रविवार, 30 नवंबर 2014

संस्कृत का संरक्षण सरकार का काम है: गुलाम

'देश की सभी शास्त्रीय भाषाओं, विशेषकर संस्कृत का संरक्षण सरकार का काम है और सरकार को इसके लिए मजबूर कर देना हमारा' यह कहना है पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार का। संस्कृत के प्रकांड विद्वान, एक प्राचीन मुस्लिम दरगाह के मुतवल्ली गुलाम साहब शान से खुद को 'संस्कृत का गुलाम' कहा करते हैं। इस दुर्लभ व्यक्तित्व से परिचय कराती विमल मिश्र की रिपोर्ट।
पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार - नाम सुनकर आपको आश्चर्य होगा, पर असली आश्चर्य तो वर्ली स्थित उनके घर पर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। छोटे से कमरे में कुरान और मुस्लिम मजहबी किताबों के साथ रामायण, महाभारत, वेद, पुराण और उपनिषदों से भरे ताखे और आलमारियां, मुख से धाराप्रवाह झरते मंत्र व हिंदू धार्मिक आख्यान और उनका 'संस्कृतमय' बायोडाटा।
'बेटा और दोनों बेटियां शादी-विवाह करके बाहर नहीं गए होते तो आपको इस परिवार के बीच शुद्ध संस्कृत संभाषण भी सुनने को मिलता।' यह कहना है पत्रकार मोहम्मद वजीहुद्दीन का, जिन्होंने हमारी जानकारी में वृद्धि की और बताया कि गुलाम साहब ने तीनों बच्चों के विवाह की पत्रिका भी संस्कृत में ही छपवाई थी।
हिंदी, मराठी, कन्नड, उर्दू, अरबी और अंग्रेजी के विद्वान, 'विश्व भाषा' पत्रिका के संपादक, 'कुरान' व अमर चित्र कथा के संस्कृत रूपांतरकार - पं. गुलाम दस्तगीर बिराजदार नाम का उनके धर्म से कोई वास्ता नहीं। वे नाम से नहीं, काम से पंडित हैं। संस्कृत उनका प्रेम है, आदत है, जुनून है और शायद उनकी जिंदगी भी। वे जैसे माहिर हैं हदीस, कुरान और इस्लामी तहजीब के, संस्कृत पुराणों और कर्मकांड के भी वैसे ही उद्भट् विद्वान हैं।
पं. गुलाम दस्तगीर बिराजदार हिंदू कर्मकांडों का ज्ञान भी हिंदू धर्मशास्त्रों के ज्ञान से कम नहीं रखते। लिहाजा, उन्हें शादी-विवाह, जैसे शुभ संस्कार और अंत्यक्रिया कराने के आग्रह भी मिलते रहते हैं, पर यह उन्हें मंजूर नहीं। वजह? 'क्योंकि ये शुद्ध धार्मिक संस्कार हैं', अपने घर के पास सूफी संत सैयद अहमद बदवी की सैकड़ों साल पुरानी दरगाह के मुतवल्ली (प्रमुख) ने हमें समझाया।
80 वर्षीय पं. गुलाम दस्तगीर आज भी बचपन के वे दिन भूले नहीं हैं, जब सोलापुर के अपने गांव में खेतिहर मजदूर के रूप में दिन भर खेतों में खटने के बाद वे रात्रिशाला में पढ़ने जाते समय पास की संस्कृत शाला के बाहर बैठे घंटों संस्कृत के मंत्र व श्लोक सुनने में बिता देते। उनकी लगन देखकर शाला के ब्राह्मण शिक्षक ने आखिरकार उन्हें कक्षा में बैठने की अनुमति दी। फिर जो हुआ वह अब इतिहास है।
उनकी संस्कृत सेवाओं का ही पुण्यप्रताप था, जो वर्षों महाराष्ट्र राज्य संस्कृत संगठन का मानद राजदूत रखने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने देवभाषा की देख-रेख करने वाली अपनी संस्कृत स्थायी समिति का सदस्य बनाया और काशी के विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान ने अपना महासचिव। आज भी काशी उनका दूसरे घर जैसा है। काशी नरेश जब भी मुंबई में होते हैं, उनके घर जरूर आया करते हैं।
पंडितजी खुद को संस्कृत के मामूली प्रचारक से ज्यादा नहीं मानते और मराठा मंदिर स्कूल के संस्कृत विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद देश भर घूम-घूमकर सभा-सेमिनारों को संबोधित कर संस्कृत और सर्वधर्म समभाव का प्रचार किया करते हैं। उनकी संस्कृत विरासत अभी कायम है। उनके नवासे दानिश ने देवभाषा में संभाषण की कला सीखी है और बेटी गयासुन्निसा ने संस्कृत में 'शास्त्री' कर इस्लाम और हिंदू धर्मों में तुलनात्मक शोधकार्य किया।
संस्कृत को लेकर मौजूदा विवाद से खिन्न पंडितजी कहते है, 'संस्कृत बहुत ही सरल और ज्ञान की भाषा है। संस्कृत को सीखने के लिए जरूरत है सिर्फ इच्छा एवं उत्कंठा की। सरकार को उसे प्रश्रय देना चाहिए। नहीं तो यह हमारा काम है कि हम उसे उसके लिए मजबूर कर दें।'
पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार कहते हैं, 'वेदों और कुरान का एक ही जैसा संदेश है - मानवता का कल्याण। केवल उसे हासिल करने के तरीके अलग-अलग हैं।'
- BBC.com

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

बिरजू महाराज को बिडला कलाशिखर सम्मान

मुम्बई.विश्वप्रसिद्ध कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज को संगीत कला केंद्र की तरफ से कल आदित्य विक्रम बिडला कलाशिखर पुरस्कार से सम्मानित किया जायेगा। आज यहां जारी आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार महाराष्ट्र के राज्यपाल विद्यासागर राव कल यहां नेंहरू केंद्र में उन्हें यह पुरस्कार प्रदान करेंगे। उनसे पहले सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर. पंडित भीमसेन जोशी. पंडित जसराज. गुरू केलूचरण महापात्र.पंडित रामनारायण.एम एफ हुसैन. हबीब तनवीर. गंगूबाई हंगल. गिरिजा देवी आदि यह पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।इसके तहत दो लाख रूपये का पुरस्कार दिया जाता है। - legendnews.in

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

वजूद को बचाने की नाकाम कोशिश: TTP-JA

सनक से उपजी हताशा जब अपनी उपस्‍थिति आमो-खास में दर्ज़ कराने पर आमादा होती है, तब वह किसी भी घातक तरीके का इस्‍तेमाल करती है ताकि वह लोगों की नजर में आ सके और इस तरह अपने मिटते वजूद को फिर से खबरों में लाया जा सके। मगर हताश व्‍यक्‍ति अपनी कमजोरी छुपाने और स्‍वयं को श्रेष्‍ठ बताने के लिए पागलपन की हद तक कोशिश करता है। कुछ ऐसा ही कर रहे हैं वो आतंकी संगठन जो भारत के चौतरफा बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव से घबरा गये हैं। संभवत: यही कारण है कि अब वह सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कर अपने वजूद को बचाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।
कुछ दिन पूर्व वाघा बॉर्डर पर हुए आत्‍मघाती बम ब्‍लास्‍ट के ठीक बाद माइक्रो ब्‍लॉगिंग साइट ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक धमकीभरा मैसेज उभरा जिसके अर्थ ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिये हैं। #नरेंद्र मोदी# हैशटैग के साथ साइट पर उभरे इस धमकी भरे मैसेज में प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा गया है- "u r the killer of hundreds of muslim," Tehreek-e-Taliban Pakistan Jamaat Ahrar(TTP-JA)spokesperson- 'Ehsanullah Ehsan'....इसके कुछ ही घंटे बाद एक और मैसेज उभरा जिसमें वाघा बॉर्डर पर किये गये विस्‍फोट की  जिम्‍मेदारी ले गई थी और यह भी एहसानउल्‍लाह एहसान के नाम से जारी किया गया था,यह कुछ इस तरह था- "We w(il) take the revenge of innocent people of Kashmir and Gujrat "(sic).
पाकिस्‍तान के नौर्थ-वेस्‍ट के संघर्षरत क्षेत्र से उभरे TTP-JA का यूं तो उदय तहरीके तालिबान से हुआ, जो पाकिस्‍तान के इन क्षेत्रों में शांति के लिए आतंकवादी गतिविधियों को विराम देने पर मूल तालिबानियों से अलहदा सोच रखता था। वह पाकिस्‍तानी सरकार के साथ बातचीत करके आपसी सहमति के आधार पर शांति का कॉमन एजेंडा तय करने की बात भी करता है, मगर भारत के बढ़ते अंतर्राष्‍ट्रीय प्रभाव से वह खासा बेचैन है और इस बेचैनी के चलते वह अपनी मूल प्रवृत्‍ति (दहशतगर्दी) को ही हथियार बना रहा है।
दहशतगर्दी से जुड़ी इधर कुछ घटनाएं भारत में भी हुईं जिनमें मुज़फ़्फरनगर के दंगाप्रभावित क्षेत्र से युवकों का बड़ी संख्‍या में गुम हो जाना, मोदी की पटना सभा व गया में ब्‍लास्‍ट होना। ऐसी घटनाओं की कड़ी अब बर्द्धमान से जुड़ रही हैं जिनके तहत अलकायदा के रीजनल चीफ के भारतीय होने जैसी खबरें आई हैं, तब ऐसे में TTP-JA का उक्‍त संदेश ट्विटर पर दिया जाना यह बताता है कि उनके असली मकसद कुछ और है ।
पाकिस्‍तान में बताये गये TTP-JA के कथित शांति वाले मुखौटे के पीछे उनका मकसद आईएस की भांति खबरों में रहने के लिए दहशत फैलाना ही है। ज़ाहिर है कि दहशत फैलाने वाले संगठन अब हताशा से घिरे हुए हैं।  यदि वो हताश न होते तो कश्‍मीर की कथित आजादी के लिए तब घड़ियाली आंसू न बहाते जब वहां बाढ़ की विभीषिका से लोग जूझ रहे थे। उन्‍हें कश्‍मीर की चिंता होती तो वे अपना राहत कार्य चलाते, बाढ़ में सब-कुछ बहा चुके परिवारों के आंसू पोंछते। ट्विटर पर आये ये संदेश बताते हैं कि राहत कार्य से जी चुराना व कश्‍मीर के विकास की बात को सिरे से नकार कर उनके नापाक इरादे नाकाम हुए और इसी नाकामी से उभरी है ये ट्विटरीय हताशा।
हकीकत तो यह है कि अल-कायदा हो या आईएस अथवा भारत में स्‍लीपर मॉड्यूल के रूप में पलने वाले आतंकवादी, सबके सब अब यह बाखूबी जान गये हैं कि मौजूदा भारतीय कूटनीति उनके वजूद को हमेशा हमेशा के लिए मिटा सकती है, और इसी हताशा में वे अब हर वो माध्‍यम इस्‍तेमाल कर रहे हैं जिससे ये जाहिर भी ना हो कि वे भयभीत हो रहे हैं और उनकी उपस्‍थिति का अंदाजा भी होता रहे। उनके इन्‍हीं माध्‍यमों में स्‍लीपर मॉड्यूल के साथ साथ अब महिलाओं और बच्‍चों को भी इस्‍तेमाल किया जा रहा है।
आतंकी संगठनों में ये हताशा आने की वजह एक खबर और भी है। वो ये कि अभी दो दिन पहले ही खबर आई कि पीओके (पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर) के वाशिंदे वापस भारत के साथ जुड़ने का मन बना रहे हैं।
शांति एवं सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए काम करने वाला मुस्लिम संगठन अंजुमन मिन्हाज ए रसूल के अध्यक्ष मौलाना सैयद अतहर देहलवी के अनुसार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अगर जनमत संग्रह होता है तो 99 फीसदी से ज्यादा लोग भारत का हिस्सा बनने के लिए वोट देंगे। जम्मू-कश्मीर के बाढ़ प्रभावित इलाकों के पांच दिवसीय दौरे के बाद स्‍थानीय लोगों की मंशा बताते हुए देहलवी ने कहा कि कश्मीर में अलगाववादियों का आधार खत्म हो गया है और घाटी के लोग सुशासन, विकास और शिक्षा जैसे मुद्दों पर बात कर रहे हैं, उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि मुट्ठी भर लोग क्या कहते हैं। बाढ़ प्रभावित लोगों ने सेना द्वारा चलाए गए राहत एवं बचाव कार्यों की प्रशंसा व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी जम्मू-कश्मीर एवं देश में ‘लोक समर्थक’ नीतियों की प्रशंसा से आतंकी संगठन घबरा गये हैं।
गौरतलब है कि अंजुमन-ए-रसूल ही एकमात्र इस्लामी संगठन है जिसने अलकायदा एवं अन्य आतंकवादी समूहों के खिलाफ आवाज उठाई और जब कश्मीरी पंडितों को जबरन कश्मीर से बाहर किया गया तो जेद्दा में ओआईसी में आपत्ति जताई थी।
बहरहाल, जम्‍मू कश्‍मीर की राजनैतिक परिस्‍थितियां क्‍या रहती हैं...वहां बाढ़ के बाद के हालात क्‍या घाटी को फिर से वो रौनक वापस दे पायेंगे या नहीं, ये तो समय ही बतायेगा मगर इतना अवश्‍य है कि भारतीय प्रशासनिक सुदृढ़ता और नरेंद्र मोदी की राजनैतिक व सांगठनिक कुशलता ने भारत के विरुद्ध सोचने वालों व आतंकवादियों
के हौसले इस हद तक पस्‍त कर दिये हैं कि अब उन्‍हें अपने बचाव का कोई रास्‍ता नज़र नहीं आ रहा। जिस कश्‍मीर पर उनकी सारी योजनायें टिकी होती थीं, अब उस कश्‍मीर सहित पीओके में भी दहशत के पांव उखड़ना और अब ये ट्विटर पर धमकी देना उनकी मनोदशा को बताता है कि उनकी सनक ने न केवल वाघा बॉर्डर पर इतने लोगों की जान ले ली बल्‍कि उनके जो भी आका या समर्थक हैं उन्‍हें भी आइना दिखाया है।
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 10 नवंबर 2014

समर्पण



जो सब समर्पण करता है वह सब पा लेता है। जो कतार में सबसे पीछे खड़ा हो जाता है अपने अहं और दोषों को त्‍याग कर  वह कतार में सबसे आगे जगह पा लेता है क्‍योंकि वह अहं के भारी बोझ से दबा नहीं होता। ऐसा व्‍यक्‍ति अपनी बारी आने का  इंतजार सब्र के साथ करता है। यह भी कहा जा सकता है कि जब अहं से रीत जाता है दिमाग तो उसमें सब्र खुदबखुद बैठता  चला जाता है। और जब सब्र आता है तब गुस्‍सा आ ही नहीं सकता। ये एक चेन है...एक सीरीज है...जो अपनी पहली कड़ी से  यात्रा शुरू करती है और एक एक कर उसमें सभ्‍यता की ऊंचाई पर पहुंचाने वाली कई कड़ियां जुड़ती जाती हैं और अंतिम कड़ी  तक पहुंचने की यात्रा के इस क्रम में जो कमजोरियों को जकड़े रहता है, वह ही असभ्‍य समाज की नींव रखता है वह कारण  बन जाता है अनेक आक्रमणों का, अनैतिकताओं का व अनाचारों का।
अहं से रहित समर्पण, प्रेम के वृक्ष की न सिर्फ नींव रखता है बल्‍कि उसको ईश्‍वर की ऊंचाई तक पहुंचाने की शक्‍ति भी रखता  है ठीक जैसे राधा पहुंचीं श्रीकृष्‍ण तक । यूं तो संस्‍थागत दृष्‍टि से समर्पण का पहला अधिकार रुक्‍मणि का था और इसी अधिकार  से जन्‍मे कर्तव्‍य के कारण उनके समर्पण को नि:स्‍वार्थ समर्पण कहने से बचा गया जबकि राधा के समर्पण को भक्‍ति व प्रेम  का आधार माना गया है क्‍योंकि वहां समर्पण के बाद श्रीकृष्‍ण से कुछ वापस पाने का भाव नहीं था, बस समर्पण से प्रेम को  करते चले जाना था। इसीलिए रुक्मणि और राधा में ऐतिहासिक दृष्‍टि से भले ही अंतर देखा गया मगर प्रेम और समर्पण में  अपनी भावनाओं को 'ईश्‍वर बनाने तक ले जाना' इसे तो सिर्फ और सिर्फ राधा ही सार्थक कर पाईं। इसीलिए श्रीकृष्‍ण के संग रुक्‍मिणि की अनुपस्‍थिति और राधा की अतिशय उपस्‍थिति समर्पण का सर्वोच्‍च उदाहरण बन गई । कृष्‍ण के आगे राधा का नाम आगे रखा जाना इसी समर्पण का हिस्‍सा है। ओशो कहते भी हैं कि कृष्‍ण चूंकि पूर्णपुरुष माने गये  हैं इसलिए उनके साथ आना किसी पूर्ण स्‍त्री के ही वश की बात हो सकती है। रुक्‍मिणि दावेदार थीं कृष्‍ण नाम के संग अपना  नाम जोड़ने की। मगर वो दावेदार थीं...अर्थात् दावा करने का अर्थ ही ये रह गया कि कहीं कुछ बाकी रह गया है जिसे पाने के  लिए उन्‍हें संस्‍थागत रिवाजों का सहारा लेना पड़ रहा है, ऐसे में वह मेंटीनेंस भी मांग सकती है जबकि राधा को किसी रिवाज में  बांधा नहीं जा सकता। उन्‍हें इसकी आवश्‍यकता नहीं है।
निश्‍चित ही ईश्‍वर के अंशमात्र में भी रमने के लिए किसी अदालती दावे, किसी समाज या किसी संस्‍थागत बंधन में रहने की  आवश्‍यकता ही नहीं होती, ईश्‍वर तो हवा की तरह घुलता जाता है मन में। मन में घुलने के लिए बिल्‍कुल पानी का सा रंग  लेना पड़ता है तभी समर्पण शतप्रतिशत होता है, जैसे राधा का था कृष्‍ण के लिए। इसीलिए रुक्‍मिणी पीछे छूटती चली गई और  राधा आगे आती गईं। इतना आगे कि कृष्‍ण नाम के आगे राधा खड़ी हो गईं जबकि वे संस्‍थागत संबंधों की कतार में सबसे  पीछे खड़ी थीं। सबसे पीछे खड़े होने का अर्थ है कि सब कुछ छोड़ो, सबकुछ दे दो और हल्‍के हो जाओ। हल्‍के हो जाओ इतने  कि अपने ईश में रमने के लिए किसी कोशिश की जरूरत ही ना पड़े। 
- अलकनंदा सिंह

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