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रविवार, 17 जून 2018

Fathers Day पर पढ़िए अज्ञेय की कविता – चाय पीते हुए

कभी अज्ञेय ने कहा था- कि …चाय पीते हुए
हर साल जून के तीसरे रविवार को पूरी दुनिया में फादर्स डे मनाया जाता है। इस साल यह दिन 17 जून को सेलिब्रेट किया जा रहा है। पिछले साल 18 जून को फादर्स डे के रूप में मनाया गया था। इसी अवसर पर आप पढ़िए सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की अपने पिता के लिए लिखी गई एक कविता- चाय पीते हुए
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
चाय पीते हुए
मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।
आप ने कभी
चाय पीते हुए
पिता के बारे में सोचा है?
अच्छी बात नहीं है
पिताओं के बारे में सोचना।
अपनी कलई खुल जाती है।
हम कुछ दूसरे हो सकते थे।
पर सोच की कठिनाई यह है कि दिखा देता है
कि हम कुछ दूसरे हुए होते
तो पिता के अधिक निकट हुए होते
अधिक उन जैसे हुए होते।
कितनी दूर जाना होता है पिता से
पिता जैसा होने के लिए!
पिता भी
सवेरे चाय पीते थे।
क्या वह भी
पिता के बारे में सोचते थे –
निकट या दूर?
– अज्ञेय

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

कविता से राग तक- वसंत ही वसंत

सुबह उठने के साथ ही एक नई खुश्‍बू तैर जाती है पूरे वातावरण  में, ऋतुराज वसंत अपने आगमन की सूचना देता है, कल एक  फरवरी को माघ महीने की शुक्‍ल पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी  है-वसंत के प्रारंभ का दिन, वाग्‍देवी सरस्‍वती की आराधना का  दिन।
बचपन में पढ़ी कवि सोहनलाल द्विवेदी की रचना ''आया वसंत  आया वसंत'', याद आ रही है जिसे स्‍कूल में सुना सुनाकर ना  जाने कितने ईनाम हासिल किए थे।

कविता यूं है-
आया वसंत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन बन,
सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत
आया वसंत आया वसंत।

भौरे गाते हैं नया गान,
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाये नित वसंत।

दादी, नानी और मां से सुनीं कई पौराणिक कथाओं में कामदेव का  पुत्र कहा गया है वसंत को, कामना- सौंदर्य-प्रसन्‍नता का उदाहरण,  कवियों ने वसंत ऋतु का वर्णन कुछ यूं किया है कि रूप व सौंदर्य  के देवता कामदेव के घर पुत्रोत्पत्ति का समाचार पाते ही प्रकृति  झूम उठती है। पेड़ उसके लिए नए पत्‍तों का पालना डाल कर  झुलाते हैं, वस्त्र की जगह फूल श्रंगार होता है, पवन झूलना  झुलाती है और कोयल उसे गीत सुनाकर बहलाती है।
अब इन कथाओं को याद करती हूं तो समझ में आता है कि उक्‍त  विवरण एक रूपक की तरह इस्‍तेमाल किया गया है परंतु इन  श्रुतियों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि ऋतुराज की  मादकता ही इस रूपक को प्रयोग करने पर बाध्‍य कर देती रही  होगी।
ये ऋतुराज का ही प्रभाव है कि भारतीय संगीत, साहित्य और  कला में इसे अलग व महत्वपूर्ण स्थान दिया गया और एक  विशेष ''राग वसंत'' की रचना हुई। वसंत पंचमी से ही होली का  आरंभ हो जाता है इसलिए आरोह में पाँच तथा अवरोह में सात  स्वरों से सजे इस राग के तहत होलियां बहुत गाई जाती हैं। पहले  संगीत प्रथा थी कि इसे रात के अंतिम प्रहर में गाया जाना चाहिए  किंतु आजकल ये कोई बंदिश नहीं रही सो यह दिन या रात में  किसी समय भी गाया बजाया जा सकता है। यूं तो रागमाला में  इसे राग हिंडोल का पुत्र माना गया है और यह पूर्वी थाट का राग  है। शास्त्रों की बात करें तो राग वसंत हिंडोल इससे काफी मिलता  जुलता है।

क्‍लासिकल म्‍यूजिक के छात्र बता सकते हैं कि इसका अध्‍ययन  करते समय एक दोहा गुरू जी अक्‍सर रटाते रहे हैं-

"दो मध्यम कोमल ऋषभ चढ़त न पंचम कीन्ह।
स-म वादी संवादी ते, यह बसंत कह दीन्ह॥'

वसंत के इस मनभावन मौसम की कविता से राग तक फैली ना  जाने कितनी यादें हैं जो बचपन में घर- स्‍कूल और युवा होने पर  कॉलेज से चलकर दौड़ती हुई आ रही हैं और आज फिर मेरे मन  को झंकृत कर रही हैं।

वसंत के बहाने होली की दस्‍तक होते ही हम ब्रजवासी तो होली  की सुगबुगाहट से ही वासंती हुए जाते हैं। अब मंदिरों तक सिमटे  धमार ताल में गाए जाने वाले होली पद गायन का आनंद लेने की  बारी है। चलिए मन को ''वृंदावन'' करते हैं और सभी को वासंती  मौसम की धनक, धमक और धसक का परिचय कराते हैं।
कल से ही होली का त्योहार शुरू होने के कारण पहली बार गुलाल  उड़ाया जाएगा और फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाएगा।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 8 मई 2016

मैथ‍िलीशरण गुप्त की नज़र से… मां ने सिखाया पाठ

8 मई: मातृ दिवस पर विशेष  

कुछ भाव कुछ रिश्ते और कुछ अहसासों को हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं, कभी-कभी जब तक अबोले रहकर उस स्थ‍िति से ना गुजरें तब तक वो अहसास अधूरे रहते हैं… वो दर्द अधूरे रहते हैं…वो दर्द जो एक शरीर से दूसरा पूरा एक शरीर बनाते हैं, उसे इस जहां से रूबरू कराते हैं।

आज 8 मई का दिन मातृ दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। इसे मनाना आसान है, बच्चों का अपनी मां के प्रति एक दिन का ही सही, बदलते और बढ़ते समय ने एक बात तो अच्छी की कि मां के प्रति कृतज्ञता का भाव जगाया। हालांकि इस एक दिन को मनाने को पर भी कई प्रतिक्रियायें सामने आती हैं, कोई कहता कि एक दिन ही क्यों… हम तो मां के हर पल, हर दिन कृतज्ञ हैं। कोई कहता कि ये सब कॉरपोरेटाइजेशन है संबंधों का। कोई कहता सब चोचलेबाजी है। जितनेलोग उतने ही नज़रिये।
इस सब के बीच पुरानी पीढ़ी हो या नई पीढ़ी, दोनों ही पीढ़ी की मांयें अपने अपने तरीके से अपने बच्चों को अपने विचार, संस्कार सौंप रही हैं। पुरानी पीढ़ी की मांओं ने जहां सिखाया शांत रहकर, सहनशक्ति के साथ परिवार को बांधकर चलना मगर इस तरह से वे स्वयं को उतना मुखर होकर सामने नहीं ला सकीं जितना कि आज की मांयें, वहीं आज की मां अपने प्रोफाइल के साथ बच्चों के प्रोफाइल को भी उतना ही महत्व दे रही हैं, यह बेहद जरूरी भी है।
बहरहाल, मां के किरदार पर तमाम बहसों- मुबाहिसों के बीच हम तो मातृत्व को सम्मानित करना चाहते हैं और पश्चिम से ही आया सही , ये एक दिन विश‍िष्ट तो है ही… तो फिर इसे सेलिब्रेट करना भी बनता है ना।
इस आसान सी दिखने वाली कठिन यात्रा पर आज मैथ‍िलीशरण गुप्त की कविता याद आ गई जो बचपन की किताबों- यादों में से अचानक निकली है।
ये कविता बताती है कि रक्षक और भक्षक, न्याय और अन्याय, आखेटक और खग की रक्षा जैसी गूढ़ सीखों को इस तरह बातों ही बातों में सिर्फ मां ही बता सकती है, मां ही सिखा सकती है।

गुप्त जी ने मां के नज़रिए को क्या खूब लिखा है…

“माँ कह एक कहानी।”
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?”
“कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।”

“तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।”
“जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।”

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।”
“लहराता था पानी, हाँ हाँ यही कहानी।”

“गाते थे खग कल कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्षी की हानी।”
“हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!”

चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।”
“लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।”

“माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।”
“हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।”

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सब ने जानी।”
“सुनी सब ने जानी! व्यापक हुई कहानी।”

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?”
“माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों न उसे उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।”
“न्याय दया का दानी! तूने गुणी कहानी।”

– मैथिलीशरण गुप्त
                 
- अलकनंदा सिंह