मंगलवार, 31 जनवरी 2017

कविता से राग तक- वसंत ही वसंत

सुबह उठने के साथ ही एक नई खुश्‍बू तैर जाती है पूरे वातावरण  में, ऋतुराज वसंत अपने आगमन की सूचना देता है, कल एक  फरवरी को माघ महीने की शुक्‍ल पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी  है-वसंत के प्रारंभ का दिन, वाग्‍देवी सरस्‍वती की आराधना का  दिन।
बचपन में पढ़ी कवि सोहनलाल द्विवेदी की रचना ''आया वसंत  आया वसंत'', याद आ रही है जिसे स्‍कूल में सुना सुनाकर ना  जाने कितने ईनाम हासिल किए थे।

कविता यूं है-
आया वसंत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन बन,
सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत
आया वसंत आया वसंत।

भौरे गाते हैं नया गान,
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाये नित वसंत।

दादी, नानी और मां से सुनीं कई पौराणिक कथाओं में कामदेव का  पुत्र कहा गया है वसंत को, कामना- सौंदर्य-प्रसन्‍नता का उदाहरण,  कवियों ने वसंत ऋतु का वर्णन कुछ यूं किया है कि रूप व सौंदर्य  के देवता कामदेव के घर पुत्रोत्पत्ति का समाचार पाते ही प्रकृति  झूम उठती है। पेड़ उसके लिए नए पत्‍तों का पालना डाल कर  झुलाते हैं, वस्त्र की जगह फूल श्रंगार होता है, पवन झूलना  झुलाती है और कोयल उसे गीत सुनाकर बहलाती है।
अब इन कथाओं को याद करती हूं तो समझ में आता है कि उक्‍त  विवरण एक रूपक की तरह इस्‍तेमाल किया गया है परंतु इन  श्रुतियों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि ऋतुराज की  मादकता ही इस रूपक को प्रयोग करने पर बाध्‍य कर देती रही  होगी।
ये ऋतुराज का ही प्रभाव है कि भारतीय संगीत, साहित्य और  कला में इसे अलग व महत्वपूर्ण स्थान दिया गया और एक  विशेष ''राग वसंत'' की रचना हुई। वसंत पंचमी से ही होली का  आरंभ हो जाता है इसलिए आरोह में पाँच तथा अवरोह में सात  स्वरों से सजे इस राग के तहत होलियां बहुत गाई जाती हैं। पहले  संगीत प्रथा थी कि इसे रात के अंतिम प्रहर में गाया जाना चाहिए  किंतु आजकल ये कोई बंदिश नहीं रही सो यह दिन या रात में  किसी समय भी गाया बजाया जा सकता है। यूं तो रागमाला में  इसे राग हिंडोल का पुत्र माना गया है और यह पूर्वी थाट का राग  है। शास्त्रों की बात करें तो राग वसंत हिंडोल इससे काफी मिलता  जुलता है।

क्‍लासिकल म्‍यूजिक के छात्र बता सकते हैं कि इसका अध्‍ययन  करते समय एक दोहा गुरू जी अक्‍सर रटाते रहे हैं-

"दो मध्यम कोमल ऋषभ चढ़त न पंचम कीन्ह।
स-म वादी संवादी ते, यह बसंत कह दीन्ह॥'

वसंत के इस मनभावन मौसम की कविता से राग तक फैली ना  जाने कितनी यादें हैं जो बचपन में घर- स्‍कूल और युवा होने पर  कॉलेज से चलकर दौड़ती हुई आ रही हैं और आज फिर मेरे मन  को झंकृत कर रही हैं।

वसंत के बहाने होली की दस्‍तक होते ही हम ब्रजवासी तो होली  की सुगबुगाहट से ही वासंती हुए जाते हैं। अब मंदिरों तक सिमटे  धमार ताल में गाए जाने वाले होली पद गायन का आनंद लेने की  बारी है। चलिए मन को ''वृंदावन'' करते हैं और सभी को वासंती  मौसम की धनक, धमक और धसक का परिचय कराते हैं।
कल से ही होली का त्योहार शुरू होने के कारण पहली बार गुलाल  उड़ाया जाएगा और फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाएगा।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 22 जनवरी 2017

JLF से आया संस्‍कृत को बचाने वाले "हनुमानों" के लिए शुभ संदेश


कल जयपुर लिटरेचर फेस्‍टीवल के तीसरे दिन शनिवार को भाषाओं की जननी संस्‍कृत को लेकर भी सेशन '' द प्‍लेजर एंड परफेक्‍शन ऑफ संस्‍कृत'' हुआ , डिस्‍कशन के शीर्षक को लेकर रामचरित मानस की एक चौपाई याद आ रही है----किष्‍किंधा कांड में वर्णित है कि हनुमान को लंका जाकर सिया की खोज के लिए भेजने को जामवंत द्वारा उन्‍हें उनका बल याद दिलाया गया-- 

''कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा।
सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥''

यहां तो खालिस अवधी भाषा में जामवंत ने हनुमान जी को उनका बल याद दिलाया और उन्‍हें याद आ भी गया तो फौरन वो पर्बताकार हो भी गए। मगर यहां तो हमें हमारा बल याद दिलाने के लिए अंग्रेजों को आगे आना पड़ रहा है।

जो संस्‍कृत देववाणी के रूप में हमारे सभी वेदों-शास्‍त्रों और पुराणों की भाषा रही आज उसी पर परिचर्चा करने के लिए हमें अंग्रेजी शीर्षक का सहारा लेना पड़ रहा है। हमें हमारी ही जननी से परिचय कोई थर्ड पार्टी कराए, यह लज्‍जाजनक तो है ना। संस्‍कृत का यह बद-हाल आजादी के बाद से अब तक रही कमजोर राजनैतिक इच्‍छाशक्‍ति और तथाकथित गैर मुल्‍कों से आयातित राजनैतिक विचारधाराओं को (कभी जबरन तो कभी अत्‍याधुनिक कहलाए जाने के लालच में) अपनाए जाने की वजह से भी हुआ।
चलो देर आयद दुरुस्‍त आयद, यदि आज भी किसी शीर्षक अंग्रेजी में ना होता तो जयपुर तो छोड़िए किसी भी लिटरेचर फेस्‍टीवल में संस्‍कृत पढ़ना का किसी ''पोंगापंथी'' की भेंट चढ़ चुका होता। ''एज ए रिजल्‍ट'' हमें हमारी जननी भाषा के  सुनहरे शब्‍द फिर से अस्‍तित्‍व में आते दिख रहे हैं।

सराहनीय हैं ये प्रयास भी
कुछ दिन पहले एक वीडियो देखा जिसमें प्रारंभिक शिक्षा प्राप्‍त कर रहे बच्‍चों को वेदमंत्रों का अध्‍ययन संगीतमय वातावरण में कराया जा रहा है। ये सिर्फ संगीतमय बनाकर ही नहीं बल्‍कि प्रत्‍येक श्‍लोक में मौजूद शब्‍दों का एक निश्‍चित साइन होता है जो शब्‍द को खास ध्‍वनि के साथ मिलाकर धुन की रचना करता है और बच्‍चे इसी धुन पर गा गा कर सभी श्‍लोकों को बड़ी आसानी से याद भी कर लेते हैं।
बचपन में आपने भी सुना-देखा या फिर पढ़ा भी होगा कि संस्‍कृत के रूप-वचन किस तरह याद कराए  जाते थे।
व्‍याकरण के आधार क्रियाओं को भी लगभग धुन में याद कराया जाता था और कक्षा में सुना भी जाता था- ''कर्ता ने कर्म को करण से संप्रदान के लिए.....'' अब याद आया कि स्‍कूल में शास्‍त्री जी कैसे याद कराते थे। 

बहरहाल उक्‍त वीडियो के बारे में पता करते करते एक और ठिया पता चला और वह है दक्षिण भारत कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के मट्टूर गांव, जिसे लोग संस्‍कृत गांव के नाम से भी पुकारते हैं। इस गांव की आबादी का संस्कृत बोलना तो आश्चर्यजनक है ही इसके अलावा भी यहां कि एक खासियत और है यहां हर घर में एक इंजीनियर है। ये सौ फीसदी सच है जो इस गांव को सबसे अलग और आश्चर्यजनक बनाता है।
तुंगा नदी के किनारे बसे इस छोटे से गांव के लोग आम जीवन में संस्कृत का प्रयोग नहीं करते लेकिन इच्छुक व्यक्ति को संस्कृत सिखाने के लिये हमेशा तत्पर रहते हैं।

संस्कृत सीखने से गणित और तर्कशास्त्र का ज्ञान बढ़ता है और दोनों विषय बड़ी आसानी से समझ आ जाते हैं। यही कारण है कि इस गांव के युवाओं का रुझान धीरे-धीरे आईटी इंजीनियर की ओर हो गया और आज यहां घर-घर में इंजीनियर है।

पोंगापंथी की भाषा बताई जाने वाली संस्‍कृत में जप और वेदों के ज्ञान से स्मरण शक्ति बढ़ती है और ध्यान लगाने में मदद मिलती है। गांव के कई युवा एमबीबीएस या इंजीनियरिंग के लिए विदेश भी जाते हैं।

क्‍यों है संस्‍कृत अद्भुत
संस्‍कृत में आकृति और ध्वनि का आपस में संबंध होता है। उदाहरण के लिए अंग्रेजी में अगर आप ‘son’ या ‘sun’ का उच्चारण करें, तो ये दोनों एक जैसे सुनाई देंगे, बस वर्तनी में ये अलग हैं। आप जो लिखते हैं, वह मानदंड नहीं है, मानदंड तो वह ''ध्वनि'' है क्योंकि आधुनिक विज्ञान यह साबित कर चुका है कि पूरा अस्तित्व ऊर्जा की गूंज है।
जहां कहीं भी कंपन है, वहां ध्वनि है, हमारा पूरा अस्तित्व ध्वनि ऊर्जा से जुड़ा है इसीलिए एक खास ध्वनि एक खास आकृति के साथ जुड़ती है तो यही ध्वनि उस आकृति के लिए नाम बन जाती है। अब ध्वनि और आकृति आपस में जुड़ गईं। इसमें ध्वनि का उच्चारण करते हुए आकृति की ही चर्चा होती ही है। अर्थात् न केवल मनोवैज्ञानिक रूप से बल्कि अस्तित्वगत रूप से भी आप आकृति को ध्वनि से जोड़ रहे हैं। अगर ध्वनि पर आपको महारत हासिल है, तो आकृति पर भी आपको महारत हासिल होगी। तो संस्कृत भाषा हमारे अस्तित्व की रूपरेखा है। जो कुछ भी आकृति में है, हमने उसे ध्वनि में परिवर्तित कर दिंया।
आजकल इस मामले में बहुत ज्यादा विकृति आ गई है। यह एक चुनौती है कि मौजूदा दौर में इस भाषा को संरक्षित कैसे रखा जाए। इसकी वजह यह है कि इसके लिए जरूरी ज्ञान, समझ और जागरूकता की काफी कमी है।
यही वजह है कि जब लोगों को संस्कृत भाषा पढ़ाई जाती है, तो उसे रटाया जाता है। लोग शब्दों का बार बार उच्चारण करते हैं। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उन्हें इसका मतलब समझ आता है या नहीं, लेकिन ध्वनि महत्वपूर्ण है, अर्थ नहीं।
अर्थ तो आपके दिमाग में बनते हैं। यह ध्वनि और आकृति ही हैं जो आपस में जुड़ रही हैं। आप जोड़ रहे हैं या नहीं, सवाल यही है।
तो संस्कृत भाषा इस तरह से बनी, इसीलिए इसका महत्व है और इसलिए यह तमिल को छोडक़र लगभग सभी भारतीय और यूरोपीय भाषाओं की जननी है। तमिल संस्कृत से नहीं आती। यह स्वतंत्र तौर से विकसित हुई है। आमतौर पर ऐसा भी माना जाता है कि तमिल संस्कृत से भी प्राचीन भाषा है। बाकी सभी भारतीय भाषाओं और लगभग सभी यूरोपीय भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत से ही हुई है।

कुल मिला कर बात इतनी सी है कि लिटरेचर फेस्‍टीवल में परिचर्चा में शामिल एसपी भट्ट, सुधा गोपालकृष्‍णन और संस्‍कृत के विदेश विद्वान जिम मेलिन्‍सन का धन्‍यवाद देना चाहिए कि उन्‍होंने हमारी जननी भाषा के लिए ये प्रयास किए। 1000 साल से भी ज्‍यादा समय से संस्‍कृत को सिर्फ ब्राह्मणों की भाषा के तौर प्रचारित कर करके इसे सीमाओं में बांध दिया गया और इसके अध्‍ययनकर्ताओं को पोंगापंथी कह कर सोच के आधार पर ''पिछड़ा'' वर्ग में डाल दिया गया।
बावजूद इसके दक्षिण भारत कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के मट्टूर गांव के निवासी हों या लिटरेचर फेस्‍टीवल में शामिल होने आए संस्‍कृत के राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय विद्वान, सभी ने जामवंत की भांति आम भारतीय भाषा को फिर उसी ऊंचाई पर ले जाने वाले ''हनुमानों'' को उनका बल याद  दिलाया है। यह एक शुभ संकेत है और शुभ ये भी है कि पहली बार कहा गया है कि इसमें सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संस्‍कृत के महिमामयी प्रतिष्‍ठापन में भाषाविदों का सहयोग करें।

- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 16 जनवरी 2017

अपभ्रंशित रूप में डरा रहे हैं मथुरा के चतुर्वेदी परिवारों के संस्‍कार

मानवीय व्‍यवहार की जटिलता पर बड़े-बड़े शोध करने वाले मनोवैज्ञानिकों के लिए एक सरल साधन (माध्‍यम)  हो सकते हैं हमारे लोक जीवन के रीति रिवाज और संस्‍कार।
लोक जीवन में बच्‍चे के जन्‍म से लेकर वृद्धावस्‍था तक इतने कायदे-कानून बिखरे पड़े हैं कि हर एक का जस का तस पालन कर लेना अनेक सीख दे जाता है।
साथ  ही इन्‍हीं परंपराओं और रीतियों-रिवाजों का स्‍याह पहलू भी है ,  वि  यह  है कि ये तकरीबन सब की सब अब अपने अपभ्रंश रूप में हमारे जीवन में मर्यादा व अनुकूलन कम,बल्‍कि  खीझ अधिक लाने लगी हैं।

वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध अच्‍छी रीति को भी अपभ्रंशित रूप दुष्‍परिणाम देने लगे हैं। समृद्ध और प्रगतिवादी सोच रखने वाला मथुरा का चतुर्वेद समाज ऐसी ही कुछ कुरीतियों के चंगुल में फंसता जा रहा है और ऐसी कुरीतियों को बढ़ाने में महिलाओं का बड़ा हाथ है। इस समाज में आज भी दहेजरहित विवाह होते हैं, आज भी लड़की अपनी पसंद नापसंदगी को जाहिर कर सकती है। आज भी छेड़खानी, चोरी , छीनाझपटी, हत्‍या या ऐसे कोई भी अपराध चौबियापाड़ा में ना के बराबर होते हैं। संकरी गलियां आज भी सुरक्षा की दृष्‍टि से अभेद्य मानी जाती हैं। आज भी पूरा समाज आपसी झगड़े झंझट मिलबांटकर सुलझाा लेता है। ऐसे समाज में यदि कुरीतियां सिर उठाने लगें तो समाज की आगामी दशा का  अंदाजा लगाया जा सकता है।

चूं कि मथुरा के चतुर्वेदी परिवार में मेरा ससुराल है, तो एक कुटुंबीजन की मृत्‍यु के बाद पिछले 13  दिनों से रीति-रिवाजों और संस्‍कारों का जो नाटकीय रूप यहां देखने को मिला, उसने सनातन धर्म में जीवन की मर्यादाओं का महत्‍व बताने वाली सारी विधियों-सारे नियमों की जिस तरह धज्‍जियां बिखेरीं, वह बताती हैं कि कुछ भी शाश्‍वत नहीं। ना ही कोई धर्म और ना उसकी मर्यादाएं। हम ही धर्म बनाते हैं और हम ही उसे ज़मींदोज भी करते  जाते  हैं, अपने कृत्‍यों से ।
इन 13 दिनों में मानवीय व्‍यवहार की वीभत्‍सता अपने चरम पर देखने को मिली।रिश्‍तों का खोखलापन , आधा अधूरा अपनापन के साथ  कुछ रीतियां तो ऐसी देखीं कि मैं स्‍वयं को लिखने से रोक ना सकी।

कृष्‍ण के सखा रूप में प्रसिद्ध ''मथुरा के चतुर्वेदी'' स्‍वयं को ब्राह्मणों में ही सर्वोच्‍च 'मानते' हैं और यमुनापुत्र कहे जाते हैं। चारों वेदों के ज्ञाता माने जाते हैं और ये अधिकांशत: सत्‍य भी है। माथुर-चतुर्वेद समाज में जो अच्‍छी रीतियां हैं जैसे कि  महिलाओं को पुरुषों से अधिक अधिकार मिले हुए हैं। महिलायें ही रिश्‍ते कराने से लेकर शादी-ब्‍याह तक में सारी जिम्‍मेदारियों का वहन करती हैं। महिला का मायका पक्ष अन्‍य जाति व समाजों से इतर अपने पूरे अधिकार व दखल रखता है, यहां वह दोयम नहीं है।

पुरुषों में आज भी सनातन संस्‍कार पूरी तरह विद्यमान हैं, जिनमें एक है ''उपनयन संस्‍कार'' जिसका यथारूप में नई पीढ़ी द्वारा भी पूरी उम्रभर निभाया जाना, बेशक आज के भौतिकतावादी युग में आश्‍चर्य से कम नहीं वो भी तब जबकि आज नई पीढ़ी दुनिया के हर कोने में अपनी उपस्‍थिति दर्ज करा रही है। मगर  बात यहां भी वही है कि संतुलन गड़बड़ा गया है, महिलाओं को जो अधिकार मिले वह उनका दुरुपयोग करने लगीं। रीतियों  को निभाने में जो वैज्ञानिक तत्‍व मौजूद था ,वह अपने विकृत रूप में सामने आ रहा है।

इसी दुरुपयोग की बानगी है भोजन का अपव्‍यय। पिता की मृत्‍यु के बाद बेटे द्वारा दायित्‍व  निभाने के क्रम में सूतक के दौरान उसके लिए प्रतिदिन रसोई से जो भोजन निकाला जाता है, वह आज के  समय में 5 लोगों का भोजन हो सकता है। बेटे के खाने के बाद बचा हुआ भोजन यूं ही आवारा जानवरों, बंदरों व कुत्‍तों के लिए डाल दिया जाता है जिसे जानवरों द्वारा पूरी गली (अमूमन सारा समाज आज भी मथुरा के अंदरूनी क्षेत्र के पुश्‍तैनी घरों में निवास करता है) में बिखेर दिया जाता है, इस रिवाज को बदलने के फिलहाल दूर-दूर तक कोई आसार दिखाई नहीं देते। 13 दिन के बाद अर्थात् तेरहवीं हो जाने के बाद भी ये सिलसिला पूरे एक वर्ष तक चलता है, बस भोजन ग्रहणकर्ता बदल जाता है, वह कोई  ब्राह्मण या कोई बहन-बेटी-बुआ-भांजी या भांजा होता है मगर भोजन का दुरुपयोग जस का तस होता रहता है। ऐसे में जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवार और भी विपन्‍न होता जाता है। शायद इसीलिए पंजाबियों से ली गई एक कहावत चतुर्वेदी पुरुषों ने अपनाई भी है ”जिवते बात ना पुछ्छियां और मरे धड़धड़ पिट्टियां।  अर्थात् इस पूरे कर्मकांड में जो गरीब है उसका तो मरना हो जाता है ना।

सूतक की अवधि में साबुन, शैम्‍पू, तेल आदि प्रसाधन का प्रयोग वर्जित है, चाहे गंदगी से युक्‍त भोजन-कपड़े  कितना भी संक्रमित हो जाएं। तेरहवीं के संस्‍कार के बहाने मुझे जो मानवीय व्‍यवहार के कटु-किस्‍से सुनने को मिले उनका ज़िक्र फिर कभी करूंगी…कैसे…किस रूप में…यह अभी नहीं पता मगर करती रहूंगी ताकि एक संभ्रांत समाज अपने भीतर पल रही बुराइयों को दूर कर आत्‍मावलोकन तो कर सके।
संस्‍कारों को अपने हिसाब से चलाने की ”रीति” चतुर्वेदी महिलाओं की तमाम ''अच्‍छाइयों'' पर भारी पड़  रही है। डर है कि कहीं जेनेटिकली यानि विरासतों में मिली अच्‍छाइयां पूरे समाज के सुसंस्‍कारों को विपरीत दिशा में ना मोड़ दें और अपभ्रंशित समाज अपनी अनमोल विरासतों  को भूलने के लिए अभिशप्‍त ना हो जाए।
– सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

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