रविवार, 25 जून 2017

इमरजेंसी पर आज बस इतने ही हैं शब्‍द


इमरजेंसी पर आज बस इतना ही कह सकती हूं  कि…इतिहास की एक घटना जिसने भारतवर्ष की  राजनैतिक दिशा-दशा, आरोह-अवरोह, घटना-परिघटना,  विचारधाराओं का विचलन और समन्‍वय के साथ-साथ  हमारी पीढ़ियों को लोकतंत्र की उपयोगिता व संघर्ष को  बखूबी परिभाषित कर दिया….उसे शब्‍दों में समेटा नहीं  जा सकता।
इमरजेंसी के दौरान राजनेताओं और उनके समर्थकों पर  क्‍या गुजरी यह तो नहीं बता सकती मगर चूंकि मेरे  पिता सरकारी डॉक्‍टर थे…सो नसबंदियों की अनेक  ”सच्‍चाइयां” उनके मुंह से गाहेबगाहे सुनीं जरूर हैं और  इस नतीजे पर पहुंची हूं कि किसी भी सर्वाधिकार  सुरक्षित रखने वाले सत्‍ताधीश का ”अहं” जब सीमायें  लांघता है तो वह अपने और अपने परिवार के लिए  इतनी बददुआऐं-आलोचनाएं इकठ्ठी कर लेता है जिसे  सदियों तक एक ”काली सीमारेखा” के रूप में परिभाषित  किया जाता है। ऐसा ही इमरजेंसी की घोषणा करते  वक्‍त पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था और आज  गांधी परिवार के लिए हर वर्ष की 25 जून को सिवाय  भर्त्‍सनाओं के पूरे देश से और कुछ नहीं आता।
बहरहाल आप देखिए ये ”दो उदाहरण”
पहला है वो फोटो जो इंदिरा गांधी के लिए ही नहीं  लोकतंत्र का मजाक उउ़ाने वाले किसी भी नेता के लिए  हमेशा याद किया जाता रहेगा। जी हां, जगमोहन लाल  सिन्हा का फोटो…
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल  सिन्हा का फोटो जिन्‍होंने 1975 में यू.पी. बनाम राज  नारायण मामले में कहा था ” “याचिका स्वीकृत की  जाती है, जिसका मतलब था “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.”
एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज के अनुसार जगमोहन लाल  सिन्हा ने इस तरह की केस की सुनवाई ——
12 जून, 1975 की सुबह इंदिरा गांधी के वरिष्ठ निजी  सचिव एनके सेशन एक सफ़दरजंग रोड पर प्रधानमंत्री  निवास के अपने छोटे से दफ़्तर में टेलिप्रिंटर से आने  वाली हर ख़बर पर नज़र रखे हुए थे. उनको इंतज़ार था  इलाहाबाद से आने वाली एक बड़ी ख़बर का और वो  काफ़ी नर्वस थे.
ठीक 9 बजकर 55 मिनट पर जस्टिस जगमोहन लाल  सिन्हा ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के कमरा नंबर 24 में  प्रवेश किया. जैसे ही दुबले पतले 55 वर्षीय, जस्टिस  सिन्हा ने अपना आसन ग्रहण किया, उनके पेशकार ने  घोषणा की, “भाइयो और बहनो, राजनारायण की  याचिका पर जब जज साहब फ़ैसला सुनाएं तो कोई  ताली नहीं बजाएगा.”
जस्टिस सिन्हा के सामने उनका 255 पन्नों का  दस्तावेज़ रखा हुआ था, जिस पर उनका फ़ैसला लिखा  हुआ था.
जस्टिस सिन्हा ने कहा, “मैं इस केस से जुड़े हुए सभी  मुद्दों पर जिस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ, उन्हें पढ़ूंगा.” वो  कुछ पलों के लिए ठिठके और फिर बोले, “याचिका  स्वीकृत की जाती है, “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.”
अदालत में मौजूद भीड़ को सहसा विश्वास नहीं हुआ  कि वो क्या सुन रही है. कुछ सेकंड बाद पूरी अदालत  में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी. सभी रिपोर्टर्स अपने  संपादकों से संपर्क करने बाहर दौड़े.
वहाँ से 600 किलोमीटर दूर दिल्ली में जब एनके सेशन  ने ये फ़्लैश टेलिप्रिंटर पर पढ़ा तो उनका मुंह पीला पड़  गया.
उसमें लिखा था, “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.” उन्होंने  टेलिप्रिंटर मशीन से पन्ना फाड़ा और उस कमरे की ओर  दौड़े जहाँ इंदिरा गाँधी बैठी हुई थीं.
इंदिरा गाँधी के जीवनीकार प्रणय गुप्ते अपनी किताब  ‘मदर इंडिया’ में लिखते हैं, “सेशन जब वहाँ पहुंचे तो  राजीव गांधी, इंदिरा के कमरे के बाहर खड़े थे. उन्होंने  यूएनआई पर आया वो फ़्लैश राजीव को पकड़ा दिया.  राजीव गांधी पहले शख़्स थे जिन्होंने ये ख़बर सबसे  पहले इंदिरा गाँधी को सुनाई.”
1971 में रायबरेली सीट से चुनाव हारने के बाद  राजनारायण ने उन्हें हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को दो मुद्दों पर चुनाव में  अनुचित साधन अपनाने का दोषी पाया. पहला तो ये  कि इंदिरा गांधी के सचिवालय में काम करने वाले  यशपाल कपूर को उनका चुनाव एजेंट बनाया गया  जबकि वो अभी भी सरकारी अफ़सर थे.
उन्होंने 7 जनवरी से इंदिरा गांधी के लिए चुनाव प्रचार  करना शुरू कर दिया जबकि 13 जनवरी को उन्होंने  अपने पद से इस्तीफ़ा दिया जिसे अंतत: 25 जनवरी  को स्वीकार किया गया.
जस्टिस सिन्हा ने एक और आरोप में इंदिरा गांधी को  दोषी पाया, वो था अपनी चुनाव सभाओं के मंच बनवाने  में उत्तर प्रदेश के अधिकारियों की मदद लेना. इन  अधिकारियों ने कथित रूप से उन सभाओं के लिए  सरकारी ख़र्चे पर लाउड स्पीकरों और शामियानों की  व्यवस्था कराई.
हांलाकि बाद में लंदन के ‘द टाइम्स’ अख़बार ने टिप्पणी  की, “ये फ़ैसला उसी तरह का था जैसे प्रधानमंत्री को  ट्रैफ़िक नियम के उल्लंघन करने के लिए उनके पद से  बर्ख़ास्त कर दिया जाए.”
और अब दूसरा उदाहरण है अटल जी की कविता-
इमरजेंसी के कालेरूप को अपने शब्‍दों में ढालकर हमारे  सामने लाई गई अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक  कविता पढ़िए जिसे आज प्रधानमंत्री ने अपने ”मन की  बात” कार्यक्रम में शेयर किया है। किसी भी जो  इमरजेंसी की भयावहता को बखूबी दर्शा सकते हैं अटल  जी के ये शब्द …आप भी पढ़िए-
एक बरस बीत गया
 
झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
 
सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
 
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया।
अब इस दुआ के साथ कि भारत को कभी कोई और  इमरजेंसी न झेलनी पड़े, बेहतर हो कि हम अपने  इतिहास को याद रखें।
  • अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 8 जून 2017

बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्टी नहीं खाते

मुनव्‍वर राणा साहब लिखते हैं कि -

सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछाकर,
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते...


ये अशआर पढ़ते हुए हम भूल जाते हैं कि अब हमें उल्‍टे कदमों पर चलना सिखाया जा रहा है  और ये प्रयास पूरी सफलता के साथ आगे बढ़ रहा है। जी हां, तनाव का एक भरापूरा बाजार  क्रिएट किया जा चुका है, आवश्‍यकताओं की मार्केटिंग में रिसर्च, प्रोडक्‍ट और कंज्‍यूमर तक पहुंचने  की ट्रिक्‍स बताई जाने लगी हैं। हर हाल में इस बात से बचा जा रहा है कि हम अपनी जड़ों की  ओर ना देख सकें क्‍योंकि क्रिएटेड माहौल के साथ हमें अपनी जड़ों से जितना विमुख किया जा  सकेगा, उतना ही मार्केट के ज़रिए हम कैप्‍चर हो सकेंगे यानि उसके Addicted Consumer बन  सकेंगे।

मार्केटिंग के इसी घमासान के बीच 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है, देश से लेकर  विदेश तक योग की माया और महिमा फैल रही है।

कितना अजीब लगता है कि अब सरकारों को हमें योग सिखाना पड़ रहा है, योग जो घर-घर में  सूर्य प्रणाम और सूर्य को अर्घ्‍य से सूर्यासन तक अपना विस्‍तार पाता था, आज उसी योग के  माध्‍यम से शरीर को स्‍वस्‍थ रखने की अपील सरकारों को करनी पड़ रही है। इस 21 जून के आते  आते तो योग पर रोजाना लेक्‍चर भी होंगे और संकल्‍प भी लिए जाऐंगे मगर 21 जून के बाद  अगले वर्ष की 21 जून तक जिंदगी फिर उसी ढर्रे पर आ जाएगी ज़िंदगी... जड़ों से कटने का  इससे बड़ा और वीभत्‍स उदाहरण दूसरा कोई हो सकता है क्‍या।
यह हमें पुरातन कथाओं में सुनाया जाता रहा है कि जो पौधे हमेशा आसमान की ओर ऊर्ध्‍वगति  से बढ़ते दिखाई देते हैं उनकी जड़ें उन्‍हें उतना ही अधिक मजबूती के साथ पृथ्‍वी से जोड़े रखती हैं  इसीलिए वे अपना वर्तमान और भविष्‍य दोनों ही पृथ्‍वी और आकाश से पोषित करते हैं। तभी  पौधों को वृक्ष बनने के लिए किसी मार्केटिंग की जरूरत नहीं पड़ती।

आज दो शोध रिपोर्ट पढ़ीं, एक में कहा गया है कि ''Dirt is Good'' और दूसरी में बताया गया कि  ''Sleep Therapy'' से वजन कम होता है। दोनों ही रिपोर्ट हमें उन जड़ों की याद दिलाती हैं  जिसमें धूल में खेलना बच्‍चों का शगल माना जाता था और बच्‍चे धूल में खेल कर ही बड़े हो जाते  थे बिना किसी क्रोनिक डिसीज के। विडंबना देखिए कि अब लाखों रुपए शोध पर खर्च कर यह  बताया जा रहा है कि बच्‍चे यदि धूल में खेलेंगे तो उन्‍हें एलर्जी, अस्‍थमा, एक्‍जिमा और डायबिटीज  जैसे रोग नहीं होंगे।

दूसरी शोध रिपोर्ट कहती है कि अच्‍छी नींद से वजन कम होता है, ये बिल्‍कुल नाक को घुमाकर  पकड़ने वाली बात है। अच्‍छी नींद के लिए बहुत आवयश्‍क है शारीरिक मेहनत करना और जब  व्‍यक्‍ति शारीरिक तौर पर मेहनत करेगा तो पूरे शरीर की मांसपेशियां थकेंगीं, निश्‍चित ही  मानसिक तौर पर भी थकान होगी और नींद अच्‍छी आएगी। नींद अच्‍छी आएगी तो मोटापा हावी  नहीं होगा। हास्‍यास्‍पद लगता है कि जब ऐसी रिपोर्ट्स को ''शोधार्थियों की अनुपम खोज'' कहा  जाता है।

इन दोनों ही शोधकार्यों पर मुनव्‍वर राणा के ये अशआर बिल्‍कुल फिट बैठते हैं कि-

''हंसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते,
बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्ठी नहीं खाते।


सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछाकर,
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।।''


बहरहाल, अपनी जड़ों से दूर भागते हम लोग इन शोधकार्यों के बूते अपना जीवन जीने पर  इसलिए विवश हुए हैं कि हमने योग और पारंपरिक जीवनशैली से पूरी तरह दूरी बना ली है। अब  उस तक वापस लौटने के लिए बाजार का सहारा लेना पड़ रहा है, नींद की गोलियां और फैटबर्निंग  टैबलेट्स लेनी पड़ रही हैं। बच्‍चों को अस्‍थमा-डायबिटीज जैसी बीमारियां हमारी ही देन है।
 

इससे भी ज्‍यादा शर्मनाक बात ये है कि योग करने और स्‍वस्‍थ रहने लिए सरकारों को आगे आना  पड़ रहा है। अभी सिर्फ देरी हुई है, दूरी नहीं बनी...इसलिए अब भी समय है कि हम अपनी जड़ों  की ओर... अपनी पारंपरिक जीवन शैली की ओर लौट लें, आधुनिकता से जिऐं मगर इसके दास  ना बनें तभी तो योग शरीर के साथ मन को भी स्‍वस्‍थ रख पाएगा, वरना बाजार तो हमें कैप्‍चर  करने को करोड़ों के वारे-न्‍यारे कर ही रहा है ताकि हम उसके सुरसा जैसे मुंह में समा जाएं।
 

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 4 जून 2017

पूर्वाग्रही राजनीति की भेंट चढ़ता संविधान का अनुच्‍छेद 48

पूर्वाग्रह व्‍यक्‍ति के प्रति हों, समाज के प्रति अथवा राजनैतिक पार्टी के प्रति, किसी  भी विषय पर तिल का ताड़ बनाने और उसी आधार पर शंकाओं को वास्तविकता  जैसा दिखाने का माद्दा रखते हैं। रस्‍सी को सांप बनाकर पेश करने की यह ज़िद  किसी के लिए भी अच्‍छी नहीं होती। यही पूर्वाग्रह रीतियों को कुरीतियों में और  सुशासन को कुशासन में बदलते दिखाई देते हैं।
आजकल ”बीफ” के बहाने बड़ी हायतौबा हो रही है। जैसे गौमांस नहीं खाऐंगे तो  मर जाएंगे अथवा अस्‍मिता पर संकट छा जाएगा। पशु बाजार के रेगुलेशन पर जो केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन जारी किया है, उसे कुछ राजनैतिक पूर्वाग्रहियों ने आजकल ”बीफ” खाने की ज़िद बना लिया है।
क्‍या  कहता  है  संविधान
संविधान का अनुच्‍छेद 48 कहता है कि ”राज्‍य, कृषि व पशुपालन दोनों को आधुनिक व वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने को प्रयास करेगा, विशिष्‍ट गायों बछड़ों और अन्‍य दुधारू पशुओं की नस्‍लों में सुधार के साथ-साथ उनके वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएगा।” केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना महज इसलिए की जाए कि वह गैरकांग्रेसी और अपार बहुमत वाली सरकार है, तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं, वह भी तब जबकि संविधान के उक्‍त अनुच्‍छेद को ना तो भाजपा ने बनाया ना तब नरेंद्र मोदी ही राजनीति में आए थे। इसी अनुच्‍छेद में गाय को भारतीय संस्कृति का वाहक माना गया है। तो क्‍या जिन सिरफिरों ने केरल के कन्‍नूर में गाय के बछड़े के साथ जो वीभत्‍सता दिखाई, वह संविधान के इसी अनुच्‍छेद का उल्‍लंघन नहीं माना जाना चाहिए।

फिलहाल के विवाद में पशु बाजार को लेकर सरकार ने जो नए नियम बनाए हैं, उन्हें इस ”बीफ” विवाद ने परोक्ष कर दिया है जबकि नए नियमों में जानवरों की तस्करी और निर्दयता के पहलुओं पर काफी गौर किया गया है।

गौरतलब है कि 23 मई को जब केंद्र सरकार ने पशु बाजार के लिए नए नियमों की  घोषणा की तभी से कुछ तत्‍व केरल व पश्‍चिम बंगाल में बीफ को हाइलाइट करके बवाल काट रहे हैं। हालांकि ये समझ से परे है कि केरल में सिर्फ मांस ”निर्यात” करने वाले बूचड़खानों को लाइसेंस मिला हुआ है तो उन्‍हें दिक्‍कत क्‍यों हो रही है।
यूं भी गतवर्षों से जो घटनाऐं सामने आ रही हैं उनके आधार पर ये कहा जा सकता  है कि केरल को तो किसी को मारने की ”वजह” भी तलाशने की जरूरत नहीं, वहां  तो कुत्ते, गाय, औरत, बच्चे, हाथी और राजनैतिक कार्यकर्ताओं का कत्ल होता  आया है।

पश्चिम बंगाल ने भी मवेशियों की खरीद-फरोख्त को लेकर हो-हल्ला मचाया मगर  उतना नहीं जितना केरल में हुआ, तमिलनाडु में भी नए नोटिफिकेशन को लेकर  थोड़ा बहुत हंगामा हुआ। इसकी बड़ी वजह ये है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु  में ही पशुओं का सबसे ज्यादा अवैध कारोबार होता है। जहां पश्चिम बंगाल से  बांग्लादेश को गर्भवती गायों, बीमार और छोटे जानवरों की अवैध सप्लाई होती है  वहीं तमिलनाडु यही काम केरल के लिए करता है।

नेताओं और छात्र संगठनों ने पशुओं को लेकर जिन नए नियमों पर बयानबाजी की, वह बेहद ही खोखली थी। ये जिस तबके से आते हैं…निश्‍चित जानिए कि इनमें से तमामों ने तो कभी पशु् बाजार की ओर देखा भी नहीं होगा। ये बयानबाजी सिर्फ  सियासी तूफान खड़ा करने के लिए हुई और अब भी हो रही है, इस के चक्कर में  जो नए नियम बनाए हैं उनकी भी हत्या कर दी गई।

अब देखिए कि आखिर पशु बाजारों पर लगाम लगाना क्यों है जरूरी है। पहले हमें  इन बाजारों को नियमित करने की जरूरत को समझना होगा। पशु बाजारों में सिर्फ  दो तरह के जानवर बेचने के लिए लाए जाते हैं। पहले तो वो जो दुधारू होते हैं या  जिन्हें खेती के काम में इस्तेमाल किया जा सकता है, दूसरे वो जो मांस के लिए  बेचे जाते हैं।

यहां यह बात भी जान लेना जरूरी है कि जो उपयोगी जानवर होते हैं उनकी ठीक से  देख-रेख भी की जाती है और उन्हें लाने-ले जाने में भी अपेक्षाकृत कम क्रूरता दिखाई  जाती है, उनकी तस्करी भी कम होती है। इसकी वजह ये है कि उन्हें आसानी से  खरीदार मिल जाते हैं और उनकी सेहत का मालिकों को खयाल रखना पड़ता है, तभी  तो उन जानवरों की अच्छी कीमत मिल सकेगी।

इसके ठीक विपरीत जो जानवर मांस के लिए बेचने लाए जाते हैं, उनकी हालत बेहद  खराब होती है। किसान आम तौर पर वो जानवर मांस के लिए बेचते हैं, जो उनके  लिए बेकार हो चुके होते हैं।

किसान इन जानवरों को दलालों को बेच देते हैं। फिर ये दलाल दर्जन भर या इससे  ज्यादा जानवर खरीदते हैं जिन्‍हें वो बड़े बाजारों में ले जाते हैं, ताकि बड़े दलालों को  बेच सकें। कई बिचौलियों और बाजारों से गुजरते हुए ये जानवर इकट्ठे करके गाड़ियों  में ठूंस करके दूसरे राज्यों में ठेकेदारो को बेचे जाते हैं।
उत्तरी भारत के राज्यों में सबसे ज्यादा जानवर पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं जो  झारखंड, ओडिशा और बिहार से होकर गुजरते हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक,  तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र से जानवरों को केरल भेजा जाता है।

ज्यादातर राज्यों में जानवरों के वध या ट्रांसपोर्ट करने के लिए पशुपालन और  राजस्व विभाग से इजाजत लेनी होती है हालांकि किसी भी राज्य में इन नियमों का  पालन नहीं होता।
पुलिस चौकियों में पैसे देकर यानि ‘हफ्ता’ देकर जानवरों की तस्करी का ये कारोबर  बरसों से चलता आ रहा है। जाने-अनजाने ये सभी लोग जानवरों की तस्करी का  हिस्सा बने हुए हैं और ये बीमारी पूरे देश को लगी हुई है।
कुलमिलाकर ये कहा जाए कि जानवरों की तस्करी का ये बहुत बड़ा रैकेट है, जो हर  राज्य में सक्रिय है तो गलत ना होगा।

देखिए सरकारी रिपोर्ट क्‍या कहती है इस रैकेट के बारे में
गृह मंत्रालय ने 2006 में ही ये पाया था कि जानवरो की तस्करी का आतंकवादी  फंडिंग से सीधा ताल्लुक है। 2008 में असम धमाकों के बाद गिरफ्तार हूजी के  आतंकवादियों ने माना था कि उन्होंने धमाकों के लिए पैसे जानवरों की तस्करी से  जुटाए थे। हर साल सिर्फ उत्तर प्रदेश में जानवरों के तस्करों के हाथों सौ से ज्यादा  पुलिसवाले मारे जाते हैं।
भारत-बांग्लादेश की सीमा पर कई बीएसएफ जवान इन तस्करों के हाथों  कत्ल हो जाते हैं। खाड़ी देशों को मांस के निर्यात में जबरदस्त मुनाफा होता है।  इसीलिए मांस माफिया इसके लिए कुछ भी करने को तैयार होता है।
दिल्ली के गाजीपुर स्थित पशु बाजार में महिलाओं के प्रवेश की अलिखित पाबंदी है।  वो कहते हैं कि मंडी का मंजर बेहद डरावना और विचलित करने वाला होता है।
बिहार के सोनपुर मेले में जहां जानवर कटते हैं, वहां सिर्फ परिचित दलालों को ही  जाने दिया जाता है। स्‍थिति इतनी भयावह है कि अगर कोई वहां कैमरा लेकर जाता  है, तो वो कैमरे के साथ वापस नहीं आ सकता। कई केस में तो उसे स्ट्रेचर पर  लादकर लाना पड़े।
पशु बेदर्दी का अंतहीन सिलसिला
वजह वही है कि कसाईखाने का मंजर बेहद खतरनाक होता है. जानवरों को छोटी  रस्सियों से बांधा जाता है, खरीदार के इंतजार में जानवर कई दिनों या कई बार  हफ्तों तक खड़े रखे जाते हैं। फिर खरीदार उन्हें गाड़ियों में ठूंसकर दूसरे नर्क ले  जाते हैं. बदसलूकी के चलते जानवरों की हालत दयनीय होती है। छोटे जानवर बेचने  के बाद अपनी मां को तलाशते दिखाई देते हैं।

पशु वध में बेदर्दी एक बड़ा मसला है। किसान के घर से कसाई खाने तक के इस  मौत का ये सफर किसी एक खरीदार के मिल जाने से नहीं खत्म होता।

जानवर कई बार बिकते हैं। कई हाथों से गुजरते हैं। हर खरीदार उनसे बदसलूकी  करता है। जानवरों को ठीक से खाना-पानी नहीं मिलता क्योंकि हर खरीदार को पता  होता है कि इसे आखिर में कत्ल ही होना है। कई बार तो जानवरों को फिटकरी  वाला पानी दिया जाता है, जिससे उनके गुर्दे फेल हो जाएं। इससे उनके शरीर में  पानी जमा हो जाता है। इससे जानवर हट्टे-कट्टे दिखते हैं। इससे उनकी अच्छी कीमत  मिलती है। उन्हें पैदल ही एक बाजार से दूसरे बाजार ले जाया जाता है।

दक्षिण भारत के राज्यों में तो जानवरों की आंखों में मिर्च ठूंस दी जाती है ताकि दर्द  से वो खड़े रहें। भले ही खड़े-खड़े थकान से उनकी मौत ही क्यों न हो जाए। मुनाफा  बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा जानवर ट्रक में ठूंसकर ले जाए जाते हैं। वो मंजर  देखकर कई बार बेहोशी आने लगती है।

तस्करी के दौरान कई जानवर दम घुटने से मर जाते हैं। कई की हड्डियां टूट जाती  हैं, आंखें खराब हो जाती हैं, या पूंछ टूट जाती है। किसी के दूसरे अंग बेकार हो  जाते हैं।

चढ़ाने-उतारने के दौरान जानवरों को गाड़ियों में फेंक दिया जाता है, जिससे वो  जख्मी हो जाते हैं। उन्हें खींचकर गाड़ियों में भर दिया जाता है। उन जानवरों पर ये  जुल्म नहीं होता जो दुधारू होते हैं या जिनका खेती में इस्तेमाल हो सकता है।
अत: पशु बाजारों का नियमन और काटने के लिए जानवरों को सीधे किसान से  खरीदने से सबसे ज्यादा नुकसान जानवरों के तस्कर माफिया को होगा। उन ठेकेदारों  और दलालों को होगा जो तस्करी में शामिल हैं।
क्‍या होगा नए नियमों से-
नए नियमों से डेयरी के कारोबार से जुड़े लोगों की जवाबदेही भी तय होगी। उनके  कारोबार से पैदा हुए बाईप्रोडक्ट को लेकर वो जिम्मेदार बनेंगे। भारत सरकार के  इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने दूध न देने वाले जानवरों के बेहतर  इस्तेमाल के लिए भी कुछ नुस्खे सुझाए हैं।
राज्य सरकारों को इन नुस्खों को भी लागू करना होगा। डेयरी उद्योग को-ऑपेटिव  के जरिए संगठित तरीके से चलता है। इनके जरिए बेकार जानवरों को काटने के  लिए बेचा जा सकता है। इससे जवाबदेही तय होगी और जानवरों के साथ निर्दयता  भी कम होगी।

मवेशियों को लेकर नए नियमों का विरोध हताशा और कायरता के सिवा कुछ नहीं।
बाकी देशवासियों ने इन नियमों के जारी होने के बाद राहत की सांस ली है। दिवंगत  पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने इन नियमों की शक्ल में देश को सबसे बड़ी  विरासत दी है।
और इसी बात पर एक शेर दाग़ देहलवी का-
सब लोग, जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं ।

- अलकनंदा सिंह 

गुरुवार, 25 मई 2017

सहारनपुर: हर इक फ़साद ज़रूरत है अब सियासत की

शायर हसनैन आक़िब का एक शेर है -

हर इक फ़साद ज़रूरत है अब सियासत की
हर इक घोटाले के पीछे वज़ीर रहते हैं।


सहारनपुर हिंसा पर जो सवाल उठ रहे  हैं उनके जवाब अभी तो कोई नहीं देगा मगर सवाल तो उठ रहे हैं ना, कि क्‍या हिंसा सिर्फ राजनीति से प्रेरित होती है, क्‍या समाज में स्‍थापित  भाईचारा वाले मापदंड जबरदस्‍ती थोपे गए, क्‍या नई पीढ़ी को हिंसा के  बूते अपना नाम-काम-दाम कमाने का शॉर्टकट मिल गया है, क्‍या हिंसा  करने वाले गांव के गांव सोशल मीडिया को दोषी बताकर अपने  समाजों में पिछले कुछ दशकों से घुलते रहे ज़हर से निजात पा सकते  हैं, क्‍या महापुरुषों के नाम को इस तरह बदनाम नहीं किया जा रहा।

हम उत्‍तरप्रदेशवासी साक्षी हैं उस प्रवृत्‍ति के जिसके कारण महापुरुषों  के नाम पर राजनैतिक स्‍वार्थों के चलते छुट्टियों से लेकर उनकी जाति  को खोज खोजकर निकाला गया, फिर  उनके नाम पर जातिगत  ठेकेदारों और राजनेताओं द्वारा विशेष शोभायात्राऐं निकालकर अपने  बाहुबल का प्रदर्शन किया जाता रहा, यह एक परंपरा सी बन गई थी। 
नई सरकार के गठित होते ही हालांकि तमाम छुट्टियां तो खत्‍म कर दी  गईं और महापुरुषों के बारे में उनकी जयंतियों व पुण्‍यतिथियों को  कार्यालयों व स्‍कूल-कॉलेजों में मनाने का निर्णय लिया गया मगर जो  विभाजनकारी ज़हर हर तबके में घोला जा चुका, उसके आफ्टरइफेक्‍ट्स  भी तो झेलने होंगे और सहारनपुर उसी आफ्टरइफेक्‍ट का चश्‍मदीद  बना।
मेरा अपना अध्‍ययन बताता है कि ना तो बाबा साहब अंबेडकर को अपनी मूर्ति पूजा करवानी थी और ना ही महाराणा प्रताप ने ये सोचकर अपनी जंग लड़ी थी कि आने वाली पीढ़ियां उनकी प्रतिमा या उनके जन्‍मदिन पर शोभायात्रा निकालें और अपने ही गांववालों को शिकार बनाऐं, मगर ऐसा ही हो रहा है।

सहारनपुर चश्‍मदीद इस बात का भी है कि कैसे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के नाम पर भीम आर्मी द्वारा दलितों को बौद्ध धर्म ग्रहण कराकर बरगलाया जा रहा है क्‍योंकि समस्‍या धर्म में नहीं है बल्‍कि उस मानसिकता में है जो स्‍वयं को सर्वोच्‍च दर्शाने से ग्रस्‍त है।
क्‍या धर्म परिवर्तन से ठाकुर स्‍वयं को दलितों से श्रेष्‍ठ मानना छोड़ देंगे, क्‍या बौद्ध धर्म ग्रहण करने वालों को अचानक वे शक्‍तियां मिल जाऐंगीं जो दबंग ठाकुरों की मानसिकता बदल सकें।

दरअसल हिंसा हो या धर्मपरिवर्तन, जंतर मंतर पर शक्‍ति प्रदर्शन हो  अथवा शोभायात्राओं के सहारे शक्‍ति प्रदर्शन, सब इंस्‍टेंट पॉलिटिक्‍स का हिस्‍सा हैं।

बहरहाल सहारनपुर का जातिगत संघर्ष उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की कानून व्यवस्था के लिये पहली बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है और यहां के दलित एवं ठाकुर समुदाय के नेता दावा करते हैं कि सहारनपुर के जातिगत संघर्षों में राजनीति की एक अंत:धारा है जिसने मुस्लिमों को भी अपने दायरे में समेट लिया है।

घटनाक्रम के अनुसार करीब 600 दलितों और 900 ठाकुरों की आबादी वाले गांव शब्बीरपुर से हिंसक चक्र की जो शुरुआत हुई, उसमें जहां दलितों का कहना है कि ठाकुरों ने उन्हें गांव के रविदास मंदिर परिसर में बाबासाहिब अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित नहीं करने दी थी। वहीं बाद में राजपूत राजा महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य में ठाकुरों के एक जुलूस पर एक दलित समूह ने आपत्ति जतायी तो इससे हिंसा फूट पड़ी। इसमें एक व्यक्ति को अपनी जान गंवानी पड़ी और 15 लोग घायल हो गये।

हालांकि जैसे कि आसार थे कथित दलित चिंतकों ने अपनी रोटियां सेंकना शुरू कर दिया है , मायावती ने दौरा कर चुकी हैं और शेहला मसूद द्वारा दलितों को खासा ''बेचारा'' बनाकर ( हालांकि सहारनपुर के दलित ना तो गरीब हैं और ना ही बेचारे, ना ही उनकी आर्थिक स्‍थिति खराब है और ना वे भूमिहीन व ठाकुरों के बंधुआ व जीहुजूरी करने वाले ) जो लेख लिखा गया, वह यह बताने को काफी है कि आज भी सहारनपुर की हिंसा को सभी अपने अपने चश्‍मे  से देखते हुए अपना पॉलिटिकल स्‍कोप खोज रहे हैं और प्रदेश सरकार के लिए मुसीबत पैदा करने का कारण बन रहे हैं।

बहरहाल समस्‍या पर राजनीति करने वाले भला उसका समाधान कैसे निकालेंगे और महापुरुषों के  नाम पर खुदी खाइयों को ये किसी भी तरह पाटने नहीं देंगे, क्‍योंकि ये इनके लिए मुफीद हैं।

और आखिर में मंज़र भोपाली इसी सियासत पर कहते हैं-

ग़म-गुसार चेहरों पर ए'तिबार मत करना
शहर में सियासत के दोस्त भी शिकारी है।



 - अलकनंदा सिंह

बुधवार, 24 मई 2017

क़ाजी नजरुल इस्लाम- एक विद्रोही जनकवि जो अपनी उम्र के आखिरी तीन दशक तक खामोश रहा

क़ाजी नजरुल इस्लाम- एक विद्रोही जनकवि जो अपनी उम्र के आखिरी तीन दशक तक खामोश रहा
आज 24 मई को जन्‍मे काजी नजरुल इस्लाम नाम है आजादी के 1942 के दौर में सामाजिक भेदभाव और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ सबसे मुखर एक उस विद्रोही जनकवि का, जो 42 साल की अपनी उम्र के बाद के आखिरी तीन दशक तक खामोश रहा, पिक डिसीज बीमारी ने उनकी याददाश्‍त और बोलने की क्षमता को समाप्‍त कर दिया था.

आगे क़ाजी साहब के बारे में कुछ लिखूं उससे पहले ये गीत जिसे मूल बंगला से अनुवाद अनामिका घटक ने किया है - 

आज भी रोये वन में कोयलिया
चंपा कुञ्ज में आज गुंजन करे भ्रमरा -कुहके पापिया
प्रेम-कुञ्ज भी सूखा हाय!
प्राण -प्रदीप मेरे निहारो हाय!

कहीं बुझ न जाय विरही आओ लौट कर हाय!
तुम्हारा पथ निहारूँ हे प्रिय निशिदिन
माला का फूल हुआ धूल में मलिन

जनम मेरा विफल हुआ
  ।



अब सुनिए ऐतिहासिक दृटिकोण से क़ाजी साहब के बारे में -

कभी पहले विश्‍वयुद्ध में ब्रिटिश आर्मी में रहते हुए लड़ने वाले नजरूल इस्लाम बाद में अंग्रेजी शासन, कट्टरता, सांप्रदायिकता और शोषण के खिलाफ अपनी कलम के माध्यम से लड़ने लगे. उन्होंने अपने लेखन के जरिए अंग्रेजों की बहुत आलोचना की और भारत की आजादी की लड़ाई में जोर-शोर से भाग लिया जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने उनकी किताबों और अखबार के लेखों पर बैन लगा दिया. ये बातें आगे चलकर उनकी जेलयात्रा का कारण भी बनीं.

नजरुल को आज भी एक विद्रोही कवि के रूप में जाना जाता है. जिसकी कविताओं में आग है और जिसने जिंदगी के हर पहलू में हो रहे अन्याय के प्रति अपनी आवाज उठाई.

हिंदी में उनकी कविता 'विद्रोही' का स्वतंत्र रूपांतर 1937 में हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक 'रामविलास शर्मा' द्वारा किया गया था. जो इस तरह है-

बोलो बीर...
बोलो उन्नत मम शिर!
शिर निहारि आमार, नत शिर! अए शिखर हिमाद्रिर
बोलो महाविश्र्वेर महाकाश फाड़ि
चन्द्र, सूर्य, ग्रह, तारा छाड़ि
भूलोग, दूयलोक, गोलोक भेदिया
खुदार आसन 'आरस' छेदिया
उठियाछि चिर-विस्मय आमि विधात्रीर!
मम ललाटे रुद्र भगवान ज्वाले राज-राजटीका दीप्त जयश्रीर!
बोलो बीर...

नजरुल की कलम को दबाने की अंग्रेजों ने लाख कोशिशें कीं. फिर भी न दबाए जा सकने वाले नजरुल ने महान साहित्य लिखने के साथ-साथ शोषित लोगों और सांप्रदायिकता के खिलाफ काम जारी रखा, भारत की गंगा-जमुनी तहजीब से प्रेरणा ली. नजरुल फारसी और हिंदू दोनों ही धर्मों से अच्छी तरह परिचित थे.

उन्होंने स्वयं एक हिंदू महिला से शादी की, जिनका नाम प्रोमिला था. उनकी रचनाओं में संस्कृत, अरबी और बांग्ला तीनों ही संस्कृतियों का प्रभाव दिखाई पड़ता है. काजी नजरुल उत्सवधर्मी भी थे. कहा जाता है कि बंगाल और बांग्लादेश में उनके लिखे इस गीत के बजे बिना ईद पूरी ही नहीं होती.

20 सालों के छोटे से रचनात्मक काल में उन्होंने कई प्रमुख रागों पर गीत रचे. जिनकी संख्या 4 हजार से ज्यादा है. 'नजरुल गीति' नाम से नजरुल के गीतों का संकलन है.

उनकी गजलों ने बांग्ला को समृद्ध तो किया ही है. अरबी/ फारसी शब्दों को लेखन में अपनाकर एक नई तरह की संस्कृति की नींव भी डाली. उन्होंने कलकत्ता में ऑल इंडिया रेडियो में काम करते हुए उन्होंने कई संगीतकारों को गढ़ा जिन्होंने आगे चलकर बहुत नाम किया.

अधिकांश महान साहित्यकारों की तरह बच्चों के लिए भी उन्होंने कई कविताएं, गीत और लोरियां लिखी हैं. उनकी लिखी ये छोटी सी बाल कविता पढ़ें, जो आज भी 'पश्चिम बंगाल' और 'बांग्लादेश' में हर बच्चे के बचपन का हिस्सा होती है

बीमारी के दौरान उन्‍हें 'नजरूल ट्रीटमेंट सोसाइटी' जिसमें श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे, द्वारा 1952 में रांची में इलाज के लिए लाया गया, बाद में उन्हें और उनकी पत्नी प्रोमिला को इलाज के लिए लंदन भी भेजा गया, फिर वहां से वो वियना भी गए. जहां पता चला कि नजरूल को 'पिक डिजीज' नाम की बीमारी है. जो लाइलाज होती है. फिर वे लोग वापस बांग्लादेश लौट आए.

बांग्लादेश में ही रहते हुए 29 अगस्त, 1976 को उनका देहांत हो गया. जैसा कि उन्होंने अपनी एक कविता में इच्छा जाहिर की थी, उन्हें ढाका यूनिवर्सिटी के कैंपस में एक मस्जिद के बगल में दफनाया गया.

काजी नजरूल इस्लाम भारत रूपी पौधे की एक ही शाख के दो फूल 'हिंदू' और 'मुसलमानों' को बताया करते थे. काजी नजरुल इस्लाम कवि की सह्रदयता पर जोर देते थे पर उनकी कविताएं इतनी भी आदर्शवादी नहीं थीं. दरअसल नजरूल सहअस्तित्व, सौहार्द और प्रेम के समर्थक एक भावुक कवि थे.

देखिए उनकी एक कविता देखिए-

नेताओं को चंदा चाहिए और गरीब लोग
भोजन के लिए बचाया हुआ पैसा लाकर दे देते हैं
बच्चे भूख से रोने बिलबिलाने लगते हैं.
उनकी मां कहती है: 'अरे अभागों, चुप हो जाओ!
देखते नहीं, वह स्वराज्य चला आ रहा है!'
पर भूख से व्याकुल बच्चा स्वराज्य नहीं चाहता,
उसे चाहिए पेट में डालने के लिए थोड़ा सा चावल और नमक
दिन बीतता जाता है, बेचारे बच्चे ने कुछ नहीं खाया है,
उसके सुकुमार पेट में आग जल रही है.
देखकर, आंखों में आंसू भरकर, मैं पागलों की तरह दौड़ जाता हूं,
स्वराज्य का नशा तब न जाने कहां गायब हो जाता है.

नजरुल का प्रभाव और पहुंच इतनी व्यापक थी कि नजरुल का करियर खत्म होने के बहुत बाद 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में नजरूल की कविताएं विद्रोहियों के लिए महान प्रेरणा का स्त्रोत बनीं. नजरुल इस्लाम से बांग्लादेश का मानस इतना प्रभावित था कि नजरुल को बांग्लादेश का राष्ट्रीय कवि बना दिया गया.

यहां  तक  कि ठाकुर रबींद्रनाथ टैगोर भी नजरुल की आग उगलती लेखनी से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने खुद से लगभग 40 साल छोटे नजरुल को अपनी एक किताब समर्पित की थी.

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 13 मई 2017

बेसन की सोंधी रोटी... के बाद की यात्रा

आज मातृदिवस पर कुछ लिखना था तो सोचा वही क्‍यों ना लिखूं जो कई सालों से मन को बींधता आया है। बाजार और सोशल मीडिया जैसे प्‍लेटफॉर्म लीक पर चलते हुए बखूबी सारे ''दिवस'' मनाते हैं मगर वे उन प्रश्‍नों के उत्‍तर तो कतई नहीं दे पाते जो हमारे लिए बेहद अहम हैं...हमारे लिए यानि बच्‍चों के साथ-साथ हम मांओं के लिए भी...

यूं तो मैं इस विषय पर तभी से लिखने की सोच रही थी जब से उत्‍तरप्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने पद संभाला और अपनी पार्टी के संकल्‍प पत्र का एक वायदा पूरा करते हुए एंटी-रोमियो स्‍क्‍वायड का गठन किया।  एंटी-रोमियो स्‍क्‍वायड ने एक ओर जहां स्‍कूल-कॉलेज और तिराहों-चौराहों के आसपास मंडराने वाले शोहदों को पकड़-पकड़ कर उन्‍हें उनके घर वालों के सुपुर्द किया गया तो दूसरी ओर कई केस भी दायर किए। हमेशा की तरह विपक्ष के कुछ नेताओं ने इन शोहदों पर दया दिखाई तो कुछ ने इसे स्‍वतंत्रता में बाधा डालने वाला कदम बताया मगर किसी ने ये नहीं सोचा कि आखिर ये स्‍थिति आई क्‍यों? जो काम घर वालों को करना चाहिए था, उसे शासन को क्‍यों करना पड़ा। हम भले ही इसके लिए कानून व्‍यवस्‍था को दोषी मानते रहें मगर सच यह है कि सरकारों से ज्‍यादा दोष परिवारों का रहा है।
हम चूके हैं, हमारे संस्‍कार और हमारा पारिवारिक ढांचा चूका है, साथ ही इन सबसे ज्‍यादा हमारी मांएं चूकी हैं।

बच्‍चे के भाग्‍य का निर्माता ईश्‍वर है तो सांसारिक विधिविधान सिखाने को ''मां'' हैं, मां ही सिखाती है कि किससे कैसे व्‍यवहार किया जाए। इसीलिए मां को ईश्‍वर के बच्‍चे के नौतिक-अनैतिक कार्य की जिम्‍मेदारी मां की होती है। जब लायक बच्‍चे का श्रेय सब मां को देते हैं तो उसकी नालायकी का जिम्‍मा भी उसे अपने ही सिर लेना होगा।
हमारे ब्रज में कहावत भी है ना कि ''चोर नाय चोर की मैया ऐ मारौ''। मांएं अपनी परवरिश व जिम्‍मेदारी का बोझ सोशल मीडिया या अन्‍य इलेक्‍ट्रॉनिक संसाधनों पर नहीं डाल सकतीं क्‍योंकि बच्‍चे तो साधनहीन परिवारों के भी बिगड़ते हैं। तो चूक कहां है, जीवन की निर्मात्री से चूक तो हुई है और अभी भी होती जा रही है। कानून व्‍यवस्‍था, पारिवारिक विसंगतियों जैसे बहानों से कब तक मांएं अपने आपको कंफर्ट जोन में रखती रहेंगी।

कुछ दिन पहले निर्भया गैंगरेप का फैसला आया, चारों अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई। एक दर्दनाक हादसे की मुकम्‍मल तस्‍वीर, और इसके दोनों पहलू हमारे सामने। सजा दिलाने वाले और पाने वाले अपने-अपने तरीके से फैसले की व्‍याख्‍या कर रहे थे। तस्‍वीर के एक पहलू में निर्भया की मां कह रही थी कि कोर्ट ने इंसाफ किया और मीडिया ने उस इंसाफ की लड़ाई में उसका भरपूर साथ भी दिया। वहीं फांसी की सजा पाए चारों बलात्‍कारियों की मांएं कह रही थीं कि हमारे साथ अन्‍याय हुआ है। दोनों ओर मांएं अपनी अपनी संतानों के लिए दुखी व संतप्‍त होती रहीं मगर अपराध करने वालों ने ये एक बार भी सोचा कि वो जो कर रहे हैं यदि उनकी अपनी मां उस जगह हो तो...? नहीं, उन्‍होंने नहीं सोचा तभी तो ऐसे जघन्‍य अपराध को अंजाम दिया जिसने देश से लेकर विदेश तक हाहाकार मचा दिया।

उनका कृत्‍य देखकर ही कानून को अपना काम करना पड़ा, यदि मांओं ने अपना काम किया होता और इन अभागों की परवरिश सही तरीके से की होती तो ऐसी नौबत आने का सवाल ही कहां था। इसी प्रकार जब किन्‍हीं शोहदों को एंटी-रोमिओ स्‍क्‍वायड पकड़ती है उंगलियां उनके घर वालों और खासकर मां की ओर भी उठती हैं। इसलिए मानना तो पड़ेगा कि चूक कहीं न कहीं जीवन की निर्मात्री से भी होती है।

हर साल 14 मई को मातृ दिवस मनाने वाले हम, अपनी मांओं के प्रति कृतज्ञता प्रगट करते हैं, करनी भी चाहिए मगर इस कृतज्ञ भाव में वे कर्तव्‍य नहीं भुलाए जाने चाहिए जो समाज को ''और अच्‍छा व निष्‍कंटक'' बना सकें। जिनसे हमारे बच्‍चे निर्भय होकर सड़कों व गली-चौराहों पर घूम सकें।

मैं भी मां हूं और अपनी मां के कर्तव्‍यों के कारण, उनकी मेहनत के कारण आज मैं अपने शब्दों को अपने विचारों का माध्‍यम बना पा रही हूं, जब अपना बचपन अपनी शिक्षा का दौर याद करती हूं तो कई बार ऐसा लगता है कि ये कृतज्ञता शब्‍द बहुत नाकाफी है मेरी मां के लिए। मगर हमें सिर्फ अपनी-अपनी मां के प्रति कृतज्ञ होने के साथ ही अपने प्रति भी कोई संकल्‍प लेना होगा ताकि भविष्‍य में किसी निर्भया को इतनी भयंकर मौत ना मरना पड़े और ना किसी के बेटे फांसी पर झूलें। इसके लिए बहानों को दफन करना होगा। आधुनिकता, संस्‍कार, शिक्षा और मातृप्रेम में सामंजस्‍य बैठाना होगा।

चलिए मातृ दिवस पर आप भी पढ़िए निदा फाज़ली की एक बेहद खूबसूरत रचना क्‍योंकि मां का स्‍वरूप आज भले ही बदल रहा हो मगर हमारे जीवन में उनकी मौजूदगी ऐसी ही है जैसी कि निदा साहब ने बताई है-


बेसन की सोंधी रोटी

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुँकनी जैसी माँ

बान की खूर्रीं खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ

चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखें जाने कहाँ गईं
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ


- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 10 मई 2017

बेलगाम बरकती

ये कैसा  पागलपन है, ये कैसी बदहवासी है कि भाजपा और संघ में शामिल होने वाले  मुसलमानों के खिलाफ टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्मद नूरूर रहमान  बरकती ने फतवा जारी करते हुए कहा है कि भाजपा या आरएसएस (संघ) में शामिल होने वाले  सभी मुसलमान सजा के हकदार होंगे।

बरकती ने कहा कि वे ट्रिपल तलाक पर अपनी लड़ाई जारी रखेंगे, क्योंकि यह शरियत के तहत  बीते 1500 वषों से लागू है। फतवा जारी कर सुर्खियों में रहने वाले टीपू सुल्तान मस्जिद के  शाही इमाम सैयद मोहम्मद नूरूर रहमान बरकती ने उन सभी मुसलमानों के खिलाफ फतवा  जारी किया, जो भाजपा या आरएसएस (संघ) में शामिल होते हैं।

फतवों के इस मास्‍साब को ये नहीं पता कि पानी जब सिर से ऊपर चला जाता है तो आदमी  डूबने लगता है और हर एक डूबने वाले को तैरकर उबरने का मौका नहीं मिलता, खासकर तब  जबकि वैमनस्‍यता का बोझ उसके सिर पर तारी हो चुका हो। 

बरकती ने एक के बाद एक फतवे दिए जाने का रिकॉर्ड कायम किया है। और इनके आने का  सिलसिला बदस्‍तूर जारी है। फिलहाल, दूर-दूर तक कोई उम्मीद भी नहीं है कि ये अभी थमेंगे  भी। और ये थमें भी तो तब, जबकि आम मुसलमान फतवे जारी करने वाले घोर प्रतिक्रियावादी  मुल्लाओं के खिलाफ खड़े हों।

मुसलिम समाज के भीतर इस तरह की कोई हलचल नहीं दिख रही है, इससे तो ऐसा लगता है  कि मुसलिम समाज या तो इन फतवों को लेकर निर्विकार भाव पाले हुए है या मुल्लाओं की  दहशत इन्हें सता रही है।

ताजा फतवा कल मंगलवार को सामने आया जब कि टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम  सैयद मोहम्मद नूरूर रहमान बरकती ने कहा कि संघ के साथ कोई भी सहयोग मुसलमानों को  कड़ा दंड का सहभागी बनाएगा। वे (मुसलमान) कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस या माकपा जैसी किसी  भी अन्य पार्टी में शामिल हो सकते हैं।

बकौल इमाम संघ लोगों को मार रहा है, ईसाई, दलित और मुसलमानों को संघ निशाना बना  रहा है, इसलिए मुसलमानों को भाजपा और संघ में शामिल नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि  हम संघ और उसके गुंडों का सामना करने के लिए सभी धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं को भी एक साथ  आने का आह्वान करते हैं, अन्यथा हम देश में जेहाद की घोषणा करेंगे।

इससे पहले बरकती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी फतवा जारी करते हुए मोदी की  दाढ़ी काटने वाले को या उन पर काली स्याही फेंकने पर पच्चीस लाख रुपए का इनाम रख  दिया था। देखिए कि कितना खतरनाक है यह फतवा। वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता  बनर्जी के घोषित रूप से खासमखास हैं।

हालांकि तब मुंबई के मदरसा-दारुल-उलूम अली हसन सुन्नत के मुफ्ती मंजर हसन खान  अशरफी मिस्बही ने मोदी के खिलाफ जारी उनके फतवे को सिरे से खारिज कर दिया था।
उन्होंने शाही इमाम के नमाज अदा करने के हक पर भी सवाल खड़े कर दिए। मिस्बही ने दावा  किया कि बरकती मुफ्ती हैं ही नहीं और उन्हें अपनी राजनीतिक राय को फतवे के तौर पर पेश  कर उसकी पवित्रता को खत्म करने की कोशिश हरगिज नहीं करनी चाहिए। 

निश्‍चित ही अकारण और बात-बात पर जारी फतवे अब पर्सनल टसल का माध्‍यम बन रहे हैं।  मध्यवर्गीय मुसलमान इन फतवे जारी करने वालों के खिलाफ चुप हैं, उनकी चुप्पी देश की  संवैधानिक रुतबे के लिए शर्मनाक है।

मुझे पाकिस्तानी मूल के प्रख्यात पत्रकार-लेखक और विचारक (वैसे वह खुद को पाकिस्‍तानी  नहीं मानते) तारिक फतह का एक इंटरव्यू याद आ रहा है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘भारत  में ‘अल्ला का इस्लाम’ नहीं, ‘मुल्ला का इस्लाम’ चलाया जा रहा है जिसका मजहब से कोई  वास्ता ही नहीं है।’’ वास्ता है सिर्फ वास्ते की राजनीति से।

बात सिर्फ इमाम बरकती की नहीं उन जैसी कुंद सोच वाले तमाम इमामों की भी है जो देवबंद  सरीखे मुसलमानों के महत्त्वपूर्ण केंद्र से ''फतवों'' को जारी कर समाज को पिछड़ा बनाए रखने  के लिए इसका इस्‍तेमाल करते हैं।

इसी देवबंद ने कुछ समय पहले महिलाओं और पुरुषों के एक साथ काम करने को भी अवैध  बताया गया था।

जरा सोचिए कि किस अंधेरे युग में अब भी रहते हैं फतवे देने वाले। पर किसी भारतीय  मुसलमान ने इस फतवे की निंदा नहीं की। इसी तरह से देवबंद ने अपने एक और फतवे में  कहा कि इस्लाम के मुताबिक सिर्फ पति को तलाक देने का अधिकार है और पत्नी अगर  तलाक दे भी दे, तो वह वैध नहीं है।

दरअसल, एक व्यक्ति ने देवबंद से पूछा था, पत्नी ने मुझे तीन बार तलाक कहा, लेकिन हम  अब भी साथ रह रहे हैं, क्या हमारी शादी जायज है? इस पर देवबंद ने कहा कि सिर्फ पति की  ओर से दिया गया तलाक जायज है और पत्नी को तलाक देने का अधिकार नहीं है।

जब सारा संसार स्त्रियों को जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी देने के लिए कृतसंकल्प है तब देवबंद  औरत को दोयम दर्जे का इंसान बनाने पर तुला है।

एक और उदाहरण देखिए कि देवबंद ने अंगदान और रक्तदान को भी इस्लाम के मुताबिक  हराम करार दे दिया। देवबंद से पूछा गया था कि रक्तदान करना इस्लाम के हिसाब से सही है  या गलत? इसके जवाब में देवबंद ने कहा, शरीर के अंगों के हम मालिक नहीं हैं, जो अंगों का  मनमाना उपयोग कर सकें, इसलिए रक्तदान या अंगदान करना अवैध है। इन फतवों को सुन  कर तो यही लगता है देवबंद मुसलमानों को किसी और दुनिया में लेकर जाना चाहता है।

''फतवा यानी वो राय जो किसी को तब दी जाती है जब वह अपना कोई निजी मसला लेकर  मुफ्ती के पास जाता है। फतवा का शाब्दिक अर्थ असल में सुझाव है, यानी कोई इसे मानने के  लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। यह सुझाव भी सिर्फ उसी व्यक्ति के लिए होता है और वह  भी उसे मानने या न मानने के लिए आजाद होता है। इसे आलिम-ए-दीन के शरीअत के  मुताबिक जारी किया जाता है।''

मगर जिन मुद्दों पर जिस तरह के फतवे आते हैं, उनसे साफ है कि इन्हें जारी करने वाले  अपने समाज को घोर अंधकार के युग में ही रखना चाहते हैं, शायद यह मुल्लाओं द्वारा चलाई  जा रही ‘वोट बैंक की राजनीति’ के लिए मुफीद भी है।

दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी भी लंबे समय से मनचाहे फतवे देते  रहे हैं। उनकी आदत में शामिल है कि चुनावी मौसम में तो फतवा किसी दल विशेष के पक्ष या  विपक्ष में दिया ही जाता है।

यह भी सच है कि फतवे मुसलमानों पर ‘बाध्यकारी’ तो नहीं होते पर इनसे एक नकारात्मक  माहौल जरूर बन जाता है। इस्लाम के अधिकतर धर्मग्रंथ अरबी में उपलब्ध हैं। इन धार्मिक  पुस्तकों तक सामान्य मुसलमानों की पहुंच नहीं है। इस पृष्ठभूमि में मुसलमानों को जो इमाम  और मौलवी बताते हैं, वे उसी पर यकीन कर लेते हैं इसलिए बहुत-से मुसलमान फतवों पर  अमल करना शुरू कर देते हैं। यही समस्या की जड़ है।

अब सुप्रीम कोर्ट में कल से ट्रिपल तलाक पर हर रोज सुनवाई शुरू होने जा रही है तब बरकती  का इसके खिलाफ भी ये कहना कि हम इसे शरिया के खिलाफ समझते हैं, बेहद ही अहमकाना  हरकत है जो न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है बल्‍कि उन औरतों को भी ''कब्‍जे'' में रखने  की कोशिश भी है जो बमुश्‍किल अपनी लड़ाई अपने बूते लड़ रही हैं। देखना यह होगा कि  फतवों के इन मास्‍साब का फतवा ट्रिपल तलाक पर कितना असरकारी होता है या कि सीला  हुआ पटाखा निकलता है।

और अब चलते चलते राहत इन्दौरी का ये शेर बरकती के इस फतवे के नाम -

लफ़्ज़ों के हेर-फेर का धंधा भी ख़ूब है,
जाहिल हमारे शहर में उस्ताद हो गए।


-अलकनंदा सिंह

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