मंगलवार, 10 जुलाई 2018

क्रूरता की हदें पार करने पर veal का विरोध अभीतक क्‍यों नहीं हुआ

veal के रूप में क्रूरता को तो हम अपनी थाली में परोसकर चल रहे हैं , मैं किसी के आहार को नियंत्रित करने की बात यहां नहीं कह रही परंतु मगर भक्ष और अभक्ष का भेद तो करना ही होगा अन्‍यथा ये क्रूरता हमारी हमारे दिमाग को कहीं का नहीं छोड़ेगी।

पिछले कई दिनों से जब लगातार नन्‍हीं बच्‍चियों के साथ बलात्‍कार की खबरें पढ़-सुन कर मुझे बहुत बेचैनी हो रही है तो उन मांओं के साथ क्‍या बीतती होगी जिनके बच्‍चों को सिर्फ 'मारने के लिए ही' जन्‍माया जाता है। जी हां, मांसाहारियों में एक नाम बड़ा प्रचलित है 'वील'। जो वील खाता है, वह शेखी बघारता है कि उसका पसंदीदा भोजन वील है।

इसी 'वील' से जुड़ी एक मार्मिक खबर आपको सुनाती हूं... कि भारत के तकरीबन सभी फाइव स्टार होटलों में 'वील' की खास डिमांड होती है और दावत का स्‍टैंडर्ड नापने के लिए इसे मेजबान और मेहमान के बीच बड़ी अहमियत दी जाती है। सभी मांसाहारी का तो पता नहीं परंतु जो बीफ की बात करते हैं या इनमें से जो उच्‍चशक्षित और संपन्‍न परिवार के हैं, वे बखूबी परिचित होंगे ‘वील’ से परंतु उनमें से कम ही होंगे जो यह जानते होंगे कि आखिर वील तैयार कैसे होता है, मैं यह दावे से कह सकती हूं कि वील तैयार करने के प्रक्रिया जानकर उनमें से तमाम मांसाहार ही छोड़ देंगे।

फाइव स्‍टार की मांसाहारी पार्टियों में अपने स्‍टैंडर्ड को दिखाने के लिए परोसा जाने वाला वील आखिर है क्या? दरअसल यह गाय के उस नन्हें बछड़े का मांस होता है, जिसे भूखे रखकर मार दिया गया हो ताकि उसका मांस हल्‍का (सफेद-पीला) रंग लिए हुए गुलाबी भी नज़र आए, इतना ज़र्द कि उजले रंग का सा लगे। जन्म के तकरीबन 14 हफ्ते बाद ऐसे बछड़े को काट दिया जाता है।

‘veal’ मांस के लिए बछड़े तैयार करने की वीभत्‍सता जानकर दिल को थाम लेंगे आप भी। यह मांस-उद्योग के लिए पशुपालन के बाकी सभी रुपों में सबसे ज्यादा वीभत्‍स है। पशु की इस नियति से तो कहीं उसकी मौत अच्छी। ‘वील’ तैयार करने के लिए जन्म के एक- दो दिन बाद ही नन्हें बछड़े को उसकी मां से अलग कर दिया जाता है। इस बछड़े को काठ के एक तंग और 22 इंच गुणे 54 इंच के अंधेरे दड़बे में जंजीर से बांधकर रखा जाता है। दड़बा इतना तंग होता है कि उसमें बछड़े का शरीर बमुश्किल समा पाता है। चल-फिर ना पाने के कारण बछड़े की मांसपेशियां एकदम शिथिल पड़ जाती हैं और मांसपेशियों की यही शिथिलता मांस को मुलायम बनाती है। बछड़ा कभी खड़ा भी नहीं होता, सिवाय उस एक वक्त के जब उसे काटने के लिए ले जाया जाता है और इस घड़ी तक बछड़े की टांगें बेकाम हो चुकी होती हैं।

अंधेरे और मिट्टी की छुअन से दूर, बिना मां के दूध और घास के, इस बछड़े के मुंह में कुछ घंटों के अंतराल पर जबरदस्ती एक बोतल उड़ेली जाती है जिसे भोजन कहा जाता है जबकि भोजन के नाम पर यह लुगदीनुमा दवाई तरल वसा (फैट) होती है। बछड़े की चमड़ी में सूइयां चुभायी जाती हैं और यह सब इसलिए किया जाता है ताकि बछड़ा जिन्दा रहे और मोटा होता जाए। उसमें जान-बूझकर लौह-तत्व (आयरन) या ऐसे ही जरुरी पोषक तत्व नहीं डाले जाते। ऐसे भोजन के कारण पशु में आयरन की कमी हो जाती है। आयरन की कमी के ही कारण बछड़े का मांस जर्द पीला या कह लें तकरीबन उजला नजर आता है जो कि वील के लिए जरूरी माना जाता है।

‘वील’ मांस के लिए बछड़े को तैयार करने वाले किसान उसे जरुरत भर का पानी भी नहीं पिलाते, प्यास से बेहाल बछड़ा भोजन के नाम पर दिए जा रहे बदबूदार तरल वसा को पीने के लिए बाध्य होता है।
इस बछड़े को भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्‍स दी जाती हैं ताकि न्यूमोनिया और डायरिया से वह बचा रहे। यह एंटीबॉयोटिक्स वील खाने वाले के शरीर में भी पहुंचता है लेकिन सिर्फ एंटीबॉयोटिक्स ही नहीं पहुंचता बहुत कुछ और भी पहुंचता है।

वील का उत्पादन करने वाली ज्यादातर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां बछड़े को एक खतरनाक और अवैध दवा क्लेनबुटेरॉल भी देती हैं। यह बछड़े के शरीर को बढ़ाता और उसमें आयरन की ज्यादा कमी पैदा करता है ताकि बछड़े का मांस ज्यादा उजला दिखे, मांस जितना उजला दिखेगा, उसकी कीमत उतनी ज्यादा लगेगी। दूसरे 16 हफ्ते की जगह उसे 12-13 हफ्ते में ही काटने के लायक मान लिया जाता है।

गौरतलब है कि वील के ज़रिए क्लेनबुटेरॉल मांस-उपभोक्ता के शरीर में जाने पर हृदय की धड़कन का बढ़ना, कंपकंपी आना, सांस लेने में कठिनाई होना, बुखार होना और मौत होने तक का खतरा 90% बढ़ जाता है।
हालांकि भारत के होटलों में वील गैरकानूनी, चोपी छिपे मिलता है क्‍योंकि भारत में वील का उत्पादन करना गैरकानूनी है परंतु फाइवस्‍टार होटलों ने इसकी काट निकाल ली है, वे कहते हैं हमने वील का आयात किया है।
मुझे पक्का यकीन है कि होटलों पर छापेमारी की जाए तो पता चलेगा कि इम्पोर्ट लाइसेंस और वील की खरीदी की मात्रा उससे कम निकलेगी जितना कि बेचा गया है। बहुत से होटल वील बेचते हैं और अपने मैन्यू में वील के नीचे ‘इम्पोर्टेड’ (विदेश से मंगाया) लिखते हैं। 'इम्पोर्टेड' लिखने का अर्थ ही यह है कि हमारे देश में भी चोरी-छुपे इसका व्यवसाय चल तो रहा है।

बहरहाल 'इम्पोर्टेड' के तर्क को पेश करने से उनका ''वीभत्‍सता के ज़रिए व्‍यापार करने'' का दोष तो खत्म नहीं हो जाता ना।

यह भी सत्‍य है कि कानूनी तौर पर वील का आयात DGFT (Directorate General of Foreign Trade) के अंतर्गत हमेशा प्रतिबंधित रहा है और जिन होटलों में स्वदेशी या आयातित वील परोसा जाता है उनपर एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई की जा सकती है परंतु अभी तक ऐसी कार्यवाही कहीं नहीं हुई।

निश्‍चित रूप से वील मांस की तैयारी के लिए पाले जा रहे बछड़े की नियति और व्यवस्थित क्रूरता क्‍या हमें ये सोचने पर बाध्‍य नहीं करती कि जैसा खाओगे अन्‍न वैसा बनेगा मन। दरअसल क्रूरता को तो हम अपनी थाली में परोसकर चल रहे हैं फिर यह आशा कैसे करें कि वे ''आहें'' हमारा विनाश नहीं करेंगी, फिर चाहे विनाश बुद्धि का हो या शरीर का।
-अलकनंदा सिंह

शनिवार, 7 जुलाई 2018

संगीत की साक्षात् देवी सिद्धेश्वरीदेवी: सात स्वरों की स्वर्ग-सृष्टि

क्‍या हुआ जब डॉ. सुरेशव्रत राय इंटरव्‍यू लेने के लिए सिद्धेश्वरीदेवी से मिले ---

चलिए आज आपको एक अद्भुत संस्‍मराणात्‍मक लेख से परिचय कराते हैं, फरवरी 1971 में क्‍या हुआ जब डॉ. सुरेशव्रत राय सिद्धेश्वरीदेवी से मिले । जी हां, इलाहाबाद के रहने वाले डा. सुरेशव्रत राय, किताब सारंगी के लेखक, ध्रुवपद की व्‍याख्‍या करने वाले डा. राय जब प्रसिद्ध शास्‍त्रीय गायिका सिद्धेश्वरीदेवी से मिलने उनके घर गए तब........


बंगले का पोर्टिको लांघकर मैं बरामदे में पहुंचा ही था कि सामने के कमरे का परदा हिला, और एक सज्जन ने बाहर आकर मुझसे पूछा- ‘कल आपने ही सिद्धेश्वरीजी से मिलने का समय लिया था न? आइये.’ और बड़ी शिष्टता से बगल के कक्ष में ले गये.
श्वेत परिधान पहने, सफेद चादर पर श्रीमती सिद्धेश्वरीदेवी संगीत की अधिष्ठात्री देवी ‘सर्वशुक्ला सरस्वती’ की भांति विराजमान थीं. मेरे हाथ अनायास जुड़ गये और तभी मेरे कानों में ये स्नेहसिक्त शब्द प्रविष्ट हुए- ‘आवा बचवा आवा, तोहार सनेस मिलल, संगीत-चर्चा के लिए जौन समय निश्चित कइले रहली, ओकर बाट जोहत बैठल हई.’
मैं ठगा-सा रह गया. पहले कभी देखा-सुना नहीं, पर भोजपुरी के इस एक वाक्य में मुझे आत्मीय बना लिया! मैंने भोजपुरी का अपना सारा ज्ञान बटोरकर बड़े परिश्रम से कहा- ‘आपके संगीत रेडियो पर, अउर काफ्रेंस में तो बहुत सुनीला, बाकी एतने नगीच से वार्ता करै के न साहस भयल अउर न अवसर मिलल! संगीत के साथ संगीत-ज्ञान के बारे में अउर ओनकर संगीत के विषय में जाने की इच्छा के कारण आज भेंट वार्ता के ढिठाई कइली.’
उसी स्निग्ध स्वर में उत्तर मिला- ‘अरे बचवा, अपने घरे आवे में कइसन संकोच अउर कइसन ढिठाई? संगीत साक्षात नाद ब्रह्म हो, अउर संगीत-प्रेमी तो बस समझा भगवान से बढ़कर ओनकर भक्त हउअन. अइसन चर्चा बड़े भाग से होला. लेकिन उतनी दूर से आएल हउआ, पहिले कुछ जलपान करा, तब कुछ चर्चा होई.’ और कैसा ममत्व था उनके मुखड़े पर!
मैंने कैफियत दी की अभी-अभी भोजन करके आया हूं, तनिक भी गुंजाइश नहीं है. मगर कहीं-न-कहीं मुझे उनका दिया प्रसाद लेना ही था. अपनी चांदी की डिबिया से पान के दो बीड़े निकालकर मेरी ओर बढ़ाती हुई बोली- ‘पान घुलावे में तो कोई हर्जा हौ नाहीं, बनारसी मगही पान के बीड़ा मुंह में रख के ध्यान से संगीत सुना, चर्चा करा. फिर देखा पान के रस मुंह में घुलत हौ अउर ओकरे संग संगीत के रस रोम-रोम में समात हौ.’
मैंने श्रद्धापूर्वक पान लेकर बैग में रख लिया. उनकी आत्मीयता ने मन में मिस्री घोल दी थी. परंतु मुझे यह भय भी सता रहा था कि अपनी टूटी-फूटी भोजपुरी के सहारे बातचीत की गाड़ी चलाना कठिन है. आखिर मैंने हिचकिचाते हुए यह बात कह दी. इस पर वे बच्चों की तरह खिल-खिलाकर हंस पड़ीं ओर बोलीं- ‘हमार खड़ी बोली के परिच्छा लेना हौ, चला एही में सही.’
बातचीत बचपन की स्मृतियों और संगीत के प्रति अनुराग अंकुरित होने की कथा से आरंभ हुई. वे बताने लगीं- ‘जिसने मां का प्यार जाना ही नहीं, उसका बचपन क्या हो सकता है! जब मैं डेढ़ वर्ष की थी, तो मां का देहांत हो गया और जब ग्यारह वर्ष की हुई, तो पूज्य पिताजी भी परलोक सिधार गये. परंतु मेरी मौसी राजेश्वरी जी ने मेरा न केवल लालन-पालन किया, बल्कि मुझे मां का प्यार भी दिया. आज अगर मैं कुछ हूं, पूज्य मौसीजी की बदौलत हूं.’
जैसे वे मौसीजी के महत्त्व से मुझे पूरी तरह परिचित करा देना चाहती थीं.
‘मेरी मौसीजी को हिंदी, उर्दू और थोड़ा बहुत अंग्रेजी, बंगला का भी ज्ञान था. मुझे शिक्षा-दीक्षा उन्होंने घर पर ही दी और संगीत में मेरी रुचि देखकर संगीत-शिक्षा आरंभ की. उनकी माताजी अपने युग की श्रेष्ठ गायिकाओं में से थीं और काशी में ‘बड़ी मैना’ के नाम से प्रसिद्ध थीं. लोग बतलाते हैं, उनकी आवाज बहुत मधुर होते हुए भी इतनी बुलंद और तेज थी कि वे ‘बुढ़वा-मंगल’ के मेले में गातीं शीतला या चौसट्टी घाट के पास, तो सुनाई देंती रामनगर के पास तक.’
राजेश्वरी मौसी अपनी मां से बढ़कर ही निकलीं. वे और उनकी बहन विद्याधरी अपने समय की श्रेष्ठ गायिकाएं थीं. काशीदरबार की संगीत महफिल इनके बिना सूनी रहती. राजेश्वरी मौसी ‘हुस्ना’ और विद्याधरी ‘महफिले रोशन’ के नाम से प्रसिद्ध थीं. खयाल हो चाहे ठुमरी, ये विशुद्ध बनारसी अंग ही गाती थीं. यही नहीं, मेरे नाना बदरीरामजी राजा बलवंत सिंह और चेतसिंह के समय के श्रेष्ठतम तबला-वादक थे. इस तरह हमारे परिवार की संगीत-परंपरा कई सौ वर्ष पुरानी हो चली.’
और आगे की संगीत-शिक्षा?
‘लगभग आठ-नौ वर्ष की आयु में श्री सियाजी महाराज मिश्र के चरणों में मेरी संगीत-शिक्षा आरंभ हुई. वे अपने समय के चोटी के सारंगी-वादक थे और ध्रुवपद, खयाल तथा ठुमरी के सबसे बड़े जानकारों में से थे. गुरुजी को देने के लिए मेरे पास सिवा श्रद्धा के था ही क्या? मगर गुरुजी निस्संतान थे, उन्होंने मुझे कला दी, पिता का स्नेह और संरक्षण भी दिया. अंतिम सांस तक वे मुझे अपनी बेटी मानते रहे. पंचगछिया स्टेट में गुरुजी ने आफताबे-मौसीकी उस्ताद फैयाज खां के सामने स्टेज पर पहली बार मेरा गायन कराया. अपने उस केदार के खयाल-गायन को मैं आज भी भूल नहीं सकी हूं. और तब से बस चला जा रहा है. गुरुजी के देहांत के पश्चात स्वर्गीय बड़े रामदासजी से संगीत सीखने का सौभाग्य मिला.’
श्रीमती सिद्धेश्वरीदेवी जिस खूबसूरती से खयाल की अदायगी करती हैं, उसी अदा और भावपूर्णता से ठुमरी प्रस्तुत करती हैं. कारण है उनकी तन्मयता. खयाल में स्वर-विस्तार प्रधान है, जबकि ठुमरी में भाव प्रमुख होता है. परंतु सिद्धेश्वरीदेवी की गायन-शैली में दोनों का मिश्रित रूप प्रतिबिंबित होता है, जिससे उनकी गंगा-जमुनी शैली में सजीवता आ जाती है. ठुमरी को खयाल अथवा अन्य गायन-शैलियों की तुलना में सरल और हीन मानना उनकी दृष्टि में निरा अविवेक है. और वे ऐसा नहीं मानतीं कि श्रेष्ठ गायक के लिए ध्रुवपद, खयाल, ठुमरी, टप्पा आदि समस्त गायन-शैलियों में पारंगत होना आवश्यक है.
उनकी तो मान्यता है- ‘एक शैली में भी सिद्धि प्राप्त करके श्रेष्ठ गायक संगीत को दिशा दे सकता है. कहा भी है- एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय. संगीत की डिग्री-डिप्लोमा ले लेना, आकाशवाणी या सम्मेलनों में प्रोग्राम मिलना, संगीत की नौकरी मिलना, बीच की सीढ़ियां हो सकती हैं, लेकिन आखिरी मंजिल तो अनहद नाद की अनुभूति है.’
बातचीत की धारा न जाने कब अतीत की ओर फिर मुड़ गयी थी. वे पुराने दिनों का चित्र खींचने लगीं.
‘तुलसी का एक पद है- वसुधा पै वसुधारस जात बहा है. काशी में बहते उस सुधारस का पान करते-करते हर काशीवासी के गले में अमृत बस गया था. चाहे कजरी हो, चाहे चैती, यहां के जीवन का कण-कण संगीतमय था. एक तो साल-भर मेलों और त्योहारों के कारण गाने-बजाने का बराबर सिलसिला लगा रहता, दूसरे काशी में पग-पग पर बसे मंदिरों में आये दिन संगीत की महफिलें होतीं. कार्तिक मास में जाड़ऊ मंदिर, चैत्र में शितल मंदिर, मसान बाबा, किनाराम बाबा, फागुन में रामनगर (दुर्गा-मंदिर), गोपाष्टमी को पुराने विश्वनाथ, आदि विशेश्वर, बड़ा गणेश, बटुक मंदिर के प्रांगण राग-रागिनियों से गूंजते रहते. सावन में सारनाथ और दुर्गाजी के मंदिरों में महफिलें जमतीं. श्रद्धा और शौक के कारण दूर-दूर से सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ आते और बिना किसी पारिश्रमिक के,मंदिरों में अपनी कला के फूल चढ़ा कर अपने जीवन और अपनी कला को धन्य समझते.’
‘होली समाप्त होते-होते फिर बुढ़वा-मंगल का संगीत-जश्न सात दिन दिन-रात चलता और फिर ‘गुलाब बाड़ी’ उत्सव. रईसों की हवेलियों में महफिलें होती और उन महफिलों में गजरा, झूमर और दंगल होते. गायिकाओं में अपनी कला के प्रदर्शन की होड़ लग जाती और अजीब समां बंध जाता. हर महफिल का अपना निराला रंग. अलावा इनके ‘जुमागी’ होती, जिससे रियाज और भी पक्का होता जाता.’
मेरे मुख के भाव से जैसे ताड़ गयीं कि ‘जुमागी’ शब्द मेरे पल्ले नहीं पड़ा है. वे समझाने लगीं- ‘इसे बस यों समझिये कि गाने-बजाने वालों का शुक्रवारी क्लब, जो अक्सर किसी गाने-बजाने वाले के घर पर होता था. इन गोष्ठियों में गुरु-शिष्यों के समेत, हर श्रेणी के संगीतज्ञ भाग लेते थे. एक ही बोल या तान की अदायगी अलग-अलग ढंग से करने की होड़ तो होती ही थी, साथ में संगत की लडंत भी बड़ी बेमिसाल होती.’
‘जुमागियों में संगत करने के लिए सुर-सहाय, सियाजी महाराज, सुमेरु, पनारू, शंभू खां, नज्जू,खां, कल्लन खां जैसे सारंगी-वादक, सोनाजी जैसे हारमोनियम-वादक और वीरू महाराज, वाचा मिश्र, हरिजी, मौलवी राम, अनोखेलाल, कंठे महाराज जैसे महारथी तबला-वादक पधारते थे. कभी-कभी महफिलें संगीत-प्रेमी रईसों के घर भी होती थीं.’
‘संगीत-कला के पारखियों की उस महफिल का नाम सुनते ही बड़े-बड़े कलाकारों को पसीना आने लगता. मगर इसमें नये गाने बजाने वालों को सीखने-समझने का काफी मौका मिलता और बुजुर्ग संगीतज्ञ सीखने वालों का बड़े प्यार से मार्गदर्शन करते थे.’
फिर सिद्धेश्वरीजी एक ठंडी सांस लेकर बोलीं- ‘अब कहां रहे वे दिन और उस समय की काशी! वैसी महफिलें और उनका माहौल तो बस एक यादगार बनकर रह गया है.’ उनके स्वर में पीड़ा थी.
मैंने विषय बदला- ‘चैती कजरी को आप इस खूबसूरती से पेश करती हैं कि सुनने वाले जैसे सावन की फुहार में झूला झूलने लगते हैं.’ उनका उत्तर था- ‘इसका श्रेय मुझे नहीं, बल्कि काशी को है. काशी की माटी में लोटकर मैंने जीवन का अधिकांश भाग बिताया है, गंगाजी को स्पर्श करती हुई हवा में मैंने सांस ली है. आजकल मुझे ठुमरी की शिक्षा देने के सिलसिले में जरूर दिल्ली में रहना पड़ रहा है, लेकिन काशी मेरे रोम-रोम में बसी है.’
फिर बोलीं- ‘आप पूछ रहे थे, कजरी मैं इतनी भावना के साथ कैसे गाती हूं? कजरी का नाम लेते ही जैसे मैं पहुंच जाती हूं काशी के ‘बाहरी अलंग’ में, जहां किसी बाग में या जंगल में झरने के किनारे भांग-बूटी छन रही है, ‘साफा लगाया’ जा रहा है, और गाना-बजाना हो रहा है. या फिर मुझे लगता है कि रंग-बिरंगी साड़ियां पहने सारनाथ के मेले में कजरी गाती हुई गंगा की लड़कियों के झुंड में मैं भी चली जा रही हूं. जगह-जगह बन रही दाल-बाटी , दुकानों पर बन रही जलेबियों, अनरसे की सोंधी महक में, सावन की फुहार और झूले पर लगती ठंडी बयार में मेरा मन हिलोरें लेने लगता है. फिर मैं क्या गाती हूं, यह मुझे स्वयं पता नहीं रहता. मैं तो सिर्फ इतना जानती हूं कि उन झूलों और कजरी के बीच मैं खो जाती हूं.’
जब सिद्धेश्वरीदेवी तुलसी या कबीर के पद गाती हैं, तो भक्तिरस की गंगा बहने लगती है. मैंने कहा- ‘सुना है, डॉ. राजेंद्र प्रसादजी आपके भजनों के बड़े प्रशंसक थे!’ बोली- ‘वे तो संत थे, उन्होंने हमारे संगीत की प्रशंसा की. नहीं तो हमारे पल्ले क्या है? वैसे भी भाई, राम को रिझाना ही तो संगीत का लक्ष्य है. ‘ओम, तोम, हरि’ के साथ जब मैं अलाप आरंभ करती हूं, तो मुझे सुध-बुध नहीं रहती. कभी ‘मन लागो मेरो यार फकीरी में’ भजन मुंह से निकलने लगता है,तो कभी सूर-तुलसी का दूसरा कोई भजन, और फिर मुझे इसका बिलकुल पता नहीं रह जाता कि कौन गाने वाला दूसरा ही कोई है. या यों कहूं कि मैं साज बन जाती हूं, जिस पर सुर कोई और ही छेड़ रहा होता है. मुझे तो बस लगता है, ऊपर से संगीत-रस की वर्षा हो रही है, मैं भीग रही हूं. और इच्छा होती है, भीगती रहूं, अपने जीवन की अंतिम सांस तक…’
और बोलते-बोलते न जाने कब वे भजन गाने लग गयीं- ‘शिव-शिव के मन शरण हो, तो प्राण तन से निकलें.’ भक्तिभाव में पगे उस नाद-प्रवाह में गायिका और श्रोता का अस्तित्व जैसे विलीन हो गया था. केवल गेय का साम्राज्य था…‘शिव-शिव के मन शरण हो…’


बुधवार, 4 जुलाई 2018

जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है

"उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है ।"

वसीम बरेलवी का यह शेर, इंसान को इंसान की तरह नज़र आने और इंसान को इंसानियत से पेश आने का सलीका सिखाता है मगर इतनी खूबसूरती से इंसानियत की बात हो और सामने खबरों में बुराड़ी, सतना, मंदसौर आदि-आदि चल रहे हों तो जहन का कसैला हो जाना लाजिमी है।
Picture Courtsey: Google
अंधविश्‍वास की सारी हदें तोड़कर बुराड़ी में सामूहिक आत्‍महत्‍या करने वाले लोग इंसानियत के नाम पर भी किसी रहम के हकदार नहीं हैं। बेशक मानवाधकिारवादी इनके लिए रहम की बात करते हुए इनके मनोविकार का वास्‍ता देंगे, कुछ ऐसे भी होंगे जो राष्‍ट्रीय राजधानी में अकेलेपन या यहां के सामाजिक कटाव को ऐसी प्रवृत्‍तियां पनपने देने के लिए कारण बतायेंगे। शायद ही कोई होगा जो कम से कम सार्वजनिक रूप से इन ''मरने वालों की अपनी सोच'' को इनकी आत्‍महत्‍या का कारण बतायेगा।

दूसरे उदाहरण भी इंसानियत के ही नाम पर हमें शर्मसार करते हैं। मंदसौर और सतना में बच्‍चियों के साथ हुई बर्बरता की आलोचना के लिए मेरे शब्‍दों ने काम करना बंद कर दिया है। हम निर्भया और संभवत: इससे पहले भी ऐसी बर्बरता को सुनते व देखते आए हैं परंतु अब चंद महीने, चंद साल की बच्‍चियां वहशियत का शिकार हो रही हैं। अपनी उम्र के इस छोटे से अंतराल में वे तो इसका दर्द भी बयां करने की स्‍थिति में नहीं होतीं। अपराधी पकड़े जायें या नहीं, वे नहीं जानतीं, शरीर के किन भागों को किसने किस मानसिकता से चोट पहुंचाई, वे नहीं बता सकतीं। लगा लो पॉक्‍सो और चढ़ा दो फांसी पर, चाहे अपराधी को धर्म और जाति पर बांट दो या उसे मानसिक विकार से ग्रस्‍त बता दो, क्‍या फर्क पड़ेगा। बच्‍चियों के शरीर का जो हाल हो चुका, वह अब हमेशा उनके जहन पर हावी रहेगा।

हालांकि मैं यह नहीं कह रही कि वहशियों को सजा न मिले, बल्‍कि अधिकतम दंड उन्‍हें दिया जाना चाहिये और संतोषजनक बात ये है कि ऐसा हो भी रहा है। समाज में बलात्‍कारियों के प्रति घृणा का स्‍तर बताता है कि हम अब इसे दबाने या सहने की स्‍थिति से आगे निकल आए हैं, ये अच्‍छा है परंतु अब इसके आगे क्‍या।

क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता कि कहीं न कहीं हम भी समाज में फैल रहे इस कोढ़ के लिए जिम्‍मेदार हैं। अपने बच्‍चों को ''भयमुक्‍त माहौल'' न दे पाने के दोषी हैं। ज़रा याद कीजिए कि आपने कब-कब अपने पड़ोसी के बच्‍चे को गलत बात पर टोका है, या उसके घर शिकायत की है, कब किसी आवारा व्‍यक्‍ति को फालतू बैठने के लिए मना किया है, कब अपने या किसी परिचित के बच्‍चे (बेटा हो या बेटी) को मोबाइल से अलावा भी रिश्‍तों को निबाहने की सीख दी है, या कब अपने ही बच्‍चों को बड़ों के पैर छूने की हिदायत दी है जबकि यही वो बातें हैं जो सामाजिक रिश्‍तों को गहरा करके उन्‍हें समझने की सीख देती हैं।

हमने स्‍वयं ही अकेलेपन को फैशन बनाकर कई पीढ़ी पहले से रोपना शुरू कर दिया था लिहाजा अब इसके आफ्टरइफेक्‍ट कहीं बलात्कार तो कहीं आत्‍महत्‍या के रूप में सामने आ रहे हैं। 

उक्‍त सभी घटनाओं में एक बात कॉमन है कि ये सभी समाज के भीतर समाज के ही अकेले होते जाने, हमें क्‍या... कोई कुछ भी करे, बस हमारा काम बने, हमारा कुछ ना बिगड़े, कोई अपने घर में क्‍या कर रहा है, ये उसकी प्राइवेसी का मामला है और ये प्राइवेसी ही हमें, हमारे समाज को, हमारे मूल्‍यों को साबुत ही निगल रही है।

अब समझ में आ रहा है कि जब सामाजिकता दरकती है तो रिश्‍ते-नाते-परिवार व संस्‍कार भी दरकते हैं और इनकी दराज़ों से निकलता है अकेलापन, बहशतें, अवसाद। फिर नतीजा बुराड़ी, मंदसौर व सतना जैसे केस में तब्‍दील हो जाता है। तो आज से ही अपने बच्‍चों के साथ स्‍वयं को भी तैयार करें, देश व समाज को सुरक्षित व सुसंस्‍कृत बनाने के लिए संकल्‍प तो लेना ही होगा वरना आने वाला समय हमारी निकृष्‍टता और खुदग़र्जी़ को कभी माफ नहीं करेगा।

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 29 जून 2018

Down the drain: अमानवीय वातावरण में काम, ‘आखिरी व्‍यक्‍ति’ की कथा

Down the drain एक सबक के तौर पर है उनके लिए जो हमेशा अपने काम से असंतुष्‍ट रहते हैं

इस मानसूनी मौसम में कहीं जलभराव और कहीं सीवर का पानी उफनते देखकर सफाईकर्मियों को गरियाते हुए, उनके लिए अपशब्‍दों का इस्‍तेमाल करते हुए हम किसी को भी, कहीं भी देख सकते हैं। गंदगी के लिए इन्‍हें जिम्‍मेदार ठहराते हैं मगर इनके हालातों पर चर्चा करने से मुंह फेरते हैं। वह भी तब जबकि इनके बगैर एक दिन भी हम अपना सामान्‍य जीवन नहीं जी सकते। अंदाज़ा लगाइये कि एक दिन कूड़ा ना उठे तो हमारा दिमाग भन्‍ना जाता है, सीवर संबंधी समस्‍या तो जानलेवा बन जाती है पूरे वातावरण के लिए। तो सोचिए कि जो इस काम में लगे हैं उनका क्‍या हाल होता होगा।
कल सफाईकर्मियों के हालातों पर एक आंकड़ा सामने आया कि हर साल सीवर की सफाई करते हुए भारत में लगभग 22,327 लोग मारे जाते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि सुप्रीमकोर्ट के तमाम आदेशों की किस तरह अवमानना होती रही है। नगर निगमों, पालिकाओं में काम कर रहे सफाईकर्मियों को उनकी औसत सुविधायें भी नहीं दी जा रहीं। उन्‍हें मानसून में जलभराव होते ही किसी न किसी ऐसे सीवर में उतरना होता है, जहां से सही सलामत वापसी की कोई गारंटी नहीं होती।
इसके अलावा गांव-गिरांव में तो प्राइवेट सफाईकर्मियों से आज भी मैन्‍युअली गंदगी साफ करवाई जा रही है सो अलग। हां, घर-घर में शौचालय बनाए जाने की मुहिम ने हालात कुछ हद तक काबू में किये हैं परंतु इसमें अभी तक सहजता नहीं आई है क्‍योंकि इसके पीछे के सामाजिक कारण अभी तक व्‍याप्‍त हैं।
आज मैं बात कर रही हूं उन शहरी इलाकों की जहां सरकारी अमले के पास साधन होने के बावजूद सफाईकर्मियों को सीवर की सफाई के लिए अमानवीय वातावरण में काम करना पड़ रहा है।
हालांकि भारतीय संसद ने मैनुअल स्कैंवेंजर एंड रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013 भी पास किया है और सुप्रीम कोर्ट का भी स्‍पष्‍ट आदेश है कि किसी व्यक्ति को सीवर में न भेजा जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीवर साफ करने के दौरान हुई मौत का मुआवजा 10 लाख फिक्स किया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की खुलेआम अवहेलना और अवमानना की जा रही है, यहां तक कि सफाईकर्मियों को धड़ल्‍ले से सीवर में उतार दिया जाता है जिसका परिणाम उनकी भयंकर मौत के रूप में देखने को मिलता है। समाचारों में भी सफाईकर्मियों की मौत चंद क्षणों की सुर्खियां बनती हैं और फिर उनकी मौत को नजरअंदाज करके सफाईकर्मियों को बेधड़क सीवर में उतार दिया जाता है।
2014 में आई प्रैक्सिस संस्था की रिपोर्ट ”Down the drain” से पता लगता है कि सीवर में काम करने वाले मज़दूरों की मौत का कोई आधिकारिक डेटा नहीं रखा जाता। सीवर में उतरने वाले जातिवाद का जो दंश झेलते हैं, उस पर बात फिर कभी करूंगी। 20 फुट गहरे सीवर में उतरे सफाईकर्मी के लिए सांस लेने तक की साफ हवा नहीं मिलती, यह भी पता नहीं होता कि अंदर हाइड्रोजन सल्फाइड इंतज़ार कर रही है या मिथेन गैस। गैस की मौजूदगी पता करने का इनके पास कोई उपकरण नहीं होता, कई बार माचिस की तीली जलाकर जांच कर लेते हैं बस। बदन पर कोई कपड़ा नहीं होता है, कमर में रस्सी बंधी होती है ताकि कीचड़ में फंस जाए तो कोई खींच कर बाहर निकाल ले।
बहरहाल, जलभराव के इस मौसम में हम सिर्फ कामना ना करें कि सीवर साफ रहे, बल्‍कि सीवर सफाई के लिए अपने-अपने यहां की सरकारी संस्‍थाओं पर दबाव बनायें कि वे सफाईकर्मियों को काम करने के लिए सारे साधन मुहैया करायें क्‍योंकि कोई भी स्‍वच्‍छता मिशन तब तक अधूरा रहेगा जबतक कि इसे आखिरी व्‍यक्‍ति की सुरक्षा से ना जोड़ा जाए।
-अलकनंदा सिंह

रविवार, 24 जून 2018

तराशे हुए बाजुओं का सच

चित्र गूगल से साभार
कमउम्र में ही दुनिया को अलविदा कह गईं मशहूर शायरा परवीन शाकिर का एक शेर याद आ रहा है ....

तूने अखबार में उड़ानों का इश्‍तिहार देकर
मेरे तराशे हुए बाजुओं का सच बेपरदा कर दिया।

परवीन मेरी पसंदीदा शायरों में से एक रही हैं, उन्‍होंने इन चंद लफ्ज़ों में बहुत कुछ कह दिया। यह शेर लाचारगी का पर्याय बनी विधवाओं से जुड़े आज के इस लेख पर बिल्‍कुल सही बैठता है।

दो दिन पहले दिल्‍ली के विज्ञान भवन में ''लूमबा फाउंडेशन'' ने अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था। लॉर्ड राज लूमबा सीबीई द्वारा 1997 में स्‍थापित गया था। लूमबा फाउंडेशन के इस कार्यक्रम में उपराष्‍ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा था- ''विधवाओं के प्रति मानसिकता बदली जानी चाहिए, अगर कोई पुरुष पुनर्विवाह कर सकता है तो महिला क्यों नहीं कर सकती? लोगों की मानसिकता एक बड़ी समस्या है, हमें इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है।''

तो नायडू जी! बात तो सारी मानसिकता पर ही आकर ठहर जाती है ना, हालांकि इसमें बहुत कुछ बदला भी है मगर अभी बहुत कुछ बाकी भी है।

निश्‍चित ही यहां उपराष्‍ट्रपति के वक्‍तव्‍य का अर्थ सिर्फ पुनर्विवाह से नहीं था, बल्‍कि इसके ज़रिए विधवाओं के जीवन में खुशहाली लाने से था। मगर मेरा मानना है कि विधवा की इच्‍छा पर पुनर्विवाह हो तो ठीक वरना महज इसलिए पुनर्विवाह कराया जाये कि पुनर्विवाह करके वह खुश रहेगी, यह ठीक नहीं है।

बेहतर हो कि विधवाओं को आत्‍मसम्‍मान से जीने के साधन उपलब्‍ध कराये जाएं ताकि उन्‍हें किसी पर ''आश्रित'' रहना ही ना पड़े। कोई भी किसी पर आश्रित रहकर खुशहाल जीवन कतई नहीं जी सकता।

आत्‍मसम्‍मान तो दूर की बात अभी तक तो स्‍थिति यह है कि जीवन की बेसिक आवश्‍यकताओं के लिए भी दूसरों पर उनकी निर्भरता विधवा महिलाओं की पूरी ज़िंदगी को नर्क बना रही है। अधिकांशत: देखा गया है कि आर्थिक रूप से स्‍वतंत्र महिलायें जीवन को ज्‍यादा अच्‍छी तरह से जीती हैं बनिस्‍बत उनके जो अपने परिवारिक सदस्‍यों पर निर्भर रहती हैं। तो ऐसे में पुनर्विवाह विधवाओं को खुशी देने की एक संभावना तो हो सकती है (हालांकि यह किसी विधवा की व्‍यक्‍तिगत इच्‍छा पर निर्भर करेगा) मगर ''संभावनाओं'' पर खुशियां तो नहीं ढूढ़ीं जा सकतीं न। यदि ऐसा होता तो इन्‍हीं ''संभावनाओं'' के कारण वे अपने परिवार में त्‍यक्‍त न कर दी जातीं।

यहां मैं वृंदावन में निवास कर रही परित्‍यक्‍ताओं और विधवाओं की बात करना चाहूंगी जिन्‍हें उनके परिवारीजनों द्वारा भगवद्भजन के नाम पर यहां ''छोड़'' दिया जाता है। ये महिलाएं कुछ समय पहले तक सिर्फ भीख मांगकर, मंदिरों में भजन गाकर या दान आदि के सहारे जीती थीं।
इनके लिए आत्‍मसम्‍मान से जीने की विधि सुलभ इंटरनेशनल और प्रशासन ने मिलकर निकाली। सुलभ के सहयोग से संचालित विधवा आश्रय स्‍थलों में ही अब प्रशासन ने मंदिरों से निकलने वाले फूलों से अगरबत्‍ती बनाने के साथ-साथ भगवान की पोशाक आदि बनाने का न केवल प्रशिक्षण दिलवाया बल्‍कि उन्‍हें आत्‍मसम्‍मान से जीने के अन्‍य साधन भी मुहैया कराये। हर आयुवर्ग की विधवायें और यहां रह रहीं परित्‍यक्‍तायें भी अब गोपाल जी की पोशाक व अन्‍य साजोसामान बनाती हैं। इस आमदनी से वे अपना जीवन अपने मुताबिक जी सकेंगी। वे यदि चाहें तो पुनर्विवाह कर सकती हैं मगर आत्‍मसम्‍मान से जीने की खुशी उन्‍हें आर्थिक स्‍वतंत्रता से ही मिलेगी, यह निश्‍चित है।

बात सिर्फ पुनर्विवाह की नहीं है, नायडू जी ने सही कहा कि सामाजिक बदलाव से विधवाओं को सामान्‍य जीवन दिया जा सकता है। यह कटुसत्‍य है कि समाज में, स्‍वयं अपने परिवार में, अपने बच्‍चों के द्वारा भी विधवाओं को सिर्फ अपने अपने हिसाब से ''यूज'' किया जाता है, कभी इमोशनली तो कभी सोशली। उनके आत्‍मसम्‍मान की बात तो छोड़ ही दें सम्‍मान भी यदाकदा ही देखने-सुनने को मिलता है।

बहरहाल भारत में कुल 4.60 करोड़ विधवाएं हैं, जिन्‍हें आत्‍मनिर्भर बनाना आवश्‍यक है, इन कार्यक्रमों द्वारा हम 4.60 करोड़ चेहरों पर खुशी ला सकेंगे। चूं कि वर्तमान में खुशी व बदलाव सब आर्थिक उन्‍नति से जोड़कर देखा जाने लगा है तो विधवाओं के लिए भी सामाजिक स्‍तर पर बदलाव आर्थिक माध्‍यम से ही आएगा, यह वर्तमान समय का कटुसत्‍य है। वे ''विधवाविलाप'' जैसी उक्‍ति को भी बदलने का माध्‍यम बनेंगी,जहां सिर्फ लाचारगी ही होती थी।

जो भी हो मगर इतना तो अवश्‍य है कि अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस के बहाने उन ''सचों'' पर फिर से गौर किया गया जो विधवाओं के रास्‍ते का पत्‍थर थे, परवीन शाकिर के शब्‍दों में कहूं तो तराशे गए बाजुओं का सच, सामने तभी लाया जा सका है जब हमने उड़ानों का इश्‍तिहार दिया... कि अभी कितने चेहरे ऐसे हैं जो अपनी आकांक्षाओं को परिजनों के रहमोकरम पर मसलने को विवश हैं, हमें भी इन सचों को स्‍वीकारना होगा ताकि विधवायें भी ज़माने में अपनी आकांक्षाओं की उड़ान भर सकें।

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 22 जून 2018

आज साहित्य अकादमी ने वर्ष 2018 के लिए बाल साहित्य पुरस्कार और युवा पुरस्कारों की घोषणा

साहित्य अकादमी का युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार आस्तिक वाजपेयी, बाल साहित्य पुरस्कार दिविक रमेश 

नई दिल्ली। उदयन वाजपेयी के पुत्र व अशोक वाजपेयी के भतीजे हैं आस्तिक वाजपेयी  को इसबार साहित्य अकादमी का युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया जाएगा। साहित्य अकादमी ने वर्ष 2018 के लिए बाल साहित्य पुरस्कार और युवा पुरस्कारों की आज घोषणा की। साहित्य अकादमी द्वारा जारी विज्ञप्ति के मुताबिक बाल साहित्य पुरस्कार दिविक रमेश (हिंदी), ईस्टेरिन किरे (अंग्रेजी), वैद्यनाथ झा (मैथिली), तरसेम (पंजाबी), सी एल सांखला (राजस्थानी), रईस सिद्दीकी (उर्दू) ,सम्पदानंद मिश्र (संस्कृत), शीषेंदु मुखोपाध्याय (बांग्ला) और रत्नाकर मटकरी (मराठी) सहित 23 लेखकों को दिया गया. डोगरी भाषा का पुरस्कार बाद में दिया जायेगा।

देखिए साहित्‍य अकादमी केे आफीशियल ट्विटर पर अन्‍य डिटेल-

https://twitter.com/sahityaakademi/status/1010118994320285697


वहीं, साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार दस कविता संग्रहों, सात कहानी संग्रहों, तीन उपन्यासों तथा एक नाटक को दिया गया। युवा पुरस्कार से आस्तिक वाजपेयी (हिंदी), उमेश पासवान (मैथिली), दुष्यंत जोशी (राजस्थानी), शहनाज रहमान (उर्दू), गुरप्रीत सहजी (पंजाबी), मुनिसज सुंदर विजय (संस्कृत) ,साम्राज्ञी बंद्योपाध्याय (बांग्ला) और नवनाथ गोरे (मराठी) सहित 22 रचनाकर्मियों को पुरस्कृत किया गया।

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ चंद्रशेखर कंबार की अध्यक्षता में गुवाहाटी में संपन्न कार्यकारी मंडल की बैठक में इन पुरस्कारों की घोषणा की गयी। बाल साहित्य पुरस्कार के रूप में ताम्रफलक और 50 हजार रूपये का नकद इनाम 14 नवंबर को एक समारोह में प्रदान किया जायेगा। युवा पुरस्कार के रूप में उत्कीर्ण ताम्रफलक और 50 हजार रूपये की राशि एक विशेष समारोह में प्रदान की जायेगी।

सोमवार, 18 जून 2018

यहाँ सब के सर पे सलीब है

अपेक्षाओं का अतिरिक्‍त दबाव हम सहन करने में नाकाम हो रहे हैं, यह बात किसी आम आदमी  की हो तो समझ में भी आती है मगर जब दूसरों के लिए माइलस्‍टोन बने अपने क्षेत्र के ''कामयाब  दिग्‍गज'' नाकामी की इबारत लिखते हैं तो सोचना पड़ता है कि आखिर ये कामयाबी किस कीमत  पर पा रहे हैं हम?

मुझे आज अपनी बात कहने के लिए राणा सहरी की लिखी गज़ल जिसे मशहूर ग़ज़ल गायक  जगजीत सिंह ने गाया है, के कुछ अशआर याद आ रहे हैं कि- 

कोई दोस्त है न रकीब है, तेरा शहर कितना अजीब है।
वो जो इश्क था वो जुनून था, यह जो हिज्र है, ये नसीब है।
यहाँ किसका चेहरा पढ़ा करूँ, यहाँ कौन इतना करीब है।
मैं किसे कहूँ, मेरे साथ चल, यहाँ सब के सर पे सलीब है।

सलीब को अब तक हम उस क्रॉस के रूप में देखते आए है जिसे ईसा मसीह को ढोना पड़ा था।  यानि तनाव की सलीब ढोने वाले हम, अपनी मौत को अपने ही कांधों पर ढोने का अहसास और  आमंत्रण दोनों ही देते दिखाई देते हैं। सलीब लेटिन भाषा का शब्द है जिसका शाब्‍दिक अर्थ है ‘गम  का रास्ता,’ ‘दुःख का पथ,’ ‘पीड़ा का मार्ग,’ या बस ‘दर्दनाक राह’। जीवन भी कुछ ऐसा ही है, कुछ  लोगों के लिए।” सलीब या क्रॉस, ज़िम्मेदारियों के लिए एक रूपक (metaphor) की तरह भी है,  दूसरे शब्दों में, राणा सहरी के अनुसार अपने-अपने काम में सब इतने व्यस्त हैं यहाँ, कि किसी  दूसरे के लिए उनके पास वक्त ही नहीं।”

सलीब की तरह ही एक शब्‍द और है तीन अक्षरों का...तनाव जो अपने भीतर सलीब का वजन भी  रखता है और इससे मिलने वाला दुखद अंजाम भी हमारे सामने लाता है। ये किसी लहीम शहीम  पर्सनालिटी को भी जब अपनी गिरफ्त में लेता है तो वही होता है जो भय्यू जी महाराज का हुआ,  जो सुपरकॉप हिमांशु रॉय का हुआ और जो एटीएस के अधिकारी राजेश साहनी का हुआ। परीक्षाओं  में नाकाम रहने वाले छात्रों, किसानों की आत्‍महत्‍या की बात तो छोड़ ही दें क्‍योंकि वे ''कामयाब  हस्‍ती'' नहीं होते मगर ये तीनों नाम तो किसी परिचय के मोहताज नहीं थे। भौतिक रूप से  प्रतिष्‍ठित जीवन जीने के लिए ''सबकुछ'' था इनके पास, तो फिर ऐसा क्‍या हुआ कि ये जीवन जीने  से ही कतराने लगे।

पिछले महीने से लगातार घटी इन घटनाओं के बाद तनाव की वजहें तलाशी जा रही हैं। मगर जहां  तक मैं समझ पा रही हूं वो यही कि इच्‍छाओं-अपेक्षाओं का भंवर ही तनाव का निर्माण करता है।  दूसरों से पाली गई बेशुमार अपेक्षाओं पर जब अपनी इच्‍छायें पूर्ण होने की शर्त अड़ा दी जाती है  तब ही तनाव का जन्‍म होता है। कुछ लोग इससे पार पा लेते हैं तो कुछ भय्यू जी, हिमांशु रॉय  और राजेश साहनी की तरह दूसरा भयानक रास्‍ता चुनते हैं। 

माना कि सामान्‍यत: जीवन जीना आसान नहीं है मगर इतना कठिन भी नहीं कि हम कायरों की  भांति जीवन से यूं कन्‍नी काट लें। एक इंसान को जिस पद, प्रतिष्ठा और पैसे की चाह होती है, वो  भय्यूजी महाराज से लेकर साहनी तक तीनों के पास था लेकिन फिर भी तीनों की अकाल मौत का  कारण पहली नजर में अवसाद यानी तनाव ही देखा गया है। वो तनाव जिसने इन तीनों को भरी  दुनिया में अकेला कर दिया।

लेकिन मेरा स्‍पष्‍ट मानना है कि इच्‍छाओं-अपेक्षाओं की अपनी अपनी सलीबों को ढोकर चलने वाले  हम, सिर्फ अकेलेपन को आमंत्रण ही नहीं देते बल्‍कि उसी से कुचले भी जा रहे हैं। इससे तो बेहतर  होगा कि सपने, अहंकार, अपेक्षायें और नियति से जद्दोजहद के आफ्टरइफेक्‍ट्स भी हम जान लें  और अतिवाद की किसी भी स्‍थिति से समय रहते बच लें।

बहरहाल राणा सहरी के अशआरों की गहराई हमारी नियति बताते हैं तो सावधान भी करते हैं कि  जीवन सिर्फ तुम्‍हारा अपना नहीं, इसपर औरों का भी अधिकार है, हम कुछ ऐसा करें कि अपने  दुखों को ढोकर भी दूसरों को जीवन की सुखद राह दिखा सकें।

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 17 जून 2018

Fathers Day पर पढ़िए अज्ञेय की कविता – चाय पीते हुए

कभी अज्ञेय ने कहा था- कि …चाय पीते हुए
हर साल जून के तीसरे रविवार को पूरी दुनिया में फादर्स डे मनाया जाता है। इस साल यह दिन 17 जून को सेलिब्रेट किया जा रहा है। पिछले साल 18 जून को फादर्स डे के रूप में मनाया गया था। इसी अवसर पर आप पढ़िए सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की अपने पिता के लिए लिखी गई एक कविता- चाय पीते हुए
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
चाय पीते हुए
मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।
आप ने कभी
चाय पीते हुए
पिता के बारे में सोचा है?
अच्छी बात नहीं है
पिताओं के बारे में सोचना।
अपनी कलई खुल जाती है।
हम कुछ दूसरे हो सकते थे।
पर सोच की कठिनाई यह है कि दिखा देता है
कि हम कुछ दूसरे हुए होते
तो पिता के अधिक निकट हुए होते
अधिक उन जैसे हुए होते।
कितनी दूर जाना होता है पिता से
पिता जैसा होने के लिए!
पिता भी
सवेरे चाय पीते थे।
क्या वह भी
पिता के बारे में सोचते थे –
निकट या दूर?
– अज्ञेय

शनिवार, 9 जून 2018

सनौली के माध्‍यम से हमारी सभ्‍यता का इतिहास दोबारा लिखा जाएगा

किसी भी देश के अस्‍तित्‍व को उसकी सभ्‍यता के वर्षों पुराने इतिहास से आंका जाता है। आज के इस लेख से पहले मैंने एक बार लिखा था कि ''पहले हिन्दू राष्ट्र था अफगानिस्‍तान में 5000 हजार वर्ष पुराना विमान मिला'' (इसके बारे में विस्‍तृत रूप से आप यहां पढ़ सकते हैं), इस रिपोर्ट को लिखने के बाद कुछ पाठकों ने मेरी आलोचना भी की कि मैंने अवैज्ञानिक तरीके से तथ्‍यों को रखा और जानबूझकर सनातन सभ्‍यता को महिमामंडित किया। हालांकि मैंने प्राप्‍त तथ्‍यों के आधार पर ही लिखा था।
मगर अब बागपत के सिनौली गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) को उत्‍खनन में कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं जो अंग्रेजों द्वारा लिखे भारतवर्ष के इतिहास को बदल देंगे।
दरअसल, हमारे ही इतिहास को जिन दूसरों के द्वारा लिखा गया वो भारत के नायकों, विकसित विचारधाराओं को सम्‍माननीय दृष्‍टि से कभी देख ही न सके और वैदिक व्‍यवस्‍थाओं व आविष्‍कारों को पोंगापंथी कहकर गरियाते रहे।
In a First, Chariot From Pre-Iron Age Found During Excavation in UP's Sanauli

बहरहाल, मुझ पर तथ्‍यहीन लेख लिखने का आरोप लगाने वाले इन पाठकों के लिए आज मैं फिर यह कहना चाहती हूं कि हमारे लिए तो.... शताब्दियों का ये रथ अब भी उसी गति से भाग रहा है....हम आज भी उतने ही आधुनिक और प्रयोगधर्मी हैं जितने वैदिक काल में थे। गुलामी के सैकड़ों सालों में भारतवर्ष के इतिहास को जिस तरह तोड़ा-मरोड़ा गया और हमारी महान खोजों को मिट्टी में दबा दिया गया, वह अब मेरठ मंडल के बागपत जनपद की सिनौली साइट से पूरी दुनिया के सामने आ रहा है।

ASI approves excavation of tunnel near Mahabharata-era's 'Lakshagriha'
सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ी सामग्री मसलन उस समय के चिह्न, मिट्टी के बर्तन, कंकाल, आभूषण और कॉपर होर्ड सभ्यता से जुड़ी सामग्रियां अब तक अलग-अलग जगहों पर तो मिलीं थीं, लेकिन अब तक कोई ऐसा मौका पहले नहीं आया था जहां दोनों के चिह्न एक साथ मिले हों। सिनौली की खोदाई में तीन कंकाल, उनके ताबूत, आसपास रखी पॉटरी पर जहां सिंधु घाटी सभ्यता के चिह्न मिले हैं, वहीं लकड़ी के रथ में बड़े पैमाने पर तांबे का इस्तेमाल, मुट्ठे वाली लंबी तलवार, तांबे की कीलें, कंघी कॉपर होर्ड का प्रतिनिधित्व करती हैं। रथ के लकड़ी का हिस्सा तो मिट्टी हो चुका है लेकिन तांबा जस का तस है। उत्‍खनन में मिले ताबूत और उसके पास से मिले ये सामान प्रमाणित करते हैं कि यह शवाधान केंद्र किसी राजशाही परिवार का रहा होगा और वे लगभग पांच हजार पूर्व तांबे का प्रयोग करते थे।

इस सच के सामने आने से पहले हमने ''गुलामी के उस वजन'' को बखूबी ढोया है जिसमें कहा गया कि ''सिंधु घाटी सभ्यता के समापन के समय ही भारत में आर्यों का आक्रमण'' हुआ, उसके बाद आर्यों द्वारा यहां नए सिरे से एक सभ्यता गढ़ी गई और फिर नई-नई खोजें व विकास हुए, अर्थात् सिनौली की मिट्टी का उत्खनन अब अंग्रेजों द्वारा रचे गए इस ''आर्य इतिहास'' के झूठ को भी उजागर करेगा क्‍योंकि सिनौली उत्‍खनन में मिले रथ को देखकर पहली बार सिंधु घाटी सभ्यता और कॉपर होर्ड (ताम्रयुगीन संस्कृति) का सामंजस्य भी सामने आ गया है और वेद-ग्रंथों में बताई गई वस्‍तुओं का प्रमाण भी मिल गया।
तांबे और लकड़ी से रथ के साथ सिंधु घाटी सभ्यता के निशानों ने अब नए सिरे से इतिहास लिखने की बहस छिड़ चुकी है।

यह भी सत्‍य है कि जहां अंग्रेजों द्वारा उल्‍लिखित इतिहास के अनुसार आर्य सभ्यता में ही पहली बार घोड़े के उपयोग की बात की गई वहीं सिनौली के उत्‍खनित प्रमाण इससे पूर्व की सभ्यता के हैं अर्थात् भारत निर्माण और इसके पुरातात्विक महत्व को लेकर अब तक दिए तमाम तर्कों को सिनौली की मिट्टी झुठला रही है।
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के आंकलन में उत्‍खनित साइट पर मिले सामान लगभग चार से पांच हजार वर्ष पूर्व के हैं, लिहाजा अंग्रेजों का भारत पर आर्यों के आक्रमण और उनके द्वारा यहां पर नई सभ्यता की स्थापना को 1500-2000 वर्ष पुराना बताने वाले दावे धूल में मिल गए हैं। मिट्टी के नीचे दबे प्रमाणों के बाहर आने से यह अब साफ हो गया है कि आर्यों के आने से कम से कम तीन हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज रथ बना चुके थे और तत्‍कालीन राजसत्‍ता तांबे का भरपूर उपयोग करती थी।

इस संबंध में कुछ उन बयानों को मैं यहां देना चाहूंगी जो इतिहास के आंकलन और उसकी प्रमाणिकता के क्षेत्र में अव्‍वल माने जाते हैं।


1. सेंटर फॉर आम्र्ड फोर्सेज हिस्टोरिकल रिसर्च, नई दिल्ली के फेलो डॉ. अमित पाठक के अनुसार अंग्रेजों ने अभी तक यह साबित किया था कि आर्यों ने 1500-2000 वर्ष ईसा पूर्व भारत पर हमला किया। वे रथ से आए और यहां की सभ्यता को रौंदते हुए नई सभ्यता की नींव रखी। उनका दावा था कि आर्यों के आने से पहले तक यहां बैलगाड़ी थी, घोड़ागाड़ी नहीं जबकि सिनौली साइट की खोदाई में मिले रथ ने यह साबित कर दिया है कि रथ हमारे यहां लगभग पांच हजार वर्ष या उससे भी पहले से है। यानि रामायण, महाभारत की बात को यदि प्रमाण के रूप में ना भी लें तो अंग्रेजों की आर्य थ्योरी को पलटने के लिए तो सिनॉली के प्रमाण ही काफी हैं।
2. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के सुपरिंटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट रहे कमल किशोर शर्मा कहते हैं कि यह एक बड़ी डिस्कवरी है।
3. पुरातत्वविद् बी. लाल के साथ काम करने वाले के. के. शर्मा के अनुसार पूर्व में आर्कियो-जेनेटिक्स भी स्पष्ट कर चुकी है कि हमारे डीएनए, क्रोमोजोम में पिछले 12 हजार वर्ष में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और अब मिला यह आर्कियोलॉजिकल प्रमाण नए इतिहास को सृजित कर रहा है।
4. शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन कहते हैं कि दिसंबर 2007 में भी यहां 160 कंकाल मिले थे, जिनकी कॉर्बन डेटिंग के बाद स्पष्ट हुआ था कि ये लगभग चार से पांच हजार वर्ष पुराने हैं। ऐसे में रथ का यहीं से कंकालों के साथ मिलना अंग्रेजों की आर्य थ्योरी को पलट रहा है।
कुल मिलाकर सिनौली की भूमि के अंदर दबी संस्‍कृति, सभ्‍यता और इतिहास की इन धरोहरों ने पूरी तरह यह साबित कर दिया कि अखंड भारत कभी कितना समृद्ध और सुविकिसित था।
सिनौली की धरती ने इसके अलावा यह भी सिद्ध किया है कि महान भारत की संस्‍कृति व समृद्धि को झुठलाने का प्रयास हर युग में किया जाता रहा और अब भी किया जा रहा है जबकि रामायण से लेकर महाभारत तक के काल की गाथा कहने वाले अवशेष सामने हैं।
-अलकनंदा सिंह

सोमवार, 4 जून 2018

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और कवि राजकिशोर का निधन

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और कवि राजकिशोर का सोमवार को यहां अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। वे करीब तीन सप्ताह से एम्स के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में भर्ती थे।
उन्हें निमोनिया होने के कारण एम्स में भर्ती कराया गया था जहां उन्होंने सोमवार सुबह साढ़े नौ बजे के करीब अंतिम सांस ली। वे 71 वर्ष के थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी और पुत्री हैं। पिछले दिनों उनके बेटे का निधन हो गया था।
करीबियों के मुताबिक बेटे की मौत का उन्हें गहरा सदमा लगा था। उनके परिवार में अब उनकी पत्नी और बेटी बची हैं। उनका जन्म 2 जनवरी 1947 को पश्चिम बंगाल के कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुआ था।


इसके अलावा राजकिशोर ने प्रभाष जोशी के साथ जनसत्ता अखबार में भी काम किया। राजकिशोर नियमित तौर पर हिंदी के प्रतिष्ठित अखबारों और मैग्जीनों में स्तंभ लेखने का काम करते थे। इनके राजनीतिक व्यंग्य काफी चर्चित रहते थे। भारतीय समाज के व्यवहारिक समाजशास्त्र पर राजकिशोर की गहरी पकड़ थी। 

राजकिशोर को उनके कामों के लिए कई पुरस्कार और सम्मानों से भी नवाजा गया। लोहिया पुरस्कार, साहित्यकार सम्मान (हिंदी अकादमी), राजेंद्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना) प्रमुख हैं। राजकिशोर की मुख्य कृतियों में उपन्यास 'तुम्हारा सुख' व 'सुनंदा की डायरी', व्यंग्य में 'अंधेरे में हंसी' व 'राजा का बाजा' और कविता संग्रह 'पाप के दिन' शामिल है। इसके अलावा उनके प्रमुख वैचारिक लेखनों में एक अहिंदू का घोषणापत्र, गांधी मेरे भीतक, जाति कौन तोड़ेगा, गांधी की भूमि से, धर्म सांप्रदायिका और राजनीति शामिल हैं। 

राजकिशोर ने ‘रविवार’ से अपनी पत्रकारिता शुरू की थी और ‘नवभारत टाइम्स’ दिल्ली में काफी समय तक पत्रकार रहे। ‘दूसरा शनिवार’ मैग्‍जीन का संपादन किया था। वे कई अखबारों में समसामयिक विषयों पर स्तंभ भी लिखते रहे।
उनके उपन्यास संग्रह में से ‘सुनंदा की डायरी’, ‘दूसरा सुख’ प्रमुख हैं। उनका कविता संग्रह ‘पाप के दिन’ और व्यंग्य संग्रह ‘राजा का बाजा’ भी काफी लोकप्रिय था। उनको लोहिया पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।


शनिवार, 26 मई 2018

कन्नड़ लोक कथा पर बनी संस्‍कृत भाषा की पहली animated फिल्‍म ‘पुण्‍यकोटि’

आज एक कन्नड़ लोक कथा पुण्‍यकोटि का ट्रेलर आया, जन-सहयोग से बनी ये animated फिल्‍म हमें यूट्यूब पर देखने को मिली, वह भी संस्‍कृत में।
सबसे अधिक ध्‍यान देने की बात संस्‍कृत के शब्‍दों का स्‍तर कतई प्राथमिक है। ये कहानी है पुण्यकोटि गाय की जिसे हम सबसे मनोरंजक रूप अर्थात् वीडियो में तो देखेंगे ही साथ ही प्राथमिक संस्‍कृत को आसानी से समझ भी सकेंगे।
देवभाषा संस्‍कृत को इतने मनोरंजक रूप में सामने लाने के लिए इस एनीमेटेड वीडियो फिल्‍म के निर्माता सचमुच बधाई के पात्र हैं।
स्‍क्रिप्‍ट और डायरेक्‍शन रविशंकर का है, ट्रेलर का म्‍यूजिक हर्षवर्द्धन ने दिया है। संस्‍कृत परामर्श प्रोफेसर एस आर लीला द्वारा दिया गया है। चूंकि यह फिल्‍म भाषा और संस्‍कृति के लिए समर्पण के तौर पर बनाई गई है और इसके लिए निर्माता को आर्थिक सहयोग की आवश्‍यकता है इसलिए पुण्‍यकोटि टीम की ओर से रेवती,राजा व एमडी पई की ओर से सहायता मांगी गई है।

वीडियो की झलकी आप भी देखिए-


लोक कथा कुछ इस तरह है-
कलिंग नामक एक ग्वाला पहाड़ के निकट अपनी गायों के साथ बहुत सुख-सन्तोष से रहता था। उसकी गायों में पुण्यकोटि नाम की एक गाय थी, जो अपने बछड़े को बहुत प्यार करती थी। प्रतिदिन संध्या समय वह रंभाती और दौड़ती हुई घर लौट आती थी।
उसी पहाड़ में एक शेर भी रहता था। एक बार बहुत दिनों तक उसे कुछ खाने को नहीं मिला। उसने एक दिन शाम को पुण्यकोटि गाय को रोक कर कहा — ‘ मैं तुम्हें अपना आहार बनाऊँगा।’
पुण्यकोटि ने शेर से विनय के साथ कहा – ‘ मुझे घर जाने दो, बछड़े को दूध पिलाने के बाद मैं स्वयं तुम्हारे सम्मुख हाजिर हो जाउंगी।’
पहले तो शेर ने उसकी बात न मानी, पर जब पुण्यकोटि ने विश्वास दिलाया कि वह निश्चय ही वापस आने का वचन दे रही है, तो शेर ने कहा — ‘अच्छा, तुम जा सकती हो, लेकिन अपना वचन निभाना न भूलना।’
गौशाला में बछड़े को दूध पिलाते समय पुण्यकोटि ने उसको वह समाचार दिया और आँखों में आँसू भर कर अपने बछड़े से विदा ली। बाहर निकलते समय उसने बछड़े से कहा — ‘ बेटा, सावधानी से और नम्र भाव से रहना।’
फिर पुण्यकोटि ने अन्य गायों से कहा — ‘बहनों, मैं तो जा रही हूँ, लेकिन मेरे बछड़े को अपना बच्चा समझकर इसका ध्यान रखना।’
फिर पुण्यकोटि ने शेर के पास जाकर कहा — ‘लो, मुझे खा लो।’
शेर ने सोचा कि इतनी अच्छी गाय को अपना आहार बना लेना तो बहुत बुरा होगा। यह सोचकर उसने उस गाय को छोड़ दिया और आगे के लिए अन्य सब गायों को भी अभयदान दे दिया।
-Legend News

शुक्रवार, 25 मई 2018

गुलजारे दाग़, आफ्ताबे दाग़, माहतादे दाग़, यादगारे दाग़

दाग़ देहलवी: चित्र गूगल से साभार
उर्दू के प्रसिद्ध शायर दाग़ देहलवी का वास्तविक नाम नवाब मिर्ज़ा ख़ाँ था, आज उनका यानि 25 मई को जन्मदिन है।उर्दू के प्रसिद्ध शायर दाग़ देहलवी का जन्म 1831 में हुआ था। दाग़  को उर्दू जगत् में एक शायर के रूप में बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। उनके जीवन का अधिकांश समय दिल्ली में व्यतीत हुआ था, यही कारण है कि उनकी शायरियों में दिल्ली की तहज़ीब नज़र आती है। 
गुलजारे दाग, आफ्ताबे, दाग, माहतादे दाग तथा यादगारे दाग इनके चार दीवान हैं, जो सभी प्रकाशित हो चुके हैं। 'फरियादे दाग', इनकी एक मसनबी है। इनकी शैली सारल्य और सुगमता के कारण विशेष लोकप्रिय हुई। भाषा की स्वच्छता तथा प्रसाद गुण होने से इनकी कविता अधिक प्रचलित हुई पर इसका एक कारण यह भी है कि इनकी कविता कुछ सुरुचिपूर्ण भी है।
शरीर पर जख्म हों तो जाहिर है काफी तकलीफ होती है, जख्म भर जाने के बाद उसका दाग़ रह जाता है जो उस हादसे की याद बन जाता है। यह जख्म या दुर्घटना को याद तो दिलाता है लेकिन पर हादसे की तकलीफ नहीं देता। क्या हो गर जख्म दिल पर लगे हों? अव्वल तो ये आसानी भरते नहीं, भर भी जाएं तो इनके दाग़ जेहन से कभी मिटते नहीं और ये दाग़ ताउम्र हादसे की याद दिलाते हैं, वह भी पूरे दर्द के साथ। मशहूर शायर दाग़ देहलवी की जिंदगी कुछ ऐसे ही दागों बनी थी, भरी थी। सभी को मालूम है कि दाग़ देहलवी की शायरी इश्क़ और मोहब्बत की सच्ची तस्वीर पेश करती है।
दाग़ के हजारों लाखों मुरीद भी हैं। उनमें से कई ऐसे हैं जो ना तो शायर हैं, ना ही मशहूर हैं। उनको तमाम बड़े गज़ल गायकों ने गाया है। दाग़ का निधन 1905 में हुआ था। इनका जन्म स्थान दिल्ली के लाल किले को माना जाता था। दाग़, बहादुर शाह जफर के पोते थे। इनके पिता शम्सुद्दीन खां नवाब लोहारू के भाई थे। दाग़ के पिता का जब इंतकाल हुआ तब वह चार वर्ष के थे। बाद में दाग़ ने जौक को अपना गुरु बनाया। गुलजारे दाग़, आफ्ताबे दाग़, माहतादे दाग़, यादगारे दाग़ इनके चार दीवान हैं। फरियादे दाग़ इनकी एक मसनबी है।
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था
जला के दाग़-ए-मोहब्बत ने दिल को ख़ाक किया
बहार आई मेरे बाग़ में ख़िज़ाँ की तरह
…कि बराबर आग लगती
ये मजा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगती
न तुझे करार होता, न मुझे करार होता
कोई नामो-निशां पूछे तो ऐ कासिद बता देना
तख़ल्लुस दाग है और आशिकों के दिल में रहते हैं
गजब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात कयामत का इंतजार किया
मोहब्बत ने दिल को खाक किया
जला के दागे मोहब्बत ने दिल को खाक किया
बहार आई मेरे बाग में खिजां की तरह
खुदा रक्खे मुहब्बत ने किए आबाद घर दोनों
मैं उनके दिल में रहता हूं वो मेरे दिल में रहते हैं
आती है बात बात मुझे बार बार याद
कहता हूँ दौड़ दौड़ के क़ासिद से राह में
उठती क़यामत माजरा क्या है
इलाही क्यूँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है
हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं
डरते हैं चश्म ओ ज़ुल्फ़ ओ निगाह ओ अदा से हम
हर दम पनाह माँगते हैं हर बला से हम
कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी
लब पे रह जाती है आ आ के शिकायत मेरी
ख़बर सुन कर मेरे मरने की
ख़बर सुन कर मेरे मरने की वो बोले रक़ीबों से
ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियां थीं मरने वाले में
ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का
याद आता है हमें हाए ज़माना दिल का
ऐश उनको ग़म भी होते हैं
फ़लक देता है जिन को ऐश उनको ग़म भी होते हैं
जहां बजते हैं नक़्क़ारे वहीं मातम भी होते हैं
होश आते ही हसीनों को क़यामत आई
आँख में फ़ित्नागरी दिल में शरारत आई
न रोना है तरीक़े का न हँसना है सलीक़े का
परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता।
खुलता नहीं है राज़
खुलता नहीं है राज़ हमारे बयान से
लेते हैं दिल का काम हम अपनी ज़बान से
कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी
लब पे रह जाती है आ आ के शिकायत मेरी
अदा-ए-मतलब-ए-दिल हम से सीख जाए कोई
उन्हें सुना ही दिया हाल दास्ताँ की तरह। 
प्रस्‍तुति : अलकनंदा सिंह

शनिवार, 19 मई 2018

20 मई याद है ना आपको ?

आज 20 मई है, देश के अन्‍य शिक्षा बोर्ड्स की तो नहीं मालूम मगर 3 दशक पहले तक  हमारे यूपीबोर्ड के स्‍कूल और इंटर कॉलेजों में इस दिन एक अलग किस्‍म के त्‍यौहार  का नजारा होता था। परीक्षायें खत्‍म होने के बाद 20 मई घड़ी के उस कांटे की तरह होती  थी, जो हमारी और हमारे माता-पिता की प्रत्‍याशा को पेंडुलम की तरह कभी इधर तो कभी  उधर घुमाती रहती थी। कभी-कभी कोई एकादि मामला नकल का देखने-सुनने में भले ही  आ जाता था, लेकिन वह भी बड़ी शांति से समझबूझ कर निपटा लिया जाता था।

आपने भी महसूस किया होगा कि नंबरों की मारकाट तथा प्रथम और सर्वश्रेष्‍ठ आने जैसी आपाधापी तीन दशक पहले तक नहीं थी। बच्‍चों के ऊपर दिन-रात पढ़ाई करने का दबाव डालने वाले माता-पिता भी नहीं थे और ना ही बंधुआ मजदूर की भांति सर्वश्रेष्‍ठ की रेस में डिप्रेशन और एंजाइटी को मोल लेते बच्‍चे थे। शिक्षा एक ध्‍येय थी, बिजनेस और रेस नहीं। आप को भी याद होगा कि 60 प्रतिशत लाने वाला महाराजा की भांति होता था, और 45 प्रतिशत वाला भी अलग ही ठसक रखता था।

औसत प्राप्तांक करके भी दुनिया जीतने की खुशी महसूस करने वाले हम और हमारे जैसे  अनेक विद्यार्थियों ने 20 मई के रोमांच को अपने दौर में जिस शिद्दत से महसूस किया है,  वो इस तारीख को क्‍या कभी भूल पाएंगे? 20 मई को रिजल्‍ट और 8 जुलाई को स्‍कूलों के  खुलने की निश्‍चित तिथि निश्‍चित ही सबके जेहन में बनी होगी। वर्तमान की आपाधापी  वाली शिक्षा और सब-कुछ पा लेने वाली अंधी दौड़ में कुछ भी महसूस न कर पाने की  शक्‍ति खोकर हम मशीनों में तब्‍दील हो गए हैं।

तभी तो अब ''गर्मियों की छुट्टियां'' नहीं  होतीं, ''समरकैम्‍प्‍स'' होते हैं। ऐसे समर कैम्‍प्‍स जिनमें ''एक्‍टिविटी-सेंटर्स' की आड़ लेकर  बच्‍चों को फिर उसी तरह कैद कर दिया जाता है जिस तरह वो स्‍कूली दड़बों में कैद रहते  हैं। रेस तो वहां भी बनी रहती है ना। शाम को पार्क में एकत्रित होने वाली इन ''एबेकसी  बच्‍चों'' की मांएं अपने अपने बच्‍चे की प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ ''समरकैम्‍पीय चिंताओं'' में  व्‍यस्‍त देखी जा सकती हैं।

ज़रा सोचिए कि इन एबेकसी-बच्‍चों की फैक्‍ट्री क्‍या कभी अपने रिजल्‍ट मिलने वाले दिन  का रोमांच महसूस कर पाएगी?

ऐसे अनेक प्रश्‍न और अनेक ''क्‍या-क्‍यों व कब तक'' मेरे ज़हन में घुमड़ते हैं कि इस  बेमतलब चिंता में जीने वाले लोगों की अगली तबाही कौन लिखेगा...क्‍या अब किसी और  दौड़ की तैयारी हो रही है...या फिर नए धावकों के कलपुर्जे जुटाए जा रहे हैं...एबेकस के  माध्‍यमों से। किसी एक तारीख का रोमांच महसूसने की तासीर भला इस रेस में कौन  महसूस कर सकेगा।

-अलकनंदा सिंह