बुधवार, 24 अगस्त 2016

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर: मातृत्व के बाजार को बचाने का प्रयास है सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016

कर्मण्यवाध‍िकारस्ते मा फलेषु कदाचन्
श्रीमद्भगवत गीता का यह उपदेश हम ना जाने कितनी बार दोहराते आए हैं परंतु जब इसे सार्थक सोच के साथ क्रियान्वित होते देखते हैं तो निश्च‍ित ही भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाना भी सार्थक हो जाता है।

आज और कल भगवान श्री कृष्ण के जन्म की धूम मची है। हमारे यहां ब्रज में तो जन्माष्टमी मनाने  का अपना एक अलग आनंद , एक अलग अंदाज़ होता है, इस बार भी है , चारों ओर भक्ति का अंबार उड़ेला जा रहा है। मां यमुना अपने  उसी रूप में दर्शन दे रही हैं जैसे कि श्री कृष्ण जन्म के समय उफन रही थीं और आज से लेकर अगले एक हफ्ते तक ब्रज में उत्सव का यही हाल रहना है मगर आज ऐन जन्माष्टमी से पहले  भारत सरकार की ओर से एक समाचार ऐसा आया है जिसे श्री कृष्ण जन्म पर ''मातृत्व और नवजातों'' के अस्तित्व को बाजार की वस्तु बनाने पर रोक लगाने के क्रम में देखा जाना चाहिए।

मोदी कैबिनेट ने आज उस बिल को मंजूरी दे दी जिसमें Surrogacy (किराये की कोख) पर लगाम लगाने का प्रावधान है। साथ ही Surrogacy वाली मां के अधिकारों की रक्षा के उपाय भी किये गये हैं। इसके साथ ही सरोगेसी से जन्मे बच्चों के अभिभावकों को कानूनी मान्यता देने का प्रावधान है।

सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 कैबिनेट से पास

कैबिनेट से पास सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 मुताबिक अविवाहित पुरुष या महिला, सिंगल, लिव इन में रह रहा जोड़ा और समलैंगिक जोड़े अब सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते. इसके साथ ही अब सिर्फ रिश्तेदार महिला महिला ही सरोगेसी के जरिए मां बन सकती है.
केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सरोगेसी बिल पर कहा, “आज कल प्रसव पीड़ा से बचने के लिए सरोगेसी फैशन बन गई है. भारत लोगों के सरोगेसी हब बन गया था इसलिए बिल की जरूरत महसूस हुई.”

फिल्मी हस्तियों पर भी निशाना साधा

सुषमा स्वराज ने इशारों-इशारों में फिल्मी हस्तियों पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा, ”बड़े सितारे जिनके न सिर्फ दो बच्चे हैं, बल्कि एक बेटा और बेटी भी है, वे भी सरोगेसी का सहारा लेते हैं.”
स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रस्ताव के अनुसार किराये की कोख मसौदा विधेयक 2016 का लक्ष्य देश में किराये की कोख संबंधी प्रक्रिया के नियमन को समुचित ढंग से अंजाम देना है.

क्या है कैबिनेट से पास हुए सरोगेसी बिल में
कैबिनेट से पास हुए बिल में व्यावसायिक सरोगेसी पर पूरी तरह बैन लगाने का प्रस्ताव है. इसके साथ ही अब सिर्फ रिश्तेदार ही सेरोगेट मां बन सकती है.
जिन माता-पिता के पहले से एक संतान है या उन्होंने एक संतान को गोद लिया है तो वे दूसरी संतान के लिए सरोगेसी का सहारा नहीं ले सकते.
देश भर में सरोगेसी के लिए 2000 क्लीनिक हैं. अब सिर्फ भारतीय भारतीय नागरिक ही सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे सकते हैं.
पांच साल से शादीशुदा जोड़े, जिनकी कोई संतान नहीं है वो ही सरोगेसी के लिए आवेदन कर सकते हैं. अविवाहित, सिंगल, लिव इन में रह रहा जोड़ा और समलैंगिक जोड़े सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते.
सरोगेसी के लिए सरोगेसी में उम्र की सीमा भी तय कर दी गई है. इसके मुताबिक पुरुष की उम्र 26-55 साल और महिला की उम्र 25-50 साल होगी तभी वे सरोगेसी के लिए आवेदन कर सकते हैं.
अगर सरोगेसी के लिए आवेदन करने वाला जोड़ा किसी बीमारी से ग्रसित है तो वो आवेदन नहीं कर सकता.
इसके साथ ही एक महिला सिर्फ एक बार ही सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे सकती है.
सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे जा रही महिला का शादीशुदा होना जरूरी है. इसके साथ ही वह पहले भी एक बच्चे को जन्म दे चुकी हो.
सभी सरोगेसी क्लीनिक का रजिस्टर होना जरूरी है. अगर सरोगेसी के बाद जन्मे बच्चे को अपनाने से इनकार किया जाता है तो उसके लिए बिल में 10 साल की जेल और 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है.
सरोगेसी के जरिए पैदा हुए बच्चे के पास वो सभी कानूनी अधिकार होंगे सामान्य रूप से पैदा हुए बच्चे के पास होते हैं. सरोगेसी क्लीनिक को पच्चीस सालों का रिकॉर्ड मौजूद रखना होगा.
स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री की अध्‍यक्षता में केंद्र पर नेशनल सरोगेसी बोर्ड, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्तर तक स्टेट सरोगेसी बोर्ड का गठन किया जाएगा.

क्यों पड़ी सरोगेसी बिल की जरूरत
सरकार ने हाल में स्वीकार किया था कि वर्तमान में किराये की कोख संबंधी मामलों को नियन्त्रित करने के लिए कोई वैधानिक तंत्र नहीं होने के चलते ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों सहित विभिन्न क्षेत्रों में किराये की कोख के जरिये गर्भधारण के मामले हुए जिसमें शरारती तत्वों द्वारा महिलाओं के संभावित शोषण की आशंका रहती है।

हालांकि ये भी सच है कि कथ‍ित महिला अध‍िकारवादियों द्वारा इस बिल के ख‍िलाफ कल से ही आलोचनाओं का अंबार लगने वाला है  मगर श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर सरकार की ओर से मातृत्व को बाजार की वस्तु बनाने और उपभोक्तावाद से बचाने के लिए किया गया प्रयास काबिलेतारीफ है।
कुल मिला कर बात इतनी है कि मां की गरिमा को आज तक कोई ना खरद सका है ना ही कोई बेच पाया है मगर बेहद मुफलिसी और बेहद अमीरी के इस खाईनुमा वातावरण में सरोगेसी एक व्यापार बन चुकी थी, इसे समय रहते रोका जाना जरूरी था ताकि कोख खरीदना फैशन ना बन पाए ।

- अलकनंदा सिंह 

रविवार, 14 अगस्त 2016

शुक्रिया बरेली, स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर इस तोहफे की बहुत ज़रूरत थी

ठीेक 15 अगस्त की पूर्वसंध्या पर बरेली आला हजरत की दरगाह से ऐसी खबर सुनने को मिलेगी, इससे ज्यादा खुशनुमा  बात  क्या  होगी हमारे लिए,  देश  के  लिए , देश  के अमन  के  लिए। उन कथ‍ित सेक्यूलरि‍स्टों के मुंह पर  जोरदार  तमाचा  है  ये  खबर कि आला हजरत की दरगाह से संचालित  होने  वाले मदरसों  में अब दो साल का ‘आतंकवाद विरोधी’ कोर्स शुरू किया गया है ताकि देश के भविष्य को बचाया जा सके। गाहे ब गाहे मुस्लिम युवकों को आतंक का हथ‍ियार बनाने वालों के लिए ये सबक बनेगा। 

जीहां, UP में मदरसों की एक बड़ी सीरीज चलाने वाले संस्थान ने अब दो साल का ‘आतंकवाद विरोधी’ कोर्स शुरू किया है. ये मदरसा बरेली आला हजरत की दरगाह से संचालित होते हैं. इसमें मुफ्ती की पढ़ाने करने वाले छात्रों को पढ़ाया जाएगा कि किस तरह आतंकवादी कुरान और हदीस की गलत व्याख्या कर उसे दहशतगर्दी के लिए इस्तेमाल करते हैं. इस कोर्स में आतंकवाद का इतिहास, भारत में आतंकवाद और आतंकवाद से इस्लाम की हुई बदनामी जैसे टॉपिक भी शामिल हैं.
ये नया कोर्स रुहेलखंड के 48 मदरसों में शुरू किया गया है लेकिन इसे धीरे-धीरे पूरे मुल्क में फैलाने की योजना है. इस तरह अब इन मदरसों के छात्र इस्लाम की तालीम के साथ-साथ दहशतगर्दी के बारे में भी पढ़ेंगे, क्योंकि दहशतगर्द इस्लाम के नाम पर ही दहशतगर्दी कर रहे हैं.
दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के झंडे पर भी ‘अल्लाह’ और ‘मोहम्मद’ ही लिखा है लिहाजा मुफ्ती की पढ़ाई करने वालों को पढ़ाया जाएगा कि किस तरह आतंकवादी इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं.
इस कोर्स को शुरू करने वाले बरेली के मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी कहते हैं-
सलीम नूरी ने कहा, “आतंकवादी धर्म को अफीम की तरह इस्तेमाल करते हैं. आतंकी ट्रेनिंग कैंपों में किसी नए दहशतगर्द के जेहन में उठने वाले हर सवाल का जवाब कुरान और हदीस की गलत व्याख्या कर दिया जाता है, ताकि आतंक फैलाते वक्त उसे कोई अफसोस न हो. उन्हें बताया जाता है कि काफिर को जिंदा रहने का कोई हक नहीं है. काफिर के जान-माल दोनों पर मोमिन का अख्तियार है. अल्लाह की राह में आत्मघाती हमला जायज है. बेगुनाहों की मौत पर अफसोस की जरूरत नहीं क्योंकि वे भी तुम्हारे हाथों मरकर जन्नत जाएंगे. काफिरों का कत्ल ही जिहाद है. काफिरों से लड़कर शहीद हुए तो जन्नत में हूरें मिलेंगी.”
लेकिन आतंकवाद विरोधी इस कोर्स में इन सब मुद्दों की सही व्याख्या पढ़ाई जाएगी, ताकि मुफ्ती बनने वाले छात्र आतंकवादियों के झूठ को समझ सकें. कुरान की सूरा अल काफिरून की आयत नंबर-109 पढ़ाई जाएगी जो कहती है, “मैं उसकी इबादत नहीं करता, जिसकी तुम करते हो. और तुम उसकी इबादत नहीं करते, जिसकी मैं करता हूं…तुम्हारा धर्म तुम्हारे साथ और मेरा धर्म मेरे साथ है.” और कुरान की सूरा अल बक्रा की आयत नंबर-256 भी पढ़ाई जाएगी जो कहती है, मजहब को लेकर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है. अल्लाह सब कुछ सुनने और जानने वाला है.
मुफ्ती सलीम नूरी कहते हैं कि हम छात्रों को कुरान की दोनों व्याख्या पढ़ाएंगे. एक वह जो सही है और दूसरी वह जो आतंकवादी बताता है. फिर हम छात्रों को यह भी बताएंगे कि इसका रेफरेंस कॉन्टेक्सट (संदर्भ) क्या है. कैसे आतंकवादी कुरान की किसी आयत के अधूरे हिस्से को आउट ऑफ कॉन्टेक्सट (संदर्भ से परे) उद्धृत कर उसका मतलब बदल देता है…यह लोगों की आंखें खोलने वाला होगा.
मजहब के नाम पर जो ब्रेन वॉश किया जाता है, उसमें बताया जाता है कि असली जिंदगी मरने के बाद हासिल होगी, जब मरने के बाद जन्नत में हूरें मिलेंगी, जो हमेशा जवान रहेंगी. इस ब्रेन वॉश का एक वाकया दुबई के एक अंग्रेजी अखबार में काम करने वाले पाकिस्तानी मूल के वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे बताया कि पाकिस्तान में एक आत्मघाती हमले में एक आतंकवादी जख्मी होकर बेहोश हो गया. अस्पताल के आईसीयू में जब उसे होश आया तो अपने करीब खड़ी नर्स से पूछा कि बाकी हूरें कहां हैं? अगर इस नए कोर्स की तालीम फैलाई जाए तो जरूर लोगों को समझ में आएगा कि यह इस्लाम नहीं, सिर्फ दहशतगर्दी है.

तो मुफ्ती सलीम नूरी साहब आप पर निश्चित  ही  इस  पर  मशहूर कवि- शायर दुष्यंत कुमार  के कुछ अशआर एकदम फ‍िट  बैठते हैं -
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।

अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।

ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई,
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख । 

अभी तो आग़ाज़ है ये देखते हैं कि इस मुहिम के राष्ट्रवादी रास्ते पर और कितने आते हैं कि कारवां बन जाए।

- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 1 अगस्त 2016

ऐ हुक्मरानो ! दिनकर जी के शब्दों को हूबहू पेश करती CAG रिपोर्ट सोचने को बाध्य तो करती होगी ना

दिनकर जी के शब्दों को हूबहू पेश करती CAG रिपोर्ट कि सीमा पर तैनात जवानों को न तो ताजा खाना मिलता है और न भरपेट

प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह "दिनकर" द्वारा रचित कविता संग्रह ''परशुराम की प्रतीक्षा '' के  खंड - 2 में  दिनकर जी ने जो उल्लेख किया है वह शब्दश: , आज सैनिकों के भोजन पर लोकसभा में पेश की गई CAG रिपोर्ट सत्य सिद्ध कर रही है।
पहले ज़रा दिनकर जी की पंक्तियां देख‍िए .... फिर वह रिपोर्ट जो पिछली कई सरकारों के रक्षा मंत्रालयों द्वारा बरती गई लापरवाही हमारे सामने लाती है कि सरहद से लेकर आपदाग्रस्त इलाकों तक आख‍िरी खेवनहार हमारी सेना के जवान आख‍िर किन परिस्थ‍ितियों में हैं ....और जो सरकारें बिना लागलपेट के अपने जनप्रतिनिध‍ियों का वेतन-बजट खुले हाथ पेश करती रही हैं , वे सरकारें सेना के जवानों के प्रति कितनी लापरवाह हैं... देख‍िए... 

हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?

यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?
दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें।
पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।

घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।

जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।

चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;

यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।

है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ?
किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ?
जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है,
दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है।

नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।

ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।

जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है;

है जहाँ खड्ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं।

वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।

तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है।
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है।

तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में,
किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में।
बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं,
सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं।

पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ?
तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा,
है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा।

जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा,
शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।
हम पर अपने पापों का बोझ न डालें,
कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें।

कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,
आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से,
सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें,
हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें।

हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?

हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे !
जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !

जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,

रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।

ये तो दिनकर जी ने लिखा था जो आज हूबहू इस रिपोर्ट पर खरा उतरता है

क्या कहती है देश की सबसे बड़ी ऑडिट एजेंसी CAG की रिपोर्ट 

सरहदों की रखवाली करने वाले हमारे सैनिकों को घटिया खाना परोसा जा रहा है. उन्हें पेटभर खाना भी नहीं मिल रहा है.
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि पाकिस्तान और चीन की सीमा पर तैनात जवानों को ना तो ताजा खाना मिलता है और ना ही खाना जरुरत के हिसाब से मिलता है. इस रिपोर्ट को मौजूदा संसद के मानसून सत्र में पेश किया गया है. रिपोर्ट में सेना के महकमों के बीच में आपसी सामंजस्य की कमी और रक्षा मंत्रालय की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े किए गए हैं.
ऑडिट एजेंसी सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि देश के सैनिकों को घटिया खाना परोसा जाता है. सीएजी के मुताबिक, सेना द्वारा खुद कराए गए सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है कि 68 प्रतिशत जवान उनकों परोसे जा रहे खाने को संतोषजनक या फिर निम्न-स्तर का मानते हैं.
सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि सैनिकों को निम्न-गुणवता का मांस और सब्जी खाने को दी जाती है. इसके अलावा, राशन की मात्रा भी कम दी जाती है और जो राशन दिया जाता है वो स्वाद अनुसार भी नहीं होता है.
सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक राशन की कमी और गुणवत्ता की सबसे ज्यादा कमी उत्तरी और पूर्वी कमांड में पाई गई है. उत्तरी कमांड की जिम्मेदारी पूरे जम्मू-कश्मीर और करगिल से सटी पाकिस्तानी सीमा और लद्दाख से सटी चीन सीमा की रखवाली करना है जबकि पूर्वी कमांड की जिम्मेदारी अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम से सटी चीन सीमा की रखवाली करना है.
कैग रिपोर्ट के मुताबिक सेना मुख्यालय द्वारा तैयार किए गए राशन-एस्टीमेट को रक्षा मंत्रालय ने 20-23 प्रतिशत तक कम कर दिया जबकि सेना ने ये राशन फिल्ड-एरिया में तैनात बटालियन और रेजीमेंट्स की वास्तविक खाद खाद्य क्षमता और उपलब्ध स्टॉक के आधार पर तैयार किया था. यही नहीं सेना के कमांड मुख्यालय और डायेरक्टर जनरल ऑफ सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट यानि डीजीएसटी के आंकडों में भी काफी अंतर पाया गया. जिसके चलते सैनिकों के राशन में घालमेंल दिखाई दिया.
रिपोर्ट में उदाहरण के तौर पर कहा गया है कि जहां कमांड मुख्यालयों ने 2013-14 में मात्र 3199 मैट्रिक टन चाय की पत्ती की मांग की थी, डीजीएसटी ने उस मांग को खुद बे खुद बढ़ाकर 2500 मैट्रिक टन कर दिया. वहीं, कमांड्स ने जब 2014-15 में करीब 46 हजार मैट्रिक टन (45,752) दाल की मांग की थी, तो डीजीएसटी ने उसे घटाकर 37 हजार मैट्रिक टन कर दिया.
ये पहली बार नहीं है कि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में सैनिकों को मिल रहे घटिया खाने का खुलासा किया है. इससे पहले 2010 में भी सैनिकों को मिल रहे कम और निम्न-स्तर के खाने का उल्लेख किया गया था. उस रिपोर्ट के आधार पर 2013 में संसद की पब्लिक एकाउंट्स कमेटी यानि पीएसी ने रक्षा मंत्रालय को 15 प्रस्ताव दिए थे. लेकिन मौजूदा सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक, उसमें से रक्षा मंत्रालय ने मात्र दो (02) प्रस्तावों को ही मंजूर किया है. और शायद यही वजह है कि छह साल बाद भी देश की सीमाओं की हिफाजत कर रहे सैनिकों को ना केवल खराब खाना परोसा जा रहा है बल्कि भरपेट खाना भी नसीब नहीं हो रहा है.
कैग रिपोर्ट के मुताबिक सेना मुख्यालय और रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों में भारी अंतर होने के चलते ही दाल, चीनी, खाने का तेल, टिन-जैम, मिल्क-प्रोडेक्ट इत्यादि जैसी चीजों की खरीद रक्षा मंत्रालय द्वारा स्वीकृत मांग से कहीं अधिक हो गई. जिसके चलते सेना को ये चीजें स्थानीय स्तर पर खरीदनी पड़ीं. रिपोर्ट में कहा गया है कि यही वजह है कि सेना को अखनूर में मिल रही सब्जी नगरोटा से 29 प्रतिशत मंहगी और फल 23 प्रतिशत मंहगे प्राप्त हुए.
सीएजी के मुताबिक दाल और चीनी की मांग तो स्वीकृत मांग से 23 से 40 प्रतिशत ज्यादा थी. साथ ही रिपोर्ट में ये भी खुलासा हुआ है कि सेना को ब्रांडेंड आटा तक नहीं मिल पा रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक पीएसी के सुझाव के मुताबिक 2014 में रक्षा मंत्रालय ने ये बात स्वीकार की थी कि सेना के राशन के लिए रिक्यूस्ट फॉर प्रेपोज़ल यानि टेंडर प्रक्रिया शुरु की जायेगी लेकिन चीनी को छोड़कर किसी भी राशन के आईटम के लिए टेंडर निकाला गया.
इसके लिए मंत्रालय का जवाब है कि बाकी चीजों के लिए QUALITATIVE REQUIREMENTS यानी अनोमोदित गुणात्मक उपलब्धता नहीं थी. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, सेना ने पहले ही राशन के दरों और अन्य जरूरी निर्देशन जारी कर दिए थे. शायद यही वजह है कि सैनिकों को एक्सपायरी और खराब खाना मिल रहा है.

- अलकनंदा सिंह

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