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शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

लाशों को गिनने का सिलसिला बंद होना चाहिए

महाभारत युद्ध के दौरान कई बार कृष्ण ने अर्जुन से परंपरागत नियमों को तोड़ने के लिए कहा था जिससे  धर्म की रक्षा हो सके, युद्ध के दौरान कर्ण ''निःशस्त्र'' थे तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, ''हे पार्थ, धर्म की  जीत के लिए कर्ण का वध जरूरी है, वह नि:शस्‍त्र ही क्‍यों ना हो।


मौत तो हर एक को एक ना एक दिन आनी ही है मगर कुछ ऐसी होती हैं जो सवालों को छोड़ जाती हैं,  नेताओं के बड़े बड़े निंदा प्रस्‍तावों के बीच बूढ़े कांधों पर जवान बेटे की अर्थी या कहीं नन्‍हा बच्‍चा मुखाग्‍नि  देता, ये सीन अब आम हो चले हैं, जवानों को अब अपनी आवाज अपनी नौकरी को दांव पर लगाकर  उठानी पड़ रही है। नासूर सिर्फ वो समस्‍यायें नहीं जो बॉर्डर पर खून बिखेर रही हैं, नासूर ये भावनायें भी हैं  जो रणनीतियों का बोझ ढोती हैं और अनुशासनहीनता का दंड भी।

आज फेसबुक पर अपना वीडियो पोस्‍ट करने वाला सीआरपीएफ जवान आरा/बिहार निवासी पंकज मिश्रा हो  या कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर ही बीएसएफ का जवान तेजबहादुर यादव हो, गाहे-ब-गाहे ''भीतर  सबकुछ ठीक'' है को नकारते हैं तो इसे अनुशासनहीनता से जोड़कर बात को दबा दिया जाता है और यही  दबाने की आदत आज पूरे देश पर भारी पड़ रही है।

दंतेवाड़ा, बस्तर, उड़ी , सुकमा… लगातार हमारे जवान शहीद हो रहे हैं और हम बस शहीद गिन रहे हैं।  एक रस्‍मआदयगी के तहत हमारे राजनेता निंदा के साथ मुंहतोड़ जवाब देने की बात करते हैं। कश्‍मीर की  अलगाववादी हुर्रियत हो या नक्सलवादी विचारधारा दिन पर दिन हावी होती जा रही है। कुछ  मानवाधिकारवादी इन नक्सलियों को आतंकी नहीं मानते तो कुछ मानवाधिकारवादी पत्थरबाजों को मासूम  कहने से नहीं हिचकते, भ्रमित विचारधारा के शिकार कहकर इनका बचाव किया जाता है।

ये रस्‍साकशी का खेल खेलकर भारत नक्सलियों से पचासों साल से जूझ रहा है,मगर हर हमले के बाद  राजनेता ट्वीट कर निंदा कर देते हैं और मीडिया एक दिन बहस कराकर अगले दिन मानवता के पाठ  पढ़ाते हुए अलगावादियों-नक्‍सवादियों को मासूम बताने लगती है।

फिलहाल सुकमा के इन 26 जवानों की शहादत के बाद भी क्या अब भी वे मानवाधिकारवादी नक्सलियों  को ही सही ठहराएंगे? यदि नहीं तो कब तक हम श्रद्धांजलि देते रहेंगे?

आज का नक्सल आंदोलन 1967 वाला आदर्शवादी आंदोलन नहीं रहा है बल्कि यह साम्यवादियों द्वारा  रंगदारी वसूलनेवाले आपराधिक गिरोह में बदल चुका है। इन पथभ्रष्ट लोगों का साम्यवाद और गरीबों से  अब कुछ भी लेना-देना नहीं है। हां, इनका धंधा गरीबों के गरीब बने रहने पर ही टिका जरूर है इसलिए ये  लोग अपने इलाकों में कोई भी सरकारी योजना लागू नहीं होने देते हैं और यहां तक कि स्कूलों में पढ़ाई भी  नहीं होने देते।

आप ही बताईए कि जो लोग देश के 20 प्रतिशत क्षेत्रफल पर एकछत्र शासन करते हैं वे भला समझाने से  क्यों मानने लगे? हर दिन, हर सप्ताह, हर महीना, हर साल भारतीय जवान मरते रहते हैं, राजनेता आरोप  प्रत्यारोप लगाकर इस खून सनी जमीन पर मिटटी डालते रहते हैं।

हमारी वर्तमान केंद्र सरकार नक्सली समस्या को जितने हल्के में ले रही है यह समस्या उतनी हल्की है  नहीं। यह समस्या हमारी संप्रभुता को खुली चुनौती है। हमारी एकता और अखंडता के मार्ग में सबसे बड़ी  बाधा है।

हमेशा से नक्सलवादी इलाकों में सरकार योजना लेकर जाती है। लेकिन लाशे लेकर आती है। भला क्या  कोई ऐसी समस्या स्थानीय हो सकती है? क्या यह सच नहीं है कि हमारे संविधान और कानून का शासन  छत्तीसगढ़ राज्य के सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही चलता है? क्या यह सच नहीं है कि वहां के नक्सली क्षेत्रों में  जाने से हमारे सुरक्षा-बल भी डरते हैं तो योजनाएं क्या जाएंगी?

आज इन सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि भारत के मध्य हिस्से में नक्सल बहुल इलाकों में इन  लोगों के पास धन और हथियार कहां से आता है? कौन लोग इन्हें लाल क्रांति के नाम पर उकसा रहे हैं?  यदि सरकार विश्व के सामने अपनी उदार छवि पेश करना चाहती तो उसे सुरक्षित भारत की छवि भी पेश  करनी होगी। जम्मू-कश्मीर और मिजोरम के बाद कई राज्य संघर्ष के तीसरें केंद्र के रूप में उभरे हैं जहां  पर माओवादियों के विरूद्ध सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती हुई है। पिछले लगभग साढ़े चार दशकों से चल  रहा माओवाद जैसा कोई भी भूमिगत आंदोलन बिना व्यापक जन सर्मथन और राजनेताओं के संभव है?  लंबे अरसे से नक्सल अभियान पर नजर रखे सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बिना तैयारी के सुरक्षा  बलों को नक्सल विरोधी अभियान में झोंक देना भूखे भेडि़यों को न्योता देने के बराबर है।

नक्सल अकसर ही गुरिल्ला लड़ाई का तरीका अपनाते हैं और उनकी हमला कर गायब होने जाने की  रणनीति सुरक्षा बलों के लिये खतरनाक साबित हुई है। नक्सली जिन इलाकों में अपना प्रभाव रखते हैं वहां  पहुंचने के साधन नहीं हैं। पिछले दस सालों से इन इलाकों में न ही सरकार और न ही सुरक्षा एजेंसियों ने  प्रवेश करने का जोखिम लिया है जिस कारण यह लोग मजबूत होते गये।

‘जब मौत केवल आंकड़ा बन जाए, जवाब केवल ईंट और पत्थर में तोला जाए, जब हमदर्द ही दर्द देने लगें  तो सुकमा बार बार होगा।’

महाभारत में कहा गया कि धर्म की रक्षा के लिए नि:शस्‍त्र का वध भी उचित है तो क्‍यों नहीं हमारी  सरकारें, हमारी सुरक्षा एजेंसियां और कथित मानवाधिकारवादी व मीडिया मिलकर उन लोगों का सच खोलते  और उन्‍हें जनता के सामने नंगा करते , कर्ण तो तब भी निशस्‍त्र थे मगर जो हमारे जवानों को मार रहे हैं  वे अत्‍याधुनिक हथियारों से लैस हैं तो इन कॉकरोचों की सफाई क्‍यों न घर से की जाए।

-अलकनंदा सिंह

शनिवार, 9 जुलाई 2016

पाकिस्तान में ईधी और कश्मीर में वानी: किसका इस्लाम सच्चा ?

एक मजहब, एक धरती, लगभग एक जैसा खानपान और तो और रवायतें भी एक जैसी मगर जब एक आइने में इनकी दो तस्वीरें नज़र आऐं तो…तो क्या कीजिऐगा…
जी हां, आइना एक, शक्लें दो…ये हम पर है कि इंसानियत का कौन सा रूप है हमें देखना और दिखाना है ।

हम भारत में हैं तो बात पहले कश्मीर से शुरू करनी होगी। कश्मीर में कल मारे गए एक दहशतगर्द बुरहान वानी की मौत पर खून बहाने वाले कश्मीरी युवा, अलगाववादियों और आतंक के सरगनाओं द्वारा कश्मीर की हरी धरती को लाल करने की जिद ने मजहब का जो रंग व शक्ल दिखाई, वह उस शक्ल से एकदम अलग थी, एकदम विपरीत थी जो पाकिस्तान में आज समाजसेवी अब्दुल सत्तार ईधी के मरने के बाद दिखी। मजहब एक ही है मगर मकसद बदल जाने से उद्देश्य बदल गए और इसका इंसानियत से वास्ता भी बदल गया।

आइने का पहला एक रुख देख‍िए-
बीबीसी में वुसुतुल्लाह खान लिखते हैं- ”अब्दुल सत्तार ईधी के निधन की सूचना आने के बावजूद कराची के क़रीब तरीन इलाके खरादर के ईधी फाउंडेशन ट्रस्ट के कंट्रोल रूम में काम एक लम्हे के लिए भी नहीं रु का.
जहां-जहां से इमरजेंसी कॉल आ रही हैं, वहां-वहां एंबुलेंस ज़ख़्मी-बीमार लोगों को लेने आ-जा रही है.
अज़ीब लोग हैं जो शोक में तो डूबे हैं लेकिन एक मिनट भी अपना काम नहीं रोक पा रहे. कंट्रोल रूम का ऑपरेटर कॉलर्स को ये तक नहीं कह रहा है कि आज रहने दो, तुम्हारे मोहल्ले से कल लावारिस लाश उठा लेंगे. बस ईधी साहब का अंतिम संस्कार होते ही तुम्हारे बीमार के लिए एंबुलेंस रवाना कर देंगे.
कोई ये नहीं कह रहा कि आज कॉल मत करो, आज हम बंद हैं, सदमे से निढाल हैं. आज हमारे बाप का इंतकाल हो गया है.
पूरे पाकिस्तान के पौने चार सौ ईधी केंद्रों में कोई सरगर्मी एक पल के लिए भी नहीं रुकी, ऐसा लगता है ईधी साहब परलोक नहीं, बस कुछ दिनों के लिए विदेशी दौरे पर गए हैं.
इसे कहते हैं शो मस्ट गो ऑन.”
उक्त लफ्जों से उस एक अदना से दिखने वाले मगर पाकिस्तान जैसे उथल पुथल वाले देश में अपनी उपस्थ‍िति दर्ज कराने वाले ईधी फाउंडेशन के अध्यक्ष समाज सेवी अब्दुल सत्तार ईधी को श्रद्धांजलि दी जा रही है।

वहीं अब आइने का दूसरा रुख देखिए-
कश्मीर में बुरहान वानी के मरने के बाद सबसे पहले तो कश्मीर के ही पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ट्वीट करते हैं कि बुरहान ने जीते जी जो तबाही नहीं मचाई, वह उसकी मौत के बाद मचेगी… इसका अर्थ क्या लगाया जाए कि जिस देश का नमक खा रहे हैं कश्मीरी अलगाववादी, जिस देश के आमजन का टैक्स हजम किए जा रहे हैं कश्मीरी आतंकवादी, उसी देश के ख‍िलाफ हथ‍ियार उठा रहे हैं और उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि समस्या राजनीतिक है, बुरहान जैसों का मरना कोई जलजला ले आएगा। नमक हलाली ना करने वालों को क्या कहते हैं, क्या ये भी बताना पड़ेगा। बुरहान जैसे गद्दारों और देश तोड़ने वालों के लिए जो लोग अपने आंसू जाया कर रहे हैं, क्या उन्हें उन पुलिसकर्म‍ियों और सेना के जवानों की शहादत दिखाई नहीं देती जो एक कश्मीर को बचाने के लिए अपना खून बहा रहे हैं। आतंकियों की मौत को शहादत कहने वाले क्या अब भी नहीं समझ रहे कि आईएसआईएस भी अपने लड़ाकों को शहीद कहता है।

निश्च‍ित जानिए कि भस्मासुरों की जमात चाहे कितना भी कहर बरपा ले मगर वो उस ओहदे को कभी हासिल नहीं कर सकती जो ओहदा इंसानियत की सेवा करने से हासिल होता है। इसीलिए आज भले ही बुरहान वानी के सरमाएदारों ने जूलूस निकाल कर कश्मीर में खूनी प्रदर्शन किया और उसे अलगाववादियों का समर्थन भी मिल रहा हो मगर वह वो इज्जत वो श्रद्धा कभी हासिल नहीं कर सकते जो अब्दुल सत्तार साहब ने बिना किसी की मदद के अपनी सेवा से हासिल की।

बहरहाल, अब ये तो  हमें ही तय करना होगा कि समाज को बचाने वालों को ज्यादा अहमियत देनी है या उन बददिमागों को जो खून बहाने पर आमादा हैं।

सच तो यह है क‍ि कश्मीर आज जिस मुकाम पर खड़ा है वहां से उसकी वापसी तभी संभव है जब दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कुछ कठोर निर्णय लिए जाएं और आतंकवादियों के साथ-साथ अलगाववादियों को भी अब तक के उनके किए की माकूल सजा द‍िलाई जाए अन्यथा पाकिस्तान में तो ईधी जैसे किसी शख्स की शक्ल में आइने के दो पहलू नजर भी आ रहे हैं, कश्मीर में आने वाली नश्लें उसके लिए भी तरस जाएंगी।

–Alaknanda singh

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

वजूद को बचाने की नाकाम कोशिश: TTP-JA

सनक से उपजी हताशा जब अपनी उपस्‍थिति आमो-खास में दर्ज़ कराने पर आमादा होती है, तब वह किसी भी घातक तरीके का इस्‍तेमाल करती है ताकि वह लोगों की नजर में आ सके और इस तरह अपने मिटते वजूद को फिर से खबरों में लाया जा सके। मगर हताश व्‍यक्‍ति अपनी कमजोरी छुपाने और स्‍वयं को श्रेष्‍ठ बताने के लिए पागलपन की हद तक कोशिश करता है। कुछ ऐसा ही कर रहे हैं वो आतंकी संगठन जो भारत के चौतरफा बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव से घबरा गये हैं। संभवत: यही कारण है कि अब वह सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कर अपने वजूद को बचाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।
कुछ दिन पूर्व वाघा बॉर्डर पर हुए आत्‍मघाती बम ब्‍लास्‍ट के ठीक बाद माइक्रो ब्‍लॉगिंग साइट ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक धमकीभरा मैसेज उभरा जिसके अर्थ ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिये हैं। #नरेंद्र मोदी# हैशटैग के साथ साइट पर उभरे इस धमकी भरे मैसेज में प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा गया है- "u r the killer of hundreds of muslim," Tehreek-e-Taliban Pakistan Jamaat Ahrar(TTP-JA)spokesperson- 'Ehsanullah Ehsan'....इसके कुछ ही घंटे बाद एक और मैसेज उभरा जिसमें वाघा बॉर्डर पर किये गये विस्‍फोट की  जिम्‍मेदारी ले गई थी और यह भी एहसानउल्‍लाह एहसान के नाम से जारी किया गया था,यह कुछ इस तरह था- "We w(il) take the revenge of innocent people of Kashmir and Gujrat "(sic).
पाकिस्‍तान के नौर्थ-वेस्‍ट के संघर्षरत क्षेत्र से उभरे TTP-JA का यूं तो उदय तहरीके तालिबान से हुआ, जो पाकिस्‍तान के इन क्षेत्रों में शांति के लिए आतंकवादी गतिविधियों को विराम देने पर मूल तालिबानियों से अलहदा सोच रखता था। वह पाकिस्‍तानी सरकार के साथ बातचीत करके आपसी सहमति के आधार पर शांति का कॉमन एजेंडा तय करने की बात भी करता है, मगर भारत के बढ़ते अंतर्राष्‍ट्रीय प्रभाव से वह खासा बेचैन है और इस बेचैनी के चलते वह अपनी मूल प्रवृत्‍ति (दहशतगर्दी) को ही हथियार बना रहा है।
दहशतगर्दी से जुड़ी इधर कुछ घटनाएं भारत में भी हुईं जिनमें मुज़फ़्फरनगर के दंगाप्रभावित क्षेत्र से युवकों का बड़ी संख्‍या में गुम हो जाना, मोदी की पटना सभा व गया में ब्‍लास्‍ट होना। ऐसी घटनाओं की कड़ी अब बर्द्धमान से जुड़ रही हैं जिनके तहत अलकायदा के रीजनल चीफ के भारतीय होने जैसी खबरें आई हैं, तब ऐसे में TTP-JA का उक्‍त संदेश ट्विटर पर दिया जाना यह बताता है कि उनके असली मकसद कुछ और है ।
पाकिस्‍तान में बताये गये TTP-JA के कथित शांति वाले मुखौटे के पीछे उनका मकसद आईएस की भांति खबरों में रहने के लिए दहशत फैलाना ही है। ज़ाहिर है कि दहशत फैलाने वाले संगठन अब हताशा से घिरे हुए हैं।  यदि वो हताश न होते तो कश्‍मीर की कथित आजादी के लिए तब घड़ियाली आंसू न बहाते जब वहां बाढ़ की विभीषिका से लोग जूझ रहे थे। उन्‍हें कश्‍मीर की चिंता होती तो वे अपना राहत कार्य चलाते, बाढ़ में सब-कुछ बहा चुके परिवारों के आंसू पोंछते। ट्विटर पर आये ये संदेश बताते हैं कि राहत कार्य से जी चुराना व कश्‍मीर के विकास की बात को सिरे से नकार कर उनके नापाक इरादे नाकाम हुए और इसी नाकामी से उभरी है ये ट्विटरीय हताशा।
हकीकत तो यह है कि अल-कायदा हो या आईएस अथवा भारत में स्‍लीपर मॉड्यूल के रूप में पलने वाले आतंकवादी, सबके सब अब यह बाखूबी जान गये हैं कि मौजूदा भारतीय कूटनीति उनके वजूद को हमेशा हमेशा के लिए मिटा सकती है, और इसी हताशा में वे अब हर वो माध्‍यम इस्‍तेमाल कर रहे हैं जिससे ये जाहिर भी ना हो कि वे भयभीत हो रहे हैं और उनकी उपस्‍थिति का अंदाजा भी होता रहे। उनके इन्‍हीं माध्‍यमों में स्‍लीपर मॉड्यूल के साथ साथ अब महिलाओं और बच्‍चों को भी इस्‍तेमाल किया जा रहा है।
आतंकी संगठनों में ये हताशा आने की वजह एक खबर और भी है। वो ये कि अभी दो दिन पहले ही खबर आई कि पीओके (पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर) के वाशिंदे वापस भारत के साथ जुड़ने का मन बना रहे हैं।
शांति एवं सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए काम करने वाला मुस्लिम संगठन अंजुमन मिन्हाज ए रसूल के अध्यक्ष मौलाना सैयद अतहर देहलवी के अनुसार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अगर जनमत संग्रह होता है तो 99 फीसदी से ज्यादा लोग भारत का हिस्सा बनने के लिए वोट देंगे। जम्मू-कश्मीर के बाढ़ प्रभावित इलाकों के पांच दिवसीय दौरे के बाद स्‍थानीय लोगों की मंशा बताते हुए देहलवी ने कहा कि कश्मीर में अलगाववादियों का आधार खत्म हो गया है और घाटी के लोग सुशासन, विकास और शिक्षा जैसे मुद्दों पर बात कर रहे हैं, उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि मुट्ठी भर लोग क्या कहते हैं। बाढ़ प्रभावित लोगों ने सेना द्वारा चलाए गए राहत एवं बचाव कार्यों की प्रशंसा व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी जम्मू-कश्मीर एवं देश में ‘लोक समर्थक’ नीतियों की प्रशंसा से आतंकी संगठन घबरा गये हैं।
गौरतलब है कि अंजुमन-ए-रसूल ही एकमात्र इस्लामी संगठन है जिसने अलकायदा एवं अन्य आतंकवादी समूहों के खिलाफ आवाज उठाई और जब कश्मीरी पंडितों को जबरन कश्मीर से बाहर किया गया तो जेद्दा में ओआईसी में आपत्ति जताई थी।
बहरहाल, जम्‍मू कश्‍मीर की राजनैतिक परिस्‍थितियां क्‍या रहती हैं...वहां बाढ़ के बाद के हालात क्‍या घाटी को फिर से वो रौनक वापस दे पायेंगे या नहीं, ये तो समय ही बतायेगा मगर इतना अवश्‍य है कि भारतीय प्रशासनिक सुदृढ़ता और नरेंद्र मोदी की राजनैतिक व सांगठनिक कुशलता ने भारत के विरुद्ध सोचने वालों व आतंकवादियों
के हौसले इस हद तक पस्‍त कर दिये हैं कि अब उन्‍हें अपने बचाव का कोई रास्‍ता नज़र नहीं आ रहा। जिस कश्‍मीर पर उनकी सारी योजनायें टिकी होती थीं, अब उस कश्‍मीर सहित पीओके में भी दहशत के पांव उखड़ना और अब ये ट्विटर पर धमकी देना उनकी मनोदशा को बताता है कि उनकी सनक ने न केवल वाघा बॉर्डर पर इतने लोगों की जान ले ली बल्‍कि उनके जो भी आका या समर्थक हैं उन्‍हें भी आइना दिखाया है।
- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

कश्‍मीर में मुस्लिम महिलाएं दोबारा कर सकेंगी निकाह

श्रीनगर। 
जम्मू कश्मीर में पिछले कई सालों से गायब अपने पतियो का इंतजार कर रही महिलाओं को मुस्लिम धार्मिक गुरूओं ने बड़ी राहत दी है। उन्होंने गुरूवार को दिए एक फतवे में उन महिलाओं को दोबारा निकाह (शादी) करने की इजाजत दे दी है जिनके पति पिछले चार या उससे अधिक सालों से गायब हैं। दो दशक पहले घाटी में आतंक पनपना शुरू हुआ था जिसके कारण कई महिलाओं के पति गायब हो गए थे। ये धार्मिक धर्मगुरू ऎसी महिलाओं के दोबारा निकाह करने को लेकर आयोजित एक समारोह में हिस्सा लेने आए थे।
समारोह का आयोजन करने वाले गैर सरकारी संगठन "एहसास" के प्रमुख बशीर अहमद डार ने कहा कि धार्मिक गुरू इस बात के समर्थन में थे कि राज्य में पिछले दो दशक में आतंकी घटनाओं के कारण जिन महिलाओं के पति इस दौरान गायब हुए, वे गायब होने के चार साल बाद दोबारा निकाह कर सकेंगी।
मामले को लेकर तीन चरणों में चली मंत्रणा के बाद धार्मिक गुरू इस बात पर राजी हो गए कि जो महिलाएं दोबारा निकाह करना चाहती हैं, वे गायब होने के चार साल बाद ऎसा कर सकती हैं। ऎसे मामलों में संपत्ति को लेकर कोई भी फैसला पवित्र कोरान और हदीश में दिए गए नियमों के अनुसार लिया जाएगा।
देश में लागू मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 के तहत मुस्लिम कानून के तहत जिस महिला ने निकाह किया है, वह तलाक के लिए अर्जी दायर कर सकती है अगर उसका पति चार या उससे अधिक समय से गायब है। इस फतवे का महिलाओं ने खुलकर समर्थन किया है।