शनिवार, 27 दिसंबर 2014

वैदिक युग में थे रिवर्स गेयर वाले विमान

वैदिक युग में भारत में ऐसे विमान थे जिनमें रिवर्स गियर था यानी वे उलटे भी उड़ सकते थे। इतना ही नहीं, वे दूसरे ग्रहों पर भी जा सकते थे। सच है या नहीं, कौन जाने। अब एक जाना-माना वैज्ञानिक इंडियन साइंस कांग्रेस जैसे प्रतिष्ठित कार्यक्रम में भाषण के दौरान ऐसी बातें कहेगा तो आप क्या कर सकते हैं!
3 जनवरी से मुंबई में इंडियन साइंस कांग्रेस शुरू हो रही है जिसमें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दो वैज्ञानिकों समेत दुनियाभर के बुद्धिजीवी हिस्सा लेंगे। इन्हीं में एक होंगे कैप्टन आनंद जे बोडास जो मानते हैं कि 'आधुनिक विज्ञान दरअसल विज्ञान ही नहीं' है।
मुंबई मिरर अखबार को बोडास ने बताया कि जो चीजें आधुनिक विज्ञान को समझ नहीं आतीं, यह उसका अस्तित्व ही नकार देता है। बोडास कहते हैं, 'वैदिक बल्कि प्राचीन भारतीय परिभाषा के अनुसार विमान एक ऐसा वाहन था, जो वायु में एक देश से दूसरे देश तक, एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक और एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जा सकता था। उन दिनों विमान विशालकाय होते थे। वे आज के विमानों जैसे एक सीध में चलने वाले नहीं थे, बल्कि दाएं-बाएं और यहां तक कि रिवर्स भी उड़ सकते थे।'
कैप्टन बोडास 'प्राचीन भारतीय वैमानिकी तकनीक' विषय पर बोलेंगे। वह केरल में एक पायलट ट्रेनिंग सेंटर के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए हैं। उनके साथ इस विषय पर एक और वक्ता होंगे जो स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल स्कूल में एक लेक्चरर हैं।
कैप्टन बोडास भारतवर्ष में हजारों साल पहले हासिल की गईं जिन तकनीकी उपलब्धियों का दावा करते हैं, उनका स्रोत वह वैमानिका प्रक्रणम नामक एक ग्रंथ को बताते हैं, जो उनके मुताबिक ऋषि भारद्वाज ने लिखा था। वह कहते हैं, 'इस ग्रंथ में जो 500 दिशा-निर्देश बताए गए थे उनमें से अब 100-200 ही बचे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बहुत वक्त गुजर गया, फिर विदेशियों ने हम पर राज किया और देश की बहुत सी चीजें चुरा ली गईं।'

वह कहती हैं, 'ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारतीय विज्ञान कांग्रेस में एक सत्र में संस्कृत साहित्य के नजरिए से भारतीय विज्ञान को देखने की कोशिश होगी। इस साहित्य में वैमानिकी, विमान बनाने की जानकारी, पायलटों के पहनावे, खाने-पीने और यहां तक कि सात तरह ईंधन की भी बात है। अगर हम इन चीजों के बारे में बोलने के लिए संस्कृत के विद्वानों को बुलाते तो लोग हमें खारिज कर देते लेकिन कैप्टन बोडास और उनके साथी वक्ता अमीय जाधव संस्कृत में एमए के साथ-साथ एमटेक भी कर चुके हैं।'
वैसे, इस भारतीय विज्ञान कांग्रेस में इस विषय पर चर्चा का कई जाने-माने वैज्ञानिक समर्थन कर रहे हैं, जिनमें आईआईटी बेंगलुरु में एयरोस्पेस इंजिनियरिंग के प्रफेसर डॉ. एस. डी. शर्मा भी शामिल हैं।
इंडियन साइंस कांग्रेस में यह विषय इसलिए रखा गया है ताकि 'संस्कृत साहित्य के नजरिए से भारतीय विज्ञान को देखा जा सके'। इस विषय पर होने वाले कार्यक्रम में संचालक की भूमिका मुंबई यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रफेसर गौरी माहूलीकर निभाएंगी। वह कैप्टन बोडास की बात को सही ठहराने की कोशिश करती हैं।
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According to Maharshi Dayananda Saraswati’s commentary (first published in 1878 or earlier), there are references to aircraft in the Vedic mantras:

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....going from one island to another with these crafts in three days and nights....and

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Just an intelligent people constructed ships to cross oceans.....jumping into space speedily with a craft using fire and water.....containing 12 stamghas (pillars), one wheel, three
machines, 300 pivots, and 60 instruments.

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

असम का तोलिनी ब्‍याह...एक संस्‍कार

असम के बोगांइगांव ज़िले के सोलमारी में एक अनोखी शादी हो रही है. अनोखी इस मायने में कि असम की परंपरा के अनुसार यहां दुल्हन तो होती है लेकिन दूल्हा एक केले का पौधा है. ये मौक़ा है तोलिनी ब्याह का. ये वो मौका होता है जब बेटी बचपन की उम्र पार कर किशोरावस्था में चली जाती है. ये तब मनाया जाता है जब पहली बार किसी लड़की को महावारी होती है. असम के सोलमारी गांव के ओनियो रॉय के घर उसी की तैयारी चल रही है और सब की नज़र उनकी बेटी गीतूमनी पर है जिसका नवोई तोलिनी ब्याह है.
बाहर शोर गुल है, गाना बजाना है तो 13 साल की गीतूमनी रॉय एक कमरे में ज़मीन पर चुपचाप बैठी है. तीन दिन बाद वो स्नान करेगी और कपड़े बदलेगी. उसे दुल्हन की तरह सजाया जाएगा. गीतूमनी की मां भखंत रॉय का कहना था कि ऐसा अवसर उनके जीवन में भी आया था. लेकिन पहले उत्सव के साथ-साथ पाबंदियां भी ज़्यादा थीं.
वे कहती हैं, ''मुझे पहले दिन तो केवल पानी दिया गया गया था, ज़मीन पर सुलाया गया और उन दिनों में खुद खाना पकाना पड़ता था. काफी छुआछूत होती थी, काफ़ी एहतियात बरतना पड़ता था लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं कर सकती. वो स्कूल जाती है तो कैसे खाना पकाएगी. अगर मैं उसे हमेशा महावारी के दौरान नीचे सुलाउंगी तो उसे दुख होगा. मैं अपनी बेटी का साथ दूंगी.''
तोलिनी ब्याह की शुरुआत होती है लड़की की पहली माहवारी के पहले दिन से. उसे सूर्य की रोशनी से बचाया जाता है. महावारी के दौरान खाने के लिए फल, कच्चा दूध और पीठा दिया जाता है. वो पका हुआ खाना नहीं खा सकती. उसे ज़मीन पर सोना होता है और जब तक रस्म पूरी नहीं हो जाती, कोई पुरुष लड़की का चेहरा नहीं देख सकता.
गीतूमनी के पिता ओनियो रॉय कहते हैं, ''मैं खुश हूँ लेकिन मेरी बेटी ने तीन दिन से कुछ नहीं खाया. मैं कैसे खा सकता हूं. तीन दिन से वो इस सर्दी में ज़मीन पर सो रही है, माना नियम तो नियम होता है लेकिन दुख भी होता है. लेकिन एक तसल्ली है कि उसे महावारी हो गई. नहीं होती तो हम तनाव में आ जाते. अब मेरी बेटी बड़ी हो गई है.''
इस बीच परंपरा के मुताबिक गीतूमनी को उसकी मामी कंधे पर लादकर नहलाने ले गईं. इस रस्म के दौरान केवल महिला और लड़कियां शामिल होती हैं. इसके बाद, आंगन में गीतूमनी के सोने और चांदी के जेवर पहनाए गए, पेरौं में पायल और फिर पारंपरिक मेखला चादर पहनाई गई.
गीतूमनी का दुल्हन की तरह श्रृंगार करने के बाद उसकी मांग में सिंदूर भरा गया. उसने आंगन में केले के पत्तों पर रखी पूजा सामग्री के सामने प्रणाम किया. हालांकि दूल्हा बना केले का पेड़ यहां नहीं होता. शादी के बाद पूजा सामग्री में से तांबुल, पान का पत्ता पारंपरिक गमछे में बांधा जाता है और इसे बच्चा समझकर उत्सव में शामिल महिलाओं को खेलने के लिए दिया जाता है.
ये इस बात को दर्शाता है कि लड़की शादी के लायक है और मां बन सकती है.
गीतूमनी कक्षा आठ में पढ़ती है. वे कहती हैं, ''अच्छा लग रहा है और मैं जानती हूं कि रीति रिवाज़ के अनुसार मुझे खाना नहीं दिया जा रहा वो सब ठीक है लेकिन मैं ज़मीन पर नहीं सोउंगी.''
उधर 60 साल की पूर्णिमा सिंहो अपनी बेटी का कई साल पहले तोलिनी ब्याह कर चुकी है.
उनका कहना था, ''मेरी बेटी का तोलिनी ब्याह में 30 हज़ार रुपए का ख़र्च आया था. मैंने उसे सोने के गहने भी दिए थे. ये हमारे लिए खुशी मनाने का मौका होता है क्योंकि अगर बच्चा भाग कर शादी कर ले तो कम से कम दिल का अरमान तो अधूरा नहीं रहता.''
ये उत्सव लड़की के सयाने होने पर किया जाता है हालांकि हर इलाके के रीति रिवाज़ो में थोड़ा बहुत अंतर होता है. असम में माना जाता है कि पहले निचली जाति के लोग ही अपनी बेटी की पहली महावारी के बाद इस तरह का जश्न मनाते थे लेकिन अब देखा देखी समाज का हर वर्ग इसे मनाने लगा है.
तेजपुर यूनिवर्सिटी में कल्चरल स्टडीज़ में सहायक प्रोफ़ेसर मंदाकिनी बरुआ पुबर्टी राइट्स पर शोध पत्र भी लिख रही हैं. वे बताती हैं, "पहले ब्राह्मण समाज में इसे छिप कर मनाया जाता था क्योंकि वहां ये रिवाज़ था कि महावारी से पहले लड़की की शादी हो जानी चाहिए लेकिन अब असमिया समाज के हर तबके में इसे मनाया जाने लगा है."
वे कहती हैं, "तोलिनी ब्याह का मसकद दरअसल समाज या लड़के वालों को ये बताना होता है कि उनकी लड़की शादी के लिए तैयार हो गई. यहां बिहू उत्सव के दौरान अगर लड़का लड़की एक दूसरे को पसंद कर लेते है तो भाग कर शादी कर लेते हैं. क्योंकि उन्हें डर रहता है कि शायद मां-पिता इससे राज़ी न हो. ऐसे में इसी ब्याह में लड़की के माता-पिता अपनी इच्छाएं पूरी करते है. साथ ही इस बात की खुशी ज़ाहिर की जाती है कि अब वो मां बन सकती है.''
मंदाकिनी बरुआ ये भी बताती हैं कि लड़की को जेवर देकर ये अहसास भी दिलाया जाता है अब वो सयानी हो गई.
उत्तर भारत में जहां अब भी इस विषय पर खुलकर बात नहीं की जाती वहीं असम, तमिलाडु और आंध्र प्रदेश के कुछ इलाक़ों में लड़की की पहली महावारी को शादी की तरह मनाया जाता है.
-सुशीला सिंह

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

6 दिसंबर की शाम: ‘पॉपकॉर्न विद परसाई’

मुंबई में एनसीपीए थिएटर फ़ेस्टिवल सेंटरस्टेज में बीते 6 दिसंबर की शाम व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के नाम रही. मनोज शाह निर्देशित नाटक ‘पॉपकॉर्न विद परसाई’ ने हरिशंकर परसाई को ही जैसे मंच पर ला खड़ा कर दिया.
पॉपकॉर्न की चर्चा कुछ इस तरह चली कि दर्शकों ने नाटक के ज़रिए साहित्य ही नहीं, बल्कि साहित्यकार को भी जाना. चरित्र अभिनेता दया शंकर पांडे ने नाटक में लीड किरदार बख़ूबी निभाया.
नाटक का संगीत, मंच सज्जा, रघुवीर यादव की आवाज़ में मक्के का गीत और परसाई का व्यंग्य इस शाम की पहचान बना.
कटाक्ष
एक घंटे से भी ज़्यादा समय चले इस अवधी नाटक में परसाई का पात्र निभाते दया शंकर पांडे तत्कालीन साहित्यकारों पर कटाक्ष करते हैं तो फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध के पीछे का अंधेरा भी परसाई की अदा में दर्शकों को बताया जाता है.
पिछले कुछ समय से सोलो एक्ट वाले नाटकों का चलन कुछ बढ़ा है.
मनोज शाह इस प्रकार के नाटक पहले भी दर्शकों के सामने रख चुके हैं जहां एक ही अभिनेता पात्र बन अपनी कहानी बताता है.
गुजराती भाषा के लेखक चंद्रकांत बक्शी के पात्र में अभिनेता प्रतीक गांधी को ले कर बनाया गया नाटक ‘हुं चंद्रकांत बक्शी’, कार्ल मार्क्स की कथनी उन्हीं की ज़बानी बताता, सतचित पुराणिक की केंद्रीय भूमिका वाला नाटक ‘कार्ल मार्क्स इन कालबादेवी’ ऐसे ही कुछ प्रयोगो में से एक है.
लोकप्रियता की वजह
ऐसे नाटकों की सफलता के पीछे कई कारण हैं.
जब एक ही अभिनेता पूरे नाटक का भार अपने कंधो पर ले कर चलता है तब वह नाटक में अपनी तरफ़ से पूरी ज़िम्मेदारी निभाते हुए भी एक अलग ही प्रकार की स्वतंत्रता से मंच का इस्तेमाल करता है.
हालांकि निर्देशक की सूचना तो अभिनेता को मन में रखनी ही होती है फिर भी वह पात्र को आत्मसात करने के बाद अपनी समझ को अभिनय में ढाल सकता है.
मुश्किल है ये कला
एक घंटे से ज़्यादा समय तक दर्शकों को अभिनय और वाणी प्रवाह से पकड़े रखना बहुत बड़ी चुनौती है.
इस के साथ ही ढेर सारी लाइनें याद रखना, जिस किरदार को निभाना है उसके इतने क़रीब होना कि दर्शक मानने लगे कि अभिनेता और वह पात्र जैसे एक ही है.
मुंबई की रंगभूमि सोलो एक्ट जैसे कुछ प्रोडक्शन्स दर्शकों के समक्ष सफलतापूर्वक रख चुकी है.
हालांकि ये चलन कितना दीर्घकालीन होता है ये देखना बाक़ी है.
-चिरंतना भट्ट

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

कल से राष्ट्रपति भवन के कलात्मक खजाने को देख‍िए ऑनलाइन

नई दिल्ली। 
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 11 दिसंबर को "राष्ट्रपति भवन की कला विरासत- एक चयन" शीर्षक से एक इलेक्ट्रॉनिक आर्ट कैटलॉग का विमोचन वेबसाइट प्रेसिडेंटऑफइंडियाडॉटएनआईसीडॉटइन
    ( http://presidentofindia.nic.in/  ) पर करेंगे। राष्ट्रपति भवन पहली बार भवन का संपूर्ण कला संग्रह विश्व के लोगों के लिए खोल रहा है। इस कैटलॉग में राष्ट्रपति भवन की 113 उच्च गुणवत्ता वाली पेंटिंग के फोटोग्राफ्स और चुनी हुई कला वस्तुओं का संग्रह होगा। भारत और विदेश के कुछ ही लोग जानते हैं कि राष्ट्रपति भवन में कला का समृद्ध संग्रह है। राष्ट्रपति भवन में आने वाले पूरे संग्रह का कुछ ही हिस्सा देख पाते हैं।
इसके अलावा पेंटिंग के स्थान, प्रकाश व्यवस्था और दर्शकों से इसकी दूरी आदि के कारण सामान्य दर्शक को इसका अध्ययन करने और पेंटिंग की पूरी सराहना करने में परेशानी होती है। इससे दर्शक पेंटिंग को बडा और जूम-इन करके कला की बारिकियां देख सकेंगे जो नंगी आंखों से नहीं देखी जा सकती हैं।
राष्ट्रपति भवन की विज्ञçप्त के अनुसार, कैटलॉग उपयोगकर्ता के अनुकूल है और इसे फोटो एलबम की तरह डिजाइन किया गया है जिसमें पेंटिंग्स की फोटो बाएं पन्ने पर और जानकारी, कलाकार की पृष्ठभूमि और पेंटिंग का विषय दाहिने पन्ने पर है। दर्शक, श्रेणी या स्थान के जरिये कैटलॉग को ब्राउज कर सकते हैं। ई-आर्ट कैटलॉग का अनुसंधान और संकलन राष्ट्रपति के प्रेस सचिव वेणु राजमणि ने नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की अनुसंधान सहायक संग्राहक रूचि कुमार की सहायता से किया है।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

कोई भी मुसलमान मंगोलों को कभी माफ नहीं कर सकता

वाराणसी। 
अयोध्या में श्रीराम जन्म भूमि विवाद को लेकर चल रहे मुकदमे के वादी हाशिम अंसारी का आगे पैरवी न करने की घोषणा के बाद बनारस में मुस्लिम महिलाओं ने नई पहल की है। मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की दर्जनों महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय जाकर अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण कराने की अपील की है। मुस्लिम महिला फाउण्डेशन ने बाबरी मस्जिद के पैरोकार हाशिम अंसारी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि रामलला को आजाद कराने का बयान देकर हाशिम ने मुसलमानों की इज्जत बढ़ाई है।
मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की सदर नाजनीन अंसारी के नेतृत्व में कई मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री के संसदीय कार्यालय जाकर अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए पत्रक दिया। इसकी कॉपी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, आरएसएस के पदाधिकारी इंद्रेश कुमार और विहिप के अशोक सिंघल को भी भेजी गई है।
मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की ओर से मोदी को भेजे गए खत में कहा गया है, 'बाबर विदेशी और मंगोल आक्रमणकारी था। यह चंगेज खां और हलाकू जैसे मंगोलों का वंशज था जिन मंगोलो ने दुनिया के कई शहर उजाड़़ दिए, लाखों लोगों का कत्ल किया। बाबर के पूर्वज हलाकू ने बगदाद पर आक्रमण कर 40 हजार मुसलमानों के साथ साथ पैगम्बर द्वारा नियुक्त इस्लाम के सर्वोच्च धर्मगुरु खलीफा की भी हत्या कर दी थी। इसी हलाकू की वजह से आज दुनिया में इस्लाम का कोई खलीफा नहीं है।'
पत्रक में आगे लिखा है, 'कोई भी मुसलमान मंगोलों को कभी माफ नहीं कर सकता। इन्हीं मंगोलों के वंशज बाबर ने 1528 में राम मंदिर तोड़कर हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत का बीज बोया। मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की सदर ने कहा कि मुसलमानों की इज्जत तभी बढ़ेगी जब वे श्री राम के पक्ष में रहेंगे। जो लोग मंदिर निर्माण के विरोधी हैं वे मुसलमानों को हमेशा गरीब और पिछड़ा बनाए रखना चाहते हैं।'
नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय में ज्ञापन देने वालों में भारतीय अवाम पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष नजमा परवीन, हिंदुस्तानी अंसारी महासभा के अध्यक्ष रेयाजुद्ददीन अंसारी, मोहम्मद नुसरतुल्लाह, मोहम्मद अजहरुद्दीदन, नसीम अख्तर, सीमा बानो, बिलकिस बेगम, हाजरा बेगम, कहकशा अंजुम, शबाना बानो सहित कई दूसरे लोग भी शामिल थे। मुस्लिम महिला फाउण्डेशन ने अयोध्या जाकर हाशिम अंसारी से जल्द मुलाकात कर रामलला को आजाद करने की लड़ाई तेज करने की भी बात कही है।   
-एजेंसी

रविवार, 30 नवंबर 2014

संस्कृत का संरक्षण सरकार का काम है: गुलाम

'देश की सभी शास्त्रीय भाषाओं, विशेषकर संस्कृत का संरक्षण सरकार का काम है और सरकार को इसके लिए मजबूर कर देना हमारा' यह कहना है पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार का। संस्कृत के प्रकांड विद्वान, एक प्राचीन मुस्लिम दरगाह के मुतवल्ली गुलाम साहब शान से खुद को 'संस्कृत का गुलाम' कहा करते हैं। इस दुर्लभ व्यक्तित्व से परिचय कराती विमल मिश्र की रिपोर्ट।
पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार - नाम सुनकर आपको आश्चर्य होगा, पर असली आश्चर्य तो वर्ली स्थित उनके घर पर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। छोटे से कमरे में कुरान और मुस्लिम मजहबी किताबों के साथ रामायण, महाभारत, वेद, पुराण और उपनिषदों से भरे ताखे और आलमारियां, मुख से धाराप्रवाह झरते मंत्र व हिंदू धार्मिक आख्यान और उनका 'संस्कृतमय' बायोडाटा।
'बेटा और दोनों बेटियां शादी-विवाह करके बाहर नहीं गए होते तो आपको इस परिवार के बीच शुद्ध संस्कृत संभाषण भी सुनने को मिलता।' यह कहना है पत्रकार मोहम्मद वजीहुद्दीन का, जिन्होंने हमारी जानकारी में वृद्धि की और बताया कि गुलाम साहब ने तीनों बच्चों के विवाह की पत्रिका भी संस्कृत में ही छपवाई थी।
हिंदी, मराठी, कन्नड, उर्दू, अरबी और अंग्रेजी के विद्वान, 'विश्व भाषा' पत्रिका के संपादक, 'कुरान' व अमर चित्र कथा के संस्कृत रूपांतरकार - पं. गुलाम दस्तगीर बिराजदार नाम का उनके धर्म से कोई वास्ता नहीं। वे नाम से नहीं, काम से पंडित हैं। संस्कृत उनका प्रेम है, आदत है, जुनून है और शायद उनकी जिंदगी भी। वे जैसे माहिर हैं हदीस, कुरान और इस्लामी तहजीब के, संस्कृत पुराणों और कर्मकांड के भी वैसे ही उद्भट् विद्वान हैं।
पं. गुलाम दस्तगीर बिराजदार हिंदू कर्मकांडों का ज्ञान भी हिंदू धर्मशास्त्रों के ज्ञान से कम नहीं रखते। लिहाजा, उन्हें शादी-विवाह, जैसे शुभ संस्कार और अंत्यक्रिया कराने के आग्रह भी मिलते रहते हैं, पर यह उन्हें मंजूर नहीं। वजह? 'क्योंकि ये शुद्ध धार्मिक संस्कार हैं', अपने घर के पास सूफी संत सैयद अहमद बदवी की सैकड़ों साल पुरानी दरगाह के मुतवल्ली (प्रमुख) ने हमें समझाया।
80 वर्षीय पं. गुलाम दस्तगीर आज भी बचपन के वे दिन भूले नहीं हैं, जब सोलापुर के अपने गांव में खेतिहर मजदूर के रूप में दिन भर खेतों में खटने के बाद वे रात्रिशाला में पढ़ने जाते समय पास की संस्कृत शाला के बाहर बैठे घंटों संस्कृत के मंत्र व श्लोक सुनने में बिता देते। उनकी लगन देखकर शाला के ब्राह्मण शिक्षक ने आखिरकार उन्हें कक्षा में बैठने की अनुमति दी। फिर जो हुआ वह अब इतिहास है।
उनकी संस्कृत सेवाओं का ही पुण्यप्रताप था, जो वर्षों महाराष्ट्र राज्य संस्कृत संगठन का मानद राजदूत रखने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने देवभाषा की देख-रेख करने वाली अपनी संस्कृत स्थायी समिति का सदस्य बनाया और काशी के विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान ने अपना महासचिव। आज भी काशी उनका दूसरे घर जैसा है। काशी नरेश जब भी मुंबई में होते हैं, उनके घर जरूर आया करते हैं।
पंडितजी खुद को संस्कृत के मामूली प्रचारक से ज्यादा नहीं मानते और मराठा मंदिर स्कूल के संस्कृत विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद देश भर घूम-घूमकर सभा-सेमिनारों को संबोधित कर संस्कृत और सर्वधर्म समभाव का प्रचार किया करते हैं। उनकी संस्कृत विरासत अभी कायम है। उनके नवासे दानिश ने देवभाषा में संभाषण की कला सीखी है और बेटी गयासुन्निसा ने संस्कृत में 'शास्त्री' कर इस्लाम और हिंदू धर्मों में तुलनात्मक शोधकार्य किया।
संस्कृत को लेकर मौजूदा विवाद से खिन्न पंडितजी कहते है, 'संस्कृत बहुत ही सरल और ज्ञान की भाषा है। संस्कृत को सीखने के लिए जरूरत है सिर्फ इच्छा एवं उत्कंठा की। सरकार को उसे प्रश्रय देना चाहिए। नहीं तो यह हमारा काम है कि हम उसे उसके लिए मजबूर कर दें।'
पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार कहते हैं, 'वेदों और कुरान का एक ही जैसा संदेश है - मानवता का कल्याण। केवल उसे हासिल करने के तरीके अलग-अलग हैं।'
- BBC.com

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

बिरजू महाराज को बिडला कलाशिखर सम्मान

मुम्बई.विश्वप्रसिद्ध कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज को संगीत कला केंद्र की तरफ से कल आदित्य विक्रम बिडला कलाशिखर पुरस्कार से सम्मानित किया जायेगा। आज यहां जारी आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार महाराष्ट्र के राज्यपाल विद्यासागर राव कल यहां नेंहरू केंद्र में उन्हें यह पुरस्कार प्रदान करेंगे। उनसे पहले सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर. पंडित भीमसेन जोशी. पंडित जसराज. गुरू केलूचरण महापात्र.पंडित रामनारायण.एम एफ हुसैन. हबीब तनवीर. गंगूबाई हंगल. गिरिजा देवी आदि यह पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।इसके तहत दो लाख रूपये का पुरस्कार दिया जाता है। - legendnews.in

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

वजूद को बचाने की नाकाम कोशिश: TTP-JA

सनक से उपजी हताशा जब अपनी उपस्‍थिति आमो-खास में दर्ज़ कराने पर आमादा होती है, तब वह किसी भी घातक तरीके का इस्‍तेमाल करती है ताकि वह लोगों की नजर में आ सके और इस तरह अपने मिटते वजूद को फिर से खबरों में लाया जा सके। मगर हताश व्‍यक्‍ति अपनी कमजोरी छुपाने और स्‍वयं को श्रेष्‍ठ बताने के लिए पागलपन की हद तक कोशिश करता है। कुछ ऐसा ही कर रहे हैं वो आतंकी संगठन जो भारत के चौतरफा बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव से घबरा गये हैं। संभवत: यही कारण है कि अब वह सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कर अपने वजूद को बचाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।
कुछ दिन पूर्व वाघा बॉर्डर पर हुए आत्‍मघाती बम ब्‍लास्‍ट के ठीक बाद माइक्रो ब्‍लॉगिंग साइट ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक धमकीभरा मैसेज उभरा जिसके अर्थ ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिये हैं। #नरेंद्र मोदी# हैशटैग के साथ साइट पर उभरे इस धमकी भरे मैसेज में प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा गया है- "u r the killer of hundreds of muslim," Tehreek-e-Taliban Pakistan Jamaat Ahrar(TTP-JA)spokesperson- 'Ehsanullah Ehsan'....इसके कुछ ही घंटे बाद एक और मैसेज उभरा जिसमें वाघा बॉर्डर पर किये गये विस्‍फोट की  जिम्‍मेदारी ले गई थी और यह भी एहसानउल्‍लाह एहसान के नाम से जारी किया गया था,यह कुछ इस तरह था- "We w(il) take the revenge of innocent people of Kashmir and Gujrat "(sic).
पाकिस्‍तान के नौर्थ-वेस्‍ट के संघर्षरत क्षेत्र से उभरे TTP-JA का यूं तो उदय तहरीके तालिबान से हुआ, जो पाकिस्‍तान के इन क्षेत्रों में शांति के लिए आतंकवादी गतिविधियों को विराम देने पर मूल तालिबानियों से अलहदा सोच रखता था। वह पाकिस्‍तानी सरकार के साथ बातचीत करके आपसी सहमति के आधार पर शांति का कॉमन एजेंडा तय करने की बात भी करता है, मगर भारत के बढ़ते अंतर्राष्‍ट्रीय प्रभाव से वह खासा बेचैन है और इस बेचैनी के चलते वह अपनी मूल प्रवृत्‍ति (दहशतगर्दी) को ही हथियार बना रहा है।
दहशतगर्दी से जुड़ी इधर कुछ घटनाएं भारत में भी हुईं जिनमें मुज़फ़्फरनगर के दंगाप्रभावित क्षेत्र से युवकों का बड़ी संख्‍या में गुम हो जाना, मोदी की पटना सभा व गया में ब्‍लास्‍ट होना। ऐसी घटनाओं की कड़ी अब बर्द्धमान से जुड़ रही हैं जिनके तहत अलकायदा के रीजनल चीफ के भारतीय होने जैसी खबरें आई हैं, तब ऐसे में TTP-JA का उक्‍त संदेश ट्विटर पर दिया जाना यह बताता है कि उनके असली मकसद कुछ और है ।
पाकिस्‍तान में बताये गये TTP-JA के कथित शांति वाले मुखौटे के पीछे उनका मकसद आईएस की भांति खबरों में रहने के लिए दहशत फैलाना ही है। ज़ाहिर है कि दहशत फैलाने वाले संगठन अब हताशा से घिरे हुए हैं।  यदि वो हताश न होते तो कश्‍मीर की कथित आजादी के लिए तब घड़ियाली आंसू न बहाते जब वहां बाढ़ की विभीषिका से लोग जूझ रहे थे। उन्‍हें कश्‍मीर की चिंता होती तो वे अपना राहत कार्य चलाते, बाढ़ में सब-कुछ बहा चुके परिवारों के आंसू पोंछते। ट्विटर पर आये ये संदेश बताते हैं कि राहत कार्य से जी चुराना व कश्‍मीर के विकास की बात को सिरे से नकार कर उनके नापाक इरादे नाकाम हुए और इसी नाकामी से उभरी है ये ट्विटरीय हताशा।
हकीकत तो यह है कि अल-कायदा हो या आईएस अथवा भारत में स्‍लीपर मॉड्यूल के रूप में पलने वाले आतंकवादी, सबके सब अब यह बाखूबी जान गये हैं कि मौजूदा भारतीय कूटनीति उनके वजूद को हमेशा हमेशा के लिए मिटा सकती है, और इसी हताशा में वे अब हर वो माध्‍यम इस्‍तेमाल कर रहे हैं जिससे ये जाहिर भी ना हो कि वे भयभीत हो रहे हैं और उनकी उपस्‍थिति का अंदाजा भी होता रहे। उनके इन्‍हीं माध्‍यमों में स्‍लीपर मॉड्यूल के साथ साथ अब महिलाओं और बच्‍चों को भी इस्‍तेमाल किया जा रहा है।
आतंकी संगठनों में ये हताशा आने की वजह एक खबर और भी है। वो ये कि अभी दो दिन पहले ही खबर आई कि पीओके (पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर) के वाशिंदे वापस भारत के साथ जुड़ने का मन बना रहे हैं।
शांति एवं सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए काम करने वाला मुस्लिम संगठन अंजुमन मिन्हाज ए रसूल के अध्यक्ष मौलाना सैयद अतहर देहलवी के अनुसार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अगर जनमत संग्रह होता है तो 99 फीसदी से ज्यादा लोग भारत का हिस्सा बनने के लिए वोट देंगे। जम्मू-कश्मीर के बाढ़ प्रभावित इलाकों के पांच दिवसीय दौरे के बाद स्‍थानीय लोगों की मंशा बताते हुए देहलवी ने कहा कि कश्मीर में अलगाववादियों का आधार खत्म हो गया है और घाटी के लोग सुशासन, विकास और शिक्षा जैसे मुद्दों पर बात कर रहे हैं, उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि मुट्ठी भर लोग क्या कहते हैं। बाढ़ प्रभावित लोगों ने सेना द्वारा चलाए गए राहत एवं बचाव कार्यों की प्रशंसा व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी जम्मू-कश्मीर एवं देश में ‘लोक समर्थक’ नीतियों की प्रशंसा से आतंकी संगठन घबरा गये हैं।
गौरतलब है कि अंजुमन-ए-रसूल ही एकमात्र इस्लामी संगठन है जिसने अलकायदा एवं अन्य आतंकवादी समूहों के खिलाफ आवाज उठाई और जब कश्मीरी पंडितों को जबरन कश्मीर से बाहर किया गया तो जेद्दा में ओआईसी में आपत्ति जताई थी।
बहरहाल, जम्‍मू कश्‍मीर की राजनैतिक परिस्‍थितियां क्‍या रहती हैं...वहां बाढ़ के बाद के हालात क्‍या घाटी को फिर से वो रौनक वापस दे पायेंगे या नहीं, ये तो समय ही बतायेगा मगर इतना अवश्‍य है कि भारतीय प्रशासनिक सुदृढ़ता और नरेंद्र मोदी की राजनैतिक व सांगठनिक कुशलता ने भारत के विरुद्ध सोचने वालों व आतंकवादियों
के हौसले इस हद तक पस्‍त कर दिये हैं कि अब उन्‍हें अपने बचाव का कोई रास्‍ता नज़र नहीं आ रहा। जिस कश्‍मीर पर उनकी सारी योजनायें टिकी होती थीं, अब उस कश्‍मीर सहित पीओके में भी दहशत के पांव उखड़ना और अब ये ट्विटर पर धमकी देना उनकी मनोदशा को बताता है कि उनकी सनक ने न केवल वाघा बॉर्डर पर इतने लोगों की जान ले ली बल्‍कि उनके जो भी आका या समर्थक हैं उन्‍हें भी आइना दिखाया है।
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 10 नवंबर 2014

समर्पण



जो सब समर्पण करता है वह सब पा लेता है। जो कतार में सबसे पीछे खड़ा हो जाता है अपने अहं और दोषों को त्‍याग कर  वह कतार में सबसे आगे जगह पा लेता है क्‍योंकि वह अहं के भारी बोझ से दबा नहीं होता। ऐसा व्‍यक्‍ति अपनी बारी आने का  इंतजार सब्र के साथ करता है। यह भी कहा जा सकता है कि जब अहं से रीत जाता है दिमाग तो उसमें सब्र खुदबखुद बैठता  चला जाता है। और जब सब्र आता है तब गुस्‍सा आ ही नहीं सकता। ये एक चेन है...एक सीरीज है...जो अपनी पहली कड़ी से  यात्रा शुरू करती है और एक एक कर उसमें सभ्‍यता की ऊंचाई पर पहुंचाने वाली कई कड़ियां जुड़ती जाती हैं और अंतिम कड़ी  तक पहुंचने की यात्रा के इस क्रम में जो कमजोरियों को जकड़े रहता है, वह ही असभ्‍य समाज की नींव रखता है वह कारण  बन जाता है अनेक आक्रमणों का, अनैतिकताओं का व अनाचारों का।
अहं से रहित समर्पण, प्रेम के वृक्ष की न सिर्फ नींव रखता है बल्‍कि उसको ईश्‍वर की ऊंचाई तक पहुंचाने की शक्‍ति भी रखता  है ठीक जैसे राधा पहुंचीं श्रीकृष्‍ण तक । यूं तो संस्‍थागत दृष्‍टि से समर्पण का पहला अधिकार रुक्‍मणि का था और इसी अधिकार  से जन्‍मे कर्तव्‍य के कारण उनके समर्पण को नि:स्‍वार्थ समर्पण कहने से बचा गया जबकि राधा के समर्पण को भक्‍ति व प्रेम  का आधार माना गया है क्‍योंकि वहां समर्पण के बाद श्रीकृष्‍ण से कुछ वापस पाने का भाव नहीं था, बस समर्पण से प्रेम को  करते चले जाना था। इसीलिए रुक्मणि और राधा में ऐतिहासिक दृष्‍टि से भले ही अंतर देखा गया मगर प्रेम और समर्पण में  अपनी भावनाओं को 'ईश्‍वर बनाने तक ले जाना' इसे तो सिर्फ और सिर्फ राधा ही सार्थक कर पाईं। इसीलिए श्रीकृष्‍ण के संग रुक्‍मिणि की अनुपस्‍थिति और राधा की अतिशय उपस्‍थिति समर्पण का सर्वोच्‍च उदाहरण बन गई । कृष्‍ण के आगे राधा का नाम आगे रखा जाना इसी समर्पण का हिस्‍सा है। ओशो कहते भी हैं कि कृष्‍ण चूंकि पूर्णपुरुष माने गये  हैं इसलिए उनके साथ आना किसी पूर्ण स्‍त्री के ही वश की बात हो सकती है। रुक्‍मिणि दावेदार थीं कृष्‍ण नाम के संग अपना  नाम जोड़ने की। मगर वो दावेदार थीं...अर्थात् दावा करने का अर्थ ही ये रह गया कि कहीं कुछ बाकी रह गया है जिसे पाने के  लिए उन्‍हें संस्‍थागत रिवाजों का सहारा लेना पड़ रहा है, ऐसे में वह मेंटीनेंस भी मांग सकती है जबकि राधा को किसी रिवाज में  बांधा नहीं जा सकता। उन्‍हें इसकी आवश्‍यकता नहीं है।
निश्‍चित ही ईश्‍वर के अंशमात्र में भी रमने के लिए किसी अदालती दावे, किसी समाज या किसी संस्‍थागत बंधन में रहने की  आवश्‍यकता ही नहीं होती, ईश्‍वर तो हवा की तरह घुलता जाता है मन में। मन में घुलने के लिए बिल्‍कुल पानी का सा रंग  लेना पड़ता है तभी समर्पण शतप्रतिशत होता है, जैसे राधा का था कृष्‍ण के लिए। इसीलिए रुक्‍मिणी पीछे छूटती चली गई और  राधा आगे आती गईं। इतना आगे कि कृष्‍ण नाम के आगे राधा खड़ी हो गईं जबकि वे संस्‍थागत संबंधों की कतार में सबसे  पीछे खड़ी थीं। सबसे पीछे खड़े होने का अर्थ है कि सब कुछ छोड़ो, सबकुछ दे दो और हल्‍के हो जाओ। हल्‍के हो जाओ इतने  कि अपने ईश में रमने के लिए किसी कोशिश की जरूरत ही ना पड़े। 
- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

खुशवंत सिंह स्मृति पुरस्कार के लिए 5 नाम

कसौली में आयोजित वार्षिक खुशवंत सिंह साहित्य समारोह के दौरान खुशवंत सिंह  स्मृति पुरस्कार के लिए 5 कवियों को चुना गया है। अंतिम विजेता को 21 से 25 जनवरी 2015  को होने वाले ज़ी जयपुर साहित्य समारोह में पुरस्कृत किया जाएगा। 5 चयनित किताबों में श्रीदल स्वामी की ‘एस्केप आर्टिस्ट’, रंजीत होस्कोटे की ‘सेंट्रल टाइम’, अरुंधति  सुब्रमण्यम की ‘वेन गॉड इज एक ट्रैवलर’, केकी एन दारूवाला की ‘फायर अल्टर’ और संपूर्णा चटर्जी  द्वारा अनुवादित जॉय गोस्वामी की ‘सलेक्टेड पोयम्स’ हैं।
2 लाख रुपए की राशि वाले इस पुरस्कार की स्थापना इस साल सुहेल सेठ ने दिवंगत सरदार  खुशवंत सिंह की स्मृति में की थी और यह उन भारतीय कवियों के लिए है, जो अंग्रेजी में लिखते हैं  या विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचना करने वाले वे कवि जिनकी रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद  हुआ है।
सेठ ने कसौली साहित्य समारोह में प्रतिष्ठित निर्णायक मंडल के निर्णय के आधार पर चयनित इन  कवियों के नामों की घोषणा की। निर्णायक मंडल में अशोक वाजपेयी, जीत ताईल, नमिता गोखले,  पवन के. वर्मा और सोली सोराबजी शामिल थे।
-एजेंसी

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

अभी तो कहानी शुरू हुई है... मंगलयान...कॉनफोकल माइक्रोस्‍कोप...के आगे क्‍या

मंगलयान की सफलता से उत्‍साहित हमारे देश के वैज्ञानिकों  ने जैसे हर वो रिाकॉर्ड तोड़ने की ठान ली है जिसे विदेशी वैज्ञानिक हाई-फाई माहौल में अंजाम देते हैं। करोड़ों से लेकर अरबों रुपये तक खर्च कर दिये जाते हैं, नोबेल पुरस्‍कार तक से सम्‍मानित किया जाता है,  तब जाकर यह निष्‍कर्ष निकलता है कि याददाश्‍त को चुनौती देने वाली बीमारी अल्‍ज़ाइमर के इलाज के लिए दिमाग के सूचनातंत्र को लेकर कुछ अभिनव संकेत मिले हैं जिन्‍हें 30 साल की खोज के बाद दिमाग में मौजूद 'जीपीएस ' की खोज बताया जा रहा है । निश्‍चित ही यह खोज अपने अंजाम को हासिल करने के लिए तमाम कोणों और तमाम उच्‍चस्‍तरीय शोधों के रास्‍ते तय करेगी , मगर इससे हटकर हमारे देशी वैज्ञानिकों ने जो कर दिखाया है , वह अपने आप में अनूठा 'हासिल' है।
पब्‍लिक प्राइवेट पार्टनरशिप प्रोग्राम के तहत उच्‍च प्रौद्योगिकी वाली सीएसआईआर ( वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद) के वैज्ञानिकों ने सेंट्रल ग्‍लास एंड सेरेमिक रिसर्च इंस्‍टीट्यूट कोलकाता व तिरूवनंतपुरम की  विनिश कंपनी के संयुक्‍त सहयोग से 3-डी इमेजिंग टैक्‍नोलॉजी से लैस एक 'ब्रॉड स्‍पेक्‍ट्रम कॉनफोकल माइक्रोस्‍कोप' को बनाकर लाइफ साइंस के क्षेत्र में एक नहीं कई कई मील के पत्‍थर स्‍थापित किये हैं।
पहला - जो प्रयोग साढ़े चार करोड़ में अस्‍तित्‍व में आ पाता वह मात्र डेढ़ करोड़ में हमारे वैज्ञानिकों ने सामने ला दिया।
दूसरा- इसे खालिस देशी उपकरणों के माध्‍यम से बनाया गया।
तीसरा- इसकी 3-डी तकनीक अस्‍पतालों, डायगनोस्‍टिक सेंटरों और शोध प्रयोगशालाओं में आसानी से प्रयुक्‍त हो सकेगी, इसके लिए ट्रेनिंग सेशन्‍स भी चलाये जायेंगे ताकि अप्रशिक्षण कहीं भी इसके प्रयोग में बाधा ना बने।
चौथा - अभीतक 2 डायमेंशनल इमेज ही ली जा  सकती थी, परंतु अब इसकी मदद से 3- डी इमेजिंग की जा सकती है।
जी हां, यह आमजन के लिए जानना जरूरी है कि नैनो तत्‍वों, कणों, जैव पदार्थों की स्‍टडी के लिए प्रयोग किया जाने वाला यह 'ब्रॉड स्‍पेक्‍ट्रम कॉनफोकल माइक्रोस्‍कोप' एक नैनोमीटर तक के पदार्थ को  देख सकता है। चूंकि एक नैनोमीटर , एक मीटर का एक अरबवां हिस्‍सा होता है तो अंदाजा लगाना मुश्‍किल नहीं कि शरीर में होने वाली बीमारियों के सूक्ष्‍म से अतिसूक्ष्‍म तक अध्‍ययन और उसके इलाज के लिए परफेक्‍शन को पाना कितना आसान हो जाएगा।
अब वैज्ञानिकों को इस ब्रॉड स्‍पेक्‍ट्रम कॉनफोकल माइक्रोस्‍कोप के ज़रिये तत्‍वों की स्‍पेक्‍ट्रोस्‍कोपिक बिहेवियर को समझने में आसानी होगी। इसका सुपर कांटीनम लाइट वाला नेचर कॉनफोकल माइक्रोस्‍कोपी के लिए बेहद मुफीद होगा वहीं अपनी तेज व चमकदार तरंगों के माध्‍यम से फ्लोरेसेंस इमेजिंग तैयार करने की विशेषता भी इसमें होगी।
सीजीसीआरआई के डायरेक्‍टर कमल दासगुप्‍ता के अनुसार कॉनफोकल माइक्रोस्‍कोप जिस सुपर कांटीनम लाइट के सोर्स से इमेजिंग करता है , उसको विश्‍व में कुछ ही मैन्‍यूफैक्‍चरर्स द्वारा प्रयोग में  लाया जाता है इसीलिए कॉनफोकल माइक्रोस्‍कोप बनाने वाले भी कम ही हैं।
यही वजह है कि यह काफी महंगा है।
इसके महंगे होने की वजह लेजर -रे टेक्‍नीक भी है । इस माइक्रोस्‍कोप में  किसी भी ऑब्‍जेक्‍ट पर फोकस करने के लिए लेजर टेक्‍नॉलॉजी का प्रयोग किया जाता है , क्‍योंकि इसमें पिनहोल से निकलने वाली लेजर-रे की वजह से ही लाइट सीधी सीधी ऑब्‍जेक्‍ट पर पड़ती हैं, वह भी बिना छितरे हुए।
इससे पहले यह माइक्रोस्‍कोप हमारे देश में मौजूद  थे मगर ये बेहद महंगे और देश के बड़े नामी गिरामी और गिने चुने अस्‍पतालों में ही इनसे इलाज में सहयोग लिया जा रहा था। इसके अलावा ये विदेश से ही खरीदे जा सकते थे, वह भी 2 डायमेंशनल टेक्‍नीक वाले , परंतु अब 3-डी इमेजिंग सुविधा होने और बेहद कम कीमत होने इसका व्‍यापक प्रयोग हो सकेगा।
अभी तक जानलेवा बीमारियों का पता लगने में होने वाली 'देरी' भी उनके लाइलाज हो जाने के पीछे एक मुख्‍य कारण हुआ करती थी परंतु अब इस माइक्रोस्‍कोप के ज़रिये इससे आसानी से पार पाया जा सकता है।  बीमारी की मौजूदगी, उसकी विकरालता और इलाज के लिए जरूरी कंडीशन्‍स तक सब कुछ का  बारीकी से अध्‍ययन करना इस माइक्रोस्‍कोप से आसान हो जायेगा।
यूं तो फिलहाल यह तिरूवनंतपुरम की एक कंपनी विनिश  टैक्‍नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा व्‍यवसायिक तौर पर बनाया जायेगा परंतु कंपनी ने इसके इस्‍तेमाल के लिए बेहतर प्रशिक्षण देने और इसे उचित मूल्‍य पर अस्‍पतालों , शोध प्रयोगशालाओं और डायगनोस्‍टिक सेंटर्स को मुहैया कराने पर प्रतिबद्धता जताई है , परंतु इस उत्‍साही योजना के लिए असली ज़मीन तो ''इसरो'' के मंगलयान की सफलता से रखी जा चुकी है । कम से कम लागत में सर्वोत्‍कृष्‍ट कर दिखाने का जज्‍़बा तो  हमारे वैज्ञानिकों ने अभी शुरू किया है...अभी तो बहुत आगे आगे जाना है । निश्‍चित ही ये संकेत, देश को विश्‍व का सिरमौर बनाने के ही तो हैं।
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

रूह तक जाने वाली आवाज को श्रद्धांजलि

रूह तक उतर जाये, ऐसा संगीत और एक सदी बाद भी कोई उतना ही शिद्दत से याद किया जाये तो मन बेहद भर-भर आता है। केंद्र सरकार ने आज संगीत की एक स्‍तंभ और महान गायिका मल्लिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख्त़र की याद में दो स्मारक सिक्के जारी किए। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्रीपद नाइक ने बेगम अख्त़र की जन्मशती के मौके पर राष्ट्रीय संग्रहालय सभागार, जनपथ से 100 रुपए और 5 रुपए के स्‍मारक सिक्‍के जारी करने के साथ ही बेगम अख्‍़तर का जन्‍मसदी समारोह शुरू हो गया।
इस मौके पर दादरा गायि‍का डॉ. रीता गांगुली और ठुमरी गायक श्री शशांक शेखर तथा गज़ल गायि‍का श्रीमती प्रभाती मुखर्जी ने प्रभावशाली कार्यक्रम पेश कि‍ए।
कभी बहज़ाद लखनवी की ग़ज़ल
''दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे...
वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे...
ऐ देखने वालों, मुझे हंस हंस के न देखो...
तुमको भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे..." से गायिकी का सफर शुरू करने वाली मात्र 11 साल की बच्‍ची अख्‍तर बाई फैजाबादी को हम बेगम अख्‍तर नाम से जानते हैं।
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में 07 अक्टूबर 1914 में जन्‍मी अख्‍़तरी गज़ल, दादरा और ठुमरी गायि‍का थीं। उन्‍हें गायि‍का के रूप में संगीत नाटक अकादमी पुरस्‍कार प्रदान कि‍ए गए और मरणोपरांत भारत सरकार ने उन्‍हें पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्‍मानि‍त कि‍या। उन्‍हें मल्‍लि‍का-ए-गज़ल का खि‍ताब भी प्रदान कि‍या गया।
बेगम अख्‍़तर को इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्‍या होगी कि नई पीढ़ी को उनकी विरासत से परिचित कराये जाने का प्रयास किया जा रहा है।
इस प्रति‍भाशाली गायि‍का के 100 वर्ष की होने पर भारत सरकार ने इस मौके को यादगार बनाने का फैसला कि‍या। इस उद्देश्‍य से एक राष्‍ट्रीय समि‍ति‍ गठि‍त की गई है जि‍सके अध्‍यक्ष केन्‍द्रीय संस्‍कृति‍ मंत्री हैं। यह समि‍ति‍ वर्ष भर मनाए जाने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करेगी।
बेगम अख्‍तर के सम्‍मान में दि‍ल्‍ली, लखनऊ, हैदराबाद, भोपाल और कोलकाता में कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाएंगे। उनकी कृति‍यों के वेब-पोर्टल, डीज़ि‍टाइज़ेशन/ डॉक्‍यूमेंटेशन इत्‍यादि‍ तैयार कि‍ए जाएंगे और प्रदर्शनि‍यां, प्रकाशन, वि‍चार गोष्‍ठि‍यों का आयोजन कि‍या जाएगा तथा युवा कलाकारों को छात्रवृत्‍त‍ियां‍ दी जाएंगी।
अक्टूबर में जन्‍मी बेगम साहिबा 1974 में अक्तूबर के ही आखिरी दिन इस दुनिया को अलविदा कह गई।अजब इत्‍तिफाक था कि अपनी मौत से सात दिन पहले बेगम अख्तर ने कैफी  आज़मी की गजल...
''सुना करो मेरी जान उनसे उनके अफसाने, सब अजनबी है यहां कौन किसको पहचाने।''  गाकर मानो यह बता दिया था कि अब बस चंद सांसें ही और हैं इस सफर में बाकी....
बहरहाल परदे के पीछे चले गये गजल गायिकी के इस दौर में जब रीमिक्‍स और रैप-पॉप का माहौल गर्म है तब बेगम अख्‍़तर को दी जाने वाली श्रद्धांजलि सचमुच नई पीढ़ी को उसकी रूह तक जाने वाले सुरों से अवगत कराने की कोशिश तो है ही।
- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

संघ प्रमुख का दूरदर्शन पर आना


हमारे नीति वाक्‍यों में कहा गया है कि आलोचना के लिए ज्ञान होना अत्‍यधिक  आवश्‍यक है और निंदा के लिए सिर्फ शब्दकोश ही काफी होता है। आलोचना करने  वालों के पास समाधान का सर्वथा अभाव ही होता है इसीलिए आलोचना किसी की  भी की जा सकती है मगर समाधान करना हर किसी के बस की बात नहीं।
हमेशा की तरह कल भी विजयदशमी पर आरएसएस का 89वां स्थापना दिवस  मनाया गया। इस अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का दूरदर्शन पर एक घंटे तक भाषण दिखाया गया। इसके बाद से विरोधी पार्टियों द्वारा सरकारी प्रसारक माध्‍यम का दुरुपयोग किये जाने संबंधी धड़ाधड़ बयान आने लगे और लगभग सभी प्राइवेट चैनलों के प्राइम टाइम में पैनलिस्‍ट बहस करते रहे कि सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए।
उनका विरोध करना बनता भी है क्‍योंकि पहली बार रटी-रटाई तर्ज़ से परे राष्‍ट्रीय  चेतना और मुद्दों की बात की गई। राजनीति से परे पहली बार सामाजिक व  राष्‍ट्रीय मुद्दों पर दूरदर्शन से कुछ बोला गया, यह अनपेक्षित था। हजम करना  आसान भी नहीं होगा, लीक पर चलने वालों को।
यूं तो भारतीय जनता पार्टी के सत्‍ता में आने के बाद से ही राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक  संघ का विरोधियों के निशाने पर आ जाना लाजिमी था परंतु हर बात का विरोध  सिर्फ इसलिए किया जाये कि विरोध करना जरूरी है, तो यह ठीक नहीं होगा।
हां, भागवत का विरोध किया जा सकता है कि वो राष्‍ट्रीय प्रसारण के माध्‍यम  दूरदर्शन पर एक घंटे तक दिखाये गये, मगर गौवध और मांस के निर्यात पर पूर्ण  प्रतिबंध, चीन के उत्पाद खरीदना बंद करने की अपील या केरल और तमिलनाडु में  जिहादी गतिविधियां बढ़ने की बात पर हमें देशहित में उनसे सहमत होना चाहिए।  मोहन भागवत की इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पश्चिम बंगाल,  असम और बिहार में बांग्लादेश से अवैध रुप से आने वाले लोगों के कारण हिन्दू  समाज का जीवन प्रभावित हो रहा है।
दरअसल अभी तक हम समाजवादी सोच को ही प्रगति के लिए आदर्श मानते रहे  मगर ये भूल गये कि ये समाजवाद दरअसल स्‍वयं में ही अधूरी व्‍याख्‍या के साथ  खड़ा है जिसमें परिवार की बात तो की जाती है मगर उसमें अनुशासन गायब हो  चुका है। जहां कोई नियामक नहीं है, कोई मुखिया नहीं है, ऐसी समाजवादी सोच  'सबको सब-कुछ देने' का कोई प्रॉपर रोडमैप नहीं दिखा पाई नतीजा ये हुआ कि  समाज भी नहीं बंधा और राजनैतिक अनुशासन भी छिन्‍न भिन्‍न हो गया।
राष्‍ट्र की बात करने वाले को हम अपने-अपने चश्‍मे से देखने के इतने आदी हो  चुके हैं कि अच्‍छी बात को भी संशय के साथ देखा जाता है।
देश के हर नागरिक को अपनी स्‍वतंत्र सोच रखने का अधिकार है मगर इस स्‍वतंत्र  सोच ने अब तक देश की सामाजिक व सांस्‍कृतिक ढांचे को किस स्‍तर तक ध्‍वस्‍त  कर दिया है, यह भी तो सोचा जाना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत मजबूत बनकर उभर रहा है। दुनिया को भारत की  जरूरत है। लोगों के दिलों में उम्मीद की नई किरण जगी है। ऐसे में हमें छोटी  छोटी बातों को छोड़ वृहद सोच व लक्ष्‍य रखने चाहिए। कोई दूरदर्शन पर बोले या  कतई मुंह सीं कर बैठा रहे, बात तो सोच और लक्ष्‍य की है। यदि बोलने वाले का  लक्ष्‍य देशहित है तो उसकी आलोचना में कोई दम नहीं रह जाता।
जो भी हो... जिस दूरदर्शन से आम और यहां तक कि खासजन भी दूर हो चुके थे,  उस दूरदर्शन पर संघ प्रमुख के भाषण को लेकर की जा रही तीखी प्रतिक्रिया ने  एक बात तो साबित कर ही दी कि मोदी की करिश्‍माई कार्यप्रणाली से दूरदर्शन भी  अछूता नहीं रहा और इसीलिए दूरदर्शन का प्रसारण भी अब पैनल डिस्‍कशन का  विषय बन गया है।
संघ प्रमुख के भाषण पर लकीर पीटने वाले शायद इस बात से भी परेशान होंगे कि  मोदी अपने एक और मकसद में सफल हो गये।

- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 24 सितंबर 2014

देश तुम्‍हारा कृतज्ञ है...इसरो

आज का दिन देश के लिए एक कालजयी उपलब्‍धि का साक्षी बना है.
जी हां! आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्‍थान (इसरो) की तपस्‍या सफल हुई है और उपग्रह मंगलयान मंगल ग्रह की अंडाकार कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुका है।
अंतरिक्ष शोध में यह एक ऐसा मील का पत्‍थर होगा जिसके आगे की यात्रा न जाने कितनी आशाओं को जन्‍म देगी।
आज की सुबह इस अभियान की कामयाबी से यह तो निश्‍चित हो गया कि 'थोड़ा है... थोड़े की जरूरत है' पर अमल करने वाले हम भारतीय यदि पूरे मन से जुटें तो ऐसी कोई शै नहीं, ऐसी कोई ताकत नहीं... या ऐसी कोई वजह नहीं जिससे हम पार ना पा सकें। पूरे विश्‍व की निगाहों में भारत ऐसा देश बन गया है जिसने एक ही प्रयास में अपना अभियान पूरा कर लिया।
यूं तो भारत के मंगल अभियान का निर्णायक चरण कल रात से यान की तीव्र गति को धीमा करने के साथ ही शुरू हो गया था और इस मिशन की सफलता उन 24 मिनटों पर निर्भर थी, जिस दौरान यान में मौजूद इंजन को चालू किया गया।  मंगलयान की गति धीमी करनी थी ताकि ये मंगल की कक्षा में मौजूद गुरूत्वाकर्षण से
खुद-ब-खुद खिंचा चला जाए और वहां स्थापित हो जाए।
तकनीकी तौर पर मंगलयान से धरती तक जानकारी पहुंचने में करीब साढ़े बारह मिनट का समय लगा. आज सुबह लगभग आठ बजे इसरो को मंगलयान से सिग्नल प्राप्त हुआ और ये सुनिश्चित हो पाया कि मंगलयान, मंगल की कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित हो गया है।
देश की इस अभूतपूर्व वैज्ञानिक सफलता के गवाह स्‍वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बने। उन्‍होंने न सिर्फ बैंगलोर के इसरो केंद्र में मौजूद रहकर वैज्ञानिकों की प्रशंसा की बल्‍कि अपने शुभकामना भाषण के तहत लगभग सुप्‍तावस्‍था में पहुंच चुकी देश की वैज्ञानिक अनुसंधान

प्रक्रियाओं को जाग्रत करने का आह्वान भी किया। इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए
मोदी ने कहा, "आज इतिहास बना है. हमने लगभग असंभव कर दिखाया है. मैं सभी भारतीयों और इसरो वैज्ञानिकों को मुबारक देता हूं. कम साधनों के बावजूद ये कामयाबी वैज्ञानिकों के पुरुषार्थ के कारण मिली है."
बधाइयों का तांता लगा हुआ है। टि्वटर पर इसरो के हैंडल से लिखा है- ''मैं अभी ब्रेकफास्‍ट करके लौटता हूं'' आशावाद और खुशी के इज़हार का इससे बढ़िया तरीका और भला क्‍या हो सकता है। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी टि्वटर के जरिये इसरो को बधाई दी है.
भारत ने इस मिशन पर करीब 450 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जो बाकी देशों के अभियानों की तुलना में सबसे ज्यादा क़िफ़ायती है. और तो और... एक हॉलीवुड फिल्‍म की लागत भी इससे कहीं ज्‍यादा आती है। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी तक कॉपी-बुक के आधार पर ठीक वैसा ही हुआ है जो वैज्ञानिकों ने सोचा था और आगे भी अगर सब ठीक रहा तो मंगलयान छह महीनों तक मंगल ग्रह के वातावरण का अध्ययन कर लेगा। ये ग्रह पर मौजूद मीथेन गैस का पता लगाएगा, साथ ही रहस्य बने हुए ब्रह्मांड के उस सवाल का भी पता लगाएगा कि क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं या और भी हैं हमारे जैसे? इससे मिली रिपोर्ट्स धरती पर ग्‍लोबल वार्मिंग, ऋतुचक्रों में हो रहे परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों के उत्‍सर्जन और ग्‍लेशियरों के पिघलने तथा आर्कटिक व अनटार्कटिक रीजन में भूमिगत हलचलों की वजहें जानने में सहायक होंगी। इनसे सावधान रहने और विचलनों के प्रति आगाह करने में भी मंगल का वातावरण हमारे लिए जरूरी होगा ताकि जिस हश्र को आज मंगल पहुंचा आगे हम ना पहुंच जाएं।
चलिए फिलहाल तो इंतज़ार है मंगल ग्रह की उस पहली तस्‍वीर का... जिसे आज ही कक्षा में स्थापित होने के कुछ ही घंटों बाद यान एक भारतीय आंख से लेकर भेजेगा।
सच कहते हैं मोदी कि अब भारत सपेरों का देश नहीं... अब वह माउस से खेलने लगा है, वह चांद ही नहीं, बल्‍कि मंगल पर भी पहुंच चुका है। संकेत साफ हैं कि जीवन की अनेक पद्धतियों के आविष्‍कारक रहे ऋषि-मुनियों से लेकर शून्‍य तक के आविष्‍कारक आर्यभट्ट का यह देश एक बार फिर सुप्‍तावस्‍था से उबर कर आकाश नापने चल पड़ा है। बहरहाल, इसी के साथ हमारा देश एशिया ही नहीं दुनिया का अकेला ऐसा देश बन गया है जिसने पहले ही प्रयास में अपना मंगल अभियान पूरा कर लिया।
यूं तो धार्मिक व सांस्‍कृतिक तौर से आज का दिन पूर्वजों-पितरों की विदाई का दिन है और शायद अंतरिक्ष-वैज्ञानिकों का यह उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का यह नितांत भारतीय तरीका है। यह सफल प्रयास कल से नवदुर्गा के आगमन और शक्‍ति के स्‍वागत के लिए एक अभूतपूर्व अर्पण भी है।
-अलकनंदा सिंह 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

सच है कि...कभी हिंदू राष्‍ट्र था चीन

वैसे तो संपूर्ण जम्बूद्वीप पर हिन्दू साम्राज्य स्थापित था। जम्बूद्वीप के 9 देश थे उसमें से 3 थे- हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष। उक्त तीनों देशों को मिलाकर आज इस स्‍थान को चीन कहा जाता है। चीन प्राचीनकाल में हिन्दू राष्ट्र था। 1934 में हुई एक खुदाई में चीन के समुद्र के किनारे बसे एक प्राचीन शहर च्वानजो 1000 वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन हिन्दू मंदिरों के लगभग एक दर्जन से अधिक खंडहर मिले हैं। यह क्षेत्र प्राचीन काल में हरिवर्ष कहलाता था, जैसे भारत को भारतवर्ष कहा जाता है।
वैसे वर्तमान में चीन में कोई हिन्दू मंदिर तो नहीं हैं, लेकिन एक हजार वर्ष पहले सुंग राजवंश के दौरान दक्षिण चीन के फूच्यान प्रांत में इस तरह के मंदिर थे लेकिन अब सिर्फ खंडहर बचे हैं।
भारतीय प्रदेश अरुणाचल के रास्ते लोग चीन जाते थे और वहीं से आते थे। दूसरा आसान रास्ता था बर्मा। हालांकि लेह, लद्दाख, सिक्किम से भी लोग चीन आया-जाया करते थे लेकिन तब तिब्बत को पार करना होता था। तिब्बत को प्राचीनकाल में त्रिविष्टप कहा जाता था। यह देवलोक और गंधर्वलोक का हिस्सा था।
मात्र 500 से 700 ईसापूर्व ही चीन को महाचीन एवं प्राग्यज्योतिष कहा जाता था लेकिन इसके पहले आर्य काल में यह संपूर्ण क्षेत्र हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष नाम से प्रसिद्ध था।
महाभारत के सभापर्व में भारतवर्ष के प्राग्यज्योतिष (पुर) प्रांत का उल्लेख मिलता है। हालांकि कुछ विद्वानों के अनुसार प्राग्यज्योतिष आजकल के असम (पूर्वात्तर के सभी 8 प्रांत) को कहा जाता था। इन प्रांतों के क्षेत्र में चीन का भी बहुत कुछ हिस्सा शामिल था।
रामायण बालकांड (30/6) में प्राग्यज्योतिष की स्थापना का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में इस प्रांत का दूसरा नाम कामरूप (किंपुरुष) मिलता है। स्पष्ट है कि रामायण काल से महाभारत कालपर्यंत असम से चीन के सिचुआन प्रांत तक के क्षेत्र प्राग्यज्योतिष ही रहा था। जिसे कामरूप कहा गया। कालांतर में इसका नाम बदल गया।
चीनी यात्री ह्वेनसांग और अलबरूनी के समय तक कभी कामरूप को चीन और वर्तमान चीन को महाचीन कहा जाता था। अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य ने भी 'चीन' शब्द का प्रयोग कामरूप के लिए ही किया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कामरूप या प्राग्यज्योतिष प्रांत प्राचीनकाल में असम से बर्मा, सिंगापुर, कम्बोडिया, चीन, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा तक फैला हुआ था अर्थात यह एक अलग ही क्षेत्र था जिसमें वर्तमान चीन का लगभग आधा क्षेत्र आता है।
इस विशाल प्रांत के प्रवास पर एक बार श्रीकृष्ण भी गए थे। यह उस समय की घटना है, जब उनकी अनुपस्थिति में शिशुपाल ने द्वारिका को जला डाला था। महाभारत के सभापर्व (68/15) में वे स्वयं कहते हैं- कि 'हमारे प्राग्यज्योतिष पुर के प्रवास के काल में हमारी बुआ के पुत्र शिशुपाल ने द्वारिका को जलाया था।'
चीनी यात्री ह्वेनसांग (629 ई.) के अनुसार इस कामरूप प्रांत में उसके काल से पूर्व कामरूप पर एक ही कुल-वंश के 1,000 राजाओं का लंबे काल तक शासन रहा है। यदि एक राजा को औसतन 25 वर्ष भी शासन के लिए दिया जाए तो 25,000 वर्ष तक एक ही कुल के शासकों ने कामरूप पर शासन किया। अंग्रेज इतिहासकारों ने कभी कामरूप क्षेत्र के 25,000 वर्षीय इतिहास को खोजने का कष्ट नहीं किया। करते भी नहीं, क्योंकि इससे आर्य धर्म या हिन्दुत्व की गरिमा स्थापित हो जानी थी।
कालांतर में महाचीन ही चीन हो गया और प्राग्यज्योतिषपुर कामरूप होकर रह गया। यह कामरूप भी अब कई देशों में विभक्त हो गया। कामरूप से लगा 'चीन' शब्द लुप्त हो गया और महाचीन में लगा 'महा' शब्द हट गया।
पुराणों के अनुसार शल्य इसी चीन से आया था जिसे कभी महाचीन कहा जाता था। माना जाता है कि मंगोल, तातार और चीनी लोग चंद्रवंशी हैं। इनमें से तातार के लोग अपने को अय का वंशज कहते हैं, यह अय पुरुरवा का पुत्र आयु था। (पुरुरवा प्राचीनकाल में चंद्रवंशियों का पूर्वज है जिसके कुल में ही कुरु और कुरु से कौरव हुए)। इस आयु के वंश में ही सम्राट यदु हुए थे और उनका पौत्र हय था। चीनी लोग इसी हय को हयु कहते हैं और अपना पूर्वज मानते हैं।
एक दूसरी मान्यता के अनुसार चीन वालों के पास 'यू' की उत्पत्ति इस प्रकार लिखी है कि एक तारे (तातार) का समागम यू की माता के साथ हो गया। इसी से यू हुआ। यह बुद्घ और इला के समागम जैसा ही किस्सा है। इस प्रकार तातारों का अय, चीनियों का यू और पौराणिकों का आयु एक ही व्यक्ति है। इन तीनों का आदिपुरुष चंद्रमा था और ये चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं।
 
संदर्भ : कर्नल टॉड की पुस्तक ‘राजस्थान का इतिहास’ और पं. रघुनंदन शर्मा की पुस्तक ‘वैदिक संपत्ति’ और 'हिन्दी-विश्वकोश' आदि से।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

शब्‍दों के द्वंद में शिक्षक दिवस !

'अबे सुन...' और 'सुनिए...' में कितना फर्क है ..क्‍या आप  बता सकते हैं ?
दोनों शब्‍दों को सुनकर बारी-बारी से जो पहली प्रतिक्रिया मस्‍तिष्‍क देता है...वह कितनी भिन्‍न होती है... क्‍या ये बता सकते हैं ?
जरूर बता सकते हैं, दोनों शब्‍द पुकारने के सिर्फ लहजे पर ही टिके हुए हैं, बस इतना ही ना । ठीक ऐसा ही फर्क है 'टीचर्स डे' और 'गुरू उत्‍सव' में...।
जी हां! पुकारने का लहजा...जिसमें टीचर्स कहने पर मन तरंगित नहीं होता, न ही श्रद्धा पैदा होती है परंतु यदि किसी को गुरू कहा जाये तो अनायास ही हम उस व्‍यक्‍ति के समक्ष श्रद्धावनत हो जाते हैं, वह व्‍यक्‍ति हमारे सामने हो तो हाथ उसके पांवों की ओर खुद-ब-खुद बढ़ जाते हैं जबकि टीचर्स कहने से मन में ऐसी किसी भावना का जन्‍म नहीं होता। यह सब संस्‍कारों का खेल है जो हमारे जीवन में तमाम विकृत उठापटकों के बावजूद अभी भी मन  के किसी कोने में चुपके से बहते हैं।
आज सुबह से मन बेचैन था उन बयानबाजियों को पढ़-सुनकर जो कि राजनैतिक ही नहीं बल्‍कि बौद्धिक स्‍तर पर भी मेरे सामने एक-एक करके 'ओढ़ी हुई प्रगति' के दृश्‍यों को नमूदार कर रही थीं, कि किस तरह से केंद्र सरकार द्वारा शिक्षक दिवस के उपलक्ष में स्‍कूली छात्रों को गुरू उत्‍सव संबंधी निबंध लिखने की बात करने पर कोहराम  मचाया जा रहा है ।
विपक्षी पार्टियों और कथित सेक्‍युलरवादियों द्वारा इतना हो हल्‍ला मचाया गया कि अंतत: मानव संसाधन मंत्री स्‍मृति ईरानी को कहना ही पड़ा कि मंत्रालय द्वारा सम्‍मानित करने के लिए कराई जा रही निबंध प्रतियोगिता पर इतनी आपत्‍ति जताने वालों की सोच सचमुच रहम के लायक है, और कुछ नहीं क्‍योंकि गुरू उत्‍सव एक निबंध प्रतियोगिता है और इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज़ सभी भाषाओं में आयोजित करवाया गया है। यह शिक्षकों के योगदान का उत्‍सव है ।
निश्‍चित ही इसका विरोध करने वाले नहीं चाहते कि नई पीढ़ी को दिशा दिखाने वाले शिक्षकों को सम्‍मानित किया जाये और इतना ही नहीं सम्‍मान देने वाले बच्‍चों में अपने शब्‍दों से उन्‍हें सम्‍मानित करने की होड़ लगे ।
इन कथित समाजवादियों की सोच का ही परिणाम है कि हमारी समृद्ध परंपराओं में से एक गुरू-शिष्‍य परंपरा को मात्र शिक्षक और विद्यार्थी के दायरे में समेट दिया गया है। जहां शिक्षा देने  वाला एक दुकानदार की भूमिका में आता गया और विद्यार्थी एक उपभोक्‍ता बनकर उनका शिकार बनता रहा।
नतीजा हम सबके सामने है कि ना विद्यार्थी शिक्षकों का सम्‍मान कर पाते हैं और ना ही शिक्षक उन्‍हें अपना ज्ञान दे पाते हैं, अव्‍वल तो चल चला कर सारी बात हताशा से उपजे एक जर्जर से बयान पर आकर  टिक जाती है कि ''क्‍या करें...हमारे जमाने में गुरू जी के सामने गर्दन नहीं उठा पाते थे, मगर अब देखो बच्‍चे उन्‍हें सम्‍मान ही नहीं देते फिर पैर छूना तो दूर...चाहे जहां, चाहे जैसे मिसबिहेव कर देते हैं...छात्रों और शिक्षकों में मारकुटाई तो इतना आम हो गया है कि पूछो मत...ज़रा सा कुछ कहो तो सौ सौ आफतें ...कभी छात्रों के हमले तो कभी अभिभावकों के जोर-जंग आदि आदि ।'' ये रोतलू-टाइप शिकायत हर उस व्‍यक्‍ति से सुनने को मिल जायेगी जो उम्र के चौथे या पांचवें दशक में चल रहा होगा, जिसने शिक्षा का उदारीकरण भी भलीभंति देखा होगा और उसके सामाजिक दुष्‍परिणाम भी ।
 हालांकि इस उदारीकरण में कौन उदार हुआ और कौन निष्‍ठुर, किसने कितना पाया और किसने कितना खोया या संस्‍कारों की बलि देकर हमने ग्‍लोबलाइजेशन की जो चकाचौंध हासिल की, वह कितनी अपनी है और कितनी पराई  ...आदि । यह बहस बहुत लंबी खिंचेगी इसलिए आज इस पर इतना ही। बात सिर्फ उस लहजे की है जो एक शब्‍द के उच्‍चारण मात्र से नई पीढ़ी की दशा व दिशा तय कर सकती है ।
शिक्षक दिवस को टीचर्स डे कहा जाये या इसे गुरू उत्‍सव  बताकर इस पर निबंध की प्रतियोगिता आयोजित की जाये, इसे स्‍कूलों में किस तरह मनाया जाये, या इसे प्रधानमंत्री संबोधित करें तो वे कैसे  करें...बच्‍चे प्रधानमंत्री के भाषण से कितने प्रभावित  होंगे ...आदि खोखली बातें इस बारे में सोचने पर विवश कर सकती है कि केंद्र सरकार भले ही भाजपा की हो या भले ही उस पर संघ की सोच का ठप्‍पा लगा हो मगर हम सब इस बात से तो सहमत ही होंगे कि बीते दशकों में ना केवल शिक्षा का स्‍तर गिरा है बल्‍कि संस्‍कारों की भी बलि चढ़ गई और ये बलि कुछ इस तरह चढ़ी कि गुरू को गुरू मानना तो बहुत दूर की बात, किसी शिक्षक पर किसी छात्र या छात्रा को भरोसा नहीं रह गया, कोई शिक्षक अब छात्र को अपने बच्‍चे की तरह देखने को तैयार नहीं। इस राजनीति से क्षति तो दोनों की हुई ना, इस टूटते भरोसे के बारे में सेक्‍युलरवादी क्‍या संघ या भाजपा को ही दोषी ठहरायेंगे ।
हद तो तब हो गई जब सुना कि अभिषेक मनु सिंघवी कह रहे हैं कि यह मासूम बच्‍चों के दिमाग  को प्रभावित करने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का सीधा उदाहरण है। तो सिंघवी से यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्‍या महिला वकील को जज बनवाने का लालच देकर उसके साथ अंतरंग होने में क्‍या सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग नहीं था । कम से कम सिंघवी जैसे लोग तो अपना मुंह ना ही खोलें तो अच्‍छा। नैतिकता या शुचिता की बातें उन्‍हीं के  मुंह से अच्‍छी लगती हैं जो स्‍वयं भी नैतिक दृष्‍टि रखता हो।
बहरहाल, किसी को सम्‍मान देकर यदि हम अपने बच्‍चों के लिए भरोसा कमा पायें तो इस शिक्षक दिवस पर यह बहुत बड़ी कमाई होगी।
अपने लिए ना सही अपनी पीढि़यों के लिए कुछ तो वृहद सोच अपनानी ही होगी और राजनीति व कथित बौद्धिक विवेचनाओं से अलग होकर बच्‍चों को शिक्षित ही नहीं संस्‍कारवान कैसे बनाया जाये, यह भी विचारना होगा ताकि वे स्‍वयं देश के बेहतर नागरिक बन सकें, तो क्‍यों ना हम अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिए अपनी सोच को भी थोड़ा संस्‍कारों की ओर ना मोड़ें । लीक से हटकर फिर से सोचें कि पिछले दशकों में जो गंवा चुके हैं, उसे वापस कैसे लाया जाये । बात सिर्फ लहजे की ही तो है...'अबे सुन...' की जगह 'सुनिए...' को अपनाकर तो देखिए ।   
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 1 सितंबर 2014

राधा बनते जाना है और ...बस !

राधाष्‍टमी पर 

ओशो द्वारा कृष्ण पर दिए गए प्रवचन को लेकर कभी अमृता प्रीतम ने लिखा था-
'' जिस तरह कृष्ण की बाँसुरी को भीतर से सुनना है, ठीक उसी तरह ‘भारत—एक सनातन यात्रा’ को पढ़ते-सुनते, इस यात्रा पर चल देना है। और कह सकती हूँ कि अगर कोई तलब कदमों में उतरेगी, और कदम इस राह पर चल देंगे, तब वक्त आएगा कि यह राह सहज होकर कदमों के साथ चलने लगेगी, और फिर ‘यात्रा’ शब्द अपने अर्थ को पा लेगा !''
यात्रा... ,  जी हां ।  एक  ऐसा  अनवरत  सिलसिला जिसे किसी ठांव  या  मकसद की  हमेशा  जरूरत  होती  है । जिसे हर हाल में मंज़िल की तलाश होती और मंज़िल को पाना ही लक्ष्‍य। यूं तो यात्रा का अर्थ बहुत गहरा है मगर जब यह यात्रा एक धारा बनकर बहती है तो अनायास ही वह अपने उद्गम की ओर आने को उत्‍सुक रहती है । यही उत्‍सुकता धारा को राधा बना देती है।

राधा कोई एक किसी ग्‍वाले कृष्‍ण की एक सुन्‍दर सी प्रेयसी का नाम नहीं, ना ही वो केवल वृषभान की दुलारी कन्‍या है बल्‍कि वह तो अनवरत हर कृष्‍ण अर्थात् ईश्‍वर के प्रत्‍येक अंश-अंश से मिलने को आतुर रहने वाली हर उस आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति के रूप में बहने वाली धारा का नाम है जो भौतिकता के नश्‍वरवाद से आध्‍यात्‍मिक चेतना की ओर बहती है, उसमें एकात्‍म हो जाने को... बस यहीं से शुरू होती है किसी के भी राधा हो जाने की यात्रा ।
इसी 'राधा होते जाने की प्रक्रिया' को ओशो अपने प्रवचनों में कुछ यूं सुनाते हैं—‘‘पुराने शास्त्रों में राधा का कोई जिक्र नहीं । वहां गोपियाँ  हैं, सखियाँ  हैं, कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और रास की लीला होती है। राधा का नाम पुराने शास्त्रों में नहीं है। बस इतना सा जिक्र है, कि सारी सखियों में कोई एक थीं, जो छाया की तरह साथ रहती थीं। यह तो महज सात सौ वर्ष पहले 'राधा' नाम प्रकट हुआ । उस नाम के गीत गाए जाने लगे, राधा और कृष्ण को व्‍यक्‍ति के रूप में प्रस्‍थापित  किया गया । इस नाम की खोज में बहुत बड़ा गणित छिपा है । राधा शब्द बनता है धारा शब्द को उलटा कर देने से।
‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम धारा है। और धारा शब्द को उलटा देने से राधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता बनती है।’’
ओशो जिस यात्रा की बात करते हैं—वह अपने अंतर में लौट जाने की बात करते हैं। एक यात्रा धारामय होने की होती है, और एक यात्रा राधामय होने की....।
यूं तो विद्वानों ने राधा शब्‍द और राधा के अस्‍तित्‍व तथा राधा की ब्रज व कृष्‍ण के जीवन में उपस्‍थिति को लेकर अपने नज़रिये से आध्‍यत्‍मिक विश्‍लेषण तो किया ही है, मगर लोकजीवन में आध्‍यत्‍म को सहजता से पिरो पाना काफी मुश्‍किल होता है ।
दर्शन यूं भी भक्‍ति जैसी तरलता और सरलता नहीं पा सकता इसीलिए राधा भले ही ईश्‍वर की आध्‍यात्‍मिक चेतना में धारा की भांति बहती हों मगर आज भी उनके भौतिक- लौकिक स्‍वरूप पर कोई बहस नहीं की जा सकती।
ज्ञान हमेशा से ही भक्‍ति से ऊपर का पायदान रहा है, इसीलिए जो सबसे पहला पायदान है भक्‍ति का, वह आमजन के बेहद करीब रहता है और राधा को आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति से ज्‍यादा कृष्‍ण की प्रेयसी मान और उनकी अंतरसखी मान उन्‍हें किसी भी एक सखी में प्रस्‍थापित कर उन्‍हें अपना सा जानता है। ये भी तो ईश्‍वर की ओर जाने की धारा ही है, बस रास्‍ता थोड़ा लौकिक है, सरल है...।
ब्रज में समाई हुई राधा ... कृष्ण के नाम से पहले लगाया हुआ मात्र एक नामभर नहीं हैं और ना ही राधा मात्र एक प्रेम स्तम्भ हैं जिनकी कल्‍पना किसी कदम्ब के नीचे कृष्ण के संग की जाती है। भक्‍ति के रास्‍ते ही सही राधा फिर भी कृष्‍ण के ही साथ जुड़ा हुआ एक आध्यात्मिक पृष्ठ है, जहाँ द्वैत अद्वैत का मिलन है। राधा एक सम्पूर्ण काल का उद्गम है जो कृष्ण रुपी समुद्र से मिलती है ।
समाज में प्रेम को स्‍थापित करने के लिए इसे ईश्‍वर से जोड़कर देखा गया और समाज को वैमनस्‍यता से प्रेम की ओर ले जाने का सहज उपाय समझा  गया इसीलिए श्रीकृष्ण के जीवन में राधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं। हो सकता है कि राधा का कृष्‍ण से  ये  संबंध शास्‍त्रों में ना हो मगर लोकजीवन में प्रेम को पिरोने का सहज उपाय बन गया। और इस तरह जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी।

राधा की लौकिक कथायें बताती हैं कि प्रेम कभी भी शरीर की अवधारणा में नहीं सिमट सकता ... प्रेम वह अनुभूति है जिसमें साथ का एहसास निरंतर होता है। न उम्र... न जाति... न ऊंच नीच ... प्रेम हर बन्धनों से परे एक आत्मशक्ति है , जहाँ सबकुछ हो सकता है ।
यदि हम कृष्ण और राधा को हर जगह आत्मिक रूप से उपस्थित पाते हैं तो आत्मिक प्यार की ऊंचाई और गहराई को समझना होगा। कृष्‍ण इसीलिए हमारे इतने करीब हैं कि उन्‍हें सिर्फ ईश्वर ही नहीं बना दिया, उन्‍हें लड्डूगोपाल के रूप में लाड़ भी लड़ाया है तो वहीं राधा के संग झूला भी झुलाया है और रास भी रचाया है।

जब कृष्‍ण जननायक हैं तो भला राधा हममें से ही एक क्‍यों न मान ली जायें...जो सारे आध्‍यात्‍मिक तर्कों से परे हों, फिर चाहे वो आत्‍मा की गंगोत्री से  धारा बनकर  वापस कृष्‍ण में समाने को राधा बनें और अपनी यात्रा का पड़ाव पा लें या फिर बरसाने वाली राधाप्‍यारी...संदेश तो एक ही है ना दोनों का कि प्रेम में इतना रम जाया जाये कि ईश्‍वर तक पहुंचने को यात्रा  कोई भी हो उसकी हर धारा राधा बन जाये, एकात्‍म हो जाये...।
- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

तो मंडन मिश्र की पत्‍नी को क्‍या फिर आना होगा...

अभी तक साईं की मूर्तिपूजा का विरोध करने की बात करके सुर्खियां बटोरने वाले ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद ने जो धर्मसंसद लगाकर आग उगली , उसकी तपिश अब पारिवारिक रिश्‍तों को भी झुलसाने का कारण बन सकती है।
है ना कितने कमाल की बात कि बाल्‍यावस्‍था से ही संन्‍यासी रहने वाले, अब इस पर भी बोलेंगे कि नि:संतान होने पर पुरुष को दूसरा विवाह कर लेना चाहिए, वह भी बगैर यह जाने कि नि:संतान होने के लिए कौन जिम्‍मेदार है। ऐसा ही है तो फिर इन्‍हीं के अनुसार यदि पुरुष संतान उत्‍पन्‍न करने के योग्‍य नहीं है तो फिर पत्‍नी को भी दूसरा विवाह कर लेना चाहिए।
आज ही मद्रास हाइकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र व राज्‍य सरकारों से कहा है कि शादी से पहले अगर दूल्हा-दुल्हन की "नपुसकता की जांच करवाई जाए तो इन वजहों से टूटने वाली शादियों की दर में कमी आ सकती है। इसका सीधा सीधा मतलब यह भी है कि नपुंसकता का प्रतिशत बढ़ रहा है मगर इसका ठीकरा औरत के मत्‍थे कतई फोड़ा जा सकता।
गनीमत है कि देश में कानून का राज है, जो कम से कम कानूनी धाराओं में तो महिला अधिकारों की बात करता ही है वरना यदि छत्‍तीसगढ़ के कवर्धा में हुई धर्मसंसद के प्रस्‍तावों पर गौर किया जाये तो समाज के तानेबाने की प्रथम इकाई अर्थात् परिवार में धर्मसंसद में मौजूद इन संतों ने अराजकता पिरोने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
कम से कम मुझे तो इन महान धर्म विभूतियों से महिलाओं के संदर्भ में ऐसे ही अनादर की अपेक्षा थी। यूं भी औरतों से ज्‍यादा सॉफ्ट टारगेट और हो भी क्‍या सकता है ,वो भी धर्म की आड़ में। इज्‍़जत-बेइज्‍़जत ,वंश-निर्वंश, कुल और मर्यादा सब का ठेका औरतों के ही सिर जो ठहरी।
संभवत: शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद यह भूल गये कि आज से लगभग 2400 वर्ष पूर्व जब आदि शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को गूढ़ शास्‍त्रार्थ में हराकर, मंडन मिश्र की पत्‍नी के सिर्फ एक ही प्रश्‍न कि ''सम्‍भोग का व्‍यवहारिक ज्ञान क्‍या है और इससे संतान का निर्माण कैसे होता है '' का उत्‍तर देने के लिए परकाया प्रवेश तक करना पड़ा।
आज तब से लेकर अब तक सत्तर शंकाराचार्य हो चुके हैं। किसी ने भी गृहस्‍थजीवन पर बोलने का दुस्‍साहस नहीं किया। बिना व्‍यवहारिक ज्ञान के भला शंकराचार्य कैसे बता सकते हैं कि पति व पत्‍नी में से कौन नि:संतानता के लिए जिम्‍मेदार है।
इंसानियत को सर्वोपरि रखने वाले हिंदू धर्म को स्‍वामी स्‍वरूपानंद के इस कदम ने इतना हल्‍का करके पेश किया है कि गोया औरत को सिर्फ बच्‍चे पैदा करने के लिए ही दांपत्‍य जीवन जीने का अधिकार हो।
बहरहाल हिंदू मर्दों की दूसरी शादी से जुड़े शंकराचार्य के बयान पर विवाद बढ़ता जा रहा है, जैसी कि आशंका थी कि शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के बयान का जमकर विरोध शुरू हो चुका है और इसे लेकर काफी गुस्सा है। निश्‍चित ही शंकराचार्य का ये बयान अपमानजनक है और बच्चे के लिए दूसरी शादी करना संतानहीन महिलाओं के साथ धोखा है। उनका कहना है कि अगर बच्चे नहीं हो तो दूसरी शादी ही विकल्प नहीं है, टेस्टट्यूब बेबी से लेकर बच्चे गोद लेने जैसे कई और भी तरीके हैं। ये निजी मामलों में धर्माचार्यों का अनावश्यक हस्तक्षेप है।
गौरतलब है कि मुसलमान होने के चलते जहां एक तरफ शंकराचार्य साईं बाबा को संत मानने से इंकार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस्लाम में मिली एक से ज्यादा शादियों की छूट को ही हिंदू धर्म में अपनाने की बात कह रहे हैं।
क्‍या ये बात नाजायज नहीं कि बच्‍चों की पैदाइश होने या ना होने के कारण ही, व्‍यभिचार का एक टूल पुरुषों को पकड़ाया जा रहा है । सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पहली पहली पत्नी के रहते और उसे तलाक दिए बिना दूसरा विवाह जायज़ होगा या पहली पत्‍नी की उपयोगिता सिर्फ बच्‍चे पैदा करने की है, बस।
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 25 अगस्त 2014

बाकी तीन उंगलियां स्‍वामी स्‍वरूपानंद की ओर

तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे की तर्ज़ पर द्वारका शारदापीठ के शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद सरस्‍वती ने साईं की ईश्‍वर मानकर पूजा न किये जाने का जो शिगूफा छोड़ा है और इसे सनातन धर्म पर संकट के रूप में प्रचारित किया है, वह निश्‍चित ही हमारी सनातनी धर्म व्‍यवस्‍था को कमजोर बनाने का एक बचकाना प्रयास है, इसके अलावा और कुछ नहीं । सच तो ये है कि कभी धर्म की रक्षार्थ आदि शंकराचार्य ने जिन चार पीठों की स्‍थापना की,उनके उत्‍तराधिकारी धर्म की तो छोड़िए, स्‍वयं अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे और अहंकार के बोझ से इतना लद चुके हैं कि उन्‍हें सनातन धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए साईं के नाम का सहारा लेना पड़ रहा है। आमजन को यह बताना पड़ रहा है कि कुंभ स्‍नान में सर्वोच्‍चता जतलाने के अलावा भी उनका अपना कोई वज़ूद है।
कल अखाड़ों की एक धार्मिक बैठक में सनातन धर्म के अलंबरदारों ने साईं को ईश्‍वर मानकर पूजा किये जाने के विरोध में एक सहमति पत्र तैयार किया जिसे आज धर्म संसद में पढ़ा जायेगा और इस पत्र के अनुसार धर्म संसद में शामिल सभी धर्मविद्वतजन स्‍वामी स्‍वरूपानंद सरस्‍वती द्वारा उठाये गये साईं को ईश्‍वर मानकर पूजा किये जाने के मुद्दे को सहमति देंगे।
कितना अच्‍छा होता कि साईं को उनके भक्‍त ईश्‍वर मानकर पूजें या संत मानकर, इस मुद्दे पर   एकत्र होने से पहले धर्मसंसद में वेदों के ज्ञाता, सनातन धर्म के सर्वोच्‍च अधिकारी यह आत्‍मचिंतन भी कर पाते कि स्‍वयं उन्‍होंने शंकराचार्यों, महामंडलेश्‍वरों, मंडलेश्‍वरों के पद को सुशोभित करते हुये कौन-कौन से जनहितकारी, धर्महितकारी कार्य किये । सनातन धर्म की जितनी छीछालेदर इन अलंबरदारों ने की है, उतनी तो विधर्मियों ने भी नहीं की। जो स्‍वयं अपने धर्म को भूल दूसरे धर्म पर उंगली उठाता है, वह यह भूल जाता है कि बाकी की तीन उंगलियां स्‍वयं उसकी ओर ही उठ  रही हैं।
कुछ सवाल हैं जो स्‍वयं इन्‍हीं धर्माचार्यों के मंसूबों को कठघरे में लाते हैं जैसे कि -
1.क्‍या स्‍वयं स्‍वरूपानंद सरस्‍वती ये बतायेंगे कि उन्‍होंने धर्मांतरण पर चुप्‍पी क्‍यों साध रखी है
2.क्‍या उन्‍हें देश के हर हिस्‍से में हो रहे गौवध का फैलता दायरा दिखाई नहीं देता
3.क्‍या गंगा समेत तमाम पूज्‍यनीय नदियों के प्रदूषण पर उनकी चुप्‍पी उनकी मूढ़ता और निष्‍क्रियता नहीं दर्शाती
4.क्‍या उन्‍हें नहीं पता कि शंकराचार्यों, जगद्गुरुओं और महामंडलेश्‍वरों के पद भी खरीदे बेचे जा रहे हैं। इतना ही नहीं, बाकायदा इन्‍हीं के मठों से सेटिंग का पूरा खेल होता है और पदों के बदले में मिली धनराशि से इनके बैंक अकूत संपत्‍तियों से भरे पड़े हैं
5.क्‍या इन अकूत संपत्‍तियों में आने वाला धन काली कमाई नहीं होती
6.क्‍यों नहीं इनके खजानों को समाज के कल्‍याणार्थ सार्वजनिक किया जाता
7. धर्म को बेचने के लिए बनाये जा रहे आश्रमों, मंदिरों और धार्मिक चैनलों के ज़रिये जो धर्मांधता फैलाई जा रही है, उस पर क्‍यों नहीं कोई आपत्‍ति जताई जाती
8.सामाजिक बुराइयों पर इनकी चुप्‍पी क्‍या इन्‍हें बख्‍शने देगी
 ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो इन मठाधीशों के इरादों को कतई जनहितकारी या धर्महितकारी नहीं मानने देते।
यूं भी शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती विवादित बयान देकर सिर्फ खबरों में रहने के आदी हो चुके हैं और सब जानते हैं कि वह कांग्रेस के हिमायती हैं। तभी तो वह कभी कहते हैं कि स्वामी अग्निवेश यह साबित करें कि वह आतंकवादी नहीं, सिर्फ संन्यासी हैं तो कभी कहते हैं कि शिरडी के साईं मंदिर में काला धन चढ़ावे में आता है। ये कौन सी अनोखी बात है, सब जानते हैं। कभी कहते हैं कि कर्मों का फल ना निर्मल बाबा देगा, ना साईं बाबा देगा। तो फिर आपत्‍ति किस पर है, वे ये भी बतायें। कभी कहते हैं कि आपत्ति साईं से नहीं, उनकी पूजा से है तो कभी कहते हैं कि साईं बाबा 'वेश्या पुत्र' और उनके भक्तगण 'संक्रामक बीमारी'  हैं...आदि आदि।
बहरहाल "हिंसायाम दूयते या सा हिन्दु" अर्थात् हिन्दू या सनातन धर्म केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है जिसमें कहा गया है कि अपने मन, वचन, कर्म सहित जो हिंसा से दूर रहे, वह हिन्दू है और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे, वह हिंसा है और फिलहाल धर्माचार्यों का ये कदम ऐसी ही हिंसा की भूमि तैयार कर रहा है।
कौन... किसकी... कैसे... क्‍यों... किसलिए...पूजा या आराधना करे जैसे प्रश्‍नों की बौछार के बीच  कुल 13 अखाड़ों  के जमघट में जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा, अटल अखाड़ा, आवान अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, पंचाग्नि अखाड़ा, नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा, वैष्णव अखाड़ा, बड़ा उदासीन अखाड़ा, निर्मल पंचायती अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, रामानंदी दिगंबरी अखाड़ा शामिल हैं। कल सुबह सभी अखाड़ों के प्रतिनिधियों की बैठक वागंभरी गद्दी के महंत नरेन्द्र गिरी की अध्यक्षता में हुई जिसमें जूना अखाड़े के राष्ट्रीय संरक्षक हरि गिरी ने साईं मुद्दे व सनातन धर्म से जुड़े सभी मुद्दों पर शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का समर्थन करने से संबंधित प्रस्ताव पढ़ा। आज सभी अखाड़ों के प्रतिनिधि इसी सहमति पत्र को धर्म संसद में पढ़ेंगे, जिसके बाद साईं की पूजा के मुद्दे पर फैसला लिया जाएगा।
हालांकि एक अच्‍छी खबर भी है कि इस जमघट से अलग अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने कहा है कि द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा साईं बाबा के बारे में दिया गया बयान आधारहीन है। देखते हैं हैं कि आज ये धर्माचार्य क्‍या निर्णय लेते हैं।
- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

कुल्‍हाड़ी-कुदाल के संग तम्‍बूरा

सदियों पुरानी बहस है कि भाग्‍य और कर्म में कौन श्रेष्‍ठ है। भाग्‍यवादी कर्म को और कर्मवादी भाग्‍य को गौण समझते हैं परंतु भाग्‍य और कर्म दोनों का ही अस्‍तित्‍व जीवन के लिए बेहद महत्‍वपूर्ण है। अंतर बस इतना है कि भाग्‍य पर निर्भरता हमें कर्म करने से दूर कर देती है जबकि कर्म पर निर्भर रहकर भाग्‍य का निर्माण किया जा सकता है।
यह तभी संभव है जबकि कर्म को उत्‍सव मानकर चला जाये। कर्म को जिया जाये न कि 'कैसे भी निबटाओ' की सोच के साथ उसे खत्‍म किया जाये। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि उत्‍तम कर्म करके व्‍यक्‍ति उच्‍च स्‍थान तक पहुंचे हैं, मगर उन्‍होंने भी अपने कर्म को जिया, उसे उत्‍सव मानकर जीवन का ध्‍येय बनाया।उनके लिए उनका कर्म बोझ नहीं था इसीलिए वे उसे करने में आनंदित होते रहे और आगे बढ़ते रहे।
जीवन में सब कुछ पा लेने की ज़िद में मानवीय संवेदनायें दम तोड़ रही हैं, सारे भाव खो रहे हैं, ऐसे में बहुत जरूरत है इस सोच को अपनाने की कि कर्म की प्रकृति को उत्‍सव बना दिया जाये।और फिर से कहीं मीरा के हाथ का तम्‍बूरा , कृष्‍ण के हाथ की बांसुरी बन जाये वह तो कहीं ताजमहल तक का निर्माण कर दे।
मीरा के हाथ में जो तम्‍बूरा है, वह कर्म करने वालों की वजह से ही आया, उसे बनाने वाले यदि नहीं होते तो हम तम्‍बूरे से अनभिज्ञ ही रहते मगर लकड़ी, बांस और तार के मिश्रण की कल्‍पना जिसने भी की, वह पहला व्‍यक्‍ति निश्‍चित ही 'कर्म को उत्‍सव' बनाने की धुन पाले बैठा रहा होगा। बिना उत्‍सवी सोच के ये संभव ही नहीं था। तम्‍बूरा जैसा वाद्य यंत्र 'सिर्फ कर्म' करना है, की सोच वाले पैदा नहीं करते। वे तो कुल्‍हाड़ी बनाते हैं, कुदाल बनाते हैं, तलवार बनाते हैं। तम्‍बूरा को गढ़ा गया और इसे गढ़ने वाली उत्‍सवी सोच से केवल कर्म करते जाने वालों की सोच का क्‍या लेना देना। तम्‍बूरा तो गढ़ते ही वे लोग हैं जो जिंदगी को खेल की तरह से लेते हैं। जिंदगी में जो भी श्रेष्‍ठ आया चाहे वह तम्‍बूरा हो या ताजमहल, वह उन लोगों के मन से आया, उन के सपनों से आया जो जिंदगी को उत्‍सव बनाकर चलते रहे, गुनगुनाते रहे और नायाब कृतियां बना दीं।
ज़रा सोचिए! भोजन घर में भी बनता है और होटल में भी मगर तृप्‍ति घर का भोजन ही देता है, क्‍यों ? क्‍योंकि वह  उस गृहणी के लिए काम नहीं बल्‍कि अपनों को स्‍वाद का आनंद लेते देख स्‍वयं आनंदित होने का साधन है। और जहां आनंद है वहीं उत्‍सव है। सो आनंद के साथ कर्म को करने में जो तृप्‍ति मिलती है उससे जीवन उत्‍सव बन जाता है। हर कदम हल्‍का, कहीं कोई भार नहीं, कहीं कोई जबरदस्‍ती नहीं।
आज जो चारों तरफ आपाधापी समाज में हर क्षेत्र में सर्वोच्‍चता को पा लेने की है उससे संपन्‍नता तो बढ़ रही है मगर व्‍यक्‍ति उतना ही तेजी से मन से गरीब हुआ जा रहा है। भावनायें, संवेदनायें, दया, करुणा, क्षमा जैसे मन से उपजने वाले भाव से हीन होता जा रहा है। उत्‍सवविहीनों से बनते समाज का ही तो आइना है बढ़ता आपराधिक आंकड़ा। कितने आश्‍चर्य की बात है कि समाज की गरीबी मिटाने पर सबका ध्‍यान है और किसी हद तक संपन्‍नता गरीबी को मिटा भी रही है मगर जो समाज 'मन से गरीब' हुआ जा रहा है उस पर किसी का ध्‍यान नहीं है। मन अतृप्‍त है, गरीब है, वह करोड़ों कमा लेने के बाद भी जीवन को उत्‍सव नहीं बना पा रहा, ना ही उसे देख आनंदित हो पा रहा है और कुंठाओं से घिरा अपराधों को जन्‍म दे रहा है।
कुल मिलाकर इस स्‍थिति को हम भाग्‍य के भरोसे नहीं छोड़ सकते क्‍योंकि कर्म को महज 'काम है- जो निबटाना है' वाली सोच में बांध दिया गया है, आनंद से दूर कर दिया गया है। इस बंधन में विवशता है जो जब-तब बंधन तोड़ने को आतुर हो उठती है और यही आतुरता समाज में अपराध को बढ़ावा दे रही है।
समाज को फिर से उत्‍सव से जोड़ना होगा और उत्‍सव ऐसे हों जो सदियों से थोपे गये ना हों, वे स्‍वयं ही उपजें...ऐसे उत्‍सव जो स्‍वयं आग्रह करें... मन से नाच उठने का...कुछ नया जन्‍माने का...कुछ नया खोजने का जैसे कि तम्‍बूरा खोजा गया, बांसुरी खोजी गई...। ढर्रे पर चलते चलते सदियों पुराने उत्‍सवों की सड़ांध अब समाज के मन को झूमने नहीं देती बल्‍कि बोझ बन गई है, रस्‍म बन गई है। और जो रस्‍म बन गई हो, लीक पर ही चलती रही हो वह ना तो 'कर्म' में उत्‍सव की भावना को पैदा कर पायेगी ना ही 'मन' में।
निश्‍चित ही जब मन तमाम ढर्रे में बंधी सोचों से संचालित होगा तो वह कर्म को उत्‍सव कैसे बना पायेगा भला और ऐसे में कर्म के द्वारा भाग्‍य को बनाने- बदलने के प्रयास भी तो धराशायी ही हो जायेंगे ना। इसलिए कोशिश की जाये कि कर्म जरूरी है मगर वो महज 'काम निबटाने' तक सीमित ना रहे, वह मन से किया जाये ताकि हम कर्म को उत्‍सव मानकर आगे बढ़ें और अपने पने भाग्‍यों को स्‍वयं संचालित करें..उसे बनायें और बढ़ायें। समाज की नकारात्‍मकता को सकारात्‍मक दिशा में उत्सव के संग ही ले जाया जा सकता है।

-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 13 अगस्त 2014

नाटक: 'म्यूज़ियम ऑफ़ स्पीशीज़ इन डेंजर'

"कुंती ने हमारा सेक्स टाइमटेबल बनाया ताकि किसी भाई को कम या ज़्यादा दिन न मिलें."- द्रौपदी

असली प्रेमी कौन था? वो रावण जिसने उसकी हां का इंतज़ार किया या वो राम जिसने उस पर अविश्वास किया?-सीता


"पाँच पांडवों के लिए पाँच तरह से बिस्तर सजाना पड़ता है लेकिन किसी ने मेरे इस दर्द को समझा ही नहीं क्योंकि महाभारत मेरे नज़रिए से नहीं लिखा गया था!" बीईंग एसोसिएशन के नाटक 'म्यूज़ियम ऑफ़ स्पीशीज़ इन डेंजर' की मुख्य किरदार प्रधान्या शाहत्री मंच से ऐसे कई पैने संवाद बोलती हैं.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सहयोग से मंचित इस नाटक में सीता और द्रौपदी जैसे चरित्रों के माध्यम से महिलाओं की हालत की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है लेखिका और निर्देशक रसिका अगाशे ने.
रसिका कहती हैं, "सीता को देवी होने के बाद भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी और इसे सही भी माना जाता है लेकिन मेरा मानना है कि 'अग्नि परीक्षा' जैसी चीज़ें ही रेप को बढ़ावा देती हैं."
नाटक में शूर्पणखा पूछती है, "मेरी गलती बस इतनी थी कि मैंने राम से अपने प्यार का इज़हार कर दिया था? इसके लिए मुझे कुरूप बना देना इंसाफ़ है?"
शूर्पणखा सवाल उठाती है, "अगर शादीशुदा आदमी से प्यार करना ग़लत है तो राम के पिता की तीन पत्नियां क्यों थीं?"
रसिका कहती हैं, "16 दिसंबर को दिल्ली गैंगरेप के बाद इंडिया गेट पर मोमबती जलाने और मोर्चा निकालने से बेहतर यही लगा कि लोगों तक अपनी बात को पहुंचाई जाए और इसके लिए इससे अच्छा माध्यम मुझे कोई नहीं लगा."
नाटक में सीता का किरदार निभाने वाली प्रधान्या शाहत्री हैं, "सच से डरना कैसा? ये हमारा विरोध करने का तरीका है और हम जानते हैं, हम ग़लत नहीं हैं."
जब आस्था का मामला आता है तो घर परिवार से भी विरोध होता है. द्रौपदी की भूमिका निभाने वाली किरण ने बताया कैसे घर वाले उनसे नाराज़ हो गए थे.
रसिका का कहना था, "ये पहली बार नहीं है कि किसी ने द्रौपदी और सीता के दर्द को लिखने की कोशिश की है और उस वक़्त धर्म कहाँ जाता है जब किसी लड़की का रेप हो जाता है."
"कुंती ने हमारा सेक्स टाइमटेबल बनाया ताकि किसी भाई को कम या ज़्यादा दिन न मिलें." द्रौपदी जब मंच से ये संवाद बोलती हैं तो तालियां गूंज उठती हैं.
नाटक की सीता पूछती हैं, "लोग पूछेंगे कि सीता का असली प्रेमी कौन था? वो रावण जिसने उसकी हां का इंतज़ार किया या वो राम जिसने उस पर अविश्वास किया?"
सिर्फ़ हिंदू मान्यताओं पर ही छींटाकशी क्यों, इसके जवाब में वह कहती हैं, "हमने ये कहानियां बचपन से सुनी हैं. हमें ये याद हैं और इसलिए हम इसके हर पहलू पर गौर कर सकते हैं."
साभार -सुशांत एस मोहन