शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

अभ‍िव्यक्ति की आजादी: यद‍ि मैथलीशरण गुप्त जिंदा होते तो ....


जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है। वह नर नहीं, पशु निरा है और मृतक सामान है। राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त द्वारा रचित ये कविता आज बेहद प्रासंगिक हो गई है क्योंकि संसद, जेएनयू और महिषासुर दिवस से लेकर जो चर्चा मां दुर्गा के लिए आपत्त‍िजनक शब्दों तक पहुंच गई है, वह काफी कुछ बयान करती है।
संसद सत्र की शुरुआत जिस तरह के ज्वलंत मुद्दे से हुई, वह उक्त कविता की प्रासंगिकता को और पुष्ट करती है।
पहले दिन ही केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जिस तरह ''जेएनयू के छात्रों द्वारा राष्ट्र विरोधी नारों को अभ‍िव्यक्ति की आजादी ''बताए जाने पर प्रश्नचिन्ह लगाया, फिर इसी अभ‍िव्यक्ति की आजादी के बहाने उन्होंने महिषासुर दिवस मनाये जाने व मां दुर्गा के चरित्र को लेकर आपत्तजिनक पैंपलेट बांटे जाने की घटना पर उपस्थ‍ित सभी नेताओं से पूछा कि क्या यही अभ‍िव्यक्ति की आजादी है।
सचमुच अभ‍िव्यक्ति की आजादी को लेकर अभी तक जितने भी ढोंग रचे गए, स्मृति ने उन सभी ढोंगों को तार-तार कर दिया और कम से कम पहले दिन तो किसी नेता या दल की हिम्मत नहीं हुई कि वह अचानक हुए इस अकाट्य वार से स्वयं को बचा पाता।
अभ‍िव्यक्ति की आजादी को राजनेताओं ने अभी तक अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए यूज किया था और विचारों की कथ‍ित स्वतंत्रता के नाम पर उनकी सोच घातक खेल खेलकर देश के साथ विश्वासघात करती रही। अभ‍िव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश की एकता व अखंडता का मजाक उड़ाया जाता रहा।
भारतीय संविधान में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धारा 19 के तहत छह स्वतंत्रता के अधिकारों में से एक है। किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of expression) कहलाती है परंतु इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हर जगह कुछ न कुछ सीमा अवश्य होती है।
रोहित वेमुला की खुदकुशी और जेएनयू में लगे देशद्रोही नारों को लेकर बुधवार को सदन में स्मृति ईरानी अपने तल्ख तेवर में दिखीं और वामपंथी विचारधारा पर करारा प्रहार किया। जेएनयू में कुछ छात्रों की ओर से महिषासुर दिवस मनाए जाने पर सवाल खड़े करते हुए स्मृति ईरानी ने कहा कि ये छात्र महिषासुर को पूर्वज (ऐतिहासिक) मानते हैं लेकिन मां दुर्गा का अपमान करते हैं।
स्मृति ईरानी ने महिषासुर दिवस के आयोजन का एक पर्चा पढ़कर सुनाते हुए कहा कि ' मुझे ईश्वर माफ करें इस बात को पढ़ने के लिए। इसमें लिखा है कि दुर्गा पूजा सबसे ज्यादा विवादास्पद और नस्लवादी त्योहार है। जहां प्रतिमा में खूबसूरत दुर्गा मां द्वारा काले रंग के स्थानीय निवासी महिषासुर का वध करते हुए दिखाया जाता है। महिषासुर दिवस मनाने वालों के अनुसार महिषासुर एक बहादुर, स्वाभिमानी नेता था, जिसे आर्यों द्वारा शादी के झांसे में फंसाया गया। आर्यों ने एक सेक्स वर्कर का सहारा लिया, जिसका नाम दुर्गा था। दुर्गा ने महिषासुर को शादी के लिए आकर्षित किया और 9 दिनों तक सुहागरात मनाने के बाद उसकी हत्या कर दी।" स्मृति ने गुस्से से तमतमाते हुए सवाल किया कि क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? कौन मुझसे इस मुद्दे पर बहस करना चाहता है?
स्मृति ईरानी के सदन में दिए इस बयान से एक बार फिर कई सालों बाद फिर ये मुद्दा गर्म हो गया है। बीजेपी समेत कई दलों ने देवी-देवताओं के अपमान के मुद्दे पर आपत्ति जताई है।
कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने कहा कि आपकी आस्था महिषासुर में हो सकती है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि आप दूसरों की भावनाओं का अपमान करें।
 बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि ये एक बड़ी साजिश है। इसे आर्यों और द्रविड़ों की फिलॉसफी फैलाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, जो कि अंग्रेजों की थ्योरी थी।
वीएचपी नेता विनोद बंसल ने कहा कि इस देश की मूल विचारधारा इसी धर्म की है लेकिन उसके बावजूद ये सब क्यों होता है। जेएनयू में सालों से ये हो रहा है और मैं इसके खिलाफ लगातार FIR दर्ज करवाता रहा हूं लेकिन कोई कार्यवाही नहीं होती क्योंकि अगर कार्यवाही होगी तो CPI बिलबिला जाती। हालांकि अब भी सीपीआई नेता दिनेश वार्ष्णेय ने कहा कि ये मामला राजनीति से प्रेरित होकर उठाया जा रहा है क्योंकि बंगाल में चुनाव आने वाले हैं और वहां दुर्गा पूजा का बहुत ज्यादा महत्व है।
कितने आश्चर्य की बात है कि यह जहरीला विचार उसी बंगाल की धरती से उपजा जहां दशकों तक वामपंथ‍ियों का शासन रहा और दुर्गापूजा भी होती रही मगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झुनझुना इस कदर आम जन के गले में घंटी की तरह लटका दिया गया कि कोई इसके औचित्य तक पर सवाल नहीं उठा पाया और जिसने उठाया भी तो तत्काल उसे रूढ़‍िवादी और मनुवादी करार दे दिया गया।
आज भी राज्यसभा में कांग्रेस के नेता आनंद शर्मा स्मृति ईरानी से इस बात पर तो इस्तीफा मांग रहे हैं कि उन्होंने मां दुर्गा को लेकर आपत्त‍िजनक पर्चा संसद में सार्वजनिक रूप से पढ़कर सुनाया जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती थीं मगर उस हकीकत पर वे कुछ नहीं बोले कि जेएनयू में आख‍िर ये सब घटित होता रहा और वे चुप क्यों बैठे रहे ?
गौरतलब है कि साल 2012 में जेएनयू के भीतर वामपंथी छात्र संगठनों ने महिषासुर को भारत के आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों का पूर्वज बताते हुए शरद पूर्णिमा को उसकी शहादत मनाने की घोषणा की थी और जगह-जगह कैंपस में पोस्टर भी लगाए गए थे। उस वक्त जमकर बवाल मचा था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार असुरों के राजा महिषासुर का देवी दुर्गा ने वध किया था लेकिन वामपंथी फोरम से जुड़े स्टूडेंट्स मानते हैं कि महिषासुर देश के जनजातीय, दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के पूर्वज थे, जिन्हें देवी दुर्गा का इस्तेमाल कर आर्यों ने मारा था। बात इतने पर रुक जाती तो भी ठीक था, लेकिन जिस तरह से देवी दुर्गा और महिषासुर के संबंधों के बारे में कहा गया था वो शर्मनाक है।
देश ने कई दशक गुजार दिये इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाली ऊहापोह में । अब समय आ गया है कि राजनेता देश के सामने जहरीली मानसिकताओं को प्राश्रय देने से बाज आ जायें।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अभी तक जो घ‍िनौना खेल खेला जाता रहा है, उसकी बख‍िया उधड़ने लगी है और उनकी सोच सरेआम हो गई है कि वे देश के लिया कितना कुत्स‍ित सोचते रहे हैं... करते रहे हैं।
और फिर... मैथिलीशरण गुप्त की ही कविता ''आर्य'' के अंश जिस पर हर भारतीय को अभि‍मान होगा ....
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े
वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा
संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में
वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे।

अंत में इतना कहना पर्याप्त होगा क‍ि आज यद‍ि मैथलीशरण गुप्त जिंदा होते तो कुछ नेता न केवल उनसे उनकी राष्ट्रकवि की उपमा छीन लेते बल्क‍ि निज गौरव और निज देश पर अभमिान न होने वाले को पशुतुल्य व मृतप्राय: बताए जाने पर कन्हैया, उमर खालिद जैसों के साथ जेल भेजने का कोई न कोई बंदोबस्त भी जरूर कर देते।

 - अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

JAT : बलवाई बनती एक पूरी की पूरी कौम

इन कथ‍ित आरक्षणवादियों ने देश की एक बहादुर और कर्मठ जाति के गौरव को ''हाथ पसारने वाला बनाकर'' तरक्की के सामने विलेन बनाकर खड़ा कर दिया.... अब क्या कहूं... किस मुंह से कहूं...कि मैं भी तो जाट हूं ...। J से justice, A से action और T से truth...इन तीन लफ्ज़ों से क्लासीफाई किए जाने वाली JAT जाति को अब अपनी कर्मठता के कारण नहीं, जबरन आरक्षण की मांग करने और इसकी आड़ में अपने पूर्वजों द्वारा स्थापति Justice, action और truth की परंपरा को ख़ाक कर देने जैसे कृत्य के लिए जाना जाएगा। यह सब देखकर मैं बहुत दुखी हूं क्योंकि मैं भी जात‍ि से जाट हूं और सर्वरक्षक की श्रेणी से यूं सर्व विहीन श्रेणी में आने की आतुरता को देखकर स्तब्ध भी हूं....इसलिए भी कि जाट कभी याचक नहीं रहे।

भारतीय सेना में एक पूरी की पूरी रेजीमेंट के साथ अन्य रेजीमेंट्स में भी बाहुल्य रखने वाले और देश की रक्षा में प्राणपण से आगे रहने वाले जाट ही हैं। ओलंपिक में सर्वाध‍िक पदक यदि किसी जाति ने हासिल किये तो वह जाट हैं। खेती-किसानी से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तरप्रदेश को लहलहाने वाले भी जाट हैं। यही जाट जब हक़ के नाम पर आरक्षण की भीख मांगते और स्वयं को दीन-हीन बताते दिखे तो परेशान होना स्वाभाविक है क्योंकि इन 'हक़' मांगने वालों में कोई ऐसा नहीं था जो भूमिहीन हो, भूमि कम हो या ज्यादा ये अलग विषय है, इस पर चर्चा की जा सकती है। यूं भी जो कौम अपना भाग्य अपने आप लिखने का सामर्थ्य रखती हो, उसे इस तरह स्वयं को गिराकर बलवाइयों के रूप में देखना,  क्या आनंद दे सकेगा ।

बढ़ते शहरीकरण से उपजे हालातों ने जाटों  को राजनीति का ख‍िलौना बना दिया और जो जाट 'अपने  मालिक खुद ' थे, अब वे लगभग भीख मांगने की मुद्रा में आ गए... और गिरावट की यह यात्रा उन्हें दंगाई- बलवाई के रूप में सबके सामने ले आई।

मुझे अपने बचपन की वो घटना याद हो आई। पापा पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक कस्बे में सरकारी डॉक्टर थे, हर दो ढाई साल में उनका ट्रांसफर हो जाता था, वे उसे बहुत एंज्वॉय करते थे। पापा चूंकि बहुत मिलनसार स्वभाव के थे। उस क्षेत्र के आमजन और कर्मचारियों में एक आदत थी कि जब भी ट्रांसफर होता था तो वे पापा से कहते, साहब आप तो जा रहे हैं, कउनौ चिन्हारी दइ के जाब। पापा अपनी कई प्र‍िय चीजें
ऐसे ही दे चुके थे, हम अपनी प्र‍िय चीजों को यूं ही दे दिए जाने से जब दुखी होते तो पापा समझाते थे कि बेटा हम जाट हैं, हम देने के लिए बने हैं, हम किसी से मांगते नहीं और जो हमसे मांगता है, उसे सहर्ष दे देते हैं, कभी पीछे नहीं हटते।यही हमारा धर्म है और यही कर्म।
उन्होंने ही मुझमें अपनी जाति के प्रति गर्व का भाव भरा और समय के साथ इसमें आती जा रही बुराइयों के प्रति आगाह भी किया।

आज पापा याद बहुत याद आ रहे हैं...अगर वो इस दुनिया में होते तो मैं उनसे अवश्य पूछती कि हम जैसे ''जाट'' क्या करें। कैसे शुरूआत करें इस निकृष्टता की ओर जाती आतताई सोच को बदलने की। कैसे याद दिलायें इन्हें कि हमने ही तो गढ़ा था पहचान का यह नारा ... Justice, action और truth.।
कैसे कहें
इन बलवाइयों से कि जाट आबादियों को मिटाने का नहीं, वीराने को भी जगमगा देने वाला टैग होता है। जाटों ने तो अपनी हिम्मत और मेहनतकशी से रेग‍िस्तानों और ऊसरों को भी उपजाऊ  बनाने का साहस दिखाया है। जो पोषक और रक्षक बनने का सामर्थ्य रखता है उसमें इतनी हताशा, निराशा और अपराध‍िक सोच को कैसे आ गई। 

आरक्षण की मांग के नाम पर जो कुछ हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में हुआ तथा जाम, आगजनी, लूटपाट करके बसें फूंकी गई और महिला यात्र‍ियों से गैंगरेप भी किए गए, निश्चित ही यह केवल नौकरियों में आरक्षण के लिए किसी कौम का प्रदर्शन तो नहीं ही कहा जा सकता।

खालिस अपराध‍ियों को मैं कैसे कह दूं कि ये ''जाट'' हैं... आतताइयों और बलवाइयों को कैसे कह दूं कि ये जाट हैं...। ये तो जाट हो ही नहीं सकते... किसी कीमत पर नहीं...। वे तो हक मांगने की आड़ में सिर्फ और सिर्फ देश, समाज और मानवता के दुश्मन हैं...कानूनन अपराधी हैं।

इसके अलावा मेरे दिल में और भी बहुत कुछ चल रहा है। मजाक के तौर पर जाटों को ''हनुमान'' कहा जाता है जो दूसरों के फटे में टांग अड़ाते हैं, मगर हम जाट तो इसे भी अपने लिए अवसर मानते हैं कि मां सीता की रक्षा के लिए, राम का साथ देने के वचन को पूरा करने के लिए अपनी पूंछ में आग लगवाने से भी पीछे नहीं हटते और सीना चौड़ा कर देने वाली ये संज्ञा हमारी वचनबद्धता, कर्मठता दूसरों की बेशर्त मदद के तौर पर हमारा टैग बन गई। फ‍िर आज ये सब क्यों....।

इन कथ‍ित आरक्षणवादियों ने देश की एक बहादुर और कर्मठ जाति के गौरव को ''हाथ पसारने वाला बनाकर'' तरक्की के सामने विलेन बनाकर खड़ा कर दिया.... अब क्या कहूं... किस मुंह से कहूं...।

J.A.T. का अर्थ बताने वाले पापा को साक्षी मानकर सोचती हूं कि मैं कम से कम शब्दों के द्वारा तो जाटों को बदनाम होने से रोकने की एक कोश‍िश कर ही सकती हूं ताकि अपने बच्चों के सामने मैं यह कहने से सकुचाऊं नहीं कि मैं भी तो जाट हूं।
आज ये आह निकली ही इसलिए है कि मैं भी तो जाट हूं और बलवाइयों के कृत्यों को लेकर शर्मसार भी। 

- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

# Tag और Viral होने के बीच पनपते और खत्म होते शब्दों की दुनिया


सोशल मीडिया में तैरते हुए शब्द ... देश विदेश की खबरों में तैरते हुए छा जाने वाले शब्द...जिन शब्दों से मीडिया ना जाने कितनी खबरें डेस्क पर बैठे-बैठे गढ़ लेता है, वो उम्र में बेहद कम और मौसमी बुखार की तरह जीवन लिए होते हैं। सोशल मीडिया में छाने के बाद ये अपना मकसद पूरा कर ऐसे विलोपित हो जाते हैं जैसे कि कोई फैशन था...आया...और गुजर गया...किसी एक और शब्द की तलाश में ...उसके चलन के इंतज़ार में।

इन तैरते शब्दों की उम्र इतनी छोटी होती है कि विलोपित होने के बाद इन्हें स्मृति पटल पर वापस लाने में बड़ी दिक्कत होती है। स्मृति के समुद्र में ज्वार की भंति ऊपर जाना फिर भाटे की भांति नीचे उतर जाना इनकी नियति बन गई है।

 # Tag और Viral होने के बीच अब पनपने वाले शब्दों ने ना जाने कितने गुदड़ी के लालों को चमकता सितारा बना दिया और ना जाने कितने सितारों को धूल चटा दी। ये सोशल मीडिया पर तैरते शब्दों का ही कमाल था कि ''असहिष्णुता'' के नाम पर पूरी की पूरी राजनीतिक बिसातें बिछीं, चुनाव जीते और हारे गए और  साहित्यकारों की कथ‍ित धर्मनिरपेक्षता और उनकी खुद की अस‍हिष्णुता का नंगा सच भी सबके सामने आ गया। इसी एक ''असहिष्णुता' शब्द ने अच्छी- अच्छी मार्केटिंग कंपनियों को इस कदर ब्लैंकथॉट कर दिया क‍ि उनके सामने अपने ब्राण्ड एंबेसेडर्स को रि‍प्लेस करने के सिवा कोई चारा ना बचा।

नेशनल ही नहीं, इंटरनेशनल लेवल पर भी इन # Tag शब्दों में गैंगरेप, रेप, आईएसआईएस के वीभत्स वीडियो, यज़ीदी महिलाओं के सेक्स गुलाम बनने की दास्तां, शरणार्थ‍ियों से भरी नौका डूबने और मृत बच्चे की समुद्र तट पर ली गई तस्वीर, हाल ही में नन्हें अफगानी मुर्तजा को फुटबॉलर मेसी की जर्सी मिलना और बलूचिस्तान के लोगों पर पाकिस्तानी सरकार के जुल्म जैसे विषयों ने सुर्ख‍ियां बटोरीं।

हालांकि कभी कभी # Tag के शब्द निर्णयों को भी बाधि‍त करते हैं, जैसे कि नोबेल पुरस्कार के लिए चल रहे नॉमिनेशंस में हो रहा है जहां एक सेक्स गुलाम नादिया मुराद के बच निकलने की तुलना उस बहादुरी से की जा रही है जो अफगानिस्तान की पूरी की पूरी साइकिलिस्ट टीम ने तालिबानियों के ख‍िलाफ दिखाई थी जबकि दोनों की कोई तुलना नहीं की जा सकती।

# Tag सोशल मीडिया पर सिर्फ अफवाह को वायरल करने के ही काम नहीं आता, वह सच को यथावत सामने रखने के भी काम आता है। जैसे कि ये  # Tag  का ही कमाल था कि हैदराबाद यूनीवर्स‍िटी के आत्महत्या करने वाले जिस रोहित वेमुला को राजनीतिज्ञों ने दलित कहकर शोर मचाये रखा और केंद्र की सरकार को घेरने की कोशिश की, उसकी जाति का यह सच # Tag सामने ले आया  कि वो वढेरा जाति का था जोकि ओबीसी में आती है।

# Tag ही था जिसने सबरीमाला की हकीकत और नई पीढ़ी की इन रूढ़‍ियों व रिवाजों के ख‍िलाफ उभरती अकुलाहट को #HappytoBleed के रूप में सामने रखा। # Tag ने प्रौढ़ हो रही पीढ़ी को बताया कि बंदिशों और कथ‍ित शुचिता के नाम पर जो कुछ होता आ रहा है, अब वह यथावत मंजूर नहीं किया जा सकता।
# Tag ने ही भारतीय समाज को बीफ खाने और ना खाने के खेमों में बांट दिया और बीफ पर असहिष्णु तरीके से खेली गई राजनीति को भी। ये # Tag ही था जो बताता रहा कि भोजन, भजन, पहनावे और विचारों पर समाज खुलकर बहस करने की मुद्रा में है।
इस बीच देश में नकरात्मकता भी जमकर परोसी गई,  बात- बात पर सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख‍िलाफ अभ‍ियान चलाने में # Tag की बढ़ी भूमिका रही। # Tag के जरिये एक परंपरा सी बना दी गई कि किसी के किचन में हींग का छौंक भी अगर जल जाए तो बहुमत से चुनी गई सरकार के मुखिया को ही उत्तरदायी ठहराया जाए।
बहरहाल, मुद्दे बहुत हैं # Tag के बहाने सोशल मीडिया पर छाने वाले मगर जो सुर्ख‍ियां बने उन्होंने हवा का रुख तय किया और इनके चलन को फिलहाल तो समाज, राजनीति, संस्कार, विचार के विकास की तरह देखा जाना चाहिए। # Tag का सफर और कितने परिवर्तनों से हमें रूबरू कराता है, इंतज़ार कीजिए अगले # Tag परिवर्तन का।
हर चीज का एक समय होता है, एक दौर होता है। बेशक यह  # Tag का दौर है लेकिन समय  # Tag को भी  Tag कर सकता है और किसी नई चीज को  # Tag। देखना यह है क‍ि  # Tag और कि‍तने समय तक प्रभावी रह पाता है। तो इंतजार कीजिए अब  # Tag के भी Tag होने का।  

- अलकनंदा सिंह

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