गुरुवार, 18 जनवरी 2018

whatsapp पर तैरते इस विराट झूठ का कड़वा सच क्‍या

...कि इस समय मेरी जिह्वा
पर जो एक विराट् झूठ है
वही है--वही है मेरी सदी का
सब से बड़ा सच ! 

...ये उस कविता की पंक्‍तियां हैं जिसे कवि केदारनाथ सिंह ने  अपनी एक लंबी कविता ''बाघ'' में उद्धृत किया है। कवि ने 'समय  के सच' का माप 'झूठ की ऊंचाई' के समकक्ष खड़ा करके निर्णय  करने के लिए दोनों शब्‍दों को...और उनकी मौजूदगी को हमारे  सामने छोड़ दिया है ताकि हम स्‍वयं फैसला कर सकें।
हम बखूबी झूठ तथा सच को माप सकें, परख सकें कि आखिर  इसमें हमारे लिए और समाज के लिए क्‍या ठीक रहेगा।

ये हम सभी की जन्‍मजात कमजोरी है कि जो सामने दिखता है  उसे आंख मूंदकर सच मान लेते हैं जबकि आंखों देखा भी कभी  कभी सच नहीं होता।

अब तो सोशल मीडिया के ज़रिए प्रति माइक्रो सेकंड दिमाग को  छलनी करती सूचनाओं से जूझते हुए हम आज के इस समय में  कैसे झूठ और सच के बीच पहचान करें, इस परीक्षा से गुजरते हैं।

आज सुबह-सुबह Whatsapp पर एक वीडियो मैसेज कुछ यूं टपका  जैसे कि यदि इसे शेयर ना करने वाले महापापी हों और यदि  उन्‍होंने इसे शेयर ना किया तो उनकी या उनके परिवार में से  किसी प्रिय की मृत्‍यु अवश्‍य हो जाएगी। इस वीडियो को देवी मां  काली की तस्‍वीरों के साथ डरावनी आवाज़ में वायरल किया जा  रहा है। वायरल करने वाले मृत्‍यु के भय को कैश करना जानते हैं।  दुनिया के सभी धर्मों में मृत्‍यु को निश्‍चित माना गया है। जो  निश्‍चित है उससे भय कैसा, फिर क्‍यों और कौन इस भय की  मार्केटिंग कर रहा है।

''Larger than Life'' जीने की प्रेरणा देने वाले हमारे धर्म-समाज में  अंधश्रद्धा की कोई जगह नहीं है और फिर देवी मां काली को तो  स्‍वयं काल की देवी अर्थात् शिवतत्‍व में विलीन कर मोक्ष देने वाली  देवी के रूप में पूजा जाता है, तब इस तरह की अंधभक्‍ति और  अंधविश्‍वास फैलाने वाले मैसेज आखिर क्‍या बताना चाहते हैं।

अब जरूरी हो गया है कि इन तैरते संदेशों को सरकार साइबर  अपराध की श्रेणी में ले आए, साथ ही हम भी जागरूकता के लिए  कदम उठाएं ताकि देवी देवताओं के नाम पर मृत्‍यु का भय  दिखाकर इस तरह की कुचेष्‍टाओं को रोका जा सके। मृत्‍यु तो  जीवन का सत्‍य है, ना तो डर कर इससे बचा जा सकता और न  भयवश पूजा-पाठ करके इसे रोका जा सकता है। हम सब इस  सत्‍य को जानते हैं। अब ऐसा तो है नहीं कि सारे दिन ज्ञान  बघारने वाले और व्‍हाट्सएप चलाने वाले इनके घातक परिणामों को  ना जानते हों, इतने शिक्षित तो वे होते ही हैं। मुझे आश्‍चर्य हो रहा  है कि फिर भी ऐसे संदेशों को लेकर आखिर लोगों ने इसे आगे  शेयर कैसे कर दिया। 


आप भी देखें इस वीडियो को...और हो सके तो इस तरह के प्रयासों  को अपने स्‍तर से रोकें और इनकी भर्त्‍सना करें।


झूठ और सच को मापने का कोई निश्‍चित यंत्र नहीं होता, फिर  ऐसे वीडियो हों या कोई अन्‍य माध्‍यम, इनके द्वारा  फैलाया जा रहा झूठ हमें अपने-अपने भीतर बैठे सच से भी  साक्षात्‍कार करा रहा है कि हम आखिर किन-किन बातों से भयभीत  हो सकते हैं।

ऐसे में कवि केदारनाथ सिंह की कविता ''बाघ'' के आमुख में उनका  लिखा झूठ का कड़वा ''सच'' हमें दिशा दिखा रहा है कि-

बिंब नहीं
प्रतीक नहीं
तार नहीं
हरकारा नहीं
मैं ही कहूँगा

क्योंकि मैं ही
सिर्फ़ मैं ही जानता हूँ
मेरी पीठ पर
मेरे समय के पंजो के
कितने निशान हैं

कि कितने अभिन्न हैं
मेरे समय के पंजे
मेरे नाख़ूनों की चमक से

कि मेरी आत्मा में जो मेरी ख़ुशी है
असल में वही है
मेरे घुटनों में दर्द

तलवों में जो जलन
मस्तिष्क में वही
विचारों की धमक

कि इस समय मेरी जिह्वा
पर जो एक विराट् झूठ है
वही है--वही है मेरी सदी का
सब से बड़ा सच!

यह लो मेरा हाथ
इसे तुम्हें देता हूँ
और अपने पास रखता हूँ
अपने होठों की
थरथराहट.....

एक कवि को
और क्या चाहिए!

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 13 जनवरी 2018

सबहीं को मुबारक हो हैप्‍पी वाली ''खिचराईं''

आज मकर संक्रांति है, मुझे अपना बचपन याद आ रहा है जो पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के गांवों में बीता और जहां ''संक्राति' को ''खिचराईं'' कहा जाता है।
आज के दिन वहां घर की औरतों में एक कहावत बहुतायत से कही जाती रही है और वो कहावत रसोई में औरतों की संघशक्‍ति व स्‍वादग्रहण की रोचक विधि बताती है।
जैसे कि बड़ी बहन समान जेठानी, देवरानी से कहती है-
''तात तात खिचरी, जूड़ जूड़ घिउ,
खालेउ द्विउरनिया जुड़ाय जाय जिउ।''
यूं तो खिचड़ी पर और भी कहावतें हैं वहां, जैसे...खाने के बाद बर्तन मलने के आलस्‍य को कुछ यूं इज्‍ज़त बख्‍शी गई है-
''खिचड़ी खात नीक लागे, बटुली मलत पे बथे।''
खिचड़ी खाने के समय को स्‍वास्‍थ्‍य से जोड़ते हुए कहा जाता है कि-
''माघ मास घी खिचरी खाय, फागुन उठि के प्रातः नहाय।''
स्‍वाद बढ़ाने को और बच्‍चों में इसके प्रति मोह जगाने को कह कह के सुनाया जाता है-
''खिंचड़ी के चारी इआर, दही, पापर, घी, अचार।''
बहरहाल, मैं अपने बचपन की इन खूबसूरत यादों से निकल पाती इससे पहले ही देखती हूं कि आज मीडिया में तरह-तरह के मैसेज तैर रहे हैं।
कोई मकर संक्रांति का महत्‍व बता रहा है तो कोई संस्‍कृत में भीष्‍म पितामह द्वारा बताए गए उत्‍तरायण को व्‍याख्‍यायित कर रहा है। इन प्रवचनों से थोड़ा बाहर निकलें तो अलग-अलग तरह की खिचड़ी पकाई जा रही है। इटैलियन रिसोतो से लेकर गुजराती खिचड़ी तक सब उपलब्‍ध है, और वो भी फ्री में। जो भी हो, सोशल मीडिया ने खिचड़ी का कारपोरेटाइजेशन कर ही दिया है। इसके लिए उसे धन्‍यवाद...अब वह हमारी दादी-नानी-काकी सब बन गया है।
तमाम बुराइयों के साथ सोशल मीडिया को हमें इस बात का धन्‍यवाद देना ही होगा कि उसने बीमारों का खाना बताकर नाक-भौं सिकोड़ने वालों के सामने अब इसे गरियाने के सारे रास्‍ते बंद कर दिये हैं। हमने अगर पहले ही खिचड़ी को ''हाईलेवल'' भोज्‍यपदार्थ मान लिया होता तो आज हमें ही हमारी दादी-नानी-काकी की ये रेसिपी यूं ना बताई जा रही होती। और तो और ''कथित तौर पर संभ्रांत'' कहलाने के चक्‍कर में आज हमें अपनी नाक यों घुमाकर ना पकड़नी पड़ रही होती।
पहले आज के कुछ प्रवचन खिचड़ी के इस त्‍यौहार पर सुनिये-
इस दिन से सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है यानी मकर रेखा के बिलकुल ऊपर होता है। वहाँ से धीरे-धीरे मेष राशि में प्रवेश करने के बाद छह महीने बाद कर्क राशि में प्रवेश करता है।
इसी के आधार पर ऋतु परिवर्तन होता है। मकर संक्रांति के दिन से उत्तरायण में दिन का समय बढ़ना और रात्रि का समय घटना शुरू हो जाता है।
कई राज्यों में इस दिन अलग-अलग राज्यों में तिल-गुड़ की गजक, रेवड़ी, लड्डू खाने और उपहार में देने की परंपरा भी है।
चावल बाहुल्य वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में इस पर्व को ' खिचड़ी' या 'खिचराईं' के नाम से मनाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में इस दिन खिचड़ी पकाई और खाई जाती है। कई जगह दाल और चावल दान करने की परंपरा है जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर बाजरे की खिचड़ी पकाई और खाई जाती है।
अब मैं अपनी बात आज की खिचराईं पर मुबारकबाद देते हुए इस तरह खत्‍म करती हूं कि -
“ज्यादा खाये जल्द मरि जाय,
सुखी रहे जो थोड़ा खाय।
रहे निरोगी जो कम खाये,
बिगरे काम न जो गम खाये।”
अंत में बस इतना कहना चाहती हूं कि कुछ ऐसी कहावतें जो हमारे भीतर आज भी स्‍पंदन जगाती हैं, संयुक्‍त परिवारों की याद दिलाती हैं, स्‍वाद और सेहत के प्रति जागरूक करती हैं उनमें सर्वाधिक पढ़े-लिखों की ''खिचड़ी'' यानि हम जैसों की ''खिचराईं'' को लेकर बनी कहावतें भी शामिल हैं।
आज भी हम अपने बचपन को गुनगुना लेते हैं इन्‍हीं के बहाने, वरना तो...यू नो...????????????

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

26 वें विश्व पुस्तक मेले में सबसे ज्‍यादा किताब बिकी ‘औरत और इस्लाम’

देश में तीन तलाक और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर चल रही बहस की वजह से लोगों में इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को जानने की ललक बढ़ी रही और लोग, विशेष तौर पर महिलाएं, यहां आयोजित विश्व पुस्तक मेले में इससे संबंधित किताबें खरीद रही हैं.
प्रगति मैदान में चल रहे 26 वें विश्व पुस्तक मेले में इस्लामी किताबों का प्रकाशन करने वाले कई प्रकाशक आए हैं. वे उर्दू भाषा के अलावा हिन्दी और अंग्रेजी में भी कई किताबों को लेकर आए हैं.
उनका कहना है कि सबसे ज्यादा इस्लाम में औरतों की स्थिति एवं अधिकारों का वर्णन करने वाली किताबें बिक रही हैं.
मरकज़ी मकतबा इस्लामी पब्लिशर्स के मेराज खालिद ने बताया कि ‘औरत और इस्लाम’ नाम की किताब सबसे ज्यादा बिक रही है जिसके अंग्रेजी संस्करण का नाम ‘वूमन राइट्स इन इस्लाम’ है.
उन्होंने बताया कि इस पुस्तक को खरीदने वालों में महिलाएं अधिक हैं और उनमें भी गैर मुस्लिम महिलाओं की संख्या ज्यादा है और वे इस पुस्तक का अंग्रेजी या हिन्दी संस्करण ले रही हैं.
वहीं इस्लामी बुक सर्विस लिमेटिड के नसीम अहमद ने बताया कि मेले में ‘पैगंबर की पत्नियां’, ‘पैगंबर की बेटियां’, ‘पति पत्नी के अधिकार’, ‘इस्लाम में पारिवारिक मूल्य’, ‘वूमन इन इस्लाम’ जैसी किताबें अधिक बिक रही हैं.
उन्होंने बताया कि इन किताबों में सबसे ज्यादा ‘वूमन इन इस्लाम’ बिक रही है और इसके खरीदारों में अधिकतर गैर मुस्लिम युवा हैं जो बड़ी तादाद में इस किताब को खरीद रहे हैं.
उन्होंने बताया कि इस किताब को मिली प्रतिक्रिया को देखते हुए उन्होंने इसकें हिंदी तजरुमे का काम शुरू कर दिया है और कुछ दिनों में यह किताब हिन्दी में भी उपलब्ध होगी.
इस स्टॉल पर किताब खरीद रहे तुषार ने बताया कि टीवी और अखबारों में सब अपनी अपनी बात करते हैं. कोई कहता है कि ”महिलाओं को अधिकार है तो कोई कहता है अधिकार नहीं है. इतना कंफ्यूजन है कि कुछ समझ ही नहीं आता है कि कौन सही है इसलिए यहां से किताबें खरीद रहे हैं ताकि असल स्थिति मालूम हो.”
वहीं जावेद ने बताया कि उन्हें उर्दू नहीं आती है और इस्लाम में अधिकतर किताबें उर्दू में होती है. यहां कुछ प्रकाशक ”हिन्दी और अंग्रेजी में पुस्तकें लेकर आए हैं जिन्हें हम खरीद रहे हैं ताकि थोड़ी दीनी जानकारी हो और लोगों के सवालों के जवाब दे सकें.”
मरकज़ी मकतबा इस्लामी पब्लिशर्स के मेराज खालिद ने बताया कि इस्लाम में महिलाओं के मुकाम का वर्णन करने वाली पुस्तकों के अलावा जिहाद और आतंकवाद के बारे में लिखी किताबें भी पाठक ले रहे हैं. इनमें भी गैर मुस्लिमों की संख्या अधिक है. -Agency

-www.legendnews.in

विवेकानंद जयंती : तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है

स्‍वामी विवेकानंद ने कहा था कि-
You have to grow from the inside out. None can teach  you, none can make you spiritual. There is no other  teacher but your own soul.

अर्थात्
तुम्हें अन्दर से बाहर की तरफ विकसित होना है। कोई तुम्हें पढ़ा  नहीं सकता, कोई तुम्हें आध्यात्मिक नहीं बना सकता, तुम्हारी  आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है।।

आज के मनोवैज्ञानिक शोधों में स्‍वामी विवेकानंद के इसी कथन को  आधार मानकर सेल्‍फ सजेशन व ऑटो सजेशन जैसी विधियों पर  काफी शोध हो रहा है। पीटर फ्लैचर की ''How to Practice Self  Suggestion" व एमेल कोयू की "Self Mastery Through  Conscious Auto Suggestion" जैसी पुस्‍तकें यह बताने को काफी  हैं कि आज जिस सेल्‍फ सजेशन व ऑटो सजेशन जैसी विधियों पर  काम हो रहा है, उसे तो हमारे दार्शनिकों, चिंतकों ने सदियों पूर्व  भारतीय समाज में स्‍थापित कर दिया था।

सेल्‍फ सजेशन से ऑटो सजेशन की ओर ले जाती भगवद्गीता का  भी तो सार यही है। गीता कहती है कि तुम्‍हारे वश में सिर्फ ''करना  है''। तो सोचो और करो। सोचने का अर्थ ही स्‍वयं के बारे में  विचारना है, ''स्‍वयं सोचना'' यानि सेल्‍फ सजेशन और इसके बाद की  प्रक्रिया ''करना'' यानि ऑटो सजेशन देते हुए खुद को खुद का संदेश  देना। इसका अर्थ है कि अपनी आत्‍मा को अपनी सोच में शामिल  करना, अपने मन व मस्तिष्‍क दोनों को जगाना। और जब यह  प्रक्रिया चल निकलेगी तो निश्‍चित ही आप ऐसी अवस्‍था में पहुंच  जायेंगे जो आपको दीवारों में से रास्‍ता बनाने में मदद करेगी।  कठिन से कठिन स्‍थितियों में भी धैर्य धारण करने के लिए गीता के  संदेश से लेकर स्‍वामी विवेकानंद के कथ्‍य और पीटर फ्लैचर व  एमेल कोयू सभी के वाक्‍य अपने भीतर झांकने को कहते हैं। इसका  अर्थ यह भी है कि जब मन और मस्‍तिष्‍क खुद से संवाद स्‍थापित  कराते हैं तो अंतरात्‍मा की आवाज़ सुनना आसान हो जाता है, यह  संप्रेषण ही सेल्‍फ सजेशन से होकर ऑटो सजेशन की ओर ले जाता  है।

आज जब पूरे विश्‍व के साथ-साथ हमारे देश में भी वैचारिक  नकारात्‍मकता अपने पांव फैला चुकी है तब स्‍वामी विवेकानंद के  यह वाक्‍य कि ''तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है'' पर  अमल करना अराजक सोच को दूर कर सकता है।

ये आज के समय की बड़ी आवश्‍यकता है क्‍योंकि किस्‍म-किस्‍म की  आजादी मांग रहे लोगों की सिर्फ ''अपने हितों'' और ''अपनी  इच्‍छाओं'' तक सीमित होने की प्रवृत्‍ति ने पूरा वातावरण अराजक  बना दिया है, हर कोई सिर्फ अपने लिए सोच रहा है। एक ऐसे  समय जब निर्वस्‍त्र होने को निजी स्‍वतंत्रता और गौमांस भक्षण को  भोजन की आजादी बताया जाने लगा हो, तब जरूरी हो जाता है कि  व्‍यक्‍ति को अपने उस सदियों पुराने दर्शन से फिर जोड़ा जाए जो  सर्वहित सोच सके। स्‍वयं के साथ समाज की प्रगति चाहने को  मानसिक शांति जरूरी है और इसके लिए अपने भीतर ही गुरू की  खोज करनी होगी।

बहरहाल, गीता के सार की भांति ही एक ''व्‍यक्‍तित्‍व'' को ''अमरत्‍व''  की ओर ले जाने वाले हमारे महानुभावों के ये अनमोल वाक्‍य हमें  फिर से अपने भीतर की ओर जाने के प्रेरित कर रहे हैं क्‍योंकि  आज हर दूसरा व्‍यक्‍ति किसी अन्‍य की खामी निकालने, उसे सलाह  देने, उसके व्‍यक्‍तित्‍व को क्षीण करने पर आमादा है।

ऐसे में आवश्‍यक यह है कि स्‍वामी विवेकानंद की औपचारिक जयंती  मनाने के बजाय हम उनके विचारों को आत्‍मसात करने की कोशिश  करें, और कोशिश करें इस बात की कि महान आत्‍माओं का ध्‍येय  पूरा करने में सहयोगी बन पाएं।
मन, वचन और कर्म से हम एक हों और किसी स्‍तर पर हमारे  विचारों में अंशमात्र खोट पैदा न हो सके क्‍योंकि सेल्‍फ सजेशन से  ऑटो सजेशन की यात्रा तभी पूरी होना संभव है अन्‍यथा समस्‍त सूत्र  वाक्‍य तथा सारे धर्मग्रंथ मात्र कागज के टुकड़ों पर अंकित  काले अक्षरों के सिवाय कुछ नहीं हैं। 

- सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

सोमवार, 8 जनवरी 2018

नाजायज़ शोर की बंधुआगिरी

Painting courtsey: Google images
किसी भी धर्म का मर्म व्‍यक्‍ति की अंतध्‍वर्नि को जाग्रत करने में निहित है  ताकि धर्माचरण के बाद प्रवाहित होने वाली तरंगें व्‍यक्‍ति व समाज में  सकारात्‍मक ऊर्जा फैलाने का काम करें।

शोरगुल के माध्‍यम से अपनी पहचान बनाने व बताने वाला धर्म किसी भी  कोण से किसी का भी लाभ नहीं कर सकता। ध्‍यान लगाने के लिए भी शांति  जरूरी होती है, ना कि शोर। तेज आवाज़ के साथ कही गई सही बात भी  अपना वज़न खो देती है और तेज बजने वाला मधुर से मधुर संगीत भी  किसी को प्रिय नहीं लग सकता।

ऐसे में धार्मिक स्‍थलों पर लगे लाउडस्‍पीकर्स के बारे में ध्‍वनि प्रदूषण  अधिनियम के तहत कड़ी कार्यवाही न करने को लेकर राज्‍य सरकार से  इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जवाब तलब करना आशा जगाता है कि हर  गली-कूचे में स्‍थापित धर्म स्‍थलों से आने वाली कानफोड़ू आवाजें शायद अब  जीना हराम नहीं करेंगी।

विगत वर्ष दिसंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने धार्मिक स्थलों में  बज रहे लाउडस्पीकर्स पर कड़ी नाराजगी जताई थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में  उच्चाधिकारियों को फटकार लगाकर कार्यवाही के लिए हलफनामा दाखिल  करने का आदेश दिया है।

यह आदेश मोतीलाल यादव की तरफ से दायर की गई याचिका की सुनवाई  के दौरान हाईकोर्ट ने दिया था।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अब्दुल मोइन की बेंच ने कहा था कि  प्रमुख सचिव गृह, सिविल सचिवालय और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड  के चेयरमैन अलग-अलग व्यक्तिगत हलफनामा देकर छह हफ्ते में बताएं कि  ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए उन्होंने क्या किया? इस मामले की अगली  सुनवाई अगले महीने यानि 1 फरवरी 2018 को है।

इसके अलावा हाईकोर्ट ने विभिन्‍न जुलूसों और शादी बरातों से हो रहे ध्वनि  प्रदूषण को लेकर भी कार्यवाही करने को कहा है।
हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी सहित गृह विभाग ने सभी जिलों के डीएम को  पत्र भेजकर धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाए जाने के बाद रिपोर्ट मांगी  है।
इसमें कहा गया है कि बिना अनुमति के लगाये गए लाउडस्पीकर हटाये  जाएंगे। अनुमति 15 जनवरी तक ले लेनी होगी। 15 जनवरी के बाद किसी  भी संस्थान को अनुमति नहीं दी जाएगी। 16 जनवरी से जिलों में बाकायदा  अभियान चलाकर बिना अनुमति बजाए रहे लाउडस्पीकर हटाने का काम शुरू  किया जाएगा। यह अभियान 20 जनवरी तक चलेगा और फिर इसकी रिपोर्ट  शासन को भेजी जाएगी।
यूं भी मेडीकल साइंस ने तो बाकायदा किसी भी तरह के शोर, ध्‍वनियों के  धमाके को न केवल मनुष्‍य के लिए बल्‍कि प्रकृति के हर अंश के लिए  प्राणघातक बताया है। संवेदना और सकारात्‍मकता दोनों के लिए शांति  आवश्‍यक है ना कि शोरगुल। ध्‍वनियों के प्रदूषण ने आजकल हर तीसरे  व्यक्‍ति को आक्रामक और गुस्‍सैल बना दिया है, नतीजतन शरीर और मन  दोनों बीमार हो रहे हैं। इस तरह बीमार बने हम 'जिस सुख की कल्‍पना' पाले  बाबाओं-मौलवियों की चौखटों तक जा पहुंचते हैं 'वही सुख' हमारे किसी  धर्मस्‍थल, किसी शादी-ब्‍याह या किसी अन्‍य समारोह द्वारा 'अपने-अपने  लाउडस्‍पीकर्स' के ज़रिए पहले ही छीना जा चुका है।

हम यदि ये भ्रम पाले हुए हैं कि हमारे गली, मोहल्‍ले, सामाजिक समारोह  स्‍थल व धार्मिक स्‍थल लाउडस्‍पीकर्स के साथ ही गुंजायमान होंगे तो हमने  जान-बूझकर अपनी दर्दनाक मौत को बुला रखा है।

बहरहाल, हाईकोर्ट की सख्‍ती और उप्र. सरकार की तत्परता से बौखलाए  द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद और देवबंद के उलेमा अपने  अपने तरीके से इस कदम की आलोचना करने में जुट गए हैं, मगर वो ये  भूल रहे हैं कि एक मठ की महंताई से ऊपर उठकर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने  योगी आदित्‍यनाथ जब अंधविश्‍वासों को धता बताकर नोएडा जा सकते हैं,  कुंभ में शंकराचार्यों को 'नियम विरुद्ध' ज़मीन मुहैया कराने से इंकार कर  सकते हैं, ज्‍योतिषपीठ के शंकराचार्य की पदवी के लिए दंडी स्‍वामियों को  शास्‍त्रार्थ की परंपरा आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्‍साहित कर सकते हैं और सनातन  धर्म में फैली कुरीतियों को दूर कर जानजाग्रति फैलाने का काम कर सकते हैं,  मदरसों की गतिविधियों और मौलवियों की ''खाऊ-उड़ाऊ'' संस्‍कृति को  सर्विलांस पर ले सकते हैं, वह ध्‍वनिप्रदूषण की बावत कठिन से कठिन कदम  भी उठा सकते हैं।

जो भी हो, हमें तो यह आशा करनी ही चाहिए कि कम से कम उत्‍तर प्रदेश  को तो निकट भविष्‍य में इस नाजायज शोर से मुक्‍ति मिल जाएगी और जो  लाडस्‍पीकर्स बजाए भी जाऐंगे, वे अपनी हदें पार नहीं कर सकेंगे।

-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 3 जनवरी 2018

लिखी गईं नई इबारतें...कि ये ख्‍वाहिशें रूमानी नहीं हैं...

आज के विषय पर सबसे पहले पढ़िए मेरे चंद अशआर.....

ये परेशानियां जिस्‍मानी नहीं हैं
ये ख्‍वाहिशें रूमानी नहीं हैं
और ये खिलाफतें भी रूहानी नहीं हैं
कि अब ये आवाज़ें उठ रही हैं
उन जमींदोज वज़ूदों की जानिब से,
आहिस्‍ता-आहिस्‍ता से, 
तो कहीं पूरे ज़ोर शोर से
गोया अब शिद्दतें अंजाम तक पहुंचेंगी
कि लिखी जा रही हैं नई इबारतें।



देश ज़ुदा हैं...परेशानियां भी ज़ुदा...मगर अब मुस्‍लिम महिलाओं ने अपनी आवाज़ उठाना शुरू  कर दिया है और अब ये आवाज़ें भारत व अफगानिस्‍तान से होकर ईरान तक पहुंच चुकी हैं।  ये उनकी संगठनात्‍मक शक्‍ति का ही उदाहरण हैं।

आप भी क्रमवार नज़र डालिए इन अभियानों पर-


भारत में लिखी गई नई इबारत-

वज़ूद मापने की यदि कोई इकाई होती तो आज इसकी सर्वाधिक जरूरत मुस्‍लिम महिलाओं  को होती। खुशखबरी है कि भारतीय मुस्‍लिम महिलाएं नए साल आने तक उठ खड़ी हुई हैं, वे  उठ खड़ी हुई हैं उन बंदिशों के खि़लाफ जो उनके वज़ूद पर भारी पड़ रहीं थीं। उनकी  संगठनात्‍मक भावना प्रबल हुई तभी तो सुप्रीम कोर्ट के रास्‍ते तीन तलाक़ बिल लोकसभा में  पास हो पाया।

नाइश हसन, अंबर ज़ैदी, रूबिका लियाक़त, ताहिरा हसन, शाइस्‍ता अंबर से शुरू हुआ ये सफर  आखिर में इशरत जहां तक आकर ठहरा नहीं है। पानी की तरह इन महिलाओं ने चट्टानों के  बीच से रास्‍ता निकाल लिया है। मौलानाओं द्वारा स्‍थापित रेगुलेटरी-बॉडीज को नारी शक्‍ति ने  धता बताई है। मुस्‍लिम महिलाओं ने जता दिया है कि पुरुष अब अपने बनाए नियमों को फिर  से खंगालें। बहरहाल, भारतीय मुस्‍लिम महिलाओं का तो ये आग़ाज़ है जिसे अंजाम तक चलते  जाना है।
उनकी इस जद्दोजहद की ये जीत ही तो है कि 2017 के आखिरी रेडियो संबोधन में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी द्वारा ''मन की बात'' के तहत यह बात उल्‍लेख न की जाती कि अब मुस्‍लिम  महिलाओं को बिना ''महरम'' के ही ''हज पर जाने की सुविधा'' सरकार ने शुरू कर दी है और  इसमें तमाम महिलाओं ने स्‍वयं को हज पर जाने के लिए एनरोल भी करा लिया है। अब तक  हज पर जाने के लिए ''महरम'' यानि पुरुष अभिभावक का होना महिलाओं की सुरक्षा की  गारंटी माना जाता था मगर अब कोई महिला यदि अकेले हज पर जाना चाहती है तो उसे  ''महरम'' के नाम पर रोका नहीं जा सकता।

अफगानिस्‍तान #WhereIsMyName हैशटैग ने छेड़ा 'अजी-सुनती हो' कहने के खिलाफ  अभियान -

भारत की ही तरह गुजिश्‍ता साल में कट्टरपंथ की आग से सुलगते अफगानिस्‍तान के अंदर भी  वज़ूद के लिए बदलाव की आहट भी सुनने को मिली।
गौरतलब है कि इस मुल्‍क में महिलाओं के नाम लेने का चलन नहीं है। उनको किसी की  बेगम, बहन, बेटी या मां के रूप में ही संबोधित किया जाता है। इस मामले में खास बात यह  है कि अफगान समाज में महिलाओं का नाम लेना एक तरह से गुस्‍सा जाहिर करना माना  जाता है और यदा-कदा इसको अपमान के रूप में भी लिया जाता है। अब इसके खिलाफ  अफगानी महिलाओं ने आवाज़ उठानी शुरू दी है। वे चाहती हैं कि वे अपने नाम से पहचानी  जाएं।

अफगान कानून के तहत जन्‍म प्रमाणपत्र में मां का नाम भी दर्ज नहीं होता। इन सबके  खिलाफ बदलाव की मांग अफगान समाज के भीतर से ही उठी है। सोशल मीडिया में  अफगानिस्‍तान की महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने #WhereIsMyName से एक अभियान  शुरू किया, इस अभियान के माध्‍यम से महिलाएं इस व्‍यवस्‍था में बदलाव की मांग करते हुए  चाहती हैं कि उनको उनके नाम से संबोधित किया जाना चाहिए। कुछ महीनों पहले शुरू हुए  इस हैशटेग अभियान में हजारों महिलाएं शामिल हुई, साथ ही खुशखबरी ये है कि महिलाओं  के साथ प्रगतिवादी पुरुष भी उन्‍हें प्रोत्‍साहित कर रहे हैं, हौसला बढ़ा रहे हैं।

इस अभियान से जुड़ी महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है-

गुमनामी की जिंदगी से बाहर निकलने के लिए शुरू किए गए इस अभियान से जुड़ी महिला  सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अफगानिस्‍तान में महिलाओं के नाम लेने के मामले  में ऐसी पुरातनपंथी सोच है कि महिलाएं बिना किसी निजी शिनाख्‍त के ही अपना जीवन बसर  करती हैं। यहां तक कि अंतिम संस्‍कार के समय भी महिलाओं का नाम नहीं लिया जाता और  कब्र के पत्‍थर पर भी उनका नाम नहीं लिखवाया जाता, इसलिए मौत के बाद वह सिर्फ एक  ऐसी कब्र बनकर रह जाती हैं जिसकी कोई पहचान तक नहीं होती। कब्र का पत्थर भी उन्‍हें  शायद ही पहचान पाता हो।

मुस्‍लिम महिलाओं की ऐसी ही जद्दोजहद अब ईरान में भी कट्टरपंथी आयतुल्‍ला खमैनी शासन  के शुरू हो चुकी है और उसकी गंभीरता का अंदाज सड़कों पर उमड़ रही आंदोलनकारियों की  उस भीड़ से लगाया जा सकता है, जिसमें कई दर्जन लोग मारे जा चुके हैं लेकिन आंदोलन  फिर भी जारी है। अच्‍छी बात ये है कि यहां भी प्रगतिवादी ईरानी युवक महिलाओं के कंधे से  कंधा मिलाकर शासक वर्ग की गोलियां झेलने को सड़कों पर मौजूद हैं।

बहरहाल, मैं फिर से बात भारत की मुस्‍लिम महिलाओं की संगठनात्‍मक शक्‍ति की ही करूंगी  जिन्‍हें मौलवियों के कट्टरवादी रवैये के खिलाफ सरकार का भी साथ भी मिल रहा है। हालांकि,  अब भी ज्‍यादातर महिलाऐं पारिवारिक मोर्चे पर अकेली हैं और मौलवी कहते हैं कि  तलाके-बिद्दत खत्‍म होने से तमाम ''घर बिगड़ेंगे'', मौलवी ये भी कहते हैं कि ''बिना महरम''  हज जाने वाली महिला को कयामत के रोज़ सज़ा दी जाएगी।

जो भी हो, अब तो मुस्‍लिम महिलायें ''मौलवियों की गिरफ्त से बाहर आ रही हैं'' और पूछ  रही हैं आखिर ये कयामत कब होगी। आखिर सब कुछ जो प्रगतिवाद की ओर ले जाता है कि  वह मुस्‍लिमविरोधी ही क्‍यों हो जाता है। महिलाओं को कठपुतली बनाकर क्‍या मौलानाओं की  हकीकत सामने नहीं आ गई। क्‍या एक महिला अकेली नहीं जा सकती। क्‍या मक्‍का तक जाने  वाली अकेली महिला किसी के लिए खतरा हो सकती है। शरियत जब वजूद में आई तब उसे  क्‍या ये पता था कि कंप्‍यूटर-स्‍मार्टफोन जैसी चीज दुनिया में आएगी या चांद के पार मंगल  और धरती के अंदर तक का अध्‍ययन महिलाएं करेंगी।
प्रश्‍न बहुत हैं, बहसें भी बहुत, लेकिन सिलसिला तो अभी शुरू हुआ है...सफ़र लंबा जरूर है  मगर इसकी मंज़िल एकदम स्‍पष्‍ट है। हम प्रतीक्षा करते हैं और प्रार्थना भी कि इस वास्‍तविक  आज़ादी के अभियान चलते रहें और मुकाम दर मुकाम अपनी मंज़िल की ओर आगे बढ़ें।


-अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

मशहूर शायर अनवर जलालपुरी के निधन से गमगीन हुआ माहौल

ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है
वैसे अभी मरने का इरादा भी नहीं है

हर चेहरा किसी नक्श के मानिन्द उभर जाए
ये दिल का वरक़ इतना तो सादा भी नहीं है

वह शख़्स मेरा साथ न दे पाऐगा जिसका
दिल साफ नहीं ज़ेहन कुशादा भी नहीं है....


जी हां ये नज्‍़म कहने वाले मशहूर शायर अनवर जलालपुरी नहीं रहे। 

गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले मशहूर शायर अनवर जलालपुरी का निधन मंगलवार सुबह किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ में हो गया। उन्हें चार दिन पहले ब्रेन हैमरेज होने के कारण उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। उन्होंने आज सुबह 10 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। जलालपुरी को कल दोपहर में जोहर की नमाज के बाद अम्बेडकर नगर स्थित उनके पैतृक स्थल जलालपुर में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा.

अनवर जलालपुरी देश की आज़ादी के साथ पले-बढ़े और खुली हवा में सांस लेते हुए, मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक के रूप में उभरे। 6 जुलाई, 1947 को उत्तर प्रदेश में अंबेडकर नगर जिले के जलालपुर में जन्मे अनवर जलालपुरी ने अंग्रेज़ी और उर्दू में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की फिर अंग्रेज़ी के प्राध्यापक बने।

अपने घर पर सजी महफिलों में बुजुर्गों को पानी पिलाने और पान खिलाने के दौरान अनवर जलालपुरी को कब शायरी का शौक हुआ, पता ही नहीं चला। वे आठवीं-नौवीं कक्षा के दौरान शेर कहने लगे थे। दरअसल घर में माहौल ही कुछ ऐसा था। पिता मौलाना रूम की मसनवी सुनाया करते थे। जब अनवर जलालपुरी इंटर मीडियट के छात्र के रूप में मुशायरे पढ़ने लगे तो कई बार लोग शक करते थे कि यह शेर इस नौजवान का ही है या पिता की मदद से उन्होंने लिखा लिया! देखते ही देखते एक शायर के अलावा अच्छे मंच-संचालक के रूप में उन्होंने कई बड़े मुशायरों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी और प्यार-मुहब्बत के संदेश को हमेशा प्राथमिकता दी। 

मुशायरों की जान माने जाने वाले जलालपुरी ने 'राहरौ से रहनुमा तक', 'उर्दू शायरी में गीतांजलि' तथा भगवद्गीता के उर्दू संस्करण 'उर्दू शायरी में गीता' पुस्तकें लिखीं जिन्हें बेहद सराहा गया था. उन्होंने 'अकबर द ग्रेट' धारावाहिक के संवाद भी लिखे थे.

कला की विभिन्न विधाओं में मंच का संचालन भी शामिल है। विशेषकर कवि-सम्मेलनों और मुशायरों का संचालन करने के लिए एक विशेष कलात्मक प्रतिभा की आवश्यकता होती है। उर्दू मुशायरों के संचालन के इतिहास में सक़लैन हैदर के बाद एक बड़ा नाम उभरता है- अनवर जलालपुरी का। आज अनवर जलालपुरी न केवल मुशायरों के संचालक बल्कि एक अच्छे शायर, विद्वान तथा गीता और गीतांजलि जैसी पुस्तकों को उर्दू शायरी से जोड़ने वाले रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं, उर्दू में शायरी करते हैं और संस्कृत, फारसी तथा अरबी पर भी अपना अधिकार रखते हैं। 

मंच संचालन की कला पर उनका कहना था कि यह सचमुच में बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। उन्होंने 1968 से अब तक देश के छोटे-मोटे शहरों से लेकर लाल किले के मुशायरे तक का संचालन किया। उनका कहना था कि शायर अपने समय के अनुसार, पढ़वाने की मांग रखते हैं और श्रोताओं की अपनी मांग होती है। वे अच्छे चेहरे अच्छी आवाज़ों की इच्छा रखते हैं। दोनों में सामंजस्य बनाए रखते हुए मुशायरों का सम्मान बढ़ाना अनिवार्य रहता है। 

श्रीमदभागवत गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले नामचीन उर्दू शायर को प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाजा था। 

ज्ञात हुआ है कि 71 वर्षीय जलालपुरी को ब्रेन स्ट्रोक के बाद गंभीर हालत में बृहस्पतिवार देर रात केजीएमयू में भर्ती कराया गया है। वे शाम को अपने बाथरूम में गिरने के बाद से गंभीर रूप से घायल हो गये थे। बाथरुम का दरवाजा तोड़ कर उन्हें बाहर निकालने के बाद परिजनों ने उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया था।

वहां चिकित्सकों ने उनके दिमाग में खून के थक्के, रक्तस्त्राव पाए जाने के बाद उन्हें केजीएमयू रेफर कर दिया था। लखनऊ के हुसैनगंज निवासी उर्दू शायर अनवर जलालपुरी के निधन से साहित्य जगत में शोक है। 

उनके घर पर देखने वालों का तांता लगा हुआ है। जो भी उनकी मौत की खबर सुन रहा है वह गमगीन हो जा रहा है। सभी की आंखे नम हो रही हैं। 

उन्‍हीं की रचना- 

जो भी नफ़रत की है दीवार गिराकर देखो
दोस्ती की भी ज़रा रस्म निभाकर देखो
कितना सुख मिलता है मालूम नहीं है तुमको
अपने दुश्मन को कलेजे से लगाकर देखो

विख्यात शायर मलकज़िादा मंजूर के शागिर्द रहे अनवर जलालपुरी का व्यक्तित्व अपने आप में कला, साहित्य एवं संस्कृति की उम्दा मिसाल रहा है। वे कहते हैं-

गुलों के बीच में मानिन्द ख़ार मैं भी था
फ़क़ीर ही था मगर शानदार मैं भी था
मैं दिल की बात कभी मानता नहीं फिर भी 
इसी के तीर का बरसों शिकार मैं भी था।


-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

सुनिए मंत्री जी! गले नहीं उतरने वाले ये बचकाना तर्क

किसी भी उच्‍च पदस्‍थ व्‍यक्‍ति की मन: स्‍थिति को समझने के लिए उसके भाव काफी होते हैं। उच्‍चपदासीन होने का यह मतलब यह नहीं कि पद प्राप्‍त करने वाले व्‍यक्‍ति द्वारा पद पर आसीन होने से पहले जो कुछ पढ़ा हो, वह पद की योग्‍यता के अनुरूप हो ही। किताबें पढ़कर अगर ''उच्‍च'' हुआ जा सकता तो बेचारे कबीर, तुलसी, जायसी, रसखान, पद्माकर, बिहारी जैसे कवि हमारी थाती ना बने होते।

एक वाकया कल हुआ और आज अखबारों की सुर्खियां बन गया ।
कल ऋषिकेश-हरिद्वार के एक आयुर्वेद कॉलेज में अपने संबोधन में केंद्रीय जलसंसाधन राज्‍य मंत्री सत्‍यपाल सिंह( पूर्व आईपीएस) ने गंगाप्रदूषण को लेकर अपनी सोच को जिस तरह पेश किया, वह न केवल उनके नाकारा प्रयासों को दर्शाती है बल्‍कि उन्‍हीं के कहे शब्‍दों से ज्ञात होता है कि ''नमामिगंगे-योजना'' को केंद्रीय मंत्रियों ने किसतरह मज़ाक का विषय बना दिया है।

केंद्र इस योजना के अपार धन की बात करता है मगर गंगा-प्रदूषण पर पहले उमाभारती और अब सत्‍यपालसिंह जैसे मंत्रियों के रहते न यह धन काम आने वाला है और ना ही गंगा का दम घुटने से रोका जा सकता है। उन्‍होंने कहा कि ''गंगा में अस्‍थि विसर्जन और फूल के दोने प्रवाहित करने से, संतों को भी जलसमाधि देने के कारण अधिक प्रदूषण होता है। ऐसा करना किसी भी शास्‍त्र में नहीं लिखा। गंगा में प्रवाहित करने के बजाय अस्थियों को किसी जमीन पर एक स्थान पर इकट्ठा के उसके ऊपर पौधे लगाए जाएं। ताकि आने वाली पीढ़ी उस पौधे में अपने पूर्वजों की छवि देख सकें।''

ये सही है कि पूर्वजों को याद करने का ये बेहतर तरीका हो सकता है मगर अस्‍थिवसर्जन को गंगा प्रदूषण का कारक फिर भी नहीं माना जा सकता।

मुंबई के पुलिस कमिश्‍नर रह चुके मंत्री सत्‍यपाल सिंह के बयान पर आक्रोषित संतों की भांति हम सभी सनातनधर्मी ये भलीभांति जानते हैं कि स्‍कंद पुराण, वायु पुराण, मत्‍स्‍य पुराण, नारद पुराण और विष्‍णु पुराण में गंगा में अस्‍थिविसर्जन और संतों-साधुओं की जलसमाधि का उल्‍लेख है। यूं भी राख हुई अस्‍थियां कितना जलप्रदूषित करेंगी, ये तो कोई बच्‍चा भी बता सकता है।

कौन नहीं जानता कि गंगा समेत सभी नदियां सदैव से ऐसी नहीं थी, सर्वप्रथम अंग्रेजों के शासनकाल में शहरों का सीवेज हमारी नदियों में छोड़े जाने के बाद से इसकी शुरुआत हुई जो अब सीवरेज से होते हुए प्‍लास्‍टिक कचरे और उद्योगों के तेजाबयुक्‍त प्रदूषक तत्वों तक को ढो रही हैं। इसी तेजाब ने गंगा के जलचरों को लगभग खत्‍म ही कर दिया है। इन जलचरों का जीवन ही फूल-दोनों, गंगा में प्रवाहित खाद्यसामिग्री, जलसमाधि प्राप्‍त मृत शरीरों के अवशेषों पर निर्भर हुआ करता था परंतु उद्योगों व सीवरेज के घातक अपशिष्‍ट जलचरों को खत्‍म करता गया और नतीजा यह कि अब नदियां न सदानीरा रहीं और न ही सलिला।

बेशक गंगा और उसकी सहयोगी नदियां सदानीरा रहें इसकी सभी कामना करते हैं मगर जब गंगा मंत्रालय संभाल रहे मंत्री ही ऐसी बचकाना बातें कहेंगे और उसपर जनसहयोग न होने का रोना भी रोएंगे तो आखिर कौन लेगा गंगा को प्रदूषणमुक्‍त करने के जिम्‍मेदारी।

अखाड़ा परिषद सहित संतों और हमारे जैसे आमजन को भी मंत्री की ये बात गले नहीं उतर रही। उन्‍हें संतों ने करारा जवाब देते हुए कहा है कि पहले शास्‍त्र पढ़ें मंत्री जी और जहां तक बात है जलसमाधि की तो हम तो सरकार से पहले ही भूसमाधि हेतु जमीन मांग रहे हैं, अकेले उत्‍तराखंड में ही हजारों उद्योगों का अपशिष्‍ट गंगा में ना बहाने को संतों ने कितनी बार फरियाद की, मगर आज तक उसपर तो कोई विचार भी नहीं हुआ, मंत्री बतायें कि आखिर वे गंगा प्रदूषण पर इन मांगों को क्‍यों नहीं मान रहे। क्‍या सिर्फ अस्‍थिविसर्जन और फूल के दोने ही प्रदूषण फैलाते हैं, मंत्री की दृष्‍टि में इंडस्‍ट्रियल पॉल्‍यूटेंट 
क्‍या हैं। संतों की ही बात करें तो अस्‍थिविसर्जन को पौराणिक व धार्मिक तौर पर ही सही नहीं माना गया बल्‍कि पर्यावरणीय, वैज्ञानिक, सामाजिक और भूमि के उपयोग को लेकर भी यह सर्वोत्‍तम संस्‍कार प्रक्रिया मानी गई है। अच्‍छा खासा वजनी से वजनी व्‍यक्‍ति भी सिमट कर एक लोटे में आ जाता है, क्‍या इससे फैल रहा है प्रदूषण?

फिलहाल तो गंगा-प्रदूषण पर स्‍वयं गंगा की ही हालत ऐसी हो गई है जैसी कि महाभारत के रचयिता वेद व्यास की थी, जो धर्म पालन के संदर्भ में यह कह रहे थे कि मैं अपनी बाहें उठा-उठाकर चिल्लाता हूं लेकिन मेरी कोई सुनता ही नहीं। ऐसा लगता है कि जिस महान संस्कृति को गंगा ने जीवन दिया उसका सबसे विकसित रूप देखने तक गंगा का ही जीवन नहीं बचेगा।

मंत्री सत्‍यपाल सिंह को ज्ञात होना चाहिए कि -
गंगा को ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित् श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है।
प्रसिद्ध नदीसूक्त में सर्वप्रथम गंगा का ही आह्वान किया गया है। ऋग्वेद में ‘गंगय’ शब्द आया है जिसका सम्भवत: अर्थ है ‘गंगा पर वृद्धि करता हुआ।’ 
शतपथ ब्राह्मण एवं ऐतरेय ब्राह्मण में गंगा एवं यमुना के किनारे पर भरत दौष्यंति की विजयों एवं यज्ञों का उल्लेख हुआ है। 
महाभारत एवं पुराणों में गंगा की महत्ता एवं पवित्रीकरण के विषय में सैकड़ों प्रशस्तिजनक श्लोक हैं। 
स्कन्द पुराण में गंगा के एक सहस्र नामों का उल्लेख है।

सत्‍यपाल सिंह के बचकाना तर्क और गंगा के प्रति बेहद सतही टिप्‍पणी के बाद गंगा के लिए कवि केदारनाथ अग्रवाल की ''गंगा पर कुछ पंक्‍तियां'' पढ़िए-

आज नदी बिलकुल उदास थी/
सोयी थी अपने पानी में/
उसके दर्पण पर बादल का वस्त्र पड़ा था/
मैंने उसे नहीं जगाया/
दबे पांव घर वापस आया।’

न जाने वह कौन सी नदी थी, जिसकी उदास और सोयी हुई लहरों पर कवि केदारनाथ अग्रवाल ने इतना सुंदर बिम्ब रचा था। कवि को उस रोज नदी उदास दिखी, उदासी दिल में उतर गई।

-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

चंबल की ये स्‍त्रियां- feminism से आगे की बात हैं

राजनैतिक रूप से लगातार उद्भव-पराभव वाले हमारे देश में कुछ  निर्धारित हॉट टॉपिक्स हैं चर्चाओं के लिए। देश के सभी प्रदेशों में  ''महिलाओं की स्‍थिति'' पर लगातार चर्चा इन हॉटटॉपिक्स में से एक  है। यूं तो फेमिनिस्‍ट इनकी सतत तलाश में जुटे रहते हैं मगर  उनका उद्देश्‍य हो-हल्‍ला-चर्चाएं-डिस्‍कोर्स-कॉफी मीटिंग्‍स से आगे जा ही  नहीं पाता इसीलिए आज भी ऐसी खबरें सुनने को मिल जातीं हैं जो  हमारे प्रगति आख्‍यान के लिए धब्‍बा ही कही जाऐंगी। ये फेमिनिस्‍ट  ग्रामीण भारत की ओर देखना भी नहीं चाहते और सुधार जहां से  होना चाहिए, वही पीछे रह जाता है।

ग्रामीण भारत की कई कुप्रथाएं-बेड़ियां ऐसी हैं जो महिलाओं को  इंसान ही नहीं मानना चाहतीं। इनमें से एक के बारे में शायद  आपने भी सुना होगा कि मध्यप्रदेश के चंबल इलाके में कराहल  अंचल के गांव आमेठ की महिलाएं ''पुरुषों के सामने चप्पल उतार  कर नंगे पैर चलती हैं।''

हालांकि किसानी के तौर पर यह इलाका वहां के लोगों की कर्मठता  बयान करता है। वह बताता है कि किस तरह यहां आदिवासी व  भिलाला जाति के किसानों ने आमेठ, पिपराना, झरन्या, बाड़ी,  चिलवानी सहित आस-पास के इलाकों में कंकड़-पत्थर से पटी पड़त  पड़ी भूमि को उपजाऊ बनाया है, मगर कर्मठता की इस बानगी को  पेश करने वालों ने अपनी महिलाओं की दशा को अनदेखा कर  दिया।

पता चला है कि गांव की कुल आबादी 1200 में से महिलाओं की  संख्‍या लगभग 500 है, परिवार के लिए पानी की व्‍यवस्‍था अब भी  महिलाएं ही संभालती हैं। आपको सूर्योदय से पूर्व ही गांव की  महिलाएं पानी के बर्तनों के साथ डेढ़ किलोमीटर दूर स्‍थित  झरने  की तरफ़ जाती दिख जाऐंगी। डेढ़ किमी जाने-आने का मतलब है  कि दिन के कुल मिलाकर करीब 7-8 घंटे परिवार के लिए पानी के  इंतजाम करने में बिता देना।ये महिलाऐं त्रस्‍त हैं कि उन्‍हें पुरुषों के  सामने आते ही चप्‍पल उतारनी पड़ती हैं और यह कुप्रथा उनके  आत्‍मसम्‍मान को भी चकनाचूर कर रही है।

ज़रा सोचिए कि जो महिला सिर और कमर पर पानी का बर्तन  लादकर आ रही हो, वह किसी पुरुष को सामने देखते ही अपनी  चप्‍पल उतारने लग जाए तो कैसा महसूस होगा। काफी मशक्‍कत के  बाद लाए गए पानी के गिरने की चिंता छोड़कर जब वह झुककर  पैरों से चप्‍पल निकालेगी तो निश्‍चित ही उसके मन में पुरुषों के  प्रति सम्‍मान तो नहीं रह जाएगा।

परिवार के सुख के लिए 'सम्‍मान पाने की इच्‍छा' को पीछे धकेलती  ये महिलाएं बताती हैं कि "सिर पर पानी या घास का बोझ लिए  जब हम गांव में घुसते हैं तो चबूतरे पर बैठे बुज़ुर्गों के सामने से  निकलने के लिए हमें अपनी चप्पलें उतारनी पड़ती हैं, एक हाथ से  चप्पल उतारने और दूसरे हाथ से सामान पकड़ने के कारण कई बार  वह ख़ुद को संभाल नहीं पातीं। अब ऐसा रिवाज सालों से चला आ  रहा है तो हम इसे कैसे बदलें, अगर हम बदलें भी तो सास-ससुर  या देवर, पति कहते हैं कि कैसी बहुएँ आई हैं, बिना लक्षन, बिना  दिमाग़ के, बड़ों की इज़्ज़त नहीं करतीं, चप्पल पहन कर उड़ने चली  हैं।"

इन बेड़ियों को तोड़ने की बजाय अधिकांश अधेड़ उम्र के पुरुष इस  रिवाज को अपने 'पुरखों की परंपरा' बताते हैं और इस बात पर ज़ोर  देते हैं कि 'स्‍त्रियों को पुरुषों की इज़्ज़त की ख़ातिर उनके सामने  चप्पल पहन कर नहीं चलना चाहिए। सभी स्‍त्रियां राज़ी-खुशी से  परंपरा निभाती हैं, हम उन पर कोई ज़बरदस्ती नहीं करते। आज  भी हमारे घर की स्‍त्रियां हमें देखकर दूर से ही चप्पल उतार लेती  हैं, कभी रास्ते में मिल जाती हैं तो चप्पल उतार दूर खड़ी हो जाती  हैं।

हकीकतन स्‍त्रियों को गुलामों के बतौर पेश आने वाला यह रिवाज  हर मौसम में एकसा रहता है। इस गांव सहित आसपास के कई  गांवों में ये रिवाज पहले सिर्फ 'निचली' जाति की महिलाओं के लिए  ही था लेकिन जब 'निचली' जाति की महिलाओं में कानाफूसी होने  लगी तो फिर ये 'ऊपरी' जातियों के महिलाओं के लिए भी ज़रूरी  कर दिया गया। और अब हाल ये कि इन गांवों में ज्‍यादार समय  सभी महिलाएं नंगेपांव ही दिखती हैं।

बहरहाल, इन गांवों की नई पीढ़ी की सोच एक उम्‍मीद जगाती है।  तभी तो शहर में नौकरी कर रहे युवा अब प्रश्‍न करने लगे हैं-
जैसे कि "मंदिरों के आगे से जब कोई औरत चप्पल पहन के  निकल जाए तो सारा गांव कहने लगता है कि फलाने की बहू  अपमान कर गई लेकिन गांव के मर्द तो चप्पल-जूते पहनकर ही  मंदिर के चौपाल पर जुआ खेलते रहते हैं, तब क्या भगवान का  अपमान नहीं होता."

कुछ लोग मुझे यह भी कहते मिले कि महिलाओं के प्रति ऐसे  रिवाजों के खिलाफ स्‍वयं महिलाओं को ही आगे आना होगा, मगर  यह सब इतना आसान नहीं होता जब घर के ही पुरुष महिलाओं पर  इन बंदिशों के हक में हों।

इस कुत्‍सित मानसिकता को दूर करने में शिक्षा, जागरूकता, नई  पीढ़ी में सोच के स्‍तर पर आ रहा बदलाव सहायक हो सकता है  किंतु उसमें समय लगेगा।

रही बात फेमिनिस्‍ट्स द्वारा इस तरह की कुरीतियों पर चर्चाओं की  तो वे कॉफी-हाउसों से बाहर नहीं आने वाले, इसलिए किसी भी  सकारात्‍मक बदलाव की अपेक्षा नई सोच पर टिकी है और अब जब  इस कुरीति पर बात निकली है तो दूर तलक जानी भी चाहिए।
इस क्षेत्र के किसानों को ऐसी कुरीति के विरुद्ध भी उसी शिद्दत से  खड़ा होना होगा जिस शिद्दत से वह कंकड़-पत्‍थर वाली ज़मीन को उपजाऊ बनाने के लिए उठ खड़े हुए थे ताकि वह एकसाथ प्रगति और मेहनतकशी की मिसाल बन सकें। पांवों में चप्‍पलों का न होना एक बात है और पुरुषों द्वारा अपनी छाती चौड़ी करने को महिलाओं से चप्‍पलें उतरवा देना दूसरी बात बल्‍कि यूं कहें कि यह तो फेमिनिज्‍म से आगे की बात है तो गलत ना होगा।

और अब चलते चलते ये दो लाइनें इसी जद्दोजहद पर पढ़िए- 

तूने अखबार में उड़ानों का इश्तिहार देकर,
तराशे गए मेरे बाजुओं का सच बेपर्दा कर दिया।
-अलकनंदा सिंह

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

हम पैदाइशी संन्यासी हैं, हमें तो सूतक भी नहीं लगता


हमें न अखाड़ा परिषद से मान्यता की जरूरत है, न उनके सहयोग की। अपने अधिकार व सम्मान की लड़ाई स्वयं लड़ लेंगे, क्योंकि जनता हमारे साथ है। वैसे भी हम पैदाइशी संन्यासी हैं, हमें तो सूतक भी नहीं लगता,ये कहना है किन्‍नर अखाड़े की आचार्य पीठाधीश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी का क्‍योंकि  माघ में होने वाले कुंभ मेले में विवाद से बचने के लिए मेला प्रशासन ने किन्नरों को अभी तक जमीन व सुविधाएं नहीं दी है।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद व माघ मेला प्रशासन से अखाड़ा के रूप में मान्यता नहीं मिलने से बेफिक्र किन्नर संन्यासी इस बार भी माघ मेला में डेरा जमाने की तैयारी कर रहे हैं। खुद को पैदाइशी संन्यासी बताते हुए उनका कहना है कि हमें किसी से मान्यता की जरूरत नहीं है।
हम सबसे ज्यादा त्याग भरा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हमें प्रयाग में लगने वाले माघ मेले में भजन-पूजन से कोई नहीं रोक सकता। यह बात दीगर है कि अभी तक मेला प्रशासन से उन्हें जमीन व सुविधा नहीं मिली है। प्रशासन का कहना है कि किन्नर अखाड़ा के नाम पर किसी को जमीन व सुविधा नहीं मिलेगी, हां संस्था के नाम पर सब कुछ उपलब्ध होगा।
संगमनगरी इलाहाबाद के संगम तट पर इस बार दो जनवरी से माघ मेला आरंभ हो रहा है। तंबुओं की नगरी में मोक्ष की आस में संत-महात्माओं के साथ लाखों श्रद्धालु रेती में धूनी रमाएंगे। इस बार किन्नर संन्यासी भी डेरा जमाने की तैयारी कर रहे हैं। पहली बार वह यहां अपना शिविर लगाएंगे। किन्नर अखाड़े ने मेला प्रशासन से जमीन व सुविधाएं मांगी हैं। किन्नर अखाड़ा की मांग है कि माघ मेला क्षेत्र में त्रिवेणी मार्ग पर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के शिविर के पास उसे जमीन व सुविधाएं दी जाएं।
अखाड़े की तरफ से 1500 बाई 1500 वर्ग गज जमीन, सौ तम्बू डबल प्लाई, तीन दर्जन स्विस कॉटेज, 50 नल, 50 शौचालय, 50 सोफा, 200 कुर्सियां एवं सुरक्षा को पुलिस-पीएसी के जवान मांगे हैं। इधर मेला प्रशासन का कहना है कि किन्नर अखाड़ा के नाम पर किसी को सुविधा नहीं दी जाएगी। यह निर्णय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के विरोध के चलते लेना पड़ा है।
दरअसल, अखाड़ा परिषद ने सिर्फ 13 अखाड़ों को अखाड़े के नाम पर भूमि व सुविधाएं देने की मांग मुख्यमंत्री से की है, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है। विवाद से बचने के लिए मेला प्रशासन ने किन्नरों को अभी तक जमीन व सुविधाएं नहीं दी है।
इससे बेपरवाह किन्नर अखाड़ा के आचार्य पीठाधीश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी कहते हैं कि हमें न अखाड़ा परिषद से मान्यता की जरूरत है, न उनके सहयोग की। अपने अधिकार व सम्मान की लड़ाई स्वयं लड़ लेंगे, क्योंकि जनता हमारे साथ है। वैसे भी हम पैदाइशी संन्यासी हैं, हमें तो सूतक भी नहीं लगता।
चर्चित एक्टिविस्ट के तौर पर भी ख्यात लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी यह भी कहते हैं कि 13 अखाड़े और उनके संन्यासी हमारे लिए सम्मानीय हैं, हम सबका हृदय से सम्मान करते हैं और आगे भी करेंगे। अखाड़े कुंभ और अद्र्धकुंभ में पेशवाई निकालते हैं जबकि हम देवत्व यात्रा निकालते हैं। उन्होंने कहा कि हम अपनी तुलना किसी अखाड़ा से करते ही नहीं। हम तो जन्मजात उपेक्षित हैं। पहले जन्म देने वालों ने उपेक्षित किया, बाद में समाज ने।
इसके बावजूद हमने सबको आशीर्वाद के सिवाय कुछ नहीं दिया, हमेशा सबका भला चाहा, आगे भी ऐसा ही होगा। उनका कहना है कि किन्नर अखाड़े का लक्ष्य किन्नरों को धार्मिक अधिकार व सम्मान दिलाने के साथ समाज के हर वर्ग के लोगों को धर्म के सही स्वरूप से जोड़ना है।
2016 के माघ मेले में भी किन्नर संन्यासियों के शिविर लगने की चर्चा थी। उचित सुविधा न मिलने पर किन्नर यहां नहीं आए। इस बार किन्नर अखाड़े की पहल पर मेलाधिकारी राजीव राय का कहना है कि किसी नए संगठन को अखाड़े के नाम पर सुविधा नहीं दे सकते।
अखाड़ा सिर्फ 13 हैं, हम किसी 14 वें अखाड़े को जमीन व सुविधा नहीं देंगे। हां, संस्था के नाम पर सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

हारून भाई को किसने मारा...

वो फैमिली हेयर ड्रेसर थे, दुबई रिटर्न...जी हां...''दुबई रिटर्न'', ये तमगा 90 के दशक में बड़ी बात  हुआ करती थी, वो बताते थे कि वो स्‍वयं तब वहां शेखों के पर्सनल सैलून्‍स में हजामत किया करते  थे।
खुशदिल, मिलनसार और ओवरऑल एक अच्‍छी पर्सनालिटी के मालिक थे हारून भाई। मथुरा में  उनकी दुकान हमेशा शिफ्ट होती रहती, कभी चौराहे के पास किसी नन्‍हीं सी गली में तो कभी  नामालूम वीरानी सी रोड पर। दुकान कहीं भी पहुंच जाए, मगर हारून भाई के ''हुनर'' के मुरीद  उनको तलाश ही लेते थे। उनकी कस्‍टमर लिस्‍ट में एक ओर जहां शहर के अमीरजादे, नवधनाढ्य,  गणमान्‍य नागरिक, फैशनपरस्‍त थे वहीं दूसरी ओर आमजन भी उसी शिद्दत से उन्‍हें आजमाते थे।  एक अजब सा सम्‍मोहन था उनके उंगलियों में जो नन्‍हें बच्‍चों को भी चुपचाप हेयर ड्रेसिंग कराने  को बाध्‍य कर देता।

लगभग एक साल पहले की बात है कि अचानक एक दिन उनके बेटे का फोन आया कि ''मेरे अब्‍बा  और आपके हारून भाई नहीं रहे...''। उनका जाना हमारे लिए किसी अज़ीज की रुखसती जैसा था।  बेटे से तफसील जानी तो पता लगा कि वो डायबिटिक थे, उनका शहर के जाने माने  एंडोक्रायनोलॉजिस्‍ट से इलाज चल रहा था, डॉक्‍टर ने उन्‍हें इतनी हैवी मैडीसिन्‍स दी कि उनका  पैन्‍क्रियाज ही बस्‍ट हो गया, उन्‍हें जो इंजेक्‍शन्‍स इंट्रामस्‍कुलर दिए जाने थे, वो इंट्रावेनस दिए गए,  जिससे उनका दिमाग डेड हो गया, जब शरीर में जहर फैलता देखा तब जाकर डॉक्‍टर ने उन्‍हें  दिल्‍ली के अपोलो अस्‍पताल के लिए रैफर किया, वहां का हाल भी कमोबेश ऐसा ही था, बस बच्‍चों  को सुकून था कि सर्वोच्‍च सुविधा का हॉस्‍पीटल है तो अच्‍छे रिजल्‍ट आऐंगे, परंतु कुछ दिन  वेंटीलेटर पर रखने के बाद उनका मृत शरीर ही हाथ आया।

इस तफसील का लब्‍बोलुआब ये कि अच्‍छे खासे हारून भाई को डायबिटीज ने नहीं, बल्‍कि गलत  और एक की जगह दस दवाओं के हाईडोज ने मारा और इसका जिम्‍मेदार कौन...? ज़ाहिर है वही  जिम्‍मेदार माना जाएगा जिसने दवाइयां दीं...जिसने जानबूझकर उन्‍हें कई दिनों तक अपने यहां  सिर्फ हैवी बिल बनाने के लालच में एडमिट रखा और बिगड़ती तबियत को 'अंडरकंट्रोल' बताता रहा।

ज़रा बताइये कि मरीजों की जान से खेलने वाले झोलाछाप डॉक्‍टर्स को जब हम गलत ठहराते हैं तो  ये स्‍पेशलिस्‍ट क्‍या कहे जाने चाहिए। बेशर्मी की हद देखिए कि डॉक्‍टर्स की संस्‍था ''इंडियन मेडीकल  एसोसिएशन'' यानि आईएमए इस जानलेवा अपराध को चुप्‍पी साधे देखती रहती है। डॉक्टर्स की  लापरवाही के ऐसे किसी भी मामले पर आईएमए का बोलना तो दूर, बल्‍कि उन्‍हें इस लूट-खसोट की  मौन स्‍वीकृति देती है।

कौन नहीं जानता कि हर नर्सिंग होम के भीतर मेडीकल स्‍टोर रखना नाजायज है, फिर भी रखा  जाता है, या ये कौन नहीं जानता कि पैथोलॉजीकल लैब बाकायदा कमीशन-सेंटर के तौर पर डॉक्‍टर्स  की ''साइड-इनकम'' का ज़रिया होती हैं, कैसे एक ही टेस्‍ट के लिए हर पैथलैब का रिजल्‍ट अलग  अलग होता है।

आईएमए के साथ साथ मेडीकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) भी इस बावत आंखें फेरे रहती  है कि जिन मेडीकल प्रैक्‍टिशनर्स को उसने प्रैक्‍टिस के लिए मान्‍यता दी है, वे उसका पालन कर भी  रहे हैं या नहीं। यूं तो स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय भी आंखें मूंदे था, यदि गत दिनों प्रसिद्ध हॉस्‍पीटल फोर्टिस   में डेंगू से बच्‍ची के मर जाने तथा उसके पिता को 18 लाख रुपए का बिल थमा देने जैसा गंभीर  मामला सामने न आता। अस्‍पताल की असंवेदनशीलता तथा लूट को सभी ने सुना होगा कि कैसे  अस्‍पताल के संचालकों द्वारा कई दिन पहले मर चुकी बच्‍ची का शव सिर्फ मोटा बिल बनाने के  लिए उपयोग किया जाता रहा और अंतत: बच्‍ची का निर्जीव शरीर उन्‍हें थमा दिया गया।

ये कोई किस्‍सा नहीं बल्‍कि ऐसी हकीकत है जिसे हर वो परिवार भोगता है जिसका कोई अपना  धरती पर भगवान कहलाने वाले चिकित्‍सकों की शरण में पहुंचने को मजबूर होता है।
फोर्टिस अस्‍पताल की ब्‍लैकमेलिंग के मामले ने वो सारे ज़ख्‍म ताज़ा कर दिए जो हमने हारून भाई  की मौत के बाद जाने थे।

संभवत: इसीलिए आमजन की तो अब यह धारणा हो गई है कि मल्‍टीस्‍पेशलिटी हॉस्‍पीटल, हैल्‍थ  पैकेजेज, भारी-भरकम डिग्रियों से सुसज्‍जित डॉक्‍टर्स के ये सिर्फ आधुनिक कसाईखाने हैं। हालांकि  अपवाद अभी भी शेष हैं, मगर कितने।

अब तो बस ये देखना है कि केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय की ओर से जो राज्‍यों को ''क्‍लीनकल  स्‍टैब्‍लिशमेंट एक्‍ट'' लागू करने को कहा गया है, उसे कितने समय और कितने राज्‍यों द्वारा लागू  किया जाता है क्‍योंकि इस ''क्‍लीनकल स्‍टैब्‍लिशमेंट एक्‍ट'' के तहत अस्‍पतालों को विभिन्‍न सेवाओं  व चिकित्‍सकीय प्रक्रियाओं के लिए तय फीस का ब्‍यौरा देना होगा। यदि ऐसा होता है तो अब भी  समय है कि मेडीकल जगत जनता का भरोसा कायम रख सकता है। हकीकतन तो आज कोई  डॉक्‍टर ऐसा नज़र नहीं आ रहा जो उस शपथ की सार्थकता सिद्ध कर पाने के  लायक भी हो  जिसमें पूरी मानवता की सेवा को सर्वोपरि मानने की बात कही गई थी।

बहरहाल, अफसोस तो इस बात का है कि व्‍यावसायिकता की अंधी दौड़ में पता नहीं कब धरती के  भगवानों ने शैतान का रूप धारण कर लिया और कैसे उनकी पैसे को लेकर हवस इस कदर बढ़ गई  कि उनके लिए इंसानी जान की कोई कीमत ही नहीं रही। अगर कुछ रहा तो केवल इतना कि किस  तरह मरीज के परिजनों की भावनाओं का खून की अंतिम बूंद तक दोहन किया जा सके। 

-अलकनंदा सिंह 

शनिवार, 18 नवंबर 2017

भंसाली जी! इतिहास प्रयोगधर्मी का सेट नहीं हो सकता

हाई बजट, ग्रेट स्‍ट्रैटजी, भव्‍य सेट और टॉप के कलाकारों के साथ अपनी फिल्‍म को 'महान'  बताने के 'आदी' रहे संजय लीला भंसाली ने संभवत: रानी पद्मिनी के जौहर को हल्‍के में ले  लिया। यूं आदतन उन्‍होंने बाजीराव-मस्‍तानी में भी वीरता को दरकिनार कर पेशवा बाजीराव  को भी शराबी और महबूबा मस्‍तानी के प्रेम में डूबा आशिकमिजाज़ शासक ही दिखाया था  मगर इस बार उनकी ये कथित ''अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी'' उन्‍हीं पर भारी पड़ती जा रही  है।

कुछ सेंसर बोर्ड, कुछ सरकार और कुछ जनता के भयवश अभी गनीमत इतनी है कि  ''अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी'' के नाम पर पूरा फिल्‍म जगत बस चौराहों पर नंगा होकर नहीं  नाच सकता अन्‍यथा इसी आज़ादी के चलते फिल्‍मकारों ने क्‍या-क्‍या नहीं दिखाया।

बात अगर फिल्‍म के ऐतिहासिक पक्ष की करें तो मध्‍यकालीन इतिहास में राजपूत अपनी  आन-बान-शान के लिए आपस में ही लड़ते रहे और आक्रांता इसका लाभ उठाते रहे परंतु  अब स्‍थिति वैसी नहीं है इसीलिए फिल्‍म में घूमर करती वीरांगना रानी पद्मिनी को दिखाए  जाने के खिलाफ राजघरानों-राजकुमारियों सहित महिला राजपूत संगठन एकजुट हो रहे हैं।  कुल मिलाकर पूरे मामले का राजनीतिकरण हो चुका है और इसके सहारे जहां करणी सेना  जैसे ''धमकी'' देने वाले संगठन अपना चेहरा चमका रहे हैं वहीं भंसाली भी इस अराजक  स्‍थिति को क्रिएट करने के जिम्‍मेदार हैं क्‍योंकि वो अपना भरोसा खो चुके हैं। चूंकि मामला  इतिहास का था तो कायदे से संजय लीला भंसाली को चित्‍तौड़गढ़ राजघराने की अनुमति  लेनी ही चाहिए थी और इसके चरित्र के साथ प्रयोगों से भी बचना चाहिए था क्‍योंकि यह  ऐसी गाथा है जो बदली नहीं जा सकती। 

फिल्‍म क्षेत्र तो वैसे भी देश-संस्‍कृति की गरिमा से कोसों दूर रहता आया है। ऐसे में  महारानी पद्मिनी के जौहर को पूजने वाले राजपूतों का विरोध कैसे गलत मान लिया जाए  क्‍योंकि प्रोमोज कुछ और ही बयां कर रहे हैं। कला के नाम पर इतिहास से खिलवाड़ कौन  सी ज़िंदा कौम बर्दाश्‍त करेगी भला। फिल्‍म के विरोध का राजपूतों का अभिव्‍यक्‍ति का   तरीका हो सकता है कि किसी वर्ग को नापसंद हो लेकिन उनकी भावनाओं को समझना  चाहिए क्‍योंकि भंसाली की गिनती तो ''बुद्धिजीवियों में की जाती'' है। उन्‍हें और उन जैसे  प्रयोगधर्मी फिल्‍मकारों को ये समझना चाहिए कि ना तो अस्‍मिता मनोरंजन की वस्‍तु होती  है और ना ही इतिहास को भुलाया जा सकता है। फिर ऐसे में अफवाहें भी अपना काम  करती ही हैं।

अभी जबकि सेंसर बोर्ड में भी फिल्‍म पास नहीं हो सकी है तब राजपूत संगठनों द्वारा  ''हिंसात्मक धमकी'' को भी जहां उचित नहीं ठहराया जा सकता वहीं फिल्‍म पद्मावती को  हुबहू दिखाये जाने के लिए फिल्‍म इंडस्‍ट्री के कुछ पैरोकारों द्वारा दबाव डालना भी ठीक  नहीं कहा जा सकता।

बहरहाल, जिस महाकाव्‍य ''पद्मावत'' के बहाने भंसाली खुद को बवाल से दूर करने की  कोशिश में हैं तो उन्‍हें यह समझ लेना चाहिए कि इसके रचयिता जायसी ने भी मर्यादा की  सीमाएं बनाकर रखीं थीं। अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी तो तब भी रही ही होगी। फिर उन्‍होंने  रानी पद्मिनी के चरित्र से छेड़छाड़ क्‍यों नहीं की, और क्‍यों उनके लिए अलाउद्दीन खिलजी  एक मुसलमान की बजाय एक व्‍यभिचारी आक्रांता ही रहा, जिसकी कुत्‍सित दृष्‍टि रानी पर  थी?

मलिक मोहम्मद जायसी इतिहास की एक वीरांगना स्‍त्री के आत्‍मसम्‍मान की रक्षा हेतु  'कर्म' और 'प्रेम' को उच्‍च स्‍तर तक ले जाकर पद्मावत रच सके। किसी बहस में ना पड़ते  हुए जायसी ने इतिहास और कल्पना, लौकिक और अलौकिक का सम्मिश्रण किया मगर  900 या 906 हिजरी में जन्‍मे मलिक मुहम्‍मद जायसी ने स्‍वप्‍न में भी नहीं सोचा होगा कि  जिस महाकाव्‍य को वे रच रहे हैं, वो इस तरह वैमनस्‍य का कारण बन जाएगा।

''अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी'' का एक सच यह भी है कि हमारा समाज आज तक बेडरूम के  किस्‍सों को चौराहों पर दिखाना पसंद नहीं करता, फिर ये तो शौर्य की प्रतीक एक रानी की  बात है। अत्‍याधुनिक होने के बावजूद सभ्‍यता-शालीनता-मर्यादा आज भी वांछित है। इसी  मर्यादा के कारण जायसी की अवधी भाषा में कृति ''पद्मावत'' सूफी परम्परा का प्रसिद्ध  ''महाकाव्‍य'' बन गई और भंसाली...की फिल्‍म...एक मज़ाक।

 -अलकनंदा सिंह

शनिवार, 11 नवंबर 2017

खबर आई है कि उनका दम घुट रहा है...

सुना है कि धुंध ने दिल्‍ली में डेरा जमा लिया है। ये कैसी धुंध है जो  एक कसमसाती ठंड के आगमन की सूचना लेकर नहीं आती बल्‍कि  एक ज़हर की चादर हमारे अस्‍तित्‍व पर जमा करती चली आती है।

इस धुंध ने आदमी की उस ख्‍वाइश को तिनका-तिनका कर दिया है  जो अपने हर काम और अपनी हर उपलब्‍धि को ''दिल्‍ली'' ले जाने में  लगा रहता है। सचमुच अब दिल्‍ली दूर भले ही ना लगे, मगर दिल्‍ली  से दूर रहने में ही ज्‍यादा भलाई है।

पिछले दो-तीन दिनों से दिल्‍ली पूरे विश्‍व के पटल पर चर्चा का विषय  बनी हुई है। यूं चर्चा का विषय तो स्‍मॉग है जो दिल्‍ली-एनसीआर की  बड़ी आबादी को तिल-तिल करके मार रहा है मगर वजह तो और भी  हैं जो दिल्‍ली को ज़हरीला बना रही हैं जिनमें मुख्‍य है देशभर से आई  आबादी का दिल्‍ली-एनसीआर क्षेत्र में विस्‍फोटक रूप में आकर बसना।  यहां सेर में सवासेर नहीं, बल्‍कि सेर में दस सेर समा रहा है। यानि  सब-कुछ जब कई गुना बढ़ रहा है तो स्‍मॉग कम कैसे हो सकता है।

कुल मिलाकर बात ये है कि सब जानते हैं ये समस्‍या कोई आज की  नहीं है, इसकी जड़ तो उस मूल अवधारणा में छुपी है जो हर  दिल्‍लीवासी (चाहे वह झुग्‍गीवासी ही क्‍यों ना बन गया हो) को  अतिविशिष्‍ट बनाती है। इसी सोच ने दिल्‍ली को नरक बनाकर रख  दिया है। हम सभी ये भी जानते हैं कि इस अतिविशिष्‍टता ने दिल्‍ली  को स्‍मॉग का शहर बनाने के साथ-साथ क्राइम सिटी भी बनाया है।

'सर्वसुख...? सर्वसुलभ...?' की मृगतृष्‍णा ने दिल्‍ली को आज इस  नारकीय स्‍थिति में ला खड़ा किया है कि वह आकर्षित करने की  बजाय सुरसा के मुंह की भांति भयावह नज़र आती है जो अपनी  ज़मीन पर आने वाले हर वाशिंदे को निगलने को आतुर है।

जहां तक बात है स्‍मॉग की, तो स्‍मॉग कोई सिर्फ दिल्‍ली की समस्‍या  नहीं है, इस मौसम में लगभग हर शहर इस समस्‍या से दो-चार होता  है मगर चूंकि नेशनल मीडिया दिल्‍ली में बैठा है और एक एक खबर  पर वो 24 घंटे चीखने की कुव्‍वत रखता है सो स्‍मॉग की ''चपेट'' में  आ जाती है दिल्‍ली, और आननफानन में एनजीटी से लेकर सुप्रीम  कोर्ट तक अतिसक्रिय हो जाते हैं। बाजार में 'एअरप्‍यूरीफायर' और  'मास्‍क' के ब्रांड मॉल्स से लेकर फुटपाथों तक सजा दिए जाते हैं।

हकीकतन दिल्‍ली की हवा में ज़हर की ये समस्‍या पलायन से उपजी  है, समस्‍या हर किसी के दौड़ने और दौड़कर लक्ष्‍य पाने की आपाधापी  से उपजी है, समस्‍या हर किसी के भीतर पैदा हुए बेशुमार लालच से  उपजी है, समस्‍या गांवों के खाली होने से और शहरों में भीड़ के  पहाड़ों से उपजी है, समस्‍या उस सोच से भी उभरी है जो दिल्‍ली वाला  बनने के लिए अपने जीवन, अपने रिश्‍तों, अपने बच्‍चों, अपने सुकून  को दांव पर लगा देती है मगर उसे बदले में हासिल होता है ज़हरीली  सांसों का उपहार।

यूं रस्‍मी तौर पर स्‍मॉग चर्चा में है और अगले कुछ दिनों तक रहने  भी वाली है, इस ज़हरीली धुंध के कारण-निवारण ढूढ़े जाऐंगे, हर बार  की तरह इस बार भी सर्दी के पूर्ण आगमन से पूर्व ये तमाशा चलता  है...चलता रहेगा।

लीजिए इसी हमारी 'धुंध' यानि दिल्‍ली की 'स्‍मॉग' पर मेरा एक शेर -

कोई हमें मारने को आए क्‍यूं भला
हम खुद अपने ताबूतों को नीलाम किए बैठे हैं।

-- अलकनंदा सिंह