गुरुवार, 27 मई 2021

बाहर आने लगी है “भगवानों” की संस्‍था #IMA के भीतर की गंदगी

 योग गुरू बाबा रामदेव द्वारा ऐलोपैथी को एक असफल चिकित्सा पद्धति कहे जाने के बाद से ऐलोपैथी डॉक्‍टरों की स्वयंसेवी संस्था “आईएमए” भड़की हुई है, इसकी उत्‍तराखंड शाखा ने तो योगगुरू पर 1000 करोड़ का मानहान‍ि केस तक दायर कर द‍िया है, साथ ही आईएमए के राष्‍ट्रीय महासचिव डॉ. जयेश लेले ने दिल्ली के आईपी एस्टेट थाने में शिकायत दर्ज कराई है, तो दूसरी ओर धर्मांतरण के लिए अपने कार्यालय का दुरुपयोग करने के लिए @IMAIndiaOrg प्रमुख डॉ जॉनरोस ऑस्टिन जयालाल के खिलाफ भी आपराधिक शिकायत दर्ज की गई है।

मैं आज यहां बाबा रामदेव के पक्ष में कुछ नहीं ल‍िख रही क्‍योंक‍ि ज‍िस तरह आधा सच नुकसान दायक होता है उसी तरह सही समय और सही मंच पर ना बोला सत्‍य भी गर‍िमाहीन हो जाता है, बाबा ने ऐसा ही सत्‍य बोला है।

इस पूरे घटनाक्रम में अब तक कथ‍ित “भगवानों” की संस्‍था “आईएमए” के भीतर की गंदगी, लोगों की सेहत से ख‍िलवाड़ करती देशद्रोही गत‍िव‍िध‍ियां सामने आ रही हैं। ऐलोपैथ‍ी से रोगों का इलाज़ करने वाले भारतीय डॉक्‍टरों के प्रत‍ि जनता के “अव‍िश्‍वास” को 327,207 डॉक्‍टरों की संस्‍था आईएमए के अपने रवैये ने और पुख्‍ता कर द‍िया है क‍ि उसे बाबा के बयान पर तो घोर आपत्‍त‍ि है परंतु वो उन प्रश्‍नों का जवाब नहीं देना चाहती जो स्‍वयं उसे ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।

जैसे क‍ि-

1. सरेआम ह‍िंदुओं का ईसाई धर्मांतरण करने में ल‍िप्‍त आईएमए के मौजूदा अध्‍यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टीन जयलाल के बयान क‍ि “सरकार और डॉक्‍टरों ने नहीं कोरोना को तो यीशु ने भगाया, इसल‍िए कोरोना से बचना है तो यीशु की शरण में आओ”, को क्‍या कहेंगे।

2. व‍िदेशी फार्मा कंपन‍ियों के साथ दशकों पुरानी लॉब‍िंग से भारी धन लेकर उनके प्रोडक्‍ट का प्रचार, आयुर्वेद सह‍ित अन्‍य च‍िक‍ित्‍सा पद्धत‍ियों के प्रत‍ि घृणा और भ्रम को बढ़ाना क्‍या है, इसके ल‍िए संस्‍था को व‍िदेशों से भारी रकम भी प्राप्‍त हुई।

3.  आईएमए ने 2007 में Pepsico कंपनी से 50,00,000 में उसके उत्‍पादों का व‍िज्ञापन करने का करार क‍िया जबक‍ि ट्रॉप‍िकाना जूस, सीर‍ियल, ओट्स सह‍ित उसके सभी प्रोडक्‍ट भारी कैलोरीज, बच्‍चों की लंबाई कम करने और मोटापा बढ़ाने वाले साब‍ित हुए। #CorporateDalals की भंत‍ि ब्रि‍टिश कंपनी Reckitt के उत्‍पाद Dettol Soap, Dettol व Lyzol को प्रचार‍ित क‍िया, इसी कड़ी में Dabur, ICICI , procter & gamble , Abbott india भी तो हैं।

4. इसी तरह एलईडी बल्ब, वॉल पेंट, पंखे, साबुन, तेल, वाटर प्यूरीफायर आदि को सर्टिफिकेट बांटना है? दरअसल रामदेव की वजह से उनकी दुकान बंद है, जिनकी स्थानीय/विदेशी कंपनियां पैसे से सर्टिफिकेट बांट रही हैं।

5. इसके अलावा प्लाईवुड, कोलगेट, टायलेट क्लीनर आदि प्रोडक्ट्स को बैक्टीरिया फ्री, वायरस फ्री और अमका फ्री ढिमका फ्री का सर्टिफिकेट भी तो आईएमए ही बांट रही है।

6. संस्‍था पदाध‍िकारी सह‍ित कमोवेश सभी ऐलोपैथ‍िक डॉक्‍टर्स व‍िदेश यात्रायें, बच्‍चों की पढ़ाई और मीट‍िंग्‍स,कॉ्रेंसेस तक स्‍पांसर कराते हैं, आख‍िर ये उसे कैसे जायज ठहरायेंगे। उनके पास फार्मा कंपनी के साथ साथ पैथ लैब्स,  मेडिकल र‍िप्र‍िजेंटेट‍िव, मेडिकल स्‍टोर्स के साथ साथ स्‍वयं की ऊंची फीस व हर स्‍टेप पर कमीशनखोरी से होने वाली अत‍िर‍िक्‍त कमाई के व्यवसायि‍क मॉडल पर है कोई जवाब।

आईएमए के ल‍िए बाबा का मौजूदा बयान तो बहाना बन गया क्‍योंक‍ि बाबा के देशी प्रोडक्‍ट इस संस्‍था के ईसाई धर्मांतरण मानस‍िकता वाले अध्‍यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टीन जयलाल को वैयक्‍त‍िक रूप से और संस्‍था से जुड़े व‍िदेशी ब्रांड्स को आर्थ‍िकरूप से नुकसान पहुंचा रहे थे, सो ये तो पुरानी खुन्‍नस है, न‍िकलनी ही थी।

बाबा का कुसूर इतना था क‍ि उन्‍होंने बड़बोलापन द‍िखाते हुए आचार्य सुश्रुत द्वारा “निदान स्थानम” में ल‍िखी बात ही दोहरा दी थी क‍ि-
“यद‍ि कोई एक चिकित्सा उपचार, बीमारी (जैसे क‍ि कोरोना) के कारण का इलाज करने में विफल रहता है और इसके अपने दुष्प्रभाव (sideeffect) होते हैं जिससे कई अन्य बीमारियां (Black fungus) जन्‍म लेती हों तो वह एक “असफल चिकित्सा पद्धति” है।

ज़ाह‍िर है कि लगभग  7000 cr के कोव‍िड धंधे में हजारों करोड़ के प्राइवेट हॉस्पिटल, ज‍िनका एक-एक दिन का चार्ज लाखों मेें होता है, की अगर कोई ऐसे पोल खोलेगा तो बुरा तो लगेगा ही ना, आईएमएम को भी लग गया और ठोक द‍िया बाबा पर मुकद्दमा, देखते हैं अब ऊँट क‍िस करवट बैठता है।

- अलकनंदा स‍िंंह 

http://legendnews.in/the-filth-inside-the-gods-organization-has-started-coming-out/

शनिवार, 22 मई 2021

पत्रकार‍िता की आड़ में पीड़‍ितों को न‍िगलता “बड़ों” का रसूख

तहलका के संपादक तरुण तेजपाल यौन उत्‍पीड़न के मामले में बरी 
    #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र ने ब‍िल्‍कुल ठीक           कहा है कि-

   एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
   धार पर रक्खे सब के चेहरे हैं
   रेत का हम लिबास पहने हैं
   और हवा के सफ़र पे निकले हैं।

   #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र के इस शेर को मैं         आज की पत्रकार‍िता द्वारा आदतन “चयन‍ित व‍िषयों पर ही अपनी र‍िपोर्ट” के मामले में प्रयोग कर रही हूं। कल तहलका के संपादक तरुण तेजपाल को गोवा कोर्ट द्वारा यौन उत्‍पीड़न के मामले में बरी क‍िए जाने के बाद से ही ये अभ‍ियान शुरू हो गया। चूंक‍ि गोवा में भाजपा की सरकार ने अब इस मामले को हाईकार्ट ले जाने की बात कही, तभी से पूरी की पूरी पत्रकार ब‍िरादरी खांचों में बंट गई।

कांग्रेस समर्थक पत्रकारों का एक खांचा तेजपाल की तरफदारी में लगा था तो दूसरा खांचा भाजपा पर मामले को कोर्ट ले जाने में जल्‍दबाजी और पीड़‍िता द्वारा पुल‍िस में श‍िकायत “दर्ज़ ना कराने” के बावजूद उन्‍हें राजनैत‍िक कारणों से फंसाया जाना बता रहा था मगर इस बीच जो सबसे शर्मनाक रहा, वह था तेजपाल का संद‍िग्‍ध चर‍ित्र और उस पर पत्रकार‍िता की रहस्‍यमयी चुप्‍पी। हालांक‍ि ये चुप्‍पी घटना (2013) के समय इतनी गहरी नहीं थी परंतु कल से तो पत्रकारों ने मुंह ही सीं ल‍िया है जबक‍ि सभी जानते हैं क‍ि आठ साल बाद ये न‍िर्णय अभी मात्र सेशन कोर्ट से ही आया है, गोवा सरकार की मानें तो अंत‍िम न‍िर्णय आने में समय लगेगा। इस बीच मीड‍िया की ये चुप्‍पी तेजपाल के रसूख का मूक सर्मथन करती द‍िख रही है।

तेजपाल के रसूख का अंदाज़ा इसी बात से भी लगा सकते हैं क‍ि उसे बलात्कार, यौन उत्पीड़न और जबरन बंधक बनाने के सभी आरोपों से बरी कराने में पीड़‍िता के ख‍िलाफ कुल 11 बड़े व नामी वकील पैरवी में लगे रहे। इनमें राजीव गोम्स, प्रमोद दुबे, आमिर ख़ान, अंकुर चावला, अमित देसाई, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, अमन लेखी, संदीप कपूर, राजन कारंजेवाला और श्रीकांत शिवाडे जैसे हाइलीपेड वकील रहे और इन्‍होंने 156 गवाहों की सूची में से मात्र 70 गवाहों से ही जिरह की और इसी आधार पर फैसला सुना द‍िया गया।

वकीलों की इतनी बड़ी फौज की भी वजह थी क‍ि न‍िर्भया केस के बाद बलात्कार की जस्टिस वर्मा कमेटी द्वारा तय की गई नई परिभाषा ‘फ़ोर्स्ड पीनो-वैजाइनल पेनिट्रेशन’ के तहत तेजपाल का ये मामला किसी रसूखदार व्यक्ति के खि‍लाफ़ आया पहला केस था। उधर 2013 में विशाखा गाइडलाइन्स पर बने नए कानून के तहत सभी कार्यालयों के ल‍िये “कार्यस्‍थल पर यौन उत्पीड़न” की जांच और फ़ैसले के लिए इंटर्नल कम्प्लेनेंट्स कमेटी बनाना आवश्‍यक था इसील‍िए नवंबर 2013 में पीड़‍िता ने अपने दफ़्तर को चिट्ठी लिख पूरे मामले की जानकारी दी थी और जांच की मांग की थी परंतु उस वक़्त तक तहलका मैगज़ीन में कोई इंटरनल कम्प्लेनेट्स कमेटी थी ही नहीं। हालांक‍ि वो चाहती तो क्रिमिनल लॉ के सेक्शन 354 (ए) के तहत पुलिस के पास भी जा सकती थी परंतु तेजपाल का रसूख यहां भी हावी था। अत: मामला सामने आने के बाद गोव सरकार को आगे आना पड़ा।

इसके बावजूद कई अख़बारों, वेबसाइट और टीवी चैनलों ने तरुण तेजपाल और महिला सहकर्मी की एक-दूसरे को और दफ़्तर को लिखे ई-मेल्स बिना सहमति लिए छाप दिए थे। इंटरनेट पर अब भी शिकायतकर्ता की अपनी संस्था #Tehelka  को लिखी वो ई-मेल मौजूद है जिसमें उनके साथ की गई हिंसा का पूरा विवरण था, ये ई-मेल केस के कुछ ही समय बाद ‘लीक’ हो गया था।  इतना सब लीक होने के बाद भी अब पत्रकारों द्वारा तेजपाल का “इस तरह” स्‍वागत करना बहुत कुछ कह रहा है।

बहरहाल अब जब कि‍ सेशन कोर्ट से तेजपाल बरी हो गया है तब हमारे (पत्रकारों) ल‍िए ये गंभीरता से सोचने का समय है क‍ि पीड़‍ितों की आवाज़ उठाने वाली पत्रकार‍िता को अब पूरी तरह र‍िवाइव क‍िया जाए ताक‍ि पत्रकार‍िता भाजपा, कांग्रेस, वामपंथी आद‍ि के खांचों में ना बंटे क्‍योंक‍ि आज भी “बड़ों” का रसूख ना जाने क‍ितने पीड़‍ितों को न‍िगलने को आतुर है। ऐसे में वे जो अपनी आवाज़ स्‍वयं नहीं उठा सकते, इसलिए उनकी आवाज़ बना जा सके ताक‍ि राजनैत‍िक दलों, मीड‍िया हाउस के बड़े ओहदेदारों द्वारा खांचों में बांटकर पत्रकार‍िता को मोहरे की तरह इस्‍तेमाल होने से रोक सकें।

और अंत में सभी पत्रकारों से यही कहूंगी क‍ि हमें अपना ग‍िरेबां चुस्‍त दुरुस्‍त रखने के ल‍िए ही सही,  #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र के ही शब्‍दों में “रेत का लिबास पहनकर हवा के सफ़र पे निकलने” वाली बेवकूफ़ी से बचना चाह‍िए।

-अलकनंदा स‍िंंह 

सोमवार, 17 मई 2021

हे सरकार! एक ऑड‍िट इनके द‍िमाग का भी हो

आपदा से जूझते अपने देश के स्‍वास्‍थ्‍य ढांचे को लेकर राजनैत‍िक दुष्‍प्रचार ने अब तो सारी सीमाएं लांघ दी हैं, समझ में नहीं आता क‍ि कोई इतना कैसे ग‍िर सकता है। कोरोना काल में जब सभी राजनैत‍िक पार्ट‍ियों को केंद्र सरकार के साथ म‍िलकर आपदा से दो-दो हाथ करने चाह‍िए, तब वे दुष्‍प्रचार के चरम पर जा रहे हैं।

बतौर उदाहरण दुष्‍प्रचार के पहले मामले में केजरीवाल सरकार ने लगातार ऑक्‍सीजन स‍िलेंडर्स, ऑक्‍सीजन कंसेंटेटर्स, वेंटीलेटर्स की कमी बताई और इसकी ज‍िम्‍मेदारी केंद्र पर डाली। भ्रम और झूठ का भरपूर भूत खड़ा क‍िया गया परंतु जैसे ही ऑड‍िट हुआ तो सारा सच सामने आ गया और ज‍िन उपकरणों को लेकर वे कमी का रोना रो रहे थे, अचानक वो इतनी बहुतायत में आ गए कि‍ वे उन्‍हें दान देने की बात करने लगे।

इसी तरह अब वैक्सीन पर रोना जारी है। दो द‍िन पहले द‍िल्‍ली में ही पोस्‍टर लगाए गए क‍ि ‘मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दी?’ इस दुष्‍प्रचार के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत ज‍िन 25 लोगों को गिरफ्तार किया गया उनके पक्ष में राहुल गांधी, द‍िग्‍व‍िजय स‍िंह समेत द‍िल्‍ली के आप व‍िधायक अमानतुल्‍ला खान आद‍ि ने ट्विवर पर ‘मुझे भी गिरफ्तार करो’ का अभियान चलाकर इसे प्रोफाइल पिक्चर बनाया, साथ ही ल‍िखा क‍ि ‘सुना है ये पोस्टर 𝗦𝗛𝗔𝗥𝗘 करने से पूरा 𝗦𝗬𝗦𝗧𝗘𝗠 कांपने लगता है…’।

व‍िदेशों को वैक्‍सीन मुहैया कराने का सच 
न‍िश्‍च‍ित रूप से क‍िसी अंधे व्‍यक्‍त‍ि को तो रास्‍ता द‍िखाया जा सकता है परंतु जो देखते हुए अंधा बनने का नाट‍क करे, उसे कौन दृष्‍ट‍ि दे। वैक्‍सीन को दूसरे देशों में भेजने पर क‍िए जा रहे कांग्रेस व आप के दुष्‍प्रचार के पीछे भी यही बात है जबक‍ि हकीकत यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के समझौते एवं कच्चे माल के एवज में वाणिज्यिक करार के तहत वैक्सीन देने की “बाध्यताा” है।

भारत ने 7 पड़ोसी देशों बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि को 78 लाख 50 हजार वैक्सीन अनुदान के तहत उपलब्ध कराया। इन आंख वाले अंधों को कौन समझाए क‍ि 2 लाख डोज संयुक्त राष्ट्र संघ के उस शांति बल के लिए सहायता स्वरूप दी गईं जिसमें 6600 तो भारतीय सैनिक ही हैं, अन्य देशों को दिए गए कुल वैक्सीन का यह करीब 16% है।

विदेशों को दिए गए 6 करोड़ 63 लाख वैक्सीन के डोज का करीब 84 प्रतिशत डोज वाणिज्यिक समझौते व लाइसेंसिंग करार के तहत उन देशों को दिया गया जिनसे हमें वैक्सीन तैयार करने के लिए कच्चा माल व लाइसेंस मिला है।

यूके को बड़ी मात्रा में वैक्सीन इसलिए देनी पड़ी क्योंकि सीरम इंस्टिट्यूट जिस कोविशिल्ड वैक्सीन का निर्माण कर रही है उसका लाइसेंस यूके के ‘ऑक्सफोर्ड एक्स्ट्रा जेनिका’ से प्राप्त हुआ है और “लाइसेंसिंग करार” के तहत उसे वैक्सीन का डोज देना जरूरी है।

इसके अलावा वाणिज्यिक समझौते के तहत सऊदी अरब को 12.5 प्रतिशत वैक्सीन देनी है क्योंकि जहां उससे पेट्रोलियम का आयात होता है वहीं बड़ी संख्या में वहां रह रहे भारतीयों को दो डोज मुफ्त वैक्सीन देने का उसने भारत से समझौता किया है।

इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन से हुए एक समझौते के तहत कुल निर्यात का 30 प्रतिशत वैक्सीन ‘को-वैक्स फैसिलिटी’ को दिया जाना है।

तो कुल म‍िलाकर बात ये है कि‍ ज‍िस बुद्ध‍ि के पैमाने का प्रदर्शन राहुल गांधी करते रहे हैं, उसमें “वाण‍िज्‍यक करार” को समझ पाना मुश्‍क‍िल ही लगता है। शहर और गांव के हर चौराहे पर कोई न कोई एक ऐसा नमूना आपको म‍िल ही जाएगा जो कपड़े फाड़ता हुआ जोर जोर से चीखता है परंतु उसे कोई गंभीरता से लेता ही नहीं, राहुल गांधी का भी यही हाल है। केंद्र सरकार की बजाय केवल पीएम के प्रत‍ि दुष्‍प्रचार का यह तरीका उन्‍हें कहीं का नहीं छोड़ेगा, बेहतर होगा क‍ि वो अपनी तरह व‍िदेशों में तो देश की फजीहत ना करायें क्‍यों कि‍ इनके द‍िमाग और कुप्रवृत्‍त‍ियों का ऑड‍िट तो नहीं कराया जा सकता।

– अलकनंदा स‍िंह

सोमवार, 10 मई 2021

‘पाखंड की प्रत‍िष्ठा’ से वैक्सीन पर प्रोपेगंडा जीवि‍यों के मंसूबे…


कव‍ि जयशंकर प्रसाद की एक कव‍िता है ‘पाखंड की प्रत‍िष्ठा’, इस कविता के माध्‍यम से उन्होंने भलीभांत‍ि बताया है क‍ि क‍िस तरह कोई पाखंडी अपने देश, अपनी संस्कृत‍ि तथा आमजन का जीवन दांव पर लगा कर उन्हें त्राह‍ि-त्राह‍ि करते देख आनंद‍ित होता है। कव‍िता में कहा गया है क‍ि –

स्मृतियों के शोर में अब से मौन मचाया जायेगा,
धुर वैचारिक अट्टहास में सुस्मित गाया जायेगा,
कुंठा के आगार में किंचित मुक्ति बांधी जाएगी,
भय आच्छादित मेड़ लगाकर प्रेम उगाया जायेगा.

स्वतंत्रता से पहले हो या उसके बाद हमारे देश में सदैव से ऐसे तत्व मौजूद रहे हैं ज‍िन्हें स‍िर्फ और स‍िर्फ अपने प्रोपेगंडा से वास्ता रहा, फ‍िर चाहे इसकी कीमत आमजन को भले ही क्यों ना चुकानी पड़ी हो। ऐसी ही पूरी की पूरी एक जमात अब वैक्सीन पर हायतौबा कर रही है। इस जमात ने पहले वैक्सीन न‍िर्माण पर और अब इसके न‍िर्यात पर बावेला मचा रखा है क‍ि… वैक्सीन का न‍िर्यात रोको।

पत्रकार तवलीन स‍िंह ने तो पीएम नरेंद्र मोदी को ‘नीरो’ ही बना द‍िया, जो ”स‍िर्फ अपनी छव‍ि व‍िदेशी नेताओं के समक्ष” चमकाने में लगे हैं और इसील‍िए वैक्सीन न‍िर्यात की जा रही है। वकील प्रशांत भूषण ने कहा क‍ि प्राकृतिक रूप से ही खत्म हो रहा है कोरोना संक्रमण, तो फ‍िर निजी वैक्सीन कंपनियों को सरकारी मदद क्यों।

इन प्रोपेगंडा जीवि‍यों को सोशल मीडि‍या पर लाखों लोग फॉलो करते हैं। वैक्सीन न‍िर्यात पर हायतौबा मचाने से पहले इन्होंने वैक्सीन लगाने को लेकर भी डर फैलाया, लोगों को गुमराह किया, वैक्सीन की दक्षता पर प्रश्न खड़े किए ज‍िससे लोगों के मन में शंका पैदा हुई। जब टीकाकरण शुरू हुआ तो इन लोगों ने सबसे पहले जाकर वैक्सीन का डोज लिया और फ्री में वैक्सीन उपलब्ध कराने की माँग करने लगे। चुपके से अपना वैक्सीनेशन कराने वाले पत्रकार संदीप चौधरी हों या कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य और पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी, इन्‍होंने भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के ख‍िलाफ अभ‍ियान चला रखा है।

अब बात करते हैं वैक्सीन न‍िर्यात की, क‍ि अपनी जरूरतें पूरी करने के साथ-साथ हमारे लिए इसका न‍िर्यात क्यों जरूरी है। भारत ने अपने ‘वैक्सीन मैत्री’ कार्यक्रम के जरिए करीब 83 देशों को स्‍वदेशी कोरोना वैक्सीन भेजकर मदद की। दूसरे देशों को टीकों की आपूर्ति करना अपने देश में पर्याप्त उपलब्धता होने पर ही संभव है। इसकी लगातार निगरानी एक सशक्त समिति कर रही है। इसके अलावा भारत को वैक्सीन निर्माण के लिए कच्चा माल आयात करना पड़ता है, दुनिया भर से कच्चा माल लेकर हम वैक्सीन निर्यात पर रोक नहीं लगा सकते।

ये प्रोपेगंडाजीवी जानबूझकर इस तथ्य को छ‍िपा रहे है क‍ि वैश्व‍िक साझा सहयोग की नीत‍ि के तहत अन्तर्राष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने के नतीजे क्या हो सकते हैं? इसील‍िए कोरोना की दूसरी लहर के न‍िपटने को दूसरे देशों से लगातार मदद ऑफर की जा रही है। सार्वभौम है क‍ि शक्त‍ि हो तो सब साथी होते हैं… वैक्सीन प्रकरण पर भारत यही नीत‍ि अपना रहा है और आज जो ऑक्सीजन व दवाइयों की खेप की खेप भारत आ रही है, वह भी इसी का पर‍िणाम है। यूं भी कॉमर्शियल ऑब्लिगेशन को तोड़ना आसान नहीं होता।

वैक्सीन निर्यात से नुक्सान पर रोने वालों के ल‍िए तो मैं पुन: कव‍ि जयशंकर प्रसाद की उसी कव‍िता को उद्धृत करना चाहूंगी क‍ि –

स्मृतियों के शोर में अब से मौन मचाया जायेगा

कलम थमा दी जाएगी अब विक्षिप्तों के हाथों में,
मन का मैल… कलम से बहकर… सूखे श्रेष्ठ क़िताबों में,
चिंतन के विषयों में विष का घोल मिलाया जायेगा,
ले लेकर चटकार कलेजा मां का खाया जायेगा।

तो शपथ लें क‍ि हम भारत मां का कलेजा चीरने वाले ऐसे बुद्ध‍िजीव‍ियों की असली सूरत सामने लाते रहेंगे।
– अलकनंदा स‍िंंह 

रविवार, 25 अप्रैल 2021

''लाशनऊ और श्मशान पत्रकार‍िता'' वाले इन ग‍िद्ध पत्रकारों से आत्मग्लान‍ि की उम्मीद न करें


 



कोरोना की भयावहता के इस दौर में ज‍िसे हम एकमात्र आशा कह सकते हैं, वह है मानवीयता। क‍िसी को पथभ्रष्ट करने के ल‍िए मानवीयता और अमानवीयता के बीच एक बारीक सी लाइन होती है। और यह पथभ्रष्टता अपने चरम पर तब पहु़ंचती द‍िखाई देती है जब सत्य द‍िखाने का दावा करने वाले पत्रकार ‘चुन चुन कर’ उन तथ्यों को अपनी ल‍िस्ट में रखते हैं जो अराजकता और भय फैला सकें। असत्य और अत‍िवाद का कीड़ा उन्हें कभी लखनऊ को “लाशनऊ” बनाने तो कभी श्मशान में र‍िपोर्ट‍िंग करने तक ग‍िरने पर विवश कर देता है।

दवायें, इलाज, डॉक्टर, ऑक्सीजन की खबरों से जूझते देश के सामने जो संकट है उसे पूरी तरह अपने अंधे स्वार्थवश ये पत्रकार भुनाने में लगे हैं। ”लाशनऊ और श्मशान पत्रकार‍िता” करने वाले ग‍िद्ध पत्रकारों का एजेंडा है क‍ि क‍िसी भी तरह अपनी ना-पसंदीदा सरकारों के ख‍िलाफ यथासंभव कुप्रचार क‍िया जाये।

नकारात्मक पत्रकार‍िता का यह आलम कोरोना से जूझते आमजन को तो छोड़ि‍ए स्वयं पत्रकारों के ल‍िए शर्मनाक स्थ‍ित‍ि पैदा कर चुका है क्योंक‍ि रवीश कुमार ने जहां फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा ”लखनऊ बन गया है लाशनऊ, धर्म का नशा बेचने वाले लोगों को मरता छोड़ गए।” यहां योगी आद‍ित्यनाथ को ”धर्म का नशा बेचने वाले” ल‍िखा गया जबक‍ि जापानी इंसेफेलाइट‍िस जैसी बच्चों की संक्रामक बीमारी का सफाया करने वाले योगी आद‍ित्यनाथ की प्रत‍िबद्धता असंद‍िग्ध है।

दरअसल, हकीकत द‍िखाने का दावा कर ‘लाशनऊ’ ल‍िखने वाले रवीश कुमार हों या ‘श्मशान’ में बैठकर रिपोर्टिंग करने वाली बरखा दत्त, या फ‍िर भोपाल के श्मशान में जलती लाशों के बीच खड़े होकर फ़ोटो खिंचवाने वाले एक अख़बार के संवाददाता…एक जैसा पैटर्न अपनाते हैं। इन सभी का न‍िशाना एक ही राजनैत‍िक पार्टी की सरकार होती है जबक‍ि कोरोना से होने वाली मृत्यु तो ये भेद नहीं कर रही… अन्य उन प्रदेशों में भी मृत्युदर वही है जो उप्र, गुजरात, मध्यप्रदेश में है। कोरोना तो द‍िल्ली, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भी है, स्वयं बरखा के प‍िता भी इसकी चपेट में आ गए और बरखा को ऑक्सीजन, वेंटीलेटर बेड की भीख सोशल मीड‍िया के ज़र‍िए द‍िल्ली सरकार से उसी तरह मांगनी पड़ी ज‍िससे उप्र के महामारी पीड़‍ित दो-चार हो रहे हैं। लेकिन इन्‍हें खामियां वहीं नजर आती हैं, जहां ये अपनी गीध दृष्‍टि गढ़ाए बैठे हैं।

आपात स्थ‍ित‍ि पर भी अपना एजेंडा चलाने वाले ये पत्रकार दावा करते हैं कि भगवा धारण करने वाला मुख्यमंत्री विज्ञान से वास्ता नहीं रख सकता जबकि योगी आदित्यनाथ स्वयं विज्ञान के ही स्नातक हैं और गण‍ित में गोल्ड मेडेल‍िस्ट। इन्हीं योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश जीडीपी की रैंकिंग में देश का दूसरा राज्य बना। केवल धर्म के लिए काम करने वाला कोई मुख्यमंत्री अपने प्रदेश के लिए ये काम कर सकता है क्‍या?

ये पत्रकार और कोई नहीं बल्क‍ि कविता कृष्णन जैसे फेक न्यूज़ स्प्रैडर्स के फ्रंटलाइन वर्कर हैं जो ”ऑक्सीजन की कमी” जैसी खबरों से अराजकता और कालाबाजारी की राह तैयार कर रहे हैं। कविता कृष्णन समेत कई अन्य सोशल मीडिया यूजर्स ने दिल्ली एम्स में ऑक्सीजन की कमी के चलते इमरजेंसी वार्ड के बंद होने की फेक न्यूज़ फैलाई। इतना ही नहीं, इनकी ज़मात की ही पर्यावरण एक्टिविस्ट लिसिप्रिया कँगुजम ने भी यही फेक न्यूज़ ट्वीट की लेकिन बाद में उसे डिलीट कर दिया। ये एक पैटर्न है इन ग‍िद्धों का, जो महामारी से जूझते देश के हौसले को चीर देना चाहते हैं।

कभी स्वयं द्वारा खींची गई मरणासन्न सूडानी बच्चे और उसे ताकते बैठे ग‍िद्ध की तस्वीर पर ‘पुल‍ित्जर पुरस्कार 1994’ पाने वाले न्यूयॉर्क टाइम्स के फोटो पत्रकार केव‍िन कार्टर को अपने कृत्य पर इतनी ग्लान‍ि हुई क‍ि उन्होंने आत्महत्या कर ली परंतु इन ग‍िद्ध पत्रकारों से क्या हम कोई ”आत्मग्लान‍ि” की उम्मीद कर सकते हैं… नहीं। परंतु हमें शर्म‍िंदगी और अफसोस है क‍ि हम इन जैसे कथ‍ित पत्रकारों को ढो रहे हैं… बमुश्क‍िल अपनी साख बचाते हुए कोश‍िश कर रहे हैं क‍ि पत्रकार‍िता बची रहे।

– अलकनंदा स‍िंह 

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

राम की शक्‍ति पूजा और स्‍वशक्‍ति जागरण


 चैत्र नवरात्रि की विदाई व रामनवमी का त्‍यौहार हो और ”राम की शक्‍ति पूजा” की बात ना हो, तो चर्चा कुछ अधूरी ही लगती है।

शक्‍तिपूजा अर्थात् नकारात्‍मकता से लड़ने को स्‍वशक्‍ति का जागरण। और इसी स्‍वशक्‍ति जागरण पर पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने रचा था 312 पंक्तियों का छंद काव्‍य ” राम की शक्‍तिपूजा”। यह स्‍वशक्‍ति के जागरण का ही प्रभाव था कि मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्रीराम ने शक्‍तिपूजा के समय एक कमलपुष्‍प कम पड़ने पर अपने नेत्र को अर्पण करने का साहस किया।
और इस तरह अधर्म पर धर्म की विजय को शक्‍ति आराधना के लिए एक कमल पुष्‍प की कमी पूरी करने को अपने नेत्र देने हेतु तत्‍पर हुआ पुरुष महानायकत्‍व का सर्वोत्‍कृष्‍ट उदाहरण बन गया। अपने नेत्र देवी को समर्पित करने के लिए तूणीर उठा लिया था, सहर्ष समर्पण की ये मिसाल ही श्रीराम को भगवान और महानायक बनाती है। वो महानायक जो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के लिए प्रतिपल जुटा रहा, इसीलिए तो आज भी श्रीराम जनजन के हैं, संभवत: इसीलिए वे भगवान हैं।

निराला की पंक्‍तियों के अनुसार-

“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”

शक्‍ति की आराधना और महानायकत्‍व की स्‍थापना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, इसके लिए आज का दिन हम सनातनधर्मियों के लिए विशेष महत्‍व रखता है। जहां हम अपनी आंतरिक शक्‍तियों को जगाकर महानायकत्‍व की यात्रा की ओर कदम बढ़ाते हैं।

इस यात्रा में जो कुछ ”किंतु-परंतु” हैं भी तो वे हमारे स्‍वजागरण के बाद ही पूरे हो सकते हैं। निश्‍चित ही ना तो ये समय त्रेता युग के श्री राम का है और ना ही तूणीर उठाकर संकल्‍प सिद्धि का परंतु छोटे छोटे कदमों से ही लंबी यात्रा पूरी की जा सकती है, तो क्‍यों ना वैचारिक स्‍वतंत्रता, समाज व राष्‍ट्र को श्रेष्‍ठ, संपन्‍न व सुरक्षित बनाने के कुछ संकल्‍प स्‍वयं से किए जायें जिसमें व्‍यक्‍तिगत स्‍वतंत्रता तो हो परंतु उच्‍छृंखलता ना हो, अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी हो परंतु देश व व्‍यक्‍ति की अस्‍मिता से खिलवाड़ ना हो।

निश्‍चितत: समाज की प्रथम इकाई अर्थात् स्‍वयं हम और हमारे विकास के लिए भी "स्‍वशक्‍ति का जागरण" अब समय की अनिवार्यता है क्‍योंकि स्‍वशक्‍ति को जाग्रत किये बिना हम वंचित कहलायेंगे और वंचित बने रहना, दयनीय दिखते या दिखाते रहना रुग्‍णता है, और रुग्‍णता ना तो व्‍यक्‍ति को शक्‍तिवान बनाती है ना ही समाज को

हालांकि स्‍वशक्‍ति जागरण की इस यात्रा को कुछ अतिक्रमणों से भी गुजरना पड़ है जिसमें रात रात भर आवाजों के सारे डेसीबल तोड़ती देवीजागरण थे तो ”लाउडस्‍पीकर का शक्‍तिजागरण” होता था परंतु व्‍यक्‍तियों की सारी शक्‍ति इन आवाजों की भयंकरता से जूझते ही बीत जाती है। 

फ‍िलहाल तो कोरोना ने सारे कायदे कानून होम आइसोलेट कर द‍िए हैं परंतु ''पूजा के नाम पर शोर मचाते उपकरण और द‍िखावा करने वाले भक्त'' बहुत ज्यादा द‍िनों तक अपनी आदतों को संभाल नहीं पायेंगे।  न‍िश्च‍ित जान‍िए क‍ि उन्हें स्वशक्त‍ि से कोई लेना देना नहीं...रहेगा। 

बहरहाल समाज में मूल्‍यों की स्‍थापना के लिए महानायक अथवा महानायिका कहीं अलग से उतर कर नहीं आते, यह तो आमजन के बीच से ही निकलते हैं। शक्‍ति की आराधना के बाद भगवान राम की भांति ही सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के लिए कार्य करना ही आज के इस पर्व का अभीष्‍ट होना चाहिए।

- अलकनंदा स‍िंंह 

रविवार, 4 अप्रैल 2021

नंदनंदन दास (Stephen Knapp) की पुस्तक और #FreeTemples की राह


 क‍िसी भी समृद्ध सभ्यता को तहस-नहस करना हो तो उसका नैत‍िक पतन करते चलो, उसकी आस्था के केंद्रों को म‍िटाते चलो, सभ्यता स्वयमेव समाप्त हो जाएगी। सद‍ियों से यही क‍िया जाता रहा है हमारे समृद्ध सभ्यता केंद्रों अर्थात् हमारे मंद‍िरों के साथ, ज‍िनकी स्थापत्य-कला और वैज्ञान‍िकता आज भी शोध का व‍िषय बनी हुई है। भारत की सभ्यता और इसकी सनातन शक्त‍ि को तोड़ने के ल‍िए पहले व‍िदेशी आक्रांताओं द्वारा प्रहार दर प्रहार क‍िये गये और जो शेष रहा, उसे ‘द हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडाउमेंट एक्ट-1951’ के बहाने अब तक क‍िया जा रहा है।

संभवत: अब इसील‍िए ईशा फाउंडेशन के सद्गुरू जग्गी वासुदेव ने #FreeTemples जैसे अभ‍ियान चलाए हुए हैं ज‍िसे अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती का पूर्ण समर्थन भी है ताक‍ि मंद‍िरों को ‘सरकारी चंगुल’ से छुड़ाया जा सके। #FreeTemples के पीछे मूल कारण है मंद‍िरों से प्राप्त धन केे जरिए बड़े पैमाने पर धर्मांतरण और हजारों मंद‍िरों को धराशायी कर उनकी चल-अचल संपत्त‍ि का गैरकानूनी गत‍िव‍िध‍ियों में उपयोग।

मंद‍िरों पर सरकारी आध‍िपत्य के बारे में एक खोजी र‍िपोर्ट पढ़नी हो तो इस्कॉन (ISKCON)  के अनुयायी व वैद‍िक इत‍िहास के लेखक नंदनंदन दास (स्टीफन नैप) की ‘क्राइम अगेंस्ट इंडिया एंड द नीड टू प्रोटेक्ट एनसिएंट वैदिक ट्रेडिशन’ को पढ़ा जाना चाह‍िए ताक‍ि हमें ज्ञात हो सके क‍ि द हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडाउमेंट एक्ट-1951 क्यों बना, इसके नि‍ह‍ितार्थ क‍िसे लाभ देते रहे और इस एक कानून ने मंद‍िरों की दुर्दशा के ल‍िए क्या-क्या नहीं क‍िया।

लेखक नंदनंदन दास (स्टीफन नैप) की क‍िताब में इसका भी उल्लेख है कि किसी भी धर्मनिष्ठ राजा ने मंदिरों के निर्माण के बाद उन पर आधिपत्य स्थापित नहीं किया। बहुत से राजाओं ने तो अपने नाम तक के शिलालेख नहीं लिखवाए। यहाँ तक कि उन्होंने बहुत सी ज़मीनें, हीरे-जवाहरात एवं सोना इत्यादि भी मन्दिरों को दान स्वरूप दिया। उन्होंने सुगमतापूर्वक इनका संचालन मन्दिर प्राधिकरण को सौंप दिया। शताब्दियों पूर्व धर्मनिष्ठ राजाओं द्वारा सैंकड़ों मन्दिरों का निर्माण उनके द्वारा और जनमानस द्वारा इकट्ठी की गई दानस्वरूप धनराशि से किया गया। यह धनराशि लोक कल्याण के लिए भी प्रयोग की जाती थी।
परंतु ‘द हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडाउमेंट एक्ट-1951’ के इस कानून के जरिये राज्यों को अधिकार दे दिया गया कि बिना कोई कारण बताए वे किसी भी मंदिर को सरकार के अधीन कर सकते हैं। और यही हुआ भी, ज‍िसका उदाहरण आंध्रप्रदेश का है जहां इसी कानून के नाम पर में 43000 मन्दिरों का अधिग्रहण किया गया ज‍िनसे प्राप्त राजस्व का 18% ही मन्दिरों के रखरखाव के लिए दिया गया, शेष 82% उन गैरह‍िंदू बनाने के धर्मांतरण पर लुटा द‍िए गए, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी उपलब्ध हैं। अकेले त‍िरुपत‍ि बाला जी मंदिर से ही प्रतिवर्ष 3100 करोड़ रुपये इकट्ठे होते हैं जिसका 85% सरकारी खजाने में जाता है और इसका उपयोग सरकार कहां करती है, कोई ह‍िसाब नहीं द‍िया जाता, इस मंदिर के बेशकीमती रत्न ब्रिटेन के बाजारों में बिकते पाए जा चुके हैं और तो और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी ने तिरुपति की सात पहाड़ियों में से पांच को सरकार को देने का आदेश दिया था। इन पहाड़ियों पर चर्च का निर्माण किया जाना था, अब इन्हीं का बेटा जगन रेड्डी 10 मन्दिरों को ध्वस्त कर गोल्फ़ मैदान को बना रहा है और बड़े पैमाने पर ह‍िंदुओं का धर्मांतरण कर उन्हें ईसाई बना रहा है।

इसी तरह कर्नाटक में 2 लाख मन्दिरों से एकत्र 79 करोड़ रुपये में से केवल 7 करोड़ मंद‍िर रखरखाव को म‍िले शेष 72 करोड़ में से 59 करोड़ मदरसों व 13 करोड़ चर्च को दिए गए। साफ पता चलता है कि हिंदुओं की धनराशि का उपयोग उन धर्मों के लिए किया जाता है जो धर्मान्तरण को बढ़ावा देते हैं। इन सभी मंदिरों के दान में भ्रष्टाचार का स्तर यह है कि कर्नाटक में लगभग 50 हजार मंदिर रख-रखाव के अभाव में बंद हो गए हैं।

सरकारी ट्रस्टों के अधीन मंदिर की दुर्दशा का एकमात्र कारण मंदिरों के अंदर गैर धार्मिक, राजनीतिक व्यक्तियों का ट्रस्टी के रूप में सरकारों द्वारा मनोनयन भी है। इससे हिंदू संस्कृति को क्षति पहुंच रही है।

बहरहाल अप्रैल 2019 में दक्षिण भारत के एक मंदिर के प्रबंधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में यह निर्णय दिया गया कि मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारा प्रबंधन किसी ‘सेक्युलर सरकार’ का काम नहीं है। यह उस आस्थावान समाज का काम है, जो अपने पूजास्थलों के प्रति श्रद्धा रखता है और दानस्वरूप धन खर्च करता है। वही समाज अपने पूजास्थलों का संरक्षण एवं प्रबंधन करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था क‍ि भले ही 128 संप्रदायों वाले सनातन हिंदू समाज की पूजा पद्धतियां भिन्न हों परंतु इन सभी में संस्कार तो वैदि‍क ही हैं। संतों के विभिन्न संगठनों से संवाद कर हिंदू मंदिरों के प्रबंधन व्यवस्था को सुदृढ़ किए जाने की ज़रूरत है।

साढ़े नौ लाख मंदिर अभी भी हमारे हैं ज‍िनमें साढ़े चार लाख मंद‍िरों पर विभिन्न राज्य सरकारों का कब्ज़ा है। उच्चतम न्यायालय का उक्त आदेश ही आज #FreeTemples जैसे अभ‍ियानों का संबल बना है।

देश की आजादी से पूर्व मंद‍िरों के धन को लूटने के ल‍िए जो साज‍िश अंग्रेजों ने कानून ‘मद्रास हिंदू टेंपल एक्ट 1843’ बनाकर रची, और जवाहरलाल नेहरू ने उसी को ‘1951’ में अपना जामा पहना द‍िया ताक‍ि सेक्यूलर‍िज्म के नाम पर इन्हें तहस-नहस क‍िया जा सके। मंद‍िर मुक्त‍ि की राह में अब उस कानून को समाप्त क‍िया जाने का वक्त आ गया है

- अलकनंदा स‍िंंह

 

सोमवार, 29 मार्च 2021

संस्कृत और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: समय है अपनी जड़ों की ओर वापसी का

 प्लास्ट‍िक से न‍िर्म‍ित डेकोरेट‍िव पौधे चाहे क‍ितने ही सुंदर क्यों ना हों, उनको देखकर न तो मन शांत होता है और न ही प्रफुल्ल‍ित, जबक‍ि वास्तव‍िक पौधों की देखभाल में अनेक झंझट रहते हुए भी सुकून उन्हीं से म‍िलता है। यही बात देवभाषा संस्कृत के बारे में है, जहां हमारे हीनभाव ने अंग्रेजी जैसी डेकोरेट‍िव भाषा को तो घरों में सजा ल‍िया और वास्तव‍िक आनंद देने वाली ‘संस्कृत’ को गंवारू भाषा ठहरा द‍िया। नतीज़ा यह हुआ क‍ि ज‍िन आव‍िष्कारों को दुन‍िया मानती है, हम उन्हीं पर नहीं इतरा सके।

आयात‍ित सोच से चलता समाज, अपनी भाषा और अपनी मूल सोच को ही नहीं बल्क‍ि वह अपने भव‍िष्य को भी वहीं धरती में गाड़ देता जहां से उसकी जड़ें न‍िकली हैं। ”NASA” के बहाने अब इन जड़ों को और ताकतवर बनाने का मौका हमारे पास पुन: आया है, न‍िश्च‍ित ही यह उसी स्वर्ण‍िम युग का न्यौता है ज‍िस युग की स्थापना आर्यभट्ट, वराह मिहिर, भास्कर, चरक और सुश्रुत जैसे वैज्ञानिकों और गणितज्ञों ने की, इनका महत्वपूर्ण कार्य संस्कृत में ही हुआ। हमारे वेदों, पुराणों, शास्त्रों का एक एक श्लोक पूर्णत: एल्गोर‍िद्म पर आधार‍ित है।

आज के अत्यध‍िक ड‍िजि‍टलाइज्ड युग में हमें अपनी इस ”गलती” को सुधारने का वृहत्तर मौका म‍िला है क्योंक‍ि संस्कृत और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का संबंध प्रगाढ़ होता जा रहा है।

नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स ने “संस्कृत और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर ” NASA संस्कृत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में ज्ञान का प्रतिनिधित्व” पर जो काम क‍िया है, वह अद्भुत है।

व‍िश्वस्तरीय कंप्यूटर वैज्ञान‍िक यह साब‍ित कर चुके हैं और इसी पर आगे भी लगातार काम कर रहे हैं क‍ि आर्टिफीश‍ियल इंटेलिजेंस, मशीनी भाषा और कंप्यूटर एलगोरिदम के लिए ‘संस्कृत’ ही सबसे उपयुक्त भाषा है।

गणित, कंप्यूटिंग में किसी कार्य के लिये आवश्यक चरणों के समूह यान‍ि अल्गोरिदम को लेकर कंप्यूटर जगत के विद्वानों का मानना है कि संस्कृत चूंक‍ि नियमों पर आधारित तार्किक व्याकरण से सजी है इसल‍िए यह एलगोरिदम लेखन के लिए सबसे उपयुक्त या मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमता में भी उपयोगी है।

‘पोंगा पंड‍ितों’ की भाषा कहकर ज‍िस संस्कृत का मजाक बनाया गया, आज वही संस्कृत अध्यात्म, दर्शन, भक्ति, कर्मकांड या साहित्य तक ही सीमित नहीं रही बल्क‍ि अब यह ज्ञान और विज्ञान के ल‍िए महत्वपूर्ण बन गई है। संस्कृत भाषा, साहित्य और विज्ञान की परंपरा हमारे बौद्धिक विकास की शानदार यात्रा को द‍िखाती है।

यहां तक क‍ि भारतीय गणित तो एल्गोर‍िद्म से भरा पड़ा है। इन एल्गोर‍िद्म के सिद्धान्त तथा उनकी उपपत्तियाँ भी अनेक टीका ग्रन्थों में उपस्थ‍ित हैं। आर्यभट्ट के अनुसार किसी संख्या के वर्ग, घन, वर्गमूल तथा घनमूल निकालने की कई कई एल्गोर‍िद्म (कलनविधियाँ) हैं। इसी तरह शुल्बसूत्रों में विभिन्न यज्ञ-वेदियाँ बनाने की एल्गोर‍िद्मि‍क विधियाँ दी गयीं हैं।

तो बात ये है क‍ि हमें गुलाम बनाने से पहले ज‍िस मैकाले ने हमारी भाषा, हमारे पौराण‍िक, वैद‍िक ज्ञान को त‍िरस्कृत क‍िया, आज वही ज्ञान हमें वापस अपने चरम की ओर ले जाने आया है , देखना यह है क‍ि हम इस अवसर का लाभ क‍ितना और कैसे उठा पाते हैं। हमें वास्तव‍िक पौधा चाह‍िए ज्ञान का, डेकोरेट‍िव ज्ञान का खम‍ियाजा तो अबतक काफी भुगत चुके, अपनी पीढ़‍ियां बरबाद कर लीं, अपनी संस्कृत‍ियों और ज्ञान को भुलाकर, समय है अपनी जड़ों की ओर वापसी का।

- अलकनंदा स‍िंंह  

सोमवार, 15 मार्च 2021

आधा सच बोलने वाले ये मीड‍ियाजीवी…आख‍िर चाहते क्या हैं

 महाभारत युद्ध के बीचों बीच अश्वत्थामा की मृत्यु को लेकर बोला गया ‘आधा सच’ आज तक अपने स‍िर पर से अभ‍िशाप को नहीं हटा पाया क्योंक‍ि इसी आधे सच ने युद्ध के अंति‍म पर‍िणाम को बदल द‍िया। यही ‘आधा सच’ महत्वपूर्ण बात को अंधे कुंए में डाल स‍िर्फ और स‍िर्फ भ्रम का कारोबार करता है, और जब आधा सच कथ‍ित बुद्ध‍िजीव‍ियों द्वारा बोला जाए तो…? तो सोचना पड़ जाता है क‍ि हम और हमारी श‍िक्षा, बुद्ध‍िमत्ता और सोच इस तरह व‍िध्वंस पर आमादा क्यों है। क्यों हम देश, देशवासी, नई पीढ़ी और संपन्नता के ह‍ित में नहीं सोच पा रहे। क्यों हमारे स्वार्थ और व‍िचारधारायें प्रगत‍ि के ल‍िए तैयार नहीं।

कल एक ही खबर दो अलग अलग समाचारपत्र में पढ़ीं, पहली थी ”नई श‍िक्षा नीत‍ि में अब इंजीन‍ियर‍िंग करने वालों के ल‍िए भौत‍िकी, रसायन शास्त्र और गण‍ित अन‍िवार्य नहीं होंगे बल्क‍ि वैकल्प‍िक होंगे तो इसके ठीक व‍िपरीत दूसरे समाचारपत्र में इसी खबर को एआईसीटीई का ‘यू-टर्न’ बताते हुए इन व‍िषयों को इंजीन‍ियर‍िंग के ल‍िए अन‍िवार्य बता द‍िया गया। इस कारस्तानी के बाद ब‍िना पूरी खबर पढ़े मृणाल पांडेय जैसी वर‍िष्ठ पत्रकार और उनके पूरे ग्रुप ने तुरंत नई श‍िक्षानीत‍ि पर तंज़ कस अपनी भड़ास भी न‍िकाल डाली, इतना ही नहीं एआईसीटीई को मानस‍िकरूप से द‍िवाल‍िया लोगों का संस्थान बता इसपर भगवाकरण का आरोप भी मढ़ द‍िया क‍ि ये लोग देश को पोंगापंथी युग में ले जाना चाहते हैं।

हकीकत ये है क‍ि ये व‍िषय वैकल्प‍िक हैं परंतु स‍िर्फ बायोटैक्नोलॉजी, एग्रीकल्चरल इंजीन‍िर‍िंग और इंटीर‍ियर ड‍िजाइन‍िंग जैसे व‍िषयों के ल‍िए ज‍िनमें क‍ि इनका सामान्य स्कूली ज्ञान ही काफी होगा, तो बच्चों पर अनावश्यक बोझा क्यों डाला जाये। अभी तक इस बोझ ने शोध, बुद्ध‍िमत्ता व व्यवहार‍िक ज्ञान को कुंद करते हुए ड‍िग्र‍ीधारि‍यों की जमात ही तो खड़ी की। कोरोना काल ने ऐसे ड‍िग्रीधार‍ियों का सच सामने ला द‍िया क‍िसी चाय की टपरी खोली तो कोई खेती करने लगा, आख‍िर क्यों ? इसका जवाब यही है क‍ि श‍िक्षा का अध‍िकतम ह‍िस्सा, ज़मीनी हकीक़त नहीं स‍िखाता। क्या इस श‍िक्षा नीत‍ि की आलोचना स‍िर्फ इसल‍िए की जानी चाह‍िए क‍ि वह हमें हमारी प्राचीन ज्ञान की थात‍ियों की ओर मुड़कर देखने को कहती है, उन्हें हू-ब-हू अपनाने की नहीं उसमें और इज़ाफा करने को कहती है।
न‍िश्च‍ित रूप से नई श‍िक्षा नीत‍ि पर भी मंथन हो और इससे जो भी अमृत या व‍िष न‍िकले उस पर भी चर्चा हो बशर्ते हम क्वांटम, अणु, वैद‍िक गण‍ित, ज्योत‍िषीय गणना देने वाले भारत को आगे ले जाना चाहें। ज्ञान और श‍िक्षा में फर्क करना सीखें, नैत‍िक शास्त्र, दर्शन और सामाज‍िक दाय‍ित्व का बोध इसके केंद्र में हो। हमें यह नहीं भूलना चाह‍िए क‍ि कुछ साल पहले तक योग को भी हमारे पत्रकार साथी मुंह ब‍िचकाकर ही देखते थे। पत्रकार‍िता से जुड़े लोगों पर वृहत्तर दाय‍ित्व है परंतु जब ये ही पक्षपाती होंगे और भ्रम फैलायेंगे तो … । इस पर भी सोचना होगा।

- अलकनंदा स‍िंह 

बुधवार, 10 मार्च 2021

शिवरात्रि: श‍िव और कृष्ण के युग्म का सान‍िध्य स‍िर्फ ब्रज में ही


 जो क‍िसी का नहीं, वो श‍िव का और जो श‍िव का उसे फ‍िर क्या चाह‍िए, जी हां आज ऐसे ही औघड़दानी की आराधना पूरा देश ही नहीं, व‍िश्वभर में की जा रही है। व‍िश्वभर में जहां जहां सनातन की उपस्थ‍ित‍ि है, वहां वहां श‍िव भी उपस्थ‍ित हैं।


ब्रजभूम‍ि पर आज शिवचतुर्दशी…शिवरात्रि…शिवविवाह का दिन…शिव महिमा गायन का दिन है, इसील‍िए ब्रज में बरसाना की प्रसिद्ध लठामार होली की पहली चौपाई गोस्वामी समाज द्वारा आज ही से न‍िकाली जाएगी, जिसे लाड़ली महल से निकाल कर रंगीली गली के शिव मंदिर ”रंगेश्वर” तक लाया जाएगा और ब्रज में 40 द‍िवसीय होली का जो जोर बसंत पंचमी से शुरू हुआ था वह अपने चरम की ओर बढ़ता जाएगा। गोस्वामी समाज द्वारा क‍िए जाने वाले समाज गायन की कड़ी इस ”चौपाई गायन” में भक्त‍िकालीन रस‍िक कव‍ियों के पद का गायन क‍िया जाता है ज‍िसके माध्यम से श्रीकृष्ण के योगी बनकर सख‍ियों के बीच जाने की लीला का वर्णन होगा। भभूत रमाए श‍िव और योगी बनकर आए श्री कृष्ण का सख‍ियों के बीच आना प्रेम तत्व का परम नहीं तो क्या है। पूरा का पूरा ब्रज क्षेत्र श्रीकृष्ण और श‍िव के इस परमयोग का साक्षी रहा है, आज भी इसकी अनुभूत‍ि कदम कदम पर की जा सकती है।

शिव जैसा भोला भंडारी जो नाचता है तो नटराज और गाता है तो विशिष्‍ट रागों का निर्माता, योगसाधना में रत हो तो 112 विधियों को प्रतिपादित कर दे और प्रेमी तो ऐसा क‍ि जो व‍िरह में संपूर्ण ब्रहमांड को उथलपुथल ही कर दे… परंतु ब्रजवासी भलीभांति‍ जानते हैं श‍िव और श्री कृष्ण के इस युग्म का सान‍िध्य पाना क‍ितना सहज है।
श‍िव को लेकर यही सहजता आदि गुरू शंकराचार्य ने भी प्रगट की, जब अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय मांगा। बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन जाता है…

यह परिचय ‘निर्वाण-षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||
अर्थात्

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…।

तो ऐसी है श‍िव की सहज प्राप्त‍ि जो धर्म, गुरुओं और उनकी उंगली पकड़ने वालों के लिए एक सबक भी हो सकती है।

शिव के ज‍िस रूप को पाने के लिए हम इतने लालायित रहते हैं, वो हमारे ही भीतर घुला हुआ है, हर श्‍वास-नि:श्‍वास में है, उसे हम विलग नहीं कर सकते। और जो ऐसा करते हैं वह कोरा नाटक रचते हैं।

श‍िव की सहजता को लेकर पं.व‍िद्यान‍िवास म‍िश्र ने क्या खूब कहा है क‍ि मूर्त‍िरूप में व‍िष्णु सोने, तांबे और श‍िला के बनाए जाते हैं परंतु श‍िव तो म‍िट्टी का पार्थ‍िव बनकर ही प्रसन्न हैं, पार्थ‍िव बनाया और पीपल के नीचे ढुलका द‍िया, न रुद्री
… ना स्नानार्घ्य, न फूल ना धूप-अगर, कुछ भी तो आवश्यक नहीं..।
तो आइये हम भी ऐसे ही श‍िव की आराधना करें..जो सहज है, सरल है और आद‍िगुरु शंकराचार्य की भांत‍ि कह सकें… शिवोहम् शिवोहम् ।

- अलकनंदा स‍िंंह 

सोमवार, 1 मार्च 2021

#RealtionshipCrisis: आंकड़े बोल रहे हैं… बढ़ रही है कुमाताओं की संख्या


 मशहूर शायर बशीर बद्र का एक शेर है-

”काटना, पिसना
और निचुड़ जाना
अंतिम बूँद तक….
ईख से बेहतर
कौन जाने है,
मीठे होने का मतलब?”


मां भी ऐसी ही ईख होती है जो बच्चे के ल‍िए कटती, प‍िसती, न‍िचुड़ती रहती है अपनी अंत‍िम बूंद तक…और मीठी सी ज‍िंदगी के सपने के साथ साथ ही कठ‍िनाइयों से लड़ने का साहस भी उसके अंतस में प‍िरोती जाती है…ताक‍ि जब वह जाग्रत हो उठे तो संसार को सुख, उत्साह और प्रगत‍ि से भर दे।

परंतु…ऊपर ल‍िखे शब्दों से अलग भी एक दुन‍िया है ज‍िसमें मां, बच्चे के सामने ईख की तरह कोई ‘मीठा’ नहीं परोसती बल्क‍ि उसके अंतस को लांक्षना के उन कंकड़-पत्थरों से भर देती है जो अपराध का वटवृक्ष बन जाता है। मां को मह‍िमामंड‍ित करने वाले कसीदों के बीच ”कल‍ियुगी मांओं” से जुड़ी ऐसी ऐसी खबरें भी सुनने-पढ़ने को म‍िल रही हैं जो तत्क्षण यह सोचने पर बाध्य करती हैं क‍ि ”सच! क्या कोई मां ऐसा भी कर सकती है”।

इन्हीं खबरों में सबसे ज्यादा संख्या उन मांओं की होती है जो स‍िर्फ और स‍िर्फ अपनी कामनापूर्त‍ि के ल‍िए परपुरुष के साथ संबंध बनाती हैं, घर से भाग जाती हैं, अवैध संबंधों के चलते अपने साथी की हत्या तक करने- कराने से बाज नहीं आतीं, इन्हीं संबंधों के चलते कई बार इन मह‍िलाओं को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ जाता है। आए द‍िन म‍िलने वाली लाशें इन संबंधों की पर‍िणत‍ि बतातीं हैं। अंतत:  यही कृत्य उनके  बच्चों को संवेदनाहीन बनाकर अपराध‍ की ओर धकेल देते हैं। आंकड़े गवाह हैं क‍ि अध‍िकांशत: बाल अपराध‍ियों के पीछे मांओं द्वारा क‍िए गए ये कृत्य ही होते हैं।

एनसीआरबी (नेशनल क्राइम र‍िकॉर्ड ब्यूरो) के अनुसार भारत में बाल अपराधि‍यों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, प‍िछले एक साल में ही 11 फीसदी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। बच्चों के खिलाफ अपराध का आंकड़ा 2015 में जहां 94172 था, वहीं 2016 में यह आंकड़ा 106958 तक पहुंच गया और अब यान‍ि 2020-2021 की शुरुआत में ही हर दिन बच्चों के खिलाफ 350 अपराध दर्ज किए जा रहे हैं।

बाल अपराध‍ियों के बारे में ये आंकड़े आइना द‍िखा रहे हैं क‍ि मां अपने मातृत्व में कहां चूक रही हैं, वे नई पीढ़ी को कौन सा रूप दे रही हैं, पैदा तो वो देश का भविष्‍य बनने के ल‍िए होते हैं परंतु उन्हें रक्तबीज बनाया जा रहा है।

दुखद बात यह भी है क‍ि‍ ऐसी भयंकर नकारात्मक घटनाओं के बावजूद हर संभव प्रयास क‍िया जाता है क‍ि उस मां के प्रत‍ि तरह-तरह से सहानुभूत‍ि‍यां प्रदर्श‍ित की जायें जबक‍ि मां के इस दूसरे रूप ने बाल अपराध‍ियों की एक लंबी चौड़ी फौज खड़ी कर दी है।

व्यक्त‍िगत आजादी और उच्छृंखलता से चलकर अपराध तक पहुंचने वाला मार्ग स‍िर्फ और स‍िर्फ एक बीमार समाज को ही जन्म दे सकता है, इसके अत‍िर‍िक्त और कुछ नहीं। ये मांएं ऐसा ही कर रही हैं।

रमेंद्र जाखू द्वारा रच‍ित इन चार पंक्त‍ियां के साथ बात खत्म –

”मैं वसीयत कर रहा हूँ
कि मेरे मरने के बाद
मेरी आग उस शख़्स को मिले
जो अंधेरे के ख़िलाफ़
इक जलती हुई मशाल है
जिसका साहस कभी कुंद नहीं होता।”

हमें भी यह साहस करना होगा क‍ि पूरी की पूरी पीढ़ी को बरबाद करने वाली मांओं को मह‍िला के प्रति सहानुभूत‍ि की आड़ में ना छुपाएं।

- अलकनंदा स‍िंंह