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बुधवार, 27 मई 2015

एएमयू के प्रोफेसर ने कहा, समलैंगिकों के अड्डे हैं मदरसे

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में घिर गए हैं। उनके ऊपर मदरसों को ‘अधर्म और समलैंगिकता के अड्डे’ कहने का आरोप लगा है। स्टूडेंट्स में उनके खिलाफ भारी नाराजगी देखी जा रही है।
यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री डिपार्टमेंट के प्रोफेसर वसीम राजा पर आरोप लगा है कि उन्होंने वॉट्सऐप पर एक टीवी चैनल को मेसेज भेजा था। इस मेसेज में लिखा था कि मौलाना इस तरह की गतिविधियों में लगे हुए हैं और मुस्लिम युवाओं का भविष्य तभी बदलेगा, जब देश के सभी मदरसे बैन कर दिए जाएं। चैट के स्क्रीन ग्रैब्स में राजा यह कहते दिखते हैं, ‘हम मदरसों को हटाना चाहते हैं, जहां समलैंगिकता को बोलबाला है और मौलाना इसमें शामिल हैं।’
प्रोफेसर पिछले 3 दशकों से यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। उन्होंने इस तरह के मेसेज भेजने से इंकार किया है। उन्होंने कहा, ‘मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। मैं कई सार्क कॉन्फ्रेंसेस में हिस्सा ले चुका हूं और हमेशा कम्युनिटी के पुनर्गठन की बात की है। क्या मदरसे हमारी कम्युनिटी में नहीं आते? इसका मतलब यह नहीं है मैंने ऐसा कुछ कहा है। मेरा फोन हैक कर लिया गया था। अब मैंने ग्रुप को बैन कर दिया है।’
स्टूडेंट्स ने राजा की टिप्पणियों की कड़ी आलोचना की है। रिसर्च स्कॉलर शाह आलम तुर्क ने कहा, ‘मैं ग्रुप में चैट कर रहा था, तभी राजा ने ऐसी बातें कहीं। मैंने उन्हें कहा कि अपने विचार रखना आपका संवैधानिक अधिकार है, मगर आप तथ्यों के बिना इस तरह से अपमान नहीं कर सकते। यह पूर्वग्रह है और इससे हमारी कम्युनिटी कमजोर होगी, मजबूत नहीं।’
अन्य स्टूडेंट्स ने भी इसी तरह के विरोध किया है। एक ने कहा, ‘आप जैसे लोग यूनिवर्सिटी का नाम बदनाम कर रहे हैं। आपक इस जगह पहुंचे हैं तो बोलने से पहले सोचिए।’ AMUTA सचिव मुस्तफा जैदी ने कहा कि प्रोफेसर को बोलने से पहले कुछ सोचना चाहिए था। उन्होंने कहा, ‘इस तरह के बयान नाराजगी पैदा कर सकते हैं। उन्हें ऐसा कहना ही नहीं चाहिए था।’
एएमयू पीआरओ राहत अबरा ने कहा कि वीसी अभी बाहर हैं और उनके लौटने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि इस मामले में क्या कार्यवाही की जाए।

रविवार, 2 जून 2013

तो फिर वनमानुष क्‍या बुरे हैं

ग्‍लोबलाइजेशन के इस दौर में जिस्‍म की नुमाइश को ही खुलेपन और आधुनिकता का पैमाना बना दिया गया है और इसके लिये मीडिया भी उतना ही दोषी है।
कुछ दिन पहले की बात है जब अलीगढ़ मुस्‍लिम यूनीवर्सिटी में कल कुलपति ने सभ्‍य दायरे में रह कर छात्राओं व छात्रों को यूनीवर्सिटी की रवायत के अनुसार लिबास पहनने हेतु एक खुला पत्र लिखा।
उन्‍हें यह इसलिए लिखना पड़ा क्‍यों कि छात्रायें खुलेपन की आड़ में मात्र अपनी नुमाइश करने लगीं थीं, अराजकत तत्‍वों ने आयेदिन बवाल करना शुरू कर दिया। दु:ख तो इस बात का था कि इस अनुशासनात्‍मक पत्र की खबर पर स्‍थानीय अखबार चिल्‍लाने लगे कि ड्रेस कोड... ड्रेस कोड...लड़कियों की आज़ादी पर प्रश्‍नचिन्‍ह... आदि आदि ....।
अब बताइये आखिर हम किस सभ्‍यता और किस तरक्‍की की बात कर रहे हैं।  हम चांद पर जाने का उदाहरण  देते रहते हैं मगर संस्‍कारों की कब्र खोदते  जा रहे हैं । खयालातों  की तरक्‍की के इतर अगर कम कपड़े पहनना ही आधुनिकता का मापदंड है तो फिर वनमानुष क्‍या बुरे हैं।  
इसी विषय पर बकौल शायर.....
मंज़िल उन्‍हें ही मिलती है जिनके सपनों में जान होती है
परों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है।
एएमयू के कुलपति के आदेशों को देखते हुये इस शेर के संदर्भ में ये कहा जा सकता है कि बस इन परों के हौसलों का डायरेक्‍शन सही करना होगा।
- अलकनंदा सिंह