गुरुवार, 22 अगस्त 2019

हरिशंकर परसाई का व्यंग्य: एक मध्यमवर्गीय कुत्ता

हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार हरिशंकर परसाई का जन्‍म 22 अगस्त 1924 को हुआ था। उनका होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) जिले के जमानी गांव में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती है, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असंभव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा–शैली में खास किस्म का अपनापन है जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है।
हरिशंकर परसाई का व्यंग्य: एक मध्यमवर्गीय कुत्ता
मेरे मित्र की कार बँगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, ‘इनके यहाँ कुत्ता तो नहीं है?’ मित्र ने कहा, ‘तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!’ मैंने कहा, ‘आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूँ।’
कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते। वहाँ जाओ तो मेजबान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से ‘नमस्ते’ हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी – ‘क्यों यहाँ आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहाँ से!’
फिर कुत्ते का काटने का डर नहीं लगता – चार बार काट ले। डर लगता है उन चौदह बड़े इंजेक्शनों का जो डॉक्टर पेट में घुसेड़ता है। यूँ कुछ आदमी कुत्ते से अधिक जहरीले होते हैं। एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था। मैंने कहा, ‘इन्हें कुछ नहीं होगा। हालचाल उस कुत्ते का पूछो और इंजेक्शन उसे लगाओ।’
एक नए परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया। मैं उनके बँगले पर पहुँचा तो फाटक पर तख्ती टँगी दीखी – ‘कुत्ते से सावधान!’ मैं फौरन लौट गया।
कुछ दिनों बाद वे मिले तो शिकायत की, ‘आप उस दिन चाय पीने नहीं आए।’ मैंने कहा, ‘माफ करें। मैं बँगले तक गया था। वहाँ तख्ती लटकी थी – ‘कुत्ते से सावधान। ‘मेरा ख्याल था, उस बँगले में आदमी रहते हैं। पर नेमप्लेट कुत्ते की टँगी हुई दीखी।’ यूँ कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है। मार्क ट्वेन ने लिखा है – ‘यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा।’ कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतर है।
बँगले में हमारे स्नेही थे। हमें वहाँ तीन दिन ठहरना था। मेरे मित्र ने घंटी बजाई तो जाली के अंदर से वही ‘भौं-भौं’ की आवाज आई। मैं दो कदम पीछे हट गया। हमारे मेजबान आए। कुत्ते को डाँटा – ‘टाइगर, टाइगर!’ उनका मतलब था – ‘शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं हैं। तू इतना वफादार मत बन।’
कुत्ता ज़ंजीर से बँधा था। उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था। मैं उससे काफी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया। मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है। लगता ऐसा ही है। मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूँ। चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो। उस बँगले में मेरी अजब स्थिति थी। मैं हीनभावना से ग्रस्त था – इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं! वह मुझे हिकारत की नजर से देखता।
शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे। नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था। मैंने देखा, फाटक पर आकर दो ‘सड़किया’ आवारा कुत्ते खड़े हो गए। वे सर्वहारा कुत्ते थे। वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते। फिर यहाँ-वहाँ घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते। पर यह बँगलेवाला उन पर भौंकता था। वे सहम जाते और यहाँ-वहाँ हो जाते। पर फिर आकर इस कु्ते को देखने लगते। मेजबान ने कहा, ‘यह हमेशा का सिलसिला है। जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं।’
मैंने कहा, ‘पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए। यह पट्टे और जंजीरवाला है। सुविधाभोगी है। वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं। इसकी और उनकी बराबरी नहीं है। फिर यह क्यों चुनौती देता है!’
रात को हम बाहर ही सोए। जंजीर से बँधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था। अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता। आखिर यह उनके साथ क्यों भौंकता है? यह तो उन पर भौंकता है। जब वे मोहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाज में आवाज मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे साथ हूँ।
मुझे इसके वर्ग पर शक होने लगा है। यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है। मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते। उनका रोब ही निराला! मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना। आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे। लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे। कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी। वे बैठे रहते या घूमते रहते। फाटक खुला होता, तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे. बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट।
यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज में आवाज भी मिलाता है। कहता है- ‘मैं तुममें शामिल हूँ। ‘उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी- यह चरित्र है इस कुत्ते का। यह मध्यवर्गीय चरित्र है। यह मध्यवर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है। तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है। हमारी आहट पर वह भौंका नहीं,
थोड़ा-सा मरी आवाज में गुर्राया। आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं। थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया। मैंने मेजबान से कहा, ‘आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है।’
मेजबान ने बताया, ‘आज यह बुरी हालत में है। हुआ यह कि नौकर की गफलत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया। वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही। दोनों ने इसे घेर लिया। इसे रगेदा। दोनों इस पर चढ़ बैठे। इसे काटा। हालत खराब हो गई। नौकर इसे बचाकर लाया। तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है। डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाउँगा।’
मैंने कुत्ते की तरफ देखा। दीन भाव से पड़ा था। मैंने अंदाज लगाया। हुआ यों होगा –
यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा। उन कुत्तों पर भौंका होगा। उन कुत्तों ने कहा होगा – ‘अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता। ढोंग रचता है। ये पट्टा और जंजीर लगाए है। मुफ्त का खाता है। लॉन पर टहलता है। हमें ठसक दिखाता है। पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है। संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौंकेगा। हममें से है तो निकल बाहर। छोड़ यह पट्टा और जंजीर। छोड़ यह आराम। घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा। धूल में लोट।’ यह फिर भौंका होगा। इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे। यह कहकर – ‘अच्छा ढोंगी। दगाबाज, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं।’
इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिला।
कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिंतन कर रहा है।

रविवार, 18 अगस्त 2019

कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ, क‍िसी की आंख में हमको भी इंतज़ार द‍िखे ….Gulzar

कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ, क‍िसी की आंख में हमको भी इंतज़ार द‍िखे …. जैसी अनग‍िनत रचनायें हमें देने वाले संपूर्ण सिंह कालरा यान‍ि गीतकार Gulzar का आज 86वां जन्मदिन है । फिल्म इडंस्ट्री को अपने नायाब नगमों से मदहोश करने वाले Gulzar साहब की नज्में, कविताएं, शेरो-शायरी आज भी लोगों को दीवाना बना देती हैं।
काग़ज़ पर भारी-भरकम ख़याल वाली एक के बाद एक नन्ही मुन्नी नज़्में जब अंदर उतरती हैं जीने की लम्बी और गहरी कहानी आहिस्ते- आहिस्ते उभरने लगती है और फिर कोसों लम्बा सफ़र तय कर डालने का ढाढस मिलता है। यह कह कर सुकृता पॉल ने गुलज़ार साहब को याद क‍िया है।
1968 में रिलीज हुई फिल्म ‘आशीर्वाद’ के लिए संवाद लिखना हो या फिर हॉलीवुड मूवी ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ का गाना ‘जय हो’.. दशकों से अपने हुनर से लोगों का दिल जीत रहे मशहूर गीतकार, कवि, पटकथा लेखक, फिल्म निर्देशक और नाटककार गुलज़ार 18 अगस्त को अपना 84वां बर्थडे सेलिब्रेट कर रहे हैं। संपूर्ण सिंह कालरा उर्फ गुलज़ार का जन्म 1934 में हुआ था। फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है, उसके लिए उन्हें काफी संघर्ष भी करना पड़ा। वह मुंबई में मैकेनिक का काम करते थे, लेकिन उनके शौक ने ही उनकी जिंदगी बदल दी।
गुलज़ार अपने पिता माखन सिंह कालरा की दूसरी पत्नी सुजान कौर की इकलौती संतान हैं। जब वह छोटे थे, तभी उनकी मां का इंतकाल हो गया था। देश के विभाजन के वक्त उनका परिवार पंजाब के अमृतसर में आकर बस गया। इसके बाद गुलज़ार मुंबई आ गए।
मुंबई आकर गुलजार ने एक गैरेज में बतौर मैकेनिक काम करना शुरू कर दिया। पैसे कमाने के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन उन्हें बचपन से ही कविताएं लिखने का शौक था। अपने शौक के कारण ही उन्होंने मैकेनिक का काम छोड़ दिया और फिल्म इंडस्ट्री का रुख किया। गुलजार मशहूर फिल्म निर्देशक बिमल राय, ह्रषिकेश मुखर्जी और हेमंत कुमार के सहायक के रूप में काम करने लगे।
गुलज़ार ने एसडी बर्मन की फिल्म ‘बंदिनी’ से बतौर गीत लेखक अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने कई बेहतरीन गानों के बोल लिखे। उन्होंने बतौर निर्देशक भी हिंदी सिनेमा में योगदान दिया है। इसके अलावा उन्होंने दूरदर्शन पर आए शो ‘जंगल बुक’ का मशहूर गाना ‘जंगल जंगल बात चली है..’ भी लिखा था।
84 साल के गुलज़ार को 2004 में भारत के सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण से नवाजा जा चुका है। 2009 में उन्हें ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के गाने ‘जय हो’ के लिए सर्वश्रेष्ठ गीत का ऑस्कर अवॉर्ड मिला। इसी गाने के लिए उन्हें ग्रैमी अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

कुंठा परोस रहे clinics पर ये कार्यवाही काबिले-तारीफ है

सुरसा की तरह हमारे मूल्‍यों को निगल चुके बाजार का वश चले तो सभी को बीमार, बदसूरत, बेचारा व गरीब बना डाले। छोटे से पिज्‍जा के टुकड़े के लिए किसी लड़की या लड़के को ट्रैफिक रूल्‍स तोड़ते, यहां तक कि भूख के कारण लड़के से लड़की बने मॉडल को चॉकलेट खाते ही असली रूप में आते देख तो अतिशयोक्‍ति के सारे रिकॉर्ड टूट जाते हैं। लड़की जब खास क्रीम लगाती है तो गोरी होती है और जब गोरी होती है तो कॉन्‍फीडेंस और नौकरी में ऊंचे पद पर पहुंच जाती है।
रात दिन लोगों में उनके शरीर, रूप, रंग, खानपान व करियर को लेकर इतनी नकारात्‍मकता परोसते जाने का ही असर है कि आजकल किसी ना किसी तरह बच्‍चे, जवान, बूढ़े, शहर, ग्रामीण, पुरुष व महिलायें भारी कुंठा के शिकार हो रहे हैं।
ये जानते हुए भी कि ये विज्ञापन ”अपने-अपने झूठ ”सिर्फ और सिर्फ उत्‍पाद बेचने के लिए फैला रहे हैं, हम इनके उत्‍पादों के लिए अपने घरों को प्रयोगशाला और अपने शरीर को इनका ”गिनी पिग” बना चुके हैं, यानि लाइलाज बीमारियों को खुला आमंत्रण देते रहते हैं।
नकारात्‍मक और कमतर बताने का ये बाजारी फंडा एक और घिनौने रूप में तब हमारे सामने आता है जब हम शहर की ”हर दीवार” पर खानदानी शफाखानों (Sex clinics ) से जुड़े ”मर्दाना कमजोरी” के विज्ञापन देखते हैं।
मजे की बात ये है कि इन शफाखानों के डॉक्‍टर अजीब से निकनेम वाले होते हैं, गोया कि पूरा नाम लिखने से इनकी कोई ”कमजोरी” जाहिर हो जाएगी। आपत्‍तिजनक भाषाओं में लक्षणों का सरेआम प्रदर्शन ना जाने कितने पुरुषों (महिलाओं के लिए नहीं होते ये विज्ञापन) को कुंठित बनाता होगा। ऐसी कुंठायें कहां व किस रूप में निकलती होंगी, अंदाजा लगाना कोई मुश्‍किल काम नहीं। यौन अपराधों में बढ़ोत्‍तरी के पीछे अपराधी का कुंठित होना भी एक कारण अवश्‍य होता है।
इस सबके बीच अच्‍छी खबर ये है कि मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने एक सराहनीय काम यह किया है कि अब शहर की दीवारों को Sex clinics के विज्ञापन से रंगने पर प्रतिबंध के साथ-साथ भारी-भरकम जुर्माना वसूलना शुरू कर दिया है ताकि शहर में ये फिर ना दिखाई पड़ें। स्‍थानीय सांसद हेमामालिनी द्वारा इन पर आपत्‍ति जताने के बाद शुरू हुआ अभियान धार्मिक शहर की छवि को तो सुधारेगा ही, साफ-सुथरे रूप में प्रस्‍तुत भी करेगा।
खानदानी शफाखानों पर ये कड़ाई श्रद्धालुओं अब पर्यटकों के बीच ना तो अश्‍लीलता का प्रचार कर पाएगी और ना ही धार्मिक शहर के छवि को खराब करेगी।
बहरहाल, बाजार ने नितांत व्‍यक्‍तिगत शारीरिक समस्‍याओं को कुंठाओं से भर देने वालों के खिलाफ एक शहर नहीं पूरे देश में कड़े कदम उठाए जाने चाहिए। स्‍वस्‍थ समाज बनाने के भाषणों से हटकर जमीनी कार्यवाही होनी चहिए जैसे कि मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने की। कम से कम धार्मिक स्‍थानों पर बाजार के ऐसे कुचक्रों को नहीं चलने देना चाहिए क्‍योंकि यहां श्रद्धालु आध्‍यात्‍मिकता के लिए आते हैं ना कि कुंठा मोल लेने।
-अलकनंदा स‍िंंह 

रविवार, 4 अगस्त 2019

जब मेंड़ ही खेत को खाने लगे तो खेत का अस्‍तित्‍व बचेगा कैसे?

जब कर्तव्‍य पर सिर्फ और सिर्फ पैसा हावी होने लगे और ”सरकारी नौकरी” इस बात की गारंटी हो कि बिना कुछ किए धरे भी तनख्‍वाह आपको मिल ही जाएगी तो वही होता है जो आजकल उत्‍तर प्रदेश के कमोवेश सभी सरकारी स्‍कूलों में हो रहा है। यहां मौजूद 90 प्रतिशत शिक्षक, शिक्षा व्‍यवस्‍था को इसी प्रकार पलीता लगा रहे हैं। यूं भी जब मेंड़ ही खेत को खाने लगे तो खेत का अस्‍तित्‍व ही कहां बचेगा। प्रदेश की शिक्षा व्‍यवस्‍था इसी तरह अपने अस्‍तित्‍व को मिटते देख रही है।
सृजनात्‍मकता, नवोन्‍मेष को धता बताते हुए शिक्षामित्र, बीटीसी, बीएड, डीएड, डीएलएड, टीईटी, सीटीईटी के माध्‍यम नौकरी प्राप्‍त लगभग दर्जनभर से ज्‍यादा तरह के पदों पर ”कार्य” करने वाले शिक्षकों की भरमार के बावजूद प्राइमरी शिक्षा को स्‍वयं शिक्षकों ने ही मजाक बनाकर रख दिया है।
बच्‍चे स्‍कूलों से नदारद हैं, शिक्षक स्‍कूल आ ही नहीं रहे और यदि आ भी रहे हैं तो कक्षाएं नहीं ले रहे। बच्‍चे पहाड़े, पीएम, सीएम , जिले का नाम, दिन व महीनों तक के नाम नहीं बता पा रहे। आखिर इसके लिए कौन जिम्‍मेदार है। सरकार इसके लिए जब तनख्‍वाह दे रही है तो यह जिम्‍मेदारी किसकी है।
पिछले लगभग दो हफ्तों से मथुरा जिला प्रशासन लगातार जिले के सभी सरकारी स्‍कूलों में चेकिंग कर रहा है, आख्‍या में अनुपस्‍थित शिक्षकों की तनख्‍वाह काटी जाने की संस्‍तुति भी एडीएम कर रहे हैं, एबीएसए, बीएसए द्वारा रेगुलर चेकिंग न करने की शिकायत लिखित में दे रहे हैं, परंतु कुछ भी काम नहीं आ रहा और स्‍कूलों में शिक्षकों की मनमानी अपने चरम पर है।
शिक्षकों की इस सीनाजोरी के लिए मीडिया भी उतना ही दोषी है क्‍योंकि जब-जब शिक्षकों के धरना प्रदर्शन होते हैं तो बड़ी सी हेडलाइन, इनकी दुर्दशा को लेकर छापते हैं या दिखाते हैं परंतु शिक्षा की इस तरह दुर्दशा करने पर उन्‍हीं शिक्षकों के खिलाफ मीडिया एक शब्‍द नहीं लिखता।
हर महीने बंधी-बंधाई तनख्‍वाह के बावजूद शिक्षामित्र, सहायक शिक्षक आदि पदों पर बैठे अकर्मण्‍य लोग, बच्‍चों को शिक्षित करना तो दूर स्‍वयं ही अनुशासन तोड़ने के बहाने ढूढ़ते रहते हैं। वेतन भत्‍तों के लिए मरने-मारने पर हर वक्‍त आमादा तथा बात-बात में हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट पहुंचने वाले इन ”कथित” ठेकेदार शिक्षकों के बूते प्रदेश की शिक्षा व्‍यवस्‍था अपनी दुर्दशा से नहीं निकल सकती।
एक कड़वा सच ये भी है कि शिक्षा व्‍यवस्‍था जिन कांधों पर चढ़कर दौड़नी चाहिए थी, वे सिर्फ इसे ढो रहे हैं। अपने ”हालातों” के चलते शिक्षा जैसे उच्‍च्‍तम मानदंड वाले क्षेत्र में ”नौकरी” कर रहे 90 प्रतिशत शिक्षकों में शिक्षा देने का जज्‍़बा पूरी तरह से गायब है। जो स्‍वयं ही शिक्षा के मायने नहीं जानते, उनसे भला बच्‍चों को शिक्षित करने की आशा कैसे रखी जाए।
बहरहाल, ये हालात चिंतनीय हैं क्‍योंकि करोड़ों के बजट के बाद भी रिजल्‍ट शून्‍य है। वक्‍त आ गया है कि अब सरकार को ड्रेस, बस्‍ते, जूते, मिड डे मील से आगे बढ़कर सोचना होगा ताकि सरकारी स्‍कूलों में पढ़ने आने वाले बच्‍चों के भविष्‍य के साथ खिलवाड़ न हो सके।
शिक्षकों से तो इतना ही कहा जा सकता है कि…
ख्वाहिशों का मोहल्ला बहुत बड़ा होता है..
बेहतर है हम ज़रूरतों की गली में मुड़ जाएं..और अपने कर्तव्‍य को निभायें।
-अलकनंदा स‍िंह

शनिवार, 3 अगस्त 2019

Blogger of the Year 2019 : डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी व‍िजेता, मुकेश कुमार सिन्हा रहे उप विजेता


नई दिल्ली। Blogger of the Year 2019 का खिताब राजस्थान के डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी के नाम रहा और उप विजेता नई दिल्ली के मुकेश कुमार सिन्हा रहे। Blogger of the Year का फाइनल रिजल्ट 02 अगस्त को घोषित किया गया था।
नई दिल्ली के ब्लॉगर व कवि मुकेश कुमार सिन्हा रहे उप विजेता
गुजरात की प्रीति ‘अज्ञात’ टॉप 10 ब्लॉगरों में प्रथम स्थान पर रहीं
पूरे देशभर से हिन्दी भाषाई ब्लॉगरो ने किया था प्रतिभाग
गौरतलब है कि iBlogger के 4 वर्ष पूर्ण होने पर ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 का कॉन्सेप्ट व थीम iBlogger द्वारा तैयार किया गया था एवं प्राची डिजिटल पब्लिकेशन द्वारा प्रायोजित किया गया था। ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 के लिए विभिन्न क्षेत्र के हिन्दी ब्लॉगरों के आवेदन पूरे देशभर से प्राप्त हुए थे।
उपरोक्त आयोजन के अर्न्तगत प्रत्येक प्रतिभागी ब्लॉगर की प्रोफाइल को ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 के बनाई गई विशेष निर्णायक टीम द्वारा अवलोकन किया गया और फिर उनकी प्रोफाइल को iBlogger पर पाठकों की समीक्षाओं व वोट के लिए उपलब्ध करा दिया गया था। ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 का विजेता और उप विजेता का चुनाव पाठकों की समीक्षा, वोटिंग एवं निर्णायक मंडल के निर्णय के आधार पर किया गया। इसके अलावा टॉप 10 ब्लॉगर ऑफ द ईयर का चुनाव भी किया गया।
बता दें कि ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 के विजेता डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी वर्तमान में एक विश्वविद्यालय में कम्प्युटर विज्ञान का शिक्षक के पद पर कार्यरत है। उन्होंने 100 से अधिक सॉफ्टवेयर और 50 से अधिक वैबसाइट का निर्माण किया है। लगभग 35 शोध पत्रिकाओं में संपादक के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। 21 शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं और 45 शोध पत्र विभिन्न संगोष्ठियों में प्रस्तुत किए हैं। तीन मोनोग्राफ (ISBN सहित) प्रकाशित हुए हैं। 7 राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय सम्मान प्राप्त हुए हैं और 3 अन्य सम्मान हेतु चयन हुआ है। डॉ. छतलानी जी ने लगभग 150 लघुकथाएं लिखी हैं। लघुकथाओं के अतिरिक्त कविताएं, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ, बालकथाएं, बोधकथाएं, लेख एवं पत्र भी लिखे है। कई साहित्यिक प्रतियोगिताओं में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया है।
वहीं, ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 के उप विजेता मुकेश कुमार सिन्हा वर्तमान में केंद्रीय राज्य मंत्री, भारत सरकार, के प्रथम व्यक्तिगत सहायक हैं। उनकी “हमिंग बर्ड” कविता संग्रह और ‘लाल फ्रॉक वाली लड़की” (लप्रेक) का प्रकाशन हो चुका है। सिन्हा जी ने कारवां, कस्तूरी, पगडंडियाँ, “गुलमोहर”, “तुहिन”, “गूँज” व “100 कदम” (साझा कविता संग्रह) का सम्पादन भी किया है। इसके अलावा कई साहित्यक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैंं।
मुकेश कुमार सिन्हा को तस्लीम परिकल्पना ब्लोगोत्सव (अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर्स एसोसिएशन) द्वारा सर्वश्रेष्ठ युवा कवि का पुरुस्कार, “शोभना काव्य सृजन सम्मान”, परिकल्पना (अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर्स एसोसिएशन) द्वारा ‘ब्लॉग गौरव युवा सम्मान’, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ से हिंदी सेवा के लिए ‘विद्या वाचस्पति, दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल से ‘पोएट ऑफ़ द इयरश’, ‘शेर-ए-भारत’ अवार्ड, करुणावती साहित्य धारा साहित्यिक पत्रिका द्वारा साहित्य सम्मान भी प्राप्त हो चुके है। उनकी कविताएँ कविता कोष में भी शामिल की गई है। ऑल इंडिया रेडियो, इन्द्रप्रस्थ रेडियो चैनल, चैनल वन टीवी पर कविता पाठ कर चुके है। APN News टीवी के म्यूजिकल शो “मेरा भी नाम होगा” में ज्यूरी में भी शामिल रहे हैं। मुकेश जी गत 6 वर्षो से एक साहित्यिक संस्था “गूँज” का परिचालन कर रहे हैं।
2019 के Top 10 ब्लॉगरों में प्रीति ‘अज्ञात’ प्रथम स्थान पर रहीं

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इसी क्रम में 2019 के टॉप 10 ब्लॉगरों में देशभर के विभिन्न क्षेत्रों से 10 ब्लॉगर शामिल रहे।
गुजरात के अहमदाबाद से प्रीति अज्ञात ने टॉप 10 ब्लॉगरों में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। प्रीति सुप्रसिद्व मासिक वेब पत्रिका ‘हस्ताक्षर’की संस्थापक एवं संपादक के साथ ही जागरूक ब्लॉगर, सामाजिक कार्यकर्त्ता, स्वतंत्र रचनाकार है। आपको भी कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। प्रीति जी का एक काव्य-संग्रह मध्यांतर प्रकाशित हो चुका है और ललित निबंध संग्रह प्रकाशनाधीन है। इसके अतिरिक्त 16 साझा संग्रहों (काव्य, कहानी, संस्मरण) में रचनाएँ प्रकाशित, 5 पुस्तकों का संपादन तथा एक दर्ज़न से भी अधिक पुस्तकों की भूमिका एवं समीक्षा लेखन कर चुकीं है। आपको कई सारे सम्मान प्राप्त हो चुके है।
महाराष्ट्र के नई मुम्बई से सुधा सिंह ने टॉप 10 ब्लॉगरों में द्वितीय स्थान प्राप्त किया है। सुधा जी एक गृहणी एवं अध्यापिका है।
महाराष्ट्र के मुम्बई से ज्योति देहलीवाल ने टॉप 10 ब्लॉगरों में तृतीय स्थान प्राप्त किया है। ज्योति जी गृहणी के साथ ही बेहतरीन ब्लॉगर है।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले से नीलेन्द्र शुक्ल “नील” ने टॉप 10 ब्लॉगरों में चौथा स्थान प्राप्त किया है। नीलेन्द्र युवा कवि और ब्लॉगर है। उनकी एक “पुस्तक तेरी परछाईयाँ जो हमसफर है” अभी पिछले दिनो ही प्रकाशित हुई है।
बिहार से प्रज्ञा मिश्रा ने टॉप 10 ब्लॉगरों में पांचवा स्थान प्राप्त किया है। प्रज्ञा जी सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत हैं। आपको मुक्तांगन-कविता कोश नव प्रतिभा प्रोत्साहन योजना के पाँचवें चरण में कविता “आम का अचार” के लिए 10 जुलाई 2018 को द्वितीय पुरस्कार, मुम्बई के प्रसिद्ध स्लैम पोएट्री प्लेटफार्म पर द हैबिटैट में जून 2018 में आयोजित एक पोएट्री टूर्नामेंट में इम्प्रोम्पटू कविता “जगरना” के लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की सुमन कपूर ‘सु-मन’ ने टॉप 10 ब्लॉगरों में छठा स्थान प्राप्त किया हैं। सुमन वर्तमान में ग्रामीण विकास विभाग में Accountant के पद पर कार्यरत हैं।
राजस्थान के जयपुर जिले से अभिलाषा चौहान ने टॉप 10 ब्लॉगरों में सातवां स्थान प्राप्त किया है। अभिलाषा ने अपने जीवन के 15 वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में बिताएं है।
नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष ने टॉप 10 ब्लॉगरों में आठवां स्थान प्राप्त किया है। नवीन जी वाणिज्य के पेशे से जुड़े हुए है।
नूपुर शांडिल्य ने टॉप 10 ब्लॉगरों में नौवा स्थान प्राप्त किया है। नूपुर जी दो दशकों से अधिक प्रसार भारती (आकाशवाणी और दूरदर्शन ) में कार्यरत रह चुकीं है और अब वर्तमान में फ्रीलांसर हैं। आपकी नवांकुर प्रकाशन और शब्दांकुर प्रकाशन के काव्य संग्रह “काव्यालय”और “काव्यांकुर 6” में वरिष्ठ कवियों द्वारा चयनित और प्रकाशित हो चुकी है।
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से डॉ. सुशील कुमार जोशी ने टॉप 10 ब्लॉगरों में दसवां स्थान प्राप्त किया है। जोशी जी वर्तमान में कुमाउँ विश्वविद्यालय नैनीताल के सोबन सिंह जीना परिसर अल्मोड़ा के रसायन विज्ञान विभाग में भौतिक रसायन विषय के प्राध्यापक पद में कार्यरत हैं।
http://legendnews.in/blogger-of-the-year-2019-award-to-dr-chandresh-kumar-chhatlani/

बुधवार, 17 जुलाई 2019

354 A, B, C, D कानून: बीएचयू का मामला, अकेला मामला नहीं है


कोई दूसरा क्‍या मारेगा, जब महिलाऐं स्‍वयं ही अपनी कुल्‍हाड़ियों का बोझ, अपने ही कांधों पर लादे हुए हों,
अपनी सहूलियतों पर स्‍वयं कुठाराघात करने पर आमादा हों और शिकायत ये कि दुनिया हमें क्‍यों सताती है।
यौन उत्‍पीड़न में भी कुछ महिलाओं ने कानूनों का दुरुपयोग करके अत्‍याचार की वास्‍तव में शिकार हुई महिलाओं को भी अविश्‍वास के घेरे में खड़ा कर दिया है। यानि 354 A, B, C, D (यौन उत्पीड़न) कानून का दुरुपयोग कर कुल्‍हाड़ी पर स्‍वयं ही पैर दे मारा है और इसका परिणाम उन सभी महिलाओं को भुगतना होगा जो वास्‍तव में पीड़िता हैं।
बीएचयू का एक वाकया सामने आया है जहां एक शोध छात्रा द्वारा शिक्षा संकाय प्रमुख पर यौन उत्‍पीड़न का आरोप लगाया गया, हालांकि न केवल शिक्षक बल्‍कि साथी छात्रों ने भी इस बात की तसदीक कर दी है कि कम उपस्‍थिति को लेकर दी गई हिदायत छात्रा को हजम नहीं हुई और उसने ये ”विक्‍टिम कार्ड” खेला। अब विश्‍वविद्यालय कुलपति के निर्देश पर मामले की जांच को कमेटी बना दी गई है। 11 जुलाई को डीन ने कमेटी के सामने कहा कि सारा मामला कम उपस्‍थिति का है, क्‍योंकि कुछ छात्र फैलोशिप तो लेते रहते हैं परंतु क्‍लास अटेंड नहीं करते जबकि उक्‍त शोध छात्रा के गाइड तीन साल पहले ही रिटायर हो चुके हैं। जब उपस्‍थिति की जांच की गई और कई बार रिमांइंडर भी दिये गये तो उक्‍त छात्रा ने यौन उत्‍पीड़न मामले में फंसाने की धमकी भी दी। अब उस छात्रा ने कुलपति को पत्र लिखकर शिकायत कर इस मामले को सुर्खियों में ला दिया है।
जांच कमेटी सच का पता लगा लेगी परंतु एक बात निश्‍चित जानिए कि विवि प्रशासन के साथ सास बहु जैसे रिश्‍ते रखने वाले छात्र संघ इसे भुनाने में पीछे नहीं हटेंगे, संभावना इस बात की भी है कि इनके दबाव के बाद छात्रा को कथित ”न्‍याय” मिल भी जाए मगर क्‍या ये सही होगा।
कौन नहीं जानता कि कुछ समय पहले तक दहेज उत्‍पीड़न और दहेज हत्‍या रोकने को बनाया कानून ”दहेज निषेध अधिनियम, 1961” भी अपने ऐसे ही दुरुपयोग के कारण अहमियत खोता गया क्‍योंकि दहेज के बहाने ससुराल पक्ष को धमकाना, प्रताड़ित करना इसका मुख्‍य उद्देश्‍य बन गया। इसीतरह दुष्‍कर्म और यौन उत्‍पीड़न रोकने को आईपीसी की धारा 354 (छेड़खानी), 354 A, B, C, D (यौन उत्पीड़न) और धारा 375 (दुष्कर्म) है परंतु अब देखने में आ रहा है कि महिलाऐं अपना उद्देश्‍य पूरा करने को इन कानूनों का दुरुपयोग धड़ल्‍ले से कर रही हैं क्‍योंकि आईपीसी की धारा 354, 354 A, B, C, D और धारा 375(दुष्कर्म) के प्रावधानों में सिर्फ पुरुष को अपराधी माना गया है और महिला को पीड़िता। इसी प्राविधान का लाभ उठाते हुए कई मामलों में तो पूरे षडयंत्र के तहत परिवारीजन ही इसे प्‍लांट करते हुए पाए गए।
बहरहाल यौन उत्‍पीड़न कानून को अपना हथियार बनाने वाली ऐसी ही महिलायें उन महिलाओं के पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारने का काम कर रही हैं जो वास्‍तव में प्रताड़ना की शिकार हैं। बीएचयू जैसी खबरों की बढ़ती तादाद के बाद यौन उत्‍पीड़न मामलों में महिलाओं को लेकर सहानुभूति अब संशय में बदल रही है, यह आत्‍मघाती स्‍थिति महिला हितकारी कानूनों को तहस नहस कर देगी।
-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

कुछ लिखने से पहले…एक दृष्‍टांत

महाभारत का एक दृष्‍टांत है जिसे अकसर हम अपनी बातों में दोहराते हैं और दूसरों को उपदेशात्‍मक शैली में सुनाते भी हैं, मगर सिर्फ दूसरों को, स्‍वयं इसे कितना सूझते-बूझते हैं इससे कोई मतलब नहीं।
ये दृष्‍टांत, श्रीकृष्‍ण और द्रौपदी संवाद से है—-
18 दिन के युद्ध ने, द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था…शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी!
शहर में चारों तरफ़ विधवाओं का बाहुल्य था..पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था।
अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी
द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।
तभी, श्रीकृष्ण कक्ष में दाखिल होते हैं…
द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है …
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं…
थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं।
द्रोपदी: यह क्या हो गया सखा ??
ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।
कृष्ण: नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती! वह हमारे ”कर्मों को परिणामों में” बदल देती है।
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी ना और, तुम सफल भी हुई, द्रौपदी! तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ… सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव समाप्त हो गए! तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !
द्रोपदी: सखा, तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए ?
कृष्ण: नहीं द्रौपदी, मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूँ! हमारे कर्मों के परिणाम (अच्‍छे अथवा बुरे) को हम, दूर तक नहीं देख पाते और जब वे हमारे सामने आते हैं, तब तक परिस्‍थितियां बहुत कुछ बदल चुकी होती हैं, तब हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता।
द्रोपदी: तो क्या, इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ कृष्ण?
कृष्ण: नहीं, द्रौपदी तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो…
लेकिन, तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।
द्रोपदी: मैं क्या कर सकती थी कृष्ण?
कृष्ण: तुम बहुत कुछ कर सकती थीं! …जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ…तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती तो, शायद परिणाम
कुछ और होते।
इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया…तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते।
और…
उसके बाद तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया…
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं। वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता…तब भी शायद, परिस्थितियाँ कुछ और होती ।
हमारे शब्द भी
हमारे कर्म होते हैं द्रोपदी…
और, हमें अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना बहुत ज़रूरी होता है…अन्यथा, उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं… अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।
संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है…जिसका “ज़हर”
उसके “दाँतों” में नहीं, “शब्दों” में है…
द्रोपदी को यह सुनाकर हमें श्रीकृष्‍ण ने वो सीख दे दी जो आएदिन हम गाल बजाते हुए ना तो याद रख पाते हैं और ना ही कोशिश करते हैं। नतीजतन घटनाऐं दुर्घटनाओं में बदल जाती हैं और मामूली सा वादविवाद रक्‍तरंजित सामाजिक क्‍लेश में…
मॉबलिंचिंग और क्‍या है…अपनी वाणी, अपनी आकांक्षाओं की हिंसक परिणति ही ना। जो स्‍वयं कुछ नहीं कर पाते वे भीड़ का सहारा लेते हैं और ऐसे तत्‍व ही समाज और सरकारों की नाक में दम किए हुए हैं। वे सोचते हैं कि जो अपराध वे कर रहे हैं उसे कोई नहीं देख रहा परंतु नियति का बूमरैंग घूमता अवश्‍य है।
बहरहाल आंख मूंदकर स्‍थापित की गईं धारणाओं को बदलने का अब वक्‍त आ गया है। धारणाऐं जैसे कि कोई मां अपने बच्‍चे का बुरा नहीं सोचती, साधु सदैव दूसरों का कल्‍याण चाहता है, अनुसूचित और अल्‍पसंख्‍यक समुदाय हमेशा ‘पीड़ित’ ही होते हैं, बलात्‍कार हमेशा महिला का होता है, कामगार हमेशा शोषित रहता है, बच्‍चे हमेशा सच ही बोलते हैं, शिक्षक हमेशा शिष्‍य को सही शिक्षा देते हैं, डॉक्‍टर सेवाभावी होते हैं, व्‍यवसायी हमेशा चोरी करता है और राजनेता निकृष्‍ट और भ्रष्‍ट होते हैं और अधिकारी ‘बेचारे’…आदि उदाहरण अनेक हैं जो शब्‍दों के सहारे ही अब तक पीड़ित दिखकर पीड़क बनते गए और अब स्‍थिति विस्‍फोटक हो चुकी है।
श्रीकृष्‍ण याद आ रहे हैं…द्रोपदी (जनता) को समझा भी रहे घटनाओं-परिस्‍थितियों के रूप में उदाहरण दे देकर परंतु द्रोपदी आंख-कान-मुंह बंद किए हुए है। हम भी तो देखें कि यह कौन सी महाभारत की नींव रखी जा रही है…।
-अलकनंदा सिंह

रविवार, 16 जून 2019

एक बेटी थी सोनोरा जिसके कैंपेन ने शुरू कराया Father’s Day

सोनोरा ने Fathers Day मनाने की ठान ली थी, इसके लिए यूएस तक में कैंपेन किया. इस तरह 19 जून 1910 को पहली बार फादर्स डे मनाया गया.
बात 1909 की है. सोनोरा लुईस स्मार्ट डॉड (Sonora Louise Smart Dodd) नाम की 16 साल की लड़की ने Father’s Day मनाने की शुरुआत की. दरअसल, जब वो 16 साल की थी तब उसकी मां उसे और उसके पांच छोटे भाइयों को छोड़कर चली गईं.
सोनोरा और भाइयों की जिम्मेदारी उसके पिता पर आ गई. एक दिन 1909 में वह मदर्स डे (Mother’s Day) बारे में सुन रही थी, तभी उसे महसूस हुआ कि ऐसा एक दिन पिता के नाम भी होना चाहिए.
सोनोरा ने फादर्स डे (Father’s Day) मनाने के लिए एक याचिका दायर की. उसमें सोनोरा ने कहा कि उसके पिता का जन्मदिन जून में आता है इसलिए वो जून में ही फादर्स डे मनाना चाहती है. इस याचिका के लिए दो हस्ताक्षरों की जरुरत थी. इस वजह से उसने आस-पास मौजूद चर्च के सदस्यों को भी मनाया.
लेकिन फादर्स डे मनाने की मंजूरी नहीं मिली. लेकिन सोनोरा ने फादर्स डे (Fathers Day) मनाने की ठान ली थी, इसके लिए यूएस तक में कैंपेन किया. इस तरह 19 जून 1910 को पहली बार फादर्स डे मनाया गया.
Father’s Day 2019: पापा को प्यार जताने के लिए पूरी जिंदगी कम है. बावजूद इसके हर साल जून के तीसरे संडे को फादर्ड डे (Father’s Day) मनाया जाता है. ये दिन खास पापा को अपना प्यार दिखाने और उन्हें स्पेशल महसूस कराने का होता है. गिफ्ट्स, केक और मिठाइयों के साथ इस दिन उन्हें खास फादर्स डे के मैसेजेस (Father’s Day Messages) भी भेजे जाते हैं. इन सबके अलावा आप अपने पापा के लिए एक काम और कर सकते हैं और वो है अपने व्हाट्सएप और फेसबुक पर फादर्स डे के स्टेटस (Father’s Day Status) लगाएं.
वहीं, मदर्स डे 1914 में बतौर नेशनल हॉलिडे मनाया जाने लगा था लेकिन 1972 तक फादर्स डे को राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं किया गया था. आगे सालों में प्रेज़िडेंट वुड्रो विल्सन, कैल्विन कॉलिज और लिंडन बी जॉनसन सभी ने पिता के समर्पित इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने के बारे में लिखा. आखिरकार साल 1970 में, राष्ट्रपति रिचर्ड दस्तखत कर अपनी रज़ामंदी दी.

Who was Sonora Louise Smart Dodd?

Dodd, born in 1882, was the daughter of American Civil War veteran William Jackson Smart. She was 16 years old when her mother died in childbirth with her sixth child.
Following her mother’s death, Dodd helped her father raise her younger brothers. She held her father in high esteem and was motivated by the newly recognised Mother’s Day to fight for the recognition of fatherhood.
धीरे-धीरे फादर्स डे मनाने का ट्रेंड पूरी दुनिया में फैला. अब हर घर में हर फादर्स डे बहुत ही प्यार के साथ मनाया जाता है.
-Legend News

शनिवार, 1 जून 2019

शीशम के एक बड़े टुकड़े से बनी श्रीराम की प्रतिमा स्‍थापित होगी अयोध्‍या में

अयोध्या में कोदंड श्रीराम की सात फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी। तमिलनाडु में बनी यह प्रतिमा अयोध्या शोध संस्थान में प्रतिष्ठित की जाएगी, जिसे बनाने में 3 साल का समय लगा है।


संस्थान ने इस आदम कद प्रतिमा को कर्नाटक सरकार के उपक्रम ‘कावेरी’ से 35 लाख रुपए में खरीदा है।
खास बात यह है कि इस प्रतिमा को शीशम की लकड़ी के एक बड़े टुकड़े से ही बनाया गया है।


संस्थान के अधिकारियों ने बताया कि जून के पहले हफ्ते में प्रतिमा की स्थापना के समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में मौजूद रहेंगे। बताया जा रहा है कि इस प्रतिमा को तैयार करने वाले कलाकार को हस्त शिल्प के लिए राष्ट्रपति सम्मान मिल चुका है। अयोध्या में आने वाले श्रद्धालुओं को इस प्रतिमा की उपस्थिति एक नया अनुभव होगी। साथ ही यह भगवान राम की विराट छवि और अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी अलग-अलग रूपों में स्वीकार्यता को दर्शाएगी।


भगवान राम के धनुष को कोदंड के नाम से जाना जाना जाता है

भगवान राम के धनुष को कोदंड के नाम से जाना जाना जाता है। जब वह माता सीता की खोज के लिए दक्षिण भारत पहुंचे तो वनवासी रूप में उनके हाथ में उनका धनुष कोदंड था। उन्होंने अपनी पत्नी सीता की रक्षा के लिए धनुष उठाया था लिहाजा दक्षिण भारत में उनका परिचय एक ऐसे पुरुष के तौर पर होता है जो ‘स्त्री रक्षक’ हैं इसलिए तमिलनाडु में भगवान राम के कोदंड स्वरूप को पूजा जाता है। स्त्रियों में श्रीराम के इस स्वरूप को आदर और सम्मान दिया जाता है।
देशभर में भगवान राम की जिन रूपों में पूजा की जाती है, उसका विशेष कारण है। कहते हैं- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी तैसी। यानी जिसकी जैसी भावना होती है, उसे भगवान की वैसी मूर्ति दिखती है। यह बात श्रीराम के जीवन काल की घटनाओं पर भी लागू होती है। अयोध्या और इसके आस-पास के क्षेत्र के लोगों ने उन्हें बाल्य रूप में देखा था तो वहां उनकी पूजा ‘बाल राम’ रूप में की जाती है।


मिथिला क्षेत्र में उन्होंने सीता से स्वयंवर किया था, तो वहां उन्हें ‘दूल्हा राम’ के रूप में पूजा जाता है। 14 वर्ष के वनवास के दौरान वह काफी समय मध्य प्रदेश और चित्रकूट में रहे तो वहां उनकी छवि ‘बनवासी राम’ की है। इसी तरह जब वह रावण द्वारा सीता मां का अपहरण कर लिए जाने के बाद उनकी तलाश करते हुए हाथ में अपने धनुष कोदंड के साथ दक्षिण भारत पहुंचते हैं, तो वहां उनके कोदंड स्वरूप को पूजा जाता है, जो स्त्री के सम्मान के लिए रावण जैसे आतताई से भिड़ने के लिए तत्पर हैं।

मंगलवार, 14 मई 2019

यूपी बोर्ड की शिक्षा कुव्‍यवस्‍था, बानगी बने 165 स्‍कूल

हमारे देश में शिक्षा का अधिकार कहता है कि शिक्षा सबके लिए हो, शिक्षा सर्वसुलभ हो, शिक्षा समाज के निचले पायदान पर बैठे व्‍यक्‍ति तक पहुंचे…मगर इस प्रक्रिया को पूरी करने वाली सबसे अहम कड़ी शिक्षक ही जब अपने कर्तव्‍य निर्वहन में भ्रष्‍ट और नाकारा उदाहरण पेश करते दिखाई दें तो इस अभियान का गर्त में जाना निश्‍चित है।
शिक्षा को व्‍यवसायिक और नौकरी का माध्‍यम मानकर चलने वाली सोच का ही नतीज़ा है कि यूपी बोर्ड के इंटरमीडिएट व हाईस्‍कूल रिजल्‍ट में प्रदेश के कुल 165 स्‍कूल का परिणाम शून्‍य रहा। प्रदेश के ये स्‍कूल कोशांबी, प्रयागराज, मिर्ज़ापुर, इटावा, बलिया, गाजीपुर, चित्रकूट और आजमगढ़ के हैं।
कोई सामान्‍य बुद्धि वाला व्‍यक्‍ति भी बता देगा कि रिजल्‍ट उन स्‍कूल का ही खराब रहा, जहां इस बार नकल के ठेके नहीं उठाये जा सके। इन ठेकों में शिक्षक व प्रधानाचार्यों से लेकर कॉपी चेकर्स और शिक्षा बोर्ड के आला अधिकारी भी हिस्‍सेदार हुआ करते थे। इस पूरी ठेकेदारी प्रथा के इतर शिक्षा किस हाल में हैं, ये तब पता लगा जब 165 स्‍कूल ने इस तरह ”नाम कमाया”।
सरकारी खानापूरी की तर्ज़ पर अब माध्‍यमिक शिक्षा परिषद इसका निरीक्षण-परीक्षण करेगा कि ऐसा क्‍यों हुआ, इन स्‍कूलों के प्रधानाचार्यों से जवाब तलब किया गया है, इसके बाद जांच कमेटी के विशेषज्ञ कारण तलाशेंगे, फिर निवारण सुझायेंगे, दोषी व्‍यक्‍ति व प्रतिकूल स्‍थितियों को लेकर ”फाइल ”बनेगी, कुछ नपेंगे कुछ को ”विशेष चेतावनी” देकर ”बख्‍श” दिया जाएगा।
इस पूरी कवायद में शिक्षा और बच्‍चों के भविष्‍य पर कोई कुछ नहीं बोलेगा। उक्‍त स्‍कूलों के शिक्षक तो खैर सोचेंगे भी क्‍यों। उन्‍हें बमुश्‍किल सड़कों पर आए दिन विरोध प्रदर्शन करके ये ”रोजगार” मिला है। लाठियां खाकर शिक्षक की ”नौकरी” हासिल हुई है। उन्‍हें शिक्षा के स्‍तर या बच्‍चों के भविष्‍य से कोई लेना देना नहीं होता जबकि पूरे साल इन स्‍कूलों में क्‍या पढ़ाया गया और किस तरह ये शर्मनाक स्‍थिति आई, इस पर सबसे पहले शिक्षकों को ही ध्‍यान देना चाहिए।
आए दिन ये दिवस…वो दिवस.. मनाने वाले हम लोग इंस्‍टेंट की अभिलाषा में गुरू से मास्‍टर और मास्‍टर से नकल माफिया तक आ चुके हैं। ऐसे में क्‍या हम अपने बच्‍चों से ये आशा कर सकते हैं कि वो सभ्‍य सुसंस्‍कृत बनेंगे, उन शिक्षकों को ”गुरू” मानते हुए परीक्षा में अव्‍वल आऐंगे जो स्‍वयं अच्‍छे शिक्षक भी नहीं बन पाए। जो ये शर्म महसूस नहीं कर पा रहे कि उनके स्‍कूल ”शून्‍य” कैसे रह गए। ये तो उन शिक्षकों व प्रधानाचार्यों को स्‍वयं सोचना चाहिए क्‍योंकि हर बच्‍चे का प्रदर्शन स्‍वयं उनकी काबिलियत का प्रदर्शन होता है। ऐसे में 165 स्‍कूल बानगी हैं कि शिक्षण कार्य में लगे कर्मचारी (सिर्फ गुरु ही नहीं) किस तरह हमारी प्रतिभाओं का नाश करने पर आमादा है।
शिक्षा कभी ज्ञान का पर्याय हुआ करती थी और गुरू को गोविंद (ईश्‍वर) से भी श्रेष्‍ठ पद प्राप्‍त था, लेकिन आज की शिक्षा व्‍यवसाय बन चुकी है और गुरू उस व्‍यवसाय का एक मोहरा। निजी स्‍कूलों में जहां इस व्‍यवसाय का रूप खालिस धंधेबाजी बन चुका है वहीं सरकारी स्‍कूलों में इसी के लिए नकल के ठेके लिए और दिए जाते हैं।
इन हालातों में सर्वशिक्षा का उद्देश्‍य पूरा भी कैसे किया जा सकता है। सरकारी मशीनरी और उसके टूल्स इतने निरर्थक हो चुके हैं कि उनकी उपयोगिता पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लग गया है।
शिक्षा को सबसे निचले पायदान तक पहुंचाना है तो इस क्षेत्र में लगी मशीनरी और उसके टूल्‍स का मुकम्‍मल इंतजाम करना होगा अन्‍यथा आज जो कहानी 165 schools की सामने आई है, वो कल 1650 की भी हो सकती है।
-अलकनंदा सिंंह

शनिवार, 11 मई 2019

मंटो मर नहीं सकता...कभी नहीं

मंटो एक जगह कहते हैं कि - "मैं उस सभ्यता, उस समाज की चोली क्या उतारुँगा जो पहले ही नंगी है।" इस कथन में मंटो ने समाज की सच्चाई पर एक व्यंग्य किया है, एक ऐसा व्यंग्य जो समाज कभी नहीं पचा सकता। मंटो पर उनकी भाषा और कहानियों की वजह से कई मुकदमे भी चले, जिनमें उनकी कहानियों को अश्लील बताकर समाज के लिये घातक बताया लेकिन यहाँ भी मंटो डटे रहे और इसके ख़िलाफ़ खुलकर लड़े।

उर्दू के जाने-माने लेखक सआदत हसन मंटो का जन्‍म 11 मई 1912 को हुआ था। 18 जनवरी 1955 को उनका देहांत हो गया। अपनी लेखनी से समाज के चेहरे को तार-तार कर देने वाले सआदत हसन ‘मंटो’ को पहले लोगों ने साहित्यकार मानने से इंकार कर दिया था।
अपनी लघु कथाओं… बू, खोल दो, ठंडा गोश्त और टोबा टेकसिंह के लिए प्रसिद्ध हुए सआदत हसन मंटो कहानीकार होने के साथ-साथ फिल्म और रेडिया पटकथा लेखक तथा पत्रकार भी थे।
अपने छोटे से जीवनकाल में सआदत हसन मंटो ने 22 लघु कथा संग्रह, एक उपन्यास, रेडियो नाटक के पांच संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह और व्यक्तिगत रेखाचित्रों के दो संग्रह प्रकाशित किए
कहानियों में अश्लीलता के आरोपों की वजह से मंटो को छह बार अदालत जाना पड़ा था, जिसमें से तीन बार पाकिस्तान बनने से पहले और बनने के बाद, लेकिन एक भी बार उनके ऊपर आरोप साबित नहीं हो पाए। मंटो की कुछ रचनाओं का दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद किया हुआ।

मंटो ने भी रूसी कथाकार आंतोन चेखव की तरह अपनी कहानियों के दम पर अपनी पहचान बनाई
कहते हैं कि भारत पाकिस्तान बंटवारे के बाद मंटो पागल हो गए थे। उसी पागल दिमाग से निकली उनकी कहानी ‘खोल दो’ यथार्थ से दो-दो हाथ करती है।

मंटो ने एकबार कहा था- मैं अफ़साना नहीं लिखता, अफ़साना मुझे लिखता है। कभी-कभी हैरत होती है कि यह कौन है, जिसने इतने अच्छे अफ़साने लिखे हैं?
“मेरा कलम उठाना एक बहुत बड़ी घटना थी, जिससे ‘शिष्ट’ लेखकों को भी दुख हुआ और ‘शिष्ट’ पाठकों को भी”
दक्षिण एशिया में सआदत हसन मंटो और फैज़ अहमद फैज़ सब से ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक है।

पिछले सत्तर साल में मंटो की किताबों की मांग लगातार रही है। एक तरह से वह घर-घर में जाना जाने वाला नाम बन गया है। उनके सम्पूर्ण लेखन की किताबों की जिल्दें लगातार छपती रहती हैं, बार-बार छपती हैं और बिक जाती हैं।


यह भी सचाई है कि मंटो और पाबंदियों का चोली-दमन का साथ रहा है। हर बार उन पर अश्लील होने का इल्ज़ाम लगता रहा है और पाबंदियां लगाई जाती हैं।
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 9 मई 2019

चिदंबरम साहब…अतीत पीछा नहीं छोड़ता, आपकी चाटुकारिता भी इतिहास में दर्ज़़ होगी

आइना सच नहीं बोलता बल्‍कि आपकी उस इमेज को रैप्‍लिकेट करता है जो पब्‍लिकली दिखाई देती है, आइने द्वारा दिखाई गई इमेज आपकी अंतरात्‍मा की इमेज से अलग होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि सच अंतरात्‍मा में छुपा होता है ना कि आइने की इमेज में ।
यूपीए शासनकाल में वित्‍तमंत्री रहे वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता, वरिष्‍ठ वकील, वरिष्‍ठ आर्थिक विद्वान पी. चिदंबरम ने कल एक ऐसा ट्वीट किया जिसने उनकी तमाम ”वरिष्‍ठ उपाधियों” की पोल खोलते हुए उनके इस आइनाई इमेज का सच सामने ला दिया।
ट्वीट में उन्‍होंने लिखा – ‘De mortuis nihil nisi bonum’ “मृत व्यक्ति के लिए कभी बुरा ना बोलें”। क्या पीएम ने यह प्राचीन कहावत सुनी है?
क्या कोई भी धर्म किसी मृत व्यक्ति को अपमानित करने की इजाज़त देता है?
चिदंबरम साहब चूंकि इंटरनेशनल स्‍तर के ज्ञानी व्‍यक्‍ति हैं इसलिए उन्‍होंने लैटिन कहावत का इस्‍तेमाल पीएम नरेंद्र मोदी को गरियाने के लिए किया वरना देसी ज्ञानी होते तो भगवद्गीता को बांचते जहां कर्मप्रधान माना गया है। अर्थात् मनुष्‍य जैसा कर्म करता है, समाज उसे वैसे ही विभूषित करता है।
लैटिन कहावत ”De mortuis nihil nisi bonum and De mortuis nil nisi bene” का उद्धरण, चिदंबरम साहब द्वारा कहा गया वो अधूरा सच है जो आइने में तस्‍वीर तो दिखाता है मगर उल्‍टी। ये सच अधूरा इसलिए भी है क्‍यों कि इस कहावत में कहीं भी ”मृत व्‍यक्‍ति के कर्म” के आधार पर उसका ”आंकलन” करने से नहीं रोका गया। इस आंकलन के आधार पर ही भगवान श्रीकृष्‍ण ने गीता में अच्‍छे और निष्‍काम कर्म करने के लिए प्रेरित किया।
चिदंबरम साहब, आप तो पीएम मोदी की आलोचना करने में भगवद्गगीता तक को भूल गए और राजीव गांधी का पूरा सच बताने पर भड़क गए जबकि 1984 के जिस ”सिख नरसंहार” को कांग्रेसियों और उनके तत्‍कालीन मीडियाहाउसेस ने सिख दंगा कहकर कातिलों के सिर से इल्‍ज़ाम हल्‍का करने का गुनाह किया, वह आज भी राजीव गांधी सहित समूची कांग्रेस का पीछा कर रहा है। संभवत: इसीलिए गत दिनों सिखों के एक समूह ने बाकायदा चिठ्ठी लिखकर राहुल गांधी से अनुरोध किया है कि वह अपने पिता को ‘शहीद’ न कहें।
आप अपनी अतिबुद्धिमता के अहंकार में शायद ये भी भूल गए कि हमारे सनातन धर्म में कर्म ही राजा और प्रजा का भाग्‍य तय करते आए हैं। कर्म ही होते हैं जो पीढ़ियों तक अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कर्म ही थे जिन्‍होंने रावण, कंस, दुशासन, दुर्योधन, तैमूर लंग, गोरी, गजनवी, बाबर, औरंगजेब, हिटलर के बाद नाथूराम गोडसे को भी सदैव के लिए खलनायक बना दिया। अफजल गुरु और कसाब को कैसे याद किया जाए, ये भी बताइये ज़रा। शासक के कार्यों की समीक्षा करके ही जनता सर्वश्रेष्‍ठ चुनती है, यही लोकतंत्र है परंतु एक बात निश्‍चित है कि अच्‍छे हों या बुरे कर्म कभी मनुष्‍य का पीछा नहीं छोड़ते।
राजीव गांधी यदि सिख नरसंहार की भर्त्सना करते तो शायद उन्‍हें अलग तरह से याद किया जाता परंतु उन्‍होंने इसे जायज ठहराया और ये इबारत इतिहास में दर्ज हो गई कि बड़ा पेड़ गिरने पर धरती तो हिलती ही है। नरसंहार से उपजी आहें उनके नाम को कभी इज्‍ज़त नहीं बख्‍शेंगीं, ये निश्‍चित है। चिदंबरम साहब, चाटुकारिता ही करनी थी तो मिसाल अच्‍छी देते। मेरी मानिए तो गीतापाठ शुरू कर दीजिए जिसमें अतिज्ञानी महात्‍मा और वरिष्‍ठतम भीष्‍म को भी शासन के पायों से बंधे रह कर अधर्म का साथ देने के लिए अर्जुन के हाथों मृत्‍युशैया तक पहुंचना पड़ा था। इस तरह राजीव गांधी का महिमामंडन कर सहानुभूति के रूप में राजनैतिक लाभ लेने की धूर्ततापूर्ण कोशिश ना करिए क्‍योंकि सच्चाई तथ्यों के साथ जनता के सम्मुख रखना धर्मानुरूप है।
”मृत व्यक्ति के लिए कभी बुरा ना बोलकर” हम लोकतंत्र का ही अपमान करेंगे।

मंगलवार, 7 मई 2019

दया के पात्र हैं ये दसवीं और बारहवीं परीक्षा के टॉपर

कल सीबीएसई का दसवीं का रिजल्‍ट आया, इससे पहले सीबीएसई का ही 12वीं का और यूपी बोर्ड की भी दोनों कक्षाओं का रिजल्‍ट आ चुका है। सीबीएसई में जहां बच्‍चों ने टॉपर होने के सारे रिकॉर्ड्स को धराशायी किया वहीं यूपी बोर्ड ने भी ऐसे ही रिकॉर्ड बनाए। यानि कदम दर कदम , इन दोनों ही बोर्ड परीक्षाओं में अंतर सिर्फ इतना रहा कि यूपी बोर्ड के लिए एनरोल होने वाले लाखों बच्‍चों ने ”नकल न कर पाने” की प्रतिकूल परिस्‍थितियों में अपना समय जाया नहीं किया और परीक्षा ही छोड़ दी। शेष रहे बच्‍चों ने अपनी अपनी मानसिक काबिलियत को ”स्‍कोरिंग” बना कर बता दिया।
बोर्ड रिजल्‍ट के बाद टॉपर्स की तस्‍वीरों से भरे अखबार और इन अखबारों में मोटे चश्‍मों से झांकते तथा माता-पिता की आकांक्षा के बोझ तले इंटरव्‍यू देते जा रहे बच्‍चों ने अभी सिर्फ 10वीं-12वीं की परीक्षाएं ही पास की हैं लेकिन इनसे कहलवाया जा रहा है कि वो ”क्‍या-क्‍या” बनेंगे।
इन टॉपर्स के अदना से मन पर आपदा की तरह गिराई जा रही यह स्थिति सहन नहीं हो रही क्‍योंकि ये ही वो स्‍थिति है जो बच्‍चों को समय से पहले प्रौढ़ बना रही है।
आप भी देखिए अखबार उठाकर कि क्‍या किसी बच्‍चे के चेहरे पर टॉपर बनने की आत्‍मसंतुष्‍टि, शांति है। या कितने हैं जो स्‍वस्‍थ दिखाई दे रहे हैं। हर चेहरा चिंतातुर है कि अब आगे क्‍या?
प्रिंट मीडिया कुछ अधिक ही बौरा गया है और उसके कई-कई पन्‍नों में सिर्फ टॉपर ही छाए हुए हैं। ज़रा सोचकर देखिए कि उन बच्‍चों के मन पर क्‍या गुजर रही होगी जो किसी भी कारणवश टॉप नहीं कर पाए, मां बाप तो उनके भी आकांक्षी रहे होंगे, उन बच्‍चों के मन में आ रहा होगा कि वे ऊंचे ओहदे पर पहुंचें।
ये मीडिया का कसाईपन टॉप न कर पाए बच्‍चों का जो मानसिक शोषण कर रहा है, उस पर सोचने का यही वक्‍त है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के ज़माने में जब हम टेक्‍नीकली, सोशली इतने एक्‍टिव हैं कि एक क्‍लिक पर लोगों के मन, घर और जीवन में क्‍या क्‍या चल रहा है, ये जान सकते हैं तो इन बच्‍चों का मन क्‍यों नहीं पढ़ पा रहे।
सच पूछा जाए तो आज के ये टॉपर बच्‍चे अधिक दया के पात्र हैं क्‍योंकि जाने अनजाने इनके मन पर ”आकांक्षाओं का इतना बोझ” लादा जा रहा है कि वो उसी को पूरा करने की उधेड़बुन में लगे हैं। टापर बनने की खुशी महसूस करने से पहले उन्‍हें ये चिंता सताने लगी है कि अब आकांक्षाओं से कैसे जूझा जाए। उन्‍हें इस गर्त में से तो उनके माता पिता भी नहीं उबारने वाले क्‍योंकि ये देन उन्‍हीं की है।
बहरहाल टॉप आने वाले बच्‍चे, टॉप कराने वाले स्‍कूल-संस्‍थान एक ऐसे चक्रव्‍यूह को रच रहे हैं जिसके बीच ”नेचुरल इंटेलीजेंस, नेचुरल क्‍यूरिओसिटी और नेचुरल बिहेवियर” शायद ही कभी पनप पाए।
बच्‍चों के ऊपर लदा यही वो बोझ है जो गत कई वर्षों से कोचिंग सेंटर्स भुना रहे हैं। याद आते हैं वो चेहरे जो कोटा (राजस्‍थान) के कोचिंग हब में अपने जीवन को खत्‍म करने पर बाध्‍य हुए क्‍योंकि उनके मन में भी कुछ ऐसा ही चल रहा होगा। टॉप आने का खेल मेधा को चाट रहा है। स्‍कूल, कोचिंग संस्‍थान और ट्यूशन तो खैर बाजार हैं, कम से कम हम तो अपने बच्‍चों को बाजार की कमोडिटी ना बनाएं। मेधा जीवन की थाती बने ना कि शोषक। निश्‍चित ही इंसान बने रहने के लिए ये एकमात्र आवश्‍यकता है, बाकी तो नई पीढ़ी स्‍वयं अपना रास्‍ता खोज ही लेगी।