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रविवार, 2 जून 2013

तो फिर वनमानुष क्‍या बुरे हैं

ग्‍लोबलाइजेशन के इस दौर में जिस्‍म की नुमाइश को ही खुलेपन और आधुनिकता का पैमाना बना दिया गया है और इसके लिये मीडिया भी उतना ही दोषी है।
कुछ दिन पहले की बात है जब अलीगढ़ मुस्‍लिम यूनीवर्सिटी में कल कुलपति ने सभ्‍य दायरे में रह कर छात्राओं व छात्रों को यूनीवर्सिटी की रवायत के अनुसार लिबास पहनने हेतु एक खुला पत्र लिखा।
उन्‍हें यह इसलिए लिखना पड़ा क्‍यों कि छात्रायें खुलेपन की आड़ में मात्र अपनी नुमाइश करने लगीं थीं, अराजकत तत्‍वों ने आयेदिन बवाल करना शुरू कर दिया। दु:ख तो इस बात का था कि इस अनुशासनात्‍मक पत्र की खबर पर स्‍थानीय अखबार चिल्‍लाने लगे कि ड्रेस कोड... ड्रेस कोड...लड़कियों की आज़ादी पर प्रश्‍नचिन्‍ह... आदि आदि ....।
अब बताइये आखिर हम किस सभ्‍यता और किस तरक्‍की की बात कर रहे हैं।  हम चांद पर जाने का उदाहरण  देते रहते हैं मगर संस्‍कारों की कब्र खोदते  जा रहे हैं । खयालातों  की तरक्‍की के इतर अगर कम कपड़े पहनना ही आधुनिकता का मापदंड है तो फिर वनमानुष क्‍या बुरे हैं।  
इसी विषय पर बकौल शायर.....
मंज़िल उन्‍हें ही मिलती है जिनके सपनों में जान होती है
परों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है।
एएमयू के कुलपति के आदेशों को देखते हुये इस शेर के संदर्भ में ये कहा जा सकता है कि बस इन परों के हौसलों का डायरेक्‍शन सही करना होगा।
- अलकनंदा सिंह


गुरुवार, 30 मई 2013

पत्रकारिता दिवस: मूकं करोति वाचालं..

आज 30 मई यानि पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारों के लिए ही प्रार्थना की सर्वाधिक ज़रूरत महसूस की जा रही है, और हो भी क्‍यों ना।
केंद्र सरकार से लेकर राज्‍य सरकारें तक और राजनैतिक दलों से लेकर कॉरपोरेट घरानों तक पत्रकारों को अपने हिसाब से तोड़ने मोड़ने में लगे हैं। सौदेबाजी का बड़ा घातक दौर चल रहा है और लगभग दो दशक पहले ही मिशन से प्रोफेशन में तब्‍दील हुई पत्रकारिता को बाजारवाद बड़ी तेजी से निगलता जा रहा है । नतीजतन दूसरों की खबर रखने वाले खबरनवीसों के स्‍वयं खबर बन जाने का खतरा बढ़ गया है।
पत्रकारिता के लिए चुनौती के रूप में ताजातरीन कुछ मामले ऐसे सामने आये हैं जिन्‍होंने बतौर मीडियापर्सन 'मीडिएटर' बने पत्रकारों को अपनी भूमिका पर यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि.... अब बस! बहुत हो चुका...।
इन मामलों में सबसे ताजा हैं कल की ही दो घटनाएं...