शुक्रवार, 30 मई 2014

दो कश्‍तियों पर पांव रखे हैं पत्रकारिता ने

आज पत्रकारिता दिवस पर विशेष

"बिना लिबास आये थे इस जहां में...
बस एक कफ़न की खातिर इतना सफ़र करना पड़ा"

मुश्‍किल मंज़िलों के एक एक पायदान को पार करते हुए हिन्‍दी पत्रकारिता के  जिस सफ़र की शुरुआत उदंत मार्तंड (The Rising Sun) के पं. जुगलकिशोर शुक्‍ल ने  30 मई 1826 को कोलकाता से की थी, उसके हर पायदान पर एक अलग गाथा लिखी हुई है।
आज यानि 30 मई, का बस एक दिन पत्रकारिता के उस पेशे के नाम किये जाने का रिवाज़ बन गया है जो गाहेबगाहे हमें यह अहसास दिलाता रहता है कि मार्केटिंग और छा जाने की लालसा के बीच भी सच ज़िंदा रहता ही  है । इसीलिए तमाम पेशेगत अनिश्‍चितताओं के बावज़ूद सच को कहने और उसके प्रतिपरिणाम देखने व भोगने वाले  आज भी पत्रकारिता की दुनिया में विचरण करते मिल जाते हैं । हां, चलिए एक पत्रकारिता दिवस के बहाने ही सही, आज ही के दिन हम उन चुनौतियों पर भी अपना मुंह भी बिसूर ही लेते हैं जो खाटी कॉमर्शियलाइज्‍ड होकर अपने लक्ष्‍य को भुलाती जा रही हैं।
आज के दिन हमें उन तल्‍ख़ हकीकतों से भी रूबरू होना होता है जो पत्रकारिता को बाजार  में  खड़ा रखने के लिए ज़रूरी होती हैं ।समय आगे बढ़ चुका है जिसमें बाजार और सच नाम की दो कश्‍तियां  हैं और उन पर पांव रखकर सिर्फ एक ही व्‍यक्‍ति को चलना है जिसका नाम,ओहदा,धर्म और पहचान सिर्फ और सिर्फ पत्रकार है। निश्‍चित ही उदंत मार्तंड के संपादक पं.जुगलकिशोर शुक्‍ला की तरह एक साप्‍ताहिक के लिए भी धन का बंदोबस्‍त करने की मजबूरी वाले  दिन अब नहीं रहे बल्‍कि मार्केटिंग से अपनी रीडरशिप सर्वे को चमकाने वाले और मीडियाघरानों के दिन हैं जो जब चाहे जैसे चाहे अपने वर्कर(पत्रकार नहीं) को 'यूज' कर सकते हैं। वो भी क्‍या करें वजू़द बचाकर रखना है , रेस में बने रहना है तो सारी स्‍ट्रेटजीज को भी कारपोरेटाइज करना ही होगा।
कुछ तल्‍ख सच्‍चाइयां 'कमाने' की भी है कि बिना धन के कोई कारोबार नहीं चलता,यहां तक  कि उस पत्रकार का भी घर पैसे मांगता है। फिर अरबों के कारोबारियों से यह अपेक्षा भी बेमानी है कि वे सच के लिए लाभ कमाना छोड़ दें। यूं भी ललचाना, लुभाना, सपने दिखाना मार्केटिंग का मूल मंत्र हैं, जो नहीं है उसका सपना दिखाना। इसके ठीक उलट है पत्रकारिता का मंत्र , जो छिपा रहा है   उसे सामने लाना। दोनों के मंत्र एकदम उलट हैं। विज्ञापन झूठ बात को सच बताये तो पत्रकारिता सच को सामने लाये। दोनों का केरि बेरि का संग है...और संग है तो संपर्क में आने पर अंग फाटे ही फाटे,यह निश्‍चित है । इस दौर में सच पर झूठ हावी है। इसीलिए विज्ञापन लिखने वाले को खबर लिखने वाले से बेहतर पैसा मिलता है। उसकी बात ज्यादा सुनी जाती है। और बेहतर प्रतिभावान उसी दिशा में जाते हैं। आखिर उन्हें भी तो अपना घर चलाना है।
बहरहाल पत्रकारिता को अपनी चुनौतियों से स्‍वयं ही जूझना है,जिसमें मीडिया को निष्पक्षता, निर्भीकता, वस्तुनिष्ठता और सत्यनिष्ठा जैसे कुछ मूल्यों से बांधना ही होगा वरना क्रेडिबिलिटी की धज्‍जियां उड़ जायेंगीं । सनसनीखेज होने से ज्‍यादा जरूरी है भरोसेमंद होना और ये बात तो मीडिया घरानों के कारपोरेट मैनेजरों को भी समझनी होगी कि झूठ का कारोबार बढ़ता दिखता अवश्‍य है मगर अपनी जड़ों को खोखला करते हुये। तो दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में झाँके बिना और तथ्यों को तोड़े-मरोड़े बिना भी न केवल कमाया जा सकता है  बल्‍कि अपने मूल्‍यों पर  टिका भी रहा जा सकता है । आफ्टर ऑल! क्‍वांटिटी नहीं ,क्‍वालिटी मैटर रखती है। सारा खेल ही बैलेंस का जो है ।आज एक दिन ही सही, उस रास्‍ते के बारे में सोचा अवश्‍य जाना चाहिए जिससे कि पत्रकारिता के सिद्धांत भी ज़मींदोज़ ना हों और कारोबार भी चलता रहे ,बेहतरी की कोशिशें तो होनी चाहिये।
हर कोई यहां बिना लिबास ही आया है, एक कफ़न के लिए ज़मीर को बचाये रखना ज्‍यादा जरूरी  है और किसी का हो ना हो, पत्रकारिता का ज़मीर से पहला नाता है।
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 26 मई 2014

शायर मुनव्वर राना ने दिया पद से इस्तीफा

लखनऊ। 
मशहूर शायर मुनव्वर राना ने आज उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने संस्थान के चेयरमैन पर गम्भीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा है. राना ने बताया, ‘मैंने मुख्यमंत्री को इस्तीफा दे दिया है. यह ओहदा सम्भालते वक्त हमने कहा था कि अगर हम उर्दू की खिदमत नहीं कर सके तो कुर्सी छोड़ देंगे. हमें हमारे ही साथियों ने काम नहीं करने दिया. हम जो बनाना चाहते थे उसे बिगाड़ दिया जाता था. हमें अकादमी के फैसलों में शरीक करना तो दूर, हमें जानकारी तक नहीं दी जाती थी. ऐसे में मेरे पास इस्तीफे के अलावा कोई चारा नहीं था.’
इस साल फरवरी में उर्दू अकादमी के अध्यक्ष का पद सम्भालने वाले राना ने अकादमी के चेयरमैन नवाज देवबंदी पर आरोप लगाया कि देवबंदी को अकादमी के कामों के लिये फुरसत ही नहीं है.
राना ने कहा कि उनके कहने के बावजूद साहित्यकारों के बीमे की योजना और जिलों में उर्दू कोचिंग केन्द्रों की स्थापना पर कोई काम नहीं हुआ. इसके अलावा अकादमी द्वारा अदीबों को दिये जाने वाले इनाम भी चार साल से नहीं बंटे. बंटना तो दूर, उसकी कोई तैयारी ही नहीं है.
इस सिलसिले में जब देवबंदी से संपर्क करने की कोशिश की गयी तो उनसे संपर्क नहीं हो सका.
-एजेंसी

शुक्रवार, 23 मई 2014

'सार्वभौम' है 'गीता': अनवर जलालपुरी

लखनऊ।  अनवर जलालपुरी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। देश-विदेश में सैकड़ों मुशायरों एवं कवि सम्मेलनों के सफलतापूर्वक संचालन का श्रेय उनको जाता है। वे एक श्रेष्ठ शायर भी हैं। अनवर जलालपुरी ने सिर्फ उर्दू में ही नहीं लिखा वरन्‌ उन्होंने 'गीता' का अनुवाद बड़े सुन्दर उर्दू शायरी में कर आजकल वे चर्चा में हैं।
जाने-माने शायर अनवर जलालपुरी की पुस्तक उर्दू शायरी में गीता का लोकार्पण संत मुरारी बापू आगामी 23 मई को गोमती नगर, लखनऊ स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के मरकारी ऑडिटोरियम में करेंगे।
संस्कृति विभाग उप्र एवं हेल्प यू एजुकेशनल एवं चैरिटेबल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में होने वाले इस कार्यक्रम का नाम रुहानी संगम दिया गया है। संत मुरारी बापू के अलावा कार्यक्रम की अध्यक्षता महापौर डॉ. दिनेश शर्मा करेंगे तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव।
अनवर जलालपुरी को पूरा विश्वास है कि हिन्दू और मुसलमानों के बीच पनपी दूरियां संवाद से ही घटेंगीं। उन्होंने कहा कि आज धार्मिक और राजनीतिक नेता साम्प्रदायिक एकता बनाने में असफल साबित हुए हैं। उनका विश्वास है कि अब बस अध्यात्म का ही रास्ता, सूफी का ही रास्ता बचा है जिस राह पर चलकर नफरत से दूर इंसानियत को एकता की राह पर चलाया जा सकता है।
अनवर जलालपुरी का मानना यह सर्वविदित है कि गीता हाथ में रखकर न्यायालय में सच बोलने की शपथ ली जाती है लेकिन गीता सिर्फ धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं है, इसमें समस्त वेदों का सार, जीवन जगत, जन्म-मरण, व्यक्ति और सृष्टि के सम्बन्ध में अनेक सूत्र हैं जो सर्वभौम हैं। यह एक दार्शनिक ग्रन्थ है। इसे कोई भी धर्म वाला पढ़ सकता है और समझ सकता है।
अनवर जलालपुरी का कहना है कि फल की चिन्ता न करते हुए निरंतर कर्मशील रहना यही गीता का मूल उद्देश्य है। उन्होंने बताया कि गीता के अनुवाद में उन्हें एक-एक श्लोक का अनुवाद करने के लिए छः-छः पंक्तियां लिखनी पड़ी हैं। उनका दावा है कि अनुवाद इतना बोधगम्य, सहज और सरल है कि जो होंठों पर तुरंत बैठ जाता है।
प्रसिद्ध गीतकार डॉ. गोपाल दास नीरज का कहना है कि मैंने गीता के हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं के भी कई अनुवाद पढ़े हैं लेकिन जैसा अनुवाद अनवर जलालपुरी ने किया है वैसा मुझे अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिला। नीरज कहते हैं कि सबसे बड़ी सार्थकता गीता की यही होगी कि वो किताब में ही न होकर लोगों की जुबान पर भी हो, जिसे वो गाएंगे भी, गुनगुनाएंगे भी।
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह का मानना है कि अनवर जलालपुरी को उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी पर समान अधिकार है, उन्हें श्रेष्ठ वक्ताओं की प्रथम पंक्ति में रखा जा सकता है। अनवर जलालपुरी द्वारा गीता का भावानुवाद उर्दू शेरों में करने पर उदय प्रताप सिंह ने आश्चर्य जताया और कहा कि आश्चर्य इसलिए कि गीता सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का बेहतरीन दस्तावेज है। भारत की भावनात्मक एकता, विश्व बंधुत्व और एक ईश्वरवाद की प्रेरणा गीता से मिलती है।
गीता को समझना और उसका भावानुवाद आसान जबान में शेरो-शायरी के माध्यम से करना बहुत मुश्किल काम है। उर्दू के सरल प्रचलित शब्दों में चयन और फिर गीता की गहराई तक पहुंचने में उनका प्रयोग जिस प्रकार अनवर साहब ने किया वह उनकी प्रतिभा का प्रतीक है। गीता का दार्शनिक पक्ष जन सुलभ शैली में जनसाधारण को उपलब्ध कराना काम कठिन जरूर है, पवित्र भी है और आवश्यक भी।
लखनऊ विश्वविद्यालय राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर रमेश दीक्षित का कहना है कि उर्दू को मुसलमानों की जुबान बताकर साजिशन उसकी अहमियत को कमतर ठहराने की तमाम कोशिशों के बावजूद इस देश की गंगा-जमुनी सांझी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम लगातार जारी है। उन्होंने कहा कि अनवर साहब का यह तजुर्मा उर्दू जुबान को देवनागरी लिपि में पढ़ने वालों को हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण दार्शनिक दृष्टिकोण से रुबरु होने का मौका उपलब्ध कराता है।
अनवर जलालपुरी ने उर्दू शायरी में गीता नामक पुस्तक में गीता के 701 श्लोक, 18 अध्याय कुल अशआर 1761 का अनुवाद उर्दू में शायरी के माध्यम से किया है। अनवर जलालपुरी ने बताया कि उन्हें बचपन से ही भगवद् गीता की बातों से गहरा लगाव था। 5 वर्ष पहले मुझे गीता के अनुवाद की धुन सवार हो गई और जो अब उर्दू शायरी में गीता के रूप में आपके हाथों में है।
अनवर जलालपुरी ने कहा कि उनका उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा और संदेश को उन उर्दू वालों तक और उन मुसलमानों तक पहुचाऊं जो गीता को एक धार्मिक ग्रन्थ तो मानते हैं किन्तु उसमें क्या कुछ लिखा है, उससे बिल्‍कुल अंजान हैं। गीता के पैगाम दुनिया को खूबसूरत और नेक बनाते हुए आत्मा से परमात्‍मा में मिल जाने की बात करते हैं। यह किताब फल की इच्छा के बिना कर्म पर अमल करने की शिक्षा देती है। उन्होंने बताया कि गीता को शायराना शक्ल देने के लिए जिन किताबों की रोशनी हासिल की है, उसका भी जिक्र जरूरी है।
श्री रजनीश यानि ओशो की गीता दर्शन, पंडित सुंदरलाल की गीता और कुरआन, अजमल खां की श्रीमद् भगवद् गीता, महात्मा गांधी की गीता बोध, मनमोहन लाल छाबड़ा की मन की गीता, डॉ. अजय मालवीय की गीता, स्वामी रामसुखदास की गीता प्रबोधनी, प्रकाश नगाइच की श्रीमद् गीता, हसनुद्दीन अहमद की गीता, ख्वाजा दिल मोहम्मद लाहौरी की दिल की गीता प्रमुख है।
अनवर जलालपुरी ने बताया कि उन्होंने कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित गीतांजलि एवं उमर खैय्याम की रुबाइयों-रुबाइयात-ए-खैय्याम उर्दू शायरी में अनुवाद कर लिया है जो कि शीघ्र ही पाठकों के हाथों में होगा।
-साभार: अरविन्द शुक्ला

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