गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

ऐसे थे न‍िराला के राम और राम की शक्तिपूजा

आज रामनवमी है और इस अवसर पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित काव्य राम की शक्तिपूजा के राम की बात यद‍ि हम ना करें तो आज का द‍िन सार्थक नहीं होगा। राम की शक्तिपूजा का प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र ‘भारत’ में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को हुआ था। इसका मूल निराला के कविता संग्रह ‘अनामिका’ के प्रथम संस्करण में छपा।
तब से लेकर आजतक हर कोई राम के व्यक्तित्व की व्याख्या अपनी अपनी तरह से करता रहता है। यहां तक क‍ि बिना रामायण के किसी भी संस्करण को पढ़े और राम के व्यक्तित्व पर चिंतन किए बिना कई कथित बुद्धिजीवी, विशेषकर फेमिनिस्ट (नारीवादी) प्रायः राम पर सीता का त्याग करने के लिए निशाना साधते रहते हैं और ब‍िना सोचे व‍िचारे क्षमायाचक (अपॉलोजेटिक) बने हिंदू उनका अनुसरण भी करते रहते हैं।
‘राम की शक्ति पूजा’ नामक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता में राम के कुछ ऐसे भी मनोभाव देखने को मिलते हैं जो शायद रामचर‍ित मानस में भी उल्लि‍खित नहीं हैं क्यायों क‍ि इसमें राम-रावण युद्ध को साधने के लिए राम द्वारा की गई शक्ति पूजा का भी उल्लेख है जिसका संदर्भ भले ही पुराणों में मिलता है लेकिन वाल्मीकि या तुलसी रामायण में नहीं।
शक्ति पूजा से पूर्व राम देवी के विधान से निराश हैं। उनकी निराशा इस बात से है कि अधर्मी होने के बावजूद वे रावण का साथ क्यों दे रही हैं। वे अपनी व्यथा बताते हुए कहते हैं कि शक्ति के प्रभाव के कारण उनकी सेना निष्फल हुई और स्वयं उनके हस्त भी शक्ति की एक दृष्टि के कारण बाण चलाते-चलाते रुक गए थे।
निराला ने अपने शब्दों में राम की पूरी ”वो पूजा” जो शक्त‍ि आराधना को समर्प‍ित थी, को हमारे सामने ऐसे उदाहरण की तरह पेश क‍िया जो पूरे के पूरे मानवीय आदर्श को नई पीढ़ी के ल‍िए एक प्रेरणा के तौर रखेगा।
राम की शक्तिपूजा का एक अंश-
रवि हुआ अस्त, ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।
आज का तीक्ष्ण शरविधृतक्षिप्रकर, वेगप्रखर,
शतशेल सम्वरणशील, नील नभगर्जित स्वर,
प्रतिपल परिवर्तित व्यूह भेद कौशल समूह
राक्षस विरुद्ध प्रत्यूह, क्रुद्ध कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि राजीवनयन हतलक्ष्य बाण,
लोहित लोचन रावण मदमोचन महीयान,
राघव लाघव रावण वारणगत युग्म प्रहर,
उद्धत लंकापति मर्दित कपि दलबल विस्तर,
अनिमेष राम विश्वजिद्दिव्य शरभंग भाव,
विद्धांगबद्ध कोदण्ड मुष्टि खर रुधिर स्राव,
रावण प्रहार दुर्वार विकल वानर दलबल,
मुर्छित सुग्रीवांगद भीषण गवाक्ष गय नल,
वारित सौमित्र भल्लपति अगणित मल्ल रोध,
गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध हनुमत् केवल प्रबोध,
उद्गीरित वह्नि भीम पर्वत कपि चतुःप्रहर,
जानकी भीरू उर आशा भर, रावण सम्वर।
लौटे युग दल। राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरणचिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न।
‘राम की शक्तिपूजा’ की कुछ अन्तिम पंक्तियाँ देखिए-
“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम !”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वरवन्दन कर।
“होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

विश्व रंगमंच दिवस आज, हिन्दी रंगमंच दिवस 3 अप्रैल को



हर साल 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस या अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस मनाया जाता है। विश्व रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में इंटरनेशनल थियेट्रिकल इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। उसके बाद से ही हर साल 27 मार्च को विश्वभर में रंगमंच दिवस मनाया जाता आ रहा है। 

यह दिन उन लोगों के लिए एक उत्सव है जो “थिएटर” के मूल्य और महत्व को देख सकते हैं और सरकारों, राजनेताओं और संस्थानों को जगाने का कार्य कर सकते हैं। इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में रंगमंच को बढ़ावा देने और लोगों को रंगमंच के सभी रूपों के मूल्यों से अवगत कराना है। रंगमंच से संबंधित अनेक संस्थाओं और समूहों द्वारा इस दिन को विशेष दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है। 

इस दिवस का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश है, जो विश्व के किसी जाने माने रंगकर्मी द्वारा रंगमंच और शांति की संस्कृति विषय पर उसके विचारों को व्यक्त करता है। 1962 में पहला अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश फ्रांस की जीन काक्टे ने दिया था। वर्ष 2002 में यह संदेश भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड द्वारा दिया गया था।


भारत में रंगमंच का इतिहास
भारत में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है। ऐसा समझा जाता है कि नाट्यकला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ। ऋग्वेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं। इन संवादों में लोग नाटक के विकास का चिह्न पाते हैं। कहा जाता है कि इन्हीं संवादों से प्रेरणा ग्रहण कर लागों ने नाटक की रचना की और नाट्यकला का विकास हुआ। उसी समय भरतमुनि ने उसे शास्त्रीय रूप दिया। भारत मे जब रंगमंच की बात होती है तो ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ में स्तिथ रामगढ़ के पहाड़ पर महाकवि कालीदास जी द्वारा निर्मित एक प्राचीनतम नाट्यशाला मौजूद है।


कहा जाता है कि महाकवि कालिदास ने यहीं मेघदूत की रचना की थी। इस आधार पर यह भी कहा जाता है कि अम्बिकापुर जिले के रामगढ़ पहाड़ पर स्तिथ महाकवि कालिदास जी द्वारा निर्मित नाट्यशाला भारत का सबसे पहला नाट्यशाला है। बता दें कि रामगढ़ सरगुजा जिले के उदयपुर क्षेत्र में है, यह अम्बिकापुर-रायपुर हाइवे पर स्तिथ है।
विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर रंगयात्रा नाट्य समारोह में बुधवार को थर्ड विंग संस्था की ओर से शाम 6:30 बजे कैसरबाग स्थित राय उमानाथ बली ऑडिटोरियम में नाटक ‘मध्यांतर’ का मंचन किया जाएगा। इसका निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी पुनीत अस्थाना करेंगे। वहीं भारतेन्दु नाट्य आकादमी की ओर से गोमतीनगर के थ्रस्ट ऑडिटोरियम में नाटक ‘अंतर्द्वंद्व’ का मंचन प्रिवेन्द्र सिंह के निर्देशन में किया जाएगा।


हिन्दी रंगमंच दिवस 3 अप्रैल को मनाया जाएगा
इसी क्रम में कलाकार एसोसिएशन उत्तर प्रदेश की ओर से 3 अप्रैल को कैसरबाग स्थित राय उमानाथ बली ऑडिटोरियम में समारोह होगा। एसोसिएशन के अध्यक्ष संगम बहुगुणा ने बताया कि जून 1967 में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-कृत ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ के अनुसार आधुनिक विधि से रंगमंच पर हिन्दी का पहला नाटक शीतला प्रसाद त्रिपाठी कृत ‘जानकी मंगल’ था। उसका मंचन बनारस के रॉयल थियेटर में 3 अप्रैल 1868 को किया गया था। 

इंग्लैंड के एलिन इंडियन मेल के 8 मई 1868 के अंक में उस नाटक के मंचन की जानकारी भी प्रकाशित की गई थी। उसी आधार पर पहली बार शरद नागर ने ही हिन्दी रंगमंच दिवस की घोषणा 3 अप्रैल को की थी। उसी की स्मृति में कलाकारों द्वारा नाट्य क्षणिकाओं का प्रदर्शन किया जाएगा। साथ ही संगीत और नृत्य के कायक्रम भी होंगे।

गुरुवार, 19 मार्च 2020

अंतत: … कानून जीता मगर अब बड़ी लाइन खींचने का समय

7 साल बाद ही सही, लेकिन आज दर‍िंदों को फांसी पर लटका द‍िये जाने बाद न‍िर्भया को न्याय म‍िल गया। न‍िर्भया के दोष‍ियों को लेकर ऐसी न्यूज़  हेडलाइंस सुबह से ही पूरे मीड‍िया पर छाई हुई हैं।
इस पूरे प्रकरण में ऐसी लज्जाजनक बातें सामने आईं, ज‍िन्होंने यह सोचने पर बाध्य कर द‍िया है क‍ि क्या हम ”इस सजा” के बाद अब भी समाज के सामने कोई उदाहरण प्रस्तुत कर पायेंगे या ये स‍िर्फ एक ”कानूनी जीत हार” का मसला बनकर ही रह जाएगा।
मैं ये बात इसल‍िए कह रही हूं क‍ि दोष‍ियों के घरवालों ने ज‍िस तरह उनके कुकृत्य को जायज ठहराया, वह समाज में व्याप्त ऐसी वीभत्स धारणा है ज‍िसके बारे में ”अभी के अभी” सोचना उतना ही जरूरी है ज‍ितना बलात्कारी को सजा द‍िलाना। सोच कर द‍ेखि‍ए क‍ि वे कैसी पत्नी और कैसी मां रही होंगीं जो ऐसे बर्बर दर‍िदों को बचाने में लगी रहीं। क्या वे स्वयं उस दर्द को महसूस कर सकती थीं जो न‍िर्भया ने झेला। क्या बलात्कार व बर्बरता उनके ल‍िए एक सामान्य घटना है। अगर माफी म‍िल भी जाती तो क्या वे इन दर‍िंदों की गारंटी ले सकती थीं क‍ि वो अब आगे ऐसा नहीं करेंगे, और यह भी क‍ि फ‍िर कानून पर फ‍िर कौन व‍िश्वास करता।
ये हमारे ल‍िए शर्म की बात है क‍ि न‍िर्भया की मां आशा देवी और दोष‍ियों के वकील एपी स‍िंह दो ऐसे पहलू हैं ज‍िनमें से एक कानून की लाचारगी द‍िखाता है तो दूसरे में कानून का कोई खौफ नहीं, उसने अपनी पब्ल‍िस‍िटी के ल‍िए जमकर कानून का मजाक बार बार उड़ाया और इसे बड़े फख़्र के साथ अपना ”कर्तव्य कहा। यहां तक क‍ि उसने न‍िर्भया की मां को चुनौती दे डाली क‍ि चाहे कहीं (इंटरनेशनल कोर्ट) तक जाना पड़े, इन्हें फांसी तो नहीं ही होने दूंगा।
एपी स‍िंह की तरह ही कुछ तथाकथ‍ित बुद्ध‍िजीवी (ज‍िनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज भी शाम‍िल हैं) भी इस बात पर अपने ”महान व‍िचार” उगलते द‍िखाई दे रहे हैं क‍ि क्या फांसी दे देने से दर‍िंदगी रुक जाएगी और जो सात साल जेल में रहे उन को भी जीने का अध‍िकार है… आद‍ि आद‍ि… ।
तो ऐसे लोगों को अब ये बताया जाना जरूरी हो गया है क‍ि कठोर दंड ही कानून का भय समाज में बनाए रखता है ताक‍ि व्यवस्थायें सही तरीके से संचाल‍ित होती रहें। यद‍ि अपराध‍ियों के अध‍िकारों की बात करने लगेंगे तो अराजकता के स‍िवाय कुछ भी हास‍िल नहीं होने वाला। ये हम सभी को समझने और द‍िलोद‍िमाग में पूरी तरह बैठा लेनी चाह‍िए क‍ि जो कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह अधिकार का दावा भी नहीं कर सकता। बलात्कार के बाद ज‍िस तरह न‍िर्भया के साथ बर्बरता की गई, उस बर्बरता ने उनकी आपराधि‍क प्रवृत्त‍ि जाह‍िर कर दी। इसमें ये बहाना भी नहीं चलने वाला क‍ि वे आदतन अपराधी नहीं थे इसल‍िए उन्हें राहत दी जानी चाह‍िये थी ।
बहरहाल, न‍िर्भया केस ने हमें बताया क‍ि अब एक ऐसी लाइन खींचने का समय आ गया है जो कानून और समाज के बीच ”कर्तव्यों” को प्राथम‍िकता दे न क‍ि अध‍िकारों की दुहाई देकर समाज को सड़न की ओर धकेले। हद से ज्यादा ल‍िबरलाइजेशन समाज को दायि‍त्वबोध नहीं कराता, उसे उच्छृंखल बनाता है।
- अलकनंदा स‍िंंह 

सोमवार, 2 मार्च 2020

ऐसे श‍िक्षकों को तो ‘न‍िष्ठा’ कार्यक्रम या ‘प्रेरणा’ एप भी नहीं सुधार सकते

आज एक लज्जाजनक व‍िषय पर ल‍िखने जा रही हूं जो यह सोचने पर बाध्य करता है क‍ि अपने बच्चों में श‍िक्षा व संस्कार प‍िरोने की इच्छा के साथ हम उन्हें ज‍िन श‍िक्षकों के हवाले करते हैं, क्या वे श‍िक्षक स्वयं इतने संस्कारवान हैं क‍ि हमारे बच्चों को ”लायक बना सकें”?
आज एक लज्जाजनक व‍िषय पर ल‍िखने जा रही हूं जो यह सोचने पर बाध्य करता है क‍ि अपने बच्चों में श‍िक्षा व संस्कार प‍िरोने की इच्छा के साथ हम उन्हें ज‍िन श‍िक्षकों के हवाले करते हैं, क्या वे श‍िक्षक स्वयं इतने संस्कारवान हैं क‍ि हमारे बच्चों को ”लायक बना सकें”? या फ‍िर हम भी उसी अंधी और भयावह दौड़ में शामिल हैं जो क‍ि प्राइमरी से लेकर ड‍िग्रीधारक तक तो तैयार कर रही है मगर संस्कार और शैक्षण‍िक योग्यता उनमें स‍िरे से नदारद है।
और यही साब‍ित क‍िया है उत्तरप्रदेश के फ‍िरोजाबाद ज‍िले की उन श‍िक्ष‍िकाओं ने जो न केवल स्वयं सपना चौधरी के गानों पर डांस कर रही थीं बल्क‍ि अपने ऊपर पुरुष श‍िक्षकों द्वारा लुटाए जा रहे रुपयों का वीड‍ियो भी बना रही थीं। श‍िक्ष‍िकाओं के डांस करने पर भला क‍िसे आपत्त‍ि हो सकती है परंतु ट्रेन‍िंग प्रोग्राम के दौरान ”यह सब” क‍िया जाना बेहद आपत्त‍िजनक है।
देख‍िए वायरल वीड‍ियो का ल‍िंंक- https://www.youtube.com/watch?v=o_Tk7LqX0qA 
दरअसल, श‍िक्षकों के भीतर नेतृत्व क्षमता व श‍िक्षण कार्य में दक्षता प्राप्त करने के ल‍िए सरकार द्वारा सरकारी कार्यालय में चलाए जा रहे ”न‍िष्ठा प्रोग्राम” के दौरान न केवल यह डांस क‍िया गया बल्क‍ि साथी श‍िक्षकों द्वारा श‍िक्ष‍िकाओं पर रुपये लुटाए जाने का वीड‍ियो बनाया गया, फ‍िर उसे वायरल भी क‍िया गया। ये पूरा का पूरा घटनाक्रम श‍िक्षकों की घट‍िया मानस‍िकता को दर्शाता है।
हालांक‍ि अब इस पर कार्यवाही हो रही है परंतु सवाल यही है क‍ि ये सब हुआ ही क्यों…जो श‍िक्ष‍िकायें अपने ऊपर पुरुष साथ‍ियों द्वारा रुपये लुटाए जाने को एंज्वॉय कर सकती हैं, वे भला बच्चों को कौन सी श‍िक्षा व संस्कार देंगी। इससे पहले भी प्रदेश के श‍िक्षकों की स्कूलों में उपस्थ‍ित‍ि सुन‍िश्च‍ित करने के ल‍िए लाए गए ”प्रेरणा एप” को लेकर भी श‍िक्षकों का बेहद जाह‍िलाना रवैया सामने आया था। उन्हें अपनी उपस्थ‍ित‍ि को लेकर प्रेरणा एप पर बस रोजाना अपनी क्लास के बच्चों के साथ एक सेल्फी पोस्ट करनी थी … व‍िरोध का तर्क था क‍ि सरकार इस सेल्फी से श‍िक्षकों की न‍िजता पर हमला कर रही है। उन पर अव‍िश्वास जता रही है। एक तर्क ये भी द‍िया गया क‍ि सभी के पास मोबाइल नहीं हैं, सरकार मोबाइल फोन मुहैया करवाये।
कुल म‍िलाकर बात वहीं आकर ठहरती है क‍ि आख‍िर ये स्थि‍ति आई ही क्यों। सभी श‍िक्षक ज‍ितना मानदेय, सैलरी व अन्य भत्तों को लेकर ज‍ितना सचेत रहते हैं, उतना कर्तव्यों को लेकर क्यों नहीं रहते। ऐसा नहीं हैं क‍ि जो अपने कर्तव्यों को न‍िभाते हैं उन्हें नजरंदाज़ कर द‍िया जाता है, वरना राष्ट्रीय स्तर पर श‍िक्षक सम्मान नहीं द‍िये जा रहे होते। अपने कर्तव्य न‍िभाने की बजाय सरकारों के ख‍िलाफ सड़कों पर उतर कर, अपने अध‍िकार मांगने को हड़ताल और तरह-तरह से व‍िरोध प्रदर्शन करने वाले श‍िक्षकअपना सम्मान स्वयं ग‍िराते हैं।
”सरकारी नौकरी” करने वाले श‍िक्षक और श‍िक्षा संस्कार देने वाले ”गुरू” दोनों एक दूसरे से उतने ही अलग हैं ज‍ितने क‍ि पूरब और पश्च‍िम। श‍िक्षाम‍ित्रों के संगठन, बेस‍िक श‍िक्षक संघ, माध्यम‍िक श‍िक्षक संघ से लेकर यूनिवर्स‍िटीज तक आजकल यही आलम है क‍ि नौकरी करने वाले टीचर तो तमाम म‍िल जायेंगे मगर एक आदर्श गुरू नहीं मिलेगा। डांस करना बुरा नहीं है, उसको ज‍िस जगह, ज‍िस रूप और ज‍िस मानस‍िकता के साथ क‍िया गया, वह लज्जाजनक है। हर काम सरकारें नहीं कर सकतीं। बतौर अभ‍िभावक और बतौर श‍िक्षक कुछ तो ज‍िम्मेदारी हम सबको भी लेनी ही होगी, वरना ऐसी श‍िकायतें आती रहेंगी और दोषारापण हम आइस-पाइस खेल की तरह एक दूसरे पर करते रहेंगे।
- अलकनंदा स‍िंंह

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

ह‍िंसक मां के वीड‍ियो से एक और सच नंगा हो गया ...

सद‍ियों से बनीं धारणायें अब अपने चोले को उतारने लगी हैं और मह‍िलाओं की मौजूदा स्थ‍ित‍ि से ज्यादा अच्छा उदाहरण और इसका क्या हो सकता है। परंतु जब चोला उतरता है और बदलाव नज़र आता है तो अच्छाई के साथ उसकी वो बुराइयां भी नज़र आने लगती हैं ज‍िनसे तंग आकर बदलाव हुआ। अध‍िकांशत: ये बुराइयां हमारी पर‍िकल्पना से भी ज्यादा भयावह होती हैं। प‍िछले दो तीन द‍िनों से चल रही द‍िल्ली ह‍िंसा ने मह‍िलाओं के इसी वीभत्स रूप को मेरे सामने ''नंगा'' कर द‍िया।

कौन कहता है क‍ि मह‍िलायें हैं-  तो जीवन है, वे हैं तो प्रेम है, उन्होंने पृथ्वी पर जीवन को संजोया, पर‍िवार , र‍िश्ते और पीढ़‍ियों को संस्कार देने में अपना ''सर्वस्व'' न‍िछावर कर द‍िया। यद‍ि ऐसा ही होता तो कल द‍िल्ली ह‍िंसा के दौरान पत्थरबाजी करती वृद्ध मह‍िला का वीड‍ियो देखकर मैं ये सोचने पर बाध्य ना होती... क‍ि जब कोई मां इतनी ह‍िंसक हो सकती है, तो उसने अपने बच्चों को क्या क्या और ना स‍िखाया होगा।

ये मह‍िला उम्र के लगभग आख‍िरी पड़ाव पर थी। पत्थरबाजी कर रहे उपद्रव‍ियों के साथ इसने न केवल स्वयं पत्थरबाजी की बल्क‍ि पत्थरबाजी करते हुए नाले में ग‍िर पड़ी और लहूलुहान हो गई
ये मह‍िला उम्र के लगभग आख‍िरी पड़ाव पर थी। पत्थरबाजी कर रहे उपद्रव‍ियों के साथ इसने न केवल स्वयं पत्थरबाजी की बल्क‍ि पत्थरबाजी करते हुए नाले में ग‍िर पड़ी और लहूलुहान हो गई, और उसी घायल अवस्था में भी फ़ख्र के साथ बता रही थी क‍ि मेरा खून बहा तो क्या हुआ, मैंने भी इतनी जोर से पत्थर मारा क‍ि वो सीधा पुल‍िस वाले के माथे पर लगा और वो (गाली देते हुए बोली ) ब‍िलब‍िला कर ग‍िर पड़ा, अभी तो और पुल‍िस वालों को ऐसे ही मारूंगी। एक वृद्ध मह‍िला से ऐसी उम्मीद हममें से कोई नहीं कर सकता,स्वप्न में भी नहीं।

देश ही नहीं ये तो पूरे व‍िश्व में ये साफ हो चुका है क‍ि द‍िल्ली सह‍ित पूरे देश में जो कुछ सीएए के नाम पर अराजकता फैलाई जा रही है, वह मात्र कानून के ल‍िए नहीं बल्क‍ि ऐसी ही कथ‍ित मांओं का सहारा लेकर उन लोगों द्वारा स्पॉंसर्ड है ज‍िन्हें देश के टुकड़े करने से गुरेज़ नहीं।

ज़रा याद कीज‍िए जेएनयू  में मामूली फीस वृद्ध‍ि का उन ''कथ‍ित छात्रों'' द्वारा व‍िरोध क‍िया गया ज‍िनके हाथों में  ''आईफोन्स'' थे, ज‍िनके ड्रग्स लेते हुए वीड‍ियो वायरल हुए, जो कन्हैया कुमार सरकारी अनुदान से जेएनयू में पढ़ाई कर रहा था , ज‍िसके मां बाप गरीबी रेखा से नीचे थे , उसके पास लाखों की संपत्त‍ि ( चुनाव के ल‍िए द‍िये गए शपथपत्र के अनुसार )  कहां से आई, जो शरजील इमाम शाहीन बाग में आसाम को भारत से काटने का सरेआम ऐलान कर रहा था, इसके सुबूत भी सामने आ रहे थे परंतु उसके मां बाप कह रहे थे क‍ि उनके बेटे को साज‍िशन फंसाया जा रहा है।

ये और इन जैसे तमाम उदाहरण हैं जो मांओं की ''झूठ स‍िखाती और ह‍िंसा को जायज ठहराती'' परवर‍िश ही नहीं, स्वयं उनकी ''मानवीय मंशा'' पर भी सवाल उठाते हैं, ये बदलाव समाज के ल‍िए तो घातक हैं ही, स्वयं मह‍िलाओं के ल‍िए भी आत्मघाती हैं। अपने बच्चों, भाइयों और साथ‍ियों को ह‍िंसा के उकसाने वाली मह‍िलायें यह भूल रही हैं क‍ि वे भी इसी आग से झुलसेंगीं , ये न‍िश्च‍ित है।

अब ये तो हमें सोचना है क‍ि हम क‍िस तरह का समाज चाहते हैं, नई पीढ़ी से अच्छाई की अपेक्षा तभी रखी जा सकती है जब हम स्वयं अपने घर से... अपने बच्चों से इसकी शुरुआत करें।  समाज के क‍िसी भी अपराध, पतन या भ्रष्टाचार का पह‍िया घर और घर की मह‍िलाओं पर आकर ही ट‍िकता है। सोचकर देख‍िए ... और आज से ही अपने घर आपने बच्चों से इसकी शुरुआत कीज‍िये। 

- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

संतई को स्वयं ही त‍िरस्कृत करते 'नाराज़ संत'

व्यक्त‍ि साधारण हो या संत, उसमें ये एक आम सी प्रवृत्त‍ि होती है क‍ि जो वह स्वयं है, वैसा द‍िखना नहीं चाहता और जो वह नहीं है उसी का प्रचार व प्रसार करने में पूरे का पूरा जीवन खपा देता है। और इसी व‍िरोधाभास में वह अपना जीवन तो जी ही नहीं पाता, कुछ अनुच‍ित करने से भी बाज नहीं आता।

कबीर दास ने इसी प्रवृत्ति पर कहा था-
नद‍िया व‍िच मीन प्यासी रे, मोह‍ि सुन सुन आवत हांसी रे। 

मंद‍िर में बैठकर भी व्यक्त‍ि की मानस‍िकता मैली हो सकती, वह प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से 'धर्म' और 'मोक्ष' को छोड़कर 'अर्थ' और 'काम' में ल‍िप्त हो सकता है और वह मरघटों में भी स्वयं को पव‍ित्र रख सकता है। इसी पव‍ित्रता के सबसे बड़े उदाहरण कबीरदास और रैदास हमारे सामने हैं। नदी के बीच रह कर भी यद‍ि मछली प्यासी रहे तो इससे बड़ी बात क्या होगी , संत की 'घोष‍ित प्रवृत्त‍ि' वाले भी यद‍ि लालच, नाम, पद प्रत‍िष्ठा पाने के ल‍िए अनुच‍ित हथकंडे अपनायें तो इसे भी उक्त मछली की श्रेणी में ही रखा जाएगा ना। 

5 फरवरी को संसद में प्रधानमंत्री ने जब से राम मंद‍िर तीर्थ ट्रस्ट की घोषणा की है तब से हमारे कुछ संतों के क्र‍ियाकलापों ने जीवन और धर्म की इसी पव‍ित्रता को कठघरे में खड़ा करने का काम कि‍या है।

इन्हीं 'नाराज़' संतों ने ट्रस्ट में स्वयं को स्थान ना द‍िए जाने पर 'रूठ जाने' का जो नाटक क‍िया , वह उन्हीं की गर‍िमा को कम कर गया। हालांक‍ि गृहमंत्री द्वारा उन्हें मना ल‍िया गया परंतु इससे एक बात तो न‍िश्च‍ित हो गई क‍ि राम मंद‍िर के ल‍िए लड़ी गई सैकड़ों साल की कानूनी लड़ाई को ये 'नाराज़ संत' अपने अपने तरीके से कैश करना चाहते हैं। और अपने इस एक '' अनुच‍ित कर्म '' से इन्होंने संतत्व की पर‍िभाषा को ठेस ही पहुंचाई है। धर्मानुसार नाम और पद की लालसाओं में घ‍िरे व्यक्त‍ि को संत कहना ही ठीक नहीं है, चाहे वह क‍ितनी ही पोथ‍ियां क्यों ना पढ़ा हो, क‍ितना ही उसने धार्म‍िक व्याख्यान क्यों ना द‍िए हों। धर्म की स्थापना के ल‍िए मंद‍िर न‍िर्माण एक पव‍ित्र उद्देश्य है परंतु इनकी लालसा न‍िश्च‍ित ही एक न‍िकृष्ट कर्म है।

मैं अंधभक्तों की बात तो नहीं कह सकती परंतु जो भी धर्म का सही अर्थ जानता होगा वह संतों की इस नाराज़गी को धर्मव‍िरुद्ध के साथ राम व‍िरुद्ध भी मानेगा।

पहले से ही धर्म की आड़ में अनेक कुप्रवृत्त‍ियों ने संत समाज को लज्ज‍ित कर रखा है और उस पर ट्रस्ट में स्थान पाने की ''लालसा'' वाली संतों की यह स्वार्थी सोच ने रामभक्ति और सनातन धर्म की श्रेष्ठता को आघात पहुंचाया है।

इन 'नाराज़' संतों से पूछा जाना चाह‍िए क‍ि क्या जो ट्रस्ट में नहीं हैं, उन्होंने राम मंद‍िर न‍िर्माण के ल‍िए प्रार्थनाऐं नहीं कीं या अपनी आहुत‍ियां नहीं दीं, क्या ट्रस्ट भगवान राम की व‍िशालता से भी अध‍िक महत्वपूर्ण है । ये कैसी भक्त‍ि है इनकी, जो प्रत‍िदान मांग रही है। संतई के नाम पर भक्त‍ि का उनका मुखौटा उतर गया है और स‍िर्फ अयोध्या के ही क्यों, ब्रज के संत भी अपनी प्रत‍िष्ठा को इसी तरह धूम‍िल करने में जुटे हैं। अपने आराध्य के ल‍िए प्रत‍िदान मांगने वाले इन संतों की नाराज़गी न‍िंदनीय है।

दो द‍िन से चल रहे इस रुठने मनाने के खेल ने संतों की संतई पर ही प्रश्नच‍िन्ह नहीं लगाया बल्क‍ि यह भी बता द‍िया क‍ि मुखौटे व्यक्त‍ि का पीछा कभी नहीं छोड़ते, वह जब भी असली चेहरे से उतरते है तो व्यक्त‍ि अपनी सारी प्रत‍िष्ठा गंवा चुका होता है।

अंतत: बुधकौशिक ऋषि द्वारा रच‍ित श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के 38वें स्तोत्र में भगवान श्रीराम की स्तुति-

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥  के माध्यम से मैं तो अब भी यही प्रार्थना करती हूं क‍ि घोर असंतई वाली लालसा के बाद भी राम इन्हें सद्बुद्ध‍ि दें ।

- अलकनंदा स‍िंह

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

हिंदी के वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद का निधन

हिंदी के वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद का आज निधन हो गया। हिन्दी के आधुनिक गद्य-साहित्य में सब से महत्वपूर्ण लेखकों में गिने जाने वाले कृष्ण बलदेव वैद ने डायरी लेखन, कहानी और उपन्यास विधाओं के अलावा नाटक और अनुवाद के क्षेत्र में भी अप्रतिम योगदान दिया है। अपनी रचनाओं में उन्होंने सदा नए से नए और मौलिक-भाषाई प्रयोग किये हैं जो पाठक को 'चमत्कृत' करने के अलावा हिन्दी के आधुनिक-लेखन में एक खास शैली के मौलिक-आविष्कार की दृष्टि से विशेष अर्थपूर्ण हैं।


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 इनका जन्म डिंगा, (पंजाब (पाकिस्तान)) में २७ जुलाई १९२७ को हुआ। दक्षिण दिल्ली के 'वसंत कुंज' के निवासी वैद लम्बे अरसे से अमरीका में अपनी लेखिका पत्नी चंपा वैद और दो विवाहित बेटियों के साथ रह रहे थे ।

कृष्ण बलदेव वैद अपने दो कालजयी उपन्यासों- उसका बचपन और विमल उर्फ़ जाएँ तो जाएँ कहाँ के लिए सर्वाधिक चर्चित हुए हैं। एक मुलाक़ात में उन्होंने कहा था- "साहित्य में डलनेस को बहुत महत्व दिया जाता है। भारी-भरकम और गंभीरता को महत्व दिया जाता है। आलम यह है कि भीगी-भीगी तान और भिंची-भिंची सी मुस्कान पसंद की जाती है। और यह भी कि हिन्दी में अब भी शिल्प को शक की निगाह से देखा जाता है। बिमल उर्फ जाएँ तो जाएँ कहाँ को अश्लील कहकर खारिज किया गया। मुझ पर विदेशी लेखकों की नकल का आरोप लगाया गया, लेकिन मैं अपनी अवहेलना या किसी बहसबाजी में नहीं पड़ा। अब मैं 82 का हो गया हूँ और बतौर लेखक मैं मानता हूँ कि मेरा कोई नुकसान नहीं कर सका। जैसा लिखना चाहता, वैसा लिखा। जैसे प्रयोग करना चाहे किए।"

वैदजी का रचना-संसार बहुत बड़ा है- विपुल और विविध अनुभवों से भरा। इसमें हिन्दी के लिए भाषा और शैली के अनेकानेक नए, अनूठे, निहायत मौलिक और बिलकुल ताज़ा प्रयोग हैं। हमारे समय के एक ज़रूरी और बड़े लेखकों में से एक वैद जी नैतिकता, शील अश्लील और भाषा जैसे प्रश्नों को ले कर केवल अपने चिंतन ही नहीं बल्कि अपने समूचे लेखन में एक ऐसे मूर्तिभंजक रचनाशिल्पी हैं, जो विधाओं की सरहदों को बेहद यत्नपूर्वक तोड़ता है। हिन्दी के हित में यह अराजक तोड़फोड़ नहीं, एक सुव्यवस्थित सोची-समझी पहल है- रचनात्मक आत्म-विश्वास से भरी। अस्वीकृतियों का खतरा उठा कर भी जिन थोड़े से लेखकों ने अपने शिल्प, कथ्य और कहने के अंदाज़ को हर कृति में प्रायः नयेपन से संवारा है वैसों में वैदजी बहुधा अप्रत्याशित ढब-ढंग से अपनी रचनाओं में एक अलग विवादी-स्वर सा नज़र आते हैं। विनोद और विट, उर्दूदां लयात्मकता, अनुप्रासी छटा, तुक, निरर्थकता के भीतर संगति, आधुनिकता- ये सब वैद जी की भाषा में मिलते हैं। निर्भीक प्रयोग-पर्युत्सुकता वैद जी को मनुष्य के भीतर के अंधेरों-उजालों, जीवन-मृत्यु, सुखों-दुखों, आशंकाओं, डर, संशय, अनास्था, ऊब, उकताहट, वासनाओं, सपनों, आशंकाओं; सब के भीतर अंतरंगता झाँकने का अवकाश देती है। मनुष्य की आत्मा के अन्धकार में किसी अनदेखे उजाले की खोज करते वह अपनी राह के अकेले हमसफ़र हैं- अनूठे और मूल्यवान।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

कौन हैं कवि ‘दीनानाथ नादिम’, जिनकी कविता लोकसभा में पढ़ी गई

बजट पेश करने के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने कश्मीरी भाषा में कवि‘दीनानाथ नादिम’ की कविता पढ़ी। वित्त मंत्री ने हिंदी में इसका अनुवाद करके बताया कि-


हमारा वतन खिलते हुए शालीमार बाग़ जैसा
हमारा वतन डल लेक में खिलते हुए कमल जैसा
हमारा वतन नौजवानों के गरम खून जैसा
मेरा वतन, तेरा वतन, हमारा वतन
दुनिया का सबसे प्यारा वतन


आगे वित्त मंत्री ने बताया कि इस कविता को साहित्य अकादमी से सम्मानित कश्मीरी कवि दीनानाथ नादिम ने लिखा है। जानते हैं कौन हैं दीनानाथ नादिम जिनकी कविता से लोकसभा गूंज उठी।
18 मार्च 1916 को श्रीनगर में पैदा हुए दीनानाथ नादिम ने कश्मीरी कविताओं को नई दिशा दी और उनकी गिनती जल्द ही 20वीं सदी के अग्रणी कवियों में हो गयी। उहोंने कश्मीर में प्रगतिशील लेखक संघ की अगुवाई भी की। न सिर्फ़ उनकी कविताएं कश्मीरी भाषा में कश्मीर की मिट्टी से जुड़ी हुई हैं बल्कि उन्होंने हिंदी और उर्दू में भी काव्य कहा है। एक बड़ी संख्या में युवा उनकी कविताओं से प्रभावित थे।
दीनानाथ नादिम अपने बारे में कहते हैं कि
“मैं श्रीनगर में पैदा हुआ। बहुत कम उम्र में ही मुझमें कविता के प्रति रुचि पैदा हो गई थी लेकिन शुरुआत में मैं अपनी कविताएं किसी को दिखाने या उन्हें प्रकाशित करवाने के मामले में बेहद संकोची था। मेरी अनेक कविताएं तो इस कारण भी नष्ट हो गईं, क्योंकि वे सिगरेट के पैकेट पर लिखी गई थीं लेकिन कम छपने का मुझे कोई मलाल नहीं है।
एक पीढ़ी पहले तक कश्मीरी के कवि प्रकृति और प्रेम पर ही लिखते थे। मैंने जब लेखन शुरू किया था, तब कश्मीर अशांत था। मैंने ठोस यथार्थ को अपनी कविताओं का विषय बनाया। इस मामले में महजूर और आज़ाद जैसे वरिष्ठ कवियों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।
शेख अब्दुल्ला के स्वागत में एक जनसभा में पढ़ी गई एक कविता से अचानक मैं मशहूर हो गया। जब मुझे सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार देने का फैसला हुआ, तब तक मेरे पास एक भी किताब नहीं थी। तब आयोजकों को मजबूरन यह घोषित करना पड़ा कि मुझे यह पुरस्कार किसी किताब पर नहीं, बल्कि मेरी समग्र रचनाओं पर दिया जा रहा है। मैंने कश्मीर में प्रगतिशील लेखकों को एकजुट करने का काम किया क्योंकि मुझे यह बेहद ज़रूरी काम लगा।
हरिवंश राय बच्चन ने मेरी कुछ कविताओं का अनुवाद किया है जबकि कमलेश्वर मुझे कश्मीरी साहित्य के देवदार कह चुके हैं लेकिन मुझे सबसे ज्यादा खुशी मिलती है, जब मंच पर कविता पढ़ते समय दर्शक हाथ उठा-उठाकर मेरा स्वागत करते हैं। मेरे हिसाब से वही साहित्य महत्वपूर्ण है, जो समाज की बेहतरी के लिए काम करता है।”

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

Corona Virus: मैं ही प्रत्यक्ष… मैं ही प्रमाण

पूरे व‍िश्व में मेडीकल इमरजेंसी के तहत Corona Virus को एक राक्षस की भांत‍ि पेश क‍िया जा रहा है परंतु इस पर कोई बात नहीं हो रही क‍ि आख‍िर ये स्थ‍ित‍ि आई ही क्यों? क्यों वुहान और इस जैसी लैब्स में क‍िसी एक वायरस के प्रत‍िरोधी दर प्रत‍िरोधी वायरस तैयार क‍िये जा रहे हैं। वह भी ऐसे समय में जबक‍ि प्राकृत‍िक और मानवीय संतुलन को साधना प्राथम‍िकता होनी चाह‍िए, प्रकृत‍ि से लड़कर नहीं उसके साथ चलकर ही हम सर्वाइव कर सकते हैं, प्रकृत‍ि से ख‍िलवाड़ के नतीजे हम रोज भुगतते हैं तब भी… ।
मैं नए प्रयोगों के व‍िरुद्ध बात नहीं कर रही परंतु ये तो अवश्य ध्यान में रखना होगा क‍ि क‍िसी प्रयोग के पर‍िणामों की हम क्या ”कीमत” चुका रहे हैं , आने वाली और मौजूदा पीढ़‍ियों को हम क्या दे के जा रहे हैं। Corona वायरस की ट्रैजडी और एंटीबायोट‍िक्स के प्रत‍ि हमारे शरीर का इम्यून होते जाना तो बानगी है क‍ि हम अब भी इनसे सबक नहीं सीखे।
कोरोना वायरस से उपजी मेडीकल इमरजेंसी पर चीन के राष्ट्रपत‍ि शी ज‍िंनप‍िंग ने कहा है क‍ि कोरोना एक ऐसा राक्षस है जि‍सका अंत क‍िया जाना आवश्यक है और हम ऐसा करके रहेंगे। न‍िश्च‍ित ही वे सही कह रहे हैं परंतु सवाल बहुत हैं ज‍िनका जवाब उन्हें ही देना होगा क‍ि आख‍िर अभी तक ज‍ितने भी वायरस अटैक हुए पूरे व‍िश्व में उन सभी का जनक चीन ही क्यों रहा ? दरअसल बात तो अब इस पर होनी चाह‍िए … ।
हमें अच्छी तरह याद है क‍ि 2003 में सार्स (सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम) वायरस ने 8,422 लोगों को अपनी चपेट में लिया था और इससे 900 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इसका जन‍क भी चीन ही था।
फ‍िलहाल वायरस के आनुवांशिक विश्लेषण में कोरोना वायरस की उत्पत्ति चमगादड़ या सांपों से होने की संभावना जताई गई है, परंतु ये महज संभावनाऐं ही हैं ज‍िसे स्वयं बीजिंग के चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा प्रायोजित यह अध्ययन पत्रिका साइंस चाइना लाइफ साइंस में ही प्रकाशित क‍िया गया है, तो इस पर व‍िश्वास कैसे क‍िया जाए। बताया ये भी गया है क‍ि कोरोना वायरस से संक्रमित हुए मरीज थोक बाजार में वन्यजीवों के संपर्क में आए जहां सीफूड, मुर्गियां, सांप, चमगादड़ और पालतू मवेशी बिकते हैं।
कोरोना संक्रमण के सबसे संभावित जीव चमगादड़ और सांप बताए जा रहे हैं, इन्हें खाने से बचने को चीनी सरकार ने एडवाइजरी जारी की है परंतु सोशल मीड‍िया प्लेटफार्म ट्विवटर पर ही कोरोना से र‍िलेटेड जो वीड‍ियो तैर रहे हैं , उनमें जीव‍ित (हाफ-बॉयल्ड ) चमगादड़, चूहे, टैडपोल, मेढक, कुत्ते खाने की मेज पर सजे द‍िखाई दे रहे हैं, उन्हें चाव से खाते लोग और इनके अंगों को प्लेटों में रखकर ड‍िनर टेबल डेकोरेट करते द‍िखाई दे रहे हैं। ये सब क्या है।
चीनी राष्ट्रपत‍ि ने कोरोना को राक्षस बताया परंतु राक्षसी प्रवृत्त‍ि तो स्वयं उनके देशवासी अपना रहे हैं और वो भी सद‍ियों से, और बची खुची कसर उनकी वुहान एक्सपेरीमेंट ने पूरी कर दी। अब 1.1 करोड़ आबादी वाले द्वीप शहर वुहान को प्रशासन की ओर से सील कर द‍िया गया है और वुहान का दौरा करने गई विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की 5 सदस्यीय टीम ने इस वायरस को 2019-एनकोवी नाम देकर अपनी र‍िपोर्ट बनाई है।
अंतत: चीन की सरकार ने अब क‍िसी भी जानवर के मीट को खाने से मना क‍िया है और सब्ज‍ियों को उगाने का आदेश द‍िया है। कोरोना वायरस से उपजी ट्रैजडी हमें फ‍िर से अपनी जड़ों की ओर लौटने और उस ओर ही देखने को बाध्य करती है ज‍िसका एक छोर प्रकृत‍ि से जुड़ा है। ऐरे गैरे जीवों को कच्चा या हाफ बाॅयल्ड करके खाना प्राकृत‍िक दखलंदाज़ी है ज‍िसका नतीज़ा है कोरोना का कहर। इसील‍िए वातावरण की स्वच्छता और शाकाहार भोजन प्रणाली अपनाने के ल‍िए पूरे व‍िश्व में भारतीय सभ्यता का कोई सानी नहीं।
चरक संह‍िता के अनुसार आयुर्वेद में वायरस-
ACTA SCIENTIFIC MEDICAL SCIENCES के Volume 2 Issue 7 October 2018 में छपे Dnyaneshwar Kantaram Jadhav, Assistant Professor, Kayachikitsa Department, Shri Dhanwantri Ayurvedic Medical College and Research Centre, India के एक र‍िसर्च पेपर
तथा
YG Joshi. Charak Samhita of maharshi charak, Chukhambha
prakashan, Varanasi, Chikitsastan, Grahanidosh chikitsa-adhya,
chapter 15, verse no. 44 (2010): 354. के अनुसार –
आयुर्वेदिक दृष्टि से हम वायरस की तुलना ‘ आम’ ( आम, वात कफ प‍ित्त जैसे दोषों में से एक) से कर सकते हैं। यही ‘ आम’ व‍िकृत रस धातु बनाकर असामान्य सेल्स का निर्माण करती है। इन सेल्स के डीएनए और जींस असामान्य होते हैं ज‍िसके कारण आरएनए में प्रोटीन संश्लेषण भी असामान्य होगा और इस तरह जीन जो क‍ि स्वयं प्रोटीन मॉलीक्यूल होता है, भी असामान्य हो जाएगा और यही असामान्य प्रोटीन से बना यह आनुवंशिक पदार्थ ही वायरस है।
इसे भारतीय औषधीय प्रयोगों की पराकाष्ठा ही कहेंगे क‍ि सद‍ियों पुरानी चरक संह‍िता में भी वायरस का उल्लेख व न‍िदान द‍िए गए हैं… जो क‍ि प्राकृत‍िक भी हैं और कोरोना जैसी आपदाओं से जूझने का उपाय भी, शर्त इतनी है क‍ि हम प्रकृत‍ि और उसके न‍ियमों को ना भूलें और ना ही उसमें दखलंदाजी करें।

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

MatruBharti.com ने पुस्तक मेला में द‍िए रीडर्स च्वाॅइस अवार्ड

नई दिल्‍ली। विश्व पुस्तक मेला 2020 आज फिर हिंदी लेखकों के नाम रहा। लेखकों को हमेशा से मानदेय से ज़्यादा उनका सम्मान प्रिय होता है क्योंकि लेखन एक ऐसी कला है जिसका मूल्य पैसों में लगाया जाना सम्भव नहीं। इन लेखकों को सम्मानित करने के उपलक्ष्य में MatruBharti.com ने एक नई पहल ‘रीडर्स च्वाइस अवार्ड’ का आयोजन विश्व पुस्तक मेले के सेमिनार हॉल में किया।
कार्यक्रम में ज‍िन लेखक- लेखिकाओं को ‘रीडर्स च्वाइस अवार्ड से सम्मानित किया गया जिसमें लखनऊ के आशीष कुमार त्रिवेदी, ब्लॉगर सर्वेश सक्सेना, सूरज प्रकाश, सुभाष नीरव, उमा वैष्णव, कविता शर्मा एवं राज कमल आदि लेखक शामिल हैं।
गौरतलब है कि मातृभारती डॉट कॉम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जो 30 हज़ार से अधिक लेखकों की रचनाएं 1.5 लाख से अधिक पाठकों से साझा करने में सफल रहा है। यह एक वेबसाइट और एप के माध्यम से लोगों को जोड़ता है और साहित्य प्रेमियों के एक बड़े समूह को निशुल्क सेवा प्रधान करता है।
मातृभारती डॉट कॉम के सीईओ महेंद्र शर्मा ने बताया क‍ि हम हिंदी में लिख रहे उन सभी लेखकों को सम्मानित करते हैं जिन्होंने ऑनलाइन रीडिंग को पाठकों के लिए दिलचस्प बनाया है और लगातार इस मुहिम में वे अपना योगदान दे रहे हैं। हिंदी सहित्य केवल अखबारों व किताबों पर निर्भर नहीं, अब ऑनलाइन माध्मय से भी यह पाठकों को आकर्षित करती हैं।
– Legend News

शनिवार, 4 जनवरी 2020

सरकारी नौकरी में संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है कोटा ट्रेजडी

राजस्थान का कोटा… जी हां, वही कोटा जहां बच्चे मर रहे हैं और मुख्यमंत्री अशोक गहलौत सीएए के व‍िरोध में मार्च न‍िकाल रहे हैं। बच्चे मर रहे हैं और स्वास्थ्य मंत्री व प्रभारी मंत्री अपने स्वागत में कारपेट ब‍िछवा रहे हैं। बच्चे मर रहे हैं और अस्पताल प्रांगण में गंदगी व सूअरों के घूमने को प‍िछली सरकार की ”राजनैत‍िक साज‍िश” बता रहे हैं। ज‍िनके शब्दों में मृत शरीरों पर भी राजनीत‍ि करने का ज़हर घुल चुका हो, उनसे ये उम्मीद रखना तो कतई बेमानी है क‍ि वे कोटा की घटना से सबक सीखेंगे क्योंक‍ि ऐसा होता तो कई द‍िन बीत जाने पर भी अभी तक अस्पताल में इंतजामात वैसे के वैसे ही हैं बल्क‍ि बूंदी के अस्पताल में भी 10 बच्चे मर चुके हैं।
कोटा में जो भी बच्चे मरे वो स‍िर्फ सरकारी अस्पताल के कुप्रबंधन से, उपकरणों की कमी से , गंदगी की भयंकर स्थ‍ित‍ि से, कदम कदम पर लापरवाही से… ज‍िसे कोई न्यूनदृष्ट‍ि वाला भी बता सकता है क‍ि कमी आख‍िर क‍िसकी है , प्रथम दृष्टया दोषी कौन है, क‍िसकी कमान कसी जानी चाह‍िए और त्वर‍ित सुधार के ल‍िए क्या क्या क‍िया जाना चाह‍िए। जबक‍ि हो इसका उल्टा रहा है क‍ि इस पर बात ना करके कांग्रेस की वर्तमान गहलौत सरकार अपनी पूर्ववर्ती भाजपा सरकार को इन मौतों और अस्पतालों की दुर्दशा के ल‍िए ज‍िम्मेदार बता रही है। हद तो ये क‍ि अब भी कोई ना तो त्वर‍ित सहायता पहुंचाई गई और ना ही कार्यवाही की गई।
घ‍िनौनी राजनीत‍ि की बानगी देख‍िए क‍ि राजस्थान के ही स्वास्थ्य मंत्री ”बेचारे” रघु शर्मा, ज‍िन्हें बच्चों की मौत के 10 द‍िन बाद कोटा अस्पताल का दौरा करने का ”समय” मि‍ल पाया। चाटुकारों ने यहां भी उनका कारपेट ब‍िछाकर स्वागत करने का मौका नहीं छोड़ा , वो तो मीड‍िया था क‍ि बात खुल गई और दूर तलक गई। इसी तरह ठीक 11 वें द‍िन कांग्रेस की अध्यक्षा सोन‍िया गांधी के आदेश ( जैसा क‍ि पार्टी के पीआर व‍िभाग द्वारा प्रचार‍ित क‍िया जा रहा है) पर सच‍िन पायलट कोटा का आज दौरा करेंगे।
17 द‍िसंबर 2018 को राजस्थान में कांग्रेस की सरकार ने शपथ ली उसके बाद से पूरा एक साल म‍िला शासन चलाने को, तो ऐसे में पूर्ववर्ती वसुंधरा सरकार को अस्पतालों के कुप्रबंधन के ल‍िए ज‍िम्मेदार ठहराना कहां तक उच‍ित है।
इसी राजनीत‍ि पर एक हास्यास्पद व बेतुका जुमला ये क‍ि उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अख‍िलेश यादव ने राजस्थान की घटना पर उप्र के मुख्यमंत्री आद‍ित्यनाथ को बच्चों की मौत पर जमकर कोसा।
बहरहाल राजनीत‍ि से इतर सारी ज‍िम्मेदारी तो उस अस्पताल प्रशासन की है जो हर महीने लाखों की तनख्वाह लेकर भी न‍िकम्मा बना हुआ है। असंवेदनशीलता और अकर्मण्यता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा क‍ि सूअरों का व‍िचरण उनकी आंखों के सामने हो रहा था। अस्पतालों के कर्मचार‍ियों व अफसरों के न‍िकम्मेपन को देखना हो तो उनके घरों में जाकर देखें आधे से अध‍िक सामान अस्पतालों से ”पार क‍िया हुआ ” म‍िलेगा। अस्पताल में आने वाली दवाइयां ही नहीं बल्क‍ि अलमारी, बेड , चादरें व कंबल, बाल्टी मग, के अलावा मरीजों के ल‍िए आने वाली खाद्यसाम‍िग्री तक का स्वास्थ्य अध‍िकारी व कर्मचारी आपस में ही बंदरबांट कर लेते हैं। अस्पतालों में फैले इस भ्रष्टाचार के रोग से कोई एक राज्य नहीं बल्क‍ि पूरा देश इससे ग्रस‍ित है।
सरकारी नौकरी में संवेदनाशून्य की प्रवृत्त‍ि का घालमेल ही आज हमें ये सोचने पर व‍िवश कर रहा है क‍ि क्या सच में ज‍िन्हें हम अपने करों से वेतन भत्ते देते हैं वे कर्मचारी हमारी सेवा के ल‍िए हैं भी या हमें पूरे स‍िस्टम द्वारा मूर्ख बनाया जा रहा है।

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

हे बुद्ध‍ि श्रेष्ठो! ये चुप्पी आपके वज़ूद को भी म‍िटा देगी

कभी शायर व गीतकार शकील बदायूंनी ने लिखा था-
काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ…
देश में सीएए और एनसीआर के व‍िरोध पर तो ये शेर ब‍िल्कुल फ‍िट बैठता ही है, साथ ही ये बुद्ध‍ि के उन मठाधीशों पर भी फ‍िट बैठता है जो बात-बात पर देश की अखंडता और गंगाजमुनी तहजीब की म‍िसालें देते रहते हैं। यही तथाकथ‍ित बुद्ध‍िजीवी प‍िछले 15 द‍िन से नागर‍िकता संशोधन कानून के व‍िरोध में देश को बंधक बना चुकी अराजकता पर चुप्पी साधे बैठे हैं।
इतने बड़े देश के क‍िसी एक कोने में मॉब ल‍िंच‍िंग की एक घटना पर अपने अवार्ड वापस करने वाले और पीएम मोदी को हर दूसरे तीसरे द‍िन गर‍ियाने वाले मुनव्वर राणा जैसे शायर हों अथवा अशोक वाजपेयी जैसे साहित्‍यकार, या अनपढ़ों की तरह नागर‍िकता संशोधन कानून का व‍िरोध करने वाली मैत्रेयी पुष्पा। इन जैसे बुद्ध‍िजीव‍ियों ने अपने मुंह से ”कागवचन” बोलकर बता द‍िया क‍ि हम ज‍िन्हें लगभग पूजते थे,ऑटोग्राफ लेते झूमते थे, उन मूर्धन्य साह‍ित्यकारों की अपनी असल‍ियत क्या है। इसे मेरी धृष्टता भी कहा जा सकता है क‍ि मैं इतने ” बड़े बड़े पुरस्कार प्राप्त व‍िभूत‍ियों” के बारे में ऐसे शब्द इस्तेमाल कर रही हूं परंतु क्या करूं समय इनके साथ-साथ हमारे मुगालतों का भी मूल्यांकन कर रहा है क‍ि अभी तक हम ”क‍िस-क‍िस” को अपना आदर्श मानते रहे।
कहां हैं वे राहत इंदौरी साहब जो कहते थे क‍ि-
नए किरदार आते जा रहे हैं,
मगर नाटक पुराना चल रहा है।
चुप क्यों हैं मुनव्वर राणा जो कहते थे क‍ि-
एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना…
काश! राणा साहब उन पाक‍िस्तानी ह‍िंदुओं की बेबसी देख पाते ज‍िनकी लड़क‍ियों को उनके सामने ही अगवा कर धर्मांतरण करा द‍िया जाता है, उनके शवों को अंत‍िम संस्कार तक नहीं करने द‍िया जाता, तथाकथित अपने ही मुल्‍क में वे स‍िंदूर, ब‍िंदी नहीं लगा सकतीं…।
ये तो दो तीन मूर्धन्यों के उदाहरणभर हैं, और भी ढेरों हैं ऐसे ही शेरो शायरी के सरमाएदार… जो मानते हैं क‍ि जुल्म तो स‍िर्फ और स‍िर्फ मुसलमानों पर ही हो सकता है, मॉब ल‍िंच‍िंग स‍िर्फ मुसलमानों की हो सकती है, सरकार स‍िर्फ मुसलमानों के ख‍िलाफ ही कानून बना रही है। उन्हें देश में कोई अल्पसंख्यक द‍िखता है तो वह स‍िर्फ और स‍िर्फ मुसलमान ही है, वह भी ‘डरा हुआ मुसलमान’। गोया क‍ि मुसलमान अकेले ही अल्पसंख्यक हैं भारत में।
इत‍िहास गवाह है क‍ि आज तक ज‍ितने भी दंगे हुए, सभी में इन ”डरे हुए मुसलमानों” की कैसी-कैसी भूमिकाएं रहीं। क्यों आजादी के सत्तर साल बाद भी आज तक ये सत्ता का ”वोटबैंक तो बने” मगर आमजन का व‍िश्वास हास‍िल नहीं कर पाए। क्यों आज तक इन्हें वफादारी साब‍ित करनी पड़ती है, इन बुद्ध‍िजीवि‍यों ने कभी इस ओर सोचा है। ज़ाह‍िर है क‍ि अधिकांश मुसलमानों ने कभी देशह‍ित में नहीं सोचा, स‍िर्फ अपनी कौम का ही सोचा, इसील‍िए वफादारी पर प्रश्नच‍िन्ह इन्होंने खुद लगाया है।
उक्त बुद्ध‍िजीव‍ियों के अलावा भी जो मीड‍िया, सोशल मीड‍िया से लेकर सड़कों पर अराजकता फैला रहे हैं, वे ही कह रहे हैं क‍ि ”आज देश बड़े कठ‍िन दौर से गुजर रहा है…” । ये लफ़्ज कहने वाले वो लोग हैं, जो अभी तक ऐसे ही ना जाने क‍ितने ”कठ‍िन दौरों” को देखकर भी तमाशबीन बने रहे और 1947 से लेकर आज तक हर सांप्रदाय‍िक दंगे के चश्मदीद बने। मगर उनकी नजर में तब देश ”बड़े कठ‍िन दौर” से नहीं गुजरा।
उनकी स्वार्थी प्रवृत्त‍ि अब चरम पर है और इतनी चरम पर पहुंच गई है क‍ि ये ”डरे हुए मुसलमान” जब सरकारी संपत्त‍ि को आग लगा रहे होते हैं तब चुप्पी… और जब पुल‍िस द्वारा लठ‍ियाए जाते हैं तो ” डर का माहौल ”…। गजब आंकलन है भाई। कुल म‍िलाकर लब्बो-लुआब ये है क‍ि मुसलमान आज भी नहीं समझ रहे हैं क‍ि उन्हें क‍िस खतरनाक तरीके से ” इस्तेमाल” क‍िया जा रहा है। चाहे उन्हें देश का कानून न मानने को लेकर, जनसंख्या कानून से डरा कर, तीन तलाक पर गुमराह करके, एनसीआर व सीएए पर भ्रमित करके। आत्मावलोकन तो अब मुसलमानों को करना होगा क‍ि देश के इतर जाकर वे कथ‍ित बुद्ध‍िजीव‍ियों और स‍ियासतदानों के कहने पर अपनी कौम का क‍ितना नुकसान कर रहे हैं।
बहरहाल जाते जाते निदा फ़ाज़ली साहब का एक शेर –
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना।
- अलकनंदा स‍िंंह 

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

साहित्य अकादमी द्वारा 23 भाषाओं में वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा

साहित्य अकादमी ने आज 23 भाषाओं में अपने वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। 
सात कविता संग्रह, चार उपन्यास, छह कहानी संग्रह, तीन निबंध संग्रह, एक-एक कथेतर गद्य, आत्मकथा और जीवनी के लिए यह सम्मान दिया जाएगा।


हिंदी में नंदकिशोर आचार्य को उनके कविता-संग्रह ‘छीलते हुए अपने को’ के लिए यह सम्मान दिया जाएगा। 

शशि थरूर को अंग्रेजी भाषा में कथेतर गद्य ‘एन एरा ऑफ़ डार्कनेस’ के लिए दिया गया है। उर्दू में ‘शाफ़े किदवई’ को जीवनी ‘सवनेह-ए-सर-सैयद- एक बाज़दीद’ के लिए इस सम्मान की घोषणा हुई है।
बाकी भाषाओं में सम्मान पाने वाले साहित्यकार हैं 
असमिया – जय श्री गोस्वामी महंत
बाड्ला – चिन्मय गुहा
बोडो – फुकन चन्द्र
डोगरी – ओम शर्मा
गुजराती- रतिलाल बोरीसागर
कन्नड़ – विजया
कश्मीरी- अब्दुल अहद हाज़िनी
कोंकणी – निलबा खांडेकर
मैथिली – कुमार मनीष
मलयालम- मधुसूदन नायर
मणिपुरी – बेरिल
मराठी- अनुराधा पाटिल
ओड़िया – तरुण कांति
पंजाबी – किरपाल कज़ाक
राजस्थानी- रामस्वरूप किसान
संस्कृत – पेन्ना मधुसूदन
संताली – काली चरण
सिंधी – ईश्वर मूरजाणी
तमिल- धर्मन
तेलुगु – बंदि नारायणा स्वामी
नेपाली भाषा में पुरस्कार अभी घोषित नहीं किया गया है।
साहित्य अकादमी पुरस्कार के रूप में एक उत्कीर्ण ताम्र फलक, शॉल और एक लाख रुपये की राशि प्रदान की जाएगी। घोषित पुरस्कार 25 फरवरी 2020 को नई दिल्ली में आयोजित विशेष साहित्योत्सव में दिए जाएंगे।