शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

लाशों को गिनने का सिलसिला बंद होना चाहिए

महाभारत युद्ध के दौरान कई बार कृष्ण ने अर्जुन से परंपरागत नियमों को तोड़ने के लिए कहा था जिससे  धर्म की रक्षा हो सके, युद्ध के दौरान कर्ण ''निःशस्त्र'' थे तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, ''हे पार्थ, धर्म की  जीत के लिए कर्ण का वध जरूरी है, वह नि:शस्‍त्र ही क्‍यों ना हो।


मौत तो हर एक को एक ना एक दिन आनी ही है मगर कुछ ऐसी होती हैं जो सवालों को छोड़ जाती हैं,  नेताओं के बड़े बड़े निंदा प्रस्‍तावों के बीच बूढ़े कांधों पर जवान बेटे की अर्थी या कहीं नन्‍हा बच्‍चा मुखाग्‍नि  देता, ये सीन अब आम हो चले हैं, जवानों को अब अपनी आवाज अपनी नौकरी को दांव पर लगाकर  उठानी पड़ रही है। नासूर सिर्फ वो समस्‍यायें नहीं जो बॉर्डर पर खून बिखेर रही हैं, नासूर ये भावनायें भी हैं  जो रणनीतियों का बोझ ढोती हैं और अनुशासनहीनता का दंड भी।

आज फेसबुक पर अपना वीडियो पोस्‍ट करने वाला सीआरपीएफ जवान आरा/बिहार निवासी पंकज मिश्रा हो  या कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर ही बीएसएफ का जवान तेजबहादुर यादव हो, गाहे-ब-गाहे ''भीतर  सबकुछ ठीक'' है को नकारते हैं तो इसे अनुशासनहीनता से जोड़कर बात को दबा दिया जाता है और यही  दबाने की आदत आज पूरे देश पर भारी पड़ रही है।

दंतेवाड़ा, बस्तर, उड़ी , सुकमा… लगातार हमारे जवान शहीद हो रहे हैं और हम बस शहीद गिन रहे हैं।  एक रस्‍मआदयगी के तहत हमारे राजनेता निंदा के साथ मुंहतोड़ जवाब देने की बात करते हैं। कश्‍मीर की  अलगाववादी हुर्रियत हो या नक्सलवादी विचारधारा दिन पर दिन हावी होती जा रही है। कुछ  मानवाधिकारवादी इन नक्सलियों को आतंकी नहीं मानते तो कुछ मानवाधिकारवादी पत्थरबाजों को मासूम  कहने से नहीं हिचकते, भ्रमित विचारधारा के शिकार कहकर इनका बचाव किया जाता है।

ये रस्‍साकशी का खेल खेलकर भारत नक्सलियों से पचासों साल से जूझ रहा है,मगर हर हमले के बाद  राजनेता ट्वीट कर निंदा कर देते हैं और मीडिया एक दिन बहस कराकर अगले दिन मानवता के पाठ  पढ़ाते हुए अलगावादियों-नक्‍सवादियों को मासूम बताने लगती है।

फिलहाल सुकमा के इन 26 जवानों की शहादत के बाद भी क्या अब भी वे मानवाधिकारवादी नक्सलियों  को ही सही ठहराएंगे? यदि नहीं तो कब तक हम श्रद्धांजलि देते रहेंगे?

आज का नक्सल आंदोलन 1967 वाला आदर्शवादी आंदोलन नहीं रहा है बल्कि यह साम्यवादियों द्वारा  रंगदारी वसूलनेवाले आपराधिक गिरोह में बदल चुका है। इन पथभ्रष्ट लोगों का साम्यवाद और गरीबों से  अब कुछ भी लेना-देना नहीं है। हां, इनका धंधा गरीबों के गरीब बने रहने पर ही टिका जरूर है इसलिए ये  लोग अपने इलाकों में कोई भी सरकारी योजना लागू नहीं होने देते हैं और यहां तक कि स्कूलों में पढ़ाई भी  नहीं होने देते।

आप ही बताईए कि जो लोग देश के 20 प्रतिशत क्षेत्रफल पर एकछत्र शासन करते हैं वे भला समझाने से  क्यों मानने लगे? हर दिन, हर सप्ताह, हर महीना, हर साल भारतीय जवान मरते रहते हैं, राजनेता आरोप  प्रत्यारोप लगाकर इस खून सनी जमीन पर मिटटी डालते रहते हैं।

हमारी वर्तमान केंद्र सरकार नक्सली समस्या को जितने हल्के में ले रही है यह समस्या उतनी हल्की है  नहीं। यह समस्या हमारी संप्रभुता को खुली चुनौती है। हमारी एकता और अखंडता के मार्ग में सबसे बड़ी  बाधा है।

हमेशा से नक्सलवादी इलाकों में सरकार योजना लेकर जाती है। लेकिन लाशे लेकर आती है। भला क्या  कोई ऐसी समस्या स्थानीय हो सकती है? क्या यह सच नहीं है कि हमारे संविधान और कानून का शासन  छत्तीसगढ़ राज्य के सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही चलता है? क्या यह सच नहीं है कि वहां के नक्सली क्षेत्रों में  जाने से हमारे सुरक्षा-बल भी डरते हैं तो योजनाएं क्या जाएंगी?

आज इन सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि भारत के मध्य हिस्से में नक्सल बहुल इलाकों में इन  लोगों के पास धन और हथियार कहां से आता है? कौन लोग इन्हें लाल क्रांति के नाम पर उकसा रहे हैं?  यदि सरकार विश्व के सामने अपनी उदार छवि पेश करना चाहती तो उसे सुरक्षित भारत की छवि भी पेश  करनी होगी। जम्मू-कश्मीर और मिजोरम के बाद कई राज्य संघर्ष के तीसरें केंद्र के रूप में उभरे हैं जहां  पर माओवादियों के विरूद्ध सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती हुई है। पिछले लगभग साढ़े चार दशकों से चल  रहा माओवाद जैसा कोई भी भूमिगत आंदोलन बिना व्यापक जन सर्मथन और राजनेताओं के संभव है?  लंबे अरसे से नक्सल अभियान पर नजर रखे सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बिना तैयारी के सुरक्षा  बलों को नक्सल विरोधी अभियान में झोंक देना भूखे भेडि़यों को न्योता देने के बराबर है।

नक्सल अकसर ही गुरिल्ला लड़ाई का तरीका अपनाते हैं और उनकी हमला कर गायब होने जाने की  रणनीति सुरक्षा बलों के लिये खतरनाक साबित हुई है। नक्सली जिन इलाकों में अपना प्रभाव रखते हैं वहां  पहुंचने के साधन नहीं हैं। पिछले दस सालों से इन इलाकों में न ही सरकार और न ही सुरक्षा एजेंसियों ने  प्रवेश करने का जोखिम लिया है जिस कारण यह लोग मजबूत होते गये।

‘जब मौत केवल आंकड़ा बन जाए, जवाब केवल ईंट और पत्थर में तोला जाए, जब हमदर्द ही दर्द देने लगें  तो सुकमा बार बार होगा।’

महाभारत में कहा गया कि धर्म की रक्षा के लिए नि:शस्‍त्र का वध भी उचित है तो क्‍यों नहीं हमारी  सरकारें, हमारी सुरक्षा एजेंसियां और कथित मानवाधिकारवादी व मीडिया मिलकर उन लोगों का सच खोलते  और उन्‍हें जनता के सामने नंगा करते , कर्ण तो तब भी निशस्‍त्र थे मगर जो हमारे जवानों को मार रहे हैं  वे अत्‍याधुनिक हथियारों से लैस हैं तो इन कॉकरोचों की सफाई क्‍यों न घर से की जाए।

-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

#PresidentMukherjee conferred the 52nd Jnanpith Award on Prof. Sankha Ghosh in New Delhi today



Jnanpith Award has been the 52st Jnanpith Award to veteran modern Bengali poet Shankha Ghosh for year 2016. He is a leading authority on Rabindranath Tagore. Ghosh was conferred the Padma Bhushan in 2011 and the Sahitya Academi award in 1999. Shankha Ghosh is the seventh Bengali author to win India’s highest literary award.

Last year eminent Gujarati Litterateur Shri Raghuveer Chaudhary was declared recipient of 2015 Jnanpith Award. Prior Gyanpith award 2014 was given to Bhalchandra Nemade. Since some time, the Jnanpith Awards are being given a few years later than their year of award. Following the new precedent, Kedar Nath Singh was given the awarded in 2014 for year 2013.

- Alaknanda Singh

रविवार, 23 अप्रैल 2017

नाजनीन और हमसर हयात निजामी तो सिर्फ बानगीभर हैं

धर्म का काम है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना और राजनीति का  काम है लोगों का ध्‍यान रखना, उनके हित के लिए काम करना। जब धर्म  और राजनीति साथ-साथ नहीं चलते तब हमें भ्रष्‍ट राजनीतिज्ञ और कपटी  धार्मिक नेता मिलते हैं।

एक धार्मिक व्‍यक्‍ति जो सदाचारी व स्‍नेही है, अवश्‍य ही जनता के हित  की सोचेगा, उसका ख्‍याल रखेगा इसीलिए वह सच्‍चा राजनीतिज्ञ बनेगा।  सभी अवतार और महान उपदेशकों ने लोकहित का ध्‍यान रखा और  इसलिए वो धार्मिक बने रहे। अधार्मिक व्‍यक्‍ति या अधार्मिक सोच, दोनों  ही स्‍थितियां भ्रष्‍टाचार और अराजकता फैलाती हैं। धर्म कोई भी हो जो  ''संयम व स्‍वछंदता'' दोनों के साथ सामंजस्‍य बैठाकर चलता है, वही  पल्‍लवित होता है, अन्‍यथा वह अतिवाद का शिकार हो अपना मूल उद्देश्‍य  ही खो देता है।

अब देखिए ना, बात बहुत छोटी सी है मगर असर गहरा है। वाराणसी की  वरुणानगरम कालोनी का वाकया है जहां रामनवमी पर मुस्‍लिम महिला  संस्‍था की अध्‍यक्ष नाजनीन साहिबा ने भगवान श्री राम की आरती उतारी  और मुस्‍लिम महिलाओं को तीन तलाक की लड़ाई में जीत दिलाने का  आशीर्वाद मांगा।

बात यहां धर्म ''कौन सा है'' की है ही नहीं, बात तो सिर्फ उस आस्‍था की  है जिसके वशीभूत हो ये विश्‍वास जन्‍मा कि श्री राम का आशीर्वाद होगा  तो औरतों के हक की लड़ाई निर्णायक साबित होगी और उनके जज्‍़बे को  कोई हरा नहीं पाएगा।
ये मुस्‍लिम और हिंदू के बीच की बात ही नहीं थी कि नाजनीन साहिबा को  रामनवमी पर आरती करने तक ले गई। यह तो श्रीराम जैसे लोकनायक  के प्रति वो विश्‍वास था जो तीन तलाक के मुद्दे पर उनसे जीत का  आशीर्वाद मांगने पहुंचा।

नाजनीन तो एक उदाहरण है उनके लिए जिनके लिए धर्म, राजनीति की  मौजूदा अवधारणा से चार कदम आगे की बात है। जो स्‍पष्‍ट करती है कि  ''धर्म का काम है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना और राजनीति  का काम है लोगों का ध्‍यान रखना, उनके हित के लिए काम करना''।

यह उस अपनेपन और विश्‍वास की बात है जो मनौतियों के लिए किसी  धर्म के बीच बाकायदा ''प्‍लांट किए'' गए अंतर्विरोधों को लांघ जाती  है।

धर्म और राजनीति से ऊपर उठते हुए लोगों का एक और उदाहरण है --  हाल ही में एक सप्‍ताह तक वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में चले   संगीत महोत्‍सव का।

महोत्‍सव में दरगाह अजमेर शरीफ के कव्वाल हमसर हयात निजामी के  सूफी कलाम को संकट मोचन संगीत महोत्‍सव में जिसने भी सुना होगा  उसे यह अहसास तो हो ही गया होगा कि प्रार्थना हो इबादत हो, उन सभी  बंधनों और लकीरों से परे होती है जो हर रोज हर घड़ी लोगों के दिलों पर  खींची जाती हैं।

यह बात अलग है कि इन लकीरों को हर रोज नाजनीन, कव्वाल हमसर  हयात निजामी, श्रीराम मंदिर के पुजारी और संकटमोचन मंदिर का मंच  जैसे कई लोग व संस्‍थाएं मिलकर मिटाते भी जाते हैं। 

आजकल कुछ लोग मौजूदा राजनैतिक हालातों से बेहद ख़फा ख़फा से हैं  क्‍योंकि उन्‍हें खामियां निकालने को स्‍पेस नहीं मिल पा रहा और जो मिल  भी रहा है उसे वे परवान नहीं चढ़ा पा रहे, धर्म के नाम पर जिन मुद्दों को  वे उछालना चाहते हैं, वे अपने धब्‍बों के साथ उन्‍हीं के दामन पर जाकर  चिपक जाते हैं। एक अजब सी बौखलाहट है उनमें तभी तो कहते फिर रहे  हैं कि ''हमारी स्‍वतंत्रता'' बंधक बन गई है। धर्म और राजनीति का ये  सम्‍मिश्रण मठाधीशों-मौलवियों को जो आइना दिखा रहा है, वे उससे  विचलित हैं। कभी इन्‍हीं डरों पर वे अपना आधिपत्‍य रखते थे। 

बहरहाल, जो आजकल की राजनीति से निराश हैं, जो धर्म पर बोलने  वाली जुबानों से आहत हुए जा रहे हैं उनके लिए हिंदी के कवि शमशेर  बहादुर सिंह कहते हैं---

‘ईश्वर अगर मैंने अरबी में प्रार्थना की
तू मुझसे नाराज हो जाएगा?
अल्लमह यदि मैंने संस्कृत में संध्या की
तो तू मुझे दोजख में डालेगा?
लोग तो यही कहते घूम रहे हैं
तू बता, ईश्वर?
तू ही समझा, मेरे अल्लाह!
बहुत-सी प्रार्थनाएं हैं
मुझे बहुत-बहुत मोहती हैं
ऐसा क्यों नहीं है कि एक ही प्रार्थना
मैं दिल से कुबूल कर लूं
और अन्य प्रार्थनाओं को करने पर
प्रायश्चित करने का संकल्प करूं!
क्योंकि तब मैं अधिक धार्मिक
अपने को महसूस करूंगा,
इसमें कोई संदेह नहीं है.’


शमशेर जिस अधिक धार्मिकता की बात कर रहे हैं, वह सद्भाव से उपजती  है और सारी प्रार्थनाओं को संगीत बना देती है। सद्भाव से ही उपजा है वह  संगीत जो सबका है जिसे कव्वाल हमसर हयात निजामी गाते हैं ‘छाप  तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के...’ वहीं नाजनीन भी आरती  गाकर सद्भाव के द्योतक श्रीराम को मनाती हैं।

धर्म और राजनीति के बीच पैदा हो चुका ये अद्भुत समन्‍वय निश्‍चित ही  धर्म और राजनीति दोनों के अतिवादियों को बढ़िया सबक सिखायेगा, भला  बताइये कि उभरती अर्थव्‍यवस्‍था व शांति का संदेश देने वाले हमारे देश के  भविष्‍य के लिए इससे अच्‍छी खबर और क्‍या हो सकती है।

- अलकनंदा सिंह


बुधवार, 19 अप्रैल 2017

धार्मिक गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज़ उठाना ज़ुर्म है क्‍या


कबीर, रैदास, रसखान की भक्‍ति परंपरा वाले देश में धर्म के मूलभाव की धज्‍जियां किस तरह उड़ाती हैं, यह हम देख सकते हैं सोनू निगम द्वारा अजान पर कहे गए शब्‍दों के बाद आई प्रतिक्रियाओं से। इन शब्‍दों को लेकर सोनू निगम सुर्खियों में हैं, बॉलीवुड यूं भी आजकल अपनी रचनाओं और कृतियों से नहीं बल्‍कि ट्विटर पर अपने विचारों से सुर्खियों में रहने की कला आजमा रहा है।

दरअसल सोनू निगम ने एक के बाद एक लगातार तीन ट्वीट किये और अपनी  नींद में खलल डालने के लिए अजान की आवाज को दोषी बताते हुए कहा कि  इस गुंडागर्दी पर लगाम लगनी चाहिए। अजान का नाम आया तो ज़ाहिर है  बवाल होना ही था।

बवाल यहां तक बढ़ा कि आज बुधवार को सुबह सोनू निगम ने पश्चिम बंगाल के एक मौलवी के बयान पर अपने बाल मुंडवाने का एलान कर दिया था. सोनू निगम ने ट्वीट करते हुए कहा, ' आज दोपहर 2 बजे आलिम आएगा और मेरा सिर मुंडेगा. अपने 10 लाख रुपये तैयार रखो मौलवी'. सोनू ने इसके साथ ही अपने अगले ट्वीट में प्रैस को भी इसके लिए निमंत्रण दे दिया.
दरअसल डीएनए में छपी एक खबर में पश्चिम बंगाल अल्‍पसंख्‍यक युनाइटेड काउंसिल के एक वरिष्‍ठ सदस्‍य का बयान दिया है, 'यदि कोई उनका सिर मुंडवा कर, उनके गले में जूते की माला डालकर देश में घुमाएगा तो मैं खुद उस शख्‍स के लिए 10 लाख रुपये के पुरस्‍कार का एलान करता हूं.'

सोनू निगम ने अपने ट्वीट पर उठे विवाद पर की प्रेस कॉन्‍फरेंस में यह साफ कर दिया है कि वह किसी धर्म के विरोध में नहीं हैं और वह अपने मुस्लिम दोस्‍तों से उतना ही प्‍यार करते हैं. सोनू निगम ने अपने बाल कटवा लिए हैं. सोनू निगम ने कहा कि मेरा उद्देश्‍य किसी को चोट पहुंचाना या किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं था. उन्‍होंने दुख जताया है कि लोगों ने उनका मुद्दा समझने के बजाए उनकी बात को पकड़ा और उसके खिलाफ विवाद खड़ा कर दिया. सोनू ने अपने दावे को पूरा करते हुए अपना सिर मुंडवा का फैसला लिया है और इस काम के लिए उन्‍होंने अपने मुस्लिम दोस्‍त आलिम को चुना. आलिम हकीम सेलेब्रिटी हेयरस्‍टाइलिस्‍ट हैं. सोनू निगम ने कहा, मैं सोच भी नहीं सकता था कि इतनी छोटी सी बात इतनी बड़ी बन जाएगी.

सोनू ने कहा कि मगर आज भी मैं यही कहूंगा  कि ये गुडागर्दी है कि मैं मुस्‍लिम नहीं हूं फिर  भी जबरन मैं अजान क्‍यों सुनूं,  यही बात मंदिर-चर्च-गुरुद्वारा या ऐसे किसी भी ऑरगेनाइजेशन के लिए भी  कहूंगा।  

भारतीय जनमानस में धर्म के प्रति कटमुल्‍लावाद और कट्टरता इस हद तक  समाहित होता गया कि धर्म से जुड़ी कोई बात उठी नहीं कि हाज़िर हो जाते हैं  आलोचक एक दम बर्र के टूटे छत्‍ते की तरह। यही हुआ और आज सुबह तक  सोनू निगम अपने आलोचकों को अपनी बात का मर्म समझा रहे हैं।

कला की आलोचना समालोचना करते हुए किसी को कोई तकलीफ नहीं होती  मगर धर्म की बात आते ही इतिहास से निकल-निकल के सामने आती हैं  आलोचनाऐं।

चिंतन, मनन और कर्म का संदेश देते आए कमोवेश सभी धर्मों ने कभी भी  किसी दूसरे को आहत करने की बात नहीं कही।

कबीर का तो पूरा निर्गुण दर्शन प्रैक्‍टीकैलिटी पर ही टिका है जो मुस्‍लिमों को  असल धर्म बताते हुए कहते हैं कि-
कांकर पाथर जोरि कै मज्‍ज़िद लई बना।
ता पर मुल्‍ला बांग दे क्‍या बहरा हुआ खुदा।।

इसी तरह वे हिंदू धर्मावलंबियों से भी अंधे-बहरे बन कर जड़ होने से बाज आने  को कहते हैं-
पाथर पूजें हरि मिलें तौ  मैं पूजूं पहार।
जा ते तो चाकी भली पूज खाय संसार।।

हम सब जानते हैं कि लाउडस्‍पीकर लगाकर आए दिन कानफोड़ू संगीत के साथ  देवी जागरण, अखंड रामायण, श्री मद्भागवत कथा धर्म और ईश्‍वर से  हमें  मिलान के नाम पर ध्‍वनि प्रदूषण फैलाते हैं जिन्‍हें ना किसी बीमार की फिक्र  होती है और न किसी की नींद की।देर रात ड्यूटी से आने वालों की, परीक्षा देने  वाले छात्रों की शामत आ जाती है जब घर या पड़ोस में कोई ऐसा कार्यक्रम  होता है। अजीब बात यह भी है कि चिंतन और मनन करके ईश्‍वर प्राप्‍ति का शांति वाला उपदेश भी इन्‍हीं लाउडस्‍पीकर्स के द्वारा ही दिया जाता है।

तो फिर सोनू निगम कहां गलत हैं। सोनू निगम ने भी यह सच ही तो कहा है ये तो गुंडागर्दी है भाई।

धर्म के आतंक का यह रूप नि:संदेह भर्त्‍सनायोग्‍य है। मस्‍जिद हो, मंदिर हो, चर्च  हो या गुरूद्वारा सभी में लाउडस्‍पीकर्स पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। कई बार  तो सांप्रदयिक विवादों की जड़ में ये लाउडस्‍पीकर ही होते हैं। हालांकि कानूनी  तौर पर निश्‍चित फ्रीक्‍वेंसी पर लाउस्‍पीकर बजाने की इजाजत है मगर कानून  का पालन कितना होता है यह मौजूदा विवाद बता रहा है।

ईश्‍वर की खोज और पूजा पद्धतियों में शामिल होते गए इस शोरशराबे पर क्‍या  हम कबीर के कहे को सच नहीं कर सकते।

- अलकनंदा सिंह


गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अकेली कविता कृष्‍णन ही क्‍यों…इस अराजकता के हम सभी साक्षी हैं

हमारे देश में जिन शब्‍दों को ब्रह्म माना गया, सोशल मीडिया पर या इंटरनेट की दुनिया ने उनको  धराशाई करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। यहां शब्‍दों का ऐसा सैलाब आया हुआ है कि क्‍या  सही है क्‍या गलत, इनके प्रयोग से समाज में क्‍या प्रतिक्रिया होगी, कोई समझने को तैयार नहीं।

इंटरनेट पर अभिव्‍यक्‍ति को जिन उच्‍छृंखल शब्‍दों का सामना करना पड़ रहा है, उससे तो अर्थ का  अनर्थ होते देर नहीं लगती। सड़कछाप और संभ्रांत भाषा के बीच अब अंतर कर पाने में विचारधारा के  संकट से भी जूझना पड़ता है सो अलग। शब्‍दों के इन वीभत्‍स रूपों का डिसेक्‍शन कर पाना आसान  नहीं होता, वह भी तब जब लिखने वाला (चूंकि हर लिखने वाला लेखक नहीं होता) नकारात्‍मक सोच  वाला हो तो उसके लिखे गए शब्‍द अच्‍छाई में भी बुराई ढूंढ़ ही लेते हैं।

मुकम्‍मल कानून की कमी और पेचीदगियों के कारण इंटरनेट पर इन अपशब्‍दों ने हद से बाहर जाकर शर्मनाक स्‍थिति पैदा कर दी है। यह अपशब्‍दों का ऐसा मायाजाल तैयार कर चुका है कि इस  पर यदि समय रहते रोक नहीं लगाई तो हम इस शब्‍दजनित अराजकता के लिए स्‍वयं भी उतने ही  दोषी माने जाऐंगे जितने कि अपशब्‍दों के आविष्‍कारक हैं।

हाल ही में एक मामला वामपंथी सोशल एक्‍टिविस्ट कविता कृष्‍णन पर अपशब्‍दों के इसी आतंक का  आया है जिसने खूब सुर्खियां बटोरीं। ये बात इसलिए भी गंभीर है कि कथित स्‍वतंत्रता की आड़ लेकर  एक समाचार वेबसाइट द्वारा आपत्‍तिजनक शब्‍दों के साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ  कविता कृष्‍णन की विवादित टिप्पणी को पब्‍लिश किया जाता है।

जी हां, यह घृणित कारनामा किया है www.Hamariawaz.in नामक वेबसाइट ने जिसमें हाल ही में छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में वामपंथी महिला संगठनों की नेता कामरेड कविता कृष्णन ने  हवाले से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विवादित टिप्पणी को पब्‍लिश किया गया है।  वेबसाइट के अनुसार कविता कृष्णन ने कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री ने अपने बाप अमेरिका के  इशारे पर 1000 और 500 के नोट बंद कर दिए है, जिससे हमारे बस्तर में रहने वाले आदिवासी  भाइयों को आज भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है।
वेबसाइट के ही अनुसार कविता कृष्णन ने कहा कि.. ये देश का दुर्भाग्य है, जो पहली बार भारत को  नरेंद्र मोदी जैसा नपुंसक प्रधानमंत्री मिला। वो यही नहीं रुकी उसने कहा कि जो अपनी पत्नी और माँ  का नहीं हुआ वो देश का कैसे होगा। मोदी एक हिजड़ा है, और अगर ऐसा नहीं है, तो मेरे साथ  हमबिस्तर होकर अपनी मर्दानगी साबित करे। पूँजीपतियों का अरबों-खरबों का टैक्स माफ करने वाला  यह प्रधानमंत्री देशद्रोही और गद्दार है। वामपंथी नेता कविता कृष्णन ने आदिवासी महिलाओं के एक  सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि हम महिलाओं को भी फ्री सेक्स की आजादी चाहिए, जिस  तरह कोई भी पुरुष किसी भी महिला के साथ शारीरिक संबंध बना सकता है उसी तरह महिलाओं को  भी किसी भी पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाने का अधिकार होना चाहिए। हम महिलाएं भी अपने  मनपसंद पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाकर अपने काम वासना की पूर्ति कर सकें।
वामपंथी नेता कविता कृष्णन ने कहा कि सीआरपीएफ के जवान बस्तर में नक्सलियों के नाम पर  दलित आदिवासियों का एनकाउंटर कर रही है और आदिवासी महिलाओं के साथ सीआरपीएफ के  जवान बलात्कार करते हैं, हम इसका विरोध करते हैं।
वामपंथी महिला संगठनों की नेता कामरेड कविता कृष्णन ने कहा कि हमारी आदिवासी महिलाओं के  साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ हम लड़ाई लड़ेंगे और आजादी दिलाएंगे।

हालांकि कविता कृष्‍णन ने वेबसाइट Alt News में स्‍वयं की छवि को इस घृणित अंदाज़ में पेश किए  जाने को लेकर एक इंटरव्‍यू भी दिया है और www.Hamariawaz.in पर अदालती कार्यवाही किए जाने  की बात भी की है मगर यह सब तो आगे की बात है। एक प्रतिरोध की बात है।

मैं ये नहीं कहती कि कविता को लेकर उक्‍त वेबसाइट ने ऐसा क्‍यों लिखा, कविता को लेकर ही क्‍यों  लिखा, कविता अब क्‍या करेगीं या इस वेबसाइट पर अश्‍लील सामिग्री ही क्‍यों परोसी जाती  है…नेगेटिव ही सही पब्‍लिसिटी तो वेबसाइट को मिली ही आदि आदि…।

इन सबसे कविता भी निबट  लेंगी और सरकार व कानून भी, मगर बात वहीं आ जा जाती है कि अपशाब्‍दिक होती घातक सोच  और आधा गिलास भरा देखने की बजाय आधा गिलास खाली देखने की आदी हो चुकी इस प्रवृत्‍ति ने  देश की यह दशा कर दी है कि आज ऐसे लोगों ने प्रधानमंत्री को गरियाने की सारी हदें पार कर दी  है।

श्री श्री रविशंकर कहते हैं कि जो अधिक गालियां अथवा अपशब्‍द निकालते हैं वह स्‍वयं में अपने ही  भीतर से उतना ही अधिक असुरक्षित होते हैं। संभवत:यही असुरक्षा अपशब्‍द लिखकर पब्‍लिसिटी स्‍टंट  का रूप लेती है। हमें यदि इंटरनेट के पॉजिटिव इफेक्‍ट्स पता हैं तो इसकी बेलगाम दुष्‍प्रवृत्‍ति को भी  तो झेलना होगा।

हमें अपशब्‍दों की इस बेलगाम दुनिया का प्रतिकार करना होगा और कानूनी रूप से  भी आमजन में यह संदेश देना होगा कि नंगी सोच हो या नंगा बदन आकर्षण पैदा नहीं करते। हां,  एक क्षोभ भरा  कौतूहल अवश्‍य देते हैं वह भी मानसिक विकृति के लक्षणों के साथ। और इस  मानसिक विकृति से कोई भी ग्रस्‍त हो सकता है, हमें सावधान रहना होगा और दूसरों को सचेत भी  करना होगा।

– अलकनंदा सिंह

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

बात तो आलस्‍य की ही है ना...

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस आगामी 7 अप्रैल को मनाया जाएगा तब तक देखें आप स्‍वयं को स्‍वस्‍थ रखने के लिए क्‍या क्‍या कोशिश करते हैं। इस बार वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑरगेनाइजेशन ने इसकी थीम रखी है ''अवसाद''..; और अवसाद है मन की बीमार अवस्था जिसे सिर्फ स्‍वयं के मन से ही ट्रीट किया जा सकता है।

जब बात मन और इच्‍छाशक्‍ति की ही है तो इस संबंध में चार्वाक का "यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः" सिद्धांत पूरी तरह निरर्थक हो जाता है क्‍योंकि सुख से जीने के लिए यदि ऋण ले भी लिया तो उसे चुकाने के लिए भी मन पर जो बोझ रहेगा ,वह हमेशा के लिए रोगों को आमंत्रित कर सकता है।

इसलिए चार्वाक् के सिद्धांत से हटकर आप स्‍वयं अपनी तरह अपने लिए अपनी इच्‍छा से सोचें कि हमने क्‍या क्‍या किया और क्‍या क्‍या करना है।

हममें से अधिकतर को आपने यह कहते सुना होगा, '' क्‍या करें...रोग है कि जाने का नाम ही नहीं ले रहा...इस बीमारी ने तो नाक में दम कर रखा है...ना जाने कब इससे छुटकारा मिलेगा'' या आपके द्वारा कोई सहज और सर्वथा साधारण व प्रभावी उपाय बताए जाने पर कुछ लोग ये भी कहते सुने होंगे,'' क्‍या करें इतना समय ही कहां है जो हम ये कर पाऐं'' मगर ये  100 प्रतिशत सही मानिए कि जो आपके कहने पर अपना जवाब तैयार रखते हैं और चट से आपकी सारी सलाहों पर दे मारते हैं , वे स्‍वयं के लिए भी ये चाहते ही नहीं कि वे निरोग रहें।

कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो आपसे स्‍वस्‍थ रहने की या अपनी बीमारी की चर्चा इस उद्देश्‍य से करते हैं कि आप कोई उपाय सुझाऐं ,आपके द्वारा इलाज की विधि बताते ही वे अपना ज्ञान कमजोर होते देख आक्रामक मुद्रा में कहते हैं कि '' हां, ये तो हमें पता है...मगर करने का टाइम किसके पास है''। ऐसे में आप उनकी इस आक्रामक प्रतिक्रिया से आहत ना हों..ना...ना कतई नहीं। ऐसे व्‍यक्‍ति स्‍वयं को निरोग रखना चाहते हैं परंतु उनके भीतर इच्‍छाशक्‍ति की बेहद कमी होती है जो चाहती है कि कार्य पूरा हो मगर वे स्‍वयं ना करें। हालांकि ऐसा वे जानबूझकर करते हैं या आदतन अभी इस बावत कोई शोध भले ही ना आया हो मगर हमारी-आपकी कहानी है  जो रोज-ब-रोज घटती है। निरोग रहने की इच्‍छाशक्‍ति के आगे ऐसा कोई कारण नहीं कि रोग ठहर जाए, देर हो सकती है मगर रोग को जाना ही होगा।

संक्रामक रोगों की बात छोड़ दें तो लाइफस्‍टाइल से उपजे रोगों के उपजने और फैलने में मन और इच्‍छाशक्‍ति का रोल बेहद अहम होता है। मन की तैयारी और उसका शरीर पर अनुपालन करने तक निरोग रहने के लिए किए उपाय स्‍वयं ही करने होंगे।

किसी भी प्रकार का आलस्‍य ''रोग- आमंत्रण'' का पहला कारण है।  प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति की कामना होती है सर्वथा निरोग रहने की मगर उसके लिए वह स्‍वयं जब तक प्रयास नहीं करेगा तब तक निरोग रहने की उसकी आकांक्षा सिर्फ मन की कल्‍पना तक ही सीमित रह जाएगी। अगर आप सुबह जल्‍दी नहीं उठते, अगर आप रात को देर से सोने का बहाना अपने लिए बचाकर रखते हैं , अगर आप योग और किसी अन्‍य कसरत से दूरी बनाकर रखते हैं, अगर आप कर्म की अपेक्षा प्रवचन में विश्‍वास रखते हैं, अगर आप परहेज से अधिक अधिक दवाओं पर विश्‍वास करते हैं, अगर आप शारीरिक श्रम कम करते हैं और अनेकानेक बहानों की तलाश में रहते हैं तो निश्‍चित जानिए आप का निरोग रहने का सपना महज सपना ही रह जाने वाला है।

बाबा रामदेव हो, श्री श्री रविशंकर या प्रधानमंत्री मोदी ये तीनों ही भरपूर कोशिश कर रहे हैं कि निरोग रहने के लिए देश का हर व्‍यक्‍ति अपने स्‍तर पर ऊर्जावान बने, वह मानसिक और शारीरिक तौर पर स्‍वस्‍थ रहे। योजनाओं के साथ साथ ये तीनों ही अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ रहे मगर अब भी रोगियों की संख्‍या घटने का नाम नहीं ले रही क्‍योंकि जो पहला कारण है '' अपनी देह के रखरखाव के प्रति आलस्‍य '' उसे लेकर तो स्‍वयं संबंधित व्‍यक्‍ति को ही सोचना होगा।
इसीलिए देश में नित्‍य बढ़ रहे रोगियों में संक्रामक -लाइलाज रोगियों का आंकड़ा उतना नहीं है जितना कि लाइफस्‍टाइल रोगियों का।

निश्‍चित ही चार्वाक् के सिद्धांत में से ऋण लेकर घी पीने को यदि निकाल देने का समय है अब क्‍योंकि वह ना तो समयानुकूल है और ना ही परिस्‍थितनुकूल, तो सुख से जीने के लिए निरोग रहना जरूरी है और इसके लिए स्‍वयं ही (अपने भीतर से भी) आपको ही कोशिश करनी होगी।

-  अलकनंदा  सिंह

गुरुवार, 30 मार्च 2017

क्‍या आपने मृणाल पांडे का लेख पढ़ा?

क्‍या आपने मृणाल पांडे का लेख पढ़ा? नहीं पढ़ा तो 29 मार्च के दैनिक जागरण का संपादकीय पृष्‍ठ पढ़  लीजिएगा। कल यानि 29 मार्च को छपा यह लेख मृणाल जी में मौजूद गजब की प्रतिभा को दर्शाता है,  वो प्रतिभा जो उन्‍हें विरासत में मिली और जिसके बूते उन्‍होंने राष्‍ट्रीय समाचार पत्र दैनिक हिन्‍दुस्‍तान  में संपादन का भारी भरकम बोझ अपने कांधों पर लादे रखा। इसी प्रतिभा में चार चांद लगाती है उनके  भीतर की एक और प्रतिभा, और वो प्रतिभा है- ''हद दर्जे की नेगेटिविटी को जाहिर करने और उसे  छपवाकर गौरवान्‍वित होने की''। वो प्रतिभा जिसके वशीभूत हो उन्‍होंने अपने संपादनकाल में जो  नेगेटिविटी भाजपा के प्रति संजोई थी। उसी प्रतिभा को उन्‍होंने 29 मार्च के अपने लेख में पूरीतरह उड़ेल  दिया, मानो कल मौका मिले ना मिले। वे भाजपा, मोदी और वर्तमान में जीएसटी बिल की जबरन  बखिया उधेड़ रही थीं।
लोकतंत्र की खासियत ही ये है कि किसी भी सरकार को जब हम चुनते हैं तो उसके कामकाज की  समीक्षा करने का भी हक हमें हासिल होता है। मगर समीक्षा करते समय यह देखा जाना जरूरी है कि  हम निरपेक्ष रहें। खासकर हम मीडिया वालों को सावधानी, सकारात्‍मकता और तुलनात्‍मक दृष्‍टि रखनी  चाहिए, बिना किसी पूर्वाग्रह या विचारधारा को पालने के। देश हित में और आमजन के लिए नीतियों  को लागू करने में जो कमी हो, उसे जरूर उजागर करना चाहिए मगर किसी सोच का ठप्‍पा लगने से  बचना चाहिए। मृणाल जी की भाषा शैली और चुनचुन कर सरकार के हर कदम को आरोपों से घेर देना  ठीक नहीं। वामपंथ हो या दक्षिणपंथ, लोग सभी का सच जानते हैं और इनकी कार्यशैली भी।

बहरहाल मृणाल पांडे जी ने इस लेख में लिखा-
1. 2014 तक आधार कार्ड की बखिया उधेड़ रहे नरेंद्र मोदी ने जहां आधारकार्ड को सरकारी योजनाओं  का लाभ उठाने वालों के लिए अनिवार्य कर दिया है वहीं सुरक्षा संबंधी उपायों के लिए आमजन की  निजी सूचनाऐं जुटाने के लिए प्राइवेसी में सेंध लगाने का बंदोबस्‍त कर दिया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने  इसे गैर जरूरी बताया है।
उन्‍होंने लिखा कि-
2. जीएसटी बिल के संशोधनों पर बिना संसद में चर्चा कराए तिकड़म से वित्‍तमंत्री अरुण जेटली ने इसे  पास करा लिया।

उन्‍होंने लिखा कि-
3. उत्‍तरप्रदेश में आरएसएस का एजेंडा वाली राज्‍य सरकार ने पदभार संभालते ही एंटीरोमिओ स्‍क्‍वायड  बनाकर युवाओं में दहशत फैलाने का काम शुरू कर दिया है। अवैध बूचड़खानों के नाम पर वे  अल्‍पसंख्‍यकों की बड़ी आबादी को बेरोजगार बना रहे हैं आदि आदि।

फिलहाल ये  तीनों प्‍वाइंट्स पर मुझे घोर आपत्‍ति है। ये उसी तरह का लेख है जो जेएनयू में कथित  आजादी छाप छात्रों का बयान हुआ करता था, जिन्‍हें राष्‍ट्रवाद से अभिव्‍यक्‍ति की आजादी खतरे में  दिखाई देती थी।

मृणाल जी क्‍या बताऐंगी कि देश में ''एक कर प्रणाली'' से क्‍या नुकसान हो सकते हैं। सिवाय महंगाई  घटने, टैक्‍स डिपार्टमेंट के भ्रष्‍ट कर्मचारियों-ऑफीसर्स द्वारा व्‍यापारियों से वसूली बंद हो जाने, टैक्‍स दर  टैक्‍स की लंबीचौड़ी फाइल दौड़ बंद होने जैसी दिमाग-खपाऊ कार्यपद्धति से निजात मिल जाना क्‍या उन्‍हें  अच्छा नहीं लग रहा। क्‍या देश के तेज विकास में लालफीताशाही रोड़ा नहीं रही। मृणाल जी क्‍या ये भी  बताऐंगीं कि इससे निपटने की सारी कवायद पिछली सरकारों ने भी कीं मगर वे सफल क्‍यों नहीं हो  सकीं।

मृणाल जी, आधार कार्ड जरूरी बिल्‍कुल नहीं मगर अपनी प्राइवेसी का बहाना बनाकर उन ग्रामीण और  वंचितों को हम क्‍यों भूल रहे हैं जो आज आधार कार्ड के जरिए ही सरकार से तमाम योजनाओं का  लाभ उठा पा रहे हैं। गैस सब्‍सिडी के पैसे, बैंक में आसान काम और जनधन योजना, पेंशन योजना,  बीमा योजना से लाभान्‍वित हुए हैं।

मृणाल जी का अगला क्षोभ था उत्‍तरप्रदेश में एंटीरोमिओ स्‍क्‍वायड के अभियान पर, मगर उन्‍होंने उन  एसिड अटैक विक्‍टिम्‍स का दर्द अनदेखा कर दिया जिनके ऊपर जुल्‍म की शुरुआत ही छेड़छाड़ से होती  है, जबरदस्‍ती से होती है, वे आजीवन उस घृणास्‍पद अनुभूति के साथ जीती हैं।

मृणाल जी उन लड़कियों के प्रति क्‍या कहेंगी जिन्‍हें छेड़छाड़ के कारण स्‍कूल-बाजार-आना जाना सब  छोड़ना पड़ता है, दहशत में घर से निकलते वक्‍त सौ सौ घूंट अपनी बेबसी के पीने पड़ते हैं। इसी  छेड़छाड़ ने अपने जेंडर पर शर्म करना लड़कियों की किस्‍मत बना दिया।

मृणाल जी क्‍या अपनी बेटियों-बहनों को इस शर्मिंदगी से और शोहदों की जाहिलाना हरकतों से बचाने  वाली राज्‍य सरकार गलत कर रही है। अपराधों को बढ़ावा देने की ये कथित ''मानवाधिकारी सोच''  घातक है।

मृणाल जी ने अवैध बूचड़खानों को बंद करने पर जो क्षोभ जताया, तो कोई भी राज्‍य सरकार यदि  अपने राज्‍य में अवैध गतिविधि रोकने को कदम उठाती है तो उसे किस एंगिल से गलत कहा जा  सकता है। समझ से परे की है ये बात।

सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध करना और अपनी मानसिकता को उसमें डालकर ऊलजलूल लिखते  जाना मृणाल जी जैसी हस्‍ती के लिए समाज में अच्‍छा संदेश नहीं देती। आलोचना करते समय यह भी  ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि उसकी तुलना जायज के साथ हो रही है या नाजायज के साथ।

मृणाल जी से कहना चाहूंगी कि प्रकृति हर पल सहायक और प्रेरक है, जो लोग प्राकृतिक, स्वाभाविक  और मर्यादित जीवन के अभ्यासी होते हैं वे प्राकृतिक सहजता, सरसता और आनंद के अधिकारी बन  जाते हैं। इतनी नेगेटिविटी अच्‍छी नहीं। भरोसा रखें तो परिणाम भी पॉजिटिव मिलेंगे। गिलास आधा  भरा दिखेगा, खाली नहीं।

-अलकनंदा सिंह

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