शनिवार, 23 अप्रैल 2016

400 साल बाद भी जिंदा हैं शेक्सपियर

विलियम शेक्सपीयर (26 अप्रैल 1564  – 23 अप्रैल 1616) अंग्रेजी के कवि, नाटककार तथा अभिनेता थे।
शेक्सपियर में अत्यंत उच्च कोटि की सर्जनात्मक प्रतिभा थी और साथ ही उन्हें कला के नियमों का सहज ज्ञान भी था। उनके नाटकों का लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
प्रकृति से उन्हे मनो वरदान मिला था अत: उन्होंने जो कुछ छू दिया वह सोना हो गया। उनकी रचनाएँ न केवल अंग्रेज जाति के लिए गौरव की वस्तु हैं वरन् विश्ववाङ्मय की भी अमर विभूति हैं। शेक्सपियर की कल्पना जितनी प्रखर थी उतना ही गंभीर उनके जीवन का अनुभव भी था। अत: जहाँ एक ओर उनके नाटकों तथा उनकी कविताओं से आनंद की उपलब्धि होती है वहीं दूसरी ओर उनकी रचनाओं से हमको गंभीर जीवनदर्शन भी प्राप्त होता है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शेक्सपियर के समकक्ष रखे जानेवाले विरले ही कवि मिलते हैं।
विश्वप्रसिद्ध दु:खांत नाटक हैमलेट, आथेलो, किंग लियर और मेकबैथ एवं रोमन दु:खांत नाटक जूलियस सीजर, एंटोनी ऐंड क्लिओपाट्रा एवं कोरिओलेनस इसी कालावधि में लिखे गए और अभिनीत हुए। 'ट्रवायलस ऐंड क्रेसिडा', 'आल्स वेल दैट एंड्स वेल' और 'मेजर फार मेजर' में सुख और दु:ख की संश्लिष्ट अभिव्यक्ति हुई है, तब भी दु:खद अंश का ही प्राधान्य है।
विकास की अंतिम अवस्था में शेक्सपियर ने पेरिकिल्स, सिंवेलिन, 'दी विंटर्स टेल', 'दी टेंपेस्ट' प्रभृति नाटकों का सर्जन किया, जो सुखांत होने पर भी दु:खद संभावनाओं से भरे हैं एवं एक सांध्य वातावरण की सृष्टि करते हैं। इन सुखांत दु:खांत नाटकों को रोमांस अथवा शेक्सपियर के अंतिम नाटकों की संज्ञा दी जाती है।

आज 23 अप्रैल को.....शेक्सपीयर के कुछ Phrases याद आ रहे हैं ....जो अक्सर हमारी आम बोलचाल में बोले जाते हैं .....

1. Love looks not with the eyes, but with the mind; and therefore is winged Cupid painted blind.

2. To thine own self be true, and it must follow, as the night the day, thou canst not then be false to any man.

3. Love all, trust a few, do wrong to none.

इसके अलावा 'प्यार अंधा होता है (LOVE IS BLIND)का अहसास पहली बार दुनिया के सामने आया । ऐसा लगता नहीं कि दुनिया को पहली बार प्यार में दर्द का एहसास कराने वाले मशहूर अंग्रेजी कवि विलियम शेक्सपियर आज के ही दिन 400 साल पहले दुनिया से चले गए हों। सच तो ये है कि 400 साल बाद भी शेक्सपियर आज भी कई रूपों में दुनिया के बीच जिंदा हैं।

कुछ और उनकी रचनाओं और कविताओं से लिए गए यादगार अल्फाज ....हैं जैसे कि....

Green-eyed monster यानी जलन (ओथेलो से ली गई)
   
Knock knock! Who's there?" हम अक्सर ये सवाल पूछ देते हैं (मैकबेथ से ली गई)
   
Love is blind: यानी प्यार अंधा होता है, जब आप किसी को प्यार करते हो तो आपको कुछ भी सही गलत नहीं लगता है, सिर्फ प्यार से भरा हुआ महसूस करते हैं आप। (द मर्चेंट ऑफ वेनिस से ली गई)
   
Catch a cold यानी बीमार हूं (सिमबलाइन)
   
Wild goose chase यानी एक समझौता जो कभी फलदायी नहीं साबित होगा (रोमियो एंड जुलिएट)
   
Break the ice यानी बातचीत शुरू करना (द टेमिंग ऑफ द श्रु)
   
To wear your heart on your sleeve यानी खुलकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करना (ओथेलो)

ऊपर कुछ ऐसे Phrases (वाक्यांश) हैं जिसका इस्तेमाल आज भी हम अक्सर करते हैं प्यार के इजहार , संवाद में  इस्तेमाल करते हैं।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

ख्वाब का रिश्ता हकीकत से ना जोड़ा जाए....

दरिया के तलातुम से बच सकती है कश्ती,
कश्ती में तलातुम हो तो साहिल न मिलेगा ।

और
ख्वाब का रिश्ता हकीकत से ना जोड़ा जाए
आईना है इसे पत्थर से ना तोड़ा जाए ......

जैसे अपने अल्फाज और अंदाज के लिये Famous  मारूफ शायर मलिकजादा मंजूर अहमद का आज निधन हो गया। वह करीब 90 साल के थे।
परिवार के सूत्रों ने बताया कि अहमद दिल के मरीज थे और उन्हें तीन दिन पहले लखनऊ के खुर्रमनगर स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार दोपहर दो बजकर दो मिनट पर उनकी सांसों की डोर टूट गयी। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटे तथा छह बेटियां हैं।
अम्बेडकरनगर में किछौछा के पास स्थित गिदहुड़ गांव में 17 अक्तूबर 1926 को जन्मे अहमद ने गोरखपुर में शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने आजमगढ़ स्थित शिबली कालेज में 13 साल तक अंग्रेजी के शिक्षक के तौर पर काम किया। कुछ अन्य स्थानों पर अध्यापन के बाद वह लखनऊ विश्वविद्यालय में करीब 12 साल तक प्रोफेसर रहे।
देश-विदेश में मुशायरों की बेहतरीन निजामत के लिये मशहूर अहमद ने हिन्दुस्तान के अनेक शहरों के साथ-साथ सउदी अरब, अमेरिका, कनाडा, ईरान, ओमान, कतर, पाकिस्तान समेत कई मुल्कों के सैकड़ों मुशायरों में शिरकत की।
उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष रह चुके अहमद ने अनेक रौशन कृतियां दीं। उर्दू का मसला, कॉलेज गर्ल, शहर-ए-सितम, रक्स-ए-शरार, शेर-ओ-अदब, मौलाना आजाद-अल हिलाल के आईने में, अबुल कलाम आजाद-फिक्र-ओ-फ़न उनकी कुछ चुनिन्दा व मशहूर रचनाएं हैं।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

Not Out! The Incredible Story Of The Indian Premier League: Book explores intricacies of business of IPL

The politician-cricket official dual role has hit the reputation of the game and the IPL and has also been the cause of many of the conflict of interest controversies thereby adversely impacting politicians as well as cricket’s overall health, says Delhi-based sports attorney Desh Gaurav Sekhri in his new book.

“Conflict of interest has become the single most relevant term that is synonymous with Indian cricket in 2016. The conflict of interest phenomenon has shaped how ethics in cricket are to be determined,” he writes in “Not Out! The Incredible Story Of The Indian Premier League”, published by Penguin Books.

The book explores the intricacies of the business of the IPL, pinpointing what it got right and where it went wrong. It also looks closely at the spot-fixing scandal, the conflict of interest controversy, the issues that led to suspension of two champion teams and the complicated interplay between the BCCI and the IPL.

According to the author, nothing has caused more grief to the BCCI-IPL than the conflict of interest controversy. He says the most likely to be damaging to the reputation of the BCCI-IPL in the future is the duality of roles performed by public officials who hold positions in the BCCI.

“The Justice (R M) Lodha Committee’s recommendation was to exclude ministers and government officials from the board’s administration. The current IPL chairman, Rajeev Shukla, is a politician. The secretary of the BCCI, Anurag Thakur, is a politician. A member of the present IPL governing council, Jyotiraditya Scindia, is a politician.

“Former BCCI president and the current nominee for the ICC, if (Shashank) Manohar is unavailable, Sharad Pawar, is a politician. Many of the state associations’ presidents or board members are politicians,” Sekhri writes.

रविवार, 17 अप्रैल 2016

एक दिन की Prayer उन बच्चियों के नाम करें जो ….

boko haram's suicide bomber are most of kidnapped nigerian girls
कितनी बेबस होंगी वो बच्च‍ियां जो बोको हराम के हत्थे चढ़ गई
दुख किसी के भी जीवन में आ सकता है मगर जब हम देखते हैं कि कोई हमसे भी ज्यादा दुखी है तो अचानक अपने भाग्यशाली होने पर राहत की सांस लेते हैं। किसी का दुख हमारे दुख से बड़ा है, ये जितना हमें अपने लिए आश्वस्त करता है, उतना ही प्रेरित भी करता है कि हम अपने से ज्यादा दुखी व्यक्ति की सहायता करें। कभी-कभी हम सिर्फ प्रार्थनाभर कर लेते हैं ताकि उस व्यक्ति का दुख कुछ तो कम हो सके। प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है।
और जब यही दुख नन्हीं बच्च‍ियों पर कहर बरपा रहा हो तो… ? आज जब से पढ़ा है बोको हराम द्वारा कम उम्र बच्च‍ियों के साथ अत्याचार के बारे में, तब से यह कहने में गुरेज नहीं कि हमारे देश में भले ही अभी बच्च‍ियों और औरतों के लिए बहुत काम करना बाकी है फिर भी नाइजीरिया जैसी लाचारगी तो नहीं ही है।

बोको हराम के लिए आसान फिदायीन हैं लड़कियां
कितनी बेबस होंगी वो बच्च‍ियां जो बोको हराम के हत्थे चढ़ गई और अब उन्हें अपनी जि़ंदगी खत्म करना आसान नजर आ रहा है। नाइजीरिया के खतरनाक आतंकी संगठन बोको हराम के मंसूबे अब पहले से भी कहीं ज्यादा खतरनाक होते जा रहे हैं।
हाल ही में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बोको हराम ने साल 2014 में फिदायीन हमलों के लिए 4 बच्चों का इस्तेमाल किया जबकि 2015 में यह आंकड़ा बढ़कर 44 हो गया। इसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि लड़कियों को इस तरह के खतरनाक काम में इस्तेमाल करने की कोशिश पहले से कहीं ज्यादा की जा रही है।
साल 2014 में फिदायीन हमलों की संख्या 32 थी जबकि साल 2015 में ये संख्या 151 हो गई। वर्ष 2015 में चाड, कैमरून और नाइजर, बोको हराम के निशाने पर सबसे ज्यादा रहे। यूनिसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक 5 फिदायीन में से एक फिदायीन मासूम है। जानकारों का कहना है कि आतंकियों के यौन शोषण, भूख और उनसे छुटकारा पाने के लिए खुद ही एकमात्र विकल्प अपना रही हैं।

यातना से निजात पाने को बन रही हैं सुसाइड बॉम्बर
तकरीबन दो साल पहले बोको हराम ने नाइजीरिया के चाइबोक से 300 स्कूली लड़कियों का अपहरण कर लिया था। इनमें से कुछ लड़कियां तो बच निकलने में कामयाब रहीं, लेकिन ज्यादातर अभी भी लापता हैं। इससे पहले भी कई बार जानकारी सामने आई हैं कि बोको हराम अपने यहां छोटी लड़कियों को कैद कर के रखता है और उनका यौन शोषण भी करता है।
बोको हराम का सामना करने के लिए अमेरिका समेत कई देश अभियान चला रहे हैं। इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि नाइजीनिया के आतंकी संगठन बोको हराम द्वारा बच्चों को आत्मघाती हमलावर बनाने के मामले में 10 गुना बढ़ोत्तरी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र के सारे प्रयासों के बावजूद कुछ महीनों पहले इस्लामी आतंकी संगठन बोको हराम ने अफ्रीका के चाड में हजारों लोगों के अपहरण और सिर कलम करने के साथ-साथ उन्हें भूख से तड़प कर मरने के लिए मजबूर कर दिया था। यूनिसेफ के अधिकारी लेंजर ने कहा कि बोको हराम के प्रभाव वाले इलाकों के हालात भयावह हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह आतंकी समूह, कई देशों के सैन्य हमलों से कमजोर होने के बाद अब बच्चों के माध्यम से दुनिया में आतंक का खौफ फैलाने की कोशिश कर रहा है। बोको हराम अपने इन नन्हें सुसाइड बॉम्बर का इस्तेमाल भीड़भाड़ वाले बाजारों कर और भी अधिक खूनखराबा कर रहा है।

विकीपीडिया के अनुसार  Boko Haram  
Boko Haram is a branch of the Islamic State of Iraq and the Levant ( ISIL). It has been active in Nigeria since 2009. The name of the group means “Western” or “non-Islamic” education is a sin. The group is active in the north of Nigeria, and wants to impose Islamic law as the only law in Nigeria.

 
नाइजीरिया में क्या है बोको हराम?
नाइजीरिया में कट्टरपंथी संगठन बोको हराम 200 लड़कियों को अगवा करने के बाद से सुर्ख‍ियों में आया और यह संगठन नाइजीरिया को एक इस्लामिक देश में तब्दील करना चाहता है।
कहा जाता है कि बोको हराम के समर्थक कुरान की शब्दावली से प्रभावित हैं कि ‘जो भी अल्लाह की कही गई बातों पर अमल नहीं करता है वो पापी है।’
बोको हराम इस्लाम के उस संस्करण को प्रचलित करता है जिसमें मुसलमानों को पश्चिमी समाज से संबंध रखने वाली किसी भी राजनीतिक या सामाजिक गतिविधि में भाग लेने से वर्जित किया जाता है।
इसमें चुनाव के दौरान मतदान में शामिल होना, टी शर्ट, पैंट पहनना और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा लेना शामिल है।
नाइजीरिया में मुस्लिम राष्ट्रपति होने के बावजूद बोको हराम उसे एक ऐसा देश मानते हैं जिसे अल्लाह में विश्वास न करने वाले लोग चला रहे हैं।

बोको हराम का आधिकारिक नाम
इस संगठन का आधिकारिक नाम जमाते एहली सुन्ना लिदावति वल जिहाद है जिसका अरबी में मतलब हुआ जो लोग पैगंबर मोहम्मद की शिक्षा और जिहाद को फैलान के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
उत्तर-पूर्वी शहर मैडुगुरीमें इस सगंठन का मुख्यालय था.और यहां रहने वाले लोगों ने इसे बोको हराम का नाम दिया।
अगर स्थानीय होसा भाषा में इसका उच्चारण किया जाए तो इसका मतलब हुआ ‘पश्चिमी शिक्षा लेना वर्जित है’।
बोको का मूल मतलब है फ़र्ज़ी या नकली लेकिन इसका मतलब पश्चिमी शिक्षा के संदर्भ में समझा जाने लगा जबकि हराम का मतलब है वर्जित या वो चीज़ें जिनकी समाज में मनाही है।
जब से 1903 में उत्तरी नाइजीरिया, निजेर और दक्षिणी कैमरून के इलाक़े ब्रिटेन के नियंत्रण में चले गए, तब से वहां मुस्लिम आबादी वाले इलाक़ों में पश्चिमी शिक्षा का विरोध शुरु हो गया।
कई मुस्लिम परिवार अब भी अपने बच्चों को सरकारी के उन स्कूलों में नहीं भेजना चाहते है जहाँ पश्चिमी शिक्षा दी जाती है, ये समस्या इसलिए भी बढ़ी क्योंकि वहाँ के धनाढय वर्ग भी शिक्षा को प्राथमिकता नहीं देते हैं ।
 
बोको हराम का मक़सद
इसी पृष्ठभूमि में करिश्माई मुस्लिम धर्मगुरू मोहम्मद युसूफ़ ने 2002 में बोको हराम का गठन किया। उन्होंने एक धार्मिक कॉम्पलेक्स बनाया जिसमें एक मस्जिद और इस्लामी स्कूल भी बनाया गया।
नाइजीरिया के कई ग़रीब मुस्लिम परिवारों के साथ-साथ पड़ोसी देशों के बच्चों ने भी इस स्कूलों में दाखिले लिए लेकिन बोको हराम को केवल बच्चों को शिक्षा देने में ही दिलचस्पी नहीं थी। उसका राजनीतिक मक़सद एक इस्लामिक देश का गठन करना था और ये स्कूल जिहादियों को भर्ती करने का ज़रिया बन गए।
 
बोको हराम का ट्रेड मार्क
बोको हराम का ट्रेड मार्क रहा है कि ये सगंठन हमलों के दौरान मोटरसाइकलों पर सवार बंदूकधारियों का इस्तेमाल करता है। पुलिस, राजनेताओं और जो भी उनके सगंठन की आलोचना करता है उन्हें मार देता है, इसमें अन्य मुस्लिम परंपरा का पालन करने वाले धर्मगुरू और इसाई उपदेशक भी शामिल है।

अब यह विश्वभर के विकसित-विकासशील देशों , एमनेस्टी इंटरनेशनल, मानवाध‍िकारवादियों और संयुक्त राष्ट्र के ओहदेदारों के लिए कितना गंभीर विषय है , यह तो मैं नहीं कह सकती मगर इतना अवश्य कह सकती हूं कि दर्द की टीस और उसकी वेदना पूरे विश्व में एक जैसी होती है , फिर वह चाहे नाइजीरिया हो या आई एसआईएस के चंगुल में फंसी यज़ीदी औरतें । इस वेदना को कोई भी देश तभी महसूस कर सकता है जब वह संवेदनशीलता और अपने दायरों से आगे बच्च‍ियों के दर्द को महसूस कर सके। जब तक ऐसा नहीं होगा… एक बोको हराम और आईएसआईएस जैसे संगठन जन्म लेते रहेंगे और हर उम्र की औरतों को अपनी कुत्सित इच्छाओं का श‍िकार बनाते रहेंगे। ऐसे में क्या हमें ईश्वर का धन्यवाद नहीं करना चाहिए कि हम हिंदुस्तान में पैदा हुये हैं। बेशक अभी बहुत कुछ करना बाकी है मगर लाचारगी नाइजीरिया जैसी तो नहीं है कम से कम।

– अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

नव संवत्सर शुभ हो....

हरिवंशराय बच्चन की निशा निमन्त्रण से ..... 

आओ, नूतन वर्ष मना लें!

गृह-विहीन बन वन-प्रयास का
तप्त आँसुओं, तप्त श्वास का,
एक और युग बीत रहा है, आओ इस पर हर्ष मना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

उठो, मिटा दें आशाओं को,
दबी छिपी अभिलाषाओं को,
आओ, निर्ममता से उर में यह अंतिम संघर्ष मना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

हुई बहुत दिन खेल मिचौनी,
बात यही थी निश्चित होनी,
आओ, सदा दुखी रहने का जीवन में आदर्श बना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

रविवार, 3 अप्रैल 2016

New Book- ”Olive Witch” ......is monograph of travel photos and poems by Abeer Hoque

Having penned a monograph of travel photos and poems; a collection of linked short stories, poems and photos and also a memoir, writing comes naturally to Nigerian-born Bangladeshi American writer Abeer Hoque who says it unwinds her and gives her a satisfaction that nothing else matches up to.
And there’s more. She’s working on a novel about memory loss, set in Berkeley and Brooklyn and also on a series of ekphrastic poems where she uses photographs from her collection to inspire new poems.
HarperCollins India recently published her memoir ‘Olive Witch’ in which she tells about growing up in three different countries (Nigeria, where she was born and spent her childhood, the United States where she lived from high school onwards, and Bangladesh where her parents are originally from.
With poems and weather conditions framing each chapter, ‘Olive Witch’ is an intimate memoir about taking the long way home.
In the 1970s, Nigeria is flush with oil money, building new universities and hanging on to old colonial habits. Hoque grew up in a small sunlit town where the red clay earth, corporal punishment and running games are facts of life.
At 13, she moved with her family to suburban Pittsburgh and found herself surrounded by clouded skies and high schoolers who speak in movie quotes and pop culture slang.
Finding her place as a young woman in America proved more difficult than Hoque could have imagined. Disassociated from
her parents, and laid low by academic pressure and spiralling depression, she is committed to a psychiatric ward in Philadelphia.
When she moves to Bangladesh on her own, it proves to be yet another beginning for someone who is only just getting
used to being an outsider – wherever she is.
Asked why she chose to pen her memoir so early in her writing career, she says, “I started off as a poet and poetry is still a very big part of my writing life. I went to graduate school to get an MFA in poetry, and I fell in love with the creative nonfiction classes I took in the very beginning of the program.
“I started writing memoir in those classes, basically stories about my childhood and young adult years, and my classmates and teachers loved them and encouraged me to write more. But as my memoir shows, and the book before it and even the photography book, I can never leave poetry out of the picture.”
Her first book was a monograph of travel photographs and poems called “The Long Way Home”, based on over seven years of travelling around the world.
Then came “The Lovers and the Leavers”, a collection of linked short stories, poems, and photographs, and that is heavily focused on Bangladesh.
“Half the stories are based there (in Bangladesh), and all of the stories focus on South Asian characters. I lived in Bangladesh from 2006-8 (my first time actually living there versus just visiting on occasion with my family),” Hoque told PTI.
She says the Bangladeshi literary scene (in English) is growing by leaps and bounds and it’s an exciting time to be a Bangladeshi writing in English.
“Bangla language literature is part of a robust and historic tradition, but Bangladeshi writing in English is pretty nascent, but there are some fantastic writers out there.
“Monica Ali, Tahmima Anam, and Zia Hyder Rahman are probably the biggest names in the Bangladeshi/English writing scene, and now we have Mahmud Rahman, Saad Z. Hossain, K Anis Ahmed, Tarfia Faizullah, Shabnam Nadiya, Farah Ghuznavi, Maria Chaudhuri, Kaiser Haq, and many more,” she says.
On the writing scenario in Nigeria, she says, “Nigeria’s literary scene is pretty incredible. We have the greats like Wole Soyinka, Ken Sarowiwa, and of course Chinua Achebe, but now there are literary superstars like Chimamanda Ngozi Adichie, Chris Abani, and Ben Okri, and up and coming talents like Chinelo Okparanta and Chika Unigwe and Chigozie Obioma.
“I’d say Nigeria is an overachiever in the African lit scene, but as someone who grew up there, I’m pretty happy about that.”
  • Agency

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

कहां जा रही है....Rights की आड़ में तृप्ति देसाई की ज़िद

अतिवाद किसी भी अच्छे कदम की सकारात्मकता को पीछे धकेल देता है, और यही हुआ है आज पुणे के शनि शिंगणापुर मंदिर में तृप्ति देसाई द्वारा प्रवेश करने की जिद पर। तृप्ति महिलाओं को पूजा का समान अध‍िकार दिलाने के लिए लड़ रही थीं जिसमें उन्हें न केवल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से बल्कि बॉम्बे हाईकोर्ट से भी कानूनी व प्रशासनिक सपोर्ट मिला।
अपने इस एक कदम से अचानक पूरे देश में चर्चित हुई तृप्ति देसाई और उनकी भूमाता ब्रिगेड को तथाकथित महिला अधिकार वादियों ने हाथों-हाथ लिया क्योंक‍ि उनकी बात जायज थी, और मुद्दे की बात पर कोई क्योंकर विरोध करेगा मगर जिस लड़ाई के लिए उन्होंने कोर्ट तक जाने ज़हमत उठाई, आज उसी को लेकर तृप्ति का उतावलापन बहुत कुछ स्पष्ट कर गया। तृप्त‍ि ने कोर्ट के आदेश की प्रक्रिया पूरी करने तक का इंतजार नहीं किया और आज ही मंदिर के चबूतरे पर चढ़ने की जिद के साथ अपनी भूमाता ब्रिगेड लेकर जा पहुंची। बाकी असलियत एनसीपी के नेताओं ने पूरी कर दी जो तृप्त‍ि के साथ मंदिर पहुंचे थे।
यहां कुछ प्रश्न बड़े स्वाभाविक हैं, जिनका उत्तर दिया जाना चाहिए। जैसे:
1. पहली बात ये कि कोर्ट के आदेश की लिखि‍त या फैक्स प्रति मंदिर प्रबंधन को मिलने से पहले ही वह मंदिर में क्यों प्रवेश करना चाहती थीं। उनका मंदिर पहुंचना महिलाओं के अध‍िकारों का मसला कम और निजी ज़‍िद ज्यादा दिखाई दिया।
2. दूसरी बात कि उनके साथ एनसीपी के पुरुष नेता व पुरुष कार्यकर्ता क्या कर रहे थे, ये दृश्य बिल्कुल ऐसा ही था जैसा कन्हैया की गिरफ्तारी पर राहुल गांधी की मौजूदगी।
3. तीसरी बात यह कि तमाम सालों से मौजूद रूढ़‍ियों को एक कोर्ट के आदेश और आदेश के चंद घंटों के भीतर उन्हें जस का तस मनवाना आसान तो नहीं, अच्छा होता कि तृप्ति कोर्ट के आदेश की प्रति प्रबंधकों तक पहुंचने का इंतजार करके वहां जातीं। उन स्थानीय औरतों को भी समझा पातीं जिन्होंने आज स्वयं पुरुष ग्रामीणों के साथ मिलकर तृप्ति का रास्ता रोका।
4. और हां,  तृप्ति देसाई यदि अपने संगठन को राजनैतिक पार्टियों के चंगुल में ना जाने दें तो अच्छा होगा वरना उनके एक सही कदम को मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी।
5. हठधर्मिता को कानून का सहारा मिल जाए तो वह किसी को भी ताकतवर भले ही बना सकती है मगर यहां मामला धर्म का है और धर्म का मामला दिलों, समाज की रीतियों और काफी हद तक विश्वासों (अंध विश्वास भी हो सकता है) से जुड़ा होता है जिसका विरोध ताकत या कानून से नहीं, जागरूकता पैदा करके और लोगों में विश्वास जगाकर ही हासिल किया जा सकता है।

आज का घटनाक्रम कुछ यूं रहा-
आज पुणे के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर बवाल मचा रहा। पुलिस ने भूमाता Brigade की तृप्ति देसाई को हिरासत में ले लिया गया। बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के बाद आज महिलाएं शनि मंदिर में पूजा करने जा रही थीं लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध के चलते भारी हंगामा मच गया। भूमाता ब्रिगेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में महिलाएं मंदिर के अंदर जाने पर अड़ी हैं लेकिन स्थानीय लोग जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, इन्हें मंदिर के अंदर जाने से रोकते रहे ।
एनसीपी की महिला कार्यकर्ताओं ने मंदिर के अंदर जाने की कोशिश की जिस पर स्थानीय लोगों के साथ उनकी धक्कामुक्की शुरू हो गई। स्थानीय महिलाएं तृप्ति देसाई का भी विरोध कर रही हैं। गांव वालों ने तृप्ति को घेर लिया और उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी की। गांव की महिलाओं ने तृप्ति को रोकने के लिए मानव श्रृंखला बना ली। वहीं तृप्ति देसाई ने कहा कि हम बिलकुल नहीं सुनेंगे, हम दर्शन करने आए हैं और करके रहेंगे। तृप्ति ने कहा कि आज कोर्ट के आदेश का अपमान हो रहा है। हमारे साथ धक्कामुक्की हुई, बाहर भेजने की कोशिश की जा रही है। सीएम को ये सब रोकना चााहिए, मैं दर्शन लिए बिना नहीं जाऊंगी।
वहीं पूर्व एनसीपी विधायक मुरकुटे के साथ भी मंदिर के सुरक्षा रक्षकों ने हाथापाई की। मुरकुटे महिलाओं के साथ चबूतरे पर चढ़ने की जिद पर अड़ गए।
इससे पहले हाईकोर्ट के आदेश के बाद मंदिर प्रशासन की एक बैठक हुई जिसमें ये तय किया गया है कि जब तक मंदिर प्रशासन को अदालत के आदेश की कॉपी नहीं मिलती है, तब तक पुरानी परंपरा जारी रहेगी।
तृप्ति देसाई का कहना है कि मुख्यमंत्री को आदेश देना चाहिए और महिलाओं को आज मंदिर में जाने की एंट्री मिलनी चाहिए। अगर किसी ने मंदिर के प्लेटफार्म पर जाने से रोका को एफआईआर दर्ज करवाएंगे। वहीं दिल्ली महिला आयोग की पूर्व चेयरमैन बरखा सिंह का कहना है कि अदालत का फैसला महिलाओं की जीत है। उन्होंने कहा कि भगवान पुरुष और महिला में भेदभाव नहीं करता इसलिए मंदिर में भी भेदभाव नहीं होना चाहिए।

कल बॉम्बे हाई कोर्ट ने ये आदेश दिया था –
शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए Bombay High court ने महाराष्ट्र सरकार से धार्मिक स्थलों पर प्रवेश को लेकर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए कहा है। बंबई हाईकोर्ट ने एहतियाती कदम उठाने का निर्देश दिया कि यह महिलाओं का मौलिक अधिकार है और सरकार को इसकी रक्षा करनी चाहिए।
राज्य के अहमदनगर जिले के शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने कहा कि वह केवल सरकार के लिए सामान्य निर्देश पारित कर सकती है और व्यक्तिगत और खास मामलों में नहीं जा सकती है।
महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट को आश्वस्त किया कि वह पूरी तरह से लैंगिक भेदभाव के खिलाफ है और महाराष्ट्र हिंदू पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकार) कानून के प्रावधानों को सख्ती से लागू करेगी।
मुख्य न्यायाधीश डी एच वाघेला और न्यायमूर्ति एम एस सोनक की खंडपीठ ने कहा कि महाराष्ट्र के गृह विभाग के सचिव कानून के प्रावधानों के अनुपालन और उसे लागू किए जाने को सुनिश्चित करेंगे। वे नीति व अधिनियम के उद्देश्य को पूरी तरह अमल में लाने के लिए वे (गृह विभाग) महाराष्ट्र के हर जिले के पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को दिशा-निर्देश जारी करेंगे। खंडपीठ ने कहा, कानून को पूरी तरह लागू करने के लिए सरकार सभी जरूरी कदम उठाएगी।

- अलकनंदा सिंह

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