सोमवार, 28 सितंबर 2020

‘कौवा कान ले गया’ जैसा है क‍िसान आंदोलन का सच

 

अनियंत्रित अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता के दुष्‍परिणाम: 
कुछ नासूर ऐसे होते हैं जो क‍िसी एक व्यक्त‍ि नहीं बल्क‍ि पूरे समाज को अराजक स्थ‍ित‍ि में झोंक देते हैं, ऐसा ही एक नासूर है अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता और लोकतंत्र बचाने के नाम पर ''आंदोलन'' की बात करना, फि‍र चाहे इसके ल‍िए कोई भी अराजक तरीका क्यों ना अपनाया जाये। हाल ही में क‍िया जा रहा क‍िसान आंदोलन इसी अराजकता और भ्रम की पर‍िणत‍ि है। ''क‍िसानों के नाम पर'' क‍िये जाने वाले इस आंदोलन के कर्ताधर्ता दरअसल भयभीत हैं क‍ि उनकी सूदखोर लॉबी के हाथ से न‍िकल कर क‍िसान अपनी उपज का खुद माल‍िक बन जायेगा। 

आंदोलन का जोर हर‍ियाणा, पंजाब में ज्यादा रहा क्योंक‍ि इन दोनों ही प्रदेशों में मंडी कारोबारी हों या कोल्ड स्टोरोज चेन के माल‍िक सभी नेता हैं। हर‍ियाणा में देवीलाल के पोते दुष्यंत चौटाला या पंजाब के अकाली दल की बादल फैम‍िली का करोबारी ह‍ित इससे प्रभाव‍ित हो रहा है। ठीक यही स्थ‍िति महाराष्ट्र में एनसीपी के पवार फैम‍िली की भी है, तभी तो अज‍ित पवार ने कहा क‍ि वे कानून को महाराष्ट्र में लागू नहीं होने देंगे।  पश्च‍िमी उत्तरप्रदेश में भी भाक‍ियू ने प्रदर्शन क‍िये, इसमें भाग लेने वाले ''क‍िसान'' दरअसल मंडी में कमीशन एजेंटों  व आढ़त‍ियों के वे गुर्गे ही न‍िकले परंतु यहां उनकी '' नेताग‍िरी'' की सारी हवा पढ़े ल‍िखे क‍िसानों ने ही न‍िकाल दी।  

संसद में भी आपराध‍िक पृष्ठभूम‍ि वालों ने तो भरपूर अराजकता फैलाने की कोश‍िश की, संसद के बाहर धरना द‍िया, राष्ट्रपत‍ि से जाकर भी म‍िले क‍ि व‍िधेयकों को पास न क‍िया जा सके और कहीं से भी प्राणवायु म‍िल सके परंतु अब यह कानून ''कृषि उत्पाद व्यापार व वाणिज्य विधेयक-2020'' बन गया। इसमें  किसानों के हित में ऐसे प्रावधान किए गए हैं जो कृषि उत्पाद बाजार की खामियों को दूर करेंगे। अब किसानों को अपना उत्पाद बेचने के लिए एपीएमसी यानी कृषि मंडियों तक सीमित रहने के लिए मजबूर नहीं होना होगा। कानून बनने के बाद राज्य की मंडियां या व्यापारी किसी प्रकार की फीस या लेवी नहीं ले पाएंगे। ज‍िस एमएसपी को लेकर संशय पैदा क‍िया जा रहा है , केंद्र सरकार ने अगले ही कदम में रबी की फसलों का एमएसपी बड़ा कर ये शंका भी न‍िर्मूल साब‍ित‍ कर दी। अब...? अब ये क्या करें .. कहने को कुछ नहीं ..बचा तो कुलम‍िलाकर ये कौआ कान ले गया जैसी कहावत को ही चर‍ितार्थ कर रहे हैं जहां ना कौआ है ना ही कान गायब है ..है तो बस स‍िर्फ हंगामा ..वो भी बेवजह। 

वर्ष 1967 में बना कृषि बाजार उत्पाद समिति यानी एपएमसी एक्ट और वर्ष 1991 के बाद आर्थ‍िक सुधारों के बाद भी बिचौलियों के कारण कृषि उत्पाद बाजारों की उपेक्षा, किसानों का शोषण के ल‍िए सरकारी लाइसेंस ने स्थ‍ित‍ि औश्र ब‍िगाड़ी ही। हालांक‍ि 2001 में शंकरलाल गुरु समिति ने कृषि उत्पाद बाजार के संवर्द्धन एवं विकास के लिए 2,600 अरब रुपये के निवेश का सुझाव दिया, लेकिन उस पर चुप्पी साध ली गई। ऐसे में जाह‍िर है क‍ि  इस कृषि उत्पाद व्यापार व वाणिज्य विधेयक-2020 कानून से उस वर्ग को तो खीझ होगी ही जो अब तक कृषि उत्पाद बाजार से अरबपत‍ि बन गए। कृषि मंडियां ज‍िनके ल‍िए कमाई का अहम ज़रिया रहीं, कृषि मंडियों की खामियों व उनके परिसर में संचालित होने वाले उत्पादक संघों से कौन सा क‍िसान आज‍िज़ नहीं होगा।   

इस सारे कथ‍ित आंदोलन से एक बात तो साफ हो गई क‍ि जिन्होंने कायदे से गांव नहीं देखे, खेत से जिनका साबका नहीं पड़ा, फसल की निराई-गुड़ाई नहीं की, उपज की मड़ाई-कटाई नहीं की, घर पर खेतों से अनाज कैसे आता है, जो नहीं जानते, वे लोग किसानों के हमदर्द बनने का दावा कर रहे हैं। दरअसल ऐसे लोगों की कोशिश अपनी राजनीति चमकाना है, इसीलिए वे राज्यसभा में अध्यक्ष की पीठ के सामने मेज पर चढ़ जाते हैं...हंगामा करते हैं और इसके बावजूद खुद को संसदीय आचरण के संवाहक मानते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज की जनता सूचनाओं के बहुस्रोतों के उपयोग की आदी हो गई है। वह भी सच और झूठ समझने लगी है। उसकी समझ ही मौजूदा राजनीति को जवाब देगी। 

- अलकनंदा स‍िंंह 


बुधवार, 16 सितंबर 2020

दीमकें… इससे पहले क‍ि हमारा घर चट कर जायें


 घर का गेट खोला… तो देखा दरवाजे की चौखटों पर दीमक लगी हुई है, घर के कई कोनों तक उसका फैलाव हो गया जबक‍ि अभी कुछ द‍िन पहले ही तो पेस्ट ट्रीमटमेंट कराया था। काफी कुछ तो खरोंच कर भी उतारी मगर सब बेकार। दीमक कुछ समय के ल‍िए गई लेकिन फ‍िर वापस आ गई। इसे दूर करने के ल‍िए घर के कोने-कोने व दरवाजों को लगातार खरोंचना होगा… दरअसल, दीमक की प्रवृत्त‍ि ही ऐसी होती है क‍ि उसे दूर करने को सतत प्रयास करने होते हैं।

ऐसा ही कुछ हाल है हमारे समाज में व्याप्त दीमकों का भी है, जो स‍िर्फ अपनी स्वार्थ पूर्त‍ि के ल‍िए देश के हर उस दरवाजे और हर उस अंग को अपने लपेटे में ले चुकी हैं, जहां-जहां से उन्‍हें प्रगत‍ि की आस लगी हो। दीमक को अंधेरा, सीलन और कमजोर कड़‍ियों का साथ चाह‍िए बस, फ‍िर देख‍ने लायक होता है उसका फैलाव…।

मैं बात कर रही हूं, ऐसी ही कुछ दीमकों की जैसे क‍ि द‍िल्ली दंगों के साज‍िशकर्ता तथा सीएए व एनआरसी का व‍िरोध करने वाले वो ”कथ‍ित बुद्ध‍िजीवी” जो बलवाइयों को न केवल आर्थ‍िक मदद देते रहे बल्क‍ि कोर्ट में उनकी र‍िहाई और अन्य खर्चों को भी स्वयं ही वहन करते रहे हैं…उनकी ये मदद बदस्तूर अब भी जारी है।

कल की ही बात ले लीज‍िए… द‍िल्ली दंगों के आरोपी उमर खाल‍िद का नाम दंगों में ”जबरन फ्रेम” करने व कोई सुबूत ”ना” होने का आरोप लगाते हुए कथ‍ित बुद्ध‍िजीवी उसके ल‍िए सहानुभुत‍ि अभ‍ियान चला रहे थे, वह भी सोशल मीड‍िया के उस युग में जब इसकी ”करतूतों” वाले वीड‍ियो वायरल होकर सरेआम हो चुके हैं क‍ि कैसे उमर खाल‍िद ”खून बहाने” की बात कहता है… कैसे वह डोनाल्ड ट्रंप का नाम लेते हुए कहता है क‍ि यही अच्छा मौका है ज‍िससे हमारी बात इंटरनेशनली सुनी जा सकेगी… व‍ह आईबी के अंक‍ित शर्मा के हत्यारे ताह‍िर हुसैन से मुलाकात करता है, ये वीड‍ियो भी सोशल मीड‍िया पर है… फ‍िर भी उसके पक्ष में बोल रहे कथ‍ित बुद्ध‍िजीवी आख‍िर समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं, क्यों अव‍िश्वास और अलगाववाद की दीमकों को पनपा रहे हैं, वे यह क्यों नहीं समझते क‍ि इससे तो स्वयं उनकी ही व‍िश्वसनीयता पर खतरा है।

कोरोना संक्रमण काल में भी बजाय वॉर‍ियर्स का साथ देने के सीएए व एनआरसी से लेकर द‍िल्ली दंगों तक को अंजाम देने वाली ये दीमकें आख‍िर देश को क‍िधर ले जाना चाहती हैं।

अगला उदाहरण है रेलवे कर्मचारी यून‍ियन अर्थात ‘ऑल इंड‍िया रेलवे मेंन्स फेडरेशन’ नामक दीमक का, जो रेलवे द्वारा कुछ प्राइवेट ट्रेन्स को ट्रैक पर चलाने का व‍िरोध कर रही है जबकि इससे गरीबजन की यात्रा पर कोई आंच नहीं आएगी, ये तो बस एक्स्ट्रा इनकम के ल‍िए ओवरटाइम है ताक‍ि रेलवे समृद्ध हो सके। प्राइवेट ट्रेनों का संचालन जहां रेलवे कर्मचार‍ियों की कार्यसंस्कृत‍ि को प्रत‍िस्पर्द्धा बनाएगा वहीं संसाधनों का दुरुपयोग भी रोकेगा परंतु ऑल इंड‍िया रेलवे मेंन्स फेडरेशन के इरादे भी दीमकों की भांत‍ि रहे हैं जो ”अध‍िकारों” के नाम पर व‍िभागह‍ित को ही चाटते रहे हैं।

प्रत‍िस्पर्द्धा और प्रत‍िबद्धता दोनों ही फेडरेशन के कुकृत्यों के ल‍िए खतरा हैं। अभी तक फेडरेशन के नेता कुछ भ्रष्ट रेलवे अध‍िकार‍ियों के साथ म‍िलकर टेंडर्स के नाम पर बड़े घोटाले, करोड़ों की रेलवे भूम‍ि को खुर्दबुर्द करके, वेंडर्स से लेकर कंस्ट्रक्शन, रेलवे अस्पतालों के सामान खरीद तक में घोटाला करके मामूली से पद पर रहते हुए जो करोड़ों कमा रहे हैं, वो ये नहीं कर पायेंगे, कर्मचारी संगठन पर दबदबा खो देंगे, सो अलग।

दरअसल यून‍ियन द्वारा कर्मचारी के ह‍ित की बात करना तो मुखौटा है, इसके पीछे खाल‍िस तौर पर वो कॉकस है जो प्राइवेटाइजेशन के नाम पर न केवल कर्मचार‍ियों को बरगला रहा है बल्क‍ि रेलवे को फायदे में आने से भी रोक रहा है। संगठन पदाध‍िकारी से लेकर अध‍िकार‍ियों के घर तक कर्मचार‍ियों से ”बेगार” या रेलवे ट्रैक की देखरेख करने वाले गैंगमैन्स से घरों में बर्तन, पोंछा करवाना कैसा कर्मचारी ह‍ित है परंतु यून‍ियनबाजी के चलते व‍िभाग ऐसे लोगों को ढोने पर व‍िवश है।

कुछ अन्य दीमकों में शाम‍िल हैं फर्जी भर्त‍ियों को अंजाम देने वाले ठेकेदार, ई गवर्नेंस को धता बताते भ्रष्टाचारी सरकारी कर्मचारी। वंच‍ितों -आद‍िवास‍ियों के ल‍िए काम करने वाली वो गैर सरकारी संस्थाऐं ज‍िनका ‘व‍िकास’ गरीबों का ”धर्म पर‍िवर्त‍ित” करा कर ही ज़मीन पर उतरता है और इस व‍िकास के ल‍िए वे हथ‍ियारों से लेकर मानव तस्करी तक के नेटवर्क को इस्तेमाल कर रही हैं। इसी श्रेणी में आती हैं ड्रगमाफ‍िया, हथ‍ियार माफ‍िया, बॉलीवुड माफ‍िया की दीमकें (Termites) जो अपने अपने तरीके से समाज को चट कर रही हैं।

अब इन दीमकों को समझ लेना चाह‍िए क‍ि समाज और देश की व्यवस्थाओं में भरी सीलन और कमजोरी जो इन्हें अपने मंसूबे कामयाब कराती आई है, आगे नहीं मिलने वाली क्‍योंकि समय ही नहीं सरकार भी बदल रही है।

– अलकनंदा स‍िंंह 

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मीड‍िया: अपने ही हाथों से मैला कर ल‍िया अपना ग‍िरेबां

 



मीड‍िया के न‍िकम्मेपन और ग‍िरावट ने अब तो सारी हदें पार कर दी हैं। कभी ज‍िस वर्ग को समाज और वंच‍ितों के ल‍िए प्राणवायु माना जाता था, आज मीड‍िया का वही वर्ग और उसके कर्मचारी ( ज‍िन्हें पत्रकार तो हरग‍िज नहीं कहा जा सकता) अपनी सारी क्रेड‍िब‍िल‍िटी खो चुके हैं। अब ये चीखने वाले कथ‍ित पत्रकार क‍िसी मज़लूम की ज़‍िंदगी व न्याय के ल‍िए र‍िपोर्ट‍िंग नहीं करते, वे पुल‍िस व प्रशासन के अध‍िकार‍ियों के काले कारनामों को दबाने के आदी हो चले हैं , समाज में कहां क्या बुरा हो रहा है, इसपर नज़र नहीं डालते।

वे सुशांत स‍िंह राजपूत, र‍िया चक्रवर्ती से लेकर कंगना रानौत पर गला फाड़ फाड़कर तो च‍िल्लाते हैं, परंतु उन्हीं की नाक के नीचे गाज़ियाबाद के विकास नगर, लोनी में 16 वर्ष की नाबाल‍िग बहन को छेड़ रहे शोहदों द्वारा भाई को ही धारदार हथ‍ियार से घायल करने की खबर नहीं होती है, जबक‍ि उल्टा शोहदे ने ही लड़की के भाई पर जयश्रीराम ना बोलने पर जात‍िसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने की र‍िपोर्ट करा दी गई। लड़की के अनुसार इससे पहले भी कई बार आरोपी अभिषेक जाटव ने अश्लील हरकतों के साथ छेड़ा है।

ये पत्रकार इससे भी अनभ‍िज्ञ रहते हैं क‍ि गाज़ियाबाद पुल‍िस द्वारा लड़की के भाई पर ही ‘शोहदे को मारने’ का आरोप लगाकर SC-ST एक्ट में केस दर्ज करने की लापरवाही आख‍िर कैसे की गई। वो तो भला हो सोशल मीड‍िया का ज‍िस पर ये तस्वीर वायरल हो गई और अब गाज‍ियाबाद की पुल‍िस व उनके प‍िठ्ठू पत्रकारों का ये गठजोड़ बेनकाब हो गया।

पुल‍िस की ये र‍िपोर्ट डीसीआरबी में देखने के बाद भी क्राइम बीट संभालने वाले गाज‍ियाबाद के पत्रकारों को ये नहीं सूझता क‍ि आख‍िर पूरी बस्ती जाटव समाज की, छेड़ने वाले जाटव समाज के तो एक अकेला ब्राह्मण लड़का सैकड़ों जाटव समाज के घर के बीच कैसे उनको मार लेगा और कैसे उन्हें जयश्रीराम बोलने को बाध्य करेगा ?

जात‍िगत आधार पर यद‍ि यही मामला उल्टा होता तो टीआरपी के नाम पर यही पत्रकार थाली लोटा लेकर पीछे पड़ जाते। लोनी के व‍िकासनगर का ये मामला अकेला मामला नहीं, SC-ST एक्ट में दर्ज हजारों फर्जी मामले ऐसे हैं जो बदले की भावना से ल‍िखवाए गए। ब्राह्मण सह‍ित सभी सवर्णों के प्रत‍ि दुर्भावना को कैश करने का माध्यम बन गया है ये एक्ट परंतु क‍िसी मीड‍िया हाउस ने इस संदर्भ में कुछ नहीं क‍िया।

बात ब्राह्मण और दल‍ित की नहीं है, और ना ही लड़की से छेड़छाड़ व स‍िर फाड़ देने की है… बात तो उस ज‍िम्मेदार तबके ”मीड‍िया” की अवसरवाद‍िता की है जो अपने ही ग‍िरेबां को अपने ही हाथों से मैला कर रही है। हमें पढ़ाया गया था क‍ि पत्रकार‍िता की पहली सीढ़ी ही प्रश्नों के साथ ही शुरू होती है.. कहां , क्या, कौन, कब, क‍िसने, क‍िसको , क‍सि‍तर‍ह आद‍ि प्रश्न जबतक नहीं उभरेंगे तब तक पत्रकार‍िता अपने उद्देश्य को हास‍िल नहीं कर सकती परंतु अब … अब तो हो ये रहा है क‍ि सुबह सुबह ही मीड‍िया मैनेजमेंट की ओर से मीट‍िंग में मुद्दे तय कर द‍िये जाते हैं और गरीब, मजलूम, अन्याय, बदइंतजामी से सुव‍िधानुसार मुंह फेर ल‍िया जाता है।

व‍िडंबना ये है क‍ि भरोसा खो चुका मीड‍िया अब अपनी इस ग‍िरावट के ल‍िए क‍िसी और को दोष भी नहीं दे सकता क्यों क‍ि ये सब उसके अपने लालच व स्वार्थ ने क‍िया है। बस एक शेर और बात खत्म क‍ि

संभला तो कभी भी जा सकता है, कोश‍िश तो करे कोई…
इस कुफ्र की दीवार को हल्का ही धक्का काफी है… ।

-अलकनंदा स‍िंंह  

रविवार, 6 सितंबर 2020

र‍िश्तों पर भारी पड़ता मुआवज़ा

 

क‍िसी पीड़‍ित को त्वर‍ित राहत देने के ल‍िए जब कभी भी मदद के नाम पर ''मुआवजे'' शब्द का ईजाद क‍िया गया था तब शायद ही क‍िसी ने सोचा होगा क‍ि ये मदद र‍िश्तों पर क‍ितनी भारी पड़ सकती है। प‍िछले कुछ समय से ध्रुवीकरण करने के नाम पर राजनीत‍ि कर रहे दलों ने इसे ''कैक्टस'' बना द‍िया, जहां फूल की तरह द‍िखने वाला पैसा... र‍िश्तों में कांटे बोकर उन्हें जख़्मी कर जाता है और इस तरह तार तार हुए र‍िश्ते समाज में राक्षसी प्रवृत्तिायों को जन्म देते नज़र आते हैं। 


पहला उदाहरण है - फ‍िरोजाबाद में सीएए-एनआरसी के ख‍िलाफ हुए ह‍िंसक व‍िरोध प्रदर्शन में एक व्यक्ति मारा गया ज‍िसकी पत्नी को मुआवजे के तौर पर उप्र राज्य सरकार के व‍िपक्षी दल समाजवादी पार्टी की ओर से 5 लाख का चेक द‍िया गया, ज‍िसे हथ‍ियाने को देवर ने अपनी ही बेटी की हत्या कर इसका आरोप उस व‍िधवा पर लगा द‍िया। हालांक‍ि मामला खुल गया और पुल‍िस ने उस राक्षस को ग‍िरफ्तार भी कर ल‍िया परंतु मुआवजे के लालच में र‍िश्ते...तो तार तार हो गए ना ?


दूसरा उदाहरण - रेप व‍िक्टिम बताकर सरकार से मुआवजा हास‍िल करने वाले पर‍िवार का है ज‍िसने अपनी कई बेट‍ियों को इसका माध्यम बनाया और कई बार कई लोगों यहां तक क‍ि शासन-प्रशासन से भी मुआवजा झटका... हालांक‍ि देर से ही सही इस मामले की भी पोल खुल गई... और इज्ज़त मानी जाने वाली बेटी ''ब्लैकमेल‍िंग कर मुआवजा हथ‍ियाने'' की कुंजी बन गई। बाप भाई... बाप भाई ना रहे और बेटी बेटी ना रही।  


अब तीसरा उदाहरण मुआवजे के साथ साथ रंज‍िशन बदले का भी देख‍िए क‍ि आपसी दुश्मनी में अपनी ही क‍िशोर बेट‍ियों को पहले मरवाया फिर सुबूत ऐसी ऐसी जगह छोड़े क‍ि व‍िरोधी फंस जाये, ऐसा हुआ भी। व‍िपक्षियों ने हालचाल लेने के बहाने भारी मुआवजे की बरसात कर दी, सरकार को घेरा, हल्ला मचा, मीड‍िया ट्रायल चला... ये लंबा चलता भी परंतु ...  परंतु पोल खुली मुआवजे के बंटवारे में। क‍िशोर बेट‍ियों के र‍िश्तेदार आपस में भ‍िड़ गए और सारे के सारे '' आंसू बहाते - दहाड़ मार कर रोते'' र‍िश्तों का सच सामने आ गया।   


चौथा उदाहरण शहीदों के पर‍िवारों को म‍िलने वाले मुआवजे का है। शहीद सैन‍िकों के ऐसे कई पर‍िवारों की पोल सरेआम खुली है, जो शहीद सैन‍िक के नाम पर बाकायदा धरने पर बैठे ताक‍ि जहां से ज्यादा से ज्यादा पैसा म‍िल सके, इन शहीदों के पर‍िजनों द्वारा ऐसा इमोशनल ड्रामा खेला जाता है क‍ि कोई भी सरकारी संस्था बेबस हो जाती है। कीमती ज़मीन पर शहीद की मूर्ति लगवा कर उस ज़मीन को अपने अध‍िकार में ले लेने, शहीद के नाम पर सब्सिडी के साथ ब‍िना स‍िक्यूर‍िटी जमा कराए पेट्रोल पंप  लेने, सैन्य व‍िभाग द्वारा दी गई सहायता के अलावा अनेक संस्थाओं से नकद धनराश‍ि बटोरने के ल‍िए कभी जाम लगाना, क‍िसी बड़े नेता व अध‍िकारी के आ जाने पर ही शहीद का अंत‍िम संस्कर करना आद‍ि दृश्य आमतौर पर देखे जा सकते हैं।  


पुलवामा हमले में मारे गए सीआरपीएफ के एक जवान के पर‍िवार में तो मुआवजा हास‍िल करने का मामला कोर्ट तक जा पहुंचा, ससुर ने बहू को धमकी दी तो बहू ने अपने मायके पक्ष से ससुर पर हमला करवा द‍िया... ऐसा क्यों ? क्योंक‍ि सरकार, व‍िपक्ष और सामाज‍िक संस्थाओं ने लगभग 3 करोड़ का मुआवजा अकेले इस पर‍िवार पर '' बरसाया'' ... नतीजा क्या न‍िकला...? र‍िश्तों की ऐसी तैसी तो हुई ही उस जवान की शहादत भी जाया  गई। 


कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं क‍ि शहीद की पत्नी ने मुआवजा राश‍ि लेकर अपनी दूसरी शादी तो ठाटबाट से कर ली और शहीद के बच्चों को दरबदर कर द‍िया ... और ये सब स्वयं उनकी सगी मां ने क‍िया, तो कहीं इसके बंदरबांट में जेल तक जाने की नौबत आ गई, और तो और इसी राश‍ि पर शहीदों के बच्चों ने क्राइम का रास्ता अख्तियार कर ल‍िया। 


हालांक‍ि सभी शहीदों के पर‍िवार ऐसे नहीं होते परंतु अब ऐसे मामलों की अध‍िकता शहादत का अपमान कर रही है। कुल म‍िलाकर बात इतनी सी है क‍ि अब मुआवजा एक ऐसा हथ‍ियार बन गया है जो पीड़‍ित के ज़ख्मों पर तुरंत मरहम लगाता द‍िखता तो है परंतु एक मीठे ज़हर की भांत‍ि ये र‍िश्तों को तार तार भी क‍िए दे रहा है। लाशों पर मुआवजा हास‍िल करने वालों ने हमारी मृत देह का सम्मान करने वाली परंपराओं, र‍िश्तों और फ‍िर समाज के आधारों को छ‍िन्न भ‍िन्न कर द‍िया है, अब सोचने की बारी हमारी है क‍ि इस मुआवजा- संस्कृत‍ि को कैसे रोका जाए, बात बात पर '' रहम की भीख ''  देकर ज‍िस मक्कारी को हमने यहां तक आने द‍िया, अब उस पर पुन: सोचें ताक‍ि ''क‍िसी भी मृतक'' के नामपर ना तो मुआवजा बंटे और ना ही इस मुआवजे के बंदरबांट पर र‍िश्तों से हम कंगाल हो जायें।  

- अलकनंदा स‍िंह 

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

व‍िवाद करके कहीं के न रहे साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर के मारे ये बुद्ध‍िजीवी

कुछ साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर ऐसे होते हैं जो व्यक्ति, व‍िषय, देश और ''समाज के अह‍ित में ही अपना ह‍ित'' समझते हैं , इस तरह के ड‍िसऑर्डर्स में सुपरमेसी की लालसा इतनी हावी होती है...क‍ि दूसरे को ध्वस्त करना ही मकसद हो जाता है, चाहे इसमें खुद ही क्यों ना फना हो जायें।

आजकल इस ड‍िसऑर्डर से ही गुजर रहा है साह‍ित्य का वो धड़ा जो स्वयं को प्रगत‍िशील कहता न थकता था, साह‍ित्य के शीर्ष पर यही व‍िराजमान था ज‍िसने अपनी वामपंथी सोच के चलते देश में द्रोह-राजनीत‍ि से  ''न‍िकम्मेपन की प्रवृत्त‍ि'' यशोगान क‍िया, बुर्जुआ को गर‍ियाना और सर्वहारा को न‍िकम्मा बनाना इसका अभ‍ियान रहा परंतु अब यही धड़ा अपने साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर के कारण बदहवास स्थ‍ित‍ि में है, बात बात पर व‍िरोध करने की प्रवृत्त‍ि ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा।

द‍िल्ली दंगों पर ल‍िखी क‍िताब Delhi Riots 2020: untold story को प्रकाश‍ित ना होने देने का जो अभ‍ियान इस वाम पंथी धड़े ने चलाया था, वो उसी पर भारी पड़ गया। दरअसल Delhi Riots 2020: untold story की तीनों लेखिकाओं वकील मोनिका अरोड़ा, डीसयू की प्रोफेसर सोनाली चितलकरप्रेरणा मल्होत्रा द्वारा फील्ड में घूम कर, कई लोगों से इंटरव्यू लेकर और पुलिस जाँच के आधार पर जो लिखा और संपादित किया गया है उसे  सितम्बर में ही रिलीज किया जाना था, वर्चुअल बैठकों में इसके रिलीज को लेकर बैठकें हो रहीं थीं। परंतु अभ‍िव्यक्त‍ि की आजादी पर पूरे देश को स‍िर पर उठा लेने वालों ने ब्लूमबेरी पब्ल‍िकेशन से क‍िताब के प्रकाशन पर रोक लगवा दी, क‍िताब की लेख‍िकाओं ने इस व‍िरोध को एक चैलेंज के तौर पर लेते हुए गरुड़ प्रकाशन से अपनी क‍िताब का प्रकाशन करवा ल‍िया और अब यह क‍िताब अभी तक लाखों के प्र‍िऑर्डर पर बुक हो चुकी है तथा आगे भी ब‍िक्री के सारे र‍िकॉर्ड टूटने वाले हैं। 

इस पूरे प्रकाशन व‍िरोध अभ‍ियान में पत्रकार तवलीन स‍िंह के बेटे पाक‍िस्तानी कट्टरवादी आत‍िश तासीर, मुगल कालीन इत‍िहास को मह‍िमामंड‍ित करने वाली पुस्तकें ल‍िखने वाले स्कॉटिश लेखक विलियम डेलरिम्पल, कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी के नेता, दक्षिण एशिया सॉलिडैरिटी इनिशिएटिव से जुड़े बुद्ध‍िजीवी, अभिनेत्री स्वरा भास्कर, कई पत्रकार शाम‍िल थे। ज‍िसमें खासकर वाम बुद्धिजीवियों ने क‍िताब के पब्ल‍िकेशन को रुकवाने के ल‍िए ब्लूमबेरी प्रकाशन पर स्ट्रेटज‍िक व फाइनेंश‍ियल हर तरह का दबाब बनाया और प्रकाशन रुकवाने में कामयाब भी रहे परंतु इस जद्दोजहद में वे यह भूल गए क‍ि वे स्वयं इस सब में बेनकाब हो गए हैं। स्वयं आतिश तासीर ने कहा कि स्कॉटिश इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल ही वो व्यक्ति हैं, जिसने इस पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगवाई। विलियम डेलरिम्पल ने भी इसी अगस्त 21 को कहा था कि वो दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक का प्रकाशन रोकने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

सवाल उठता है क‍ि पुस्तक का प्रकाशन रुकवाने के इस पूरे मामले में उनके हाथ क्या लगा...इतनी क्या इमरजेंसी क‍ि ये सब के सब इकठ्ठे होकर देश से लेकर व‍िदेशी लेखकों तक की मदद मांगने को व‍िवश हुए  ... क‍िताब में ऐसा क्या था क‍ि ये सब भयभीत हो रहे थे ...मात्र दंगे की र‍िपोर्ट‍िंग पर इनका भयभीत हो जाना '' दाल में काला '' की ओर इशारे नहीं करता क्या...। क‍िताब का प्रकाशन रुकवाकर हो सकता है ये खुश हो रहे हों परंतु अब जबक‍ि यही क‍िताब गरुड़ प्रकाशन से बाजार में आ रही है, तब इनका ये पूरा का पूरा अभ‍ियान चौपट हो गया। अभी तक ज‍िस क‍िताब को एक ल‍िम‍िटेड वर्ग पढ़ता अब उसी क‍िताब की गरुड़ प्रकाशन द्वारा छापने की घोषणा करने के चंद घंटों के भीतर ही 20 हजार प्रत‍ियों की  प्र‍िबुक‍िंग हो गई।

वामपंथ‍ियों की इस स्थ‍ित‍ि पर मुझे ''मोर के नाचने'' का सीन याद आ रहा है, ज‍िसमें पंखों की ओर से भले ही वो खूबसूरत द‍िखे परंतु असल में वो नंगा हो रहा होता है। मुझे आश्चर्य होता है अपने ''बौद्ध‍िक'' कहलाने पर भी क‍ि कैसे कैसे जाह‍िलों को अभी तक हमने ढोया, कैसे कैसे द्रोह‍ियों को हम अभी तक सरआंखों पर बैठाते आए... कैसे कैसे...  परंतु अब और नहीं, भांडा फूट चुका है... मैं जो क‍ि सदैव लेखन में न‍िरपेक्षता न‍िरपेक्षता रटती रही आज महसूस हुआ क‍ि समस्या की ओर से आंखें मूंद लेना न‍िरपेक्षता नहीं कायरता होती है परंतु अब और नहीं ।

- अलकनंदा स‍िंंह

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

ये सोशल मीड‍िया है… बुरी ज़हन‍ियत को नंगा भी कर देता है

हाल ही में घट‍ित हुए तीन उदाहरणों से मैं एक बात पर पहुंची हूं क‍ि दंगाई हों, सफेदपोश नेता हों, कव‍ि हों या शायर हों, इस सोशल मीड‍िया के समय में क‍िसी की कारस्तानी छुपी नहीं रह सकती। कल तक हम ज‍िन्हें स‍िर आंखों पर बैठाते थे और अचानक उनकी कोई ऐसी करतूत हमारे सामने आ जाए जो न केवल समाज व‍िरोधी हों बल्क‍ि देश व‍िरोधी भी हो तो इसके ल‍िए हम सोशल मीड‍िया को ही धन्यवाद देते हैं। फिर मुंह से न‍िकल ही जाता है क‍ि अच्छा हुआ पता चल गया वरना…
इस तर‍ह बेपर्दा होने के तीन उदाहरण हमारे सामने हैं। कल बैंगलुरु में हुई ह‍िंसा, फिर राहत इंदौरी का चले जाना और उससे एक द‍िन पहले मुनव्वर राणा साहब का ज़हर उगलना।
पहला उदाहरण- बैंगलुरू ह‍िंसा मामले की शुरुआत भगवान कृष्ण को रेप‍िस्ट बताकर राधा जी और गोप‍ियों के ख‍िलाफ ”कुछ तत्वों” द्वारा अनर्गल ल‍िखने से हुई परंतु प्रचार‍ित ये क‍िया जा रहा है क‍ि ”मुहम्मद साहब” के ख‍िलाफ अनर्गल ट्विटर पोस्ट पर बवाल हुआ और ”कुछ तत्वों” ने आगजनी कर लाखों की संपत्त‍ि फूंककर पुल‍िस पर हमला करते हुए दर्जनों पुल‍िसकर्मी घायल कर द‍िए… । इसके बाद हमारे तथाकथ‍ित धर्मन‍िरपेक्ष ठेकेदारों ने मंद‍िर के आगे मानव श्रृंखला बनाए खड़े कुछ मुस्ल‍िम युवकों की तारीफ में कसीदे पढ़े ही थे क‍ि सोशल मीड‍िया ने सारा सच उगल द‍िया… क‍ि पूर्व न‍ियोज‍ित था यह क‍ि ह‍िंसा व आगजनी के बाद ऐसा वीड‍ियो बनाकर ”खास तरह” से प्रचार‍ित क‍िया जाए। हिंसा में बड़ी बात निकलकर सामने आई है। पुलिस की मानें तो 5 दंगाइयों ने 300 लोगों का गैंग बनाया था। उनका प्लान सभी पुलिस वालों को जान से मारने का था। हमलावरों ने हिंसा के दौरान पुलिस को निशाना बनाने के लिए गुरिल्ला जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया। 


आलोक श्रीवास्तव द्ववारा राणा को ल‍िखा पत्र-

दूसरा उदाहरण हैं – जाने माने शायर मुनव्वर राणा, ज‍िन्होंने राम मंद‍िर पर सुप्रीमकोर्ट के न‍िर्णय को गलत बताते हुए एकसाथ देश की सुप्रीम कोर्ट व सरकार पर सवाल खड़े कर अपनी ”अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता” का बेजां इस्तेमाल क‍िया। ये वही मुनव्वर राणा हैं जो आजतक के पूर्व एंकर व शायर आलोक श्रीवास्तव की नज़्म चुराकर उन्हीं की मौजूदगी में मुशायरे में अपने नाम से सुना चुके हैं, मैं उस पत्र को भी यहां चस्‍पा कर रही हूं जो आलोक श्रीवास्तव ने मुनव्वर राणा को ल‍िखा था। ये पत्र भी सरेआम हो गया और मुनव्वर राणा की हक़ीकत हमें बता गया।
हालांक‍ि सोशल मीड‍िया दोधारी तलवार भी है तो बूमरैंग भी, दोधारी तलवार इसल‍िए क‍ि इस पर आने वाली सूचनाएं कहर बरपा सकती हैं और जागरूकता भी पैदा कर सकती हैं। बूमरैंग इसल‍िए क‍ि इस पर डाली गई साम‍ग्री लगातार घूमकर कब हमारे सामने क‍िसे नंगा कर दे, कहा नहीं जा सकता। सोशल मीड‍िया क‍ि पूरी प्रोसेस में परदे के पीछे से घात करने वाले बहुत द‍िनों तक छुप नहीं पाते, उनके कुकृत्य सबके सामने आ ही जाते हैं। मुनव्वर राणा इसका ताजा उदाहरण हैं।

अब तीसरा उदाहरण राहत इंदौरी साहब का- हालांक‍ि मरने के बाद हमारे संस्कारों में नहीं है क‍िसी की मजामत करना, परंतु अटल ब‍िहारी वाजपेयी से लेकर अहमदाबाद के दंगों पर उनकी ज़ुबान का ज़हर तो हमने मुशायरों में बहुत सुना परंतु कभी वह गोधरा का सच ना बोल सके…आख‍िर क्यों.. ?? मुशायरों के मंच से युवाओं को अहमदाबाद दंगे याद रखने को कहते हैं और मुंबई दंगे भूल जाते हैं, उन्हें 370 तो याद रहता है…व‍िस्थाप‍ित पंड‍ितों को भूल जाते हैं। स‍िर्फ ह‍िंदू ही क्यों, उन्हें तो तीन तलाक़ का खत्म होना भी अखरता है पर हलाला भूल जाते हैं.. इन सबके सुबूत सोशल मीड‍िया हमें देता रहता है परंतु हम ही अगर एक आंख से देखेंगे तो कैसे इनकी असल‍ियत पहचानेंगे … अब यही मीड‍िया उनकी कलई खोल रहा है।
देख‍िए वीड‍ियो-


सत्य कड़वा होता है, सुना नहीं जाता परंतु सोशल मीड‍िया ही है जो अब इन जैसों को नंगा कर रहा है। बैंगलुरू ह‍िंसा के पीछे छुपे तत्व हों या मुनव्वर राणा व राहत इंदौरी जैसे बड़े शायर, सबकी ज़हन‍ियत के सच से हमें सावधान रहना होगा।
- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

…आख‍िर ये भी तो कानून का मजाक उड़ाना ही है


भतृहर‍ि ने कहा था- क्षत‍ि क्या है= समय पर चूकना… और हम ये क्षत‍ि बहुत पहले से करते आ रहे हैं, खासकर न्याय व्यवस्था में। आवश्यक न्याय‍िक सुधारों को लेकर समय पर चूकना आज हमें ऐसे दलदल में फंसा चुका है ज‍िससे न‍िकलने के आसार कहीं द‍िखाई नहीं दे रहे। आजादी के बाद से न्याय प्रदान करने वाली जो संस्थाएं देश की रीढ़ बनीं, वे ही अपने कर्तव्यों से चूकती गईं। वे सुधार कर सकती थीं परंतु समय पर न‍िर्णय ना ले सकीं नतीजतन देश में न्याय व्यवस्था का आलम ये हो गया है क‍ि आजकल न‍िचली कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सभी ऐसा अंधा कुंआं बन कर रह गई हैं ज‍िनके पेट में ”वादी व प्रत‍िवादी” दोनों पक्षों का बेशुमार पैसा, समय, शक्त‍ि… सब समाता जा रहा है और इतना ” खाकर” भी इनकी दुर्दशा जस की तस है।
सरकारी स्तर पर क्या होना चाह‍िए, क्या नहीं हुआ … आज इस पर बात नहीं, बल्क‍ि बात इस पर है क‍ि कॉमन सेंस भी यद‍ि इस्तेमाल क‍िया जाए तो जो साढ़े तीन करोड़ मुकद्दमों का बोझ ”सुरसा” बनता जा रहा है, उसे न‍िपटाया जा सकता है। बहुत छोटे-छोटे मामलों का न‍िपटारा करके मुकद्दमों का बोझ कम क‍िया जा सकता है। न्‍यायिक जांचों के नाम पर मामले लटकाना न्यायालयों की कार्यशैली का ह‍िस्सा बन गया है, इससे बचा जा सकता है परंतु ऐसा करे कौन, ज‍िन्हें करना है वे न्याय‍िक-भ्रष्टाचार के मोहरे हैं।
अफरशाही की जकड़न इतनी है क‍ि पहले तो पुल‍िस अपराध‍ियों से जूझे, फ‍िर अदालतों के अंतहीन झमेले से। क‍िसी अपराधी के एनकाउंटर के बाद ”उसी एनकाउंटर की ही फ‍िर से जांच” के नाम पर बनाई गई जांच सम‍ित‍ियां आख‍िर क्या हैं। ये तो न्याय व्यवस्था पर अत‍िर‍िक्त बोझ के स‍िवाय कुछ और है ही नहीं। ये अत‍िर‍िक्त बोझ स‍िर्फ मामले को लटकाए रखने, जांच आयोगों के अध्यक्षों पर बेवजह धन जाया करने का माध्यम है, और कुछ नहीं। जांच आयोग के अध्यक्ष अध‍िकांशत: र‍िटायर्ड अध‍िकारी होते हैं, पेंशन पाते हैं फ‍िर भी ये कोई अवैतन‍िक काम नहीं करते, बल्क‍ि हर अध्यक्ष को प्रत‍ि सुनवाई 1.50 लाख और आयोग के अन्य सदस्यों को 1 – 1 लाख रुपये प्रत‍ि सुनवाई भुगतान क‍िया जाता है। इतना आर्थ‍िक बोझ…वो भी स‍िर्फ जांच के नाम पर ?
कानून एक सा, कानून की पढ़ाई एक सी, कानून के ओहदेदारों की समझ (जैसा क‍ि समझा जाता है) एक सी, तो फ‍िर एक ही कानून में क्यों न‍िचली अदालतों के न‍िर्णय हाईकोर्ट नहीं मानते, हाई कोर्ट के न‍िर्णय सुप्रीम कोर्ट में रद्द कर द‍िए जाते हैं… आख‍िर ये भी तो कानून का मजाक उड़ाना ही है।
व‍िकास दुबे एनकाउंटर मामला हो या हैदराबाद रेप‍िस्ट एनकाउंटर, दोनों ही मामलों में जांच आयोग बैठाना कहां तक उच‍ित है। न‍िश्च‍ित रूप से ये सही है क‍ि क‍िसी न‍िर्दोष के साथ अन्याय नहीं होना चाह‍िए परंतु जो सरेआम अपराध करते रहे, उनके ”अंजाम” पर संदेह कर जांच आयोग बैठाना कहां तक उचि‍त है। ये क्या कम था क‍ि अब हैदराबाद रेप‍िस्ट एनकाउंटर मामले की जांच सम‍ित‍ि का कार्यकाल 6 महीने बढ़ा द‍िया गया ”कोरोना के कारण जांचकार्य में देरी” के नाम पर। ये सीधा सीधा आर्थ‍िक दोहन और न्याय‍िक-भ्रष्टाचार का स्पष्ट उदाहरण है। तभी तो सोच कर देख‍िए क‍ि आख‍िर जांच आयोगों की जांच कभी समय पर पूरी क्यों नहीं होती, अदालती अफरसरशाही का कुचक्र है ही ऐसा क‍ि क‍िसी मामले की जांच को लटकाए रखने के ल‍िए जब प्रत‍ि सुनवाई लाख से डेढ़ लाख तक म‍िलते हों तो ये ”कानूनी अफसर” क्योंकर चाहेंगे क‍ि जांच कभी पूरी भी हो।
सुप्रीम कोर्ट चाहे तो इन बेवजह के दांवपेंचों से अदालतों का बोझ कम कर सकता है, मुकद्दमों में कमी तो आएगी ही, अदालतों पर जाया हो रहे धन की बरबादी भी रोकी जा सकेगी परंतु ये बात तो हम कह सकते हैं, वे ”जस्ट‍िस” करने वाले वे न्यायिक अध‍िकारी ऐसा नहीं करेंगे क्योंक‍ि आगे कोई जांच आयोग उनका भी तो इंतज़ार कर रहा होगा।
- अलकनंदा स‍िंह 

बुधवार, 22 जुलाई 2020

श‍िद्दत से सक्र‍िय हैं जड़ों से द्रोह करने वाले


आज दो मुद्दे मेरे सामने हैं … एक तो राम और दूसरी ह‍िंदी । दोनों ही अपनी व्यापकता के पश्चात भी नकारे गए और समय समय पर व‍िरोधी अभ‍ियानों से घ‍िरे रहे। इसे मैं सनातन संस्कृत‍ि और भाषा के प्रत‍ि उन लोगों का ”भय” ही कहूंगी जो बेहद नकारात्मकता के साथ अपनी ही जड़ों से द्रोह करते रहे और जो अपनी जड़ों से द्रोह करता है उसे समाज बहुत द‍िनों तक नहीं ढोता।
यही दशा आजकल उन राजनैत‍िक, सामाज‍िक व बौद्ध‍िक संस्थाओं की हो रही है जो देश में कथ‍ितरूप से लोकतंत्र , आजादी, अभ‍िव्यक्त‍ि की बात कर रही हैं। जो यहीं पनपीं और यहीं के संस्कारों को गर‍ियाती रहीं, उन्हें पराई पत्तर का भात ज्यादा स्वाद‍िष्ट लगता रहा है इसील‍िए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम काल्पन‍िक लगते ही हैं, उन्हें ह‍िंदी भी व‍िमर्श की भाषा तो लगती है परंतु उसे सर्वग्राह्य बनने नहीं देते। वे ह‍िंदी की रोजी पर पल रहे हैं परंतु तलवे ह‍िंदी व‍िरोध‍ियों के चाटते हैं।
राम से द्रोह कर उन्हें काल्पन‍िक बताने वाले न कभी जानेंगे और ना ही जानने का प्रयास भी करेंगे क‍ि आख‍िर राम को जन जन का बनाने वाली वाल्म‍िकी रामायण का आरंभ कैसे हुआ, वे कौन से प्रश्न थे ज‍िनसे वाल्म‍िकी प्रेर‍ित हुए राम कथा ल‍िखने को। वाल्म‍िकी रामायण के बालकांड के प्रथम सर्ग इसका प्रमाण है क‍ि वाल्म‍िकी ने जब नारद मुन‍ि से पूछा क‍ि संसार में ऐसा कौन है जो इस समय इस लोक में गुणवान, शक्ति‍शाली, धर्मज्ञाता, कृतज्ञ, सत्यभाषी, चर‍ित्रवान, सब प्राण‍ियों की भलाई चाहने वाला, क्रोधहीन व ओजस्वी है। तब नारद मुन‍ि ने कहा क‍ि वे इच्छवाकु वंश में पैदा हुए हैं, उनका नाम राम है, ज‍िस प्रकार नद‍ियां सागर के पास जाती हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुष राम के पास जाते हैं।
इस उत्तर के बाद ही राम की कथा का प्रारंभ हुआ और ये कल्पना नहीं बल्क‍ि वाल्म‍िकी ने एक नायक के सर्वोत्कृष्ट गुणों को आमजन के समक्ष इसील‍िए रखा क‍ि वो अपने आचरण में इन्हें सम्मि‍लि‍त कर सके और रामराज्य जैसी व्यवस्था का सुख ले सके। वो रामराज्य… ज‍िसमें व‍िपरीत सोच वाले को भी बराबरी का अध‍िकार म‍िला। तो क्या ये रामद्रोही वाल्म‍िकी रामायण के बालकांड के प्रथम सर्ग को पढ़ेंगे, नहीं… ब‍िल्कुल भी नहीं। पढ़ लेंगे तो फ‍िर राम से द्रोह कैसे कर पाएंगे।
वाल्म‍िकी के राम की पूजा तो इनके वश की नहीं परंतु ये द्रोहकारी लोग तो जानबूझकर भारतीय धर्म और दर्शन की भी उपेक्षा करते हैं। तभी तो उन्हें अपने कथ‍ित ”बौद्ध‍िक व‍िमर्श” में समुद्र मंथन पर दाराश‍िकोह के ल‍िखे मज्मउल बहरैन द‍िखाई नहीं देता, वे अलबरूनी,अब्दुर्रहीम खानखाना, मल‍िक मोहम्मद जायसी, नजीर अकबराबादी की रचनाओं और व‍िचारों को भी बड़ी चालाकी से छुपा जाते हैं। ये वे लोग हैं जो कुरान और बाइब‍ि‍ल सुनकर उसकी तारीफ में झुक ही नहीं जाते बल्क‍ि इन पर कभी बहस करने की ह‍िम्मत भी नहीं करते परंतु हां, वेद-पुराण का कोई जिक्र करे तो फौरन उसे सांप्रदायवादी, पोंगापंथी कहकर कुतर्क करने से भी बाज नहीं आते। उन्हें तो तीन युगों को पार कर आने वाला आज का समृद्ध ”सनातन धर्म” में भी आद‍िकालीन मनु द‍िखते हैं। इसी तरह उन्हें वैद‍िक शोधों से एलर्जी है।
ये द्रोहकारी प्रवृत्त‍ि क‍िसी एक जाति, धर्म, संप्रदाय में नहीं बल्क‍ि ये तो एक खास वर्ग है जो कलुष‍ित मानस‍िकता वाला है ज‍िसे न‍िज भाषा, न‍िज धर्म, न‍िज देश और न‍िज माटी को लेकर हीनताबोध है, यह प्रवृत्त‍ि उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी।
– अलकनंदा स‍िंह

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

ह‍िंदू धर्म को लेकर ही क्यों बेहूदा ट‍िप्पण‍ियां कर रहे हैं स्टैंडअप कॉमेड‍ियंस


क‍िसी व्यक्त‍ि को पंगु बनाना हो तो उसकी रीढ़ पर हमला करो, क‍िसी देश को पंगु बनाना हो तो उसकी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करो और क‍िसी समाज को पंगु बनाना हो तो उसके पर‍िवारों को मूल्यव‍िहीन कर दो। यह क‍िसी भी दुश्मनी को उसके अंजाम तक पहुंचाने की पहली और आख‍िरी शर्त होती है। पर‍िवारों को मूल्यव‍िहीन बनाने के ल‍िए मह‍िलाओं और बच्चों से ज्यादा सॉफ्ट टारगेट और कौन हो सकता है, और ऐसा ही क‍िया जा रहा है उन कथ‍ित कॉमेड‍ियंस द्वारा जो सोशल मीड‍िया के माध्यम से ह‍िंदू धर्म का उपहास उड़ा रहे हैं। हमारे संस्कारों और देवी देवताओं को लेकर बेहूदा ट‍िप्पण‍ियां कर रहे हैं।
कहते हैं बच्चा अपने घर से ही प्रथम संस्कार सीखता है और जैसे संस्कार होते हैं, बच्चा क‍ितना ही बड़ा क्यों ना हो जाए अपने जीवन के हर कदम पर उसके संस्कार उसके व्यवहार में द‍िखाई देते हैं परंतु इन कॉमेड‍ियंस में ऐसा कुछ भी द‍िखाई नहीं देता। सौरव घोष, अतुल खत्री, कुणाल कामरा, हसन म‍िन्हाज, अग्र‍िमा जोशुआ, ऐलन ड‍िजेनेर‍िस जैसे ना जाने क‍ितने नाम हैं जो ख्यात‍ि के लालच में इतना ग‍िरते जा रहे हैं क‍ि अब इनके ख‍िलाफ कानूनी तौर पर कार्यवाही की जा सकती है।
बेशक जितना निंदनीय है किसी धर्म का उपहास उड़ाया जाना, उससे कम निंदनीय नहीं है अपने धर्म का उपहास उड़ाने वालों को लेकर चुप्‍पी साध लेना। आजकल अभ‍िव्यक्त‍ि की आजादी के बहाने स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर यही सब हो रहा है। इनके ल‍िए मैं एक शब्द इस्तेमाल करना चाहूंगी ”पुंगी”, सब जानते हैं क‍ि पुंगी की अपनी कोई आवाज़ नहीं होती, जो इन्हें बजाता है ये उसी के सुर से बजती हैं। तो स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर जो ऐसा कर रहे हैं, ये तो बस पुंगी हैं, इनके पीछे की आवाजें कोई और हैं ज‍िनकी मानस‍िकता ही ह‍िंदू व‍िरोधी है। पुंगी बने ये कथ‍ित कॉमेड‍ियंस आख‍िर ह‍िंदू व‍िरोध का ही सुर क्यों न‍िकाल रहे हैं, कहां से म‍िल रही है इन्हें ये ताकत, ये सोचना होगा। ये कॉमेड‍ियंस ख्यात व कुख्यात होने व रातों रात हजारों लाखों व्यूअर्स हास‍िल करने के ल‍िए हमारे न केवल धर्म के साथ उपहास कर रहे हैं बल्क‍ि ये हमारे सामाज‍िक मूल्यों व संस्कारों पर भी घात कर रहे हैं।
इन कॉमेड‍ियन पुंगियों ने किस तरह से हिंदू धर्म, हिंदू परंपरा, हिंदू भगवान, हिंदू अनुष्ठान, हिंदू रीति-रिवाज और हिंदू धार्मिक संस्कारों का उपहास उड़ाया है, उसकी एक बानगी द‍ेख‍िए क‍ि हमारे प्रथम पूज्य गणपत‍ि का मजाक उड़ाते हुए एक स्टैंडअप कॉमेडियन ने तो यहां तक कह द‍िया क‍ि वो नास्तिक ही इसल‍िए बना क्योंक‍ि उसको ब्राह्मण कहलाना पसंद नहीं, और इस तरह ”हास्यास्पद मुद्राओं” से इशारे करके वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आईएसआईएस को एक ही श्रेणी में देता है। ऐसे ही एक अन्य कॉमेडियन भगवान शिव के बारे में ऐसी आपत्तिजनक ट‍िप्पणी करता है कि उसे लिखा नहीं जा सकता। छत्रपत‍ि श‍िवाजी पर हाल ही में एक मह‍िला कॉमेड‍ियन ने ऐसी ही व‍िवाद‍ित ट‍िप्पणी कर दी और श‍िवसेना (राजनैत‍िक कारणों से ही सही ) अगर व‍िरोध ना करती तो वह माफी भी ना मांगती।
ओटीटी पर र‍िलीज होती अनसेंसर्ड फ‍िल्में हों या स्टैंडअप कॉमेडी सभी ने अपने अपने सॉफ्ट टारगेट तलाश कर रखे हैं, हमें अपने और अपने पर‍िवारों को इस सांस्कृत‍िक आतंकवाद से बचाकर रखना होगा वरना देवी देवताओं व महापुरुषों के अपमान से चली ये साज‍िश हमारे संस्कारों, पर‍िवारों से होती हुई पीढ़‍ियों को बरबाद कर देगी, स्टैंडअप कॉमेड‍ी की इन पुंग‍ियों का ये कुत्स‍ित व्यवहार ”अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता” की आड़ में नहीं छुप सकता, ये व‍िशुद्ध रूप से सांस्कृत‍िक आतंकवाद है जो घरों में घुस रहा है। अभी तक सह‍िष्णुता ने ही ह‍िंदू धर्म को बचा रखा है और इसी सह‍िष्णुता ने धर्म को व‍िधर्म‍ियों के हवाले कर द‍िया तो… इसलिए अब चुप्पी का नहीं, बोलने का समय है ताक‍ि धर्म पर प्रहार का प्रत‍िउत्तर द‍िया जा सके।
- अलकनंदा स‍िंह 

बुधवार, 15 जुलाई 2020

सावन के महीने का राग है, राग Malhar: कैसे हुआ इस्‍तेमाल?

सावन के दूसरे सोमवार को भी बरसने का इंतज़ार है , अभी तक आधा-अधूरा मानसून तो आया परंतु सावन अभी भी दूर है, न तन भीगा, न मन नहाया। धरती की कोख से सौंधी ख़ुशबू भी नहीं फूटी, न मोर नाचे न कोयल कूकी परंतु इस सावन ने उस राग का ध्यान करा द‍िया ज‍िसे राग मल्हार कहते हैं ।
इस मौसम में हम शिव की पूजा करते हैं। क्योंकि शिव काम का शत्रु है। इसीलिए सावन प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों को समझने और उसके निकट जाने का मौका भी देता है।
बहरहाल आज बात राग की करते हैं तो Malhar के बारे में उत्सुकता जागती है। तो आइये जानते हैं क‍ि क्या है राग Malhar और इसी राग का लोकगायकी में कैसे इसका इस्तेमाल क‍िया गया है।
भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम’ भी मल्हार राग में गाया गया 
मल्हार का मतलब बारिश या वर्षा है और माना जाता है कि मल्हार राग के गानों को गाने से वर्षा होता है। मल्हार राग को कर्नाटिक शैली में मधायामावती बुलाया जाता है। तानसेन और मीरा मल्हार राग में गाने गाने के लिए मशहूर थे। माना जाता है के तानसेन के ‘मियाँ के मल्हार’ गाने से सुखा ग्रस्त प्रदेश में भी बारिश होती थी।
मल्हार राग/ मेघ मल्हार, हिंदुस्तानी व कर्नाटक संगीत में पाया जाता है।
मल्हार राग के प्रसिद्द रचनायें हैं- कारे कारे बदरा, घटा घनघोर , मियाँ की मल्हार
दीपक राग से बुझे हुए दिये जलाने और मेघ मल्हार राग से बारिश करवाने की दंत कथाएँ तो हर पीढ़ी ने अपने बुजुर्गों से सुनी हैं। लेकिन क्या सचमुच ऐसा होता था? आइये समय के गलियारों से गुजरते हुए थोड़ा इतिहास के झरोखों से झांक कर देखें और पता करें की क्या तानसेन राग मल्हार का आलाप कर सच में वर्षा करवा देते थे।
मेघ-मल्हार और वर्षा
भारतीय संगीत की सबसे बड़ी खूबी यह है की इसका हर सुर, राग और हर पल, घड़ी, दिन और मौसम के हिसाब से रचे गए हैं। किस समय किस राग को गाया जाना चाहिए, इसकी जानकारी संगीतज्ञों को होती है। जैसे दीपक राग में दिये जलाने की शक्ति है, यह वैज्ञानिक रूप से सत्य है। इसका कारण, इस राग में सुरों की संरचना इस प्रकार की है की गायक के शरीर में गर्मी उत्पन्न हो जाती है। यही गर्मी वातावरण में भी आ जाती है और ऐसा प्रतीत होता है मानों अनेक दिये जल गए। यही नियम राग मेघ-मल्हार के संबंध में भी है। दरअसल मेघ-मल्हार राग की रचना, दीपक राग की गरम तासीर को कम करने के लिए करी गयी थी। इसलिए जब मेघ-मल्हार राग गाया जाता था तो वातावरण ऐसा हो जाता था, मानों कहीं बरसात हुई है।
तानसेन द्वारा मेघ-मल्हार को गाना और बरसात का होना, मात्र संयोग हो सकता है, जो बार-बार नहीं होता।
यहां सुन‍िए श्री प्रकाश विश्वनाथ रिंगे की राग मेघ मल्हार में  रचना 

शनिवार, 11 जुलाई 2020

अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रमी संवत यहाँ...जान‍िए भारत के प्राचीन गणितज्ञ बौधायन के बारे में


अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रमी संवत यहाँ, है किन्तु औरों का उदय इतना पुराना भी कहाँ ?
ईसा,मुहम्मद आदि का जग में न था तब भी पता, कब की हमारी सभ्यता है, कौन सकता है बता? 

-मैथिलिशरण गुप्त

राष्ट्रकव‍ि मैथिलिशरण गुप्त की ये कव‍िता की पंक्त‍ियां हमें अपने गौरवशाली अतीत की याद द‍िलाती हैं और प्रर‍ित करती हैं क‍ि हम जो आज बात बात में अन्य देशों की ओर देखते रहने के आदी हो गए हैं दरअसल और कुछ नहीं अपने अतीत को व‍िस्मृत कर बैठे हैं । इसी अतीत की एक महत्वपूर्ण स्तेंभ थे ऋष‍ि बौधायन।

जी हां, बौधायन भारत के प्राचीन गणितज्ञ और शुल्ब सूत्र तथा श्रौतसूत्र के रचयिता थे । ज्यामिति के विषय में प्रमाणिक मानते हुए सारे विश्व में यूक्लिड की ही ज्यामिति पढ़ाई जाती है। मगर यह स्मरण रखना चाहिए कि महान यूनानी ज्यामितिशास्त्री यूक्लिड से पूर्व ही भारत में कई रेखागणितज्ञ ज्यामिति के महत्वपूर्ण नियमों की खोज कर चुके थे, उन रेखागणितज्ञों में बौधायन का नाम सर्वोपरि है , भारत में रेखागणित या ज्यामिति को शुल्व शास्त्र कहा जाता था ।

बौधायन के सूत्र ग्रन्थ
बौधायन के सूत्र वैदिक संस्कृत में हैं तथा धर्म, दैनिक कर्मकाण्ड, गणित आदि से सम्बन्धित हैं। वे कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय शाखा से सम्बन्धित हैं। सूत्र ग्रन्थों में सम्भवतः ये प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी रचना सम्भवतः ८वीं-७वीं शताब्दी ईसापूर्व हुई थी।

बौधायन सूत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित ६ ग्रन्थ आते हैं-

    1. बौधायन श्रौतसूत्र - यह सम्भवतः १९ प्रश्नों के रूप में है।
    2. बौधायन कर्मान्तसूत्र - २१ अध्यायों में
    3. बौधायन द्वैधसूत्र - ४ प्रश्न
    4. बौधायन गृह्यसूत्र - ४ प्रश्न
    5. बौधायन धर्मसूत्र - ४ प्रश्नों में
    6. बौधायन शुल्बसूत्र - ३ अध्यायों में

सबसे बड़ी बात यह है कि बौधायन के शुल्बसूत्रों में आरम्भिक गणित और ज्यामिति के बहुत से परिणाम और प्रमेय हैं, जिनमें २ का वर्गमूल का सन्निकट मान, तथा पाइथागोरस प्रमेय का एक कथन शामिल है।

बौधायन प्रमेय
2 का वर्गमूल
बौधायन श्लोक संख्या i.61-2 (जो आपस्तम्ब i.6 में विस्तारित किया गया है) किसी वर्ग की भुजाओं की लम्बाई दिए होने पर विकर्ण की लम्बाई निकालने की विधि बताता है। दूसरे शब्दों में यह 2 का वर्गमूल निकालने की विधि बताता है।
   
समस्य द्विकर्णि प्रमाणं तृतीयेन वर्धयेत।
 तच् चतुर्थेनात्मचतुस्त्रिंशोनेन सविशेषः ।।

   अर्थ: किसी वर्ग का विकर्ण का मान प्राप्त करने के लिए भुजा में एक-तिहाई जोड़कर, फिर इसका एक-चौथाई जोड़कर, फिर इसका चौतीसवाँ भाग घटाकर जो मिलता है वही लगभग विकर्ण का मान है।

वर्ग के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल के वृत्त का निर्माण

   चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत् ।
    यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत् ।। (I-58)[1]

    Draw half its diagonal about the centre towards the East-West line; then describe a circle together with a third part of that which lies outside the square.
   
अर्थात् यदि वर्ग की भुजा 2a हो तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a


वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल के वर्ग का निर्माण
   मण्डलं चतुरस्रं चिकीर्षन्विष्कम्भमष्टौ भागान्कृत्वा भागमेकोनत्रिंशधा
    विभाज्याष्टाविंशतिभागानुद्धरेत् भागस्य च षष्ठमष्टमभागोनम् ॥ (I-59))[2]
   
If you wish to turn a circle into a square, divide the diameter into eight parts and one of these parts into twenty-nine parts: of these twenty-nine parts remove twenty-eight and moreover the sixth part (of the one part left) less the eighth part (of the sixth part).

बौधायन के अन्य प्रमेय

बौधायन द्वारा प्रतिपादित कुछ प्रमुख प्रमेय ये हैं-

  -  किसी आयत के विकर्ण एक दूसरे को समद्विभाजित करते हैं।
  -  समचतुर्भुज (रोम्बस) के विकर्ण एक-दूसरे को समकोण पर समद्विभाजित करते हैं
  -  किसी वर्ग की भुजाओं के मध्य बिन्दुओं को मिलाने से बने वर्ग का क्षेत्रफल मूल वर्ग के क्षेत्रफल का आधा होता है।
  -  किसी आयत की भुजाओं के मध्य बिन्दुओं को मिलाने से समचतुर्भुज बनता है जिसका क्षेत्रफल मूल आयत के क्षेत्रफल का आधा होता है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि बौधायन ने आयत, वर्ग, समकोण त्रिभुज समचतुर्भुज के गुणों तथा क्षेत्रफलों का विधिवत अध्ययन किया था। यज शायद उस समय यज्ञ के लिए बनायी जाने वाली 'यज्ञ भूमिका' के महत्व के कारण था।

साभार: वैदिक गण‍ितीय संरचना व ज्याम‍ितीय का क‍िताबी स्रोत 

रविवार, 5 जुलाई 2020

गुरू पूर्णिमा- गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं, सपनेहुँ सुख सुलभ न तेहिं

गुरु के महात्मय को समझने के लिए ही प्रतिवर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व  मनाया जाता है। गुरू पूर्णिमा कब से शुरू हुई यह कहना मुश्किल है, लेकिन गुरू पूजन की यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है क्‍योंकि उपनिषदों में भी ऐसा माना गया है कि आत्मस्वरुप का ज्ञान पाने के अपने कर्त्तव्य की याद दिलाने वाला, मन को दैवी गुणों से विभूषित करनेवाला, गुरु के प्रेम और उससे प्राप्‍त ज्ञान की गंगा में बार बार डुबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देनेवाला जो पर्व है – वही है ‘गुरु पूर्णिमा’ ।

इसी पूर्णिमा के दिन ही भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, १८ पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। इसीलिए ये लोक मान्‍यता बनी है कि इस दिन जो शिष्य ब्रह्मवेत्ता गुरु के चरणों में संयम-श्रद्धा-भक्ति से उनका पूजन करता है उसे वर्षभर के पर्व मनाने का फल मिलता है।

ईश्‍वर के लिए गुरू का मार्गदर्शन अत्‍यंत आवश्‍यक माना गया है। गीता में भी श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन  से कहा -
मय्ये व मन आघत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि भय्येव, अत ऊर्ध्व न संशयः ॥8/12

अर्थात् “हे अर्जुन ! तू मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ संशय नहीं है।”

किसी को गुरु से कितना मिला, किसी को अधिक किसी को कम क्यों मिला, इसके मूल में यही कारण है कि जिसने गुरु के बताये आदर्शों में मन व बुद्धि को लगा दिया, संशय मन से निकाल दिया, श्रेष्ठता के प्रति समर्पण कर दिया, उसका सारा जीवन ही बदल गया।

गुरू और शिष्‍य के सुप्रामेंटल रिलेशन्‍स के बारे में दार्शनिक श्री अरविन्द कहते थे “डू नथिंग ट्राइ टू थिंक नथिंग विह्च इज अनवर्थी टू डिवाइन” अर्थात् जो देवत्वधारी सत्ता के योग्य न हो, ऐसा कोई भी कार्य न करो, यहां तक कि ऐसा करने की सोचो भी मत ।

श्री रामकृष्ण परमहंस ने तो और एक कदम आगे बढ़कर यही कहा कि कामिनी काँचन से दूर परमात्म सत्ता में मन-बुद्धि को लगाने पर स्वयं ईश्वर गुरु के रूप में आकर मार्गदर्शन करते हैं। देखा जाये आदर्श शिष्‍य के लिए समर्पण एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति का रूपांतरण कर देती है और जब श्रेष्ठ गुरु के प्रति यही समर्पण होता है तो व्यक्ति तत्सम हो जाता है। उपनिषदों में कहा गया है कि व्‍यक्‍ति को तप करने से सिद्धि तो मिल सकती है, किन्तु भगवान नहीं मिल सकता जबकि समर्पण से गुरु व भगवान दोनों एक साथ मिल जाते हैं।

श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे-”सामान्य गुरु कान फूँकते हैं, अवतारी महापुरुष-सदगुरु प्राण फूँकते हैं।” ऐसे सदगुरु का स्पर्श व कृपा दृष्टि ही पर्याप्त है । परमहंस जी  एक ऐसी ही सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए। अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पास बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का उन्हें अवसर मिला।

गुरू-शिष्‍य के बीच संबंध और गुरू की महत्‍ता को रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी कुछ यूं कहा है-
गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं , सपनेहुँ सुख सुलभ न तेहिं ।

उदाहरण बताते हैं कि इस एक आध्‍यात्‍मिक संबंध की वास्तविकता,  कि समर्पण भाव से गुरु के निर्देशों का परिपालन करने वालों को जी भर कर गुरु के अनुदान भी मिले हैं।

श्रद्धा की परिपक्वता, समर्पण की पूर्णता, शिष्य में अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देती है। उसके सामने देहधारी गुरु की अंत:चेतना की जितनी भी रहस्यमयी परतें होती हैं सब की सब एक एक करके खुलने लगती हैं। शिष्‍य के सामने इनका ठीक-ठीक खुलना शास्त्रीय भाषा में गुरु के परमतत्‍व का प्राकट्य ही तो होता है। गुरु का यह रूप जान लेने पर मौन व्याख्या शुरू हो जाती है। बिल्‍कुल ऐसे जैसे कि हृदय में निःशब्द शक्ति का जन्‍म हो रहा हो । जन्म लेने से पूर्व ही प्रश्‍नों का उत्‍तर मिलने लग जाता है ।

स्वामी विवेकानन्द की दो शिष्याएँ थीं एक नोबुल (निवेदिता), दूसरी क्रिस्टीन (कृष्ण प्रिया)। स्वामी जी से निवेदिता तो तरह तरह के सवाल पूछतीं परन्तु कृष्ण प्रिया चुप रहतीं। स्वामी जी ने उनसे पूछा-”तेरे मन में जिज्ञासाएँ नहीं उठतीं?” उसने कहा-”उठती हैं पर आपके जाज्वल्य समान रूप के समक्ष वे विगलित हो जाती हैं, मेरी जिज्ञासाओं का मुझे अंतःकरण में समाधान मिल जाता है।” लगभग यही स्थिति हम सबकी हो, यदि हम अपनी गुरुसत्ता के शाश्वत रूप व गुरुसत्ता के संस्कृति सत्य को ध्यान में रखें कि “जब तक एक भी शिष्य पूर्णता प्राप्ति से वंचित है, गुरु की चेतना का विसर्जन परमात्मा में नहीं हो सकता।” सूक्ष्म शरीरधारी वह सत्ता अपने शिष्यों, आदर्शोन्मुख संस्कृति साधकों की मुक्ति हेतु सतत् प्रयत्नशील है व रहेगी जब तक कि अंतिम व्यक्ति भी इस पृथ्‍वी पर मुक्त नहीं हो जाता ।

गुरू और शिष्‍य के बीच संबंधों की पवित्रता को लेकर आज की स्थिति बड़ी विषम हो चुकी है। विगत वर्षों में कई गुरुओं के कारनामों ने इस संबंध को तार तार करके रख दिया है।ऐसा लगता है कि चारों ओर नकली ही नकली गुरु भरे हैं।

ये बिल्‍कुल ऐसे ही हैं जैसे कि पानी में रहने वाला सांप, जिसके  मुंह का आकार छोटा मगर चेष्‍टायें बड़ी होती हैं। इन्‍हीं 'चेष्‍टाओं' के कारण वह मेंढक को निगलने की कोशिश में मुँह में तो उसे जकड़ लेता है पर दोनों के लिए मुश्‍किल हो जाती है । पनेले सांप के गले से मेंढक बाहर निकलने को ताकत लगाता है , और वह मेंढक को गले में उतारने के लिए । आज गुरु व शिष्य दोनों की स्थिति ऐसी है। फिर भी सत्‍य और संकल्‍प के साथ सदगुरू की खोज और उसका सानिध्‍य पाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता और इस गुरू पूर्णिमा पर  हमारा ध्‍येय यही होना चाहिए ।

-अलकनंदा स‍िंंह 

गुरुवार, 25 जून 2020

आपातकाल: 25 और 26 जून की वो दरम्यानी रात और मेरे बचपन की स्मृत‍ियां

मेरे बचपन  की स्मृत‍ियों में आज भी छपी है 25 और 26 जून की वो दरम्यानी रात
25.‍06.1975 के दिन लोकतंत्र पर लगे दाग को ढोते हुए हमें 45 साल हो गये मगर मेरे बचपन की वो स्‍मृतियां आज भी ज़हन में बराबर कौंध रही हैं कि किस तरह से प्रभावशाली लोग भी घरों में छुपने को विवश हुए जा रहे थे। चारों तरफ अफरातफरी मची थी।

तब छोटी सी उम्र में मैं अपने आसपास होने वाली हलचलों को सिर्फ देख सकती थी मगर तब मैं इतनी छोटी थी कि उसे महसूस कर पाना मेरे दिमाग के पार था। बस घर की बालकनी में बैठी गली में पुलिस को देखकर भागती भीड़, दौड़ते लोगों में से कुछेक को पकड़ कर ले जाते पुलिसवाले अंकल...मां की किसी को कुछ ना बताने की पक्‍की हिदायत के संग ऊपर से झांकती मैं भी पुलिस को देखकर नीचे को झुक जाती, छुप जाती...।

कभी ये छुपनछुपाई वाला खेल लगता तो कभी बड़ा अजीब सा ...कि हम घर में...कैद से ये कौन सा खेल खेल रहे हैं।

रात को जो एकाध बल्‍व रोशनी के लिए जलाकर छोड़ दिया जाता था, उसे भी मां नहीं जलाती थीं।

'क्‍यों नहीं जलाती हो वो आंगन के बाहर वाला बल्‍व, पूछने पर वो हरबार एक ही बात कहतीं कि तेरे 'ताऊ जी' को कुछ डाकू ढूढ़ रहे हैं, जिन्‍होंने पुलिस की वर्दी पहनी हुई है, वो घर घर जाकर पूछ रहे हैं कि ताऊ जी कहां हैं, अगर वो रोशनी देखेंगे तो ताऊ जी को पकड़ ले जायेंगे ना, इसीलिए बल्‍व अभी नहीं जलायेंगे।'

जब बड़ी हुई तो जाना कि जिस घर में हम रहते थे वो जनसंघियों का घर था जिसके मालिक बड़े ताऊ जी थे, जिन्‍होंने मेरे पिता के व्‍यवहार से खुश होकर रहने को दिया था। आरएसएस से जुड़े लोगों को अधिक परेशान किए जाने के स्पष्ट निर्देश सरकार की ओर से दिए गए थे।

पापा सरकारी डॉक्‍टर थे बरेली के पचपेड़ा हॉस्‍पीटल में, अब इससे ज्‍यादा तो याद नहीं आ रहा और कुछ। कुछ भूली सी स्‍मृतियां हैं , उनमें एक है क‍ि एक नदी बहती थी घर के पास में जिसको पहले नाव से पार करते थे, फिर हॅस्‍पीटल आता था, बड़ी खूबसूरत सी जगह थी, फिल्‍मी सेट की तरह लगने वाली...बड़ा सा कंपाउंड जिसमें घुसते ही बाईं ओर बहुत ही सुंदर नन्‍हीं सी चारदीवारी से सजा हुआ सा एक कुंआ था जिसमें हल्‍की गिरारी वाली बाल्‍टी झूलती रहती थी।

कंपाउंड के दाईं ओर हॉस्‍पीटल के लिए तीन कमरे दिए गये थे। कंपाउंड के ठीक बीच में बेहद खूबसूरत मंदिर था, मंदिर में कौन से भगवान विराजे थे... अब ये भी ठीक ठीक याद नहीं मगर उसकी घंटियों से मुझे लटकना अच्‍छा लगता था। हम वहां कुल डेढ़ साल ही रह पाये और इसी दौरान वो घटनायें घटीं जिन्‍हें अब हम इमरजेंसी या आपातकाल के नाम से जानते हैं, उनकी भयावहता की बात करते हैं क्‍योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसी घटनायें एक दाग होती हैं ...बस।

उन दिनों की स्‍मृतियों में तैर जाते हैं वो दिन कि कैसे पुलिस से बचने के लिए मां के द्वारा वो अटपटी सी हरकतें किया जाना बिल्‍कुल भी अच्‍छा नहीं लगता था मुझे। ये भी अच्‍छा नहीं लगता था कि मेरे डॉक्‍टर पिता रात रात भर हॉस्‍पीटल में रहें। मां बताती थीं कि पापा को सीएमओ से आदेश मिला था कि कम से कम डेढ़ सौ केस तो हर रोज करने ही हैं। ''केस'' का मतलब लोगों की नसबंदी कर देना था जो तब हम बच्‍चों की समझ से परे था कि बिना बीमारी के ऑपरेशन क्‍यों किये जा रहे हैं सबके।

मां-पापा की बातें बताती हैं जीप जब गांव में चक्कर लगाती थी और नसबंदी के ल‍िए पकड़ कर ले जाती थी। रात को लोग अपने घर में सोने की बजाय फसलों के बीच में सो जाया करते थे। रिश्तेदारियों में लोगों का आना-जाना तक बिल्कुल छूट गया था। इस कारण उस दौरान गली-मौहल्लों में आपातकाल के सिर्फ एक ही फैसले की चर्चा सबसे ज्यादा थी और वह भी नसबंदी। सिर्फ टारगेट पूरा करने के लिए गांव में आने वाले टीम जबरदस्ती करती थी, उस दौरान ना तो युवाओं को छोड़ा गया और ना ही बुजुर्गों को।

खैर... धरपकड़ के इसी माहौल में मंदिर के पुजारी बाबा को भी पकड़ लिया गया। बाद में घर में सब कानाफूसी कर रहे थे कि बाबा की भी नसबंदी करा दी गई। पापा मां को बता रहे थे कि हम क्‍या करें पुलिस का पहरा रहता है, वो ही पकड़ कर लाते हैं और हमें तो हर हाल में ऑपरेशन करना होता है। छोटी सी बच्‍ची मैं नहीं जानती थी कि क्‍यों पूरा लगभग डेढ़ साल से ज्‍यादा का वक्‍त पापा का ऐसे बीता, ये तब ही जाना जब बड़ी हुई कि पापा जैसे और भी लोग थे जो सरकारी आदेशों को मानने के आगे विवश थे।

बहरहाल अब कह सकती हूं कि पता नहीं वो कैसे कैसे दिन थे और कैसी कैसी जागती सी रातें कि आज भी हम उन काली स्‍मृतियों को भुला नहीं पा रहे हैं।
आज इतने साल बाद भी मुझे वो सारे सीन याद हैं जस की तस।

- अलकनंदा सिंह