बुधवार, 24 सितंबर 2014

देश तुम्‍हारा कृतज्ञ है...इसरो

आज का दिन देश के लिए एक कालजयी उपलब्‍धि का साक्षी बना है.
जी हां! आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्‍थान (इसरो) की तपस्‍या सफल हुई है और उपग्रह मंगलयान मंगल ग्रह की अंडाकार कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुका है।
अंतरिक्ष शोध में यह एक ऐसा मील का पत्‍थर होगा जिसके आगे की यात्रा न जाने कितनी आशाओं को जन्‍म देगी।
आज की सुबह इस अभियान की कामयाबी से यह तो निश्‍चित हो गया कि 'थोड़ा है... थोड़े की जरूरत है' पर अमल करने वाले हम भारतीय यदि पूरे मन से जुटें तो ऐसी कोई शै नहीं, ऐसी कोई ताकत नहीं... या ऐसी कोई वजह नहीं जिससे हम पार ना पा सकें। पूरे विश्‍व की निगाहों में भारत ऐसा देश बन गया है जिसने एक ही प्रयास में अपना अभियान पूरा कर लिया।
यूं तो भारत के मंगल अभियान का निर्णायक चरण कल रात से यान की तीव्र गति को धीमा करने के साथ ही शुरू हो गया था और इस मिशन की सफलता उन 24 मिनटों पर निर्भर थी, जिस दौरान यान में मौजूद इंजन को चालू किया गया।  मंगलयान की गति धीमी करनी थी ताकि ये मंगल की कक्षा में मौजूद गुरूत्वाकर्षण से
खुद-ब-खुद खिंचा चला जाए और वहां स्थापित हो जाए।
तकनीकी तौर पर मंगलयान से धरती तक जानकारी पहुंचने में करीब साढ़े बारह मिनट का समय लगा. आज सुबह लगभग आठ बजे इसरो को मंगलयान से सिग्नल प्राप्त हुआ और ये सुनिश्चित हो पाया कि मंगलयान, मंगल की कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित हो गया है।
देश की इस अभूतपूर्व वैज्ञानिक सफलता के गवाह स्‍वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बने। उन्‍होंने न सिर्फ बैंगलोर के इसरो केंद्र में मौजूद रहकर वैज्ञानिकों की प्रशंसा की बल्‍कि अपने शुभकामना भाषण के तहत लगभग सुप्‍तावस्‍था में पहुंच चुकी देश की वैज्ञानिक अनुसंधान

प्रक्रियाओं को जाग्रत करने का आह्वान भी किया। इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए
मोदी ने कहा, "आज इतिहास बना है. हमने लगभग असंभव कर दिखाया है. मैं सभी भारतीयों और इसरो वैज्ञानिकों को मुबारक देता हूं. कम साधनों के बावजूद ये कामयाबी वैज्ञानिकों के पुरुषार्थ के कारण मिली है."
बधाइयों का तांता लगा हुआ है। टि्वटर पर इसरो के हैंडल से लिखा है- ''मैं अभी ब्रेकफास्‍ट करके लौटता हूं'' आशावाद और खुशी के इज़हार का इससे बढ़िया तरीका और भला क्‍या हो सकता है। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी टि्वटर के जरिये इसरो को बधाई दी है.
भारत ने इस मिशन पर करीब 450 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जो बाकी देशों के अभियानों की तुलना में सबसे ज्यादा क़िफ़ायती है. और तो और... एक हॉलीवुड फिल्‍म की लागत भी इससे कहीं ज्‍यादा आती है। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी तक कॉपी-बुक के आधार पर ठीक वैसा ही हुआ है जो वैज्ञानिकों ने सोचा था और आगे भी अगर सब ठीक रहा तो मंगलयान छह महीनों तक मंगल ग्रह के वातावरण का अध्ययन कर लेगा। ये ग्रह पर मौजूद मीथेन गैस का पता लगाएगा, साथ ही रहस्य बने हुए ब्रह्मांड के उस सवाल का भी पता लगाएगा कि क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं या और भी हैं हमारे जैसे? इससे मिली रिपोर्ट्स धरती पर ग्‍लोबल वार्मिंग, ऋतुचक्रों में हो रहे परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों के उत्‍सर्जन और ग्‍लेशियरों के पिघलने तथा आर्कटिक व अनटार्कटिक रीजन में भूमिगत हलचलों की वजहें जानने में सहायक होंगी। इनसे सावधान रहने और विचलनों के प्रति आगाह करने में भी मंगल का वातावरण हमारे लिए जरूरी होगा ताकि जिस हश्र को आज मंगल पहुंचा आगे हम ना पहुंच जाएं।
चलिए फिलहाल तो इंतज़ार है मंगल ग्रह की उस पहली तस्‍वीर का... जिसे आज ही कक्षा में स्थापित होने के कुछ ही घंटों बाद यान एक भारतीय आंख से लेकर भेजेगा।
सच कहते हैं मोदी कि अब भारत सपेरों का देश नहीं... अब वह माउस से खेलने लगा है, वह चांद ही नहीं, बल्‍कि मंगल पर भी पहुंच चुका है। संकेत साफ हैं कि जीवन की अनेक पद्धतियों के आविष्‍कारक रहे ऋषि-मुनियों से लेकर शून्‍य तक के आविष्‍कारक आर्यभट्ट का यह देश एक बार फिर सुप्‍तावस्‍था से उबर कर आकाश नापने चल पड़ा है। बहरहाल, इसी के साथ हमारा देश एशिया ही नहीं दुनिया का अकेला ऐसा देश बन गया है जिसने पहले ही प्रयास में अपना मंगल अभियान पूरा कर लिया।
यूं तो धार्मिक व सांस्‍कृतिक तौर से आज का दिन पूर्वजों-पितरों की विदाई का दिन है और शायद अंतरिक्ष-वैज्ञानिकों का यह उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का यह नितांत भारतीय तरीका है। यह सफल प्रयास कल से नवदुर्गा के आगमन और शक्‍ति के स्‍वागत के लिए एक अभूतपूर्व अर्पण भी है।
-अलकनंदा सिंह 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

सच है कि...कभी हिंदू राष्‍ट्र था चीन

वैसे तो संपूर्ण जम्बूद्वीप पर हिन्दू साम्राज्य स्थापित था। जम्बूद्वीप के 9 देश थे उसमें से 3 थे- हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष। उक्त तीनों देशों को मिलाकर आज इस स्‍थान को चीन कहा जाता है। चीन प्राचीनकाल में हिन्दू राष्ट्र था। 1934 में हुई एक खुदाई में चीन के समुद्र के किनारे बसे एक प्राचीन शहर च्वानजो 1000 वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन हिन्दू मंदिरों के लगभग एक दर्जन से अधिक खंडहर मिले हैं। यह क्षेत्र प्राचीन काल में हरिवर्ष कहलाता था, जैसे भारत को भारतवर्ष कहा जाता है।
वैसे वर्तमान में चीन में कोई हिन्दू मंदिर तो नहीं हैं, लेकिन एक हजार वर्ष पहले सुंग राजवंश के दौरान दक्षिण चीन के फूच्यान प्रांत में इस तरह के मंदिर थे लेकिन अब सिर्फ खंडहर बचे हैं।
भारतीय प्रदेश अरुणाचल के रास्ते लोग चीन जाते थे और वहीं से आते थे। दूसरा आसान रास्ता था बर्मा। हालांकि लेह, लद्दाख, सिक्किम से भी लोग चीन आया-जाया करते थे लेकिन तब तिब्बत को पार करना होता था। तिब्बत को प्राचीनकाल में त्रिविष्टप कहा जाता था। यह देवलोक और गंधर्वलोक का हिस्सा था।
मात्र 500 से 700 ईसापूर्व ही चीन को महाचीन एवं प्राग्यज्योतिष कहा जाता था लेकिन इसके पहले आर्य काल में यह संपूर्ण क्षेत्र हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष नाम से प्रसिद्ध था।
महाभारत के सभापर्व में भारतवर्ष के प्राग्यज्योतिष (पुर) प्रांत का उल्लेख मिलता है। हालांकि कुछ विद्वानों के अनुसार प्राग्यज्योतिष आजकल के असम (पूर्वात्तर के सभी 8 प्रांत) को कहा जाता था। इन प्रांतों के क्षेत्र में चीन का भी बहुत कुछ हिस्सा शामिल था।
रामायण बालकांड (30/6) में प्राग्यज्योतिष की स्थापना का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में इस प्रांत का दूसरा नाम कामरूप (किंपुरुष) मिलता है। स्पष्ट है कि रामायण काल से महाभारत कालपर्यंत असम से चीन के सिचुआन प्रांत तक के क्षेत्र प्राग्यज्योतिष ही रहा था। जिसे कामरूप कहा गया। कालांतर में इसका नाम बदल गया।
चीनी यात्री ह्वेनसांग और अलबरूनी के समय तक कभी कामरूप को चीन और वर्तमान चीन को महाचीन कहा जाता था। अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य ने भी 'चीन' शब्द का प्रयोग कामरूप के लिए ही किया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कामरूप या प्राग्यज्योतिष प्रांत प्राचीनकाल में असम से बर्मा, सिंगापुर, कम्बोडिया, चीन, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा तक फैला हुआ था अर्थात यह एक अलग ही क्षेत्र था जिसमें वर्तमान चीन का लगभग आधा क्षेत्र आता है।
इस विशाल प्रांत के प्रवास पर एक बार श्रीकृष्ण भी गए थे। यह उस समय की घटना है, जब उनकी अनुपस्थिति में शिशुपाल ने द्वारिका को जला डाला था। महाभारत के सभापर्व (68/15) में वे स्वयं कहते हैं- कि 'हमारे प्राग्यज्योतिष पुर के प्रवास के काल में हमारी बुआ के पुत्र शिशुपाल ने द्वारिका को जलाया था।'
चीनी यात्री ह्वेनसांग (629 ई.) के अनुसार इस कामरूप प्रांत में उसके काल से पूर्व कामरूप पर एक ही कुल-वंश के 1,000 राजाओं का लंबे काल तक शासन रहा है। यदि एक राजा को औसतन 25 वर्ष भी शासन के लिए दिया जाए तो 25,000 वर्ष तक एक ही कुल के शासकों ने कामरूप पर शासन किया। अंग्रेज इतिहासकारों ने कभी कामरूप क्षेत्र के 25,000 वर्षीय इतिहास को खोजने का कष्ट नहीं किया। करते भी नहीं, क्योंकि इससे आर्य धर्म या हिन्दुत्व की गरिमा स्थापित हो जानी थी।
कालांतर में महाचीन ही चीन हो गया और प्राग्यज्योतिषपुर कामरूप होकर रह गया। यह कामरूप भी अब कई देशों में विभक्त हो गया। कामरूप से लगा 'चीन' शब्द लुप्त हो गया और महाचीन में लगा 'महा' शब्द हट गया।
पुराणों के अनुसार शल्य इसी चीन से आया था जिसे कभी महाचीन कहा जाता था। माना जाता है कि मंगोल, तातार और चीनी लोग चंद्रवंशी हैं। इनमें से तातार के लोग अपने को अय का वंशज कहते हैं, यह अय पुरुरवा का पुत्र आयु था। (पुरुरवा प्राचीनकाल में चंद्रवंशियों का पूर्वज है जिसके कुल में ही कुरु और कुरु से कौरव हुए)। इस आयु के वंश में ही सम्राट यदु हुए थे और उनका पौत्र हय था। चीनी लोग इसी हय को हयु कहते हैं और अपना पूर्वज मानते हैं।
एक दूसरी मान्यता के अनुसार चीन वालों के पास 'यू' की उत्पत्ति इस प्रकार लिखी है कि एक तारे (तातार) का समागम यू की माता के साथ हो गया। इसी से यू हुआ। यह बुद्घ और इला के समागम जैसा ही किस्सा है। इस प्रकार तातारों का अय, चीनियों का यू और पौराणिकों का आयु एक ही व्यक्ति है। इन तीनों का आदिपुरुष चंद्रमा था और ये चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं।
 
संदर्भ : कर्नल टॉड की पुस्तक ‘राजस्थान का इतिहास’ और पं. रघुनंदन शर्मा की पुस्तक ‘वैदिक संपत्ति’ और 'हिन्दी-विश्वकोश' आदि से।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

शब्‍दों के द्वंद में शिक्षक दिवस !

'अबे सुन...' और 'सुनिए...' में कितना फर्क है ..क्‍या आप  बता सकते हैं ?
दोनों शब्‍दों को सुनकर बारी-बारी से जो पहली प्रतिक्रिया मस्‍तिष्‍क देता है...वह कितनी भिन्‍न होती है... क्‍या ये बता सकते हैं ?
जरूर बता सकते हैं, दोनों शब्‍द पुकारने के सिर्फ लहजे पर ही टिके हुए हैं, बस इतना ही ना । ठीक ऐसा ही फर्क है 'टीचर्स डे' और 'गुरू उत्‍सव' में...।
जी हां! पुकारने का लहजा...जिसमें टीचर्स कहने पर मन तरंगित नहीं होता, न ही श्रद्धा पैदा होती है परंतु यदि किसी को गुरू कहा जाये तो अनायास ही हम उस व्‍यक्‍ति के समक्ष श्रद्धावनत हो जाते हैं, वह व्‍यक्‍ति हमारे सामने हो तो हाथ उसके पांवों की ओर खुद-ब-खुद बढ़ जाते हैं जबकि टीचर्स कहने से मन में ऐसी किसी भावना का जन्‍म नहीं होता। यह सब संस्‍कारों का खेल है जो हमारे जीवन में तमाम विकृत उठापटकों के बावजूद अभी भी मन  के किसी कोने में चुपके से बहते हैं।
आज सुबह से मन बेचैन था उन बयानबाजियों को पढ़-सुनकर जो कि राजनैतिक ही नहीं बल्‍कि बौद्धिक स्‍तर पर भी मेरे सामने एक-एक करके 'ओढ़ी हुई प्रगति' के दृश्‍यों को नमूदार कर रही थीं, कि किस तरह से केंद्र सरकार द्वारा शिक्षक दिवस के उपलक्ष में स्‍कूली छात्रों को गुरू उत्‍सव संबंधी निबंध लिखने की बात करने पर कोहराम  मचाया जा रहा है ।
विपक्षी पार्टियों और कथित सेक्‍युलरवादियों द्वारा इतना हो हल्‍ला मचाया गया कि अंतत: मानव संसाधन मंत्री स्‍मृति ईरानी को कहना ही पड़ा कि मंत्रालय द्वारा सम्‍मानित करने के लिए कराई जा रही निबंध प्रतियोगिता पर इतनी आपत्‍ति जताने वालों की सोच सचमुच रहम के लायक है, और कुछ नहीं क्‍योंकि गुरू उत्‍सव एक निबंध प्रतियोगिता है और इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज़ सभी भाषाओं में आयोजित करवाया गया है। यह शिक्षकों के योगदान का उत्‍सव है ।
निश्‍चित ही इसका विरोध करने वाले नहीं चाहते कि नई पीढ़ी को दिशा दिखाने वाले शिक्षकों को सम्‍मानित किया जाये और इतना ही नहीं सम्‍मान देने वाले बच्‍चों में अपने शब्‍दों से उन्‍हें सम्‍मानित करने की होड़ लगे ।
इन कथित समाजवादियों की सोच का ही परिणाम है कि हमारी समृद्ध परंपराओं में से एक गुरू-शिष्‍य परंपरा को मात्र शिक्षक और विद्यार्थी के दायरे में समेट दिया गया है। जहां शिक्षा देने  वाला एक दुकानदार की भूमिका में आता गया और विद्यार्थी एक उपभोक्‍ता बनकर उनका शिकार बनता रहा।
नतीजा हम सबके सामने है कि ना विद्यार्थी शिक्षकों का सम्‍मान कर पाते हैं और ना ही शिक्षक उन्‍हें अपना ज्ञान दे पाते हैं, अव्‍वल तो चल चला कर सारी बात हताशा से उपजे एक जर्जर से बयान पर आकर  टिक जाती है कि ''क्‍या करें...हमारे जमाने में गुरू जी के सामने गर्दन नहीं उठा पाते थे, मगर अब देखो बच्‍चे उन्‍हें सम्‍मान ही नहीं देते फिर पैर छूना तो दूर...चाहे जहां, चाहे जैसे मिसबिहेव कर देते हैं...छात्रों और शिक्षकों में मारकुटाई तो इतना आम हो गया है कि पूछो मत...ज़रा सा कुछ कहो तो सौ सौ आफतें ...कभी छात्रों के हमले तो कभी अभिभावकों के जोर-जंग आदि आदि ।'' ये रोतलू-टाइप शिकायत हर उस व्‍यक्‍ति से सुनने को मिल जायेगी जो उम्र के चौथे या पांचवें दशक में चल रहा होगा, जिसने शिक्षा का उदारीकरण भी भलीभंति देखा होगा और उसके सामाजिक दुष्‍परिणाम भी ।
 हालांकि इस उदारीकरण में कौन उदार हुआ और कौन निष्‍ठुर, किसने कितना पाया और किसने कितना खोया या संस्‍कारों की बलि देकर हमने ग्‍लोबलाइजेशन की जो चकाचौंध हासिल की, वह कितनी अपनी है और कितनी पराई  ...आदि । यह बहस बहुत लंबी खिंचेगी इसलिए आज इस पर इतना ही। बात सिर्फ उस लहजे की है जो एक शब्‍द के उच्‍चारण मात्र से नई पीढ़ी की दशा व दिशा तय कर सकती है ।
शिक्षक दिवस को टीचर्स डे कहा जाये या इसे गुरू उत्‍सव  बताकर इस पर निबंध की प्रतियोगिता आयोजित की जाये, इसे स्‍कूलों में किस तरह मनाया जाये, या इसे प्रधानमंत्री संबोधित करें तो वे कैसे  करें...बच्‍चे प्रधानमंत्री के भाषण से कितने प्रभावित  होंगे ...आदि खोखली बातें इस बारे में सोचने पर विवश कर सकती है कि केंद्र सरकार भले ही भाजपा की हो या भले ही उस पर संघ की सोच का ठप्‍पा लगा हो मगर हम सब इस बात से तो सहमत ही होंगे कि बीते दशकों में ना केवल शिक्षा का स्‍तर गिरा है बल्‍कि संस्‍कारों की भी बलि चढ़ गई और ये बलि कुछ इस तरह चढ़ी कि गुरू को गुरू मानना तो बहुत दूर की बात, किसी शिक्षक पर किसी छात्र या छात्रा को भरोसा नहीं रह गया, कोई शिक्षक अब छात्र को अपने बच्‍चे की तरह देखने को तैयार नहीं। इस राजनीति से क्षति तो दोनों की हुई ना, इस टूटते भरोसे के बारे में सेक्‍युलरवादी क्‍या संघ या भाजपा को ही दोषी ठहरायेंगे ।
हद तो तब हो गई जब सुना कि अभिषेक मनु सिंघवी कह रहे हैं कि यह मासूम बच्‍चों के दिमाग  को प्रभावित करने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का सीधा उदाहरण है। तो सिंघवी से यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्‍या महिला वकील को जज बनवाने का लालच देकर उसके साथ अंतरंग होने में क्‍या सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग नहीं था । कम से कम सिंघवी जैसे लोग तो अपना मुंह ना ही खोलें तो अच्‍छा। नैतिकता या शुचिता की बातें उन्‍हीं के  मुंह से अच्‍छी लगती हैं जो स्‍वयं भी नैतिक दृष्‍टि रखता हो।
बहरहाल, किसी को सम्‍मान देकर यदि हम अपने बच्‍चों के लिए भरोसा कमा पायें तो इस शिक्षक दिवस पर यह बहुत बड़ी कमाई होगी।
अपने लिए ना सही अपनी पीढि़यों के लिए कुछ तो वृहद सोच अपनानी ही होगी और राजनीति व कथित बौद्धिक विवेचनाओं से अलग होकर बच्‍चों को शिक्षित ही नहीं संस्‍कारवान कैसे बनाया जाये, यह भी विचारना होगा ताकि वे स्‍वयं देश के बेहतर नागरिक बन सकें, तो क्‍यों ना हम अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिए अपनी सोच को भी थोड़ा संस्‍कारों की ओर ना मोड़ें । लीक से हटकर फिर से सोचें कि पिछले दशकों में जो गंवा चुके हैं, उसे वापस कैसे लाया जाये । बात सिर्फ लहजे की ही तो है...'अबे सुन...' की जगह 'सुनिए...' को अपनाकर तो देखिए ।   
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 1 सितंबर 2014

राधा बनते जाना है और ...बस !

राधाष्‍टमी पर 

ओशो द्वारा कृष्ण पर दिए गए प्रवचन को लेकर कभी अमृता प्रीतम ने लिखा था-
'' जिस तरह कृष्ण की बाँसुरी को भीतर से सुनना है, ठीक उसी तरह ‘भारत—एक सनातन यात्रा’ को पढ़ते-सुनते, इस यात्रा पर चल देना है। और कह सकती हूँ कि अगर कोई तलब कदमों में उतरेगी, और कदम इस राह पर चल देंगे, तब वक्त आएगा कि यह राह सहज होकर कदमों के साथ चलने लगेगी, और फिर ‘यात्रा’ शब्द अपने अर्थ को पा लेगा !''
यात्रा... ,  जी हां ।  एक  ऐसा  अनवरत  सिलसिला जिसे किसी ठांव  या  मकसद की  हमेशा  जरूरत  होती  है । जिसे हर हाल में मंज़िल की तलाश होती और मंज़िल को पाना ही लक्ष्‍य। यूं तो यात्रा का अर्थ बहुत गहरा है मगर जब यह यात्रा एक धारा बनकर बहती है तो अनायास ही वह अपने उद्गम की ओर आने को उत्‍सुक रहती है । यही उत्‍सुकता धारा को राधा बना देती है।

राधा कोई एक किसी ग्‍वाले कृष्‍ण की एक सुन्‍दर सी प्रेयसी का नाम नहीं, ना ही वो केवल वृषभान की दुलारी कन्‍या है बल्‍कि वह तो अनवरत हर कृष्‍ण अर्थात् ईश्‍वर के प्रत्‍येक अंश-अंश से मिलने को आतुर रहने वाली हर उस आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति के रूप में बहने वाली धारा का नाम है जो भौतिकता के नश्‍वरवाद से आध्‍यात्‍मिक चेतना की ओर बहती है, उसमें एकात्‍म हो जाने को... बस यहीं से शुरू होती है किसी के भी राधा हो जाने की यात्रा ।
इसी 'राधा होते जाने की प्रक्रिया' को ओशो अपने प्रवचनों में कुछ यूं सुनाते हैं—‘‘पुराने शास्त्रों में राधा का कोई जिक्र नहीं । वहां गोपियाँ  हैं, सखियाँ  हैं, कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और रास की लीला होती है। राधा का नाम पुराने शास्त्रों में नहीं है। बस इतना सा जिक्र है, कि सारी सखियों में कोई एक थीं, जो छाया की तरह साथ रहती थीं। यह तो महज सात सौ वर्ष पहले 'राधा' नाम प्रकट हुआ । उस नाम के गीत गाए जाने लगे, राधा और कृष्ण को व्‍यक्‍ति के रूप में प्रस्‍थापित  किया गया । इस नाम की खोज में बहुत बड़ा गणित छिपा है । राधा शब्द बनता है धारा शब्द को उलटा कर देने से।
‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम धारा है। और धारा शब्द को उलटा देने से राधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता बनती है।’’
ओशो जिस यात्रा की बात करते हैं—वह अपने अंतर में लौट जाने की बात करते हैं। एक यात्रा धारामय होने की होती है, और एक यात्रा राधामय होने की....।
यूं तो विद्वानों ने राधा शब्‍द और राधा के अस्‍तित्‍व तथा राधा की ब्रज व कृष्‍ण के जीवन में उपस्‍थिति को लेकर अपने नज़रिये से आध्‍यत्‍मिक विश्‍लेषण तो किया ही है, मगर लोकजीवन में आध्‍यत्‍म को सहजता से पिरो पाना काफी मुश्‍किल होता है ।
दर्शन यूं भी भक्‍ति जैसी तरलता और सरलता नहीं पा सकता इसीलिए राधा भले ही ईश्‍वर की आध्‍यात्‍मिक चेतना में धारा की भांति बहती हों मगर आज भी उनके भौतिक- लौकिक स्‍वरूप पर कोई बहस नहीं की जा सकती।
ज्ञान हमेशा से ही भक्‍ति से ऊपर का पायदान रहा है, इसीलिए जो सबसे पहला पायदान है भक्‍ति का, वह आमजन के बेहद करीब रहता है और राधा को आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति से ज्‍यादा कृष्‍ण की प्रेयसी मान और उनकी अंतरसखी मान उन्‍हें किसी भी एक सखी में प्रस्‍थापित कर उन्‍हें अपना सा जानता है। ये भी तो ईश्‍वर की ओर जाने की धारा ही है, बस रास्‍ता थोड़ा लौकिक है, सरल है...।
ब्रज में समाई हुई राधा ... कृष्ण के नाम से पहले लगाया हुआ मात्र एक नामभर नहीं हैं और ना ही राधा मात्र एक प्रेम स्तम्भ हैं जिनकी कल्‍पना किसी कदम्ब के नीचे कृष्ण के संग की जाती है। भक्‍ति के रास्‍ते ही सही राधा फिर भी कृष्‍ण के ही साथ जुड़ा हुआ एक आध्यात्मिक पृष्ठ है, जहाँ द्वैत अद्वैत का मिलन है। राधा एक सम्पूर्ण काल का उद्गम है जो कृष्ण रुपी समुद्र से मिलती है ।
समाज में प्रेम को स्‍थापित करने के लिए इसे ईश्‍वर से जोड़कर देखा गया और समाज को वैमनस्‍यता से प्रेम की ओर ले जाने का सहज उपाय समझा  गया इसीलिए श्रीकृष्ण के जीवन में राधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं। हो सकता है कि राधा का कृष्‍ण से  ये  संबंध शास्‍त्रों में ना हो मगर लोकजीवन में प्रेम को पिरोने का सहज उपाय बन गया। और इस तरह जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी।

राधा की लौकिक कथायें बताती हैं कि प्रेम कभी भी शरीर की अवधारणा में नहीं सिमट सकता ... प्रेम वह अनुभूति है जिसमें साथ का एहसास निरंतर होता है। न उम्र... न जाति... न ऊंच नीच ... प्रेम हर बन्धनों से परे एक आत्मशक्ति है , जहाँ सबकुछ हो सकता है ।
यदि हम कृष्ण और राधा को हर जगह आत्मिक रूप से उपस्थित पाते हैं तो आत्मिक प्यार की ऊंचाई और गहराई को समझना होगा। कृष्‍ण इसीलिए हमारे इतने करीब हैं कि उन्‍हें सिर्फ ईश्वर ही नहीं बना दिया, उन्‍हें लड्डूगोपाल के रूप में लाड़ भी लड़ाया है तो वहीं राधा के संग झूला भी झुलाया है और रास भी रचाया है।

जब कृष्‍ण जननायक हैं तो भला राधा हममें से ही एक क्‍यों न मान ली जायें...जो सारे आध्‍यात्‍मिक तर्कों से परे हों, फिर चाहे वो आत्‍मा की गंगोत्री से  धारा बनकर  वापस कृष्‍ण में समाने को राधा बनें और अपनी यात्रा का पड़ाव पा लें या फिर बरसाने वाली राधाप्‍यारी...संदेश तो एक ही है ना दोनों का कि प्रेम में इतना रम जाया जाये कि ईश्‍वर तक पहुंचने को यात्रा  कोई भी हो उसकी हर धारा राधा बन जाये, एकात्‍म हो जाये...।
- अलकनंदा सिंह

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