बुधवार, 15 मार्च 2017

नाक पै आफत

अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस गुजर गया, होली भी हो ली और हुरंगा भी... मगर इस बीच कुछ घटनाऐं ऐसी  घटीं जिनसे बात बात में 'नाक' आड़े आई। कहीं तीन तलाक मामले में मुस्‍लिम महिलाओं ने उलेमाओं  की नाक को नीचा किया तो कहीं महिला प्रधान फिल्‍मों पर सेंसर बोर्ड की नाक नीची हुई और चलते  चलाते इन दोनों ही बदलावों में 'नाक' की आफत आ गई।

बड़ी नाइंसाफी है रे...कि चेहरे पर मौजूद एक अदने से अंग को लेकर गांव के गांव रंजिशों में स्‍वाहा हो  रहे हैं। अरे भई! नाक को लेकर हम इतना सेंसिटिव क्‍यों हैं। नाक को स्‍त्रीलिंग क्‍यों माना गया और  माना गया सो तो ठीक मगर इज्‍जत के साथ नाक को क्‍यों जोड़ा गया। ज़ाहिर है जब स्‍त्रीलिंग माना  गया और इज्‍ज़त से जोड़ा गया तो इसका ठीकरा महिलाओं के माथे फूटना था।

विशेषणों में ज़रा देखिए नाक का सवाल, नाक का बाल, नाक बहना, नाक में दम, नाक की बात, ऊंची  नाक, नकटी नाक, नाक नीची आदि जो भी मुझे याद आ रहा सभी में स्‍त्रीलिंग को दोषी या कारक  बताया गया है।

फिर सवाल उपजता है कि नाक कटना या नाक नीची होने को स्‍त्रियों के माध्‍यम से पुरुषों  द्वारा   हासिल इज्‍ज़त से जोड़ा जाना क्‍या ठीक है। क्‍या पुरुषों के अंदर इतनी हिम्‍मत नहीं या ताकत नहीं कि  वे अपने बल पर अपनी नाक खुद ऊंची कर सकें और अपनी इज्‍जत खुद कमा सकें।

परिवार की सबसे पहली इकाई घर है जहां महिलाऐं स्‍वयं को सुरक्षित समझती हैं, होती हैं या नहीं, यह  अलग बात है। यह हमेशा की तरह अब भी यक्ष प्रश्‍न है जिसका अधिकतर उत्‍तर हां में होता है मगर  इस हां में भी नाक अपने पूरे रुतबे के साथ मौजूद रहती है। जहां इस घरेलू सुरक्षा का कवच ना में  बदलता है वहीं नाक कटती है, नीची होती है यानि सवाल यहां भी नाक का ही है महिलाओं की सुरक्षा  का नहीं क्‍यों कि नाक यहां भी पुरुष की अस्‍मिता से चिपकी हुई रहती है। पारिवारिक परंपरा में कम ही  उदाहरण ऐसे देखने को मिले कि पुरुष की वजह से नाक कटी हो, नाक नीची हुई हो, हां नाक में दम  अवश्‍य देखा जा सकता है।

इस तरह महिलाओं की सुरक्षा में नाक के विशेषणों का महत्‍वपूर्ण योगदान है। नाक नहीं जानती कि  महिलाओं को सुरक्षा शारीरिक स्‍तर के साथ मानसिक सुरक्षा भी चाहिए जो यह महसूस कराए कि वे जो  चाह रही हैं, मांग रही हैं, कह रही हैं, लिख रही हैं, वह हकीकतन ज़मीन पर उतरना चाहिए।
वो जो अहसास कर रही हैं उसे ज़ाहिर भी करा पाएं।

घर हो या बाहर, घरेलू हो या कामकाजी हर हाल में स्‍त्रियों को अपनी रक्षा खुद ही करनी होती है-  शारीरिक स्‍तर पर भी और मानसिक स्‍तर पर भी। मानसिक स्‍तर पर असुरक्षा का अहसास ही 'नाक के  नाम पर' महिलाओं को सुरक्षित ''दिखाता'' है।

बहुत पुरानी उक्‍ति है-
"जो व्यक्ति केवल आपकी ख़ुशी के लिये अपनी हार मान ले,
उससे आप कभी जीत ही नहीं सकते"...

नाक का भी यही हाल है। नाक के बूते जो भी इज्‍ज़त घरों से लेकर समाज तक बनाई जाती है वह ही  नाक में दम की वजह भी बनती रही है।
बहरहाल, इज्‍जत के लबादे को ओढ़े महिलाऐं क्‍या लिख रही हैं, क्‍या बोल रही हैं, क्‍या हासिल कर रही  हैं, कृपया इसे अब बेचारी नाक से ना जोड़ा जाए। मीडिया के विभिन्‍न माध्‍यमों में लिखे गए शब्‍द बता  रहे हैं कि इज्‍ज़त-बेइज्‍ज़ती का ठीकरा नाक पर फोड़ नाक को तो बेवजह घसीटा जाता रहा है।

अभी तक तो नाक बचाए रखने के नाम पर सामाजिक ठेकेदारों को ''ताकत'' महिलाओं द्वारा ही बख्‍शी  जाती रही है। मगर अब अपनी इज्‍ज़त का प्रदर्शन करने के लिए नाक को बीच में ना लाइये और अपनी  हिम्‍मत को अपने बूते ही साबित कीजिए। आमने सामने की बात होने दीजिए।
मनुष्‍य के शरीर का एक अदना सा अंग बेचारी ''नाक'' को स्‍त्रियों की अस्‍मिता, खानदान का नाम और पुरुषोचित अहंकार पर बेवजह बलि चढ़ाई जा रही है, ये अच्‍छी बात नहीं। नाक की भी अपनी अस्‍मिता है, स्‍वतंत्रता है, गुण हैं। नाक को नाक ही रहने दीजिए। इज्‍ज़त, सवाल, कटना, बाल, ऊंची, नीची जैसे अलंकरणों की ज़रूरत नहीं।

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 11 मार्च 2017

क्रोध लाल रंग, ईर्ष्‍या हरे रंग, आनंद जीवंतता पीले रंग से जुड़े होते हैं

श्री श्री रविशंकर  ने  कहा कि चैतन्य होकर हम अज्ञानता और नकारात्मकता के काले रंग को मिटा सकते हैं। इससे हमारे जीवन में आनंद और जीवंतता के पीत रंग के साथ-साथ और भी कई रंग भर जाते हैं। इस आनंद का उत्सव शरीर और मन के साथ-साथ चेतना भी मनाती है
होली (13 मार्च) पर श्री श्री रविशंकर का चिंतन…
संसार रंग भरा है। प्रकृति की तरह ही रंगों का प्रभाव हमारी भावनाओं और संवेदनाओं पर भी पड़ता है। हमारी प्रत्येक भावना एक निश्चित रंग से सीधी जुड़ी होती है। जैसे माना जाता है कि क्रोध लाल रंग से, ईष्र्या हरे रंग से, आनंद और जीवंतता पीले रंग से जुड़े होते हैं। गुलाबी रंग को हम प्रेम से, नीले को विस्तार से, सफेद रंग को शांति से, केसरिया  को त्याग से और जामुनी को हम ज्ञान से जोड़कर देखते हैं। कुल मिलाकर, प्रत्येक मनुष्य रंगों का एक फ व्वारा प्रतीत होता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा हिरण्यकशिपु प्रजा के बीच स्वयं को ईश्वर के रूप में स्थापित करना चाहता था, जबकि उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु-भक्त था। अपने पुत्र के विचारों को बदलने का हिरण्यकशिपु ने हर संभव प्रयास किया। बहन होलिका की गोद में बैठाकर उसे अग्निकुंड में भी जलाने का प्रयास किया, लेकिन वह विफल रहा। प्रह्लाद की भक्ति में इतनी गहराई थी कि पिता का कोई भी अनुचित कार्य उसे अपने विचारों से डिगा नहीं सका।
दरअसल, प्रह्लाद ने चैतन्य होकर अज्ञानता के काले रंग को मिटाने में पूर्ण सफलता पा ली थी। देखा जाए तो हिरण्यकशिपु स्थूलता का प्रतीक है और प्रह्लाद आनंद और श्रद्धा का प्रतीक है। चेतना को भौतिकता तक सीमित नहीं किया जा सकता। हिरण्यकशिपु भौतिकता से सब कुछ प्राप्त करना चाहता था। कोई भी जीव अपने विचारों की शक्ति से भौतिकता से परे हो सकता है।
होलिका अतीत की प्रतीक है और प्रह्लाद वर्तमान के आनंद का प्रतीक है। यह प्रह्लाद की भक्ति ही थी, जो उसे आनंद और जीवंत (पीत रंग) बनाए रखती थी। आनंद और जीवंतता के होने से जीवन उत्सव बन जाता है। भावनाएं आपको अग्नि की तरह जलाती हैं, पर यह रंगों की फु हार की तरह होनी चाहिए, तभी जीवन सार्थक होता है। अज्ञानता में भावनाएं कष्टकारी होती हैं, लेकिन ज्ञान के साथ जुड़कर यही भावनाएं जीवन में रंग भर देती हैं। जीवन रंगों से भरा होना चाहिए। हम कई भूमिका निभाते हैं।
ये भूमिकाएं और भावनाएं स्पष्ट होनी चाहिए, अन्यथा कष्ट निश्चित है। घर में यदि आप पिता का रोल निभा रहे हैं, तो अपने कार्यस्थल पर वैसा रोल नहीं निभा सकते। जब अलग-अलग भूमिकाओं का हम जीवन में घालमेल करने लगते हैं, तो फिर उलझने लगते हैं और गलतियां करने लग जाते हैं। जीवन में जो भी आप आनंद का अनुभव करते हैं, वह आपको स्वयं से ही प्राप्त होता है।
आपको जो जकड़ कर बैठा है, जब आप उसे छोड़कर शांत बैठ जाते हैं, तो इसी समय से आपकी ध्यानावस्था शुरू हो जाती है। ध्यान में आपको गहरी नींद से भी ज्यादा विश्राम मिलता है, क्योंकि आप सभी इच्छाओं से परे होते हैं। यह मस्तिष्क को गहरी शीतलता देता है और आपके तंत्रिका-तंत्र को पुष्ट करता है।
उत्सव चेतना का स्वभाव है, जो उत्सव मौन से उत्पन्न होता है, वह वास्तविक है। यदि उत्सव के साथ पवित्रता जोड़ दी जाए, तो वह पूर्ण हो जाता है। केवल शरीर और मन ही उत्सव नहीं मनाता है, बल्कि चेतना भी उत्सव मनाती है। इसी स्थिति में जीवन रंगों से भर जाता है।

प्रस्‍तुति : अलकनंदा सिंह 

सोमवार, 6 मार्च 2017

कंकाल के साथ

बचपन में पढ़े थे सुभाषितानि...हमें संस्‍कृत पढ़ाने वाले शास्‍त्री जी कक्षा में एक एक बच्‍चे को खड़ा करके एक एक श्‍लोक रटवाते थे, फिर उनके अर्थ और प्रयोग पूछते थे तब हमें ये कतई नहीं पता था कि इनका हमारे जीवन में किस तरह पग पग पर प्रयोग होगा और किस तरह हमें जीवन की अनेक  परीक्षाओं में सफल होने और असफलताओं के पीछे छुपे हुए कारण खोजने में ही सुभाषित हमारी मदद करेंगे।

शास्‍त्री जी तेज आवाज़ में रटाया करते थे समयोचित पद्यमालिका का ये श्‍लोक -

अतिरूपाद् हृता सीतातिगर्वाद्रावणो हत:।
अतिदानाद् बलिर्बद्ध: अति सर्वत्र वर्जयेत्।।

फिर हमसे इसका अर्थ भी पूछते थे-

अति रूपवान होने के कारण सीता का हरण हुआ, अति गर्व के कारण रावण मारा गया। अतिदानशीलता के कारण बलि को अपना सर्वस्‍व देना पड़ा, इसलिए किसी भी वस्‍तु, इच्‍छा और कार्य की अधिकता अच्‍छी नहीं मानी गई।

English Translation
Too much  beauty  is  what  lead to  the kidnapping od Sita] Ravana got killed beacause of too much Pride. Bali's Progress was curtailed because of too much  charity, oe should refrain from  "Too Much" of Anything.

शास्‍त्री जी के तब याद कराये हुए इस श्‍लोक के अंतिम भाग को तो  आज आप और हम हर दूसरे तीसरे वाक्‍य में उद्धृत करते रहते हैं कि अति सर्वत्र वर्ज्‍यते मगर इसके निहितार्थ को भूल सा गए हैं कि ''बैलेंस हर जगह जरूरी है'' चाहे वह निजी जीवन हो, प्रोफेशनल हो या फिर सार्वजनिक, गली हो, मोहल्‍ला हो या अपना घर ही क्‍यों ना हो। समाज से जुड़ी हर कड़ी में इस श्‍लोक की अनिवार्यता  देखी जा सकती है। जरूरत से ज्‍यादा भोजन, सुदरता, ज्ञान, शिक्षा, मेलजोल हो या फिर जरूरत से ज्‍यादा अकेले रहने की प्रवृत्‍ति। घातक सभी हैं।

इसी हफ्ते पहली खबर कोलकाता से और फिर दूसरी खबर आगरा से आई कि अपने प्रियजन के कंकाल के साथ रह रहे व्‍यक्‍ति की भी मौत हो गई। इनका शव घर में कई दिनों से सड़ रहा था, बदबू उठने पर पड़ोसियों द्वारा पहले पुलिस को बुलाया गया फिर दरवाजा खोला गया तो उनकी कहानी सामने आई। कहानी दोनों की ही एक सी थी।
दोनों ही घटनाओं में साम्‍य यह था कि अलग-अलग पृष्‍ठभूमि में रहने वाले ये ''अकेले'' कई कई दिनों तक वे ना तो घर से नहीं निकलते थे, दोनों ने ही ''अकेलेपन'' को अपना लाइफस्‍टाइल बना लिया था। कोलकाता में अकेला रहने वाला पुरुष था तो आगरा में महिला।

यूं तो अकेलेपन  के कई कारण हो सकते हैं। लोग अनेक कारणों से अकेलापन महसूस करते हैं, जैसे सामान्य सामाजिक परेशानी एवं सुविचारित एकाकीपन। कुछ लोगों को तो भीड़ में भी अकेलापन लगता है, क्योंकि वे उन लोगों से अर्थपूर्ण संबंध ही नहीं जोड़ पाते। सभी को कभी न कभी अकेलेपन का एहसास होता है, मगर अकेलेपन को किन्‍हीं भी परिस्‍थितियों में अच्छा नहीं माना गया।

हमारे समाज में संभवत: इसीलिए रिश्‍ते-नाते, दोस्‍ती और सामाजिक गतिविधियों को इतना महत्‍व दिया जाता रहा है। न्‍यूक्‍लिर फैमिली के रिवाज, पड़ोसियों से भी संबंध रखने को प्राइवेसी के नाम पर जिस अकेलेपन को पिछले कुछ दशकों से तरजीह दी जाती रही है, उसके अब दुष्‍परिणाम सामने आने लगे हैं। ये मेट्रो कल्‍चर हमारी मानसिकता पर हावी हो चला है।

इसके अलावा स्‍वयं को सर्वोत्‍कृष्‍ट मानने की जिद भी अकेलेपन का कारण बन रही है। मैं का प्रवेश जब व्‍यक्‍तित्व में होने लगता है तो दूसरे के दुखसुख, दूसरे की इच्‍छा गौण हो जाती है और जब यही ''मैं'' किसी कारणवश परास्‍त होता है तो अकेलापन घेरने लगता है। अपेक्षाओं की अधिकता, पूरा न हो की स्‍थिति में उपेक्षा का उपजना, इससे उपजी कुंठा और अवसाद और यही अवसाद ''अकेलेपन'' को जन्‍म देती है।

नितांत अकेलेपन के ''अतिवाद'' की ओर हमारा यूं बढ़ते जाना अब जानलेवा होता जा रहा है। समाज और हमारे अपनों के मानसिक स्‍वास्‍थ के लिए ये जरूरी है कि हम औरों की खबर भी लेते रहें, उनसे जुड़े रहें। उन्‍हें अपेक्षाओं के अतिवाद से बचाने के लिए उनमें सकारात्‍मक विचारों का प्रवेश करायें।

अब ये जानना जरूरी हो गया है कि कहीं हम आधुनिक बनने की बड़ी कीमत तो नहीं चुका रहे। सोचिए कि अपने परिवार और दोस्तों से आप कितना मिलते हैं, ये आपकी सेहत को काफ़ी प्रभावित करता है। अकेलापन आपको बीमार कर देता है और सिर्फ मानसिक रूप से नहीं, शारीरिक रूप से भी।

स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्‍टि से भी देखें तो एक अध्ययन 2006 में स्तन कैंसर की शिकार 2800 महिलाओं पर किया गया कि जो मरीज़ तुलनात्मक रूप से परिवार या दोस्तों से कम मिलती थीं, उनकी बीमारी और उससे मौत की आशंका पांच गुना ज़्यादा हो गई थी। इसी तरह शिकागो विश्वविद्यालय में मनोवैज्ञानिकों ने देखा कि सामाजिक रूप से अलग-थलग लोगों की प्रतिरोधक क्षमता में बदलाव हो जाता है तथा अकेले लोग रोज़मर्रा के कामों को ज़्यादा तनावकारी पाते हैं। बड़ी संख्या में स्वस्थ लोगों में सुबह और शाम के वक्त तनाव के हार्मोन कोर्टिसोल की मात्रा की जांच की। कोर्टिसोल तनाव के वक्त पैदा होने वाला एक हार्मोन है जो अकेले लोगों में ज़्यादा पाया गया।

यूं तो हमारी सांस्‍कृतिक और सामाजिक रवायतों में अकेलेपन से निबटने की कई विधियां मौजूद हैं, जैसे नए लोगों से मिलना, अपने एकांत का आनंद लेना और परिवार से पुनर्मिलन।

कारण और निदान हमें ही खोजना है कि अकेले होते हुए लोगों को उनके अपने ''अतिवाद'' से कैसे छुटकारा दिलाया जाए।

योग व आध्‍यात्‍म की ओर रुझान अकेलेपन को खत्‍म करने की गारंटी होता है मगर योग तक लाने के लिए उनकी सोच के अतिवाद को नीचे लाना होगा, क्‍योंकि अतिवाद कोई भी हो, कई कोणों से नुकसान पहुंचाता है  इससे जूझने के लिए शारीरिक, मानसिक स्‍तर पर भी काम करना होगा अर्थात् अति सर्वत्र वर्ज्‍यते के नुकसान अब वृहद रूप में हमारे सामने है।

अकेलेपन के शिकार लोगों के संदर्भ में मुझे अपने शास्‍त्री जी याद आ रहे हैं कि जो अति के नुकसान बताया करते थे। हम जब उनकी बात पूरी तरह नहीं समझ पाते थे ...तब भी वो थकते नहीं थे...फिर फिर कहते रहते कि- बिटिया एक और कहन सुनावैं तुमका...जो कबीर बाबा बोल गए कि-

अति का भला न बोलना,
अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना,
अति की भली न धूप।

तब शास्‍त्री जी की बात कुछ समझते, कुछ समझने का नाटक करते हम बच्‍चे आज इस तथ्‍य को अच्‍छी तरह समझ पा रहे हैं कि अकेलेपन की अति अर्थात् ''कंकालों के साथ रहने की प्रवृत्‍ति'' जब खबरों में आती है तो सोचने को बाध्‍य करती है कि हजारों साधु-संन्‍यासियों, सूफी संतों, बाबाओं, साध्‍वियों और मोटीवेशनल स्‍पीकर्स के रहते भी समाज में अकेलापन क्‍यों ज़हर बनता जा रहा है।
हम भी सोचें कि आसपास कोई अकेला ना रहे, और अपना ईगो छोड़कर उसको इस विकट स्‍थिति से बाहर लायें। इसके लिए कोई खास प्रयास नहीं बल्‍कि छोटी सी कोशिश की जरूरत है...बस।

-अलकनंदा सिंह




शनिवार, 4 मार्च 2017

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्‍मदिन आज: 'मैला आंचल' लिखकर रेणु ने रेणु की ही बात कही


रेणु का मतलब होता है बालू- रेत- रेती सो अपने नाम को सार्थक करते  वो धूल से सने रस्‍ते, गली गांव चौबारे से निकलती खुश्‍बुऐं, दामन को  बच बचाकर चलती बतकहियों और हकीकतों को समेटते रहे। जी हां !  'इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन  भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी – मैं किसी से दामन बचाकर नहीं  निकल पाया' कहने वाले फणीश्‍वर नाथ रेणु का आज जन्‍मदिन है।

उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु ने 'घर की बोली' की आंचलिक पहचान  को जनजन तक पैठ बनाने में जितनी विशेषज्ञता दिखाई वह उनके  शब्‍दों से आम जन को जोड़ती है। किसी भी जन समुदाय की  भलाई-बुराई को अत्‍यधिक प्रमाणिक उसकी अपनी बोली में रचे गए  साहित्‍य से ही तो आसानी से किया जा सकता है।

'रेणु' ने अपनी अनेक रचनाओं में आंचलिक परिवेश के सौंदर्य, उसकी  सजीवता और मानवीय संवेदनाओं - दृश्यों को चित्रित करने के लिए  उन्होंने गीत, लय-ताल, वाद्य, ढोल, खंजड़ी नृत्य, लोकनाटक जैसे  उपकरणों का सुंदर प्रयोग किया है। इतना ही नहीं 'रेणु' ने मिथक,  लोकविश्वास, अंधविश्वास, किंवदंतियां, लोकगीत- इन सभी को अपनी  रचनाओं में स्थान दिया है।


उन्होंने 'मैला आंचल' उपन्यास में अपने अंचल का इतना गहरा व  व्यापक चित्र खींचा है कि सचमुच यह उपन्यास हिन्दी में आंचलिक  औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति तो बन ही गया वरन  अमानवीयता, पराधीनता और साम्राज्यवाद का प्रतिवाद भी करता है।

अपने प्रथम उपन्यास मैला आंचल के लिये उन्हें पद्मश्री से सम्मानित  किया गया।

उनकी कहानी 'मारे गए गुलफ़ाम' पर आधारित फ़िल्म 'तीसरी क़सम'  को हममें से कोई भी नहीं भूल सकता। राजकपूर, वहीदा रहमान की  इस 'तीसरी क़सम' को बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था और इसके  निर्माता सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र थे। आज भी यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा  में मील का पत्थर मानी जाती है।

रेणु सरकारी दमन और शोषण के विरुद्ध ग्रामीण जनता के साथ प्रदर्शन  करते हुए जेल गये, आपातकाल का विरोध करते हुए अपना 'पद्मश्री' का  सम्मान भी लौटा दिया। इसी दौरान उन्‍होंने पटना में 'लोकतंत्र रक्षी  साहित्य मंच' की स्थापना के साथ उस समय भयानक रोग रेणु को  'पैप्टिक अल्सर' की गंभीरता को झेला, इस बीमारी के बाद भी रेणु ने  1977 ई. में नवगठित जनता पार्टी के लिए चुनाव में काफ़ी काम किया  परंतु 11 अप्रैल 1977 ई. को रेणु उसी 'पैप्टिक अल्सर' की बीमारी के  कारण चल बसे।

फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत  की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर  रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने  के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने  'बटबाबा' नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। 'बटबाबा' 'साप्ताहिक  विश्वमित्र' के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी  कहानी 'पहलवान की ढोलक' 11 दिसम्बर 1944 को 'साप्ताहिक  विश्वमित्र' में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी 'भित्तिचित्र  की मयूरी' लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है।  'रेणु' को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको  उनकी कहानियों से भी मिली। 'ठुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम रात्रि की  महक', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'अच्छे आदमी', 'सम्पूर्ण कहानियां',  आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।

फिलहाल ये सब इतिहास है जिसे आज की पीढ़ी सिर्फ सहेज सकती है,  उसे महसूस करना है तो रेणु की ही तरह ज़मीन पर उतर कर सोचना  होगा।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

ख़ुदा के वास्‍ते !: कविता- ये गरल तुम्‍हें पीना होगा

ख़ुदा के वास्‍ते !: कविता- ये गरल तुम्‍हें पीना होगा: सृष्‍टि की खातिर शिव ने तब एक हलाहल पीया था, अब एक हलाहल तुमको भी इसी तरह पीना होगा, समरस सब होता जाए, निज और द्विज में फर्क मिटे, आग्रह...

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

मतभेद या राष्‍ट्रभेद ?

''भारत तेरे टुकड़े होंगे, हम क्‍या चाहें- आज़ादी'' जैसे नारों ने पिछले साल तो बवाल मचाया ही, अब इस साल भी दिल्‍ली यूनीवर्सिटी के रामजस कॉलेज से जो कुछ शुरू हुआ है, उसे सिर्फ और सिर्फ देश में अस्‍थिरता लाने व सेना के खिलाफ एक ''खास सोच वाले'' तबके की शरारती सोच ही कहा जाएगा जो किसी ना किसी तरह खबरों में रहना चाहता है।
कोई एक कारण गिनायें ये कि इन्‍हें देशविरोधी मानसिकता का क्‍यों ना कहा जाए। कश्‍मीर में सालों पूर्व हुए रेपकांड को सेना के विरोधस्‍वरूप और कश्‍मीर की आजादी की बात करते हुए 22 फरवरी को कॉलेज में आइसा के छात्र सेमीनार के आयोजन का आखिर औचित्‍य क्‍या था। पत्‍थरबाजों के खिलाफ इनका मुंह क्‍यों नहीं खुलता, कश्‍मीरी पंडितों के लिए ये कोई अभियान क्‍यों नहीं चलाते। क्‍यों अफजल गुरू को अपना आदर्श मानते हैं।
तो क्‍या संविधान, संसद और न्‍यायपालिका से भी इनका विरोध है। क्‍यों नहीं ये लोग नक्‍सल प्रभावित क्षेत्रों में जाकर सरकार के साथ आदिवासियों के पुनर्वास का काम करते हैं। नक्‍सल समस्‍या के जड़ में गरीबी नहीं है, वह प्रवृत्‍ति है जो धन और हथियारों से पोषित होती है, ठीक कश्‍मीर की तरह। नोटबंदी ने काफी सच उगल भी दिया है, अब और क्‍या सच बाकी है कहने को।

उमर खालिद को बाकायदा बुलाया जाना, गुरमेहर से एबीवीपी के खिलाफ कहलवाया जाना कोई इत्‍तिफाक नहीं है, रणनीति के तह में वही हैं जो लाइमलाइट पसंद हैं। सवाल का जवाब तो हम जैसे आमजन भी जानना चाहते हैं कि क्‍यों रामजस जैसे ऐतिहासिक कॉलेज की फैकल्‍टी ने उमर खालिद को बुलाया। जो एबीवीपी ने किया उसे तो स्‍वयं फैकल्‍टी ने ही सामने परोसा ताकि असहिष्‍णुता, अवार्ड वापसी और जेएनयू, कन्‍हैया कुमार या नजीब अहमद के बाद जो खामोशी ''उनकी प्रोपेगंडा राजनीति'' में छा गई थी, वह फिर से चमके। जिस वामपंथ को पूरे देश में लगभग (केरल, त्रिपुरा को छोड़कर) नकारा जा चुका है और जो आउटडेटेड हो चुका है, उसे फिर प्रकाश में लाया जाये।

यदि ऐसा ना होता तो सिमी के एक्‍टिव मेंबर रहे पिता की औलाद व जेएनयू में छात्र नेता उमर खालिद ने बाकायदा कश्‍मीर के एक आतंकवादियों के हित में और सेना के विरोध में जो अभियान चलाया हुआ है, उसका प्रसार रामजस कॉलेज तक इस तरह ना पहुंचता।

ज़ाहिर है छात्र राजनीति होनी ही थी। बवाल हुआ, मारपीट हुई, पुलिसिया कार्यवाही भी हुई मगर इसी बीच रामजस कॉलेज में पढ़ने वाली कारिगल शहीद मंदीप सिंह की बेटी गुरमेहर ने सोशल मीडिया पर "I love this country and I am not frightened of anyone. I have got these threats many times. No one can threaten women, I will take a bullet for my country. This is not about politics, this is about students. No matter who you are, one cannot threaten women." लिखा जिसने सही जगह चोट की, अचानक जो उमर खालिद खबरों में नहीं था, जो अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता खबरों में नहीं थी, वह खबरों में आ गई। गुरमेहर का एक वाक्‍य तो सही है कि मैं किसी से नहीं डरती। सही बात है, आखिर कोई भी किसी से क्यों डरे? गुरमेहर से मेरा सवाल यह है कि उसे या उस जैसे अन्‍य छात्रों को एबीवीपी से डर क्यों लगता है?
रामजस के बवाल को शांत करने की बजाय इसकी आग में घी गुरमेहर ने एक बार और डाला। गुरमेहर ने आज फिर एक पोस्‍ट अपनी फेसबुक पर लिखी, हाथ में प्‍लकार्ड लिए हुए वही स्‍टाइल, एक जिस पर  लिखा था "Pakistan did not kill my dad, war killed him"। कितना वहियात सा वाक्‍य था यह, करगिल के शहीदों का अपमान है यह। सोशल मीडिया और तिस पर वो इलेक्‍ट्रानिक मीडिया जिसके सभी धुरंधर इस ताक में बैठे रहते हैं कि कब अपनी भड़ास निकालने का मौका मिले, उन्‍होंने प्राइम टाइम इसी के नाम कर दिया।
प्रश्‍न उठना लाजिमी है कि युद्ध के लिए हरवक्‍त जो सेना अपनी जान हथेली पर लिए सीमा पर मुस्तैद रहती है, देश के हर भूभाग को बचाने के लिए दिनरात एक किए रहती है यदि उसके अपने बच्‍चे ही उसकी राष्‍ट्रभक्‍ति पर सवाल उठाने लगेंगे तो देश की अखंडता किसी न किसी स्‍तर पर शर्मिंदा जरूर होती है। कहीं नक्‍सली, कहीं आतंकी, कहीं अलगाववादी, तो कहीं भारत से आजादी चाहने वाले सिर उठाते रहेंगे। अफजल गुरूओं को फिर संसद पर हमले की जरूरत क्‍या रह जाती है।

दुखद ही नहीं यह शर्मनाक भी है कि आज जब ‘भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी जंग रहेगी’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे लगाने वाले लोगों का समर्थन करने वालों के विरोध में कोई खड़ा होता है तो मीडिया उसे विलेन की तरह पेश करता है। अभिव्यक्ति की आजादी सबको है मगर देश के प्रति अपने दायित्व को नजरंदाज करके आजादी की बात करना बेईमानी है।

सही मायनों में विभिन्न संगठनों की राजनीति के चक्कर में देश के लिए अपने व्यक्तिगत सुख को त्याग कर शहादत स्वीकार करने वालों के बलिदान का उपयोग करना पूरी तरह से गलत है। उन बलिदानियों के बलिदान का सम्मान करना हमारी नौतिक जिम्मेदारी है। गुरमेहर से कुछ सवाल पूछे जाने चाहिए लेकिन ये सवाल दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली उस लड़की से नहीं हैं जिसके पिता शहीद हो गए। बल्कि सवाल उस बेटी से हैं जो स्कूल में पढ़ाई के दौरान पीटीएम में अपने पिता को मिस करती थी, जो हर त्योहार को इस उम्मीद में बिना पिता के मना लेती थी कि इस बार न सही लेकिन अगले त्योहार पर उसके पिता जरूर घर आएंगे, जो आज अपने पिता की तस्वीर देखकर उनकी शहादत पर गर्व करती है।

तो बताओ गुरमेहर कि क्या तुम्‍हारे पिता उन लोगों का समर्थन करते जो कहते हैं कश्मीर को, बस्तर को, पूर्वोत्तर के राज्यों को भारत से ‘आजादी’ दे देनी चाहिए?
आज अगर कश्मीर में आपके पिता पर कुछ ‘आजादी के परवाने’ पत्थर चला रहे होते तो क्या तुम उन पत्थरों को कश्मीरियों का गुस्सा करार देतीं?
तुम अपने जिस पिता की शहादत का राजनीतिकरण कर रही हो, क्या वह उन लोगों का समर्थन करते जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर पर नाजायज कब्ज़ा किया हुआ है?
क्या तुम्‍हारे पिता बुरहान वानी जैसे आतंकवादियों को शहीद अथवा आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाला मानते हुए उसके जनाजे में शामिल होने वालों का समर्थन करते?
क्या तुम उन लोगों से सहमत हो जो कहते हैं कि भारतीय सेना के जवान बलात्कारी हैं?
ऐसे बहुत से सवाल हैं, क्‍या दोहरी नीति पर चलने वाले कथित वामपंथियों में यह हिम्मत है कि वे इन सवालों का सामना कर सकें। जो रिसर्च के नाम पर भारी भरकम राशि सरकार से लेते हैं, हमारे टैक्‍स से पलते हैं और भारत के टुकड़े करने वालों को सेमीनार में बतौर अतिथि आमंत्रित करते हैं।

देश का दुर्भाग्य है कि एक शहीद की बेटी अपने पिता की शहादत को अपमानित कर रही है। वह स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर नहीं खोज पा रही। उसे शहादत का अर्थ ही नहीं समझ आ रहा है क्योंकि अगर उसे शहादत का दर्द पता होता तो वह उस दर्द को भी महसूस करती जो भारतीय सेना के जवानों को पत्थर खाते वक्त होता है। निश्‍चित ही हम किसी तरह की हिंसा के समर्थक नहीं, एबीवीपी के भी नहीं। जिस किसी ने कानून हाथ में लेने की कोशिश की है तो उसे सजा मिलनी चाहिए लेकिन इसके साथ ही एक सवाल भी कि जो देश को तोड़ने की बात करने वालों का समर्थन करते हैं, उनके लिए संवैधानिक मानवाधिकार की बात आखिर किस आधार पर?

दिल्ली के रामजस कॉलेज में तथाकथित एबीवीपी/वामपंथी कार्यकर्ताओं ने जिस तरह का हिंसक प्रदर्शन किया, उसकी भर्त्‍सना होनी चाहिए मगर साथ ही उन लोगों का विरोध भी जो कश्मीर को भारत का अवैध कब्जा बताने वालों का, देश विरोधी नारे लगाने वालों का, भारतीय सेना को रेपिस्ट कहने वालों का, राष्ट्र की एकता, अखंडता और अस्मिता पर प्रहार करने वालों का समर्थन करने वालों को मंच देने की बात करते हैं। जो लोग संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास नहीं करते, संविधान में दिए गए मौलिक दायित्वों यानी कर्तव्यों का पालन नहीं करते, उनका संविधान में दिए गए ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार’ पर अधिकार कैसे है?

आप भी सोचिएगा ज़रा...क्‍योंकि चुप्पी ऐसी उच्‍छृ़ंखलताओं को और बढ़ावा ही देगी।

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

हम भी आदि शंकराचार्य की भांति कह सकते हैं शिवोहम् ...शिवोहम् ...शिवोहम्


आज शिवचतुर्दशी=शिवरात्रि=शिवविवाह का दिन=शिव महिमा के चौतरफा गायन का दिन है, आज ही  से ब्रज में बरसाना की प्रसिद्ध लठामार होली की पहली चौपाई उठेगी जिसे लाड़ली महल से निकाल कर  रंगीली गली के शिव मंदिर तक लाया जाएगा और होली का जो जोर बसंत पंचमी से शुरू हुआ था वह  अपने चरम की ओर बढ़ता जाएगा।

कोयम्बटूर में आज ही ईशा फाउंडेशन के ईशा योग केंद्र द्वारा स्‍थापित की जा रही एक विशालकाय  शिव प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे।

हमेशा की तरह इन प्रसिद्ध मंदिरों के उत्‍सव और शिव भजनों के कोलाहल में जिस शिव तत्‍व को  अनदेखा किया जाएगा, वह किस तरह हमें प्राप्‍त हो सकता है, इस पर शायद ही कोई चर्चा होगी। ईशा  फाउंडेशन के सद्गुरू कहते हैं कि आदि योगी शिव ने मानवता को आत्‍मरूपांतरण की 112 विधियां भेंट  कीं, इसी के सम्‍मान में आदियोगी के 112 फुट ऊंचे दिव्‍य चेहरे को प्रतिष्‍ठित किया जाएगा।

कितना बचकाना है ये विचार। मेरे ख्‍याल से तो यह सिर्फ उसी राह को आगे बढ़ाने करने का ज़रिया है  जिसके तहत लोग ''ईश्‍वर को इंगित करने वाली उंगली ही पकड़ कर बैठ जाते हैं और उसे ईश्‍वर  समझ लेते हैं, जिसकी ओर उंगली उठाकर ''गुरू'' उसे बतौर ईश्‍वर प्रतिष्‍ठापित करते हैं और इस तरह  अनुयायियों की एक लंबी चौड़ी फौज खड़ी हो जाती है। गाहे-बगाहे सनातन धर्म की रक्षा की बातें या यूं  कहें कि प्रोपेगंडा किया जाता है ताकि धर्म का असली स्‍वरूप इन उंगली पकड़ने वालों की समझ में  कैसे भी ना आने पाए। फिर किसके कितने अनुयायी, किसके कितने मंदिर- मठ, किसके कितने ''5  स्‍टार भक्‍त'' और किसका कितना बाहुबल, कितनी संपत्‍ति आदि तो प्रतिस्‍पर्द्धा में होता ही है।

ऐसे में ''शिव'' और ''शिव तत्‍व'' का अध्‍ययन कौन करेगा, निश्‍चित ही कोई नहीं। शिव योगी थे तो  उस योग का मूल तत्‍व ''स्‍वयं पर नियंत्रण'', सर्वप्रथम इन मंदिर-मठ-गुरुओं के सानिध्‍य में नहीं बल्‍कि  ''स्‍वयं को स्‍वयं के द्वारा ही'' जानकर हो सकता है। प्रतिमाओं की स्‍थापना से हो सकता है कि आंखें  आश्‍चर्य से फटी की फटी रह जायें, हम कौतूहलवश ये तो कह सकते हैं कि ओह, कितनी विशाल है,  किस तरह बनाई गई होगी, कितना धन व्‍यय हुआ होगा परंतु इसे देखकर शिवतत्‍व पाने
की कामना नहीं जागेगी। कदापि नहीं।

आस्‍थाओं के बाजार के बीच शिव को समझने और हृदय के तल तक उतारने के लिए आदि गुरू  शंकराचार्य का उदाहरण देना चाहूंगी जो आज धर्म, गुरुओं और उनकी उंगली पकड़ने वालों के लिए  बिल्‍कुल सही बैठती है-

''आदि गुरू शंकराचार्य की जब अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका  परिचय मांगा। बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन  जाता है…

यह परिचय ‘निर्वाण-षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||1||

अर्थात्

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश,  भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…।
अब आप ही बताइये कि शिव के किस रूप को पाने के लिए हम इतने लालायित रहते हैं, जो हमारे  भीतर घुला हुआ है उसे हम विलग करके कैसे देख सकते हैं। और जो ऐसा देखने का प्रयास करते हैं  वह कोरा नाटक है क्‍योंकि शिव तो हमारे भीतर हर श्‍वास-नि:श्‍वास में है। प्रतिमाओं- मंदिरों-  मठों-सिद्धपीठों में ही यदि शिव विराजते तो ना तो शंकराचार्य होते और ना ही कबीर और सूर को  शायद ही कभी ब्रह्म का ज्ञान होता।

जहां तक बात है शिवचौदस पर लोक के मनोरंजन की तो जब मन आल्‍हादित होगा...प्रफुल्‍लित होगा...
तो ईश्‍वर तक उतनी ही सहजता से जा मिलेगा...शिव को भोला भंडारी इसीलिए तो कहा गया है कि  वो नाचना चाहता है तो नटराज बन जाता है गाना चाहता है तो विशिष्‍ट रागों का निर्माण करता  है...और प्रेमी ऐसा कि सती के विरह में संपूर्ण ब्रहमांड को उथलपुथल कर देता है और जब वह योग  साधना में रत होता है तो 112 विधियों को प्रतिपादित कर देता है...। हम लोक में सहज रहकर भी  शिव को अपने ''भोलेपन'' से पा सकते हैं।

स्‍वयं के ''शिव'' बनने की प्रक्रिया स्‍वयं को मिटाकर आती है, ''शिव तत्‍व'' को पाने की लालसा नहीं,  अनुभूति जाग्रत करनी होगी तभी शिव दर्शन हो सकता है और हम भी आदि शंकराचार्य की भांति कह  सकते हैं शिवोहम् ...शिवोहम् ...शिवोहम् ।

- अलकनंदा सिंह

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