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मंगलवार, 20 अगस्त 2024

अजमेर सेक्स स्केंडल: वो भी तो रेप-गैंगरेप था... ज‍िसमें आज 32 साल बाद आया फैसला

 


 अभी कोलकाता, मुरादाबाद और बदलापुर के रेप-गैंगरेप पर हम बात कर ही रहे थे क‍ि आज राजस्थान के अजमेर शहर में 32 साल पहले हुआ अजमेर सेक्स स्कैंडल एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस मामले में कोर्ट ने 100 से ज्यादा छात्राओं से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में 6 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. अजमेर की विशेष अदालत ने यह फैसला सुनाया है। 32 साल पुराने इस सेक्स स्केंडल कांड में नफीस चिश्ती, सलीम चिश्ती, इकबाल भाटी, नसीम सैयद, जमीर हुसैन व सोहिल गनी को कोर्ट ने दोषी माना। 


इस सेक्स स्केंडल में कुल 18 आरोपी थे, जिनमें नौ आरोपियों को पहले ही सजा सुनाई जा चुकी है। बाकी बचे नौ आरोपियों में से एक ने सुसाइड कर लिया, एक फरार है और एक कुकर्म के आरोपी का अलग से ट्रायल चल रहा है।


ये था पूरा मामला 


सन् 1992 लगभग 29 साल पहले सोफिया गर्ल्स स्कूल अजमेर की लगभग 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों का रेप जिन्हें लव जिहाद/ प्रेमजाल में फंसा कर, न केवल सामूहिक बलात्कार किया बल्कि एक लड़की का रेप कर उसकी फ्रेंड/ भाभी/ बहन आदि को लाने को कहा, एक पूरा रेप चेन सिस्टम बनाया, जिसमें पीड़ितों की न्यूड तस्वीरें लेकर उन्हें ब्लैकमेल करके यौन शोषण किया जाता रहा।


फारूक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती- इस बलात्कार रेप कांड के मुख्य आरोपी थे। तीनों अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह के खादिम (केयरटेकर) के रिश्तेदार/ वंशज तथा कांग्रेस यूथ लीडर भी थे।


फारूक चिश्ती ने सोफिया गर्ल्स स्कूल की 1 हिन्दू लड़की को प्रेमजाल में फंसा कर एक दिन फार्म हाउस पर ले जा कर सामूहिक बलात्कार करके, उसकी न्यूड तस्वीरें लीं और तस्वीरो से ब्लैकमेल कर उस लड़की की सहेलियों को भी लाने को कहा।


एक के बाद एक लड़की के साथ पहले वाली लड़की की तरह फार्म हाउस पर ले जाना, बलात्कार करना, न्यूड तस्वीरें लेना, ब्लैकमेल कर उसकी भी बहन/ सहेलियों को फार्म हाउस पर लाने को कहना और उन लड़कियों के साथ भी यही घृणित कृत्य करना- इस चेन सिस्टम में लगभग 250 से ज्यादा लडकियों के साथ भी वही शर्मनाक कृत्य किया।


उस जमाने में आज की तरह डिजिटल कैमरे नही थे। रील वाले थे। रील धुलने जिस स्टूडियो में गयी वह भी चिश्ती के दोस्त और मुसलमान समुदाय का ही था। उसने भी एक्स्ट्रा कॉपी निकाल लड़कियों का शोषण किया।


ये भी कहा जाता है कि स्कूल की इन लड़कियों के साथ रेप करने में नेता और सरकारी अधिकारी भी शामिल थे। आगे चलकर ब्लैकमैलिंग में और भी लोग जुड़ते गये।


आखिरी में कुल 18 ब्लैकमेलर्स हो गये। बलात्कार करने वाले इनसे तीन गुने। इन लोगों में लैब के मालिक के साथ-साथ नेगटिव से फोटोज डेवेलप करने वाला टेकनिशियन भी था।


यह ब्लैकमेलर्स स्वयं तो बलात्कार करते ही, अपने नजदीकी अन्य लोगों को भी “ओब्लाइज” करते। इसका खुलासा हुआ तो हंगामा हो गया। इसे भारत का अब तक का सबसे बडा सेक्स स्कैंडल माना गया।


इस केस ने बड़ी-बड़ी कंट्रोवर्सीज की आग को हवा दी। जो भी लड़ने के लिए आगे आता, उसे धमका कर बैठा दिया जाता।


अधिकारियों ने, कम्युनल टेंशन (सांप्रदायिक तनाव) न हो जाये, इसका हवाला दे कर आरोपियों को बचाया।


अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम (केयरटेकर) चिश्ती परिवार का खौफ इतना था, जिन लड़कियों की फोटोज खींची गई थीं, उनमें से कईयों ने सुसाइड कर लिया।


एक समय अंतराल में 6-7 लड़कियां ने आत्महत्या की।


डिप्रेस्ड होकर इन लड़कियों ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया । एक ही स्कूल की लड़कियों का एक साथ सुसाइड करना अजीब सा था। सब लड़कियां नाबालिग और 10वी, 12वी में पढने वाली मासूम किशोरियां।


आश्चर्य की बात यह कि रेप की गई लड़कियों में आईएएस, आईपीएस की बेटियां भी थीं। ये सब किया गया अश्लील फोटो खींच कर। पहले एक लड़की, फिर दूसरी और ऐसे करके 250 से ऊपर लड़कियों के साथ हुई ये हरकत। ये लड़कियां किसी गरीब या मिडिल क्लास बेबस घरों से नहीं, बल्कि अजमेर के जाने-माने घरों से आने वाली बच्चियां थीं।


वो दौर सोशल मीडिया का नहीं, पेड/ बिकाऊ मीडिया का था। फिर पच्चीस तीस साल पुरानी ख़बरें कौन याद रखता है? ये वो ख़बरें थी जिन्हें कांग्रेसी नेताओं ने वोट और तुष्टीकरण की राजनीति के लिए दबा दिया था।


पुलिस के कुछ अधिकारियों और इक्का दुक्का महिला संगठनों की कोशिशों के बावजूद लड़कियों के परिवार आगे नहीं आ रहे थे। इस गैंग में शामिल लोगों के कांग्रेसी नेताओं और खूंखार अपराधियों तथा चिश्तियों से कनेक्शन्स की वजह से लोगों ने मुंह नहीं खोला।


बाद में फोटो और वीडियोज के जरिए तीस लड़कियों की शक्लें पहचानी गईं। इनसे जाकर बात की गई। केस फाइल करने को कहा गया। लेकिन सोसाइटी में बदनामी के नाम से बहुत परिवारों ने मना कर दिया। बारह लड़कियां ही केस फाइल करने को तैयार हुई। बाद में धमकियां मिलने से इनमे से भी दस लड़कियां पीछे हट गई।


बाकी बची दो लड़कियों ने ही केस आगे बढ़ाया। इन लड़कियों ने सोलह आदमियों को पहचाना। ग्यारह लोगों को पुलिस ने अरेस्ट किया। जिला कोर्ट ने आठ लोगों को उम्र कैद की सजा सुनाई।


इसी बीच मुख्य आरोपियों में से फारूक चिश्ती का मानसिक संतुलन ठीक नहीं का सर्टिफिकेट पेश कर फांसी की सजा से बचा कर 10 साल की सजा का ही दंड मात्र दिया।


नवज्योति के संपादक दीनबंधु चौधरी ने स्वीकार किया था कि स्थानीय प्रशासन एवं अन्य अधिकारियों को इस कांड के खुलने के लगभग एक साल पहले से ही इस घोटाले की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने स्थानीय राजनेताओं के दवाब और प्रभाव के कारण जांच को रोकने की अनुमति दी और रोके रखा। चौधरी ने कहा कि आखिरकार उन्होंने कहानी के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया क्योंकि यह स्थानीय प्रशासन को कार्रवाई में जागृत करने का एकमात्र तरीका था।


अंत में, पुलिस ने आठ आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। आगे की जांच में कुल 18 लोगों को आरोपित किया गया और कई दिनों तक शहर में अत्यधिक तनाव व्याप्त रहा। विरोध करने के लिए लोग सड़कों पर उतर आए और सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया। तीन दिवसीय बंद का आह्वाहन किया गया और फिर बाद में व्यापक शोषण और ब्लैकमेल की खबरें आने लगीं। सेवानिवृत्त राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओमेंद्र भारद्वाज जो उस समय अजमेर में पुलिस उपमहानिरीक्षक थें को आरोपियों ने बहुत परेशान किया और उन्होंने अपनी सामाजिक और वित्तीय ताकत के कारण ओमेंद्र भारद्वाज को इस मामले को आगे लाने से रोकने की बहुत कोशिश की। 

राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओमेंद्र भारद्वाज, जो उस समय डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल के पद पर तैनात थे, ने इस घटना के संबंध में कहा था कि "आरोपी सामाजिक और आर्थिक रूप से अत्यंत हीं सक्षम और समृद्ध थें और इसी कारण पुलिस के लिए इन पीड़ित लड़कियां को इस कांड के घटना की जानकर देने और इस कांड में केस दर्ज करने के लिए आगे लाना अत्यंत ही कठिन कार्य था।"


इसके बाद राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक अक्षमता की एक और गाथा लिखी गई। लड़कियों को प्रताड़ित करने और ब्लैकमेल करने का मामला अभी भी बंद होने से कोसों दूर था। कई पीड़ित जो गवाह बनने वाले थे, बाद में पलट गए। सामाजिक कलंक और आडंबर की बदबू इतनी बुरी थी कि शहर की लड़कियों को गिरोह का शिकार होने के बाद उन्हें एक दूसरे के साथ पहचान करवा कर आरोपियों ने आपस मे पहचान करा दिया था। पीड़ितों की संख्या कई सौ मानी गई। कुछ ही पीड़ित लड़कियां आगे आई। स्थिति इतनी खराब थी कि भावी दूल्हे, जो अजमेर की लड़कियों से शादी करने वाले थे, अखबारों के कार्यालयों में आ जाते थे और यह पता लगाने की कोशिश करते थे कि जिस लड़की से वे शादी करने जा रहे थे क्या उनकी होने वाली पत्नी कहीं उनमें से एक तो नहीं। अनंत भटनागर, राज्य महासचिव, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और अजमेर के निवासी ने कहा कि लोग कहते थे कि अगर लड़की अजमेर की थी, तो उन्हें यह पता लगाना होगा कि वह किस तरह की लड़की थी।


इस भयावह मामले का सबसे विचलित करने वाला हिस्सा पीड़ितों की अनकही पीड़ा है। बलात्कार के बाद, अधिकांश पीड़ितों ने उत्पीड़न और धमकियों का सामना किया। इस से बाहर आने के लिए उन्हें समाज या उनके परिवारों से कोई समर्थन नहीं मिला। पुलिस जांच के अनुसार लगभग 6 पीड़ितों ने कथित तौर पर आत्महत्या की। अजमेर महिला संगठन जिसने पीड़ितो की मदद करने और इस पूरे घटना को कानूनी मदद देनी चाही तो उन्हें धमकियां मिलने लगीं और उन धमकियों के मिलने के कारण इस संगठन ने अपना विचार त्याग दिया। उस समय अजमेर में छोटे समय की वीडियोज काफी सनसनीखेज थीं। जैसे कि सैकड़ों लड़कियों का सामूहिक शोषण शहर की अंतरात्मा के लिए कोई नई ख़बर लेकर आई हो। कई पीड़ितों को कथित रूप से इन वीडियोस फ़ोटो और स्थानीय कागजात द्वारा आगे भी ब्लैकमेल किया गया था। उनके पास लड़कियों की स्पष्ट तस्वीरों तक पहुंच थी और मालिकों और प्रकाशकों ने लड़कियों के परिवारों से उन्हें छिपाए रखने के लिए पैसे मांगे।


एक स्थानीय अखबार नवज्योति ने सबसे पहले कुछ लड़कियों के नग्न चित्र और एक कहानी प्रकाशित की जिसमें स्कूली छात्राओं को स्थानीय गिरोह के द्वारा ब्लैकमेल किए जाने की बात कही गई थी। इसके बाद हीं लोगों को इस जघन्य कांड और इस घोटाले के संबंध में पता चला और फिर उसके बाद इस निर्मम कांड के एक-एक तार आपस मे जुड़ते चले गए।


दोनो मुख्य आरोपी अजमेर के प्रसिद्व मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह के खादिमों (या यूं कहें कि उस दरगाह के देखभालकर्ताओं) के कबीले से थें। मुख्य आरोपी फारूक चिस्ती था। उसके अतिरिक्त अजमेर के भारतीय युवा कांग्रेस से जुड़े हुए दो अन्य नफीस चिश्ती और उसका भाई अनवर चिश्ती क्रमशः अजमेर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव थे। अंततः 18 जाने-माने अपराधियों को अदालत में आरोपित किया गया। आठ को जीवन भर के लिए दोषी ठहराया गया था, उनमें से 4 को बाद में 2001 में बरी कर दिया गया था, और शेष को पहले से ही जेल की सजा को कम करने के बाद मुक्त कर दिया गया था।

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

क्‍या है छावला रेप एंड मर्डर केस, जिसके सभी आरोपी सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए ?


 10 साल पुराने 19 साल की एक युवती से बलात्कार और उसकी हत्या वाला छावला रेप एंड मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर 2022 को फैसला सुनाते हुए  तीनों आरोपियों को रेप और मर्डर के आरोप से बरी कर दिया। ज़ाहिर है कि लोग तो गुस्‍से में आने ही थे। आखिर इतने जघन्य अपराध के मामले में कोई दोषी क्‍यों नहीं पाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है, उससे पता चलता है कि इस केस की पूरी जांच में ही गलतियां हुईं और फिर सुनवाई में भी यही हाल रहा।


आइए देखते हैं कि छावला रेप एंड मर्डर केस क्या है?

9 फरवरी साल 2012, युवती अपने ऑफिस से लौट रही थी। कुतुब विहार इलाके से तीन लोगों ने उसे किडनैप कर लिया। शिकायत होने पर पश्चिम दिल्ली के छावला पुलिस स्टेशन में अपहरण का मामला दर्ज किया गया। 13 फरवरी को पुलिस ने तीन आरोपियों को अरेस्ट किया। उनकी कार जब्त की। युवती का क्षत-विक्षत शव हरियाणा में रेवाड़ी जिले के रोढाई गांव के एक खेत में मिला, ऐसा पुलिस ने बताया था।

छावला रेप मामले में ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में क्या हुआ? 

26 मई 2012 को निचली अदालत ने तीनों आरोपियों के खिलाफ किडनैपिंग, रेप, मर्डर और दूसरे अपराधों में आरोप तय किए। करीब दो साल बाद 13 फरवरी को कोर्ट ने तीनों आरोपियों को रेप और मर्डर का दोषी करार दिया। उसी साल 19 फरवरी को सुनाए गए फैसले में अदालत ने कहा था कि दोषियों पर कोई रहम नहीं की जा सकती, लिहाजा फांसी की सजा सुनाई जा रही है।

इस फैसले के खिलाफ दोषियों ने अपील की, लेकिन हाई कोर्ट ने उसी साल अगस्त में अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत से सुनाई गई फांसी की सजा सही है। उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में आया। पूरी सुनवाई के बाद 7 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यू यू ललित, जस्टिस रवींद्र भट और जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच ने आरोपियों को बरी कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए जो सवाल

कोर्ट ने कहा कि किसी भी जांच अधिकारी ने आरोपियों की टेस्ट-आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई। लिहाजा आरोपियों की शिनाख्त ठीक तरीके से तय नहीं हो सकी।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने इंडिका कार 13 फरवरी 2012 को जब्त की और कहा कि इसी कार में पीड़िता को किडनैप किया गया था, लेकिन किसी भी गवाह ने इस कार का रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं देखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीट कॉन्सटेबल्स से पूछताछ और जिरह नहीं की गई, जिससे ‘आरोपियों की गिरफ्तारी की पूरी कहानी शक के दायरे में आ गई।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन हालात में आरोपियों को अरेस्ट किया गया और कार को जब्त किया गया, उससे ‘अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गई स्टोरी पर गहरे शक पैदा होते हैं।’ कोर्ट ने कहा कि इस बात का सबूत भी साफ नहीं है कि जिस जगह पर पीड़िता का शव मिलने की बात बताई गई, वहां सबसे पहले कौन पहुंचा था।

पुलिस ने कहा था कि पीड़िता का शव रेवाड़ी जिले के गांव के एक खेत में तीन दिनों तक पड़ा रहा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शव के सड़ने के कोई संकेत नहीं मिले थे और इस बात की गुंजाइश बेहद कम है कि तीन दिनों तक खेत में खुले पड़े रहने पर भी शव को कोई न देखे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का पूरा केस ‘परिस्थितियों से जुड़े सबूत’ पर टिका था। जो सबूत पेश किए गए, उनको ‘परिस्थितियों से मिलाकर’ देखने पर साबित होता है कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का दोष साबित करने में नाकाम रहा। ‘दोष सिद्ध करने के लिए जिन परिस्थितियों का हवाला दिया जाता है, उनसे एक कंप्लीट चेन बननी चाहिए। ऐसी चेन जिससे इस नतीजे पर पहुंचने में कोई शंका न रह जाए कि अपराध आरोपियों ने ही किया था, किसी और ने नहीं। परिस्थितियों से जुड़े सबूत इस तरह कंप्लीट होने चाहिए कि आरोपियों के दोषी होने के सिवा और किसी हाइपोथेसिस की बात ही न हो पाए।’

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों और पीड़िता की डीएनए प्रोफाइलिंग और मैचिग के लिए सैंपल कलेक्शन, स्टोरेज और उसकी जांच के बारे में भी सवाल उठाए। आरोपियों और पीड़िता के सभी सैंपल जांच एजेंसी ने 14 फरवरी और 16 फरवरी 2012 को लिए थे। ये सैंपल जांच के लिए 27 फरवरी 2012 को लैबोरेटरी भेजे गए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कलेक्शन से लेकर लैबोरेटरी में भेजे जाने के बीच सैंपल ‘पुलिस स्टेशन के मालखाना में पड़े रहे। ऐसे हालात में नमूनों से छेड़छाड़ की आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता। न तो ट्रायल कोर्ट और न ही हाई कोर्ट ने इस बात की जांच की थी कि डीएनए रिपोर्ट्स के नतीजों का आधार क्या था। न ही उन्होंने यह देखा कि जांच करने वाले एक्सपर्ट ने सही तरीका अपनाया या नहीं। ऐसा कोई सबूत सामने नहीं था, लिहाजा डीएनए प्रोफाइलिंग से जुड़ी सारी रिपोर्ट संदेह के दायरे में आ गईं, खासतौर से यह देखते हुए कि जांच के लिए भेजे गए नमूनों का कलेक्शन और उनको सील करने की प्रक्रिया भी शक के दायरे में है।’

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की मदद के लिए नियुक्त की गईं वकील सोनिया माथुर ने डीएनए रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। माथुर का कहना था कि नमूनों की कलेक्शन प्रक्रिया शक के घेरे में है। उनका कहना था कि फोरेंसिक एविडेंस न तो वैज्ञानिक और न ही कानूनी रूप से साबित होता है, लिहाजा इसे आरोपियों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी सोनिया माथुर की इस राय से इत्तिफाक जताया।

पुलिस ने जो इंडिका कार जब्त की थी, उसकी सीट कवर पर मिले खून के धब्बों और सीमेन को जांच के लिए CFSL भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ब्लडस्टेन और सीमेन को जांच के लिए भेजे जाने के ब्योरे को भरोसे लायक नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि इस बात का कोई साफ सबूत नहीं है कि जब्त किए जाने के बाद से जांच के लिए CFSL भेजे जाने तक कार किसके पास थी। यह भी साफ नहीं था कि इस दौरान कार को सील किया गया था या नहीं।

अभियोजन पक्ष ने कहा था कि पीड़िता के शव से आरोपी का बाल मिला था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह दावा विश्वास करने लायक नहीं दिखता। कोर्ट ने कहा कि दावा किया जा रहा है कि बाल पीड़िता के शव से मिला, लेकिन वह शव खेत में करीब तीन दिन और तीन रात तक खुले में पड़ा था।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में हुई सुनवाई के बारे में भी काफी कुछ कहा। आइए देखते हुए कोर्ट ने क्या कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने सचाई तक पहुंचने के प्रयास नहीं किए। बेंच ने कहा कि ट्रायल के दौरान ‘कई बड़ी गलतियां’ हुई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट का सेक्शन 165 जज के सवाल पूछने के अधिकार से जुड़ा है और यह सेक्शन ट्रायल कोर्ट को इस बात का ‘असीमित अधिकार’ देता है कि वह सच तक पहुंचने के लिए सुनवाई के किसी भी चरण में गवाहों से कोई भी सवाल पूछ सकता है। बेंच ने कहा, ‘कई फैसलों में यह बात कही जा चुकी है कि जज से चुपचाप अंपायरिंग करने की अपेक्षा नहीं की जाती है। इसके बजाय यह उम्मीद की जाती है कि जज ट्रायल में सक्रियता दिखाएंगे और सही नतीजे पर पहुंचने के लिए गवाहों से सवाल करेंगे।’

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की गिरफ्तारी से लेकर सैंपल कलेक्शन सहित पूरी जांच प्रक्रिया में गलतियां पाईं। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में हुए ट्रायल पर भी सवाल उठाए। आखिर में इस साल 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों से ठीक से जिरह नहीं की गई थी और आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई के उनके अधिकार से वंचित रखा गया।

कुलमिलाकर देश में कानून का राज स्‍थापित करने का सपना हमें बहुत दूर दिखाई देता है क्‍योंकि न्‍याय की आस को धूमिल करने की उतनी ही दोषी हैं जितनी कि पुलिस कार्यवाही।  है ना कमाल की बात आरोपियों को बचने का हरसंभव प्रयास करती दिखती ये संस्‍थाऐं पूरे सिस्‍टम का मखौल उड़ा रही हैं और हम अब भी चुप हैं।

Compiled: Legend News 

शनिवार, 22 जनवरी 2022

पुरुषों के लिए भी कानून बनाने का समय


 कानून के बारे में एक कहावत है कि “Any law loses its teeth and bites on repeated misuse.” अर्थात् “कोई भी कानून बार-बार दुरुपयोग करने पर अपने दांत खो देता है और काटने लगता है।” यूं तो किसी कानून का दुरुपयोग हमारे यहां कोई नई बात नहीं है परंतु अब यह अविश्‍वास से उपजे रिश्‍तों के लिए एक ऐसी आड़ बन गया है जिसका दुष्‍प्रभाव पूरे समाज को झेलना होगा।

इसकी नज़ीर के तौर पर गुरुग्राम का आयुषी भाटिया केस हो या मद्रास हाईकोर्ट और पुणे की सेशन कोर्ट के ‘दो फैसले’ जो हमें अपनी सामाजिक व्‍यवस्‍थाओं और घरों में दिए जाने वाले संस्कारों को फिर से खंगालने को बाध्‍य कर रहे हैं कि आखिर सभ्‍यता के ये कौन से मानदंड हैं जिन्‍हें हम सशक्‍तीकरण और स्‍वतंत्रता के खांचों में फिट करके स्‍वयं को आधुनिक साबित करने में जुटे हुए हैं।

सिर्फ एक महीने के अंदर जो मामले सामने आए उनमें –

पहला मामला
पुणे स्‍थित एमएनसी में लाखों के पैकेज पर कार्यरत एक नवविवाहिता ने कोर्ट में तलाक की अर्जी देते हुए, स्‍वयं से आधा वेतन पाने वाले सीआरपीएफ में कार्यरत पति से भारी भरकम ‘भरण-पोषण’ की मांग की, वह भी सिर्फ इसलिए कि उसे वह हनीमून (कोरोना काल में) पर नहीं ले गया।

दूसरा मामला
चेन्‍नई की एक महिला द्वारा अपने पति को परेशान करने के लिए फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक की मंजूरी के बावजूद घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई गई ताकि उसको नौकरी से निलंबित किया जा सके। इसपर फैसला देने वाले मद्रास हाई कोर्ट के जस्‍टिस एस. वैद्यनाथन ने खेद जताते हुए कहा कि दुर्भाग्‍यवश पति के पास पत्नी के खिलाफ केस दर्ज कराने के लिए #घरेलूहिंसाअधिनियम 2005 जैसा कोई कानून नहीं है और हम विवश हैं निष्‍पक्ष न्‍याय ”न” दे पाने के लिए।

तीसरा मामला
हरियाणा के गुरुग्राम पुलिस ने 4-5 जनवरी को 20 वर्षीय युवती आयुषी भाटिया को रेप का आरोप लगाकर जबरन वसूली करने के आरोप में गिरफ्तार किया, जिस मामले में आयुषी भाटिया को पकड़ा गया, वह उसका आठवां शिकार था।

विगत 15 महीनों के दौरान आरोपी महिला ने गुड़गांव के 7 पुलिस स्टेशनों (राजेंद्र पार्क, सदर, साइबर, सेक्टर 5, न्यू कॉलोनी, सेक्टर 10 और सिटी) पर 8 अलग-अलग लड़कों के खिलाफ रेप के मामले दर्ज कराए, वह ये काम बेहिचक करती थी और अब तक वह 7 लड़कों की जिंदगी बर्बाद कर चुकी है। हालांकि आठवें लड़के के ‘शिकार’ होने से पूर्व ही आयुषी का भंडाफोड़ हो गया और अब वह जेल में है। आठ में से तीन की क्लोजर रिपोर्ट में पाया गया है कि महिला की मां और उसका एक चाचा भी इस कथित जबरन वसूली सिंडिकेट का हिस्सा थे, फिलहाल वे फरार हैं।

इसी दिसंबर-जनवरी के दौरान घटित घटनाओं पर एक नज़र-

1. भोपाल फैमिली कोर्ट की काउंसलर सरिता रजनी ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि भोपाल की एक कामकाजी महिला ने कैंसर पीड़ित पति से की भरण-पोषण की मांग करते हुए निर्दयता पूर्वक कहा कि ‘भले ही अपनी किडनी बेचो लेकिन मुझे पैसे दो’, इस घटना के बाद से वह व्‍यक्‍ति खुद पत्नी के इस व्यवहार से सदमे में हैं।
2. गुरुग्राम कोर्ट ने ऐसे ही एक झूठे केस में नाबालिग लड़के को फंसाने वाली बालिग महिला के खिलाफ निर्णय सुनाया कि ‘इच्छा’ पूरी नहीं होने पर महिला ने लिया रेप कानूनों का फायदा लिया।
3. अलवर के मांढण थाना इलाके के स्कूल गैंगरेप केस में हाल ही में एक खुलासा हुआ है कि पूर्व कर्मचारी के कहने पर नाबालिग छात्राओं ने शिक्षकों पर जो आरोप लगाया वह इन शिक्षकों की गिरफ्तारी के बाद झूठा निकला।

ये तो चंद उदाहरण हैं वरना खोजने बैठें तो कई पन्‍ने भर जाऐंगे, इन सभी मामलों में महिलाओं द्वारा पुरुषों के खिलाफ ”कानून का बेजां इस्‍तेमाल” किया गया। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि पुरुष भी तो सदियों से ऐसा करते रहे हैं, उन्‍होंने तो बांझ, डायन व चरित्रहीन कहकर महिलाओं पर लगातार अत्‍याचार किए और तमाम मामलों में आज भी कर ही रहे हैं। संभवत: इसीलिए आज यह स्‍थिति आई कि उनके लिए आज कोई खड़े होने को तैयार नहीं और ना ही कोई कानून बन सका है।

मगर हमें ये समझना होगा कि अत्‍याचार का बदला अत्‍याचार से नहीं लिया जा सकता। महिला के ऐसा करने पर इतनी हाय-तौबा इसीलिए है क्‍योंकि एक ”मां” के किसी भी तरह डगमगाने पर पूरा परिवार, सारे रिश्‍ते नाते तहसनहस हो जाते हैं और ऐसा होते ही सामाजिक तानाबाना चरमराने लगता है इसलिए महिलाओं द्वारा पैदा किया जा रहा ये अविश्‍वास स्‍वयं उन्‍हीं के लिए अहितकर है क्‍योंकि इस ‘अविश्‍वास’ के लिए न्‍यायालय भी कैसे न्‍याय देंगे और कितने कानून बनेंगे।

हमें यह समझना चाहिए कि विवाह कोई अनुबंध नहीं बल्कि एक संस्कार है। बेशक लिव-इन-रिलेशनशिप को मंजूरी देने वाले घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के प्रभाव में आने के बाद ‘संस्कार’ शब्द का कोई अर्थ नहीं रह गया है परंतु फिर भी हम वर्तमान ही नहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कम से कम बदतर उदाहरण तो ना ही बनें। तलाक के मामलों के अलावा झूठे रेप केस में पुरुषों को फंसाने वाली महिलाएं, उन वास्‍तविक रेप पीड़िताओं की राह में कांटे बो रही हैं जो वास्‍तव में इस अपराध को झेलती हैं।

बहरहाल हमें अपनी आंखें खुली रखनी होंगी ताकि न्‍याय-अन्‍याय में सही अंतर कर सकें और वास्‍तविक अपराधी को सजा तक पहुंचा सकें फिर चाहे वह कोई भी हो।

- अलकनंदा सिंंह

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

हाथरस को ‘हाथरस’ बनाने के बाद…की कहानी


 र‍िश्तों को लेकर हमारे कव‍ियों- साह‍ित्यकारों ने बड़ा काम क‍िया है, पोथ‍ियों पर पोथ‍ियां गढ़ते गए परंतु इन्हें प्रभाव‍ित करने वाली लालची मानस‍िकता को वे नहीं पढ़ पाए और ना ही बदल पाए। आज जब लालच ने सबसे पहला प्रहार र‍िश्तों पर क‍िया और सामूह‍िक दुष्कर्म के बढ़ते मामलों के रूप में इसका नतीज़ा अब हमारे सामने आ रहा है, तो एक एक केस की हकीकत भी समझ आ रही है। ये अलग बात है क‍ि कभी राजनीति तो कभी कानूनी बहाने ‘सच’ को कहने-सुनने-देखने पर बंद‍िशें लगा रहे हैं परंतु कब तक, सच की यही खूबी है क‍ि वह तो सामने आकर ही रहता है।

और सच ये है क‍ि दुष्कर्म की ‘घृणा’ का मोल लगाकर जो मुआवज़ा बांटने की प्रथा चली है, उसने इसके ‘घट‍ित होने’ पर प्रश्नच‍िन्ह लगाने शुरू कर द‍िए हैं। ऐसा नहीं है क‍ि ये घटनायें होती ही नहीं हैं, न‍िश्च‍ित ही होती हैं परंतु भेड़‍िया आया… भेड़‍िया आया… की तर्ज़ पर दुखद घटनायें भी संशय के घेरे में तब आ जाती हैं जब इसके पीछे पीड़‍ित को न्याय द‍िलाने की अपेक्षा मुआवजे का लालच प्रगट होता है। हक़ीकत हम सभी जानते हैं क‍ि समाज में सभी पुरुष ‘हर‍िश्चंद्र’ नहीं बैठे और ना ही सभी मह‍िलायें ‘साव‍ित्री’ हैं।

हाथरस कांड के बाद अब फतेहपुर में भी ऐसा ही मामला सामने आया है जहां मृतका के पर‍िजन जाम लगाकर न्याय की मांग के साथ ही पुल‍िस के व‍िरुद्ध नारे लगा रहे थे, अचानक सपा व कांग्रेस के नेता के पहुंचते ही एफआईआर में नामज़द क‍िए गए एक आरोपी के साथ साथ ”तीन अन्य अज्ञात” का नाम भी जोड़ देते हैं और मामले को ‘ जघन्य व सामूह‍िक दुष्कर्म ‘ बताने लगते हैं। फ‍िर एक और ट्व‍िस्ट आता है क‍ि 25 लाख मुआवजे की घोषणा होते ही वे पुल‍िस का व‍िरोध भी छोड़ देते हैं और मृतका का अंत‍िम संस्कार भी फटाफट कर देते हैं।

बहरहाल ये और इस जैसे कई मामले हैं जहां मुआवज़ा ‘बांटा’ नहीं गया , बल्क‍ि पर‍िजनों पर पैसा पानी की तरह बहाया गया। निर्भया केस के बाद जिस तरह से उसके घरवालों को दिल्ली में फ़्लैट, लाखों रुपये और भाईयों को नौकरी दी गई, उसके बाद से देशभर में न्याय की जगह ‘तुष्टीकरण’ की एक अजीब सी प्रथा शुरू हो गई ज‍िसने लालच को ऐसा पनपाया क‍ि अब वही गुनाहों को जन्म दे रहा है।

अगर बेटियों के रेप के बदले ज़मीन, लाखों रूपये और बेटों को सरकारी नौकरी मिलने लगेगी तो फिर समझ लो कि गरीब और मजबूर समाज को किस लालच के गर्त में ढकेला जा रहा है। ये बात तो अब कतई बेमानी हो गई है कि कोई भी माँ-बाप अपनी बेटियों के बलात्कार का झूठा मुक़द्दमा नहीं कर सकते। अदालतों से बड़ी संख्या में वापस ल‍िए गए बलात्कार के आरोपों वाले केस इस बात की तस्दीक करते हैं । चूंक‍ि बलात्कार के अपराध में प्रत्यक्ष साक्षी का अभाव होता है इसल‍िए इसका बेजां फायदा उठाकर मुआवज़ा प्रथा के ल‍िए इस टूल को सब अपने-अपने ह‍िसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं ।

हसरत मोहानी का एक शेर और बात खत्म क‍ि –

भड़क उठी है कैसी आतिश-ए-गुल
शरारे आशियाँ तक आ गए हैं।

- अलकनंदा स‍िंंह