मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

देह तक सिमटे ''कथित फरिश्‍ते''


देह तक सिमटे ''कथित फरिश्‍ते''
हम जिस आदि धर्म को ''सनातन'' कहते हैं, आज उसी के नाम पर  किस तरह गंदगी फैलाई जा रही है, उसकी बानगी हैं आध्यात्मिक  गुरू होने का दावा करने वाले दुराचारी वीरेंद्र देव दीक्षित। जी हां,  मामला कोर्ट में होने और उनके अपराधी घोषित होने से पूर्व ही उन्‍हें  शत-प्रतिशत दुराचारी कहा जा सकता है। कहते हैं ना कि आंखों के  सामने दूध में गिरी मक्‍खी को भी नहीं निगला जा सकता, ठीक उसी  तरह दीक्षित के वकील ने कल जो कुछ कोर्ट में कहा, वह उनकी  ''कुत्‍सित सोच वाली बिरादरी'' के बारे में सब-कुछ बता गया कि  उन्‍होंने बच्‍चियों के साथ ''क्‍या क्‍या न किया होगा'' और इस सोच के  आधार पर ही इन्‍हें बख्‍शा नहीं जा सकता।

आध्यात्मिक गुरू होने का दावा करने वाले वीरेंद्र देव दीक्षित के  वकील ने कल सोमवार को दिल्‍ली हाईकोर्ट में विवादास्पद बयान देते  हुए कहा कि ‘नारी नर्क का द्वार है’ और इसलिए हम लड़कियों को  आश्रम में कैद करके रखते हैं।
हालांकि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल व न्यायमूर्ति सी.  हरि. शंकर की पीठ ने दीक्षित के वकील के इस बयान पर कड़ा  एतराज जताते हुए उसे तत्काल कोर्ट से बाहर निकलवा दिया।
इससे पहले मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से  पेश अधिवक्ता ने कहा कि ‘दीक्षित न सिर्फ खुद को सबसे ऊपर  मानते हैं, बल्कि खुद को भगवान भी समझते हैं। तो इस पर भी  आश्रम के वकील ने कहा कि हम न तो कोई सोसायटी हैं और न ही  हमारे ऊपर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या किसी अन्य संस्था  का आदेश मानने के लिए बाध्य हैं क्योंकि हम कोई डिग्री या  डिप्लोमा नहीं देते हैं।

हाईकोर्ट ने जब पूछा कि आखिर यह विश्वविद्यालय कैसे कहलाता  है तो इसके जवाब में आश्रम के वकील ने कहा कि आश्रम इस  लिहाज से विश्वविद्यालय कहलाता है क्योंकि इसका संचालन खुद  भगवान कर रहे हैं। वकील ने दीक्षित को भगवान बताते हुए कहा  कि जब भगवान खुद ज्ञान दे रहे हैं तो कोई हमको विश्वविद्यालय  कहने से मना कैसे कर सकता है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि  आश्रम विश्वविद्यालय शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता क्योंकि  इसका गठन नियमों के तहत नहीं हुआ है और न ही विश्वविद्यालय  अनुदान आयोग से मान्यता प्राप्त है।

बहरहाल, दीक्षित के वकील ने बता दिया कि वह और उसका क्‍लाइंट  ''कथित भगवान'' उसी लाइन में लग गए हैं जिस लाइन को अब  तक पकड़े गए एक दर्जन से अधिक ''दुराचारी बाबाओं'' ने तैयार  किया, जो ''कथित बाबा'' अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए, यहां उनकी  कोई गिनती नहीं हुई है ।

निश्‍चित ही हम मानते हैं कि समाज की सोच में गिरावट आई है  और इसका फायदा ऐसे ही दुराचारी उठा रहे हैं तथा वासनापूर्ति के  साथ संपत्‍तियां अर्जित कर रहे हैं। ये सब हुआ ही इसलिए कि हम  अपने मूलधर्म और उसकी अवधारणा से दूर होते गए। जिस सनातन  धर्म की नींव वेदों की ऋचाओं के अनुसार रखी गई, उनमें भी कहीं  ये जिक्र नहीं है कि ''नारी नर्क का द्वार'' है।

इसी संदर्भ में ऋग्वेद के एक मंत्र का मैं उल्‍लेख करना चाहूंगी। 
जिस मंत्र का मैं उल्‍लेख कर रही हूं, उसके तीसरे मंडल के 18वें  श्‍लोक के पहले मंत्र में कहा गया है कि- 

''यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा  हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यो, आप अपने उत्पन्न होने की  आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें।'- (ऋग्वेद-3-18-1)

इस मंत्र में ना तो माता को स्‍त्री माना गया है और ना ही देहमात्र,  बल्‍कि माता को प्रकृति, धरती अथवा जन्‍मदात्री माना है और तीनों  के संदर्भ में यह मंत्र अपनी सार्थकता सिद्ध करता है। परंतु स्‍त्री को  मात्र देह भर समझाने वाले इसके औचित्‍य तक नहीं पहुंच सकते  और इन्‍हीं में शामिल हैं ऐसे ''दुराचारी बाबा''।

यूं भी जो लोग अपनी मानसिक चेतना को सिर्फ देह तक ही सीमित  रखते आए हैं, उन्‍हें फिर से ऋग्वेद की ओर ले जाने की खुशफहमी  हमें नहीं पालनी चाहिए क्‍योंकि जो व्‍यक्‍ति विकृत मानसिकता का  है, वह इस ज्ञान का दुरुपयोग ही करेगा।

ऋग्वेद ने हमें माता के जिस रूप को सहेजने का ज्ञान दिया, वह  नरक के द्वार में कब और कैसे तब्‍दील हुई और इसे तब्‍दील किसने  किया, यह अब कोई पहेली नहीं रह गई।

सनातन धर्म को ऐसे ही लोगों द्वारा विकृतरूप में पेश किया जाता  रहा है और यही कारण है कि आज देश की ही विराट विरासत को  गरियाने वालों की कमी नहीं हैं। ना मूलभाव समझा, ना ही मूलरूप।  आधे-अधूरे सच के रूप में कोई मनुस्‍मृति लेकर चौराहे पर खड़ा हो  जाता है तो कोई बाबा बनकर अपना धन-वासना का साम्राज्‍य  स्‍थापित कर ''लोगों को बेवकूफ बनाने'' में मशगूल। सनातन धर्म को  अपभ्रंशित रूप में आमजन के सामने पेश करने का ही नतीजा है कि  आज कहीं ''बाबाओं'' का घिनौना रूप सामने आ रहा है तो कहीं  उनके कुत्‍सित विचार।

देह तक सिमटे ये ''कथित फरिश्‍ते'' हमारे सनातन धर्म का कितना  नुकसान कर चुके हैं और अभी कितना करेंगे, यह दिल्‍ली हाई कोर्ट  में दीक्षित के वकील ने अपनी घिनौनी सोच से बता दिया। इस पर  यदि गौर नहीं किया गया और हम हर बाबा को धर्मरक्षक अथवा  संत-महात्‍मा मानकर पूजते रहेंगे और उन्‍हीं में से उपजते रहेंगे राम  रहीम- वीरेंद्र दीक्षित-आसाराम आदि आदि....।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

अभी तक सबसे ज्‍यादा तोड़े मरोड़े गए हैं महात्‍मा गांधी और उनके शब्‍द, ये कैसी श्रद्धांजलि

अभी तक सबसे ज्‍यादा तोड़े मरोड़े गए हैं महात्‍मा गांधी और उनके शब्‍द, आलोचकों की नई पीढ़ी में शामिल हो गई हैं भारतीय मूल की अमेरिकी लेखिका सुजाता गिडला ।

भारतीय मूल की अमेरिकी लेखिका सुजाता गिडला ने कहा है कि महात्मा गांधी ‘जातिवादी और नस्लीय’ थे जो जाति व्यवस्था को जिंदा रखना चाहते थे। वह राजनीतिक फायदे के लिए दलित उत्थान पर केवल जबानी जमा खर्च करते थे। न्यूयार्क में रहने वाली दलित लेखिका ने जयपुर साहित्य महोत्सव में यह बात कही है। उन्होंने आगे कहा कि गांधी जाति व्यवस्था को केवल ‘संवारना’ चाहते थे।
गिडला ने कहा, ‘कैसे कोई कह सकता है कि गांधी जाति विरोधी व्यक्ति थे? वाकई वह जाति व्यवस्था की रक्षा करना चाहते थे और यही कारण है कि अछूतों के उत्थान के लिए वह केवल बातें करने तक सीमित रहे क्योंकि ब्रिटिश सरकार में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ बहुमत की जरूरत थी ।’ गिडला ने कहा, ‘इसी वजह से हिंदू नेताओं ने हमेशा जाति मुद्दे को उठाया।’
अपने तर्कों को जायज ठहराने के लिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में राजनीतिक नेताओं के घटनाक्रम की याद दिलाई जहां उन्होंने कहा था कि अश्वेत लोग ‘काफिर’ और ‘असफल’ हैं। गिडला ने कहा, ‘अफ्रीका में जब लोग पासपोर्ट शुरू करने के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे तो उन्होंने कहा कि भारतीय लोग मेहनती होते हैं और उनके लिए इन चीजों को साथ लेकर चलना जरूरी नहीं होना चाहिए।
लेकिन अश्वेत लोग काफिर और असफल होते हैं और वे आलसी हैं । हां, वे अपना पासपोर्ट रख सकते हैं लेकिन हमें ऐसा क्यों करना चाहिए ?’ उन्होंने कहा, ‘गांधी वास्तविकता में बहुत जातिवादी और नस्लीय थे और कोई भी अछूत यह जान जाएगा कि गांधी की असल मंशा वहां क्या थी।’
ये तो रही सुजाता गिडला जैसे हाइप पाने के लिए लालायित लेखकों की बात मगर महात्‍मा गांधी को लेकर और भी कई कयासों से भरी पड़ी हैं इतिहास की किताबें। ऐसा ही एक और खुलासा देखिए कि- 

Mahatma Gandhi: क्‍या हुआ था उन आखिरी पलों में, आखिरी शब्द ‘हे राम’ नहीं थे

सरदार वल्लभ भाई पटेल की वजह से बापू Mahatma Gandhi 15 मिनट देर से उस कार्यक्रम में पहुंचे, जहां उन पर गोलियां चली थीं महात्मा गांधी के निजी सचिव वी कल्याणम ने विस्तार से बताया है-
आज महात्मा गांधी की 70वीं पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। बापू की हत्या कैसे हुई, आखिरी वक्त में क्या-क्या हुआ, उनके करीबियों ने विस्तार से इसके बारे में बताया है। आपको बता दें कि सरदार वल्लभ भाई पटेल की वजह से बापू 15 मिनट देरी से उस कार्यक्रम में पहुंचे, जहां उन पर गोलियां चली थीं। महात्मा गांधी के निजी सचिव वी कल्याणम ने विस्तार से इस बारे में बताया है।
कल्याणम के मुताबिक, उस वक्त पंडित नेहरू और सरदार पटेल के बीच मतभेद की खबरों से बापू काफी परेशान थे। इसी मुद्दे पर चर्चा करने के लिए उन्होंने पटेल को शाम चार बजे दिल्ली के बिड़ला भवन बुलाया था। बापू चाहते थे कि वह पटेल को इस्तीफा देने पर राजी कर लें ताकि नेहरू खुलकर काम कर सकें। बापू को शाम 5 बजे प्रार्थना सभा में जाना था। हालांकि, इस मुद्दे पर उनकी और पटेल के बीच इतनी लंबी बातचीत हुई कि थोड़ी देर हो गई। 5 बजकर 10 मिनट पर बातचीत खत्म होने के बाद बापू टॉयलेट गए और वहां से आकर प्रार्थना सभा के लिए रवाना हुए।
प्रार्थना सभा Mahatma Gandhi जी के कमरे से कुछ ही दूरी पर स्थित था। बापू जब तक वहां पहुंचे, 15 मिनट ज्यादा बीत चुका था। बापू अपनी पोतियां संग लोगों के बीच पहुंचे। कल्याणम भी उनके साथ मौजूद थे। बापू नाराज थे क्योंकि उन्हें देर से पहुंचना पसंद नहीं था। इसके बाद बापू उन सीढ़ियों पर चढ़ने लगे, जो प्रार्थना मंच के लिए बनाई गई थीं। लोग बापू का अभिवादन कर रहे थे और वह उस आसन की ओर बढ़ रहे थे, जिस पर बैठकर वह प्रार्थना करते थे। इसी भीड़ में नाथूराम गोडसे भी छिपा था। यहीं पर नाथूराम ने उन पर कई गोलियां चलाईं। इसके बाद वहां भगदड़ मच गई। बापू का काफी खून बह रहा था और लोगों के भागने की वजह से उनका चश्मा और खड़ाऊं भीड़ में कहीं खो गया था। जब लोगों को बापू की हत्या की खबर मिली तो वे अवाक रह गए। बिड़ला भवन पर लोगों की भीड़ जुटने लगी। हत्या के बाद कल्याणम ने नेहरू को सूचना दी।
कल्याणम के मुताबिक, गोली लगने के बाद गांधी जहां गिरे थे, लोग वहां की मिट्टी मुठ्ठियों में भरकर ले जाने लगे। कुछ ही देर में उस जगह पर एक बड़ा सा गड्ढा बन गया था। Mahatma Gandhi  के निजी सचिव ने इस बात का भी खंडन किया था कि महात्मा के आखिरी शब्द ‘हे राम’ थे। 
कल्याणम का मानना था कि किसी चालाक पत्रकार ने अपने अनुमान से ऐसा लिखा और यह प्रचलित हो गया।
कुलमिलाकर इतना कहा जा सकता है कि महात्‍मा गांधी पर कुछ भी कहकर अथवा लिखकर तिल को ताड़ बनाने की कला को अभी विराम नहीं लगेगा। आखिर सबसे सेलेबिल सब्‍जेक्‍ट जो हैं महात्‍मा गांधी। 
- अलकनंदा सिंह



रविवार, 28 जनवरी 2018

भपंग वादन से हुई समानांतर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन की शुरूआत

जयपुर। समानांतर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन प्रतिरोध का पंजाबी साहित्य, कविता अनंत, कहानी बुरे दिनों में और भारतीय लोकतंत्र का उत्तर सत्य विषय पर विभिन्न सत्रों का आयोजन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में श्रोताओं की भागीदारी रही।
उत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत सुबह 9 बजे राजस्थान के मशहूर लोकवाद्य भपंग वादक यूसुफ खान मेवाती और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत भपंग वादन से हुई।
इसके बाद मुक्तिबोध मंच पर रचना पाठ : कहानी बुरे दिनों में सत्र में हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार अरुण असफल, अनिल यादव, तस्लीम खान, संतोष दीक्षित ने कहानी पाठ किया। इन समकालीन कथाकारों ने वर्तमान समय और समाज से जुड़ी कहानियों का वाचन किया एवं उन पर अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र का संचालन कथाकार उदय शंकर ने किया।
बिज्जी की बैठक मंच पर कविता अनंत सत्र में देश के जाने माने कवि विष्णु खरे, सुरजीत पातर, नरेश सक्सेना, देवी प्रसाद मिश्र ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित ने किया।
प्रतिरोध का पंजाबी साहित्य सत्र हुआ। जिसमें पंजाबी के सुपरिचित रचनाकारों डॉ. तेजवंत एस. गिल, वरियाम सिंह संधु, सुखदेव सिंह, डॉ. सरबजीत सिंह और प्रो. सुरजीत जाज की सहभागिता रही। इन सभी रचनाकारों ने पंजाबी साहित्य में प्रतिरोध की स्थितियों पर प्रकाश डाला।
कविता अनंत सत्र :
इस सत्र में प्रतिष्ठित कवि देवी प्रसाद मिश्र ने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ किया। उनकी कविता ‘सत्य को पाने में मुझे अपनी दुर्गति चाहिए” के जरिए साहित्य संस्कृति, राजनीति, फिल्म, क्रिकेट और मनुष्य जीवन की विसंगतियों पर गहरा कटाक्ष किया। उनकी कविता में जीवन की विद्रूपताओं पर गहरा हस्तक्षेप जान पड़ता है। उन्होंने फासिस्टवाद के चेहरे और राजनीति के घिनौनेपन का चित्रण भी एक कविता ‘मुझे एक वैकल्पिक मनुष्य चाहिए” में किया। इसी प्रकार तीन जनें शीर्षक से सुनाई कविता में अपसंस्कृति और अमानवीयता का सजीव चित्रण किया।
वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने हमारे जीवन मूल्यों में आ रही निरंतर गिरावट, धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति और सद्भावना के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की कोशिशों को बेनकाब करने वाली कविताओं का पाठ किया। उनकी कविता ‘रंग” में कहा गया- ‘मजा आ गया, आकाश हिंदू हो गया अभी ठहरों बारिश आने दीजिए, सारी धरती मुसलमान हो जाएगी”। इसी प्रकार मातृ ऋण शीर्षक से उनकी कविता में कहा गया-‘हमने धरती को माता कहा और उसे कुभी पाक बना दिया। बूढ़ी होते ही गौ-माता को घर से बाहर निकाल दिया, कुछ बच्चे अपनी मां को खा जाते हैं भारत माता अपनी खैर मना”। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविताएं बांसुरी और शिशु शीर्षक भी सुनाई। बांसुरी कविता में उन्होंने सुनाया-भूख मिटाने के लिए कीड़ों ने बांसों में छेद कर दिए, कीड़ों को पता ही नहीं था कि वह संगीत के क्षेत्र में एक आविष्कार कर रहे हैं। अब जब भी बजाता हूं बांसुरी तो बांसों का रोना भी सुनाई देता है। गिरना कविता में उन्होंने जीवन में आ रहे आदर्श मूल्यों में गिरावट को इंगित किया। इसी प्रकार साहित्य अकादमी से समादृत पंजाबी प्रसिद्ध कवि सुरजीत पातर और हिंदी के लोकप्रिय कवि विष्णु नागर ने भी अपनी कविताओं में समाज के आज के परिदृश्य को रेखांकित किया।
लेखक से मिलिए सत्र
हरीश भादानी नुक्कड़ में लेखक से मिलिए सत्र के तहत हिंदी के जाने माने रचनाकार डॉ. जितेन्द्र भाटिया से वरिष्ठ कवि एवं व्यंग्यकार फारुक आफरीदी ने संवाद किया। भाटिया ने चीन के कथाकारों की रचनाओं के अनुवाद की चर्चा करते हुए कहा कि चीनी कथा साहित्य में लोक जीवन उभरकर सामने आता है। उन्होंने चीनी लेखक की कथा ‘आई क्यू टेस्ट” तथा अन्य कहानियों का पाठ भी किया। संवाद में यह बात उभरकर आई कि चीन का लेखन भाषा की दृष्टि से चीनी भाषा अन्य भाषाओं की अपेक्षा भारत के निकट है।
जितेन्द्र भाटिया ने आज की साहित्यिक पत्रिकाओं के संदर्भ में कहा कि एक जमाने में सारिका पत्रिका के संपादक कमलेश्वर जहां रचनाकारों की समस्त रचनाएं खुद पढ़ा करते थे और रचनाओं की अशुद्धियों पर विशेष ध्यान देते थे। वहीं वर्तमान युग में बिरले ही है जो अपनी पत्रिका में छपी रचनाओं को पढ़ते हो। भाटिया ने बताया कि वह पिछले कई वर्षों से कहानी, उपान्यास, नाटक और अनुवाद कार्य में जुटे हुए हैं। विगत छह-सात वर्षों से साहित्य के समकालीन परिदृश्यों पर पहल पत्रिका में 21वीं शताब्दी की लड़ाईयां शीर्षक से कालम लिखते रहे हैं। इसी प्रकार कथा देश के लिए भी उन्होंने ‘सोचो साथ क्या जाएगा” श्रृंखला लिखी है। उन्होंने कहा कि एक लेखक को अपनी स्वयं की कठिनाइयों को पार करना होता है। अपनी कठिनाइयों से मुक्त होकर ही वह अच्छा साहित्य रच सकता है।
जितेन्द्र भाटिया ने बताया कि वह अपने ब्लॉग में ‘कंकरीट के जंगल में गुम होते श़हर” शीर्षक से एक श्रृंखला लिख रहे हैं जिसमें शहरों के बदलते चेहरे और वहां के जनजीवन को रेखांकित करने का प्रयास होगा। उनका अनुभव था कि पिछले दस वर्षों में ढाई हजार नए शहर बस गए हैं। यह शहरी गांवों से आए हैं। यह एक प्रकार का विस्थापन है। आज दुनिया में 20 फीसद पानी की कमी है। पर्यावरण की चिंताओं से भी लेखक मुक्त नहीं रह सकता। लेखक को अपनी निगाहें समय और समाज पर निरंतर गड़ाए रखनी पड़ती है।
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शनिवार, 27 जनवरी 2018

आवारा पूंजी के वर्चस्व को चुनौती देने खड़ा हुआ समानांतर साहित्य उत्सव


जयपुर। राजस्‍थान की राजधानी जयपुर में तीन दिवसीय समानांतर साहित्य उत्सव यानी पीएलएफ का शनिवार से शुभारंभ हो गया। इस समानांतर साहित्य उत्सव का उदघाटन साहित्यकार विभूति नारायण, मैत्रेयी पुष्पा, अर्जुन देव चारण, राजेंद्र राजन, विष्णु खरे, नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई ने दीप प्रज्जवलित करके किया।
स्वागत उद्बोधन में पीएलएफ के अध्यक्ष ऋतुराज ने कहा कि यह आयोजन राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ का एक छोटा सा प्रयास है। यह पहल इस तरह की है जैसे किसी शिशु ने एक बड़ी झील पर पत्थर फेंकने की कोशिश की हो।
उन्होंने कहा कि आजकल जो लिट् फेस्ट हो रहे है, ऐसे आयोजन सिर्फ आवारा पूंजी के वर्चस्व के खेल है। पीएलएफ एक समानांतर प्रतिरोध करने की कोशिश है सत्ता और बाजार के समीकरण को चुनौती देती है। यह एक वैकल्पिक हस्तक्षेप भी है।


उन्होंने कहा कि पीएलएफ का आयोजन ख्यातनाम साहित्यकारों की बैचेनी है।
फेस्टिवल के संयोजक कृष्ण कल्पित ने कहा कि दुनिया में जो लिट् फेस्ट हो रहे हैं, वह पूंजीवाद का घिनौना चेहरा है। आवारा पूंजी, पूंजीवाद के अवशेष की तरह लिट् फेस्ट जैसे आयोजन हो रहे हैं। कल्पित ने कहा कि लिट् फेस्ट के समानांतर साहित्य उत्सव करने की पहल का उद्देश्य यह है कि भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को एक मंच मिल सके।
उन्होंने कहा कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में 90 फीसदी सत्र अंग्रेजी भाषा के होते है, और पूरी तरह से जेएलएफ का आयोजन बाजारवाद पर आधारित होता है। कल्पित ने चेताया कि अंग्रेजी का बाजार ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह है और अंग्रेजी के लेखक ट्रेडर्स के रूप में जेएलएफ में आते हैं।
वहीं इस मौके पर फेस्टिवल के मुख्य समन्वयक ईशमधु तलवार ने कहा कि यह मंच हिन्दी साहित्य का चेहरा है और पीएलएफ के जरिये एक नया आगाज़ हो रहा है।
उन्होंने कहा कि लिट् फेस्ट की तरह यहां यह कोई साहित्य का फैशन नहीं है। यहां पर सिर्फ साहित्य की वास्तविकता की बात होगी।
इस मौके पर ट्राईबल स्टूडियो की तरफ से आदिवासी कलाकारों द्वारा तैयार कलाकृतियों को स्मृति चिह्न के रूप में राजुल तिवारी और हेमंत गुप्ता ने साहित्यकारों को भेंट किया।
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गुरुवार, 25 जनवरी 2018

भविष्‍य के हाथों में खंजर देकर देख लिया, अब गिरेबां में झांकने का वक्‍त

बच्‍चों में फैलती हिंसा पर पिछले कुछ दिनों में इतने लेख लिखे  गए हैं कि समस्‍या पीछे छूटती गई और लेखकों के अपने विचार  हावी होते गए। लेखकों में से कोई सरकारी नीतियों को, तो कोई  परिवारों के विघटन को और कोई सामाजिक ताने बाने को ध्वस्‍त  करते टीवी मोबाइल को दोषी ठहराने में लगा है परंतु क्‍या किसी  ने ये सोचा है कि आखिर ये स्‍थिति आई ही क्‍यों ?

हमारे जीवनपद्धति में आखिर ऐसा क्‍या बदलाव हुआ जिसने हमारे  बच्‍चों के हाथों में खंजर थमा दिया। क्‍यों माता-पिता अपने बच्‍चों  को मोबाइल थमाकर, टीवी के कार्टून चैनलों के सामने बिठाकर  उन्‍हें मनुष्‍य बनने से रोकते रहे?
क्‍यों माओं का कर्तव्‍य सिर्फ प्रिमैटरनिटी से थ्री मंथ मैटरनिटी लीव  तक समेट दिया गया?
क्‍यों बच्‍चे को पैदा करने और उनकी परवरिश के लिए महिलाओं  के घर पर रहने को हम दकियानूसी सोच, पिछड़ापन या  स्‍त्री-स्‍वातंत्र्य से जोड़ने लगे?
हम क्‍यों नहीं देख पाये कि भूखे बच्‍चे को मां का दूध जरूरी है,  उसका सानिध्‍य जरूरी है ना कि सेरलक और बॉर्नविटा व मैगी की  खुराक।
संवेदनाओं का मशीनीकरण हमने स्‍वयं किया है, किसी सरकार ने  नहीं। स्‍त्री-पुरुष की बराबरी के द्वंद युद्ध की बलि चढ़ते गए बच्‍चे।  पारिवारिक व्‍यवस्‍था की खामियों को दूर करने की बजाय महिलाओं  की स्‍वतंत्रता को इस तरह परिभाषित किया जाने लगा कि परिवार  ढहते गए और बच्‍चे क्रिमिलन बनने लगे। 
ऐसा तब हुआ जबकि पूरी दुनिया ये मान चुकी है कि भारतवर्ष में  जन्‍मे ''वेद'' और ''गीता'' जैसे महानग्रंथ किसी भी समाज को संपूर्ण  चारित्रिक बल तथा पूरी स्‍वतंत्रता और अभिव्‍यक्‍ति के साथ जीने  का अधिकार देते हैं।
सदियों से आक्रांताओं और उनकी थोपी गई सोच का 'असर' हमारे  देश पर ऐसा पड़ा कि वेद और गीता की बात करने वाले को कथित बुद्धिजीवी तक अपना विरोध जताने को पुरातनपंथी या कट्टरवादी या हिंदूवादी जैसे विशेषणों से नवाजने लगते हैं। ऋषियों-मुनियों की अनगिनत खोज को झुठलाने में जुट जाते हैं और इस बीच मूल तथ्‍य तिरोहित हो जाते हैं कि आखिर कैसे बच्‍चों को संपूर्ण मनुष्‍य बनाया जाए। 

जब मानवीयता से परे ले जाकर हम ही अपनी आने वाली  पीढ़ी को उत्‍पाद (Comodity) बनाने पर आमादा हों तो श्रेष्‍ठ से  श्रेष्‍ठतर और संपूर्ण मनुष्‍य (संतान अथवा शिष्‍य रूप में) की अपेक्षा करना सरासर गलत है।

इस संदर्भ में ऋग्‍वेद के 10वें मंडल से लिया गया 53वें सूक्‍त का  छठा मंत्र कहता है----

।। मनुर्भव जनया दैव्यं जनम् ।।

पूरा मंत्र इस प्रकार है-

तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान् ।  
अनुल्बणं वयत जोगुवामपो, मनुर्भव जनया दैव्यं जनम् ॥

                इसका भावार्थ है-
Become  the  Human  being  create  the  divine   people 
                     अर्थात्
मानव को चाहिए कि वह 'उत्‍तम मनुष्‍य' का विस्तार करे| अपने  जीवन में धर्मपरक मार्गों का आलम्बन करते हुए मननशील होकर  'उत्‍तम मनुष्‍य' के निर्माण में यत्न करता रहे || ६ ||

ऋग्‍वेद के इस मंत्र में की गई 'उत्‍तम मनुष्‍य' की व्‍याख्‍या आज  जैसे कोरी कल्‍पना बन चुकी है। मनुष्‍यता अपने निकृष्‍टतम स्‍तर  पर जा पहुंची है। पहले यह 'उत्‍तम मनुष्‍य' की जगह निजी स्‍तर  पर 'उत्‍तम संतान' अथवा 'उत्‍तम शिष्‍य' तक सिमटी, और फिर  इससे भी नीचे 'सिर्फ संतान' व 'सिर्फ शिष्‍य' पर आकर ठहर गई। 
और अब तो उत्तम मनुष्‍य जैसी कोई व्‍याख्‍या रह ही नहीं गई है। संतान और शिष्‍य को कमोडिटी के तौर पर इस्‍तेमाल करने के इस काल में कमोडिटी को हानि-लाभ के तौर परखा जाता है। फिर इनसे मानवता और मानवीय संवेदना की अपेक्षा करना क्‍या उचित होगा।

बाल सुधारगृह, बच्‍चा जेल की अवधारणा तक आ पहुंचे हम क्‍या  अपने गिरेबां में झांक कर देखने की हिम्‍मत करेंगे?

यकीन मानिए कि जिस दिन हम ''अपनी ओर'' देख पाऐंगे, उसी  दिन से उत्‍तम मनुष्‍य की अवधारणा पुन: प्रत्‍यक्ष होने लगेगी  लगेंगे। आज भी जो अपनी ओर देख पा रहे हैं तथा आत्‍मचिंतन  करने में समर्थ हैं वे आईआईटियन हों या एमएनसी के सीईओ,  सभी अपने देश की गौरवशाली परंपरा एवं आध्‍यात्‍मिक जीवनशैली  की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं...बच्‍चों के आपराधिक बनने जैसी  विडंबना के बीच यह सुखद परिवर्तन भी देखने को मिल रहा है। 
अब बस बाकी है उस पारिवारिक एवं सामाजिक ताने बाने को  पुनर्स्‍थापित करना जो समाज के लिए कमोडिटी नहीं, श्रेष्‍ठतर  मनुष्‍य उत्‍पन्‍न करने का मार्ग प्रशस्‍त करता है।

- अलकनंदा सिंह
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गुरुवार, 18 जनवरी 2018

whatsapp पर तैरते इस विराट झूठ का कड़वा सच क्‍या

...कि इस समय मेरी जिह्वा
पर जो एक विराट् झूठ है
वही है--वही है मेरी सदी का
सब से बड़ा सच ! 

...ये उस कविता की पंक्‍तियां हैं जिसे कवि केदारनाथ सिंह ने  अपनी एक लंबी कविता ''बाघ'' में उद्धृत किया है। कवि ने 'समय  के सच' का माप 'झूठ की ऊंचाई' के समकक्ष खड़ा करके निर्णय  करने के लिए दोनों शब्‍दों को...और उनकी मौजूदगी को हमारे  सामने छोड़ दिया है ताकि हम स्‍वयं फैसला कर सकें।
हम बखूबी झूठ तथा सच को माप सकें, परख सकें कि आखिर  इसमें हमारे लिए और समाज के लिए क्‍या ठीक रहेगा।

ये हम सभी की जन्‍मजात कमजोरी है कि जो सामने दिखता है  उसे आंख मूंदकर सच मान लेते हैं जबकि आंखों देखा भी कभी  कभी सच नहीं होता।

अब तो सोशल मीडिया के ज़रिए प्रति माइक्रो सेकंड दिमाग को  छलनी करती सूचनाओं से जूझते हुए हम आज के इस समय में  कैसे झूठ और सच के बीच पहचान करें, इस परीक्षा से गुजरते हैं।

आज सुबह-सुबह Whatsapp पर एक वीडियो मैसेज कुछ यूं टपका  जैसे कि यदि इसे शेयर ना करने वाले महापापी हों और यदि  उन्‍होंने इसे शेयर ना किया तो उनकी या उनके परिवार में से  किसी प्रिय की मृत्‍यु अवश्‍य हो जाएगी। इस वीडियो को देवी मां  काली की तस्‍वीरों के साथ डरावनी आवाज़ में वायरल किया जा  रहा है। वायरल करने वाले मृत्‍यु के भय को कैश करना जानते हैं।  दुनिया के सभी धर्मों में मृत्‍यु को निश्‍चित माना गया है। जो  निश्‍चित है उससे भय कैसा, फिर क्‍यों और कौन इस भय की  मार्केटिंग कर रहा है।

''Larger than Life'' जीने की प्रेरणा देने वाले हमारे धर्म-समाज में  अंधश्रद्धा की कोई जगह नहीं है और फिर देवी मां काली को तो  स्‍वयं काल की देवी अर्थात् शिवतत्‍व में विलीन कर मोक्ष देने वाली  देवी के रूप में पूजा जाता है, तब इस तरह की अंधभक्‍ति और  अंधविश्‍वास फैलाने वाले मैसेज आखिर क्‍या बताना चाहते हैं।

अब जरूरी हो गया है कि इन तैरते संदेशों को सरकार साइबर  अपराध की श्रेणी में ले आए, साथ ही हम भी जागरूकता के लिए  कदम उठाएं ताकि देवी देवताओं के नाम पर मृत्‍यु का भय  दिखाकर इस तरह की कुचेष्‍टाओं को रोका जा सके। मृत्‍यु तो  जीवन का सत्‍य है, ना तो डर कर इससे बचा जा सकता और न  भयवश पूजा-पाठ करके इसे रोका जा सकता है। हम सब इस  सत्‍य को जानते हैं। अब ऐसा तो है नहीं कि सारे दिन ज्ञान  बघारने वाले और व्‍हाट्सएप चलाने वाले इनके घातक परिणामों को  ना जानते हों, इतने शिक्षित तो वे होते ही हैं। मुझे आश्‍चर्य हो रहा  है कि फिर भी ऐसे संदेशों को लेकर आखिर लोगों ने इसे आगे  शेयर कैसे कर दिया। 


आप भी देखें इस वीडियो को...और हो सके तो इस तरह के प्रयासों  को अपने स्‍तर से रोकें और इनकी भर्त्‍सना करें।


झूठ और सच को मापने का कोई निश्‍चित यंत्र नहीं होता, फिर  ऐसे वीडियो हों या कोई अन्‍य माध्‍यम, इनके द्वारा  फैलाया जा रहा झूठ हमें अपने-अपने भीतर बैठे सच से भी  साक्षात्‍कार करा रहा है कि हम आखिर किन-किन बातों से भयभीत  हो सकते हैं।

ऐसे में कवि केदारनाथ सिंह की कविता ''बाघ'' के आमुख में उनका  लिखा झूठ का कड़वा ''सच'' हमें दिशा दिखा रहा है कि-

बिंब नहीं
प्रतीक नहीं
तार नहीं
हरकारा नहीं
मैं ही कहूँगा

क्योंकि मैं ही
सिर्फ़ मैं ही जानता हूँ
मेरी पीठ पर
मेरे समय के पंजो के
कितने निशान हैं

कि कितने अभिन्न हैं
मेरे समय के पंजे
मेरे नाख़ूनों की चमक से

कि मेरी आत्मा में जो मेरी ख़ुशी है
असल में वही है
मेरे घुटनों में दर्द

तलवों में जो जलन
मस्तिष्क में वही
विचारों की धमक

कि इस समय मेरी जिह्वा
पर जो एक विराट् झूठ है
वही है--वही है मेरी सदी का
सब से बड़ा सच!

यह लो मेरा हाथ
इसे तुम्हें देता हूँ
और अपने पास रखता हूँ
अपने होठों की
थरथराहट.....

एक कवि को
और क्या चाहिए!

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 13 जनवरी 2018

सबहीं को मुबारक हो हैप्‍पी वाली ''खिचराईं''

आज मकर संक्रांति है, मुझे अपना बचपन याद आ रहा है जो पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के गांवों में बीता और जहां ''संक्राति' को ''खिचराईं'' कहा जाता है।
आज के दिन वहां घर की औरतों में एक कहावत बहुतायत से कही जाती रही है और वो कहावत रसोई में औरतों की संघशक्‍ति व स्‍वादग्रहण की रोचक विधि बताती है।
जैसे कि बड़ी बहन समान जेठानी, देवरानी से कहती है-
''तात तात खिचरी, जूड़ जूड़ घिउ,
खालेउ द्विउरनिया जुड़ाय जाय जिउ।''
यूं तो खिचड़ी पर और भी कहावतें हैं वहां, जैसे...खाने के बाद बर्तन मलने के आलस्‍य को कुछ यूं इज्‍ज़त बख्‍शी गई है-
''खिचड़ी खात नीक लागे, बटुली मलत पे बथे।''
खिचड़ी खाने के समय को स्‍वास्‍थ्‍य से जोड़ते हुए कहा जाता है कि-
''माघ मास घी खिचरी खाय, फागुन उठि के प्रातः नहाय।''
स्‍वाद बढ़ाने को और बच्‍चों में इसके प्रति मोह जगाने को कह कह के सुनाया जाता है-
''खिंचड़ी के चारी इआर, दही, पापर, घी, अचार।''
बहरहाल, मैं अपने बचपन की इन खूबसूरत यादों से निकल पाती इससे पहले ही देखती हूं कि आज मीडिया में तरह-तरह के मैसेज तैर रहे हैं।
कोई मकर संक्रांति का महत्‍व बता रहा है तो कोई संस्‍कृत में भीष्‍म पितामह द्वारा बताए गए उत्‍तरायण को व्‍याख्‍यायित कर रहा है। इन प्रवचनों से थोड़ा बाहर निकलें तो अलग-अलग तरह की खिचड़ी पकाई जा रही है। इटैलियन रिसोतो से लेकर गुजराती खिचड़ी तक सब उपलब्‍ध है, और वो भी फ्री में। जो भी हो, सोशल मीडिया ने खिचड़ी का कारपोरेटाइजेशन कर ही दिया है। इसके लिए उसे धन्‍यवाद...अब वह हमारी दादी-नानी-काकी सब बन गया है।
तमाम बुराइयों के साथ सोशल मीडिया को हमें इस बात का धन्‍यवाद देना ही होगा कि उसने बीमारों का खाना बताकर नाक-भौं सिकोड़ने वालों के सामने अब इसे गरियाने के सारे रास्‍ते बंद कर दिये हैं। हमने अगर पहले ही खिचड़ी को ''हाईलेवल'' भोज्‍यपदार्थ मान लिया होता तो आज हमें ही हमारी दादी-नानी-काकी की ये रेसिपी यूं ना बताई जा रही होती। और तो और ''कथित तौर पर संभ्रांत'' कहलाने के चक्‍कर में आज हमें अपनी नाक यों घुमाकर ना पकड़नी पड़ रही होती।
पहले आज के कुछ प्रवचन खिचड़ी के इस त्‍यौहार पर सुनिये-
इस दिन से सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है यानी मकर रेखा के बिलकुल ऊपर होता है। वहाँ से धीरे-धीरे मेष राशि में प्रवेश करने के बाद छह महीने बाद कर्क राशि में प्रवेश करता है।
इसी के आधार पर ऋतु परिवर्तन होता है। मकर संक्रांति के दिन से उत्तरायण में दिन का समय बढ़ना और रात्रि का समय घटना शुरू हो जाता है।
कई राज्यों में इस दिन अलग-अलग राज्यों में तिल-गुड़ की गजक, रेवड़ी, लड्डू खाने और उपहार में देने की परंपरा भी है।
चावल बाहुल्य वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में इस पर्व को ' खिचड़ी' या 'खिचराईं' के नाम से मनाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में इस दिन खिचड़ी पकाई और खाई जाती है। कई जगह दाल और चावल दान करने की परंपरा है जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर बाजरे की खिचड़ी पकाई और खाई जाती है।
अब मैं अपनी बात आज की खिचराईं पर मुबारकबाद देते हुए इस तरह खत्‍म करती हूं कि -
“ज्यादा खाये जल्द मरि जाय,
सुखी रहे जो थोड़ा खाय।
रहे निरोगी जो कम खाये,
बिगरे काम न जो गम खाये।”
अंत में बस इतना कहना चाहती हूं कि कुछ ऐसी कहावतें जो हमारे भीतर आज भी स्‍पंदन जगाती हैं, संयुक्‍त परिवारों की याद दिलाती हैं, स्‍वाद और सेहत के प्रति जागरूक करती हैं उनमें सर्वाधिक पढ़े-लिखों की ''खिचड़ी'' यानि हम जैसों की ''खिचराईं'' को लेकर बनी कहावतें भी शामिल हैं।
आज भी हम अपने बचपन को गुनगुना लेते हैं इन्‍हीं के बहाने, वरना तो...यू नो...????????????

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

26 वें विश्व पुस्तक मेले में सबसे ज्‍यादा किताब बिकी ‘औरत और इस्लाम’

देश में तीन तलाक और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर चल रही बहस की वजह से लोगों में इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को जानने की ललक बढ़ी रही और लोग, विशेष तौर पर महिलाएं, यहां आयोजित विश्व पुस्तक मेले में इससे संबंधित किताबें खरीद रही हैं.
प्रगति मैदान में चल रहे 26 वें विश्व पुस्तक मेले में इस्लामी किताबों का प्रकाशन करने वाले कई प्रकाशक आए हैं. वे उर्दू भाषा के अलावा हिन्दी और अंग्रेजी में भी कई किताबों को लेकर आए हैं.
उनका कहना है कि सबसे ज्यादा इस्लाम में औरतों की स्थिति एवं अधिकारों का वर्णन करने वाली किताबें बिक रही हैं.
मरकज़ी मकतबा इस्लामी पब्लिशर्स के मेराज खालिद ने बताया कि ‘औरत और इस्लाम’ नाम की किताब सबसे ज्यादा बिक रही है जिसके अंग्रेजी संस्करण का नाम ‘वूमन राइट्स इन इस्लाम’ है.
उन्होंने बताया कि इस पुस्तक को खरीदने वालों में महिलाएं अधिक हैं और उनमें भी गैर मुस्लिम महिलाओं की संख्या ज्यादा है और वे इस पुस्तक का अंग्रेजी या हिन्दी संस्करण ले रही हैं.
वहीं इस्लामी बुक सर्विस लिमेटिड के नसीम अहमद ने बताया कि मेले में ‘पैगंबर की पत्नियां’, ‘पैगंबर की बेटियां’, ‘पति पत्नी के अधिकार’, ‘इस्लाम में पारिवारिक मूल्य’, ‘वूमन इन इस्लाम’ जैसी किताबें अधिक बिक रही हैं.
उन्होंने बताया कि इन किताबों में सबसे ज्यादा ‘वूमन इन इस्लाम’ बिक रही है और इसके खरीदारों में अधिकतर गैर मुस्लिम युवा हैं जो बड़ी तादाद में इस किताब को खरीद रहे हैं.
उन्होंने बताया कि इस किताब को मिली प्रतिक्रिया को देखते हुए उन्होंने इसकें हिंदी तजरुमे का काम शुरू कर दिया है और कुछ दिनों में यह किताब हिन्दी में भी उपलब्ध होगी.
इस स्टॉल पर किताब खरीद रहे तुषार ने बताया कि टीवी और अखबारों में सब अपनी अपनी बात करते हैं. कोई कहता है कि ”महिलाओं को अधिकार है तो कोई कहता है अधिकार नहीं है. इतना कंफ्यूजन है कि कुछ समझ ही नहीं आता है कि कौन सही है इसलिए यहां से किताबें खरीद रहे हैं ताकि असल स्थिति मालूम हो.”
वहीं जावेद ने बताया कि उन्हें उर्दू नहीं आती है और इस्लाम में अधिकतर किताबें उर्दू में होती है. यहां कुछ प्रकाशक ”हिन्दी और अंग्रेजी में पुस्तकें लेकर आए हैं जिन्हें हम खरीद रहे हैं ताकि थोड़ी दीनी जानकारी हो और लोगों के सवालों के जवाब दे सकें.”
मरकज़ी मकतबा इस्लामी पब्लिशर्स के मेराज खालिद ने बताया कि इस्लाम में महिलाओं के मुकाम का वर्णन करने वाली पुस्तकों के अलावा जिहाद और आतंकवाद के बारे में लिखी किताबें भी पाठक ले रहे हैं. इनमें भी गैर मुस्लिमों की संख्या अधिक है. -Agency

-www.legendnews.in

विवेकानंद जयंती : तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है

स्‍वामी विवेकानंद ने कहा था कि-
You have to grow from the inside out. None can teach  you, none can make you spiritual. There is no other  teacher but your own soul.

अर्थात्
तुम्हें अन्दर से बाहर की तरफ विकसित होना है। कोई तुम्हें पढ़ा  नहीं सकता, कोई तुम्हें आध्यात्मिक नहीं बना सकता, तुम्हारी  आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है।।

आज के मनोवैज्ञानिक शोधों में स्‍वामी विवेकानंद के इसी कथन को  आधार मानकर सेल्‍फ सजेशन व ऑटो सजेशन जैसी विधियों पर  काफी शोध हो रहा है। पीटर फ्लैचर की ''How to Practice Self  Suggestion" व एमेल कोयू की "Self Mastery Through  Conscious Auto Suggestion" जैसी पुस्‍तकें यह बताने को काफी  हैं कि आज जिस सेल्‍फ सजेशन व ऑटो सजेशन जैसी विधियों पर  काम हो रहा है, उसे तो हमारे दार्शनिकों, चिंतकों ने सदियों पूर्व  भारतीय समाज में स्‍थापित कर दिया था।

सेल्‍फ सजेशन से ऑटो सजेशन की ओर ले जाती भगवद्गीता का  भी तो सार यही है। गीता कहती है कि तुम्‍हारे वश में सिर्फ ''करना  है''। तो सोचो और करो। सोचने का अर्थ ही स्‍वयं के बारे में  विचारना है, ''स्‍वयं सोचना'' यानि सेल्‍फ सजेशन और इसके बाद की  प्रक्रिया ''करना'' यानि ऑटो सजेशन देते हुए खुद को खुद का संदेश  देना। इसका अर्थ है कि अपनी आत्‍मा को अपनी सोच में शामिल  करना, अपने मन व मस्तिष्‍क दोनों को जगाना। और जब यह  प्रक्रिया चल निकलेगी तो निश्‍चित ही आप ऐसी अवस्‍था में पहुंच  जायेंगे जो आपको दीवारों में से रास्‍ता बनाने में मदद करेगी।  कठिन से कठिन स्‍थितियों में भी धैर्य धारण करने के लिए गीता के  संदेश से लेकर स्‍वामी विवेकानंद के कथ्‍य और पीटर फ्लैचर व  एमेल कोयू सभी के वाक्‍य अपने भीतर झांकने को कहते हैं। इसका  अर्थ यह भी है कि जब मन और मस्‍तिष्‍क खुद से संवाद स्‍थापित  कराते हैं तो अंतरात्‍मा की आवाज़ सुनना आसान हो जाता है, यह  संप्रेषण ही सेल्‍फ सजेशन से होकर ऑटो सजेशन की ओर ले जाता  है।

आज जब पूरे विश्‍व के साथ-साथ हमारे देश में भी वैचारिक  नकारात्‍मकता अपने पांव फैला चुकी है तब स्‍वामी विवेकानंद के  यह वाक्‍य कि ''तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है'' पर  अमल करना अराजक सोच को दूर कर सकता है।

ये आज के समय की बड़ी आवश्‍यकता है क्‍योंकि किस्‍म-किस्‍म की  आजादी मांग रहे लोगों की सिर्फ ''अपने हितों'' और ''अपनी  इच्‍छाओं'' तक सीमित होने की प्रवृत्‍ति ने पूरा वातावरण अराजक  बना दिया है, हर कोई सिर्फ अपने लिए सोच रहा है। एक ऐसे  समय जब निर्वस्‍त्र होने को निजी स्‍वतंत्रता और गौमांस भक्षण को  भोजन की आजादी बताया जाने लगा हो, तब जरूरी हो जाता है कि  व्‍यक्‍ति को अपने उस सदियों पुराने दर्शन से फिर जोड़ा जाए जो  सर्वहित सोच सके। स्‍वयं के साथ समाज की प्रगति चाहने को  मानसिक शांति जरूरी है और इसके लिए अपने भीतर ही गुरू की  खोज करनी होगी।

बहरहाल, गीता के सार की भांति ही एक ''व्‍यक्‍तित्‍व'' को ''अमरत्‍व''  की ओर ले जाने वाले हमारे महानुभावों के ये अनमोल वाक्‍य हमें  फिर से अपने भीतर की ओर जाने के प्रेरित कर रहे हैं क्‍योंकि  आज हर दूसरा व्‍यक्‍ति किसी अन्‍य की खामी निकालने, उसे सलाह  देने, उसके व्‍यक्‍तित्‍व को क्षीण करने पर आमादा है।

ऐसे में आवश्‍यक यह है कि स्‍वामी विवेकानंद की औपचारिक जयंती  मनाने के बजाय हम उनके विचारों को आत्‍मसात करने की कोशिश  करें, और कोशिश करें इस बात की कि महान आत्‍माओं का ध्‍येय  पूरा करने में सहयोगी बन पाएं।
मन, वचन और कर्म से हम एक हों और किसी स्‍तर पर हमारे  विचारों में अंशमात्र खोट पैदा न हो सके क्‍योंकि सेल्‍फ सजेशन से  ऑटो सजेशन की यात्रा तभी पूरी होना संभव है अन्‍यथा समस्‍त सूत्र  वाक्‍य तथा सारे धर्मग्रंथ मात्र कागज के टुकड़ों पर अंकित  काले अक्षरों के सिवाय कुछ नहीं हैं। 

- सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

सोमवार, 8 जनवरी 2018

नाजायज़ शोर की बंधुआगिरी

Painting courtsey: Google images
किसी भी धर्म का मर्म व्‍यक्‍ति की अंतध्‍वर्नि को जाग्रत करने में निहित है  ताकि धर्माचरण के बाद प्रवाहित होने वाली तरंगें व्‍यक्‍ति व समाज में  सकारात्‍मक ऊर्जा फैलाने का काम करें।

शोरगुल के माध्‍यम से अपनी पहचान बनाने व बताने वाला धर्म किसी भी  कोण से किसी का भी लाभ नहीं कर सकता। ध्‍यान लगाने के लिए भी शांति  जरूरी होती है, ना कि शोर। तेज आवाज़ के साथ कही गई सही बात भी  अपना वज़न खो देती है और तेज बजने वाला मधुर से मधुर संगीत भी  किसी को प्रिय नहीं लग सकता।

ऐसे में धार्मिक स्‍थलों पर लगे लाउडस्‍पीकर्स के बारे में ध्‍वनि प्रदूषण  अधिनियम के तहत कड़ी कार्यवाही न करने को लेकर राज्‍य सरकार से  इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जवाब तलब करना आशा जगाता है कि हर  गली-कूचे में स्‍थापित धर्म स्‍थलों से आने वाली कानफोड़ू आवाजें शायद अब  जीना हराम नहीं करेंगी।

विगत वर्ष दिसंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने धार्मिक स्थलों में  बज रहे लाउडस्पीकर्स पर कड़ी नाराजगी जताई थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में  उच्चाधिकारियों को फटकार लगाकर कार्यवाही के लिए हलफनामा दाखिल  करने का आदेश दिया है।

यह आदेश मोतीलाल यादव की तरफ से दायर की गई याचिका की सुनवाई  के दौरान हाईकोर्ट ने दिया था।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अब्दुल मोइन की बेंच ने कहा था कि  प्रमुख सचिव गृह, सिविल सचिवालय और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड  के चेयरमैन अलग-अलग व्यक्तिगत हलफनामा देकर छह हफ्ते में बताएं कि  ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए उन्होंने क्या किया? इस मामले की अगली  सुनवाई अगले महीने यानि 1 फरवरी 2018 को है।

इसके अलावा हाईकोर्ट ने विभिन्‍न जुलूसों और शादी बरातों से हो रहे ध्वनि  प्रदूषण को लेकर भी कार्यवाही करने को कहा है।
हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी सहित गृह विभाग ने सभी जिलों के डीएम को  पत्र भेजकर धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाए जाने के बाद रिपोर्ट मांगी  है।
इसमें कहा गया है कि बिना अनुमति के लगाये गए लाउडस्पीकर हटाये  जाएंगे। अनुमति 15 जनवरी तक ले लेनी होगी। 15 जनवरी के बाद किसी  भी संस्थान को अनुमति नहीं दी जाएगी। 16 जनवरी से जिलों में बाकायदा  अभियान चलाकर बिना अनुमति बजाए रहे लाउडस्पीकर हटाने का काम शुरू  किया जाएगा। यह अभियान 20 जनवरी तक चलेगा और फिर इसकी रिपोर्ट  शासन को भेजी जाएगी।
यूं भी मेडीकल साइंस ने तो बाकायदा किसी भी तरह के शोर, ध्‍वनियों के  धमाके को न केवल मनुष्‍य के लिए बल्‍कि प्रकृति के हर अंश के लिए  प्राणघातक बताया है। संवेदना और सकारात्‍मकता दोनों के लिए शांति  आवश्‍यक है ना कि शोरगुल। ध्‍वनियों के प्रदूषण ने आजकल हर तीसरे  व्यक्‍ति को आक्रामक और गुस्‍सैल बना दिया है, नतीजतन शरीर और मन  दोनों बीमार हो रहे हैं। इस तरह बीमार बने हम 'जिस सुख की कल्‍पना' पाले  बाबाओं-मौलवियों की चौखटों तक जा पहुंचते हैं 'वही सुख' हमारे किसी  धर्मस्‍थल, किसी शादी-ब्‍याह या किसी अन्‍य समारोह द्वारा 'अपने-अपने  लाउडस्‍पीकर्स' के ज़रिए पहले ही छीना जा चुका है।

हम यदि ये भ्रम पाले हुए हैं कि हमारे गली, मोहल्‍ले, सामाजिक समारोह  स्‍थल व धार्मिक स्‍थल लाउडस्‍पीकर्स के साथ ही गुंजायमान होंगे तो हमने  जान-बूझकर अपनी दर्दनाक मौत को बुला रखा है।

बहरहाल, हाईकोर्ट की सख्‍ती और उप्र. सरकार की तत्परता से बौखलाए  द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद और देवबंद के उलेमा अपने  अपने तरीके से इस कदम की आलोचना करने में जुट गए हैं, मगर वो ये  भूल रहे हैं कि एक मठ की महंताई से ऊपर उठकर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने  योगी आदित्‍यनाथ जब अंधविश्‍वासों को धता बताकर नोएडा जा सकते हैं,  कुंभ में शंकराचार्यों को 'नियम विरुद्ध' ज़मीन मुहैया कराने से इंकार कर  सकते हैं, ज्‍योतिषपीठ के शंकराचार्य की पदवी के लिए दंडी स्‍वामियों को  शास्‍त्रार्थ की परंपरा आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्‍साहित कर सकते हैं और सनातन  धर्म में फैली कुरीतियों को दूर कर जानजाग्रति फैलाने का काम कर सकते हैं,  मदरसों की गतिविधियों और मौलवियों की ''खाऊ-उड़ाऊ'' संस्‍कृति को  सर्विलांस पर ले सकते हैं, वह ध्‍वनिप्रदूषण की बावत कठिन से कठिन कदम  भी उठा सकते हैं।

जो भी हो, हमें तो यह आशा करनी ही चाहिए कि कम से कम उत्‍तर प्रदेश  को तो निकट भविष्‍य में इस नाजायज शोर से मुक्‍ति मिल जाएगी और जो  लाडस्‍पीकर्स बजाए भी जाऐंगे, वे अपनी हदें पार नहीं कर सकेंगे।

-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 3 जनवरी 2018

लिखी गईं नई इबारतें...कि ये ख्‍वाहिशें रूमानी नहीं हैं...

आज के विषय पर सबसे पहले पढ़िए मेरे चंद अशआर.....

ये परेशानियां जिस्‍मानी नहीं हैं
ये ख्‍वाहिशें रूमानी नहीं हैं
और ये खिलाफतें भी रूहानी नहीं हैं
कि अब ये आवाज़ें उठ रही हैं
उन जमींदोज वज़ूदों की जानिब से,
आहिस्‍ता-आहिस्‍ता से, 
तो कहीं पूरे ज़ोर शोर से
गोया अब शिद्दतें अंजाम तक पहुंचेंगी
कि लिखी जा रही हैं नई इबारतें।



देश ज़ुदा हैं...परेशानियां भी ज़ुदा...मगर अब मुस्‍लिम महिलाओं ने अपनी आवाज़ उठाना शुरू  कर दिया है और अब ये आवाज़ें भारत व अफगानिस्‍तान से होकर ईरान तक पहुंच चुकी हैं।  ये उनकी संगठनात्‍मक शक्‍ति का ही उदाहरण हैं।

आप भी क्रमवार नज़र डालिए इन अभियानों पर-


भारत में लिखी गई नई इबारत-

वज़ूद मापने की यदि कोई इकाई होती तो आज इसकी सर्वाधिक जरूरत मुस्‍लिम महिलाओं  को होती। खुशखबरी है कि भारतीय मुस्‍लिम महिलाएं नए साल आने तक उठ खड़ी हुई हैं, वे  उठ खड़ी हुई हैं उन बंदिशों के खि़लाफ जो उनके वज़ूद पर भारी पड़ रहीं थीं। उनकी  संगठनात्‍मक भावना प्रबल हुई तभी तो सुप्रीम कोर्ट के रास्‍ते तीन तलाक़ बिल लोकसभा में  पास हो पाया।

नाइश हसन, अंबर ज़ैदी, रूबिका लियाक़त, ताहिरा हसन, शाइस्‍ता अंबर से शुरू हुआ ये सफर  आखिर में इशरत जहां तक आकर ठहरा नहीं है। पानी की तरह इन महिलाओं ने चट्टानों के  बीच से रास्‍ता निकाल लिया है। मौलानाओं द्वारा स्‍थापित रेगुलेटरी-बॉडीज को नारी शक्‍ति ने  धता बताई है। मुस्‍लिम महिलाओं ने जता दिया है कि पुरुष अब अपने बनाए नियमों को फिर  से खंगालें। बहरहाल, भारतीय मुस्‍लिम महिलाओं का तो ये आग़ाज़ है जिसे अंजाम तक चलते  जाना है।
उनकी इस जद्दोजहद की ये जीत ही तो है कि 2017 के आखिरी रेडियो संबोधन में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी द्वारा ''मन की बात'' के तहत यह बात उल्‍लेख न की जाती कि अब मुस्‍लिम  महिलाओं को बिना ''महरम'' के ही ''हज पर जाने की सुविधा'' सरकार ने शुरू कर दी है और  इसमें तमाम महिलाओं ने स्‍वयं को हज पर जाने के लिए एनरोल भी करा लिया है। अब तक  हज पर जाने के लिए ''महरम'' यानि पुरुष अभिभावक का होना महिलाओं की सुरक्षा की  गारंटी माना जाता था मगर अब कोई महिला यदि अकेले हज पर जाना चाहती है तो उसे  ''महरम'' के नाम पर रोका नहीं जा सकता।

अफगानिस्‍तान #WhereIsMyName हैशटैग ने छेड़ा 'अजी-सुनती हो' कहने के खिलाफ  अभियान -

भारत की ही तरह गुजिश्‍ता साल में कट्टरपंथ की आग से सुलगते अफगानिस्‍तान के अंदर भी  वज़ूद के लिए बदलाव की आहट भी सुनने को मिली।
गौरतलब है कि इस मुल्‍क में महिलाओं के नाम लेने का चलन नहीं है। उनको किसी की  बेगम, बहन, बेटी या मां के रूप में ही संबोधित किया जाता है। इस मामले में खास बात यह  है कि अफगान समाज में महिलाओं का नाम लेना एक तरह से गुस्‍सा जाहिर करना माना  जाता है और यदा-कदा इसको अपमान के रूप में भी लिया जाता है। अब इसके खिलाफ  अफगानी महिलाओं ने आवाज़ उठानी शुरू दी है। वे चाहती हैं कि वे अपने नाम से पहचानी  जाएं।

अफगान कानून के तहत जन्‍म प्रमाणपत्र में मां का नाम भी दर्ज नहीं होता। इन सबके  खिलाफ बदलाव की मांग अफगान समाज के भीतर से ही उठी है। सोशल मीडिया में  अफगानिस्‍तान की महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने #WhereIsMyName से एक अभियान  शुरू किया, इस अभियान के माध्‍यम से महिलाएं इस व्‍यवस्‍था में बदलाव की मांग करते हुए  चाहती हैं कि उनको उनके नाम से संबोधित किया जाना चाहिए। कुछ महीनों पहले शुरू हुए  इस हैशटेग अभियान में हजारों महिलाएं शामिल हुई, साथ ही खुशखबरी ये है कि महिलाओं  के साथ प्रगतिवादी पुरुष भी उन्‍हें प्रोत्‍साहित कर रहे हैं, हौसला बढ़ा रहे हैं।

इस अभियान से जुड़ी महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है-

गुमनामी की जिंदगी से बाहर निकलने के लिए शुरू किए गए इस अभियान से जुड़ी महिला  सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अफगानिस्‍तान में महिलाओं के नाम लेने के मामले  में ऐसी पुरातनपंथी सोच है कि महिलाएं बिना किसी निजी शिनाख्‍त के ही अपना जीवन बसर  करती हैं। यहां तक कि अंतिम संस्‍कार के समय भी महिलाओं का नाम नहीं लिया जाता और  कब्र के पत्‍थर पर भी उनका नाम नहीं लिखवाया जाता, इसलिए मौत के बाद वह सिर्फ एक  ऐसी कब्र बनकर रह जाती हैं जिसकी कोई पहचान तक नहीं होती। कब्र का पत्थर भी उन्‍हें  शायद ही पहचान पाता हो।

मुस्‍लिम महिलाओं की ऐसी ही जद्दोजहद अब ईरान में भी कट्टरपंथी आयतुल्‍ला खमैनी शासन  के शुरू हो चुकी है और उसकी गंभीरता का अंदाज सड़कों पर उमड़ रही आंदोलनकारियों की  उस भीड़ से लगाया जा सकता है, जिसमें कई दर्जन लोग मारे जा चुके हैं लेकिन आंदोलन  फिर भी जारी है। अच्‍छी बात ये है कि यहां भी प्रगतिवादी ईरानी युवक महिलाओं के कंधे से  कंधा मिलाकर शासक वर्ग की गोलियां झेलने को सड़कों पर मौजूद हैं।

बहरहाल, मैं फिर से बात भारत की मुस्‍लिम महिलाओं की संगठनात्‍मक शक्‍ति की ही करूंगी  जिन्‍हें मौलवियों के कट्टरवादी रवैये के खिलाफ सरकार का भी साथ भी मिल रहा है। हालांकि,  अब भी ज्‍यादातर महिलाऐं पारिवारिक मोर्चे पर अकेली हैं और मौलवी कहते हैं कि  तलाके-बिद्दत खत्‍म होने से तमाम ''घर बिगड़ेंगे'', मौलवी ये भी कहते हैं कि ''बिना महरम''  हज जाने वाली महिला को कयामत के रोज़ सज़ा दी जाएगी।

जो भी हो, अब तो मुस्‍लिम महिलायें ''मौलवियों की गिरफ्त से बाहर आ रही हैं'' और पूछ  रही हैं आखिर ये कयामत कब होगी। आखिर सब कुछ जो प्रगतिवाद की ओर ले जाता है कि  वह मुस्‍लिमविरोधी ही क्‍यों हो जाता है। महिलाओं को कठपुतली बनाकर क्‍या मौलानाओं की  हकीकत सामने नहीं आ गई। क्‍या एक महिला अकेली नहीं जा सकती। क्‍या मक्‍का तक जाने  वाली अकेली महिला किसी के लिए खतरा हो सकती है। शरियत जब वजूद में आई तब उसे  क्‍या ये पता था कि कंप्‍यूटर-स्‍मार्टफोन जैसी चीज दुनिया में आएगी या चांद के पार मंगल  और धरती के अंदर तक का अध्‍ययन महिलाएं करेंगी।
प्रश्‍न बहुत हैं, बहसें भी बहुत, लेकिन सिलसिला तो अभी शुरू हुआ है...सफ़र लंबा जरूर है  मगर इसकी मंज़िल एकदम स्‍पष्‍ट है। हम प्रतीक्षा करते हैं और प्रार्थना भी कि इस वास्‍तविक  आज़ादी के अभियान चलते रहें और मुकाम दर मुकाम अपनी मंज़िल की ओर आगे बढ़ें।


-अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

मशहूर शायर अनवर जलालपुरी के निधन से गमगीन हुआ माहौल

ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है
वैसे अभी मरने का इरादा भी नहीं है

हर चेहरा किसी नक्श के मानिन्द उभर जाए
ये दिल का वरक़ इतना तो सादा भी नहीं है

वह शख़्स मेरा साथ न दे पाऐगा जिसका
दिल साफ नहीं ज़ेहन कुशादा भी नहीं है....


जी हां ये नज्‍़म कहने वाले मशहूर शायर अनवर जलालपुरी नहीं रहे। 

गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले मशहूर शायर अनवर जलालपुरी का निधन मंगलवार सुबह किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ में हो गया। उन्हें चार दिन पहले ब्रेन हैमरेज होने के कारण उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। उन्होंने आज सुबह 10 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। जलालपुरी को कल दोपहर में जोहर की नमाज के बाद अम्बेडकर नगर स्थित उनके पैतृक स्थल जलालपुर में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा.

अनवर जलालपुरी देश की आज़ादी के साथ पले-बढ़े और खुली हवा में सांस लेते हुए, मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक के रूप में उभरे। 6 जुलाई, 1947 को उत्तर प्रदेश में अंबेडकर नगर जिले के जलालपुर में जन्मे अनवर जलालपुरी ने अंग्रेज़ी और उर्दू में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की फिर अंग्रेज़ी के प्राध्यापक बने।

अपने घर पर सजी महफिलों में बुजुर्गों को पानी पिलाने और पान खिलाने के दौरान अनवर जलालपुरी को कब शायरी का शौक हुआ, पता ही नहीं चला। वे आठवीं-नौवीं कक्षा के दौरान शेर कहने लगे थे। दरअसल घर में माहौल ही कुछ ऐसा था। पिता मौलाना रूम की मसनवी सुनाया करते थे। जब अनवर जलालपुरी इंटर मीडियट के छात्र के रूप में मुशायरे पढ़ने लगे तो कई बार लोग शक करते थे कि यह शेर इस नौजवान का ही है या पिता की मदद से उन्होंने लिखा लिया! देखते ही देखते एक शायर के अलावा अच्छे मंच-संचालक के रूप में उन्होंने कई बड़े मुशायरों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी और प्यार-मुहब्बत के संदेश को हमेशा प्राथमिकता दी। 

मुशायरों की जान माने जाने वाले जलालपुरी ने 'राहरौ से रहनुमा तक', 'उर्दू शायरी में गीतांजलि' तथा भगवद्गीता के उर्दू संस्करण 'उर्दू शायरी में गीता' पुस्तकें लिखीं जिन्हें बेहद सराहा गया था. उन्होंने 'अकबर द ग्रेट' धारावाहिक के संवाद भी लिखे थे.

कला की विभिन्न विधाओं में मंच का संचालन भी शामिल है। विशेषकर कवि-सम्मेलनों और मुशायरों का संचालन करने के लिए एक विशेष कलात्मक प्रतिभा की आवश्यकता होती है। उर्दू मुशायरों के संचालन के इतिहास में सक़लैन हैदर के बाद एक बड़ा नाम उभरता है- अनवर जलालपुरी का। आज अनवर जलालपुरी न केवल मुशायरों के संचालक बल्कि एक अच्छे शायर, विद्वान तथा गीता और गीतांजलि जैसी पुस्तकों को उर्दू शायरी से जोड़ने वाले रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं, उर्दू में शायरी करते हैं और संस्कृत, फारसी तथा अरबी पर भी अपना अधिकार रखते हैं। 

मंच संचालन की कला पर उनका कहना था कि यह सचमुच में बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। उन्होंने 1968 से अब तक देश के छोटे-मोटे शहरों से लेकर लाल किले के मुशायरे तक का संचालन किया। उनका कहना था कि शायर अपने समय के अनुसार, पढ़वाने की मांग रखते हैं और श्रोताओं की अपनी मांग होती है। वे अच्छे चेहरे अच्छी आवाज़ों की इच्छा रखते हैं। दोनों में सामंजस्य बनाए रखते हुए मुशायरों का सम्मान बढ़ाना अनिवार्य रहता है। 

श्रीमदभागवत गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले नामचीन उर्दू शायर को प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाजा था। 

ज्ञात हुआ है कि 71 वर्षीय जलालपुरी को ब्रेन स्ट्रोक के बाद गंभीर हालत में बृहस्पतिवार देर रात केजीएमयू में भर्ती कराया गया है। वे शाम को अपने बाथरूम में गिरने के बाद से गंभीर रूप से घायल हो गये थे। बाथरुम का दरवाजा तोड़ कर उन्हें बाहर निकालने के बाद परिजनों ने उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया था।

वहां चिकित्सकों ने उनके दिमाग में खून के थक्के, रक्तस्त्राव पाए जाने के बाद उन्हें केजीएमयू रेफर कर दिया था। लखनऊ के हुसैनगंज निवासी उर्दू शायर अनवर जलालपुरी के निधन से साहित्य जगत में शोक है। 

उनके घर पर देखने वालों का तांता लगा हुआ है। जो भी उनकी मौत की खबर सुन रहा है वह गमगीन हो जा रहा है। सभी की आंखे नम हो रही हैं। 

उन्‍हीं की रचना- 

जो भी नफ़रत की है दीवार गिराकर देखो
दोस्ती की भी ज़रा रस्म निभाकर देखो
कितना सुख मिलता है मालूम नहीं है तुमको
अपने दुश्मन को कलेजे से लगाकर देखो

विख्यात शायर मलकज़िादा मंजूर के शागिर्द रहे अनवर जलालपुरी का व्यक्तित्व अपने आप में कला, साहित्य एवं संस्कृति की उम्दा मिसाल रहा है। वे कहते हैं-

गुलों के बीच में मानिन्द ख़ार मैं भी था
फ़क़ीर ही था मगर शानदार मैं भी था
मैं दिल की बात कभी मानता नहीं फिर भी 
इसी के तीर का बरसों शिकार मैं भी था।


-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

सुनिए मंत्री जी! गले नहीं उतरने वाले ये बचकाना तर्क

किसी भी उच्‍च पदस्‍थ व्‍यक्‍ति की मन: स्‍थिति को समझने के लिए उसके भाव काफी होते हैं। उच्‍चपदासीन होने का यह मतलब यह नहीं कि पद प्राप्‍त करने वाले व्‍यक्‍ति द्वारा पद पर आसीन होने से पहले जो कुछ पढ़ा हो, वह पद की योग्‍यता के अनुरूप हो ही। किताबें पढ़कर अगर ''उच्‍च'' हुआ जा सकता तो बेचारे कबीर, तुलसी, जायसी, रसखान, पद्माकर, बिहारी जैसे कवि हमारी थाती ना बने होते।

एक वाकया कल हुआ और आज अखबारों की सुर्खियां बन गया ।
कल ऋषिकेश-हरिद्वार के एक आयुर्वेद कॉलेज में अपने संबोधन में केंद्रीय जलसंसाधन राज्‍य मंत्री सत्‍यपाल सिंह( पूर्व आईपीएस) ने गंगाप्रदूषण को लेकर अपनी सोच को जिस तरह पेश किया, वह न केवल उनके नाकारा प्रयासों को दर्शाती है बल्‍कि उन्‍हीं के कहे शब्‍दों से ज्ञात होता है कि ''नमामिगंगे-योजना'' को केंद्रीय मंत्रियों ने किसतरह मज़ाक का विषय बना दिया है।

केंद्र इस योजना के अपार धन की बात करता है मगर गंगा-प्रदूषण पर पहले उमाभारती और अब सत्‍यपालसिंह जैसे मंत्रियों के रहते न यह धन काम आने वाला है और ना ही गंगा का दम घुटने से रोका जा सकता है। उन्‍होंने कहा कि ''गंगा में अस्‍थि विसर्जन और फूल के दोने प्रवाहित करने से, संतों को भी जलसमाधि देने के कारण अधिक प्रदूषण होता है। ऐसा करना किसी भी शास्‍त्र में नहीं लिखा। गंगा में प्रवाहित करने के बजाय अस्थियों को किसी जमीन पर एक स्थान पर इकट्ठा के उसके ऊपर पौधे लगाए जाएं। ताकि आने वाली पीढ़ी उस पौधे में अपने पूर्वजों की छवि देख सकें।''

ये सही है कि पूर्वजों को याद करने का ये बेहतर तरीका हो सकता है मगर अस्‍थिवसर्जन को गंगा प्रदूषण का कारक फिर भी नहीं माना जा सकता।

मुंबई के पुलिस कमिश्‍नर रह चुके मंत्री सत्‍यपाल सिंह के बयान पर आक्रोषित संतों की भांति हम सभी सनातनधर्मी ये भलीभांति जानते हैं कि स्‍कंद पुराण, वायु पुराण, मत्‍स्‍य पुराण, नारद पुराण और विष्‍णु पुराण में गंगा में अस्‍थिविसर्जन और संतों-साधुओं की जलसमाधि का उल्‍लेख है। यूं भी राख हुई अस्‍थियां कितना जलप्रदूषित करेंगी, ये तो कोई बच्‍चा भी बता सकता है।

कौन नहीं जानता कि गंगा समेत सभी नदियां सदैव से ऐसी नहीं थी, सर्वप्रथम अंग्रेजों के शासनकाल में शहरों का सीवेज हमारी नदियों में छोड़े जाने के बाद से इसकी शुरुआत हुई जो अब सीवरेज से होते हुए प्‍लास्‍टिक कचरे और उद्योगों के तेजाबयुक्‍त प्रदूषक तत्वों तक को ढो रही हैं। इसी तेजाब ने गंगा के जलचरों को लगभग खत्‍म ही कर दिया है। इन जलचरों का जीवन ही फूल-दोनों, गंगा में प्रवाहित खाद्यसामिग्री, जलसमाधि प्राप्‍त मृत शरीरों के अवशेषों पर निर्भर हुआ करता था परंतु उद्योगों व सीवरेज के घातक अपशिष्‍ट जलचरों को खत्‍म करता गया और नतीजा यह कि अब नदियां न सदानीरा रहीं और न ही सलिला।

बेशक गंगा और उसकी सहयोगी नदियां सदानीरा रहें इसकी सभी कामना करते हैं मगर जब गंगा मंत्रालय संभाल रहे मंत्री ही ऐसी बचकाना बातें कहेंगे और उसपर जनसहयोग न होने का रोना भी रोएंगे तो आखिर कौन लेगा गंगा को प्रदूषणमुक्‍त करने के जिम्‍मेदारी।

अखाड़ा परिषद सहित संतों और हमारे जैसे आमजन को भी मंत्री की ये बात गले नहीं उतर रही। उन्‍हें संतों ने करारा जवाब देते हुए कहा है कि पहले शास्‍त्र पढ़ें मंत्री जी और जहां तक बात है जलसमाधि की तो हम तो सरकार से पहले ही भूसमाधि हेतु जमीन मांग रहे हैं, अकेले उत्‍तराखंड में ही हजारों उद्योगों का अपशिष्‍ट गंगा में ना बहाने को संतों ने कितनी बार फरियाद की, मगर आज तक उसपर तो कोई विचार भी नहीं हुआ, मंत्री बतायें कि आखिर वे गंगा प्रदूषण पर इन मांगों को क्‍यों नहीं मान रहे। क्‍या सिर्फ अस्‍थिविसर्जन और फूल के दोने ही प्रदूषण फैलाते हैं, मंत्री की दृष्‍टि में इंडस्‍ट्रियल पॉल्‍यूटेंट 
क्‍या हैं। संतों की ही बात करें तो अस्‍थिविसर्जन को पौराणिक व धार्मिक तौर पर ही सही नहीं माना गया बल्‍कि पर्यावरणीय, वैज्ञानिक, सामाजिक और भूमि के उपयोग को लेकर भी यह सर्वोत्‍तम संस्‍कार प्रक्रिया मानी गई है। अच्‍छा खासा वजनी से वजनी व्‍यक्‍ति भी सिमट कर एक लोटे में आ जाता है, क्‍या इससे फैल रहा है प्रदूषण?

फिलहाल तो गंगा-प्रदूषण पर स्‍वयं गंगा की ही हालत ऐसी हो गई है जैसी कि महाभारत के रचयिता वेद व्यास की थी, जो धर्म पालन के संदर्भ में यह कह रहे थे कि मैं अपनी बाहें उठा-उठाकर चिल्लाता हूं लेकिन मेरी कोई सुनता ही नहीं। ऐसा लगता है कि जिस महान संस्कृति को गंगा ने जीवन दिया उसका सबसे विकसित रूप देखने तक गंगा का ही जीवन नहीं बचेगा।

मंत्री सत्‍यपाल सिंह को ज्ञात होना चाहिए कि -
गंगा को ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित् श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है।
प्रसिद्ध नदीसूक्त में सर्वप्रथम गंगा का ही आह्वान किया गया है। ऋग्वेद में ‘गंगय’ शब्द आया है जिसका सम्भवत: अर्थ है ‘गंगा पर वृद्धि करता हुआ।’ 
शतपथ ब्राह्मण एवं ऐतरेय ब्राह्मण में गंगा एवं यमुना के किनारे पर भरत दौष्यंति की विजयों एवं यज्ञों का उल्लेख हुआ है। 
महाभारत एवं पुराणों में गंगा की महत्ता एवं पवित्रीकरण के विषय में सैकड़ों प्रशस्तिजनक श्लोक हैं। 
स्कन्द पुराण में गंगा के एक सहस्र नामों का उल्लेख है।

सत्‍यपाल सिंह के बचकाना तर्क और गंगा के प्रति बेहद सतही टिप्‍पणी के बाद गंगा के लिए कवि केदारनाथ अग्रवाल की ''गंगा पर कुछ पंक्‍तियां'' पढ़िए-

आज नदी बिलकुल उदास थी/
सोयी थी अपने पानी में/
उसके दर्पण पर बादल का वस्त्र पड़ा था/
मैंने उसे नहीं जगाया/
दबे पांव घर वापस आया।’

न जाने वह कौन सी नदी थी, जिसकी उदास और सोयी हुई लहरों पर कवि केदारनाथ अग्रवाल ने इतना सुंदर बिम्ब रचा था। कवि को उस रोज नदी उदास दिखी, उदासी दिल में उतर गई।

-अलकनंदा सिंह