सोमवार, 28 दिसंबर 2015

रक्तबीज का Clone कोई कपोलकल्पना नहीं

श्री दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय में देवी दुर्गा रक्तबीज नाम के जिस राक्षस से युद्ध कर रही थीं उसके रक्त की एक-एक बूंद से हर बार नया राक्षस पैदा होने का वर्णन श्लोकों में आता है। उस राक्षस का अंत करने के लिए देवी को अपनी अन्य शक्तियों का आव्हान करना पड़ता है, तब सारी शक्तियां मिलकर रक्तबीज के रक्त की एक- एक बूंद को पृथ्वी पर गिरने से रोकते हुए राक्षस का अंत करती हैं। 
अभी तक आधुनिक युग के शोधकर्ताओं व बुद्धिजीवियों द्वारा श्री दुर्गा सप्तशती में वर्ण‍ित यह वृत्तांत पुराणों की कपोल कल्पना और अतिशयोक्ति का एक उदाहरण माना जाता रहा है। अब जबकि यह साबित होने जा रहा है कि आधुनिक विज्ञान जहां आज पहुंचा है, भारतीय सभ्यता अपने उस उत्कर्ष को पहले ही प्राप्त कर चुकी थी, तब यह भी जानना आश्चर्य में नहीं डालता कि रक्त की मात्र एक ही बूंद से व्यक्ति का Clone बनाया जा सकता है और तो और उसे म्यूटेशंस के जरिए थोड़े ही समय में कई गुना तक किया जा सकता है, विशाल आकार भी दिया जा सकता है।
हाल ही में मेरठ के छात्र प्रियांक भारती और गरिमा त्यागी द्वारा तैयार एक शोधपत्र को चीन के अंतर्राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी सम्मेलन के लिए चुना गया है। और यह शोध अमेरिका की इनोवेटिव जर्नल ऑफ मेडीकल साइंस के आगामी अंक में छपने जा रहा है। प्रियांक भारती और गरिमा त्यागी ने अपने प्रयोग में रक्तबीज को कपोल कल्पना मानने से इंकार करते हुए बताया है कि रक्तबीज कोई चमत्कार नहीं बल्कि अति विकसित विज्ञान का एक उदाहरण था जो सबसे पहला Clone कहा जाता है।
भारतीय पौराण‍िक कथानकों की सत्यता सिद्ध करते हुए इन शोध छात्रों ने अपने प्रयोग के माध्यम से  बायोटेक्नोलॉजिकली दावा किया है कि रक्त एवं शुक्राणुओं के बीच 95 प्रतिशत समानता पाई जाती है। ऐसे में रक्त से भी जीवन की उत्पत्त‍ि संभव है। रक्त और वीर्य के न्यूक्लियस प्रोटीन समान होते हैं। यही प्रोटीन्स डीएनए संजाल के जरिए वंशानुगत गुण-दोषों के साथ बच्चों में स्थानांतरित होते हैं।
किसी व्यक्ति के उभयलिंगी होने पर यह संभावना और बढ़ जाती है कि वह शुक्राणु और अंडाणु बनाने की समान क्षमता रखता है। रक्तबीज का रक्त जब जमीन पर गिरा तो सफेद रक्त कोश‍िकाओं का न्यूक्लियस उसी के अंडे से फ्यूज कर नया भ्रूण बनाता रहा।
नई क्लोनिंग साइंस पद्धति इसी सिद्धांत पर काम करती है। रक्तबीज के रक्त से तैयार भ्रूण को जमीन से कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, सल्फर और ऑक्सीजन समेत तमाम पोषक तत्व मिलते रहे।
जापान में रक्त की एक बूंद से 600 चूहे पैदा करने का कुछ दिनों पहले एक रिकॉर्ड बनाया गया था।
बायोटेक्नोलॉजी का यह प्रयोग क्लोनिंग में काफी समय ये उपयोग होता रहा है मगर भारतीय शोधकर्ताओं का यह पहला उत्साहजनक प्रयास है जो हमारी ही सभ्यता और विज्ञान से हमें पुन: परिचित करवा रहा है। प्र‍ियांक भारती और गरिमा त्यागी का यह प्रयास सनातन (हिंदू) धर्म के उस कथन की पुष्ट‍ि करता है जिसमें धर्म और विज्ञान को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया गया है।      
दुर्गा सप्तशती या अन्य पौराणि‍क उदाहरणों से असहज होने वालों के लिए यह पचा पाना असंभव है कि ऋ‍िष‍ि दधीचि की वज्र जैसी हड्ड‍ियां हों या उनसे वज्रास्त्र बनाने के लिए उनका त्याग, राक्षसों का आसमान की ओर उड़ना और युद्ध करते हुए जमीन पर आना, रावण के एक मस्तिष्क का दस सिरों की भांति द्रुत गति से काम लेना, पुष्पक विमान, सीता का भूमि से उपजना, एक ही भ्रूण के सौ हिस्से होकर कौरवों के रूप में हमारे सामने आना, बिना शारीरिक संपर्क के ही कुंती के पांच पुत्र और उभयलिंगी व्यक्ति होना या ऋिष‍ियों के शरीर से किसी बच्चे का जन्म या फ‍िर कृष्ण जन्म के समय योगमाया का भ्रूण प्रत्यारोपण जैसी घटनायें सिर्फ कहानियांभर नहीं हैं।
यह उस समय में आनुवांशिकी विज्ञान का चरमोत्कर्ष था जिसमें बाकायदा स्टेम सेल्स, वीर्य, रक्त, मज्जा, हारमोन्स, आईवीएफ तकनीक, म्यूटेशंस और  हाइब्र‍िड तकनीक का बेहतरीन उपयोग था।
किसी भी सभ्यता के चरमोत्कर्ष के बाद उसे प्रकृति के नियमानुसार नीचे आना ही होता है और यही नीयति हमारी इस पौराण‍िक सभ्यता की भी रही, नतीजा य‍ह है कि आज हजारों साल बाद यदि कोई कहता है कि कभी हमारी सभ्यता इतनी विकसित थी तो यकायक विश्वास नहीं होता और ज्यादातर लोग इसे अंधविश्वास की अतिवादिता कहकर स्वयं अपने ही धर्म को संशय से देखने लगते हैं। वे तभी विश्वास करते हैं जब क्लोनिंग व म्यूटेशंस का उदाहरण एक्स मैन और हल्क जैसी हॉलीवुड फिल्में पेश करती हैं ।

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 28 नवंबर 2015

#HappytoBleed: ज़मींदोज़ होती ‘उन दिनों’ की बात

विचारों की राजनीति और प्रगतिशील समाज के बीच में अजीब सी रस्साकशी चल रही है। पुरानी सोच अपनी स्थापित ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं और नई उर्वरा शक्तियां उसी ज़मीन को खोद-खोद कर और अधि‍क उर्वरा बनाने को आतुर हैं।
द्वंद है अपने अपने अस्तित्व का … उसकी स्थापना का… । इन सबके बीच जो अभि‍शप्त हैं, अपनी-अपनी गर्दनें ज़मीन में गाड़ लेने के लिए, उन्हें तो समझाना जरूरी हो जाता है ना, और यह जरूरत यदि #HappytoBleed जैसे अभि‍यान के ज़रिये सामने आए तो इसमें आश्चर्य कैसा ?
टैबू बना दिए गये जीवन से जुड़े हिस्सों को अगर नई पीढ़ी खुलेपन का हिस्सा बना रही है तो इसमें हर्ज़ क्या ?
वाकया केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति को लेकर बढ़ा और विवादास्पद बयानों से #HappytoBleed कैम्पेन तक पहुंचा गया। दरअसल त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन ने विवादित बयान दिया कि महिलाओं को प्रसिद्ध साबरीमाला में प्रवेश की अनुमति तभी दी जाएगी जब उनकी शुद्धता की जांच करने वाली मशीन का आविष्कार हो जाएगा।
दरअसल युवा महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में जाने की अनुमति नहीं होती। कुछ लोगों का कहना है कि महिलाओं को इसलिए अनुमति नहीं है, क्योंकि मासिक धर्म के दौरान उन्हें अशुद्ध माना जाता है। हालांकि कुछ दूसरे विद्वानों का कहना है कि भगवान अयप्पा, जिन्हें यह मंदिर समर्पित है, को एक ब्रह्मचारी योगी माना जाता है और इसी वजह से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है मगर ये सारे नियम बनाते समय इस तथ्य को भुला दिया गया कि ब्रह्मचारी भी जिस कोख से जन्मता है वह स्त्री की ही होती है और वह भी जिसे अशुद्ध बताते हैं उसी से  जन्मे हैं।
सबरीमाला मंदिर उसी ‘प्रगतिशील केरल’ में है स्थ‍ित है जहां बीफ पर प्रतिबंध को रूढ़‍िवादी कहा जाता है , जहां शत प्रतिशत साक्षरता है।
गोपालकृष्णन के इस बयान के बाद चंडीगढ़ की एक युवती निकिता आजाद ने गत 21 नवंबर को फ़ेसबुक पर ‘HappytoBleed’ पेज बनाया जिसमें उन्होंने महिलाओं से आग्रह किया है कि “वो ये चार्ट या सेनिटरी नैपकिन लेकर अपनी तस्वीर पोस्ट करें ताकि सदियों पुराने इस पितृसत्तात्मक समाज के शर्मिंदा करने वाले इस खेल का विरोध किया जा सके.”महिलाओं ने भी लिख दिया- Hey Mr Temple Chief, We Are Very #HappyToBleed#HappytoBleed
एक सप्ताह बाद भी 21 नवंबर से चलाए जा रहे इस कैंपेन को अभी तक लगातार हिट किया जा रहा है और इसकी अवध‍ि 4 दिसंबर तक है।
केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन देखने वाली संस्था त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के एक अधिकारी के बयान को लेकर फेसबुक और ट्विटर पर जबरदस्त गुस्सा दिख रहा है, जहां सैकड़ों महिलाएं कह रही हैं कि उन्हें अपने शरीर पर गर्व है और ऐसा हो भी क्यों ना ।
ईश्वर की बनाई प्रकृति पर अंकुश लगाया जाना तो स्वयं ईश्वर का अपमान है, शरीर की प्रकृति को लेकर नियम-कानूनों को अब नई पीढ़ी मानने से इंकार कर रही है। यह संकेत है कि जो अभ‍ियान अभी फेसबुक और ट्विटर पर हैं उनके ज़मीन पर उतरने का समय आ गया है।
सबरीमाला देवाश्वम बोर्ड के प्रमुख प्रयार गोपालकृष्णन की इस टिप्पणी के खिलाफ ट्विटर और फेसबुक पर कमेंट की झड़ी लग गई,  पुरुष और महिलाएं #HappyToBleed हैशटैग के साथ कमेंट कर रहे हैं।
यह मुहिम 21 नवंबर से शुरू है, जिसमें महिलाएं अपने प्रोफाइल या कैंपेन पेज पर प्लेकार्ड या सैनेटरी नैपकिन के साथ तस्वीरें डाल रही हैं।
बहरहाल, चंडीगढ़ की निकिता आजाद की पहल से चला ये कैंपेन कुछ लोगों को बेवजह लग सकता है, कुछ इसे टाइम पास कह सकते हैं मगर ऐसी पहल अब हो चुकी है जहां माहवारी को टैबू की तरह देखने वाले इसे ना तो नज़रंदाज कर पायेंगे और ना ही इसे अपवित्रता का सिंबल बना पायेंगे।
सबसे अच्छी बात ये रही कि लड़कियां अब इस पर बात करते समय हिचकती नहीं हैं… अब वो सैनिटरी नैपकिन लेते समय इधर-उधर नहीं ताकतीं। सदियों से चली आ रही सामंती सोच को बदलने में वक्त लग सकता है मगर वक्त बदलने के निशां उसकी निरंतरता से लगाए जा सकते हैं।
इस संदर्भ में मुझे पत्रकार मनीषा पांडेय का कथन याद आता है कि जो इंडिया गेट पर निर्भया कांड के बाद बोली थीं
”औरत के इंसान बनने की राह में पुरुष की सामंती सोच अब भी सबसे बड़ी दीवार है।”

अलकनंदा सिंह

बुधवार, 18 नवंबर 2015

मदनी साहब का (अ) सहिष्णु मार्च

हमारे यहां कहावत है कि जो होता है अच्छे के लिए होता है... मदनी साहब ने कल क्या खूब कहा... मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कहना चाहूंगा कि मुसलमानों के लिए भारत से बेहतर कोई देश नहीं है... । और आज उनके  नेतृत्व में आतंकवाद के खिलाफ प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
हालांकि जमात-ए-उलेमा हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी के नेतृत्व में जमात-ए-उलेमा हिंद द्वारा आतंकवाद के खिलाफ किया जा रहा प्रदर्शन, पेरिस की खबरों के बीच कुछ दब सा गया है मगर जो प्रयास किया जा रहा है, यह काबिले तारीफ है।
उलेमा आगे आएं तो क्या मुसलमानों के नाम पर होने वाली राजनीतिक बयानबाजी और असहिष्णुता जैसी बातें अपना कॉकस बना पायेंगी ?
निश्‍चि‍त ही नहीं...
ये कोई इत्त‍िफाक नहीं हो सकता कि बिहार चुनाव से ठीक पहले तक असहिष्णुता की बात करने और अपने पुरस्कार लौटाने वाले कर्नाटक में हुई हिंसा पर चुप्पी साधे रहे।
हिंसा तो हुई ना, अंतर बस इतना था कि दादरी में मरने वाला मुसलमान था और कर्नाटक में मारा गया व्यक्ति हिंदू था।
बिहार चुनाव से ठीक पहले तक जिन नामचीन बुद्धिजीवियों ने 'मोदी सरकार' के ख‍िलाफ कथ‍ित तौर पर असहिष्णुता का झंडा उठा रखा था... उनके पुरस्कार वापसी अभ‍ियान को भी मदनी साहब ने कुछ इस तरह पलीता लगा दिया कि उन बेचारों के अवार्ड भी हाथ से गए और सहिष्णुता भी... क्योंक‍ि मदनी साहब जैसी जानी मानी इस्लामिक हस्ती ने मुसलमानों के लिए भारत को दुनिया का ''अव्वल देश'' बता दिया ... अब बुद्धिजीवियों की उस ''प्लांटेड इनटॉलरेंस'' का क्या होगा। उनके पास तो मदनी साहब के इस बयान की कोई काट भी नहीं है। उनकी इनटॉलरेंस की तो इस एक बयान ने धज्ज‍ियां ही उड़ा दीं।
दर्जन भर आयोगों के आने-जाने के बाद न्यायमूर्ति सच्चर कमेटी की आख‍िरी सिफारिशें मुसलमानों की स्थ‍ितियां संभाल पाई हों या न संभाल पाई हों मगर प्लांटेड इनटॉलरेंस के हौव्वे ने ये जरूर बता दिया कि इस देश में अगर मीडिया हाईप चाहिए तो मुसलमानों पर अत्याचार की बात कर दो।
क्या किसी ने इन बयानबाजों को सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर बात करते देखा है... या कितने एनजीओ हैं जो मुसलमान के वास्तविक हित, उनकी गरीबी, मुस्लिम महिलाओं की स्थ‍िति, अश‍िक्षा और जीवनस्तर के बदतर होने की बात करते हों।
कोई नहीं... क्योंकि इस सबकी बात करने से ना तो साहित्यकारों का ''नाम रोशन'' हो पाता और ना ही  कलाकारों को सुर्ख‍ियां मिल पातीं।
सच्चर रिपोर्ट भारतीय मुस्लिम समाज की आर्थिक, सामाजिक, तथा शैक्षिक परिस्थितियों का आईना है मगर किसी भी बुद्धिजीवी ने उसे लागू ना किये जाने पर आपत्त‍ि नहीं जताई। सच्चर समिति की रिपोर्ट के आने के इतने सालों बाद भी मुसलमानों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है।
 बहरहाल, मदनी साहब द्वारा आतंकवाद के ख‍िलाफ विरोध जताने और जंतर- मंतर सहित देश के सभी बड़े शहरों में प्रदर्शन करने से ना केवल उन युवकों पर असर पड़ेगा जो आईएस या किसी कट्टरवाद से प्रेरित हो सकते हैं बल्कि उन लोगों की भी दुकानें फीकी पड़ने की पूरी पूरी संभावना है जो गाहे-बगाहे आतंकवाद के नाम पर भारतीय मुसलमानों को विदेश‍ियों की तरह ट्रीट करते रहे हैं। 
हम तो हर बुराई में भी अच्छाई खोजने वाले देश के वाशिंदे हैं, अब देखि‍ए ना .... हमला पेरिस में आईएसआईएस आतंकवादियों ने किया और हमारे उलेमा स्वयं आगे आ गये आतंकवाद के विरोध में।
इतना ही नहीं, उनके इस बड़े कदम ने छद्म असहिष्णुतावादियों का सच भी उजागर कर दिया। 
एक ऐसा सच जो किसी "हिन्दू" के लाख प्रयास भी सामने नहीं ला पाते क्योंक‍ि उसकी सहि‍ष्णुता को भी विरोधी चश्मे से देखने का रिवाज बन गया है। तभी तो खुलेआम विभिन्न मीडिया मंचों पर आकर मोदी सरकार को गरियाने के बावजूद असहि‍ष्णुता का ढोल पीटा जाता रहा क्योंक‍ि असहि‍ष्णुता की कांग्रेसी परिभाषा ऐसी ही है।
खैर... असहि‍ष्णुता को लेकर मुस्लि‍मों की परि‍भाषा मदनी साहब ने बता ही दी है।
क्या अब कोई कांग्रेसी उन्हें जवाब देने सामने आयेगा?

- अलकनंदा सिंह    


मंगलवार, 3 नवंबर 2015

राम का जन्म अयोध्या में नहीं, डेरा इस्माइल खान में हुआ

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के सीनियर मेंबर अब्दुल रहीम कुरैशी ने अपनी किताब में भगवान राम के जन्म के बारे में नया दावा किया है।कुरैशी ने ‘फैक्ट्स ऑफ अयोध्या एपिसोड (मिथ ऑफ राम जन्मभूमि)’ टाइटल से किताब लिखी है। इसमें उन्होंने लिखा है कि भगवान राम का जन्म भारत के अयोध्या में नहीं, बल्कि डेरा इस्माइल खान में हुआ था जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान में है।
क्या है किताब का मकसद?
कुरैशी के मुताबिक वे इस किताब के जरिए राम जन्मभूमि विवाद पर जागरूकता लाने की कोशिश करेंगे। उनका कहना है कि वे अपने रिसर्च को शेयर करने के लिए हिंदू नेताओं से भी मुलाकात करेंगे। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहे बाबरी मस्जिद केस में AIMPLB भी एक पक्ष है। कुरैशी बोर्ड के असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी और स्पोक्सपर्सन हैं।
क्या दावे किए गए हैं किताब में?
* भगवान राम का जन्म डेरा इस्माइल खान में हुआ।
* यह क्षेत्र पुराने नॉर्थ-वेस्ट इंडिया का हिस्सा था। आजादी और बंटवारे के बाद यह पाकिस्तान में है।
* वहां आज भी एक स्थान का नाम रहमान देहरी है। इसे पहले राम देहरी कहा जाता था।
* किताब के मुताबिक वेद-पुराण में गंगा के मैदानी इलाके में कहीं भी राम के जन्म या उनके साम्राज्य का जिक्र नहीं है।
* राम जन्मभूमि विवाद अंग्रेजों की वजह से पैदा हुआ।
* राम के साम्राज्‍य की पहचान ‘सप्‍त सिंधु’ के जरिए की गई है। यह क्षेत्र अभी के हरियाणा-पंजाब से लेकर पाकिस्‍तान और पूर्वी अफगानिस्‍तान तक फैला हुआ है।
किताब के मुताबिक कब जन्मे थे राम?
* किताब में लिखा गया है कि हिंदू धर्म में युगों की जो मान्यता है, उसके मुताबिक श्रीराम का जन्म 24वें या 28वें त्रेता युग में माना जाता है। यानी यह वक्त करीब 1.8 करोड़ साल पहले का है। दुनियाभर में कहीं भी इतने पुराने युग के कोई अवशेष नहीं हैं।
* वहीं, रामायण में लिखी गई जगहों के मुताबिक राम का जन्म 5561 ईसा पूर्व से 7323 ईसा पूर्व से बीच का माना जाता है। लेकिन यूपी के अयोध्या और आसपास के इलाकों में 600 ईसा पूर्व से पहले के कोई सबूत नहीं मिलते।
बाबरी मस्जिद के बारे में लेखक का क्या दावा है?
* कुरैशी ने कहा- राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाए जाने की कहानी अंग्रेजों ने गढ़ी थी। अंग्रेज हिंदू-मुस्लिमों के बीच दरार लाना चाहते थे।
* गोस्वामी तुलसीदासजी ने अयोध्या में रामचरितमानस लिखी थी। उन्हीं के सामने मस्जिद थी। लेकिन उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि राम मंदिर के अवशेषों पर मस्जिद बनाई गई है।
* इस किताब के लेखक कुरैशी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक और मेंबर कमाल फारूकी ने दावा किया कि इनमें से कुछ तथ्य तो कोर्ट के सामने भी पेश किए जा चुके हैं। हम कोर्ट के आदेश से परे नहीं जा रहे लेकिन हम चाहते हैं कि सच सामने आए। यह मुद्दा राजनीति का नहीं है। यह मुद्दा धर्म और आस्था का है।
क्या है विवाद?
अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद 1949 से चल रहा है। इसमें 7 पक्ष हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को इस मामले में अपना फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने विवादित स्थल को भगवान राम का जन्मस्थल बताया था। विवादित जगह का दो-तिहाई हिस्सा हिंदुओं और एक-तिहाई हिस्सा मुस्लिमों को देने को कहा था। लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। मामला अभी भी पेंडिंग है।

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

निराला के राम और साहित्यकारों का फुल वॉशआउट

साहित्यि‍क निरपेक्षता के लिए जब मौजूदा समय को संक्रमण काल कहा जा रहा है, तब आज ठीक नवमी के दिन निराला जी द्वारा रचित   ‘राम की शक्ति पूजा’ के निहितार्थ समझ में आ रहे हैं। कल विजय दशमी है और कल ही साहित्य अकादमी की वो महत्वपूर्ण बैठक है जिसके बहाने तमाम साहित्यकार अपने भविष्य का रास्ता तय करेंगे। कल की बैठक का जो भी लब्बोलुआब निकले,  लेकिन आज मेरा ये लिखना सर्वथा आवश्यक है कि तब आखिर ऐसा क्या था कि हमारे रचनाकार व साहित्यकार जन- जन के दिलों तक समाए और राम की शक्ति पूजा (निराला) या कामायनी ( जयशंकर प्रसाद ) जैसी निरापद रचनायें दे सके। वे किसी भी शूरवीर नायक से कमतर नहीं थे, तो आज ऐसा क्या हो गया है कि पूरी की पूरी रचनात्मकता ही कठघरे में आ खड़ी हुई।
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ रचना में यह भलीभंति उद्धृत किया है कि रावण को मारने से पूर्व जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने आठ दिनों तक 108 नीलकमलों से यज्ञ करते हुए देवी महाशक्ति का आह्वान किया, तब नवें दिन 108 नीलकमलों में दो नीलकमल कम रह गए, देवी परीक्षा ले रही थीं क्योंकि राम तो दो नीलकमल लाने के लिए यज्ञ से उठ नहीं सकते थे, अचानक उन्हें याद आया कि बचपन में मां उन्हें राजीव-नयन कह कर बुलाती थीं…यानि जिनके नेत्र नीलकमल के समान हों, बस यह सोचते ही उन्होंने तूणीर साधा और अपने नेत्र निकालने को आतुर हो उठे… सत्य और निष्ठा के इस मार्ग पर उनके इस निर्भीक कदम का स्वयं देवी शक्ति ने स्वागत किया और सुविजय का आशीर्वाद दिया ।
निराला जी ने इस वृत्तांत को पढ़ते हुए आज भी वह पूरा का पूरा दृश्य आंखों के सामने आ जाता है और साथ ही आ जाता है वो साहस जो मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा को युगों युगों तक के लिए प्रतिष्ठापित कर गया ।
कल साहित्य अकादमी की बैठक से पहले आज विक्रम सेठ और अनीता देसाई का भी अकादमी पुरस्कार लौटाने वाला धमकी भरा बयान छप गया कि वे भी ‘आहत’ हैं देश में फैल रही असहिष्णुता से। यह साहित्य अकादमी पर बेजां दबाव बनाने का एनआरआई प्रयास है।
दबाव तो वह भी बेजां ही रहा होगा कि जब मशहूर शायर मुनव्वर राणा साहब ने 7 अक्तूबर को ही कहा कि अगर आप सम्मान लौटा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप थक चुके हैं, अपनी कलम पर आपको भरोसा नहीं है. लाख-डेढ़ लाख रुपये का सम्मान लौटाना बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात यह है कि आप अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को सुधारें.’ और अगले 10 – 12 दिनों में ही उनकी निष्ठा इस तरह बदलीं कि 18 अक्तूबर को स्वयं उन्होंने भी अपना अवार्ड लौटा दिया। वह अपने ही हौसलों वाले बयानों से मुकर गए, ठीक ऐसे ही जैसे कि अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल की कथ‍ित सहिष्णुता और निरपेक्षता दिखी।
कमाल की बात है ना कि साहित्यकार आदमी हैं या सिक्का, जिन्हें पलटने के लिए धार्मिक सहिष्णुता और अभ‍िव्यक्ति की आजादी जैसे  शब्दों का सहारा लिया और सत्ताओं के खांचों ने आज के रचनाकारों की असल तस्वीर हम सबको दिखाई। यह कैसे संभव है कि एक ही जैसी घटनाएं किसी खास सत्ता काल में अभ‍िव्यक्ति की आजादी का सवाल बन जाएं तो वैसी ही घटना किसी दूसरे सत्ताकाल में वक्ती जज़्बात का प्रदर्शन भर मानीं जाएं।
अब तो साहित्य अकादमी के हित और समाज के हित की बात करने वाले साहित्यकारों के कथन पर विश्वास करना भी मुश्किल हो रहा है कि कौन …क्यों…किसलिये…और कब कह रहा है। किसके कथन को सच मानें और किसे ड्रामेबाज कहें। जो कुछ भी रचनात्मक दिख रहा है वह कथ‍ित ”असहिष्णुता” के नाम पर लामबंदी के नाम स्वाहा हुआ जा रहा है।
आज गोपालदास नीरज जी ने कहा है कि साहित्यकार वर्तमान केंद्र सरकार को लांक्ष‍ित करके अपनी ‘अवार्ड लौटाऊ’ धमकियों से यह ज़ाहिर करवा रहे हैं कि वे पिछली सरकारों के किस तरह अंधभक्त रहे हैं। एक स्वायत्त संस्था साहित्य अकादमी को एक सरकारी संस्था की तरह ट्रीट करने वाले बुद्धिजनों के अपनी इस बकझक में ये भी याद नहीं रहा कि अतिरंजना में वे साहित्य अकादमी को ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।
आज तो मुझे यह लिखने में भी डर लग रहा है कि मुनव्वर राणा साहब की तरह नीरज जी भी तो कहीं अपने पुरस्कार वापस करने नहीं जा रहे ???? किसकी बात पर भरोसा किया जाए।
कल दशहरा भी है, अपने सारे कुविचारों को फुल वॉशआउट करने का समय, जो हो रहा है अच्छा ही है, साहित्यिक जगत के लिए भी एक खास किस्म के नाजीवाद से मुक्ति का समय है ये। हमाम सबका सच सामने ला रहा है। एक और बात पक्की है कि आने वाली पीढ़ी आज के इन साहित्यकारों को रचनात्मकता के लिए नहीं बल्कि एक खास कॉकसगीरी के लिए याद करेगी। जहां साहित्यकार शब्दों की नहीं व्यक्ति की शक्ति पूजा कर रहे हैं। जहां देश पीछे रह गया है और उसे खांचों में बांटने वाले स्वयं को राम निरूपित करने में लगे हैं।
बहरहाल, पुरस्कार लौटाऊ साहित्यकारों का आंकड़ा जब ‘चालीसवें’ में चल रहा है तब समझ में आ रहा है कि निराला जी के ‘राम’ और उनकी ‘शक्ति पूजा’ की आज भी इतनी निरपेक्ष स्वीकार्यता कैसे संभव है। निश्चित ही वे महाप्राण निराला जी थे जो स्वार्थों से घि‍रे दशकंधरों (साहित्यकारों) के अहंकार का नाश करने की उक्ति, अपनी रचना के माध्यम से पहले ही बता गये।

अंत में उन्हीं की कृति ‘राम की शक्ति पूजा’ के 5वें भाग से ये पंक्तियां ….पढ़ें…..

“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीव नयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”
कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।
“होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

– अलकनंदा सिंह

रविवार, 18 अक्तूबर 2015

ENJOY : menopause…International Menopause Day

Around one third of a woman’s life is lived after the menopause. The age of the natural menopause among women in developed countries is between 50 and 52 years, whereas, in less developed countries, menopause often occurs in the late ’40s. In the decade after the menopause, women become vulnerable to chronic diseases, such as cardiovascular disease, osteoporosis, cognitive decline (e.g. Alzheimer’s disease), and cancer; so the early postmenopause years provide the opportunity for women to take preventative steps to steer a positive course for their future health. Actions taken at the time of the menopause can avoid chronic diseases in later life, according to a report on women’s health marking International Menopause Day (18th October).
For all women, the report of the International Menopause Society stresses the need to consider; lifestyle measures (healthy diet and physical activity) prevention of weight gain being involved in mentally stimulating activities
The report emphasises that, in consultation with their clinician, women should undergo regular health checks for chronic conditions including cancer and heart disease. The report also considers which pharmaceuticals can benefit women going through the menopause. Heart disease kills more women than any other condition. Starting the use of estrogen and certain types of MHT (Menopausal Hormone Therapy, also known as Hormone Replacement Therapy) within 10 years of the menopause, or under the age of 60, has been shown to reduce the incidence of heart disease and all-cause mortality.
what to eat at the time of menopause
The following dietary tips will help you on your way.
ENJOY FOODS CONTAINING PHYTOESTROGENS which have the potential to reduce menopausal symptoms such as hot flushes and vaginal dryness. Here are three phytoestrogen rich foods to add to your diet.
The humble soy bean has been shown to have a modest effect on symptoms such as hot flushes and vaginal dryness. It has been shown that phytoestrogens from soy foods are far more bioavailable then those in soy supplements. Try adding 100g of tofu to your daily diet. One idea is to marinate firm tofu in a mixture of tamari Japanese soy sauce, ginger and garlic and then add to vegie stir fries. Silken (soft) tofu can be added to a smoothie. Eating a handful of soy nuts is another option.
Linseeds (also known as Flaxseeds) are rich in lignans, which also act as phytoestrogens. You can buy and grind your own flaxseeds, or you can purchase them pre-ground. Either way, remember to store them in the fridge as they are prone to rancidity when exposed to heat. Aim to have 1 tablespoon of ground flaxseeds a day; they mix nicely in yogurt, can be added to a smoothie or even sprinkled in a salad.
Alfalfa sprouts not only contain high quantities of the phytoestrogen coumestrol, but they are also a rich source of vitamins A,C,E and K. Alfalfa sprouts are great to add to salads and sandwiches.
EAT LOTS OF PLANT BASED FOOD – studies of both vegetarians and those eating a plant rich Mediterranean diet show they have a lower body weight and improved blood sugar levels. The message – eat a wholefood diet that includes whole grains, seeds and nuts, legumes, vegetables, fruit and good fats such as olive oil. This diet will naturally be minimally processed, with healthy levels of meat and dairy products.
USE HERBS AND SPICES – liven up your cooking by adding culinary herbs and spices such as ginger, cumin, chilli, cardamom, coriander, garlic, fennel seeds, bay leaf, allspice, anise and turmeric. These have been shown to reduce the risk of developing metabolic syndrome which is increasingly prevalent in menopause.
EAT CALCIUM CONTAINING FOODS – eating enough calcium containing foods is important to maintain bone mass at midlife and beyond. Foods rich in calcium include yogurt (choose those naturally sweetened with fruit or a little honey), tofu, Chinese cabbage, rhubarb, spinach, white beans, bok choy, kale, broccoli and beans (especially pinto and red beans). Also, matching your calcium intake with adequate magnesium is also important and you will find this mineral in whole grains (such as oats and rice) and vegetables.
EAT ADEQUATE PROTEIN – protein gives us energy and is needed for many body functions including growth and repair, it helps maintain healthy blood sugar levels, immune function, hormone production and fluid balance. Protein is found in meat, seafood, dairy, eggs, soy products, nuts, seeds and legumes. Aim to have some protein at each meal and also in your snacks.

- Alaknanda singh

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

निदा फ़ाजली और मुनव्‍वर राणा आखिर हैं क्‍या ?

उस दिन मैं मशहूर शायर निदा फ़ाजली साहब के बारे में पढ़ रहा था। 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ तो निदा फ़ाजली के अब्‍बा भी पाकिस्‍तान चले गए किंतु निदा फ़ाजली नहीं गए।
निदा फ़ाजली साहब का मानना था कि जो भी दंगे हो रहे हैं, उनका कारण हिंदू या मुसलमान नहीं हैं। उनका कारण इंसान हैं, चाहे उनका वास्‍ता किसी मजहब से हो। वो हिंदू हों या मुसलमान, सिख हों या ईसाई।
निदा फ़ाजली के अनुसार इंसान जहां भी होगा, वहां वह ऐसे हालात पैदा कर लेगा क्‍योंकि वह उसकी फितरत में शामिल है।
1947 में हुए बंटवारे के वक्‍त निदा फ़ाजली कितने जवान रहे होंगे, इसका अंदाज तो लगाया जा सकता है किंतु यह अंदाज लगाना मुश्‍किल है कि उस समय उनकी जो सोच थी, वह इतनी परिपक्‍व कैसे थी कि आज भी न केवल हिंदुस्‍तान के संदर्भ में बल्‍कि विश्‍वभर के संदर्भ में पूरी तरह सच्‍ची साबित हो रही है।
जरा विचार कीजिए कि यदि समस्‍या सिर्फ हिंदू या मुसलमान की होती तो दुनिया के उन तमाम मुल्‍कों में एक ही मजहब के लोग परस्‍पर एक दूसरे की जान के दुश्‍मन क्‍यों बने हुए हैं।
पाकिस्‍तान जैसे लगभग शत-प्रतिशत मुस्‍लिम आबादी वाले देश में आतंकवादी अपने ही निर्दोष भाई-बंधुओं का कत्‍ल क्‍यों कर रहे हैं। यहां तक कि उन मासूम बच्‍चों को भी निशाना बनाने से परहेज नहीं करते, जिन्‍हें ठीक से न मजहब का पता होता है और न वो उनके मकसद से वाकिफ होते हैं।
पाकिस्‍तान के अलावा सीरिया, ईरान, इराक और अफगानिस्‍तान से लेकर दुनिया के तमाम मुस्‍लिम मुल्‍कों में कौम के रक्‍त पिपाशु सक्रिय हैं जिससे साबित होता है कि निदा फ़ाजली साहब सौ फीसद सही थे।
अब बात करें हिंदुस्‍तान की तो यहां भी सवाल हिंदू, मुस्‍लिम या सिख का नहीं है। सवाल उन लोगों का है जिनकी समूची राजनीति ही वैमनस्‍यता पर टिकी है।
चूंकि मुंसिफ भी वही हैं और मुज़रिम भी वही इसलिए उनकी पूरी भूमिका कभी सामने नहीं आ पाती। जितनी और जो आ भी पाती है, वह भी राजनीति की चौसर का हिस्‍सा होती है लिहाजा सबूत व गवाहों के अभाव में दम तोड़ देती है। वो देर-सवेर बेदाग साबित होते हैं।
राजनीति में सक्रिय ऐसे रक्‍त पिपाशु न तो किसी एक मजहब में हैं और न किसी एक दल में। यह हर दल में और हर मजहब में घुसे हुए हैं।
जहां तक इनकी सामर्थ्‍य का प्रश्‍न है तो वह इतने शक्‍तिशाली हैं कि उनके अपने दल और उनके अपने नेता भी उन पर लगाम लगाने में असमर्थ हैं क्‍योंकि वहां वोटों की राजनीति तथा सत्‍ता पर कायम रहने अथवा सत्‍ता कब्‍जाने की चाहत आड़े आ जाती है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस दौर की राजनीति संभवत: राजनीति के उस मुकाम तक जा पहुंची है जहां से नीचे गिरने लायक कुछ बचा ही नहीं है। ऐसे में किसी कौम का कोई एक व्‍यक्‍ति मरे या सैकड़ों-हजारों मारे जाएं, राजनेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता।
कहीं उस गौवंश के नाम पर हिंसा की जाती है जो खुद अपने जीवन-यापन के लिए गली-गली और सड़क-सड़क आवारा घूम रहा है। कूड़े के ढेरों पर से गंदगी खाकर अपने उदर की पूर्ति कर रहा है…और कहीं मंदिर, मस्‍जिद, गुरुद्वारों तथा धार्मिक ग्रंथों की आड़ में हिंसा के बीज बोए जा रहे हैं जहां से निकलने वाली हर आवाज़ तथा जिनमें दर्ज़ एक-एक शब्‍द मानवता का संदेश देता है…शांति का उद्घघोष करता है।
घोर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि समाज का वो बुद्धिजीवी तबका भी राजनेताओं की चाल में फंस रहा है जिससे उम्‍मीद की जाती है कि वह विषम परिस्‍थितियों या संक्रमण काल में समाज को दिशा दिखाने के लिए आगे आयेंगे।
चिंता इस बात की नहीं कि बुद्धिजीवी कहलाने वाले ये लोग देश के हालातों पर अपना रोष किस तरह प्रकट कर रहे हैं, चिंता इस बात की है कि उन्‍होंने अपना बुद्धि-विवेक ताक पर रख दिया है।
बुद्धिजीवियों की इस जमात से कोई यह पूछने वाला नहीं कि यदि उन्‍हें देश पर इतना बड़ा खतरा मंडराता नजर आ रहा है और सत्‍ता के शिखर पर बैठे व्‍यक्‍ति विशेष अथवा दल विशेष से इतनी ही निराशा है तो वह खुद समाज व देश को बचाने के लिए कौन से प्रयास कर रहे हैं।
क्‍या समाज व देश के प्रति उनकी जिम्‍मेदारी सिर्फ चंद रचनाएं लिख देने और उनकी एवज में पहले तो हर हथकंडा अपनाकर पुरस्‍कार हासिल करने तथा फिर उसी पुरस्‍कार को लौटा देने तक सीमित है। क्‍या इसके अलावा उनकी समाज के प्रति कोई जिम्‍मेदारी नहीं बनती।
आज अपने पुरस्‍कार लौटाने वाले बुद्धिजीवियों व रचनाधर्मियों में से तमाम तो ऐसे हैं जिन्‍हें पुरस्‍कार लौटाने की घोषणा करने से पहले तक नई पीढ़ी जानती भी नहीं थी। आमजन को भी यह पता नहीं था कि उन्‍हें किस कार्य के लिए और कब पुरस्‍कृत किया गया जबकि मुंशी प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, हजारी प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम या शिवानी से आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग वाकिफ़ है।
आज ही के दौर में अपनी रचनाओं के साथ-साथ अपनी शख्‍सि़यत के बल पर अलग पहचान रखने वाले दिग्‍गज शायर मुनव्‍वर राणा ने सही कहा है कि जो लोग पुरस्‍कार लौटा रहे हैं वह थके हुए लोग हैं और उन्‍हें अपनी योग्‍यता पर भरोसा नहीं रहा।
स्‍वतंत्रता के आंदोलन की ओर मुड़कर देखिए तो आपको मुनव्‍वर राणा की कही हुई बातों का अर्थ शायद समझ में आ जाए, जब अनेक रचनाधर्मियों, बुद्धिजीवियों तथा पत्रकारों ने कलम के साथ-साथ समाज के बीच सक्रिय होकर भी स्‍वतंत्रता सेनानियों का साथ निभाया था और उसकी खातिर जेलयात्रा भी की थी।
निदा फ़ाजली और मुनव्‍वर राणा जैसी शख्‍सियतों का मक़सद यदि तथाकथित बुद्धिजीवियों की समझ में आ जाए तो नि:संदेह कभी कोई राजनेता अपने नापाक इरादों में कामयाब नहीं हो सकता।
नाराजगी ज़ाहिर करना और समाज के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराना हर इंसान का अधिकार भी है और कर्तव्‍य भी लेकिन यदि उस नाराजगी के पीछे कोई निजी स्‍वार्थ अथवा छद्म मकसद छिपा हो तो वह बेमानी हो जाती है। फिर राजनीति और नेकनीयती में फर्क कहां रह जाता है। यूं तो अक्‍सर राजनेता ही एक-दूसरे पर राजनीति करने का आरोप लगाते रहते हैं लेकिन वो तो राजनेता हैं, उनके आरोप-प्रत्‍यारोप भी राजनीति से परे नहीं हैं किंतु उनका क्‍या, जो कहलाते बुद्धिजीवी हैं लेकिन फिर भी राजनीति के शिकार हो रहे हैं।
इस सब को देखकर तो निदा फ़ाजली साहब का दर्शन शत-प्रतिशत सही साबित होता है कि समस्‍या जाति-धर्म या खान-पान नहीं है, समस्‍या इंसान खुद है। वो इंसान जिसे कदम-कदम पर इंसानियत सिखानी पड़ती है। यही एकमात्र ऐसी इकाई है, जो खुद को सृष्‍टि की सर्वश्रेष्‍ठ रचना बताती है लेकिन इंसानियत के मौलिक धर्म से सर्वथा अनभिज्ञ है और जिसे मानव होते हुए मानवता का पाठ एक-दो मर्तबा नहीं, बार-बार पढ़ाना पड़ता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

मुनव्वर राना ने कहा, थके हुए लोग लौटा रहे हैं पुरस्‍कार और सम्‍मान

लखनऊ। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने कहा है कि साहित्‍यकारों के विरोध का यह तरीका बताता कि वे थक चुके हैं और उन्हें अपनी कलम पर भरोसा नहीं है. मुनव्‍वर राना ने कहा कि विरोध का यह तरीका गलत है।गौरतलब है कि केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए देशभर में बड़ी संख्या में साहित्यकार साहित्य अकादमी पुरस्कार और नागरिक सम्मान लौटा रहे हैं, लेकिन मुनव्वर राना ने विरोध के इस तरीके पर सवाल उठाया है.
राना ने कहा, ‘लेखक का काम समाज को सुधारना है. हमें समाज की चिंता करनी चाहिए.’
अपनी पुस्तक ‘शाहदाबा’ के लिए 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू भाषा) से सम्मानित मुनव्वर राना ने कहा कि अगर आप सम्मान लौटा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप थक चुके हैं. उन्होंने कहा, ‘अपनी कलम पर आपको भरोसा नहीं है. लाख-डेढ़ लाख रुपये का सम्मान लौटाना बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात यह है कि आप अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को सुधारें.’
राना ने कहा कि जिन घटनाओं के विरोध में सम्मान लौटाए जा रहे हैं, वे समाज के अलग-अलग समूहों ने की हैं. उन्होंने कहा कि हमारा विरोध समाज के उन लोगों से है, न कि हुकूमत से.
राना ने कहा कि सम्मान लौटाने को विचारधारा से जोड़ना गलत है. विचारधारा कोई भी हो, साहित्यकार जिन मूल्यों के लिए काम करते हैं, वे भिन्न नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी स्वायत्तशासी संगठन है. यह पूरी तरह सरकारी संस्था नहीं है. अगर सरकार ऐसी संस्था में दखल देती है तो यह गलत है.
उन्होंने कहा, ‘मैंने ऐसे ही दखल के खिलाफ उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी से इस्तीफा दिया था.’

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

तो साहित्य जगत पर उंगली उठना भी लाजिमी है , है ना…?

आमजन के बीच पॉकेटबुक्स का चलन चलाने वाले और 1963 से अब तक 291 थ्रि‍लर व जासूसी उपन्यास लिखने वाले सुरेंद्रमोहन पाठक को साहित्य जगत ने अपनी बिरादरी से छेक कर रखा है, लिहाजा उन्हें कोई पुरस्कार मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, फिर भी वह आज मोस्ट सेलेबल लेखक हैं। सुरेंद्रमोहन पाठक का दावा है कि उनकी मौत के बाद पॉकेटबुक्स का बाजार ही बंद हो जाएगा। जहाज का पंछी की तो सिर्फ 15 दिन में डेढ़ लाख कॉपी निकल गईं।
जो स्वयं ही अपने प्रकाशक के ख‍िलाफ लिखने का माद्दा रखता हो। जिससे स्वयं बड़े साहित्यकार कमलेश्वर ने कहा हो कि तुमने माहौल बिगाड़ दिया, तुम्हारी किताबें बाजार ही पकड़ लेती हैं,
इससे साफ जाहिर होता है कि मोस्ट सेलेबल होने में और बड़ा साहित्यकार होने में फर्क है।
मगर यहां एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या साहित्य आमजन का नहीं हो सकता, क्या आमजन की समस्याओं से दूर रहकर सिर्फ कंट्रोवर्सी के लिए लिखा गया साहित्य ही पुरस्कृत होना चाहिए?
या क्या सिर्फ उसी की समीक्षा होनी चाहिए जो एक विशेष खेमे या विशेष विचारधारा के साथ साहित्य की पेशबंदी करता हो?
क्या धार्मिक असहिष्णुता की परिभाषायें साहित्यकारों के लिए अपने-अपने खेमे के अनुसार अलग अलग होती हैं?
जिन बड़ी (महान नहीं) लेख‍िका नयनतारा ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाकर खेमेबाजी को बढ़ावा दिया और उनके पीछे- पीछे 16 और साहित्यकारों द्वारा अपना पुरस्कार लौटाने की सूचना है, उनसे यह तो पूछा जाना चाहिए कि अचानक भारत की आजादी के अब तक के इतिहास में उन्हें दादरी की ही धार्मिक असहिष्णुता क्यों दिखाई दी।
नयनतारा जी यह भी बतायें कि जिन लेखकों की हत्या पर वे इतनी द्रवित हैं, उनके हित में उन्होंने सरकार को कोई पत्र लिखा या स्वयं साहित्य अकादमी को लिखा या कहीं भी किसी भी मंच से इन हत्याओं की निंदा की?
नहीं…उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया, क्योंकि ऐसा करके वे उस तरह की सुर्ख‍ियों में नहीं आतीं जिससे कि न केवल मोदी सरकार को कोसा जा सकता बल्कि कांग्रेस व नेहरू से जुड़े संस्थानों पर सरकार की कार्यवाहियों की खि‍लाफत भी की जा सकती। पुरस्कार लौटाना सुलभ था, सो उन्होंने किया।
हमेशा अभि‍जात्य वर्ग की लेख‍िका रहीं नयनतारा सहगल कब से आम जन के हित में कुछ कहने- सुनने लगीं, आश्चर्य होता है ना कि जीवन के 88 वसंत देखने के बाद उनमें गरीबों के लिए जज्ब़ात जागे। 1984 के सिख विरोधी दंगे और हालिया उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के दंगों पर वो कुछ क्यों नहीं बोलीं ?
सिख विरोधी दंगों के वक्त केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी और मुजफ्फरनगर दंगों के समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, मोदी का तो नामोनिशान तक नहीं था।
आज मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, कश्मीरी लेखक गुलाम नबी ख्याल, कन्नड़ लेखक श्रीनाथ डीएन, वरयाम संधु, जी एन रंगनाथ राव और उर्दू उपन्यासकार रहमान अब्बास द्वारा पुरस्कार लौटाने की सूचना पर क्या ये ठीक नहीं होगा कि इन सभी से वही सवाल किये जाने चाहिए जो नयनतारा से पूछे जा रहे हैं।
कश्मीरी लेखक गुलाम नबी ख्याल साहब को आज धर्म निरपेक्षता पर खतरा नजर आ रहा है। क्या वो  खतरा तब नहीं था जब कश्मीर से पंडितों को बेदखल किया जा रहा था। ये मंज़र तो उन्होंने भी देखा होगा।
सवाल तो रहमान अब्बास साहब से भी हैं कि मुज़फ्फ़रनगर के दंगों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार किस तरह हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और केंद्र का कांग्रेसनीत गठबंधन देखेंगे… करेंगे….हो रहा है… जांच करवायेंगे… दोष‍ियों को बख्शा नहीं जाएगा…. की राजनीति करके अपनी सरकार बचाने में लगा था।
हकीकत तो ये है कि साहित्य जगत पूरा का पूरा खेमों में बंट चुका है जिसे जनसरोकार से या उसे अच्छा साहित्य उपलब्ध कराने से वास्ता नहीं, बल्कि खमों में ही अपनी-अपनी पैठ गहरी करने की राजनीति करनी है…।
संकेत अच्छा नहीं हैं, कम से कम उन नये पाठकों के लिए, जिन्हें ना मोदी से मतलब है ना कांग्रेस से और न ही धर्मनिरपेक्षता के कथ‍ित ढकोसलों से, नया पाठक खुद अपनी राह बना रहा है और पुरानों की बेचैनी यही है कि वे चर्चाओं से दूर हो रहे हैं। यह उनका अंतिम अरण्य है।
अधि‍कांशत: तो अपनी उम्र के कम से कम छह दशक साहित्य के सहारे काट चुके हैं, ऐसे में इन साहि‍त्यकारों से यह उम्मीद तो कतई नहीं थी कि वो आधे सच के आधार पर अपना विरोध जतायेंगे।
एक ओर पुरस्कार लौटाने वाले कुशल राजनैतिक साहित्यकार हैं जिन्हें पुरस्कार की अहमियत सिर्फ अपने खेमों की और अपनी चमक बनाए रखने के लिए जरूरी लगती है तो दूसरी ओर सुरेंद्र मोहन पाठक जैसे रचनाकार हैं जिन्हें साहित्यिक जमात ने किसी पुरस्कार के लायक नहीं समझा। उन्हें फिक्शन या थ्र‍िलर की श्रेणी में भी नहीं रखा क्योंकि वो इनकी जमात से बाहर के थे।
सच तो यह है कि साहित्य अकादमी के लिए अब अपने पैमाने बदलने का समय आ गया है। अब Writer for elite की बजाय writer of masses की ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि खेमेबाजी और राजनीति से हटकर कुछ पाठकों के लिए, कुछ साहित्य के लिए और कुछ समाज के लिए लिखा-पढ़ा जा सके। रही बात इन पुरस्कार का कैच- कैच खेलने की तो इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला सिवाय इसके कि कुछ लेखक कांग्रेसी, कुछ वामपंथी और कुछ दक्ष‍िणपंथी हो जायें।
जो अपना पुरस्कार लौटा रहे हैं वो खालिस भारतीय समाज के हित में ऐसा कर रहे हैं, यह समझने की भूल हमें नहीं करनी चाहिए वरना किसी की ओर एक उंगली उठाने से पहले अपनी ओर मुड़ने वाली तीन उंगलियां भी देख लेनी चाहिए। विरोध की बात है तो विरोध करना जरूरी है मगर बात एकपक्षीय हो जाए तो उंगली उठना भी लाजिमी है । है ना….. ?
– अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

बेलारुस की स्वेतलाना एलेक्जिविच को साहित्य का नोबेल

इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार बेलारुस की स्वेतलाना एलेक्जिविच को दिया जाएगा। इस बात की घोषणा स्वीडेन के स्टॉकहोम में की गई। यह पुरस्कार किसी भी लेखक के लिए किसी सपने के पूरा होने जैसा ही है।
साहित्य के क्षेत्र में साल 2015 के नोबेल पुरस्कार की दौड़ में दुनिया के कई बड़े लेखक शामिल थे जिनमें जापान के उपन्यासकार हारुकी मुराकामी, केन्या के गुगी वा थियान्ग, नोर्वे के जॉन फोसे और अमेरिका के जाएस कैरॉल ओट्स और फिलिप रोथ के नाम शामिल थे। इन सभी नामों को पीछे छोड़ते हुए स्वेतलाना ने इस पुरस्कार पर बाजी मार ली।
गौरतलब है कि यह पुरस्कार साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य करने वाले लेखकों को ही दिया जाता है। इस बार यह पुरस्कार स्वेतलाना के खाते में गया।
स्वेतलाना बेलारूस की एक खोजी पत्रकार, पक्षी विज्ञानी और लेखक हैं। इनका जन्म 31 मई 1948 में यूक्रेन के एक शहर में हुआ था।
साल 1962 में यह अपने माता पिता के साथ बेलारूस में रहने आ गईं और यहीं पर अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके बाद इन्होंने एक स्थानीय समाचार पत्र में रिपोर्टर के तौर पर काम करना शुरू किया।
उन्होंने एक पत्रकार के रुप में देश में घट रही कई घटनाओं पर लिखना शुरू किया जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध, सोवियत अफगान युद्ध, सोवियत संघ का पतन और चर्नोबिल आपदा शामिल है।
उनकी पहली किताब ‘वार्स अनवुमेनली फेस’ 1985 में आई जिसकी 20 लाख से ज्यादा प्रतियां बिकीं। यह पुस्तक द्वितीय विश्व युद्ध में महिलाओं की स्थिति पर लिखी गई थी। उसके बाद उनकी दूसरी किताब ‘द लास्ट विटनेसेस’ आई जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बच्चों की स्मृति पर आधारित थी। इसके बाद उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अपना योगदान लगातार जारी रखा।

काश ! हर दिल मुनव्वर हो जाए तो कोई बात बने …

साहित्य अकादमी पुरस्कार को ठुकराने वाले लेखकों के पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तरीके से लोग व्याख्या कर रहे हैं और पुरस्कार को ठुकराने के पीछे छुपी उनकी अपनी स्ट्रैटिजिक महात्वाकांक्षाओं- आकांक्षाओं का ब्यौरा दर ब्यौरा सामने रख रहे हैं।
इस सबके पीछे गत दिनों दादरी में घटी गौमांस खाने पर हत्या किये जाने की घटना को आधार बनाया गया है। राजनैतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक जगत के ये वरिष्ठ लोग आहत हैं या आहत होने का दिखावा कर रहे हैं, यह धीमे धीमे सबके सामने आता जा रहा है।
ऐसे में कोई यदि ये कहे कि ”जिस उत्तर प्रदेश में ये घटना घटी, उस प्रदेश में नेता नहीं दलाल रहते हैं, उस प्रदेश के धर्मगुरू गाय के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं, उत्तर प्रदेश में मसला गाय का नहीं 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव का है,” तो आप क्या कहेंगे?
यही ना कि ये फरिश्ता कहां से आ टपका जो इस सोचविहीन समाज में ऐसी बातें कर रहा है। हो सकता है कि आप ये भी कहें कि इस व्यक्ति को या तो कोई खौफ नहीं है या इसे लालच नहीं है उस जमात में बैठने का जो साहित्य जगत को भी राजनीति का अखाड़ा बनाने पर आमादा रहती है।
जी हां! ये हैं मशहूर शायर मुनव्वर राणा, जिन्होंने सहारनपुर के मुशायरे में भाग लेने से पहले मीडिया के सामने अपने जज़्बात साझा करते हुए यह सब कहा। मुनव्वर राणा व अनवर जलालपुरी सहारनपुर के मेला ”गुघाल” के अवसर पर आयोजित होने वाले मुशायरे में शामिल होने पहुंचे थे।
मुनव्वर राणा साहब की लाजवाब शख्स‍ियत के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं है। और कल तो उन्होंने सरेमीडिया उक्त बात कहकर न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति की ज़मींदोज़ हो चुकी साख को लानत मलानत भेजी बल्कि उस साहित्यिक जमात के विचारों को भी ललकारा जो आजकल देश की सेक्यूलर छवि को लेकर बड़े चिंतित हैं। ये वही साहित्यिक जमात है जो आयातित सेक्यूलरिज्म के नाम पर अनर्गल लिखने और बोलने को सच्ची साहित्यिक साधना कहती है, बिना ये सोचे कि हमारे देश का समाजवाद दुनिया के किसी और देश में नहीं, उन देशों में भी नहीं जहां के समाजवाद को ये के साहित्यिक वरिष्ठजन इसे ढो रहे हैं। ये वही जमात है जो कला या साहित्य साधना के नाम पर चरित्रों के कोने- कोने को भ्रष्ट करती है। ये वही जमात  है जिसके लिए शराब और बीफ  साहित्यिक गोष्ठियों का मेन मेन्यू होता है। ये कैसा समाजवाद है इनका, मुनव्वर साहब ने इन साहिबानों के समाजवाद पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि गाय को जो बेचे या मारे, वह सबसे बड़ा गुनहगार है। बीफ मुद्दे पर दो पक्षों द्वारा की जा रही राजनीति म‍हज 2017 के चुनावों तक है। जब दादरी का पीड़‍ित परिवार राज्य और केंद्र सरकारों के प्रयास व स्वयं अपने गांव वालों की दिलेरी से मुतमईन है तो फिर आजम खान जैसे नेता या कोई आदित्यनाथ जैसे धर्मगुरू द्वारा इस प्रकरण में बयानबाजी के आखिर क्या मायने हैं।
प्रदेश के मुख्यमंत्री अख‍िलेश यादव और नगर विकास मंत्री आजम खान द्वारा उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की ओर से प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को सम्मानित किए जाने के सवाल पर मुनव्वर राणा ने कहा कि जो उर्दू की आत्मा को नहीं जान सके वे ही पुरस्कार समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं। आख‍िर ये कैसा मजाक है उर्दू के साथ।
अनवर जलालपुरी के संग प्रेस वार्ता कर रहे मुनव्वर राणा साहब ने उर्दू अकादमी के चेयरमैन बनाने की प्रक्रिया और नीयत दोनों पर सवाल उठाए कि नाकाबिल लोग अगर राजनैतिक रसूख के बल पर चेयरमैन बनेंगे तो अकादमी और उर्दू जबान दोनों का गर्त में जाना निश्चित है। उनका ये कहना कि कोई शायर है और मुसलमान है सिर्फ इसी के बूते उर्दू अकादमी का चेयरमैन नहीं बनाया जा सकता। उसमें नेताओं की चौखट चूमने से ज्यादा भाषा के सम्मान का गुण होना चाहिए।
उर्दू अकादमी का चेयरमैन बनाने के पीछे मुसलमान होना कोई वजह नहीं होनी चाहिए इसी तरह उर्दू की बेहतरी के लिए उर्दू अकादमी की जरूरत नहीं, अकादमी बना देने से उर्दू का भला होने वाला नहीं है क्योंकि अकादमी को लेकर प्रदेश सरकार की मंशा अच्छी नहीं है। सरकार और सरकार के मंत्रीगणों ने उर्दू अकादमी को अय्याशी का अड्डा बना रखा है।
मुनव्वर राणा का ये कहना कि जिस दिन प्रदेश के मुसलमान सपा सरकार में शामिल मुस्लिम नेताओं के पीछे चलना छोड़ देंगे तथा लाल बत्ती वालों का गिरेबां पकड़ लेंगे, उसी दिन प्रदेश के मुस्लिमों के हालत सुधर जाएंगे।
ये वो झकझोरते सवाल हैं जो मुनव्वर राणा साहब ने उर्दू के भविष्य, साहित्य की छीछीलेदर करती समाजवादी जमात और गाय को लेकर हो रही राजनीति पर दागे व स्वयं मुसलमानों की भटकी हुई दिशा व दशा पर उठाए।
निश्चित ही भूखों मरती गायों की ओर कभी मुड़कर न देखने वाले, गौशालाओं के नाम पर देश-विदेश से भारी दान इकठ्ठा करने वाले धर्मगुरूओं की आज अचानक गाय और बीफ मुद्दे पर उमड़ी करुणा और दया हो या आजम खान के उर्दू और मुसलमानों के लिए बहते आंसू, इनको आइना दिखाने वाले मुनव्वर राणा व अनवर जलालपुरी इंसानियत की जिस सूरत की बात करते हैं उसके लिए बार- बार तहेदिल से यही निकलता है कि काश ! हर दिल मुनव्वर हो जाए तो कोई बात बने …
मुनव्वर साहब के ही शब्दों में —-
यहाँ वीरानियों की एक मुद्दत से हुकूमत है
यहाँ से नफ़रतें गुज़री है बरबादी बताती है
लहू कैसे बहाया जाय यह लीडर बताते हैं
लहू का ज़ायक़ा कैसा है यह खादी बताती है
ग़ुलामी ने अभी तक मुल्‍क का पीछा नहीं छोड़ा
हमें फिर क़ैद होना है ये आज़ादी बताती है….
– अलकनंदा सिंह

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

लेखकों को साहित्य अकादमी का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए

लेखकों को विरोध करने का अलग तरीका अपनाना चाहिए और साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्तशासी निकाय का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए.
लेखक नयनतारा सहगल और कवि अशोक वाजपेयी द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा करने के बाद अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा है कि अकादमी कोई सरकारी संगठन नहीं बल्कि एक स्वायत्तशासी निकाय है. किसी भी लेखक को एक चुने गए कार्य के लिए पुरस्कार दिया जाता है और पुरस्कार लौटाने का कोई तर्क नहीं है क्योंकि यह पद्म पुरस्कार जैसा नहीं है.
हिंदी कवि अशोक वाजपेयी ने आज साहित्य पुरस्कार लौटा दिया, जो उन्हें 1994 में उनके काव्य संग्रह ‘कहीं नहीं वहीं’ के लिए दिया गया था.
उन्होंने यह पुरस्कार ‘जीवन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर हमले’ के खिलाफ लौटाया और आरोप लगाया कि साहित्य अकादमी की ओर से कुछ नहीं कहा गया.
कल लेखक नयनतारा सहगल ने एक खुला पत्र लिखकर अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी और दादरी में एक मुस्लिम की गोमांस खाने के संदेह में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर की गई हत्या और कन्नड़ लेखक एम. एम. कलबुर्गी और तर्कवादी नरेंद्र डाभोलकर एवं गोविंद पानसरे की हत्याओं का उल्लेख किया.
तिवारी ने कहा, ‘भारत की साहित्यिक संस्कृति की राष्ट्रीय अकादमी पुरस्कार के लिए चुनी गई कृतियों का अनुवाद विभिन्न भाषाओं में कराता है और पुरस्कृत लेखक को इससे काफी सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. यदि लेखक पुरस्कार लौटा भी देता है तो उसे मिली ख्याति का क्या?’
अकादमी के अध्यक्ष तिवारी स्वयं हिंदी के जानेमाने कवि, लेखक, और समीक्षक हैं.
उन्होंने लेखकों से विरोध जताने के लिए अलग तरीका अपनाने का आग्रह किया और कहा कि वे इस साहित्यिक संस्था को राजनीति में नहीं खींचें. उन्होंने कहा, ‘लेखकों को विरोध जताने के लिए अलग तरीका अपनाना चाहिए. वे साहित्य अकादमी को जिम्मेदार कैसे ठहरा सकते हैं जिसका 60 से अधिक वर्षों से अस्तित्व है. आपातकाल के दौरान भी अकादमी ने कोई रुख नहीं अपनाया था.’ उन्होंने जोर देकर कहा कि साहित्यिक हलकों में परंपरा के तहत अकादमी कृतियों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कराता है, पुरस्कार देता है, सम्मेलन आयोजित करता है और कार्यशालाएं आयोजित करता है ताकि साहित्यिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाया जा सके.
तिवारी ने कहा, ‘यदि साहित्य अकादमी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी के खिलाफ विरोध जताएगा तो क्या वह अपने प्राथमिक कार्य से भटक नहीं जाएगा.? उन्होंने कहा, ‘मैं समझता हूं कि लेखक साहित्य अकादमी नहीं बल्कि सरकार का विरोध कर रहे हैं. इसलिए यदि यह एजेंडा है तो क्या साहित्य अकादमी को इस एजेंडे में पड़ना चाहिए और साहित्यिक कार्य छोड़ देना चाहिए?’

देश का पहला बंगाली साहित्य महोत्सव कोलकाता में

देश का पहला बंगाली साहित्य महोत्सव रविवार को कोलकाता में आयोजित होगा. इस आयोजन में पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के साहित्यकार हिस्सा लेंगे.पत्र भारती प्रकाशन के सहयोग से ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर द्वारा आयोजित दिनभर का अपीजे बांग्ला साहित्य उत्सव (एबीएसयू) बहस, चर्चा और कविता सत्रों के माध्यम से बंगाली साहित्य के रुझानों और बदलावों की तलाश करेगा.
पत्र भारती समूह के प्रबंध निदेशक त्रिदिब कुमार चट्टोपाध्याय ने कहा, “यद्यपि कोलकाता में हर साल तीन साहित्य उत्सव आयोजित होते हैं लेकिन कोई भी साहित्‍य उत्सव बंगाली साहित्य को समर्पित नहीं है.”
उन्होंने कहा, “इससे न सिर्फ दृष्टिकोण को व्यापक करने में मदद मिलेगी, बल्कि विवादास्पद लेखन को भी सामने लाया जा सकेगा.”
महोत्सव में प्रख्यात लेखक शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय, नबनीता देव सेन, समरेश मजुमदार, संखा घोष, इमदादुल हकमिलान (बांग्लादेश), बानी बसु सहित अन्य प्रतिभागी हिस्सा लेंगे.
सिनेमा और साहित्य के बीच संबंधों को रेखांकित करने के लिए फिल्मकार गौतम घोष, सुमन मुखोपाध्याय, अनिरुद्ध रॉय चौधरी, मैनाक भौमिक के साथ ही बंगाली संगीतकार नचिकेता, सुरोजित चटर्जी और कालिका प्रसाद भी चर्चा सत्र में हिस्सा लेंगे.
इसमें साहित्य और सिनेमा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होगी.

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

भारत में नाटक एग्नेस ऑफ़ गॉड का विरोध क्‍यों ?


आप जब इस ख़बर को पढ़ रहे होंगे तो मुंबई के एनसीपीए थिएटर में विवादित नाटक ‘एग्नेस ऑफ़ गॉड’ का मंचन पूरा हो चुका होगा. इस नाटक को लेकर कैथोलिक ईसाई समुदाय में भारी नाराज़गी है. वो पूरे भारत में इसके मंचन पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं.
लेकिन इस नाटक के मंचन पर रोक लगती नहीं दिख रही है. इसके निर्माता-निर्देशक कैज़ाद कोतवाल का कहना है कि वो इसे पूरे भारत में लेकर जाएंगे.
विस्तार से पढ़िए क्यों इसका विरोध हे रहा है?
साल 1982 में न्यूयॉर्क की ब्रॉडवे प्ले पब्लिशिंग कंपनी के जॉन पाईलमियर के नाटक ‘एग्नेस ऑफ़ गॉड’ को भारत में दिखाया जा रहा है. यह काम कर रहे हैं ‘वजाइना मोनोलॉग’ जैसे विवादित और चर्चित नाटक का मंचन कर चुके कैज़ाद कोतवाल.
एक नन के गर्भवती हो जाने और उसके बाद पैदा हुए हालात पर आधारित इस नाटक पर कैथोलिक ईसाई समाज को ख़ासी आपत्ति है. वे इस नाटक में इस्तेमाल कई शब्दों को ननों के लिए अभद्र और आपत्तिजनक मानते हैं.
इस मुद्दे पर 1985 में एक हॉलीवुड फ़िल्म भी बन चुकी है. उस समय भी यूरोप और दूसरे देशों में ईसाई समाज ने इसका विरोध किया था.
बिना देखे विरोध
हालांकि मुंबई में इस नाटक के मंचन पर रोक लगाने की मांग की गई है लेकिन सोमवार को हुए इस नाटक के मंचन पर कोई बड़ा विरोध नहीं किया गया.
इस नाटक के निर्देशक कैज़ाद कोतवाल ने कहा, “हमारे नाटक को कुछ विशेष लोग बिना देखे ही बैन करने की मांग कर रहे हैं और गलत ठहरा रहे हैं.”
वो कहते हैं, ” हमने यह नाटक सेंसर बोर्ड से पास करवाने के बाद ही दिखाना शुरू किया है. महाराष्ट्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री एकनाथ खड़से ने मुझे आश्वासन दिया है कि अगर हमने क़ानून नहीं तोड़ा है तो नाटक को भी नहीं रोका जाएगा.”
एकनाथ खड़से ने इस बात की पुष्टि की कि सरकार इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी. उन्होंने बताया कि सुरक्षा कारणों से कैज़ाद को पुलिस सुरक्षा दी गई है.
प्रतिक्रिया
इस मामले पर कैथोलिक समुदाय के बिशप का कहना है,” इस नाटक में संन्यासी जीवन जीने वाली ननों को ग़लत तरीके से दिखाया जा रहा है. इस मामले में हम महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से मिलने भी वाले हैं.”
लेकिन कैज़ाद इस विरोध को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन मानते है. वो कहते हैं, ” ननों के साथ बुरी घटनाएं होती हैं. यह सच है और मैं सिर्फ़ सच को दिखा रहा हूं और दिखाता रहूंगा.”
क़ैज़ाद को भले ही ईसाई समुदाय के विरोध का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन कुछ लोगों का उन्हें समर्थन भी मिला है.
अभिनेत्री शबाना आज़मी ने ट्वीट कर कहा, ” मैं कैज़ाद और महाबानो (सह निर्माता) के साथ खड़ी हूं क्योंकि इस नाटक को सरकारी स्वीकृति मिली है. यह काफ़ी है.”
सोशल एक्टिविस्ट कविता कृष्णन कहती हैं,” इस नाटक पर बैन की मांग एक असहनशील माहौल का उदाहरण है. बैन कल्चर नहीं चलेगा, अभिव्यकित की स्वतंत्रता की रक्षा होनी चाहिए.”

सोमवार, 28 सितंबर 2015

विसर्जन किसका होना चाहिए ?

धर्म अगर शब्दों, प्रतीकों, मूर्तियों तक सिमट कर रह जाए तो उसमें जड़ता आना स्वाभाविक है... और यही जड़ता जब 'सिर्फ मैं' की संतुष्टि के लिए मरने-मारने पर उतारू हो जाए तो ज़रा बताइये, धर्म बचेगा क्या ?
धर्म पालन के नाम पर नियम-कानून से भी ख‍िलवाड़ किया जाना पिछले कुछ दिनों से एक शगल बनता जा रहा है। स्थ‍िति तब और खतरनाक हो जाती है जब कानून को स्वयं धर्मध्वज ही तोड़ने लगें। ऐसे में धर्म का कौन सा स्वरूप आमजन के बीच स्थापित होगा, इसकी परिणति लोगों की मानसिकता को कितना धस्त करेगी, इसे आसानी से समझा जा सकता है ।
गणेश प्रतिमा विसर्जन की आड़ में वाराणसी, गोंडा और मुंबई की घटनाएं धर्म के नाम पर असहिष्णु स्वरूप को लेकर यह सोचने के लिए काफी हैं कि आखिर किस ओर जा रहे हैं हम, कौन सी सोच को प्राश्रय दे रहे हैं?
भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापना के पीछे जो उद्देश्य होता है, उसे किस आतातायी युग में ले जा रहे हैं?
वाराणसी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सहित बजरंग दल व अन्य हिंदू धर्मावलंबियों ने गणेश प्रतिमा का गंगा में विसर्जन करने के लिए काशी के प्रशासन के समक्ष धरना दे रखा था। कोर्ट के आदेशों की वजह से प्रशासन उन्हें रोक रहा था जिसके परिणाम स्वरूप टकराव बढ़ा और वह लाठीचार्ज में तब्दील हो गया।
अब इस पर स्थानीय नेताओं के साथ-साथ प्राची जैसी बेलगाम जुबान वाली साध्वी भी इसे प्रशासन की हिंदू विरोधी कार्यवाही बताकर बरगलाने की कोशि‍श कर रही है ।
दूसरा मामला गोंडा में प्रतिमा विसर्जन को लेकर दो पक्षों के आपस में भि‍ड़ जाने का है। यहां भी कोर्ट के आदेशानुसार प्रतिमा विसर्जन के लिए बनाए गए कुंड में विसर्जन न करने पर कथ‍ित भक्तगण अड़े हुए थे और उसे नदी में प्रवाहित करना चाहते थे।
तीसरा मामला कुछ अलग है। मुंबई में प्रतिमा विसर्जन के दौरान गुटबाजी के चलते एक गुट के लोगों ने दूसरे गुट के व्यक्ति को प्रतिमा के साथ ही कुंड में डुबोकर मार दिया, सीसीटीवी फुटेज में मिले सबूतों से पता चला वरना वो महज हादसा बताकर रफा दफा कर दिया जाता।
वाराणसी और गोंडा की घटनाएं नदियों में प्रदूषण के प्रति आमजन की लापरवाही को ही नहीं, बल्कि धर्म को सिर्फ और सिर्फ ढोंग बनाकर पेश कर रही हैं। सदियों पूर्व नदियों की स्वच्छता के लिए स्वयं समाज ने जिन नियमों को बनाया था, आज वही अपने उन नियमों को तोड़ रहा है और नतीजा यह कि अब जीवनदायिनी नदियों को धर्म के इस रूप से ही बचाने को कोर्ट को सामने आना पड़ रहा है।
यह क्या लज्जा की बात नहीं कि हमें हमारी नदियों की शुद्धता व पवित्रता बनाए रखने के लिए कोर्ट को आदेश देना पड़ रहा है। समाज के इन धर्माध‍िकारियों से ये पूछा जाना चाहिए कि हर व्यक्ति को धर्म का उपदेश देने से पहले ये स्वयं ही धर्म को अपने आचरण में ढाल कर क्यों नहीं दिखाते ।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पुलिस प्रशासन की लाठियां खाते समय चीख रहे थे ''मैं अपने भगवान को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा'' ...तो  क्या अविमुक्तेश्वरानंद को यह नहीं बताया जाना चाहिए कि भगवान ''छोड़ने और पकड़ने'' की वस्तु नहीं होते। जो छोड़ना है वह है अपना अंधविश्वास, नदियों को प्रदूषित करने की अंधविश्वासी प्रवृत्ति।
इसी तरह गोंडा की घटना में मूर्ति विसर्जन को लेकर जो जिद अपनाई गई वह क्या गणेश की मूर्ति स्थापना का मज़ाक नहीं थी?
मुंबई में गणेश विसर्जन के साथ ही किसी की हत्या भी क्या धर्म के इसी बिगड़ते स्वरूप की बानगी नहीं है?
बहरहाल, पिछले कुछ दिनों से धर्म और उनके अनुयायियों की इतनी जमातें सामने आई हैं कि इन सब में इंसानियत तो कहीं पीछे छूटी ही, वो मुद्दे भी पीछे छूट गये जिनके लिए सरकारें अभी तक ना जाने कितना धन और समय बर्बाद कर चुकी हैं।
देश में लाखों की संख्या में साधु संत मौजूद हैं मगर आज तक कितनों ने नदियों के प्रदूषण को दूर करने की पहल की है। पूरा का पूरा जीवन साधना के नाम पर 'आराम' फरमाने पर जाया कर दिया।
स्वयं अविमुक्तेश्वरानंद चाहते तो एक अलग मिसाल कायम कर सकते थे, लीक से हटकर प्रतिमा विसर्जन की नई पद्धति ईज़ाद करते, कुछ अलग करने की पहल तो करते .... निश्च‍ित जानिए उन्हें सर आंखों पर बैठा लिया जाता ... । मगर धर्म की पट्टी बांधे लोगों से धर्म को इंसान व देश की बेहतरी के लिए प्रयुक्त करने की आशा करना बेमानी है। कट्टरवादिता का ये स्थापित रूप अब असहनीय होता जा रहा है।    
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 21 सितंबर 2015

दिल्‍ली में कुमाऊं साहित्य समारोह का आयोजन

नई दिल्‍ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्‍ली में कुमाऊं साहित्य समारोह का आयोजन 23 से 27 अक्टूबर तक किया जाएगा. इसका पूर्वावलोकन राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित किया गया. पूर्वावलोकन के तौर पर समारोह से संबंधित कई सामाजिक कार्यक्रमों- ‘वुमेन राइटर्स अनलिमिटेड’, ‘फेलोज ऑफ नेचर’, ‘लिटररी भागीदारी’ और ‘के-लिट’ मोबाइल एप का अनावरण किया गया.
उत्तराखंड में हिमालय में बसे छोटे से गांव धनचौली के ते-अरोहा में देश की इस पहली साहित्य समारोह यात्रा में जाने-माने लेखक, सिनेमा और मीडिया की जानी-मानी हस्तियां, राजनीतिक टीकाकार आदि भाग लेंगे.
इस समारोह के संस्थापक और पेशे से वकील सुमंत बत्रा ने कहा कि इस वार्षिक समारोह को धनचौली में आयोजित करने के पीछे कारण यह है कि इस जगह का साहित्य से खास रिश्ता है.
बत्रा ने कहा, “कुमाऊं साहित्य समारोह ग्रामीण क्षेत्र में आयोजित किया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पहला समारोह है.”
पत्रकार और समारोह की सलाहकार समीति की अध्यक्ष बरखा दत्त ने बताया, “इस असहिष्णु समाज में यह समारोह प्रतिबंध की संस्कृति पर बात करेगा. पोर्न पर प्रतिबंध का समर्थन करने वाली लेखिका अनुजा चौहान और इसका विरोध करने वाले अन्य लोग अपने विचार प्रकट करने के लिए मंच साझा करेंगे.”
बत्रा ने कहा, “यह पहला ऐसा समारोह होगा, जिससे कई सामाजिक और अन्य मुद्दों के सार्थक परिणाम निकल कर सामने आएंगे.”
वुमेन राइटर्स अनलिमिटेड सीरीज महिलाओं को सशक्त बनाने की एक पहल है. यह कुमाऊं साहित्य समारोह के इस खास आकर्षण को उजागर करती है कि इसके प्रतिभागियों में 50 फीसदी से अधिक महिलाएं हैं.
एक अन्य सामाजिक कार्यक्रम ‘फैलोज ऑफ नेचर’ में प्रकृति पर लघु कथाओं की एक किताब तैयार करने की योजना है. चुनी गई दो सर्वोत्कृष्ट कहानियों को ‘एफओएन’ पुरस्कार दिया जाएगा. इस अभियान के तहत पर्यावरण के जटिल मुद्दों पर प्रकाश डाला जाएगा.
साहित्य भागीदारी कार्यक्रम युवाओं को सहित्य के माध्यम से प्रेरित करेगा.
मोबाइल एप ‘के लिट’ समारोह को लाइव देखने और वक्ताओं से बातचीत की सुविधा देगा.
समारोह की योजना और अवधारणा बरखा दत्त, साहित्यकार अनुज बाहरी, फिल्म निर्माता झानवी प्रसाद और कई अन्य लोगों ने मिलकर की है. यूएन वुमेन और उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने समारोह में सहयोग दिया है.
समारोह के वक्ताओं में कथाशिल्पी मृणाल पांडे, इतिहासकार शेखर पाठक, साहित्यिक इतिहासकार रक्षंदा जलील, लेखिका अनुजा चौहान और नमिता गोखले सहित कई अन्य शामिल होंगे.
समारोह में ‘राजनीतिक अभियान का स्थानांतरित होता परिदृश्य’, ‘भारतीय सिनेमा केभूली हुई किंवदंतियां’ ‘पारंपरिक भारत में महिलाओं की भूमिका’ और ‘जनमानस को साहित्य से जोड़ती भारतीय कविता’ जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी.

महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के पुनर्प्रकाशन का विमोचन


रायबरेली। 83 साल पहले छपे व आज दुर्लभ महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के पुनर्प्रकाशन का विमोचन समारोह साहित्य आकदेमी के अध्यक्ष डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी युग निर्माता और युग प्रेरक थे। उन्होंने प्रेमचद, मैथिलीशरण गुप्त जैसे लेखकों की रचनाओं में संशोधन किए। उन्होंने विभिन्न बोली-भाषा में बंटी हिंदी को एक मानक रूप में ढालने का भी काम किया। वे केवल कहानी-कविता ही  नहीं, बल्कि बाल साहित्य, विज्ञान, किसानों के लिए भी लिखते थे।  हिंदी में प्रगतिशील चेतना की धारा का प्रारंभ द्विवेदीजी से ही हुआ।
श्री तिवारी आज से 83 साल पहले छपे व आज दुर्लभ महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के पुनर्प्रकाशन के विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि की आसंदी से बोल रहे थे। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न इस समारोह की अध्यक्षता प्रख्यात आलोचक प्रो. मैनेजर पांडे कर रहे थे। इस आयोजन में पद्मश्री रामबहादर राय, प्रो. पुष्पिता अवस्थी, नीदरलैंड , अनुपम मिश्र और न्यास की निदेशक डा. रीटा चौधरी विश‍िष्ट अतिथि थे।
उल्लेखनीय है कि सन 1933 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा आचार्य द्विवेदी के सम्मान में प्रकाश‍ित इस ग्रंथ में महात्मा गांधी से लेकर ग्रियर्सन तक और प्रेमंचद से लेकर सुमित्रानंदन पंत व सुभद्रा कुमारी चौहान तक देश-दुनिया के सभी विश‍िष्ट लोगों ने आलेख लिखे थे।
कई दुर्लभ चित्रों से सज्जित यह ग्रंथ उस दौर की भारतीय संस्कृति व सरोकार का आईना था। इस दुर्लभ पुस्तक को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने फिर से प्रकाश‍ित किया है जिसकी भूमिका प्रो. मैनेजर पांडे ने लिखी है। अपने उद्बोधन में प्रो. पांडे ने इस ग्रंथ को भारतीय साहित्य का विश्वकोष निरूपित किया। उन्होंने आचार्यजी की अर्थशास्त्र में रूचि व ‘‘संपत्ति शास्त्र’’ के लेखन, उनकी महिला विमर्ष और किसानों की समस्या पर लेखन में भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।  श्री अनुपम मिश्र ने पुस्तक में प्रस्तुत चित्रों को अपने विमर्ष का केंद्र बनया। उन्होंने नंदलाल बोस की कृति ‘रूधिर’ और अप्पा साहब की कृति ‘मोलभाव’ पर चर्चा करते हुए उनकी प्रासंगिकता पर विचार व्यक्त किए। श्री मिश्र ने अच्छे कामों के केंद्र को विकेंद्रीकृत करने पर जोर दिया।
नीदरलैड से पधारीं हिंदी विदुषी प्रो. पुश्पिता अवस्थी ने कहा कि इस ग्रंथ को कई-कई बार पढ़ कर ही सही तरीके से समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि हिंदी का असली ताकत उन घरों में है, उन मस्तिष्कों में है जहां भारतीय संस्कृति बसती है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की निदेशक व साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित लेखिका डा. रीटा चैधरी ने कहा कि यह अवसर न्यास के लिए बेहद गौरवपूर्ण व महत्वपूर्ण है कि हम इस अनूठे ग्रंथ के पुनप्र्रकाषन के कार्य से जुड़ पाए। उन्होंने ऐसी विश‍िष्ट पुस्तकों का अनुवाद सभी भारतीय भाषाओं में करने  पर बल दिया। डा. चौधरी ने कहा कि यह ग्रंथ हिंदी का नहीं बल्कि भारतीयता का ग्रंथ है और उस काल का भारत दर्शन है।
प्रख्यात पत्रकार रामबहादुर राय ने इन दिनों मुद्रित होने वाले नामीगिरामी लोगों के अभिनंदन ग्रंथों की चर्चा करते हुए कहा कि ऐसे ग्रंथों को लोग घर में रखने से परहेज करते हैं लेकिन आचार्य द्विवेदी की स्मृति में प्रकाश‍ित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य, समाज, भाषा, ज्ञान का विमर्श करते हैं ना कि आचार्य द्विवेदी की प्रशंसा मात्र। उन्होंने इस ग्रंथ को अपने आप में एक विष्व हिंदी सम्मेलन निरूपित किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में श्री गौरव अवस्थी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी से जुड़ी स्मृतियों का एक पॉवर पॉईंट प्रेजेंटेशन किया जिसमें बताया गया कि किस तरह से रायबरेली का आम आदमी, मजदूर, किसान भी आचार्य द्विवेदी जी को समझता और सम्मान करता है। अंत में पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने इस ग्रंथ के प्रकाशन हेतु राष्ट्रीय पुस्तक न्यास व इस आयोजन के लिए रायबरेली की जनता को धन्यवाद किया। कार्यक्रम का संचालन पंकज चतुर्वेदी ने किया।

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

‘ख़बर लहरिया’ अख़बार की संपादक और पत्रकारों को बलात्कार की धमकी

नई दिल्‍ली। ‘ख़बर लहरिया’ नाम से अख़बार निकालने वाली आदिवासी और दलित ग्रामीण महिलाएं को आठ महीने से एक शख़्स बलात्कार की धमकी दे रहा है। उत्तर प्रदेश की इन महिला पत्रकारों को टेलीफ़ोन से अश्लील बातें कहने और धमकियां देने वाले शख़्स के ख़िलाफ़ आख़िरकार राज्‍य सरकार ने कार्यवाही करने का भरोसा दिलाया है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने एक ट्वीट में कहा कि, “स्पेशल टीम बनाई गई है और उन्हें अपराधी को जल्द से जल्द पकड़ने के लिए रवाना कर दिया गया है.”
ये आदिवासी, दलित ग्रामीण महिलाएं ‘ख़बर लहरिया’ नाम का अख़बार चलाती हैं. 40 महिलाओं द्वारा चलाया जाने वाला ये अख़बार उत्तर प्रदेश और बिहार में स्थानीय भाषाओं में छपता है.
अख़बार की संपादक कविता ने एक वेबसाइट पर अपनी आपबीती लिखी.
उनके लेख के मुताबिक़ जनवरी से एक शख़्स उन्हें लगातार फ़ोन कर रहा है, “रात में फ़ोन करके वो कहता, मुझसे गंदी बातें करो, नहीं तो मैं तुम्हारा अपहरण कर बलात्कार करूंगा। कई बार करूंगा, जहां भी छिपोगी, ढूंढ लूंगा, तुम्हें भी और तुम्हारी साथियों को भी.”
संपादक के मुताबिक़ ये आदमी अलग-अलग नंबर से फ़ोन करता है और कई बार उनका और उनकी सहयोगियों के सिम कार्ड भी ब्लॉक करवा चुका है.
कविता के मुताबिक़ मार्च में उन्होंने उस आदमी के ख़िलाफ़ पुलिस में एफ़आईआर दर्ज कराई थी पर अब तक उसे ढूंढा नहीं जा सका है.
वो पुलिस के ख़राब रवैये की भी चर्चा करती हैं, “इंस्पेक्टर ने मुझे कहा, बताओ वो तुम्हें कौन सी गालियां देता था? कैसे कहता था? जो भी वो फ़ोन पर कहता था वो सब मेरे लिए दोहराओ”
‘द लेडीज़ फ़िंगर’ वेबसाइट पर उनका लेख छपने के बाद उसे ट्विटर पर कई महिला पत्रकारों ने शेयर किया. आख़िरकार उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ़ से आश्वासन भरे ट्वीट किए गए.
उत्तर प्रदेश सरकार के ट्वीट में कहा गया कि बांदा के एसपी ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि ये केस बहुत संवेदनशीलता से देखा जाएगा.
एक और ट्वीट में कहा गया, “बांदा की पत्रकारों के मुद्दे का संज्ञान ले रहे हैं, बांदा के एसपी को हिदायत दी गई है कि पत्रकारों के साथ ऐसी प्रताड़ना के लिए ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ होनी चाहिए.”
ख़बर लहरिया साल 2002 में छपना शुरू हुआ था. इसे संयुक्त राष्ट्र के ‘लिट्रेसी प्राइज़’ समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.

बुधवार, 9 सितंबर 2015

जनरल वी. के. सिंह साहब! राजनीति में रहकर कड़वा सच नहीं बोलते...

क्या कहा ? राजनीति और सच , दोनों एक साथ ?  नहीं ...नहीं । राजनेता है तो वह सच नहीं बोल सकता, बोलना चाहे तो भी सच उसे न जाने कितने झूठों के साथ लपेट कर धीमे से सरकाना पड़ता है, और यदि कभी सच बोल दिया सीधे सीधे, तो मीडिया ही बचता है आड़ लेने को, कि नहीं भाई मैंने ऐसा (सच) कुछ नहीं कहा, वो  तो मीडिया ने तोड़ मरोड़ कर पेश कर दिया है। आज ऐसा ही कुछ विदेश राज्य मंत्री और सेना के पूर्व जनरल श्री वी. के. सिंह के सच कहे जाने पर मचे बवाल का सीन था।
भोपाल में कल से शुरू होने जा रहे दसवें हिंदी सम्मेलन से पूर्व आयोजित प्रेस वार्ता में वी. के. सिंह ने पत्रकारों द्वारा कुछ नामी सहित्यकारों को न बुलाए जाने के सवाल पर कुछ ऐसा सच कह दिया जो बड़े साहित्यकारों की नैतिकता की बख‍िया उधेड़ता दिखा। मीडिया ने भी इसे अच्छे मसाले के साथ पेश किया।
सिंह से जब पूछा गया कि इस आयोजन में ज्यादातर बड़े साहित्यकारों की उपेक्षा की गई और आपने कई बड़े नामों को इसमें आमंत्रित नहीं किया तो सिंह साहब ने कहा कि कुछ साहित्यकार हिंदी सम्मेलन में सिर्फ शराब पीने आते थे। इस बयान का साहित्यकारों ने विरोध भी शुरू कर दिया है।
हालांकि बतौरे-सफाई बाद में वीके सिंह ने सारा ठीकरा मीडिया के सिर फोड़ते हुए कहा कि बिका हुआ है मीडिया, मीडिया ने उनका बयान  तोड़-मरोड़ कर पेश किया है।  मुझे तो बताया गया था कि साहित्कार अपनी किताबों, लेखों को लेकर शराब के नशे में लड़ते-झगड़ते थे... । वीके सिंह ऐसा कहकर विवाद से पीछा छुड़ाने की कोश‍िश करते रहे, बस।
निश्चित ही यह वह सच था, जो न सिर्फ एक राजनेता द्वारा कहा गया बल्कि सम्मेलन के आधार स्तंभों यानि साहित्यकारों की निजता पर तीखा हमला भी था।
संभवत: शराब तो बहानाभर है उन साहित्यकारों से पीछा छुड़ाने का जो सरकार की भावनाओं से ताल नहीं बिठाते अथवा दक्ष‍िणपंथी सोच से अलग रहते हैं या फ‍िर 'वामपंथी बेचारगी' से तरबतर हैं ।
यूं भी ज़रा सोचिए ! जब आयोजक शराब मुहैया ही नहीं करायेंगे तो आमंत्रित अतिथ‍ि और वह भी साहित्यकार कम से कम अपनी जेब से तो पीने से रहा।
तो जनाब वी. के. सिंह साहब ! ये कोई ग़ालिब का ज़माना तो है नहीं और ना ही फिराक़ गोरखपुरी का, कि उम्दा रचनाओं के बाहर आने के लिए भी शराब एक माध्यम बन रही हो। ये तो इक्कीसवीं सदी है, जब साहित्य की उम्दा रचनाओं के लिए नहीं बल्कि साहित्य के बाजार को तिकड़मी बनाने के लिए शराब को पिया और पिलाया जाता है। अब के साहित्यकार घर फूंक कर न तो शराब पीते हैं और न ही साहित्य रचने के लिए शराब पीते हैं। अब शराब साहित्य का नहीं मार्केटिंग का आधार है।
मेरा ख़याल है कि सिंह साहब शायद पूरी तरह से अपनी बात कह नहीं पाये, वो अधूरे राजनेता हैं ना।
यह तो मैं भी कहूंगी कि सरकार का बड़प्पन इसी में रहता कि वह हिंदी सम्मेलन में सभी बड़े साहित्यकारों को आमंत्रित करती। आख‍िर सम्मेलन के वे आधार स्तंभ तो हैं ही।  कुछ 'बड़ों' को न बुलाकर सरकार ने स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला ली है। इस एक बयान से सिंह साहब ने बैठे बिठाए बुद्धिजीवियों के विरोध को आमंत्रण दे दिया।
- सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी   

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

अब आया हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’

भोपाल। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ एवं उनके साथियों ने आज यहां ‘ट्विटर’ की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला ‘मूषक’ सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश किया है।
हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी :सीईओ: अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां ट्विटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बदलती तकनीक के साथ हिन्दी को लोगों से परिचित कराना होगा, ताकि लोग रोमन लिपि से पिछड़कर अपनी पहचान ना खो दें।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन पर उनकी इस सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है तथा इसके अलावा कम्प्यूटर पर इसे गूगल सर्च में डब्लूडब्लूडब्लू डॉट मूषक डॉट इन के नाम से खोजा जा सकता है।
गौड़ ने कहा कि भाषा वैज्ञानियों का विचार है कि जो भाषा हम बोलना है और जानते हैं, उसे थोड़े प्रयत्नों से ही सरलता से लिखना सीख जाते हैं। उन्होंने कहा कि ‘मूषक’ का उद्देश्य हिन्दी और देवनागरी को आज की पीढी के लिए सामयिक और प्रचलित करना है। इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर हिन्दी भाषी रोमन में टाइप करने से वहीं तत्काल हिन्दी शब्द का विकल्प पा सकेंगे।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में ‘मूषक’ के सीईओ ने कहा कि ट्विटर, फेसबुक सरीखे सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जिसे हमारे नेताओं, अभिनेताओं और प्रतिष्ठित लोगों ने जोर-शोर से अपनाया है, वहां प्राथमिकता अंग्रेजी भाषा को दी जाती है और उसे ही देश की आवाज समझा जाता है। हिन्दी दोयम दर्जे की मानी जाती है। उन्होंने कहा कि मूषक द्वारा हम इस प्रक्रिया को सही मायनों में गणतांत्रिक बनाना चाहते हैं, जहां गण की आवाज गण की भाषा में ही उठे।

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

लियोनी की लीला पर अंजान का अतुल्य उवाच

अभी कुछ दिन ही हुए हैं जब केंद्र सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, कुछ पॉर्न वेबसाइट्स को निगरानी के बहाने प्रतिबंधित किया था। उसके बाद अचानक पूरे देश से कथ‍ित बुद्धिजीवी निकल-निकल कर बाहर आ गए और चीखने लगे कि यह तो व्यक्ति की आजादी को छीनना है। कोई अपने बेडरूम में अपना जीवन कैसे जीता है, सरकार इसे कंडक्ट कैसे कर सकती है। हो- हल्ला इतना हुआ कि सरकार को पॉर्न साइट्स पर से प्रतिबंध हटाना पड़ा। इन हो-हल्ला करने वालों को बढ़ते रेप, सेक्स की मंडियों में बच्चों को सेक्स टॉयज की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति, ज्यादातर रेप केसेज में अपराधियों द्वारा खुद ब्लूफिल्म देखना स्वीकारना जैसे उदाहरण नजर नहीं आते जबक‍ि रेप के लिए ब्लूफिल्म की सहज उपलब्धता एक एनहांसर के रूप में सामने आई है।
ऐसा ही एक एनहांसर है टीवी पर सनी लियोनी द्वारा दिया जा रहा कंडोम का एक विज्ञापन जिसमें वह बाकायदा यह समझाती है कि कंडोम को कैसे और कितनी बार यूज किया जा सकता है।
इस पर हम अन्य सेक्सी विज्ञापनों की तरह नज़र नहीं डालते, यदि वामपंथी नेता अतुल अंजान ने सनी लियोनी के कंडोम के विज्ञापन को लेकर सवाल न उठाए होते।
दरअसल उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक रैली के दौरान उन्होंने कहा कि कंडोम का एड करती सनी लियोनी के टीवी कमर्शियल्स से देश में रेप के मामले बढ़ेंगे।
अतुल अंजान ने अभिनेत्री सनी लियोनी पर हमला बोलते हुए कहा कि उसके जरिए संस्कृति को खराब किया जा रहा है। सनी लियोनी एक पोर्न स्टार है और मैं उसका सम्मान नहीं कर सकता।
अंजान ने कहा कि मैं सेंसर बोर्ड से सनी लियोनी की शिकायत करूंगा।
अंजान ने कहा कि टेलीविजन खोलते ही सनी लियोनी के विज्ञापन आते हैं और वो पूरे दिन चलते हैं। अंजान का कहना है कि कंडोम के इतने गंदे और अभद्र प्रचार रेडियो और टेलीविजन पर चलेंगे तो इससे देश में रेप की घटनाएं बढ़ेंगी, कम नहीं होंगी।
अतुल अंजान ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि मैं तो नारी का सम्मान करने वाला हूं। मैं कंडोम का विरोधी नही हूं, जिन लोगों को इस बात से नाराज़गी है क्या वो अपनी मां-बहन, बेटियों के साथ ये देख सकते हैं। ये कोई विज्ञापन है। सनी लियोनी का सम्मान मैं नहीं कर सकता। उसकी नंगी फिल्में देखिए, क्या असभ्यता है, जो लड़की आपके समाज को ये गंदा मेसैज दे, आप अपने मन से सेंसर बोर्ड को शिकायत दे दें मेरी तरफ से, मैं तो बंद कराउंगा ही। जिन लोगों को सनी लियोनी से प्रेम है, मैं उनसे कहूंगा कि अपने घर में कला के नाम पर ये एड अपनी बहन, मां, बेटियों को दिखाएं और अगर किसी को इस से आपत्ति है तो मैं माफी मांगता हूं।
निश्चित ही अतुल अंजान ने हर मिडिल क्लास घर की वो सच्चाई सामने रखी है जिसमें सनी लियोनी आज भी वल्गर मानी जाती है। आज भी कोई निर्लज्ज विज्ञापन आते ही पूरा परिवार एक दूसरे से नजरें चुराता है, आज भी बाप के सामने बेटी या बेटा कंडोम की बात तो दूर अंडरगारमेंट्स या परफ्यूम के अश्लील विज्ञापन आने पर बात का रुख बदल देता है या चैनल बदलना ज्यादा मुफीद समझता है ।
इलेक्ट्रानिक मीडिया पर आजादी की बहस तो बहुत चलती है मगर नैतिकता सिखाने वाले कदम क्या हों, इस बावत कोई बहस सुनाई नहीं देती। इन चैनलों की बाजारू प्रवृत्त‍ि समाज में किन-किन अपराधों को बढ़ावा दे रही है, अभी शायद कोई इन्हें समझ नहीं पा रहा। इन चैनलों के अनुसार तो आजादी का मतलब नंगा होना ही है, तभी तो इन्हें सनी लियोनी रोल मॉडल नजर आती है और उसके विज्ञापनों का हमारे ड्रॉइंग रूम्स में सरेआम देखना खुलेपन का उदाहरण।
इन चैनलों की ही देन है कि हम अपने सारे नीति वाक्यों को बेमानी बनते हुए देख रहे हैं, जिनमें कहा जाता था कि भोजन-भजन और रति एकांत में ही किए जाने चाहिए। कंडोम का विज्ञापन हमें आजादी के नाम पर कामुकता की जिस अंधी कैद में धकेलता जा रहा है, उसके ख‍िलाफ आवाज उठनी ही चाहिए। हम आज भी नंगे होने को असभ्यता ही मानते हैं और इसे अपराध की जद में रखते हैं। मैं तो अतुल अंजान जी को बधाई का पात्र मानती हूं कि उन्होंने वामपंथी होते हुए इस शाश्वत सत्य को खुले मंच से कहा और यह भी कहा कि नंगे विज्ञापनों को करने वाली पॉर्न स्टार को मैं सम्मान नहीं दे सकता। ज़ाहिर है कि हम आज भी इतने खुलेपन को नकारते हैं जो हमें अपने बच्चों के सामने नज़रें चुराने पर विवश कर देता हो।
गनीमत यह रही कि ये आवाज किसी हिंदूवादी संगठन ने नहीं उठाई वरना इसे कट्टरवादी सोच कह कर कब का दबा दिया जाता। अतुल अंजान के बहाने ही सही, यह बहस चलनी चाहिए ताकि मां, बहन और बेटियों को टीवी के सामने अपनी मौजूदगी शर्मिंदगी ना लगे।
– सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की तैयारियां जोर शोर से शुरू

भोपाल। दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियां जोर शोर से जारी हैं जिसका आयोजन यहां 10 से 12 सितंबर के बीच किया जाएगा और जिसमें हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन आकषर्ण का मुख्य केंद्र होंगे ।
दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन में समकालीन मुद्दों और विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रशासन और विदेश नीति, विधि, मीडिया आदि के क्षेत्रों में हिंदी के सामान्य प्रयोग और विस्तार से संबंधित तौर तरीकों पर चर्चा होगी। सम्मेलन का मुख्य विषय ‘हिंदी जगत: विस्तार एवं संभावनाएं’ है।
ताल-तालाबों की नगरी भोपाल में होने वाले इस सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे तो समापन समारोह में गृह मंत्री राजनाथ सिंह पधारंेगे। समापन समारोह में बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन भी आकषर्ण का मुख्य केन्द्र होंगे।
सम्मेलन के आयोजन से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श करने के लिए परामर्श, प्रबंधन और कार्यक्रम से संबंधित तीन समितियां गठित की गई हैं। परामर्श एवं कार्यक्रम समितियों की अध्यक्ष विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हैं जबकि प्रबंधन समिति के अध्यक्ष विदेश राज्य मंत्री जनरल (सेवानिवृ}ा) डॉ. वी.के. सिंह हैं।
मध्य प्रदेश राज्य सरकार सम्मेलन की स्थानीय आयोजक है और मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री, शिवराज सिंह चौहान मुख्य संरक्षक हैं। सम्मेलन के लिए माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल भागीदार संस्था है।
विश्व हिंदी सम्मेलन की संकल्पना राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा 1973 में की गई थी। संकल्पना के फलस्वरूप, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के तत्वावधान में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन 10 से 12 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित किया गया था। इसके बाद विश्व हिंदी सम्मेलन दो बार पोर्ट लुई (मॉरीशस) में, दो बार भारत में, पोर्ट ऑफ स्पेन (ट्रिनिडाड एण्ड टोबेगो), लंदन, पारामारिबो (सूरीनाम), न्यूयार्क (अमेरिका) और जोहांसबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में आयोजित किया जा चुका है ।

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

सच कहा रिजू , हर शाख पर उल्लू बैठा है

आइने नस्ब (लगे हुए) हैं दीवारों पर 
चमकती हुई शोहरतों के
जिन के पीछे छुपा कर रखे हैं खंजरों से भरे हाथ
खून ज़मीरो-अदब का करने को 


सोशल मीडिया आज फिर एक महिला के दर्द का वायस बना। एक ट्रेनी महिला आईएएस रिजू बाफना के इस खुलासे ने कि औरत को लेकर पुरुषों के एक वर्ग की मानसिकता किस हद तक बीमार हो चुकी है, उन अदीबों का चरित्र सरेआम कर दिया जो ऊंचे ओहदों पर बैठे जरूर हैं लेकिन उनकी सोच उतनी ही गिरी हुई है, जितनी किसी बलात्कारी की हो सकती है। 
हालांकि रिजू के इस खुलासे में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जिसे आम औरत लगभग हर दिन भुगतती ना हो मगर ट्रेनी आईएएस होने के नाते उनका खुलासा खलबली तो मचा ही गया।
देश में यौन प्रताड़ना के मामले हर रोज और कभी कभी तो दिन में कई बार निकलकर सामने आते हैं किंतु इसी कड़ी में एक युवा महिला आईएएस ऑफिसर के जुड़ जाने से खबर कुछ ''यूं ही'' वाली कैटेगरी से अलग होकर सुर्ख‍ियां बन गई। 
मध्यप्रदेश के सिवनी में तैनात महिला ट्रेनी आईएएस रिजू बाफना का कहना है कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे क्‍योंकि यहां हर शाख पर उल्लू बैठा है। युवा महिला आईएएस अधिकारी रिजू बाफना ने पिछले हफ्ते राज्य मानवाधिकार आयोग के एक अधिकारी के खिलाफ अश्लील संदेश भेजने की शिकायत दर्ज कराई थी।
इस पूरे वाकए के संबंध में रिजू बाफना ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला है। जिसमें उन्होंने कानून और व्यवस्था को तार- तार करने वाली बातों से लोगों को अवगत कराया है। रिजू बाफना इस वाकए को लेकर बहुत दुखी हैं और वे कहती हैं, ‘मैं बस यही दुआ कर सकती हूं कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे।’
यौन उत्पीड़न से लड़ने के दौरान मिले अनुभव के आधार पर बाफना ने कहा, ‘यहां हर शाख पर उल्लू बैठा है।’
वह अपनी पोस्ट में लिखती हैं कि जब अपना बयान दर्ज कराने वह अदालत पहुंचीं, तो कक्ष में वकील के साथ कई लोग मौजूद थे। बाफना ने लिखा है कि मैंने कहा कि मैं इतने लोगों के सामने बयान देने को लेकर असहज महसूस कर रही हूं इसलिए मैंने उस वकील और दूसरे लोगों से  एकांत की गुजारिश की।’
वह बताती हैं कि इसके बाद उस वकील ने चिल्लाते हुए कहा, ‘आप अपने दफ्तर में अधिकारी होंगी, अदालत में नहीं।’
बाफना कहती हैं कि उन्होंने अपनी चिंता से जज को भी अवगत कराया।
वह कहती हैं, ‘जब मैंने न्यायिक मजिस्ट्रेट से कहा कि उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि यौन उत्पीड़न के मामले में जब कोई महिला अपना बयान दे रही हो तो वहां दूसरे लोग मौजूद ना हों।
इस पर जज ने कहा कि आप युवा हैं और इसी वजह से ऐसी मांग कर रही हैं।’
इससे आहत बाफना कहती हैं कि यह देश महिलाओं की दुर्दशा को लेकर ‘असंवेदनशील′ बना रहेगा। ‘मैं बस यही दुआ कर सकती हूं कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे। यहां हर कदम पर उल्लू बैठे हैं…’।
बाफना द्वारा डाले गए इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर खूब सहयोग मिल रहा है। लोग बाफना की ओर से लगातार प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
इस पोस्ट के बाद बाफना ने दूसरी पोस्ट भी डाली है। उन्होंने लिखा है कि पहली पोस्ट में मैंने एक लाइन लिखी थी कि इस देश में नारी जन्म ना ले। मैंने वह लाइन आवेश में आकर लिख दी थी, ये सही है कि किसी एक व्यक्ति के दोष के लिए पूरे देश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता इसीलिए मैंने बाद में अपनी पोस्ट को एडिट भी किया। हालांकि पूरे अनुभव ने मुझे एहसास दिलाया कि हमारे देश में आपराधिक न्याय प्रणाली यौन अपराधों जैसे संवेदनशील मामलों को लेकर कितनी असंवेदनशील है।
मेरा मेरे देश के कानून पर पूरा भरोसा है और इसलिए मैंने इस संबंध में तुरंत अधिकारियों को अवगत कराया। मैं आपको मेरे साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बताने जा रही हूं जो मेरे साथ जुडीशियल मजिस्ट्रेट, सिवनी मध्यप्रदेश के कोर्ट में 1 अगस्त 2015 को हुआ।
मैं अपना बयान दर्ज कराने के लिए कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुई थी। इस मामले के संबंध में मैंने 26 जुलाई 2015 को एफआईआर दर्ज करवाई थी। यह एफआईआर मैंने संतोष चौबे के खिलाफ दर्ज करवाई थी जो सिवनी जिले में ह्यूमन राइट कमीशन के एक अधिकारी के रूप में नियुक्त हैं।
संतोष चौबे मुझे अभद्र मैसेज भेजकर प्रताड़ित कर रहे थे। मैंने इस संबंध में अपने वरिष्ठ अधिकारी भरत यादव कलेक्टर एवं डीएम सिवनी को बताया।
उन्होंने तुरंत इस संबंध में एमपीएचआरसी को लिखा और संतोष चौबे को तुरंत बर्खास्त कर दिया गया।
मैं एक युवा महिला हूं और मैं पहली बार कोर्ट में यौन उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मामले के बारे में सुनवाई के लिए गई थी। मैंने सोचा कि आखिर इस तरह के मामलों में ज्यादातर महिलाएं निकलकर सामने क्यों नहीं आतीं। लेकिन जब मैं कोर्ट के अंदर पहुंची तो जो मैंने वहां अनुभव किया, वह बहुत ही भयानक व दर्दनाक था।
मैंने कोर्ट में पहुंचते ही जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट से गुजारिश की कि वह मुझे कैमरे पर बयान रिकॉर्ड करने की इजाजत दें। जब कोर्ट मेरी इस मांग को स्वीकार करने वाला ही था कि इतने में एक वकील जो उस समय वहां खड़ा था, वह मुझ पर बुरी तरह से चिल्लाने लगा और कहने लगा कि तुम्हारी इस तरह की रिक्वेस्ट करने की हिम्मत कैसे हुई। वह क्रुद्ध शब्दों में मुझ पर चिल्लाता रहा और उसने कहा कि तुम अपने ऑफिस में आईएएस ऑफिसर होगी, यह उसका कोर्ट है और वह यहां से नहीं जाएगा।
मैंने उनसे थोड़ा प्राइवेसी देने की बात की थी, वो मैंने एक महिला होने की हैसियत से की थी ना कि एक आईएएस अधिकारी होने की हैसियत से क्योंकि मैं यहां पर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले के संबंध में बयान देने जा रही थी।
लेकिन शायद वह वकील मुझे न्याय दिलाने की बजाय मुझे नीचा दिखाने में ज्यादा रुचि ले रहा था। कुछ देर इसी तरह बहस चलने के बाद वह वहां से चला गया। इस पूरे वाकए के दौरान जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट ने एक भी लफ्ज़ नहीं बोला।
उन्होंने इस दौरान मेरे बयान को कैमरे में रिकॉर्ड करने के संबंध में कोई निर्णय भी नहीं लिया। जिस समय वह वकील भद्दे तरीके से मुझसे बातें कर रहा था, तब वे एक मूक दर्शक की तरह वहां बैठे हुए थे। इससे भी बुरा तब हुआ जब मैंने अंततः अपना बयान रिकॉर्ड करवा दिया।
जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट ने मुझसे कहा कि मैं युवा हूं और नई भर्ती हुई हूं इसीलिए मुझे प्राइवेसी को लेकर ये अपेक्षाएं हैं। आप समय के साथ कोर्ट व सिस्टम को समझ जाएंगी और तब आप इस तरह की मांग नहीं रखेंगी।
वे आगे लिखती हैं कि अगर हमारे देश में कानून इसी तरह से चलता है कि एक आईएएस अधिकारी को भी कोर्ट में जलील किया जा सकता है तो एक आम महिला के साथ कैसा व्यवहार किया जाता होगा, यह जगजाहिर है। यही कारण है कि हमारे देश में हर रोज यौन उत्पीड़न को लेकर मामले सामने आते रहते हैं।
इसीलिए महिलाएं सब कुछ सह कर बैठ जाती हैं। मैं उन महिलाओं के प्रति अपनी सहानूभूति व्यक्ति करती हूं जो अपराध सह कर चुप चाप बैठ गईं क्योंकि हमारे देश में क्रिमनल जस्टिस सिस्टम हमसे उम्मीद करता है कि हम सबके सामने अपना बयान देकर एक बार फिर वही कड़वा अनुभव करें।
सच कहती हैं रिजू कि एक बार यौन उत्पीड़न की बात सामने आने पर महिला को बार-बार उसी उत्पीड़न से गुजरना पड़ता है, कभी शब्दों से तो कभी नजरों से ... । 
- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 1 अगस्त 2015

ज़हरीली और बीमार सोच का कोई इलाज नहीं


आतंकवादियों की पैरवी करने वाली ज़हरीली और बीमार सोच का कोई इलाज नहीं हो सकता । किसी भी संविधान या कानून में सोच की नकारात्मकता को खत्म करने का प्राविधान अभी तक नहीं आया है।

1. प्रिप्लांड मास मर्डर को दंगों से कंपेयर करना
2. प्रो मुस्लिम और एंटी हिंदू को लाइन ऑफ सेक्यूलरिज्म बनाना
3. कश्मीर में अलगाववादियों के लश्कर व आईएस की झंडों को फहराने को देशद्रोह बताने की बजाय सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताना

4. बहुसंख्यकों की पूरी कौम को अपराधी और अल्पसंख्यकों की पूरी कौम को निर्दोष साबित करने में जुटे रहना
5. बहसों के माध्यम से आतंकवाद की मुखालफत की बजाय आतंकवादियों के मानवाध‍िकारों की बात को तवज्जो देना

ये कुछ बातें ऐसी हैं जिन्होंने पिछले दिनों से याकूब मेमन की फांसी को लेकर पूरे सिस्टम को ही दोषी बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मुस्लिम होने की वजह से याकूब की फांसी को अन्याय साबित करने पर तुले हुए लोग तो ऐसा लगता है कि उसे आतंकवादी ही नहीं मान पा रहे हैं ।
 गरीबी, अन्याय की घटनाओं , बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं , किसानों की वाजिब मुश्किलों, से अलग सिर्फ ये ' हिंदू-मुस्लिम ' जैसे हॉट टॉपिक्स की तलाश में रहते हैं। हरसंभव प्रयास यही किया जाता है कि हिंदू को खलनायक और मुस्लिम को नायक साबित किया जा सके। बिल्कुल ऐसे ही जैसे कि सड़क पर एक्सीडेंट भले ही साइकिल वाले की गलती से हुआ हो मगर दोष कार वाले का ही माना जाना निश्चित होता है।
याकूब की फांसी से दंगों की विभीष‍िका  की तुलना अक्लमंदों की ऐसी भीड़ कर रही है जो हर हाल में साबित करना चाहती है कि - 22 साल तक कोर्ट ने झक मारी है,  राष्ट्रपति बौराए हुए हैं। याकूब को शहीद बताने वाले यह भी भूल जाते हैं कि एक मुसलमान कलाम भी थे, जिनकी जयजयकार में डेढ़ किलोमीटर तक हिंदू और मुसलमानों ने लाइन लगा रखी थी। 
सच में कमाल हैं ये लोग .... इन्हें तो खैर मनानी चाहिए कि ये पाकिस्तान में पैदा नहीं हुए जहां गैर धर्म की बात भी करना गुनाह हो जाता है, पलभर में ईशनिंदा हो जाती है, इन्हें तो ईश्वर का शुक्रिया करना चाहिए कि ये भारत में हैं... आजाद भारतीय... जिसे पूरी आजादी होती है अपना धर्म अपना कर्म और अपना अस्तित्व बनाए रखने की ।
मगर
इस ज़हरीली और बीमार सोच का कोई इलाज नहीं हो सकता । किसी भी संविधान या कानून में सोच की नकारात्मकता को खत्म करने का प्राविधान अभी तक नहीं आया है।
याकूब के लिए दहाड़ मार कर रोने वालों की इस मौजूदा सोच पर सिवाय हैरानी और दुख जताने के और किया क्या जा सकता है ।
इस संबंध में कमाल हैं एनडीटीवी समेत कई चैनल्स पर बहसियाने वाले महानुभाव और उनके एंकर। ये कथित तौर पर बड़े एंकर , इन्हें प्रो मुस्लिम या प्रो पुअर समझने की गलती कभी न करियेगा, ये सिर्फ प्रो क्रिमिनल हैं बस्स.....।
टीवी पर प्राइम टाइम का एक घंटा बरबाद करने वाले , ढेर सारे मेकअप और टचअप्स के साथ एसी रूम्स में बैठने वाले , जो कि पहले से लिखी स्क्रिप्ट के बिना बोल भी नहीं सकते , इस हकीकत को नजरअंदाज करके कि एक अपराधी जो कि प्रिप्लांड मास मर्डर का एक्टिव एजेंट भी था , आख‍िर साबित क्या करना चाहते हैं कि मानवाध‍िकार सिर्फ क्रिमिनल्स के होते हैं , उन मरने वालों के क्या कोई मानवाध‍िकार नहीं जो इनकी हत्यारी करतूत के विक्टिम बने । उनमें औरतें भी थीं, बच्चे भी, हिंदू भी थे , मुस्लिम भी।
अत्यंत दुख और क्षोभ का विषय है कि प्राइम टाइम का मोस्टवांटेड टॉपिक बनाने में कामयाब रहे इलेक्ट्रानिक चैनल्स ने सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के निर्णय पर उंगली ही नहीं उठाई बल्कि उसे कठघरे में भी खड़ा करने की कोश‍िश की है।
यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही रहा है कि इसपर दूसरों के आक्रमण से ज्यादा तो अपनों ने ही छलनी किया।
विरोध करना ही है तो देश के टैक्स का जितना हिस्सा याकूब जैसे अपराध‍ियों की परवरिश पर खर्च हो जाता है, उस पर किया जाना चाहिए विरोध, जिससे ना जाने कितने अनाथों व असहायों की जिंदगी संवर सकती है।
क्या प्राइम टाइम वालों ने उन विधवाओं , अनाथ बच्चों , अपंगों को जाकर देखा जो याकूब की दहशतगर्दी की भेंट चढ़ गए।
बहस ही करनी है तो इस पर कीजिए कि आखिर न्याय में देरी को कम करने के लिए क्या क्या उपाय किए जा सकते हैं। बहस इस पर भी होनी चाहिए कि सरकारें इस न्याय व्यवस्था को दुरुस्त करने में ढीली क्यों पड़ रही हैं।
हर हाल में किसी भी अपराधी को हमारे टैक्स पर पालने का रिवाज खत्म होना चाहिए। आतंकवाद से जुड़े फैसलों की समयसीमा निर्धारित की जानी चाहिए।
कम से कम जनता को इस बेवकूफियानी बहस से निजात तो मिलेगी ।
- अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

गुरू पूर्ण‍िमा पर विशेष - हमारी तो आध्यात्मिक परंपरा में ही हैं गुरू का स्थान

'तत्व मसि श्वेतकेतोः' अर्थात्  'तू ही वह चिदानंद ब्रह्म है' कहकर आरुणी ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को जो ब्रह्म विद्या संबंधी आख्यान सुनाया वह और कुछ नहीं अपने शि‍ष्य पर पड़े अज्ञान का आवरण हटाने का एक गुरुमंत्र था।
इसी तरह कठोपनिषद् की वल्लियों में गुरू के रूप में यम एवं शिष्य के रूप में बैठे नचिकेता का आपसी संवाद पंचाग्नि विद्या के रूप में हमारे सामने आया , तब से अब तक उपनिषदों के माध्यम से चली आ रही  यह ज्ञान देने और गृहण करने की परंपरा ने गुरू के पद को शाश्वत घोष‍ित कर दिया।
ये मात्र दो उदाहरणभर हैं जो यह बताते हैं कि किसी जिज्ञासु श‍िष्य की जिज्ञासा शांत करके न केवल श‍िष्य की बल्कि स्वयं गुरू की श्रेष्ठता भी सिद्ध होती है।

हमारी सांस्कृतिक परम्परा रही है जिसमें जिज्ञासु शिष्य की जिज्ञासा का समाधान एक ऐसी गुरूसत्ता करती है जिसने स्वयं उसका अपने जीवन में साक्षात्कार कर लिया हो।

गुरु-शिष्य परम्परा के कारण ही उपनिषद काल की ज्ञानसंपदा का संरक्षण श्रुति के रूप में क्रमबद्ध हो पाया। इस परंपरा के अंतर्गत समर्पण भाव , अहंकार को गला कर ज्ञान प्राप्ति के अनेक उदाहरण शास्त्रों में दिए गए हैं। सुकरात व उनके शिष्य प्लेटो तथा प्लेटो के शिष्य एलेक्जेंडर एवं गुरजिएफ व आस्पेन्स्की की परम्पराएँ तो बाद में आईं जबकि हमारे देश में आदिकाल से ही यह परम्परा चली आयी है कि गुरु अपने ज्ञान द्वारा उचित पात्र समझे गए शिष्य पर पड़े अविद्या-अज्ञान के पर्दे को हटाएँ व उसका उँगली पकड़ कर मार्ग दर्शन करें।

गुरु कौन हो व कैसा हो-  
'विशारदं ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं गुरुकाश्रयेत्'-  'श्रोत्रिय' अर्थात् जो श्रुतियों से शब्द ब्रह्म को जान सके , उनका तत्व समझ सके, 'ब्रह्मनिष्ठ' अर्थात् आचरण से श्रेष्ठ व ब्राह्मण जैसा ब्रह्म में निवास कर परोक्ष साक्षात्कार कर चुका हो तथा 'विशारद' अर्थात् जो अपने आश्रय में शिष्य को लेकर उस पर शक्तिपात करने की सामर्थ्य रखता हो। 
गुरू के लिए संत ज्ञानेश्वर ने भी गीता की भावार्थ दीपिका में लिखा है कि “यह दृष्टि (गुरु की दृष्टि) जिस पर चमकती है अथवा यह करार विन्दु जिसे स्पर्श करता है वह होने को तो चाहे जीव हो, पर बराबरी करता है महेश्वर-श्रीशंकर की”।

गुरु मानवी चेतना का मर्मज्ञ माना गया है। वह शिष्य की चेतना में उलट फेर करने में समर्थ होता है। गुरु का हर आघात शिष्य के अहंकार पर होता है तथा वह यह प्रयास करता है कि किसी भी प्रकार से डाँट से, पुचकार से, विभिन्न शिक्षणों द्वारा वह अपने समर्पित शिष्य के अहंकार को धोकर साफ कर उसे निर्मल बना दे। प्रयास दोनों ओर से होता है तो यह कार्य जल्दी हो जाता है नहीं तो कई बार अधीरतावश शिष्य गुरु को समझ पाने में असमर्थ हो भाग खड़े होते हैं।
हमारी आध्यात्मिक परम्परा गुरु प्रधान ही रही है। इसी परम्परा के कारण साधना पद्धतियाँ भी सफल सिद्ध हुईं। सदैव गुरुजनों ने अपने जीवन के सफल प्रयोगों का सुपात्र साधकों के ऊपर रिसर्च लैबोरेटरी की तरह परीक्षण किया है। उन्हें श्रेष्ठ देवमानव बनाने का प्रयास किया है। गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

गुरू की श्रेष्ठता के साथ शिष्य में गुरु के प्रति श्रद्धा भी उतनी ही आवश्यक है। सामान्यतया व्यक्ति का मन बिखराव लिए होता है। चित्त वृत्तियाँ लोकद्वेषों में रुचि लेने के कारण बिखरी होती हैं। इसी बिखराव को समेट कर मन को समग्र बना लेना-महानता की ओर मोड़ लेना ही श्रद्धा है। इस मन को 'इन्टीग्रेटेड माइण्ड' कहा गया है। समग्रता के संग श्रद्धायुक्त मन से जब संशय मिट जाए तब  गुरू के प्रति पूर्ण समर्पण-विसर्जन-विलय-तादात्म्य हो जाता है। निश्चय ही गुरु-शिष्य संबंध इसी स्तर के आध्यात्मिक होते हैं जिनमें उच्चस्तरीय आदान-प्रदान होता है।जहां एक ओर शिष्य अपनी सत्ता को, अहं को गुरु के चरणों में समर्पित करता है वहीं दूसरी ओर गुरु आध्यात्मिक शक्ति द्वारा उसे ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी बनाकर जीवन मुक्त कर देता है।

- अलकनंदा सिंह

रविवार, 26 जुलाई 2015

कुंठित मंशा वालों के लिए सबक

जिस तरह अति कट्टरवादिता किसी भी समाज के लिए ज़हर बन जाती है उसी तरह अति उदारवादिता भी ज़हर का ही काम करती है। मानवाध‍िकारवादी इसी अति का श‍िकार होते रहे हैं। कोई आतंकी को फांसी दिए जाने का विरोध करता है तो कोई आतंकवाद को धर्म और मजहब से जोड़ कर दहशत फैलाने वाले को ‘बेचारा’ घोषि‍त करने पर आमादा रहता है। कोई नक्सलवाद को सरकार, पूंजीवाद और भेदभाव जनित समस्या बताकर नक्सलवाद की भेंट चढ़े जवानों की शहादत से मुंह फेर लेने की बात कहता है तो कोई बलात्कारी के भी मानवाध‍िकार की बात करता है।
कानून के लचीलेपन का फायदा वो गैर सरकारी संगठन भी उठाते रहे हैं जो मानवाधिकारवादी होने का तमगा स्वयं लटकाए घूमते हैं। बिना ये सोचे कि देश और समाज के दुश्मन सिर्फ सजा के हकदार होते हैं और इनके अध‍िकारों की बात करना कानून-व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करना है। इसके अलावा भी दोषी की तरफदारी करना अपराधी के साथ शामिल होने जैसा ही है।
हकीकत में ऐसा करने वालों की मानसिकता सिर्फ खबरों में रहने और सेंसेशन फैलाकर अपने लिए सुर्खियां बटोरने तक ही होती है, वे न अपराधी का भला चाहते हैं ना देश का, और न कानून को सही मानते हैं।
बहरहाल, अब केंद्र सरकार ने कुछ नए फैसले लेकर इन कथ‍ित मानवाध‍िकारवादियों की मानसिकता पर लगाम लगाने का प्रयास किया है। अपराधि‍यों  को जानने के बहाने व अभ‍िव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपनी सेंसेशनल खबरें, डॉक्यूमेंटरी और आर्टिकल को प्रकाश‍ित या प्रदर्श‍ित करना अब उनके लिए आसान नहीं रहेगा।
अब नए सरकारी फैसले के मुताबिक जेल में बंद कैदियों पर आर्टिकल लिखने या इंटरव्यू लेने के इरादे से कोई जर्नलिस्ट, एनजीओ ऐक्टिविस्ट्स या फिल्ममेकर्स को जेल में एंट्री नहीं दी जाएगी। हां, इस पाबंदी से कुछ स्पेशल मामलों में छूट होगी।
खबर के मुताबिक यह फैसला इसलिए लिया गया है क्‍योंकि जेल में बंद कैदियों के कई इंटरव्यूज़ लगातार सामने आए। इंटरव्यू लेने वालों में ब्रिटिश फिल्ममेकर लेसली उडविन का नाम भी शामिल है, जिन्होंने 16 दिसंबर को हुए रेप ममाले में कैद, आरोपी से इंटरव्यू लेकर इस घटना पर एक डाक्युमेंट्री बनाई थी। उनकी इस इंडियाज डॉटर नाम की डॉक्युमेंट्री ने दोषियों की मानसिकता को सबके सामने लाकर रखा, जिसे देखकर लोगों की भावनाएं भड़क उठी थीं।
गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव कुमार आलोक ने सभी प्रांतों और केंद्र शासित राज्यों को भेजे एडवाइज़री में कहा है कि किसी भी व्यक्ति, प्रेस, एनजीओ, कंपनी को जेल के भीतर शोध करने, डाक्युमेंट्री बनाने, आर्टिकल या इंटरव्यू के मकसद से प्रवेश की इजाजत सामान्य रूप से नहीं दी जानी चाहिए।
हालांकि, वैसे विज़िटर्स, प्रेस या डॉक्युमेंट्री मेकर्स को कंसिडर करने की भी बात की गई है, जिनके आर्टिकल, डॉक्यूमेट्री या रिसर्च से अथॉरिटी को किसी पॉज़िटिव सोशल मेसेज का एहसास होगा।
खबर है कि यदि जेल के अधिकारियों से इस तरह की अनुमति मिल भी जाती है तो विज़िटर्स को सिक्यॉरिटी अमाउंट के रूप में एक लाख रुपए जमा करना पड़ेगा।
इतना ही नहीं, इंटरव्यू या डॉक्युमेंट्री बनाने वालों को केवल हैंडीकैम, कैमरा, टेप रिकॉर्डर ले जाने की इजाजत मिलेगी जबकि मोबाइल, पेपर्स, किताब या कलम वे अंदर नहीं ले जा सकेंगे।
यदि जेल के सुपरिन्टेंडेंट को लगेगा कि कोई खास रिकॉर्डिंग गलत है या वह गैर-जरूरी है तो उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप करने का भी अधिकार होगा।
कुल मिलाकर इससे एक लाभ यह जरूर होगा क‍ि जो मीडियाकर्मी, मीडिया हाउसेस, सामाजकि संगठन आद‍ि अपने पेशे या सामाजिक जिम्मेदारी की आड़ में अपनी कुंठित मंशा पूरी करते हैं, उन्हें वो मौका नहीं मिल पायेगा। और हां, नेक नीयत वालों के लिए सरकार ने अब भी रास्ता छोड़ दिया है।
 अतिवाद के इन मानवाध‍िकारवादियों को एक सबक हदें पहचानने के लिए एक शेर मुजफ्फर हनफी का कुछ यूं है कि-
हक़-दारों की छुट्टी कर दो ,  इस्तिग़्ना के एक सबक में..... 
- अलकनंदा सिंह