सोमवार, 29 जनवरी 2024

यव अर्थात् यौवन: धार्मिक अनुष्ठानों में 'जौ' का उपयोग और इसके न‍िह‍ितार्थ


 अमेरिका के मेडिसन राज्य में कृषि विभाग अनुसधान केंद्र में काम कर रहे एक वैज्ञानिक को उसके पाकिस्तानी पिता ने बताया था कि जिस क्षेत्र में वे ग्रामीणों का इलाज करते हैं, वहां दिल का दौरा पड़ना एक अप्रत्याश‍ित बात है। शायद ही किसी को दिल का कोई गम्भीर रोग हो। 

वैज्ञानिक डॉक्टर आसिफ कुरैशी के पिता पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक चिकित्सक थे। पिता के अनुसार वहां लोग बड़ी मात्रा में जौ खाते हैं क्योंकि यही उस इलाके का मुख्य अनाज है और यही इनके स्वास्थ्य का रहस्य है। कुरैशी अपने पिता के इस अनुभव को वैज्ञानिक स्तर पर सिद्ध करना चाहते थे और अमेरिका की इस प्रयोगशाला में जौ के गुणों की खोज करने लग गए।

यव अथवा जौ पाकिस्तान के पंजाब में ही नहीं, पूरे भारत के कई क्षेत्रों में लोगों का मुख्य भोजन हुआ करता था और आज भी भोजन का महत्त्वपूर्ण अंग है। दैनिक खाने में इस की कमी तभी से आने लगी जबसे जौ का एक और व्यावसायिक उपयोग मालूम हुआ अर्थात् बियर बनाना। जौ रसोई से हट कर शराबखाने में स्थापित हुआ। 

यह भारतखण्ड के प्राचीनतम अन्नों में से एक है, गेहूं से बहुत पुराना और शायद चावल से भी कुछ प्राचीन। इसीलिए हमारे धार्मिक अनुष्ठानों में चावल के साथ-साथ जौ का ही उपयोग होता रहा है। जौ पोषक आहार है, यह तो सभी जानते और मानते थे लेकिन वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में इतना पर्याप्त नहीं होता। 
वैज्ञानिक जानना चाहते हैं कि इसमें ऐसा क्या है जो इसे पोषक आहार बनाता है और यह भी कि जो रसायनिक पदार्थ इसमें हैं, वे काम किस प्रकार करते हैं।
डाक्टर कुरैशी को पता लगा कि कुछ खाद्य पदार्थ, विशेष कर जौ और जई जैसे अन्न जिगर में उस रासायनिक प्रक्रिया को दबाते हैं जिनसे रक्त में कोलस्ट्रोल पैदा होता है। 

दरअसल बताया जाता है कि अगर हम अपने यकृत के साथ जबरदस्ती करना छोड़ दे, तो हम अपने आपको दिल की बीमारी से भी बचा सकते हैं। अगर यकृत कम कोलेस्ट्रॉल बना ले तो जिन कोश‍िकाओं को रोगकारक एलडीएल की आवश्यकता होती है, वे रक्त से उसे खींच लेती हैं, यानी रक्त में इस प्रकार कोलेस्ट्रॉल एकदम कम हो जाता है। इसी विशेषता के कारण इस बीमारी की पहली औषधि– लोवस्टेटिन बनी। 

यकृत जब कोलेस्ट्रोल बनाने वाली फैक्ट्री में बदल जाता है तो इसकी गतिविधि को कम करना आवश्यक हो जाता है। यह जौ में मौजूद रसायानों के कारण हो सकता है। जब कोलेस्ट्रॉल बनाने वाली प्रक्रिया को धीमा कर दिया जाता है तो एलडीएल बनना बंद होता है और रक्त कोश‍िकाओं के नष्ट होने का खतरा भी समाप्त हो जाता है। डाक्टर आसिफ कुरेशी की यात्रा यहीं पर समाप्त हो गई।

आगे की यात्रा ‘डाक्टर फाइबर’ ने आरम्भ की। फाइबर उनका नाम नहीं था, मोटे अनाजों के फाइबर के बारे में उनके जुनून के कारण उनकी पहचान थी, नाम तो जेम्स एंडरसन था। उन्होंने भी ऐसी किसी बात का आविष्कार नहीं किया जिसके बारे में समाज नहीं जानता था। लोक में तो वह बात प्रचलित ही थी लेकिन कुरेशी की ही तरह एंडरसन ने उसे प्रयोगशाला में सही सिद्ध कर दिया। यह आश्चर्य की बात लगती है कि पिछले दो दशक से दुनिया भर में गंवारू तरह के मोटे अनाजों को इज्जत से देखा जाने लगा है। 

आज कल बीसियों तरह के खाद्य बाजार में मिलते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि उन में रेशा या फाइबर मिला हुआ है। एंडरसन को लगा कि मुख्य अनाज के अतिरिक्त कुछ तो और है जो कोलेस्ट्रोल बनाने की प्रक्रिया को थामता है। कई प्रकार के प्रयोगों के पश्चात उन्हें पता चला कि वह जौ और जई जैसे अनाजों की बाहरी परत है, जिसमें ऐसे गुण बहुतायत में पाए जाते हैं जो कोलेस्ट्रोल को रोकते हैं। वे वैज्ञानिक तो थे और उनके अनुसंधान का उद्देश्य तो जनहित ही था लेकिन उनके जुनून के पीछे उनका अपनी पीड़ा भी थी। वे रोगी थे, उनका रक्तचाप असाधारण तौर पर ऊंचा रहता था, लगभग 300 से ऊपर। उन्होंने पाया था कि जो लोग फाइबर समेत जौ और जई जैसे अनाजों का अधिक मात्रा में सेवन करते हैं, उनका न केवल कोलेस्ट्रोल ही नियंत्रण में होता बल्क‍ि वे और मायनों में भी अधिक स्वस्थ रहते हैं। उनकी उम्मीद थी कि अगर उस तत्त्व को खोज पाएं, जिसके कारण यह संभव होता है तो उनके रक्तचाप का भी इलाज होगा।

उन दिनों यानी वर्ष 1976 में एक कम्पनी जेई यानी ओटस का एक उत्पाद बडे पैमाने पर बेच रही थी जो कुत्ते बिल्ली जैसे पालतू जानवरों के खाने के लिए उपयोगी माना जाता था। एंडरसन ने उस कम्पनी क्वैकर ओटस कम्पनी को लिखा कि उन्हें जई की भूसी उपलब्ध कराएं। उन्हें मालूम था कि कम्पनी अपना व्यापारिक माल बनाते समय भूसी तो बचा कर रखते नहीं लेकिन उन्हें भी पता था कि जई की भूसी बर्तन की पैंदी में चिपक जाती है और कम्पनी जिन बड़े-बड़े पात्रों में अपना माल बनाती होगी, उनकी पैंदी से भूसी मिल ही जाएगी। हुआ भी वैसा ही।

कम्पनी ने एक बड़ा ड्रम भूसी का भेज ही दिया, जो 533 लोगों को एक बार खिलाई जा सकती थी या पच्चास व्यक्तियों को दस-ग्यारह बार लेकिन इसकी आधी तो एंडरसन ने स्वयं ही खा डाली। कुछ समय पश्चात वे उत्साह में बोले, ‘ मेरा रक्तचाप कुछ ही सप्ताह मे 285 से 175 अंश तक गिर गया। 110 अंश नीचे। मैं शायद पहला मानव हूं जिसने जई की भूसी रक्तचाप कम करने के लिए खाई होगी।’
डाक्टर एंडरसन को यह नहीं पता था कि पूरब में यह बात लगभग हर ग्रामीण को मालूम थी, अलबत्ता वे रक्तचाप और कोलेस्ट्राल जैसी शब्दावली नहीं जानते थे। अनुसंधान की लम्बी यात्रा के पश्चात अब यह चिकित्सक जानते हैं कि जहां जौ सीधे-सीधे यकृत में ही कोलेस्ट्रोल बनाने की प्रक्रिया पर अंकुश लगाता है, वहीं जई की भूसी अंतड़ियों में कुछ रासायनिक पदार्थों में बदल कर आंतों से बाइल के एसिडों को धो डालता है। अगर ऐसा न होता तो ये एसिड जो आंतों में बनते हैं, अंत में कोलेस्ट्राल में बदल जाते हैं। 

ठीक इसी आधार पर प्रसिद्ध ऐलेापैथिक औषधि कोलेस्टाइरामाइन भी आंतों को सफाई करके रोग का इलाज करती है।

इन वैज्ञानिकों और दूसरे शोधकर्ताओं के शोध से एक बात साफ तौर पर समझ में आनी चाहिए कि निरामिष यानी केवल शाकाहारी भोजन करने भर से ही कुछ रोगों का हम उतनी कुशलता के साथ सामना कर सकते हैं, जितनी कुशलता की हम आधुनिकतम औषधियों से आशा करते हैं। केवल इतना ही नहीं, प्राकृतिक आहार के कारण लगातार हमारे शरीर में ऐसे सक्रिय औषधीय गुणों से युक्त पदार्थों को आहार के रूप में नियमित तौर पर लेते रहते हैं जो अनेक रोगों को आरम्भ ही नहीं होने देते। निरामिष आहार करने वाले समाजों के दीर्घजीवी होने का बस यही रहस्य है। जौ और जेई की भूसी से बना आहार विशेष रूप से उन लोगों के लिए वरदान साबित हो सकता है जिनको आंतों की गम्भीर बीमारियों जैसे कैंसर आदि का खतरा रहता है।

रविवार, 21 जनवरी 2024

रामलला मूर्ति की प्राण-प्रतिष्‍ठा: शुभ घड़ी आई... 50 वाद्ययंत्रों द्वारा 2 घंटे तक गूंजेगी मंगल ध्‍वनि


 रामलला की मूर्ति के प्राण-प्रतिष्‍ठा आयोजन को भव्‍य, दिव्‍य और नव्‍य बनाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जा रहा है. इसी के तहत देश के विभिन्‍न राज्‍यों से आए 50 से ज्‍यादा वाद्य यंत्र की मंगल घ्‍वनि गूंजेगी.  

22 जनवरी को देश दिवाली मनाने जा रहा है. देश ही नहीं विदेशों से भी रामलला के लिए बेशकीमती तोहफे आए हैं. साथ ही प्राण-प्रतिष्‍ठा कार्यक्रम के ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने के लिए रामभक्‍तों का अयोध्‍या पहुंचने का सिलसिला जारी है. पूरी अयोध्‍या नगरी सजकर तैयार है. 22 जनवरी को जब रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्‍ठा होगी, उससे 2 घंटे पहले से ही राम मंदिर परिसर में मंगल ध्‍वनि गूंजने लगेगी. वैदिक मंत्रोच्‍चार के साथ-साथ देश के तमाम राज्‍यो से आए 50 से ज्‍यादा शुभ वाद्य यंत्र भी बजाए जाएंगे. कह सकते हैं कि यह मंगल ध्‍वनि, मंत्रोच्‍चार, पूजा-पाठ आदि पूरे माहौल को एक अनोखी दिव्‍यता देंगे. 

मनमोहक मंगल ध्‍वनि 
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने रविवार को घोषणा की है कि प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दिन मंगल ध्वनि का कार्यक्रम भी होगा. यह एक मनमोहक संगीत कार्यक्रम होगा, जिसमें विभिन्न राज्यों से आए 50 से अधिक उत्कृष्ट वाद्ययंत्र इस शुभ मौके पर एक साथ बजाए जाएंगे. करीब 2 घंटे तक यह मंगल ध्‍वनि गूजेगी. इस मांगलिक संगीत कार्यक्रम के परिकल्पनाकार और संयोजक यतीन्द्र मिश्र हैं, जो प्रख्यात लेखक, अयोध्या संस्कृति के जानकार और कलाविद हैं. वहीं इस कार्यक्रम में केंद्रीय संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली भी सहयोग दे रही है. 
 
मुहूर्त से ठीक पहले होगा वादन

श्रीरामजन्मभूमि प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के ऐतिहासिक मौके पर मुख्‍य मुहूर्त से पहले सुबह 10 बजे से ही करीब 2 घंटे तक 'मंगल ध्वनि का आयोजन किया जाएगा. श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बताया कि हमारी भारतीय संस्कृति की परम्परा में किसी भी शुभ कार्य, अनुष्ठान, पर्व के अवसर पर देवता के सम्मुख आनन्द और मंगल के लिए पारम्परिक ढंग से मंगल- ध्वनि बजाने का विधान है.

इसे लेकर ट्रस्‍ट ने पोस्‍ट में लिखा है- 'भक्ति में डूबे हुए, अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर प्राण प्रतिष्ठा का समारोह सुबह 10 बजे राजसी 'मंगल ध्वनि' से सुशोभित होगा. विभिन्न राज्यों के 50 से अधिक उत्कृष्ट वाद्ययंत्र इस शुभ अवसर पर एक साथ बजेंगे और लगभग दो घंटे तक गूंजते रहेंगे. विभिन्न राज्यों के ये अनोखे वाद्य यंत्र, दिव्य आर्केस्ट्रा में एकजुट होंगे. इससे भारत की सदियों पुरानी परंपराओं को अपनाने और पुनर्जीवित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है."

- Alaknanda Singh 

बुधवार, 3 जनवरी 2024

यह आपके ल‍िए काम की खबर है, FSSAI क्वालिटी को लेकर क्यों कर रहा है 'चाय पर चर्चा', जान‍िए

 


 


बात सर्दी की हो या क‍ि गर्मी का मौसम, कम से कम मुझे तो चाय हर मौसम में चाह‍िए... इसल‍िए मेरी तरह हो सकता है क‍ि आप भी इस सांवली सलोनी रंगत वाले पेय के मुरीद हों परंतु ये खबर हमें चौंका रही है. 

आप भी जान लीज‍िए क‍ि सर्दियों में हम सभी चाय में गर्माहट ढूंढते हैं लेकिन मिलावट कहां, कैसे मिल जाए, ये कोई नहीं कह सकता. देशभर से चाय की पत्तियों के लिए गए सैंपलों फूड रेगुलेटर FSSAI को न जाने क्या-क्या मिला है. फूड रेगुलेटर क्वालिटी को लेकर 'चाय पर चर्चा' कर रहा है. 

दरअसल, इसी महीने के मध्य में इंडस्ट्री, रेगुलेटर, उपभोक्ता मामले मंत्रालय की इस मुद्दे पर बैठक होने वाली है, जिसमें चाय की पत्तियों में मिलावट के खिलाफ कदम उठाए जाएंगे.

FSSAI देशभर से जुटाए सैंपल की जांच कर रहा है. नियामक ने अक्टूबर माह में इंडस्ट्री, एसोसिएशन और अन्य स्टेकहोल्डर्स से चर्चा की थी. फूड रेगुलेटर की जांच आखिरी दौर में चल रही है. 

FSSAI की जांच में 50% से अधिक सैंपल मानक पर खरे नहीं उतरे हैं. देशभर से ये सैंपल इकट्ठा किए गए थे. चाय सैंपल में भारी मेटल, कलर, डस्ट की मिलावट मिली है. कई सैंपल में प्रॉसेस की हुई Used Tea मिली है. ऊपर से फ्लेवर्ड चाय के नाम पर कई तरह की विसंगतियां देखने को मिली हैं.

उधर, चाय की पैदावार बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में कीटनाशक का प्रयोग हो रहा है. मई महीने में 5 पेस्टीसाइड्स emamectin, benzoate, fenpyroximate, hexaconazole, propiconazole, & quinalphos के मिनिमम रेसिड्यू लेवल को लेकर नोटिफिकेशन भी जारी किया गया था. 

आख‍िर  FSSAI क्यों हुआ इतना सक्र‍िय 

भारत में घरेलू आबादी देश में उत्पादित कुल चाय का लगभग 76 प्रतिशत उपभोग करती है. इतनी बड़ी चाय पीने वाली आबादी के बीच चाय में मिलावट की खबरें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. निर्माताओं द्वारा काजू के बाहरी आवरण को जलने तक भूनकर नकली चाय पाउडर बनाने की कई शिकायतें सामने आई हैं. फिर इसे गुणवत्तापूर्ण चाय पाउडर के साथ मिलाया जाता है. अक्सर, निर्माता चाय में प्रतिबंधित रंग भी मिलाते हैं.

इस साल अगस्त में, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने कोयंबटूर से 1.5 टन मिलावटी चाय की धूल जब्त की थी. एफएसएसएआई के नामित अधिकारी के. तमिलसेल्वन ने कहा, “हमने जो 500 ग्राम चाय की धूल के पैकेट जब्त किए उनमें से कुछ में 50 ग्राम चाय की धूल के पाउच में उच्च मात्रा में कलरेंट मिला हुआ था. इस पाउच को गाढ़ा रंग पाने के लिए असली चाय के बुरादे के साथ मिलाया जाना था. कई अन्य पैकेटों में चाय की धूल थी जो रंगों के साथ मिश्रित थी और उपयोग के लिए तैयार थी.

चाय पर FSSAI 2011 विनियमन 2.10.1 (1) में उल्लेख है, "उत्पाद बाहरी पदार्थ, अतिरिक्त रंगीन पदार्थ और हानिकारक पदार्थों से मुक्त होगा. इस साल अक्टूबर में, FSSAI ने असम की एक चाय फैक्ट्री से लाए गए नमूनों की जांच की, तो उन्हें एक पीले रंग का पदार्थ, टार्ट्राज़िन मिला, जिसमें कैंसरकारी गुण पाए गए हैं.

उत्पाद संस्करण में शुद्ध चाय की लोकप्रियता और स्थायित्व के कारण, केवल चाय की खपत को देखने या बेचने से यह पता चलता है कि यह वास्तविक या नकली है. हालांकि, कुछ तरीके हैं जिनसे आप रैना के बारे में पता लगा सकते हैं.

तो आप अंतर कैसे पता कर सकते हैं? 

कैसे पता करें कि चाय को तारकोल के साथ कैसे बनाया गया है

एक फिल्टर पेपर/ब्लॉटिंग पेपर पर कुछ चाय की दुकानें, उन पर थोड़ा सा पानी छिड़कें. एक बार हो जाने पर, चाय की दुकान के नीचे नल के पानी के नीचे कागज और फिल्टर पेपर हटा दिए गए. उन दागों का निरीक्षण करें जो प्रकाश के विपरीत छूट दिए गए हैं. अगर चाय के अवशेष शुद्ध हैं तो फिल्टर पेपर पर दाग नहीं है और अगर आपकी चाय में तारकोल के रूप में उत्पाद है तो आप देखेंगे कि फिल्टर पेपर का रंग तुरंत बदल रहा है.

कैसे पता करें कि चाय की दुकान में आयरन भराव की व्यवस्था की गई है

इसके लिए आपको एक चुंबक की जरूरत पड़ेगी. एक कांच की प्लेट पर थोड़ी मात्रा में चाय की पत्तियां फैलाएं और चुंबक को चाय की पत्तियों के ऊपर धीरे से घुमाएं. चाय की पत्तियां शुद्ध होंगी तो चुंबक भी साफ होगा. हालांकि, मिलावट तब प्रकट होगी जब लोहे का भराव चुंबक से चिपक जाएगा.

ऐसे करें चाय का जल परीक्षण

चाय की शुद्धता जांचने का सबसे आसान तरीका एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच चाय की पत्तियां मिलाना है. सुनिश्चित करें कि पानी या तो ठंडा है या कमरे के तापमान पर है लेकिन गर्म नहीं है. अगर चाय शुद्ध होगी तो पानी के रंग में कोई बदलाव नहीं आएगा। अगर चाय की पत्तियों में कोई रंग मिला दिया जाए तो रंग तुरंत लाल हो जाएगा, इसलिए सावधान रहें.

चाय की पत्तियों में मिलावट का एक कारण यह है कि जहां एक किलो असली पत्तियों से लगभग 400 से 500 कप चाय बनती है, वहीं चाय की समान मात्रा के लिए कृत्रिम स्वाद और रंग मिलाने से यह संख्या लगभग दोगुनी होकर 800 से 1,000 कप के बीच हो सकती है.

आपके लिए यह जांचने का समय आ गया है कि आपकी चाय शुद्ध है या नहीं.