गुरुवार, 18 जनवरी 2018

whatsapp पर तैरते इस विराट झूठ का कड़वा सच क्‍या

...कि इस समय मेरी जिह्वा
पर जो एक विराट् झूठ है
वही है--वही है मेरी सदी का
सब से बड़ा सच ! 

...ये उस कविता की पंक्‍तियां हैं जिसे कवि केदारनाथ सिंह ने  अपनी एक लंबी कविता ''बाघ'' में उद्धृत किया है। कवि ने 'समय  के सच' का माप 'झूठ की ऊंचाई' के समकक्ष खड़ा करके निर्णय  करने के लिए दोनों शब्‍दों को...और उनकी मौजूदगी को हमारे  सामने छोड़ दिया है ताकि हम स्‍वयं फैसला कर सकें।
हम बखूबी झूठ तथा सच को माप सकें, परख सकें कि आखिर  इसमें हमारे लिए और समाज के लिए क्‍या ठीक रहेगा।

ये हम सभी की जन्‍मजात कमजोरी है कि जो सामने दिखता है  उसे आंख मूंदकर सच मान लेते हैं जबकि आंखों देखा भी कभी  कभी सच नहीं होता।

अब तो सोशल मीडिया के ज़रिए प्रति माइक्रो सेकंड दिमाग को  छलनी करती सूचनाओं से जूझते हुए हम आज के इस समय में  कैसे झूठ और सच के बीच पहचान करें, इस परीक्षा से गुजरते हैं।

आज सुबह-सुबह Whatsapp पर एक वीडियो मैसेज कुछ यूं टपका  जैसे कि यदि इसे शेयर ना करने वाले महापापी हों और यदि  उन्‍होंने इसे शेयर ना किया तो उनकी या उनके परिवार में से  किसी प्रिय की मृत्‍यु अवश्‍य हो जाएगी। इस वीडियो को देवी मां  काली की तस्‍वीरों के साथ डरावनी आवाज़ में वायरल किया जा  रहा है। वायरल करने वाले मृत्‍यु के भय को कैश करना जानते हैं।  दुनिया के सभी धर्मों में मृत्‍यु को निश्‍चित माना गया है। जो  निश्‍चित है उससे भय कैसा, फिर क्‍यों और कौन इस भय की  मार्केटिंग कर रहा है।

''Larger than Life'' जीने की प्रेरणा देने वाले हमारे धर्म-समाज में  अंधश्रद्धा की कोई जगह नहीं है और फिर देवी मां काली को तो  स्‍वयं काल की देवी अर्थात् शिवतत्‍व में विलीन कर मोक्ष देने वाली  देवी के रूप में पूजा जाता है, तब इस तरह की अंधभक्‍ति और  अंधविश्‍वास फैलाने वाले मैसेज आखिर क्‍या बताना चाहते हैं।

अब जरूरी हो गया है कि इन तैरते संदेशों को सरकार साइबर  अपराध की श्रेणी में ले आए, साथ ही हम भी जागरूकता के लिए  कदम उठाएं ताकि देवी देवताओं के नाम पर मृत्‍यु का भय  दिखाकर इस तरह की कुचेष्‍टाओं को रोका जा सके। मृत्‍यु तो  जीवन का सत्‍य है, ना तो डर कर इससे बचा जा सकता और न  भयवश पूजा-पाठ करके इसे रोका जा सकता है। हम सब इस  सत्‍य को जानते हैं। अब ऐसा तो है नहीं कि सारे दिन ज्ञान  बघारने वाले और व्‍हाट्सएप चलाने वाले इनके घातक परिणामों को  ना जानते हों, इतने शिक्षित तो वे होते ही हैं। मुझे आश्‍चर्य हो रहा  है कि फिर भी ऐसे संदेशों को लेकर आखिर लोगों ने इसे आगे  शेयर कैसे कर दिया। 


आप भी देखें इस वीडियो को...और हो सके तो इस तरह के प्रयासों  को अपने स्‍तर से रोकें और इनकी भर्त्‍सना करें।


झूठ और सच को मापने का कोई निश्‍चित यंत्र नहीं होता, फिर  ऐसे वीडियो हों या कोई अन्‍य माध्‍यम, इनके द्वारा  फैलाया जा रहा झूठ हमें अपने-अपने भीतर बैठे सच से भी  साक्षात्‍कार करा रहा है कि हम आखिर किन-किन बातों से भयभीत  हो सकते हैं।

ऐसे में कवि केदारनाथ सिंह की कविता ''बाघ'' के आमुख में उनका  लिखा झूठ का कड़वा ''सच'' हमें दिशा दिखा रहा है कि-

बिंब नहीं
प्रतीक नहीं
तार नहीं
हरकारा नहीं
मैं ही कहूँगा

क्योंकि मैं ही
सिर्फ़ मैं ही जानता हूँ
मेरी पीठ पर
मेरे समय के पंजो के
कितने निशान हैं

कि कितने अभिन्न हैं
मेरे समय के पंजे
मेरे नाख़ूनों की चमक से

कि मेरी आत्मा में जो मेरी ख़ुशी है
असल में वही है
मेरे घुटनों में दर्द

तलवों में जो जलन
मस्तिष्क में वही
विचारों की धमक

कि इस समय मेरी जिह्वा
पर जो एक विराट् झूठ है
वही है--वही है मेरी सदी का
सब से बड़ा सच!

यह लो मेरा हाथ
इसे तुम्हें देता हूँ
और अपने पास रखता हूँ
अपने होठों की
थरथराहट.....

एक कवि को
और क्या चाहिए!

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 13 जनवरी 2018

सबहीं को मुबारक हो हैप्‍पी वाली ''खिचराईं''

आज मकर संक्रांति है, मुझे अपना बचपन याद आ रहा है जो पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के गांवों में बीता और जहां ''संक्राति' को ''खिचराईं'' कहा जाता है।
आज के दिन वहां घर की औरतों में एक कहावत बहुतायत से कही जाती रही है और वो कहावत रसोई में औरतों की संघशक्‍ति व स्‍वादग्रहण की रोचक विधि बताती है।
जैसे कि बड़ी बहन समान जेठानी, देवरानी से कहती है-
''तात तात खिचरी, जूड़ जूड़ घिउ,
खालेउ द्विउरनिया जुड़ाय जाय जिउ।''
यूं तो खिचड़ी पर और भी कहावतें हैं वहां, जैसे...खाने के बाद बर्तन मलने के आलस्‍य को कुछ यूं इज्‍ज़त बख्‍शी गई है-
''खिचड़ी खात नीक लागे, बटुली मलत पे बथे।''
खिचड़ी खाने के समय को स्‍वास्‍थ्‍य से जोड़ते हुए कहा जाता है कि-
''माघ मास घी खिचरी खाय, फागुन उठि के प्रातः नहाय।''
स्‍वाद बढ़ाने को और बच्‍चों में इसके प्रति मोह जगाने को कह कह के सुनाया जाता है-
''खिंचड़ी के चारी इआर, दही, पापर, घी, अचार।''
बहरहाल, मैं अपने बचपन की इन खूबसूरत यादों से निकल पाती इससे पहले ही देखती हूं कि आज मीडिया में तरह-तरह के मैसेज तैर रहे हैं।
कोई मकर संक्रांति का महत्‍व बता रहा है तो कोई संस्‍कृत में भीष्‍म पितामह द्वारा बताए गए उत्‍तरायण को व्‍याख्‍यायित कर रहा है। इन प्रवचनों से थोड़ा बाहर निकलें तो अलग-अलग तरह की खिचड़ी पकाई जा रही है। इटैलियन रिसोतो से लेकर गुजराती खिचड़ी तक सब उपलब्‍ध है, और वो भी फ्री में। जो भी हो, सोशल मीडिया ने खिचड़ी का कारपोरेटाइजेशन कर ही दिया है। इसके लिए उसे धन्‍यवाद...अब वह हमारी दादी-नानी-काकी सब बन गया है।
तमाम बुराइयों के साथ सोशल मीडिया को हमें इस बात का धन्‍यवाद देना ही होगा कि उसने बीमारों का खाना बताकर नाक-भौं सिकोड़ने वालों के सामने अब इसे गरियाने के सारे रास्‍ते बंद कर दिये हैं। हमने अगर पहले ही खिचड़ी को ''हाईलेवल'' भोज्‍यपदार्थ मान लिया होता तो आज हमें ही हमारी दादी-नानी-काकी की ये रेसिपी यूं ना बताई जा रही होती। और तो और ''कथित तौर पर संभ्रांत'' कहलाने के चक्‍कर में आज हमें अपनी नाक यों घुमाकर ना पकड़नी पड़ रही होती।
पहले आज के कुछ प्रवचन खिचड़ी के इस त्‍यौहार पर सुनिये-
इस दिन से सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है यानी मकर रेखा के बिलकुल ऊपर होता है। वहाँ से धीरे-धीरे मेष राशि में प्रवेश करने के बाद छह महीने बाद कर्क राशि में प्रवेश करता है।
इसी के आधार पर ऋतु परिवर्तन होता है। मकर संक्रांति के दिन से उत्तरायण में दिन का समय बढ़ना और रात्रि का समय घटना शुरू हो जाता है।
कई राज्यों में इस दिन अलग-अलग राज्यों में तिल-गुड़ की गजक, रेवड़ी, लड्डू खाने और उपहार में देने की परंपरा भी है।
चावल बाहुल्य वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में इस पर्व को ' खिचड़ी' या 'खिचराईं' के नाम से मनाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में इस दिन खिचड़ी पकाई और खाई जाती है। कई जगह दाल और चावल दान करने की परंपरा है जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर बाजरे की खिचड़ी पकाई और खाई जाती है।
अब मैं अपनी बात आज की खिचराईं पर मुबारकबाद देते हुए इस तरह खत्‍म करती हूं कि -
“ज्यादा खाये जल्द मरि जाय,
सुखी रहे जो थोड़ा खाय।
रहे निरोगी जो कम खाये,
बिगरे काम न जो गम खाये।”
अंत में बस इतना कहना चाहती हूं कि कुछ ऐसी कहावतें जो हमारे भीतर आज भी स्‍पंदन जगाती हैं, संयुक्‍त परिवारों की याद दिलाती हैं, स्‍वाद और सेहत के प्रति जागरूक करती हैं उनमें सर्वाधिक पढ़े-लिखों की ''खिचड़ी'' यानि हम जैसों की ''खिचराईं'' को लेकर बनी कहावतें भी शामिल हैं।
आज भी हम अपने बचपन को गुनगुना लेते हैं इन्‍हीं के बहाने, वरना तो...यू नो...????????????

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

26 वें विश्व पुस्तक मेले में सबसे ज्‍यादा किताब बिकी ‘औरत और इस्लाम’

देश में तीन तलाक और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर चल रही बहस की वजह से लोगों में इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को जानने की ललक बढ़ी रही और लोग, विशेष तौर पर महिलाएं, यहां आयोजित विश्व पुस्तक मेले में इससे संबंधित किताबें खरीद रही हैं.
प्रगति मैदान में चल रहे 26 वें विश्व पुस्तक मेले में इस्लामी किताबों का प्रकाशन करने वाले कई प्रकाशक आए हैं. वे उर्दू भाषा के अलावा हिन्दी और अंग्रेजी में भी कई किताबों को लेकर आए हैं.
उनका कहना है कि सबसे ज्यादा इस्लाम में औरतों की स्थिति एवं अधिकारों का वर्णन करने वाली किताबें बिक रही हैं.
मरकज़ी मकतबा इस्लामी पब्लिशर्स के मेराज खालिद ने बताया कि ‘औरत और इस्लाम’ नाम की किताब सबसे ज्यादा बिक रही है जिसके अंग्रेजी संस्करण का नाम ‘वूमन राइट्स इन इस्लाम’ है.
उन्होंने बताया कि इस पुस्तक को खरीदने वालों में महिलाएं अधिक हैं और उनमें भी गैर मुस्लिम महिलाओं की संख्या ज्यादा है और वे इस पुस्तक का अंग्रेजी या हिन्दी संस्करण ले रही हैं.
वहीं इस्लामी बुक सर्विस लिमेटिड के नसीम अहमद ने बताया कि मेले में ‘पैगंबर की पत्नियां’, ‘पैगंबर की बेटियां’, ‘पति पत्नी के अधिकार’, ‘इस्लाम में पारिवारिक मूल्य’, ‘वूमन इन इस्लाम’ जैसी किताबें अधिक बिक रही हैं.
उन्होंने बताया कि इन किताबों में सबसे ज्यादा ‘वूमन इन इस्लाम’ बिक रही है और इसके खरीदारों में अधिकतर गैर मुस्लिम युवा हैं जो बड़ी तादाद में इस किताब को खरीद रहे हैं.
उन्होंने बताया कि इस किताब को मिली प्रतिक्रिया को देखते हुए उन्होंने इसकें हिंदी तजरुमे का काम शुरू कर दिया है और कुछ दिनों में यह किताब हिन्दी में भी उपलब्ध होगी.
इस स्टॉल पर किताब खरीद रहे तुषार ने बताया कि टीवी और अखबारों में सब अपनी अपनी बात करते हैं. कोई कहता है कि ”महिलाओं को अधिकार है तो कोई कहता है अधिकार नहीं है. इतना कंफ्यूजन है कि कुछ समझ ही नहीं आता है कि कौन सही है इसलिए यहां से किताबें खरीद रहे हैं ताकि असल स्थिति मालूम हो.”
वहीं जावेद ने बताया कि उन्हें उर्दू नहीं आती है और इस्लाम में अधिकतर किताबें उर्दू में होती है. यहां कुछ प्रकाशक ”हिन्दी और अंग्रेजी में पुस्तकें लेकर आए हैं जिन्हें हम खरीद रहे हैं ताकि थोड़ी दीनी जानकारी हो और लोगों के सवालों के जवाब दे सकें.”
मरकज़ी मकतबा इस्लामी पब्लिशर्स के मेराज खालिद ने बताया कि इस्लाम में महिलाओं के मुकाम का वर्णन करने वाली पुस्तकों के अलावा जिहाद और आतंकवाद के बारे में लिखी किताबें भी पाठक ले रहे हैं. इनमें भी गैर मुस्लिमों की संख्या अधिक है. -Agency

-www.legendnews.in

विवेकानंद जयंती : तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है

स्‍वामी विवेकानंद ने कहा था कि-
You have to grow from the inside out. None can teach  you, none can make you spiritual. There is no other  teacher but your own soul.

अर्थात्
तुम्हें अन्दर से बाहर की तरफ विकसित होना है। कोई तुम्हें पढ़ा  नहीं सकता, कोई तुम्हें आध्यात्मिक नहीं बना सकता, तुम्हारी  आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है।।

आज के मनोवैज्ञानिक शोधों में स्‍वामी विवेकानंद के इसी कथन को  आधार मानकर सेल्‍फ सजेशन व ऑटो सजेशन जैसी विधियों पर  काफी शोध हो रहा है। पीटर फ्लैचर की ''How to Practice Self  Suggestion" व एमेल कोयू की "Self Mastery Through  Conscious Auto Suggestion" जैसी पुस्‍तकें यह बताने को काफी  हैं कि आज जिस सेल्‍फ सजेशन व ऑटो सजेशन जैसी विधियों पर  काम हो रहा है, उसे तो हमारे दार्शनिकों, चिंतकों ने सदियों पूर्व  भारतीय समाज में स्‍थापित कर दिया था।

सेल्‍फ सजेशन से ऑटो सजेशन की ओर ले जाती भगवद्गीता का  भी तो सार यही है। गीता कहती है कि तुम्‍हारे वश में सिर्फ ''करना  है''। तो सोचो और करो। सोचने का अर्थ ही स्‍वयं के बारे में  विचारना है, ''स्‍वयं सोचना'' यानि सेल्‍फ सजेशन और इसके बाद की  प्रक्रिया ''करना'' यानि ऑटो सजेशन देते हुए खुद को खुद का संदेश  देना। इसका अर्थ है कि अपनी आत्‍मा को अपनी सोच में शामिल  करना, अपने मन व मस्तिष्‍क दोनों को जगाना। और जब यह  प्रक्रिया चल निकलेगी तो निश्‍चित ही आप ऐसी अवस्‍था में पहुंच  जायेंगे जो आपको दीवारों में से रास्‍ता बनाने में मदद करेगी।  कठिन से कठिन स्‍थितियों में भी धैर्य धारण करने के लिए गीता के  संदेश से लेकर स्‍वामी विवेकानंद के कथ्‍य और पीटर फ्लैचर व  एमेल कोयू सभी के वाक्‍य अपने भीतर झांकने को कहते हैं। इसका  अर्थ यह भी है कि जब मन और मस्‍तिष्‍क खुद से संवाद स्‍थापित  कराते हैं तो अंतरात्‍मा की आवाज़ सुनना आसान हो जाता है, यह  संप्रेषण ही सेल्‍फ सजेशन से होकर ऑटो सजेशन की ओर ले जाता  है।

आज जब पूरे विश्‍व के साथ-साथ हमारे देश में भी वैचारिक  नकारात्‍मकता अपने पांव फैला चुकी है तब स्‍वामी विवेकानंद के  यह वाक्‍य कि ''तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है'' पर  अमल करना अराजक सोच को दूर कर सकता है।

ये आज के समय की बड़ी आवश्‍यकता है क्‍योंकि किस्‍म-किस्‍म की  आजादी मांग रहे लोगों की सिर्फ ''अपने हितों'' और ''अपनी  इच्‍छाओं'' तक सीमित होने की प्रवृत्‍ति ने पूरा वातावरण अराजक  बना दिया है, हर कोई सिर्फ अपने लिए सोच रहा है। एक ऐसे  समय जब निर्वस्‍त्र होने को निजी स्‍वतंत्रता और गौमांस भक्षण को  भोजन की आजादी बताया जाने लगा हो, तब जरूरी हो जाता है कि  व्‍यक्‍ति को अपने उस सदियों पुराने दर्शन से फिर जोड़ा जाए जो  सर्वहित सोच सके। स्‍वयं के साथ समाज की प्रगति चाहने को  मानसिक शांति जरूरी है और इसके लिए अपने भीतर ही गुरू की  खोज करनी होगी।

बहरहाल, गीता के सार की भांति ही एक ''व्‍यक्‍तित्‍व'' को ''अमरत्‍व''  की ओर ले जाने वाले हमारे महानुभावों के ये अनमोल वाक्‍य हमें  फिर से अपने भीतर की ओर जाने के प्रेरित कर रहे हैं क्‍योंकि  आज हर दूसरा व्‍यक्‍ति किसी अन्‍य की खामी निकालने, उसे सलाह  देने, उसके व्‍यक्‍तित्‍व को क्षीण करने पर आमादा है।

ऐसे में आवश्‍यक यह है कि स्‍वामी विवेकानंद की औपचारिक जयंती  मनाने के बजाय हम उनके विचारों को आत्‍मसात करने की कोशिश  करें, और कोशिश करें इस बात की कि महान आत्‍माओं का ध्‍येय  पूरा करने में सहयोगी बन पाएं।
मन, वचन और कर्म से हम एक हों और किसी स्‍तर पर हमारे  विचारों में अंशमात्र खोट पैदा न हो सके क्‍योंकि सेल्‍फ सजेशन से  ऑटो सजेशन की यात्रा तभी पूरी होना संभव है अन्‍यथा समस्‍त सूत्र  वाक्‍य तथा सारे धर्मग्रंथ मात्र कागज के टुकड़ों पर अंकित  काले अक्षरों के सिवाय कुछ नहीं हैं। 

- सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

सोमवार, 8 जनवरी 2018

नाजायज़ शोर की बंधुआगिरी

Painting courtsey: Google images
किसी भी धर्म का मर्म व्‍यक्‍ति की अंतध्‍वर्नि को जाग्रत करने में निहित है  ताकि धर्माचरण के बाद प्रवाहित होने वाली तरंगें व्‍यक्‍ति व समाज में  सकारात्‍मक ऊर्जा फैलाने का काम करें।

शोरगुल के माध्‍यम से अपनी पहचान बनाने व बताने वाला धर्म किसी भी  कोण से किसी का भी लाभ नहीं कर सकता। ध्‍यान लगाने के लिए भी शांति  जरूरी होती है, ना कि शोर। तेज आवाज़ के साथ कही गई सही बात भी  अपना वज़न खो देती है और तेज बजने वाला मधुर से मधुर संगीत भी  किसी को प्रिय नहीं लग सकता।

ऐसे में धार्मिक स्‍थलों पर लगे लाउडस्‍पीकर्स के बारे में ध्‍वनि प्रदूषण  अधिनियम के तहत कड़ी कार्यवाही न करने को लेकर राज्‍य सरकार से  इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जवाब तलब करना आशा जगाता है कि हर  गली-कूचे में स्‍थापित धर्म स्‍थलों से आने वाली कानफोड़ू आवाजें शायद अब  जीना हराम नहीं करेंगी।

विगत वर्ष दिसंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने धार्मिक स्थलों में  बज रहे लाउडस्पीकर्स पर कड़ी नाराजगी जताई थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में  उच्चाधिकारियों को फटकार लगाकर कार्यवाही के लिए हलफनामा दाखिल  करने का आदेश दिया है।

यह आदेश मोतीलाल यादव की तरफ से दायर की गई याचिका की सुनवाई  के दौरान हाईकोर्ट ने दिया था।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अब्दुल मोइन की बेंच ने कहा था कि  प्रमुख सचिव गृह, सिविल सचिवालय और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड  के चेयरमैन अलग-अलग व्यक्तिगत हलफनामा देकर छह हफ्ते में बताएं कि  ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए उन्होंने क्या किया? इस मामले की अगली  सुनवाई अगले महीने यानि 1 फरवरी 2018 को है।

इसके अलावा हाईकोर्ट ने विभिन्‍न जुलूसों और शादी बरातों से हो रहे ध्वनि  प्रदूषण को लेकर भी कार्यवाही करने को कहा है।
हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी सहित गृह विभाग ने सभी जिलों के डीएम को  पत्र भेजकर धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाए जाने के बाद रिपोर्ट मांगी  है।
इसमें कहा गया है कि बिना अनुमति के लगाये गए लाउडस्पीकर हटाये  जाएंगे। अनुमति 15 जनवरी तक ले लेनी होगी। 15 जनवरी के बाद किसी  भी संस्थान को अनुमति नहीं दी जाएगी। 16 जनवरी से जिलों में बाकायदा  अभियान चलाकर बिना अनुमति बजाए रहे लाउडस्पीकर हटाने का काम शुरू  किया जाएगा। यह अभियान 20 जनवरी तक चलेगा और फिर इसकी रिपोर्ट  शासन को भेजी जाएगी।
यूं भी मेडीकल साइंस ने तो बाकायदा किसी भी तरह के शोर, ध्‍वनियों के  धमाके को न केवल मनुष्‍य के लिए बल्‍कि प्रकृति के हर अंश के लिए  प्राणघातक बताया है। संवेदना और सकारात्‍मकता दोनों के लिए शांति  आवश्‍यक है ना कि शोरगुल। ध्‍वनियों के प्रदूषण ने आजकल हर तीसरे  व्यक्‍ति को आक्रामक और गुस्‍सैल बना दिया है, नतीजतन शरीर और मन  दोनों बीमार हो रहे हैं। इस तरह बीमार बने हम 'जिस सुख की कल्‍पना' पाले  बाबाओं-मौलवियों की चौखटों तक जा पहुंचते हैं 'वही सुख' हमारे किसी  धर्मस्‍थल, किसी शादी-ब्‍याह या किसी अन्‍य समारोह द्वारा 'अपने-अपने  लाउडस्‍पीकर्स' के ज़रिए पहले ही छीना जा चुका है।

हम यदि ये भ्रम पाले हुए हैं कि हमारे गली, मोहल्‍ले, सामाजिक समारोह  स्‍थल व धार्मिक स्‍थल लाउडस्‍पीकर्स के साथ ही गुंजायमान होंगे तो हमने  जान-बूझकर अपनी दर्दनाक मौत को बुला रखा है।

बहरहाल, हाईकोर्ट की सख्‍ती और उप्र. सरकार की तत्परता से बौखलाए  द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद और देवबंद के उलेमा अपने  अपने तरीके से इस कदम की आलोचना करने में जुट गए हैं, मगर वो ये  भूल रहे हैं कि एक मठ की महंताई से ऊपर उठकर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने  योगी आदित्‍यनाथ जब अंधविश्‍वासों को धता बताकर नोएडा जा सकते हैं,  कुंभ में शंकराचार्यों को 'नियम विरुद्ध' ज़मीन मुहैया कराने से इंकार कर  सकते हैं, ज्‍योतिषपीठ के शंकराचार्य की पदवी के लिए दंडी स्‍वामियों को  शास्‍त्रार्थ की परंपरा आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्‍साहित कर सकते हैं और सनातन  धर्म में फैली कुरीतियों को दूर कर जानजाग्रति फैलाने का काम कर सकते हैं,  मदरसों की गतिविधियों और मौलवियों की ''खाऊ-उड़ाऊ'' संस्‍कृति को  सर्विलांस पर ले सकते हैं, वह ध्‍वनिप्रदूषण की बावत कठिन से कठिन कदम  भी उठा सकते हैं।

जो भी हो, हमें तो यह आशा करनी ही चाहिए कि कम से कम उत्‍तर प्रदेश  को तो निकट भविष्‍य में इस नाजायज शोर से मुक्‍ति मिल जाएगी और जो  लाडस्‍पीकर्स बजाए भी जाऐंगे, वे अपनी हदें पार नहीं कर सकेंगे।

-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 3 जनवरी 2018

लिखी गईं नई इबारतें...कि ये ख्‍वाहिशें रूमानी नहीं हैं...

आज के विषय पर सबसे पहले पढ़िए मेरे चंद अशआर.....

ये परेशानियां जिस्‍मानी नहीं हैं
ये ख्‍वाहिशें रूमानी नहीं हैं
और ये खिलाफतें भी रूहानी नहीं हैं
कि अब ये आवाज़ें उठ रही हैं
उन जमींदोज वज़ूदों की जानिब से,
आहिस्‍ता-आहिस्‍ता से, 
तो कहीं पूरे ज़ोर शोर से
गोया अब शिद्दतें अंजाम तक पहुंचेंगी
कि लिखी जा रही हैं नई इबारतें।



देश ज़ुदा हैं...परेशानियां भी ज़ुदा...मगर अब मुस्‍लिम महिलाओं ने अपनी आवाज़ उठाना शुरू  कर दिया है और अब ये आवाज़ें भारत व अफगानिस्‍तान से होकर ईरान तक पहुंच चुकी हैं।  ये उनकी संगठनात्‍मक शक्‍ति का ही उदाहरण हैं।

आप भी क्रमवार नज़र डालिए इन अभियानों पर-


भारत में लिखी गई नई इबारत-

वज़ूद मापने की यदि कोई इकाई होती तो आज इसकी सर्वाधिक जरूरत मुस्‍लिम महिलाओं  को होती। खुशखबरी है कि भारतीय मुस्‍लिम महिलाएं नए साल आने तक उठ खड़ी हुई हैं, वे  उठ खड़ी हुई हैं उन बंदिशों के खि़लाफ जो उनके वज़ूद पर भारी पड़ रहीं थीं। उनकी  संगठनात्‍मक भावना प्रबल हुई तभी तो सुप्रीम कोर्ट के रास्‍ते तीन तलाक़ बिल लोकसभा में  पास हो पाया।

नाइश हसन, अंबर ज़ैदी, रूबिका लियाक़त, ताहिरा हसन, शाइस्‍ता अंबर से शुरू हुआ ये सफर  आखिर में इशरत जहां तक आकर ठहरा नहीं है। पानी की तरह इन महिलाओं ने चट्टानों के  बीच से रास्‍ता निकाल लिया है। मौलानाओं द्वारा स्‍थापित रेगुलेटरी-बॉडीज को नारी शक्‍ति ने  धता बताई है। मुस्‍लिम महिलाओं ने जता दिया है कि पुरुष अब अपने बनाए नियमों को फिर  से खंगालें। बहरहाल, भारतीय मुस्‍लिम महिलाओं का तो ये आग़ाज़ है जिसे अंजाम तक चलते  जाना है।
उनकी इस जद्दोजहद की ये जीत ही तो है कि 2017 के आखिरी रेडियो संबोधन में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी द्वारा ''मन की बात'' के तहत यह बात उल्‍लेख न की जाती कि अब मुस्‍लिम  महिलाओं को बिना ''महरम'' के ही ''हज पर जाने की सुविधा'' सरकार ने शुरू कर दी है और  इसमें तमाम महिलाओं ने स्‍वयं को हज पर जाने के लिए एनरोल भी करा लिया है। अब तक  हज पर जाने के लिए ''महरम'' यानि पुरुष अभिभावक का होना महिलाओं की सुरक्षा की  गारंटी माना जाता था मगर अब कोई महिला यदि अकेले हज पर जाना चाहती है तो उसे  ''महरम'' के नाम पर रोका नहीं जा सकता।

अफगानिस्‍तान #WhereIsMyName हैशटैग ने छेड़ा 'अजी-सुनती हो' कहने के खिलाफ  अभियान -

भारत की ही तरह गुजिश्‍ता साल में कट्टरपंथ की आग से सुलगते अफगानिस्‍तान के अंदर भी  वज़ूद के लिए बदलाव की आहट भी सुनने को मिली।
गौरतलब है कि इस मुल्‍क में महिलाओं के नाम लेने का चलन नहीं है। उनको किसी की  बेगम, बहन, बेटी या मां के रूप में ही संबोधित किया जाता है। इस मामले में खास बात यह  है कि अफगान समाज में महिलाओं का नाम लेना एक तरह से गुस्‍सा जाहिर करना माना  जाता है और यदा-कदा इसको अपमान के रूप में भी लिया जाता है। अब इसके खिलाफ  अफगानी महिलाओं ने आवाज़ उठानी शुरू दी है। वे चाहती हैं कि वे अपने नाम से पहचानी  जाएं।

अफगान कानून के तहत जन्‍म प्रमाणपत्र में मां का नाम भी दर्ज नहीं होता। इन सबके  खिलाफ बदलाव की मांग अफगान समाज के भीतर से ही उठी है। सोशल मीडिया में  अफगानिस्‍तान की महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने #WhereIsMyName से एक अभियान  शुरू किया, इस अभियान के माध्‍यम से महिलाएं इस व्‍यवस्‍था में बदलाव की मांग करते हुए  चाहती हैं कि उनको उनके नाम से संबोधित किया जाना चाहिए। कुछ महीनों पहले शुरू हुए  इस हैशटेग अभियान में हजारों महिलाएं शामिल हुई, साथ ही खुशखबरी ये है कि महिलाओं  के साथ प्रगतिवादी पुरुष भी उन्‍हें प्रोत्‍साहित कर रहे हैं, हौसला बढ़ा रहे हैं।

इस अभियान से जुड़ी महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है-

गुमनामी की जिंदगी से बाहर निकलने के लिए शुरू किए गए इस अभियान से जुड़ी महिला  सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अफगानिस्‍तान में महिलाओं के नाम लेने के मामले  में ऐसी पुरातनपंथी सोच है कि महिलाएं बिना किसी निजी शिनाख्‍त के ही अपना जीवन बसर  करती हैं। यहां तक कि अंतिम संस्‍कार के समय भी महिलाओं का नाम नहीं लिया जाता और  कब्र के पत्‍थर पर भी उनका नाम नहीं लिखवाया जाता, इसलिए मौत के बाद वह सिर्फ एक  ऐसी कब्र बनकर रह जाती हैं जिसकी कोई पहचान तक नहीं होती। कब्र का पत्थर भी उन्‍हें  शायद ही पहचान पाता हो।

मुस्‍लिम महिलाओं की ऐसी ही जद्दोजहद अब ईरान में भी कट्टरपंथी आयतुल्‍ला खमैनी शासन  के शुरू हो चुकी है और उसकी गंभीरता का अंदाज सड़कों पर उमड़ रही आंदोलनकारियों की  उस भीड़ से लगाया जा सकता है, जिसमें कई दर्जन लोग मारे जा चुके हैं लेकिन आंदोलन  फिर भी जारी है। अच्‍छी बात ये है कि यहां भी प्रगतिवादी ईरानी युवक महिलाओं के कंधे से  कंधा मिलाकर शासक वर्ग की गोलियां झेलने को सड़कों पर मौजूद हैं।

बहरहाल, मैं फिर से बात भारत की मुस्‍लिम महिलाओं की संगठनात्‍मक शक्‍ति की ही करूंगी  जिन्‍हें मौलवियों के कट्टरवादी रवैये के खिलाफ सरकार का भी साथ भी मिल रहा है। हालांकि,  अब भी ज्‍यादातर महिलाऐं पारिवारिक मोर्चे पर अकेली हैं और मौलवी कहते हैं कि  तलाके-बिद्दत खत्‍म होने से तमाम ''घर बिगड़ेंगे'', मौलवी ये भी कहते हैं कि ''बिना महरम''  हज जाने वाली महिला को कयामत के रोज़ सज़ा दी जाएगी।

जो भी हो, अब तो मुस्‍लिम महिलायें ''मौलवियों की गिरफ्त से बाहर आ रही हैं'' और पूछ  रही हैं आखिर ये कयामत कब होगी। आखिर सब कुछ जो प्रगतिवाद की ओर ले जाता है कि  वह मुस्‍लिमविरोधी ही क्‍यों हो जाता है। महिलाओं को कठपुतली बनाकर क्‍या मौलानाओं की  हकीकत सामने नहीं आ गई। क्‍या एक महिला अकेली नहीं जा सकती। क्‍या मक्‍का तक जाने  वाली अकेली महिला किसी के लिए खतरा हो सकती है। शरियत जब वजूद में आई तब उसे  क्‍या ये पता था कि कंप्‍यूटर-स्‍मार्टफोन जैसी चीज दुनिया में आएगी या चांद के पार मंगल  और धरती के अंदर तक का अध्‍ययन महिलाएं करेंगी।
प्रश्‍न बहुत हैं, बहसें भी बहुत, लेकिन सिलसिला तो अभी शुरू हुआ है...सफ़र लंबा जरूर है  मगर इसकी मंज़िल एकदम स्‍पष्‍ट है। हम प्रतीक्षा करते हैं और प्रार्थना भी कि इस वास्‍तविक  आज़ादी के अभियान चलते रहें और मुकाम दर मुकाम अपनी मंज़िल की ओर आगे बढ़ें।


-अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

मशहूर शायर अनवर जलालपुरी के निधन से गमगीन हुआ माहौल

ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है
वैसे अभी मरने का इरादा भी नहीं है

हर चेहरा किसी नक्श के मानिन्द उभर जाए
ये दिल का वरक़ इतना तो सादा भी नहीं है

वह शख़्स मेरा साथ न दे पाऐगा जिसका
दिल साफ नहीं ज़ेहन कुशादा भी नहीं है....


जी हां ये नज्‍़म कहने वाले मशहूर शायर अनवर जलालपुरी नहीं रहे। 

गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले मशहूर शायर अनवर जलालपुरी का निधन मंगलवार सुबह किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ में हो गया। उन्हें चार दिन पहले ब्रेन हैमरेज होने के कारण उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। उन्होंने आज सुबह 10 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। जलालपुरी को कल दोपहर में जोहर की नमाज के बाद अम्बेडकर नगर स्थित उनके पैतृक स्थल जलालपुर में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा.

अनवर जलालपुरी देश की आज़ादी के साथ पले-बढ़े और खुली हवा में सांस लेते हुए, मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक के रूप में उभरे। 6 जुलाई, 1947 को उत्तर प्रदेश में अंबेडकर नगर जिले के जलालपुर में जन्मे अनवर जलालपुरी ने अंग्रेज़ी और उर्दू में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की फिर अंग्रेज़ी के प्राध्यापक बने।

अपने घर पर सजी महफिलों में बुजुर्गों को पानी पिलाने और पान खिलाने के दौरान अनवर जलालपुरी को कब शायरी का शौक हुआ, पता ही नहीं चला। वे आठवीं-नौवीं कक्षा के दौरान शेर कहने लगे थे। दरअसल घर में माहौल ही कुछ ऐसा था। पिता मौलाना रूम की मसनवी सुनाया करते थे। जब अनवर जलालपुरी इंटर मीडियट के छात्र के रूप में मुशायरे पढ़ने लगे तो कई बार लोग शक करते थे कि यह शेर इस नौजवान का ही है या पिता की मदद से उन्होंने लिखा लिया! देखते ही देखते एक शायर के अलावा अच्छे मंच-संचालक के रूप में उन्होंने कई बड़े मुशायरों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी और प्यार-मुहब्बत के संदेश को हमेशा प्राथमिकता दी। 

मुशायरों की जान माने जाने वाले जलालपुरी ने 'राहरौ से रहनुमा तक', 'उर्दू शायरी में गीतांजलि' तथा भगवद्गीता के उर्दू संस्करण 'उर्दू शायरी में गीता' पुस्तकें लिखीं जिन्हें बेहद सराहा गया था. उन्होंने 'अकबर द ग्रेट' धारावाहिक के संवाद भी लिखे थे.

कला की विभिन्न विधाओं में मंच का संचालन भी शामिल है। विशेषकर कवि-सम्मेलनों और मुशायरों का संचालन करने के लिए एक विशेष कलात्मक प्रतिभा की आवश्यकता होती है। उर्दू मुशायरों के संचालन के इतिहास में सक़लैन हैदर के बाद एक बड़ा नाम उभरता है- अनवर जलालपुरी का। आज अनवर जलालपुरी न केवल मुशायरों के संचालक बल्कि एक अच्छे शायर, विद्वान तथा गीता और गीतांजलि जैसी पुस्तकों को उर्दू शायरी से जोड़ने वाले रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं, उर्दू में शायरी करते हैं और संस्कृत, फारसी तथा अरबी पर भी अपना अधिकार रखते हैं। 

मंच संचालन की कला पर उनका कहना था कि यह सचमुच में बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। उन्होंने 1968 से अब तक देश के छोटे-मोटे शहरों से लेकर लाल किले के मुशायरे तक का संचालन किया। उनका कहना था कि शायर अपने समय के अनुसार, पढ़वाने की मांग रखते हैं और श्रोताओं की अपनी मांग होती है। वे अच्छे चेहरे अच्छी आवाज़ों की इच्छा रखते हैं। दोनों में सामंजस्य बनाए रखते हुए मुशायरों का सम्मान बढ़ाना अनिवार्य रहता है। 

श्रीमदभागवत गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले नामचीन उर्दू शायर को प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाजा था। 

ज्ञात हुआ है कि 71 वर्षीय जलालपुरी को ब्रेन स्ट्रोक के बाद गंभीर हालत में बृहस्पतिवार देर रात केजीएमयू में भर्ती कराया गया है। वे शाम को अपने बाथरूम में गिरने के बाद से गंभीर रूप से घायल हो गये थे। बाथरुम का दरवाजा तोड़ कर उन्हें बाहर निकालने के बाद परिजनों ने उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया था।

वहां चिकित्सकों ने उनके दिमाग में खून के थक्के, रक्तस्त्राव पाए जाने के बाद उन्हें केजीएमयू रेफर कर दिया था। लखनऊ के हुसैनगंज निवासी उर्दू शायर अनवर जलालपुरी के निधन से साहित्य जगत में शोक है। 

उनके घर पर देखने वालों का तांता लगा हुआ है। जो भी उनकी मौत की खबर सुन रहा है वह गमगीन हो जा रहा है। सभी की आंखे नम हो रही हैं। 

उन्‍हीं की रचना- 

जो भी नफ़रत की है दीवार गिराकर देखो
दोस्ती की भी ज़रा रस्म निभाकर देखो
कितना सुख मिलता है मालूम नहीं है तुमको
अपने दुश्मन को कलेजे से लगाकर देखो

विख्यात शायर मलकज़िादा मंजूर के शागिर्द रहे अनवर जलालपुरी का व्यक्तित्व अपने आप में कला, साहित्य एवं संस्कृति की उम्दा मिसाल रहा है। वे कहते हैं-

गुलों के बीच में मानिन्द ख़ार मैं भी था
फ़क़ीर ही था मगर शानदार मैं भी था
मैं दिल की बात कभी मानता नहीं फिर भी 
इसी के तीर का बरसों शिकार मैं भी था।


-अलकनंदा सिंह