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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

बहुत कुछ कहती है अमेजॉन पर ब‍िक रही ये ऐश ट्रे


 शाद लखनवी का एक शेर है –

बुझ गई आतिश-ए-गुल देख तू ऐ दीदा-ए-तर
क्या सुलगता है जो पहलू में धुआँ है कुछ और…

ये शेर उस खबर पर पूरी तरह फ‍िट बैठता है जो अमेजॉन के मार्केट प्लेटफॉर्म से आई है, ऑनलाइन बाज़ार की सरताज बनी अमेजॉन पर एक ऐश ट्रे बिक रही थी, ऐश ट्रे की बनावट मह‍िलाओं का सरेआम अपमान करने के ल‍िए काफी थी, इसका ड‍िजाइन कुछ ऐसा था जैसे कोई औरत अपनी टांगें फैलाकर बैठी है और आप उसकी टांगों के बीच में सिगरेट बुझा सकते हैं। हालांक‍ि अब ‘संभवत:’ वह हटा ली गई है, मगर इस एक बात ने ये अवश्य बता द‍िया क‍ि मह‍िलाओं के शरीर की बनावट को लेकर जो मानस‍िकता अब भी बरकरार है, उसे बाज़ार में क‍िस क‍िस तरह भुनाया जा सकता है।

बानगी ही सही, परंतु अमेजॉन पर ब‍िक रही इस ऐश ट्रे की ड‍िजाइन से अंदाज़ा लगाया जा सकता है क‍ि स‍िगरेट पीने वाले व्यक्त‍ि के मन में उसे बुझाते हुए क्या व‍िचार उठते होंगे और उन व‍िचारों की पर‍िणत‍ि क‍िस क‍िस रूप में होने की संभावनायें रहती होंगी। देश के लगभग सभी मह‍िला अध‍िकारवादी संगठन जो क‍िसी बलात्कार की घटना पर ज़ार-ज़ार रोते हैं, ज‍िन्हें उसमें ‘दल‍ित… वंच‍ित…,अल्पसंख्यक…ल‍िंच‍िंग’ तक सब नज़र आ जाता है परंतु वे अपनी न‍िगाहें बाज़ार, मीड‍िया, समाचारपत्रों के ” इस हथकंडे” की ओर नहीं डालते। वे इस तरह से बाज़ार में परोसे जा रहे अपराध पर चुप क्यों हैं, क्या सारी ज‍िम्मेदारी सरकारों पर ही है, ये फ‍िर कानूनों के बहाने समस्या को टालने तक सीम‍ित है। क्या इसके ल‍िए समाज में चेतना लाना या आवाज़ उठाना इन संगठनों के ल‍िए ”लाभ” की श्रेणी में नहीं आता।

मह‍िलाओं के शरीर को द‍िखाने वाले ऑनलाइन बाज़ार हों या न्यूज़ मीड‍िया प्लेटफॉर्म्स, सभी वल्गैर‍िटी को भुनाने में लगे हैं। उन्हें ब‍िकनी में स्पॉट की गईं लगभग पूर्णत: न‍िर्वस्त्र अभ‍िनेत्र‍ियां ”हॉट” द‍िखाई देती हैं तो उस पर हुए ”क्ल‍िक” उन्हें बाज़ार की ऊंचाइयों तक ले जाते हैं। मह‍िलाओं के शरीर पर चल रहे इस बाज़ार का प्राइम फंडा ही ये है क‍ि ज्यादा क्ल‍िक ज्यादा रेवेन्यू…। अभी तक हम वल्गैर‍िटी के ल‍िए पॉर्न फ‍िल्म्स का कोसते थे, उन पर प्रत‍िबंध और कड़ी न‍िगाह रखते थे परंतु ये जो बाज़ार हथ‍ियाने के बहाने सरेआम न्यूड‍िटी को परोस रहे हैं, उनका क्या…?

यूं तो प्र‍िंट मीड‍िया भी यौन समस्याओं के बहाने वल्गैर‍िटी वाले व‍िज्ञापन सालों से न‍िकाल रहे हैं, ज‍िन्हें बड़े तो देखते ही हैं, क‍िशोर वर्ग के बच्चे भी देखते हैं… इन्हें देखकर वो क्या क्या सोचते होंगे , इसका अंदाज़ा बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है।

बात इतनी सी है क‍ि मह‍िला शरीर की बनावट और उसे अर्द्धन‍िर्वस्त्र अथवा न‍िर्वस्त्र द‍िखाकर आसानी से पैसे बना रहे इन प्लेटफॉर्म्स को स‍िर्फ और स‍िर्फ बाज़ार से मतलब है, उन्हें ना तो मह‍िलाओं के बहाने लगाई जाने वाली आत‍िशे-गुल से मतलब है और ना ही उससे आंखें सेंकने वाली उस बीमार मानस‍िकता से जो उनके शरीर तक सीम‍ित रहती है, और मौका-बेमौका उसे उधेड़ने से बाज़ नहीं आती। स्वच्छंद इंटरनेट वाले ज़माने में नई पीढ़ी तक ये क्या क्या कहर ढा जाएगा… इसे सोचकर ही डर लगता है।

कभी रोमांट‍िक अंदाज़ में आत‍िशे-गुल के ल‍िए हनीफ़ फ़ौक़ की ल‍िखी ये लाइनें क‍ि

”नालों ने ये बुलबुल के बड़ा काम किया है
अब आतिश-ए-गुल ही से चमन जलने लगा है…”

अब बदमज़ा हो रही हैं, फ‍िर भी बात खत्म न कीज‍िए, चर्चा कीज‍िए क‍ि हम कहां तक और क्या-क्या कर सकते हैं।

- अलकनंदा स‍िंंह