शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

कुछ लिखने से पहले…एक दृष्‍टांत

महाभारत का एक दृष्‍टांत है जिसे अकसर हम अपनी बातों में दोहराते हैं और दूसरों को उपदेशात्‍मक शैली में सुनाते भी हैं, मगर सिर्फ दूसरों को, स्‍वयं इसे कितना सूझते-बूझते हैं इससे कोई मतलब नहीं।
ये दृष्‍टांत, श्रीकृष्‍ण और द्रौपदी संवाद से है—-
18 दिन के युद्ध ने, द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था…शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी!
शहर में चारों तरफ़ विधवाओं का बाहुल्य था..पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था।
अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी
द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।
तभी, श्रीकृष्ण कक्ष में दाखिल होते हैं…
द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है …
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं…
थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं।
द्रोपदी: यह क्या हो गया सखा ??
ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।
कृष्ण: नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती! वह हमारे ”कर्मों को परिणामों में” बदल देती है।
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी ना और, तुम सफल भी हुई, द्रौपदी! तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ… सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव समाप्त हो गए! तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !
द्रोपदी: सखा, तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए ?
कृष्ण: नहीं द्रौपदी, मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूँ! हमारे कर्मों के परिणाम (अच्‍छे अथवा बुरे) को हम, दूर तक नहीं देख पाते और जब वे हमारे सामने आते हैं, तब तक परिस्‍थितियां बहुत कुछ बदल चुकी होती हैं, तब हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता।
द्रोपदी: तो क्या, इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ कृष्ण?
कृष्ण: नहीं, द्रौपदी तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो…
लेकिन, तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।
द्रोपदी: मैं क्या कर सकती थी कृष्ण?
कृष्ण: तुम बहुत कुछ कर सकती थीं! …जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ…तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती तो, शायद परिणाम
कुछ और होते।
इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया…तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते।
और…
उसके बाद तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया…
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं। वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता…तब भी शायद, परिस्थितियाँ कुछ और होती ।
हमारे शब्द भी
हमारे कर्म होते हैं द्रोपदी…
और, हमें अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना बहुत ज़रूरी होता है…अन्यथा, उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं… अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।
संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है…जिसका “ज़हर”
उसके “दाँतों” में नहीं, “शब्दों” में है…
द्रोपदी को यह सुनाकर हमें श्रीकृष्‍ण ने वो सीख दे दी जो आएदिन हम गाल बजाते हुए ना तो याद रख पाते हैं और ना ही कोशिश करते हैं। नतीजतन घटनाऐं दुर्घटनाओं में बदल जाती हैं और मामूली सा वादविवाद रक्‍तरंजित सामाजिक क्‍लेश में…
मॉबलिंचिंग और क्‍या है…अपनी वाणी, अपनी आकांक्षाओं की हिंसक परिणति ही ना। जो स्‍वयं कुछ नहीं कर पाते वे भीड़ का सहारा लेते हैं और ऐसे तत्‍व ही समाज और सरकारों की नाक में दम किए हुए हैं। वे सोचते हैं कि जो अपराध वे कर रहे हैं उसे कोई नहीं देख रहा परंतु नियति का बूमरैंग घूमता अवश्‍य है।
बहरहाल आंख मूंदकर स्‍थापित की गईं धारणाओं को बदलने का अब वक्‍त आ गया है। धारणाऐं जैसे कि कोई मां अपने बच्‍चे का बुरा नहीं सोचती, साधु सदैव दूसरों का कल्‍याण चाहता है, अनुसूचित और अल्‍पसंख्‍यक समुदाय हमेशा ‘पीड़ित’ ही होते हैं, बलात्‍कार हमेशा महिला का होता है, कामगार हमेशा शोषित रहता है, बच्‍चे हमेशा सच ही बोलते हैं, शिक्षक हमेशा शिष्‍य को सही शिक्षा देते हैं, डॉक्‍टर सेवाभावी होते हैं, व्‍यवसायी हमेशा चोरी करता है और राजनेता निकृष्‍ट और भ्रष्‍ट होते हैं और अधिकारी ‘बेचारे’…आदि उदाहरण अनेक हैं जो शब्‍दों के सहारे ही अब तक पीड़ित दिखकर पीड़क बनते गए और अब स्‍थिति विस्‍फोटक हो चुकी है।
श्रीकृष्‍ण याद आ रहे हैं…द्रोपदी (जनता) को समझा भी रहे घटनाओं-परिस्‍थितियों के रूप में उदाहरण दे देकर परंतु द्रोपदी आंख-कान-मुंह बंद किए हुए है। हम भी तो देखें कि यह कौन सी महाभारत की नींव रखी जा रही है…।
-अलकनंदा सिंह

रविवार, 16 जून 2019

एक बेटी थी सोनोरा जिसके कैंपेन ने शुरू कराया Father’s Day

सोनोरा ने Fathers Day मनाने की ठान ली थी, इसके लिए यूएस तक में कैंपेन किया. इस तरह 19 जून 1910 को पहली बार फादर्स डे मनाया गया.
बात 1909 की है. सोनोरा लुईस स्मार्ट डॉड (Sonora Louise Smart Dodd) नाम की 16 साल की लड़की ने Father’s Day मनाने की शुरुआत की. दरअसल, जब वो 16 साल की थी तब उसकी मां उसे और उसके पांच छोटे भाइयों को छोड़कर चली गईं.
सोनोरा और भाइयों की जिम्मेदारी उसके पिता पर आ गई. एक दिन 1909 में वह मदर्स डे (Mother’s Day) बारे में सुन रही थी, तभी उसे महसूस हुआ कि ऐसा एक दिन पिता के नाम भी होना चाहिए.
सोनोरा ने फादर्स डे (Father’s Day) मनाने के लिए एक याचिका दायर की. उसमें सोनोरा ने कहा कि उसके पिता का जन्मदिन जून में आता है इसलिए वो जून में ही फादर्स डे मनाना चाहती है. इस याचिका के लिए दो हस्ताक्षरों की जरुरत थी. इस वजह से उसने आस-पास मौजूद चर्च के सदस्यों को भी मनाया.
लेकिन फादर्स डे मनाने की मंजूरी नहीं मिली. लेकिन सोनोरा ने फादर्स डे (Fathers Day) मनाने की ठान ली थी, इसके लिए यूएस तक में कैंपेन किया. इस तरह 19 जून 1910 को पहली बार फादर्स डे मनाया गया.
Father’s Day 2019: पापा को प्यार जताने के लिए पूरी जिंदगी कम है. बावजूद इसके हर साल जून के तीसरे संडे को फादर्ड डे (Father’s Day) मनाया जाता है. ये दिन खास पापा को अपना प्यार दिखाने और उन्हें स्पेशल महसूस कराने का होता है. गिफ्ट्स, केक और मिठाइयों के साथ इस दिन उन्हें खास फादर्स डे के मैसेजेस (Father’s Day Messages) भी भेजे जाते हैं. इन सबके अलावा आप अपने पापा के लिए एक काम और कर सकते हैं और वो है अपने व्हाट्सएप और फेसबुक पर फादर्स डे के स्टेटस (Father’s Day Status) लगाएं.
वहीं, मदर्स डे 1914 में बतौर नेशनल हॉलिडे मनाया जाने लगा था लेकिन 1972 तक फादर्स डे को राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं किया गया था. आगे सालों में प्रेज़िडेंट वुड्रो विल्सन, कैल्विन कॉलिज और लिंडन बी जॉनसन सभी ने पिता के समर्पित इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने के बारे में लिखा. आखिरकार साल 1970 में, राष्ट्रपति रिचर्ड दस्तखत कर अपनी रज़ामंदी दी.

Who was Sonora Louise Smart Dodd?

Dodd, born in 1882, was the daughter of American Civil War veteran William Jackson Smart. She was 16 years old when her mother died in childbirth with her sixth child.
Following her mother’s death, Dodd helped her father raise her younger brothers. She held her father in high esteem and was motivated by the newly recognised Mother’s Day to fight for the recognition of fatherhood.
धीरे-धीरे फादर्स डे मनाने का ट्रेंड पूरी दुनिया में फैला. अब हर घर में हर फादर्स डे बहुत ही प्यार के साथ मनाया जाता है.
-Legend News

शनिवार, 1 जून 2019

शीशम के एक बड़े टुकड़े से बनी श्रीराम की प्रतिमा स्‍थापित होगी अयोध्‍या में

अयोध्या में कोदंड श्रीराम की सात फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी। तमिलनाडु में बनी यह प्रतिमा अयोध्या शोध संस्थान में प्रतिष्ठित की जाएगी, जिसे बनाने में 3 साल का समय लगा है।


संस्थान ने इस आदम कद प्रतिमा को कर्नाटक सरकार के उपक्रम ‘कावेरी’ से 35 लाख रुपए में खरीदा है।
खास बात यह है कि इस प्रतिमा को शीशम की लकड़ी के एक बड़े टुकड़े से ही बनाया गया है।


संस्थान के अधिकारियों ने बताया कि जून के पहले हफ्ते में प्रतिमा की स्थापना के समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में मौजूद रहेंगे। बताया जा रहा है कि इस प्रतिमा को तैयार करने वाले कलाकार को हस्त शिल्प के लिए राष्ट्रपति सम्मान मिल चुका है। अयोध्या में आने वाले श्रद्धालुओं को इस प्रतिमा की उपस्थिति एक नया अनुभव होगी। साथ ही यह भगवान राम की विराट छवि और अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी अलग-अलग रूपों में स्वीकार्यता को दर्शाएगी।


भगवान राम के धनुष को कोदंड के नाम से जाना जाना जाता है

भगवान राम के धनुष को कोदंड के नाम से जाना जाना जाता है। जब वह माता सीता की खोज के लिए दक्षिण भारत पहुंचे तो वनवासी रूप में उनके हाथ में उनका धनुष कोदंड था। उन्होंने अपनी पत्नी सीता की रक्षा के लिए धनुष उठाया था लिहाजा दक्षिण भारत में उनका परिचय एक ऐसे पुरुष के तौर पर होता है जो ‘स्त्री रक्षक’ हैं इसलिए तमिलनाडु में भगवान राम के कोदंड स्वरूप को पूजा जाता है। स्त्रियों में श्रीराम के इस स्वरूप को आदर और सम्मान दिया जाता है।
देशभर में भगवान राम की जिन रूपों में पूजा की जाती है, उसका विशेष कारण है। कहते हैं- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी तैसी। यानी जिसकी जैसी भावना होती है, उसे भगवान की वैसी मूर्ति दिखती है। यह बात श्रीराम के जीवन काल की घटनाओं पर भी लागू होती है। अयोध्या और इसके आस-पास के क्षेत्र के लोगों ने उन्हें बाल्य रूप में देखा था तो वहां उनकी पूजा ‘बाल राम’ रूप में की जाती है।


मिथिला क्षेत्र में उन्होंने सीता से स्वयंवर किया था, तो वहां उन्हें ‘दूल्हा राम’ के रूप में पूजा जाता है। 14 वर्ष के वनवास के दौरान वह काफी समय मध्य प्रदेश और चित्रकूट में रहे तो वहां उनकी छवि ‘बनवासी राम’ की है। इसी तरह जब वह रावण द्वारा सीता मां का अपहरण कर लिए जाने के बाद उनकी तलाश करते हुए हाथ में अपने धनुष कोदंड के साथ दक्षिण भारत पहुंचते हैं, तो वहां उनके कोदंड स्वरूप को पूजा जाता है, जो स्त्री के सम्मान के लिए रावण जैसे आतताई से भिड़ने के लिए तत्पर हैं।

मंगलवार, 14 मई 2019

यूपी बोर्ड की शिक्षा कुव्‍यवस्‍था, बानगी बने 165 स्‍कूल

हमारे देश में शिक्षा का अधिकार कहता है कि शिक्षा सबके लिए हो, शिक्षा सर्वसुलभ हो, शिक्षा समाज के निचले पायदान पर बैठे व्‍यक्‍ति तक पहुंचे…मगर इस प्रक्रिया को पूरी करने वाली सबसे अहम कड़ी शिक्षक ही जब अपने कर्तव्‍य निर्वहन में भ्रष्‍ट और नाकारा उदाहरण पेश करते दिखाई दें तो इस अभियान का गर्त में जाना निश्‍चित है।
शिक्षा को व्‍यवसायिक और नौकरी का माध्‍यम मानकर चलने वाली सोच का ही नतीज़ा है कि यूपी बोर्ड के इंटरमीडिएट व हाईस्‍कूल रिजल्‍ट में प्रदेश के कुल 165 स्‍कूल का परिणाम शून्‍य रहा। प्रदेश के ये स्‍कूल कोशांबी, प्रयागराज, मिर्ज़ापुर, इटावा, बलिया, गाजीपुर, चित्रकूट और आजमगढ़ के हैं।
कोई सामान्‍य बुद्धि वाला व्‍यक्‍ति भी बता देगा कि रिजल्‍ट उन स्‍कूल का ही खराब रहा, जहां इस बार नकल के ठेके नहीं उठाये जा सके। इन ठेकों में शिक्षक व प्रधानाचार्यों से लेकर कॉपी चेकर्स और शिक्षा बोर्ड के आला अधिकारी भी हिस्‍सेदार हुआ करते थे। इस पूरी ठेकेदारी प्रथा के इतर शिक्षा किस हाल में हैं, ये तब पता लगा जब 165 स्‍कूल ने इस तरह ”नाम कमाया”।
सरकारी खानापूरी की तर्ज़ पर अब माध्‍यमिक शिक्षा परिषद इसका निरीक्षण-परीक्षण करेगा कि ऐसा क्‍यों हुआ, इन स्‍कूलों के प्रधानाचार्यों से जवाब तलब किया गया है, इसके बाद जांच कमेटी के विशेषज्ञ कारण तलाशेंगे, फिर निवारण सुझायेंगे, दोषी व्‍यक्‍ति व प्रतिकूल स्‍थितियों को लेकर ”फाइल ”बनेगी, कुछ नपेंगे कुछ को ”विशेष चेतावनी” देकर ”बख्‍श” दिया जाएगा।
इस पूरी कवायद में शिक्षा और बच्‍चों के भविष्‍य पर कोई कुछ नहीं बोलेगा। उक्‍त स्‍कूलों के शिक्षक तो खैर सोचेंगे भी क्‍यों। उन्‍हें बमुश्‍किल सड़कों पर आए दिन विरोध प्रदर्शन करके ये ”रोजगार” मिला है। लाठियां खाकर शिक्षक की ”नौकरी” हासिल हुई है। उन्‍हें शिक्षा के स्‍तर या बच्‍चों के भविष्‍य से कोई लेना देना नहीं होता जबकि पूरे साल इन स्‍कूलों में क्‍या पढ़ाया गया और किस तरह ये शर्मनाक स्‍थिति आई, इस पर सबसे पहले शिक्षकों को ही ध्‍यान देना चाहिए।
आए दिन ये दिवस…वो दिवस.. मनाने वाले हम लोग इंस्‍टेंट की अभिलाषा में गुरू से मास्‍टर और मास्‍टर से नकल माफिया तक आ चुके हैं। ऐसे में क्‍या हम अपने बच्‍चों से ये आशा कर सकते हैं कि वो सभ्‍य सुसंस्‍कृत बनेंगे, उन शिक्षकों को ”गुरू” मानते हुए परीक्षा में अव्‍वल आऐंगे जो स्‍वयं अच्‍छे शिक्षक भी नहीं बन पाए। जो ये शर्म महसूस नहीं कर पा रहे कि उनके स्‍कूल ”शून्‍य” कैसे रह गए। ये तो उन शिक्षकों व प्रधानाचार्यों को स्‍वयं सोचना चाहिए क्‍योंकि हर बच्‍चे का प्रदर्शन स्‍वयं उनकी काबिलियत का प्रदर्शन होता है। ऐसे में 165 स्‍कूल बानगी हैं कि शिक्षण कार्य में लगे कर्मचारी (सिर्फ गुरु ही नहीं) किस तरह हमारी प्रतिभाओं का नाश करने पर आमादा है।
शिक्षा कभी ज्ञान का पर्याय हुआ करती थी और गुरू को गोविंद (ईश्‍वर) से भी श्रेष्‍ठ पद प्राप्‍त था, लेकिन आज की शिक्षा व्‍यवसाय बन चुकी है और गुरू उस व्‍यवसाय का एक मोहरा। निजी स्‍कूलों में जहां इस व्‍यवसाय का रूप खालिस धंधेबाजी बन चुका है वहीं सरकारी स्‍कूलों में इसी के लिए नकल के ठेके लिए और दिए जाते हैं।
इन हालातों में सर्वशिक्षा का उद्देश्‍य पूरा भी कैसे किया जा सकता है। सरकारी मशीनरी और उसके टूल्स इतने निरर्थक हो चुके हैं कि उनकी उपयोगिता पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लग गया है।
शिक्षा को सबसे निचले पायदान तक पहुंचाना है तो इस क्षेत्र में लगी मशीनरी और उसके टूल्‍स का मुकम्‍मल इंतजाम करना होगा अन्‍यथा आज जो कहानी 165 schools की सामने आई है, वो कल 1650 की भी हो सकती है।
-अलकनंदा सिंंह

शनिवार, 11 मई 2019

मंटो मर नहीं सकता...कभी नहीं

मंटो एक जगह कहते हैं कि - "मैं उस सभ्यता, उस समाज की चोली क्या उतारुँगा जो पहले ही नंगी है।" इस कथन में मंटो ने समाज की सच्चाई पर एक व्यंग्य किया है, एक ऐसा व्यंग्य जो समाज कभी नहीं पचा सकता। मंटो पर उनकी भाषा और कहानियों की वजह से कई मुकदमे भी चले, जिनमें उनकी कहानियों को अश्लील बताकर समाज के लिये घातक बताया लेकिन यहाँ भी मंटो डटे रहे और इसके ख़िलाफ़ खुलकर लड़े।

उर्दू के जाने-माने लेखक सआदत हसन मंटो का जन्‍म 11 मई 1912 को हुआ था। 18 जनवरी 1955 को उनका देहांत हो गया। अपनी लेखनी से समाज के चेहरे को तार-तार कर देने वाले सआदत हसन ‘मंटो’ को पहले लोगों ने साहित्यकार मानने से इंकार कर दिया था।
अपनी लघु कथाओं… बू, खोल दो, ठंडा गोश्त और टोबा टेकसिंह के लिए प्रसिद्ध हुए सआदत हसन मंटो कहानीकार होने के साथ-साथ फिल्म और रेडिया पटकथा लेखक तथा पत्रकार भी थे।
अपने छोटे से जीवनकाल में सआदत हसन मंटो ने 22 लघु कथा संग्रह, एक उपन्यास, रेडियो नाटक के पांच संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह और व्यक्तिगत रेखाचित्रों के दो संग्रह प्रकाशित किए
कहानियों में अश्लीलता के आरोपों की वजह से मंटो को छह बार अदालत जाना पड़ा था, जिसमें से तीन बार पाकिस्तान बनने से पहले और बनने के बाद, लेकिन एक भी बार उनके ऊपर आरोप साबित नहीं हो पाए। मंटो की कुछ रचनाओं का दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद किया हुआ।

मंटो ने भी रूसी कथाकार आंतोन चेखव की तरह अपनी कहानियों के दम पर अपनी पहचान बनाई
कहते हैं कि भारत पाकिस्तान बंटवारे के बाद मंटो पागल हो गए थे। उसी पागल दिमाग से निकली उनकी कहानी ‘खोल दो’ यथार्थ से दो-दो हाथ करती है।

मंटो ने एकबार कहा था- मैं अफ़साना नहीं लिखता, अफ़साना मुझे लिखता है। कभी-कभी हैरत होती है कि यह कौन है, जिसने इतने अच्छे अफ़साने लिखे हैं?
“मेरा कलम उठाना एक बहुत बड़ी घटना थी, जिससे ‘शिष्ट’ लेखकों को भी दुख हुआ और ‘शिष्ट’ पाठकों को भी”
दक्षिण एशिया में सआदत हसन मंटो और फैज़ अहमद फैज़ सब से ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक है।

पिछले सत्तर साल में मंटो की किताबों की मांग लगातार रही है। एक तरह से वह घर-घर में जाना जाने वाला नाम बन गया है। उनके सम्पूर्ण लेखन की किताबों की जिल्दें लगातार छपती रहती हैं, बार-बार छपती हैं और बिक जाती हैं।


यह भी सचाई है कि मंटो और पाबंदियों का चोली-दमन का साथ रहा है। हर बार उन पर अश्लील होने का इल्ज़ाम लगता रहा है और पाबंदियां लगाई जाती हैं।
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 9 मई 2019

चिदंबरम साहब…अतीत पीछा नहीं छोड़ता, आपकी चाटुकारिता भी इतिहास में दर्ज़़ होगी

आइना सच नहीं बोलता बल्‍कि आपकी उस इमेज को रैप्‍लिकेट करता है जो पब्‍लिकली दिखाई देती है, आइने द्वारा दिखाई गई इमेज आपकी अंतरात्‍मा की इमेज से अलग होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि सच अंतरात्‍मा में छुपा होता है ना कि आइने की इमेज में ।
यूपीए शासनकाल में वित्‍तमंत्री रहे वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता, वरिष्‍ठ वकील, वरिष्‍ठ आर्थिक विद्वान पी. चिदंबरम ने कल एक ऐसा ट्वीट किया जिसने उनकी तमाम ”वरिष्‍ठ उपाधियों” की पोल खोलते हुए उनके इस आइनाई इमेज का सच सामने ला दिया।
ट्वीट में उन्‍होंने लिखा – ‘De mortuis nihil nisi bonum’ “मृत व्यक्ति के लिए कभी बुरा ना बोलें”। क्या पीएम ने यह प्राचीन कहावत सुनी है?
क्या कोई भी धर्म किसी मृत व्यक्ति को अपमानित करने की इजाज़त देता है?
चिदंबरम साहब चूंकि इंटरनेशनल स्‍तर के ज्ञानी व्‍यक्‍ति हैं इसलिए उन्‍होंने लैटिन कहावत का इस्‍तेमाल पीएम नरेंद्र मोदी को गरियाने के लिए किया वरना देसी ज्ञानी होते तो भगवद्गीता को बांचते जहां कर्मप्रधान माना गया है। अर्थात् मनुष्‍य जैसा कर्म करता है, समाज उसे वैसे ही विभूषित करता है।
लैटिन कहावत ”De mortuis nihil nisi bonum and De mortuis nil nisi bene” का उद्धरण, चिदंबरम साहब द्वारा कहा गया वो अधूरा सच है जो आइने में तस्‍वीर तो दिखाता है मगर उल्‍टी। ये सच अधूरा इसलिए भी है क्‍यों कि इस कहावत में कहीं भी ”मृत व्‍यक्‍ति के कर्म” के आधार पर उसका ”आंकलन” करने से नहीं रोका गया। इस आंकलन के आधार पर ही भगवान श्रीकृष्‍ण ने गीता में अच्‍छे और निष्‍काम कर्म करने के लिए प्रेरित किया।
चिदंबरम साहब, आप तो पीएम मोदी की आलोचना करने में भगवद्गगीता तक को भूल गए और राजीव गांधी का पूरा सच बताने पर भड़क गए जबकि 1984 के जिस ”सिख नरसंहार” को कांग्रेसियों और उनके तत्‍कालीन मीडियाहाउसेस ने सिख दंगा कहकर कातिलों के सिर से इल्‍ज़ाम हल्‍का करने का गुनाह किया, वह आज भी राजीव गांधी सहित समूची कांग्रेस का पीछा कर रहा है। संभवत: इसीलिए गत दिनों सिखों के एक समूह ने बाकायदा चिठ्ठी लिखकर राहुल गांधी से अनुरोध किया है कि वह अपने पिता को ‘शहीद’ न कहें।
आप अपनी अतिबुद्धिमता के अहंकार में शायद ये भी भूल गए कि हमारे सनातन धर्म में कर्म ही राजा और प्रजा का भाग्‍य तय करते आए हैं। कर्म ही होते हैं जो पीढ़ियों तक अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कर्म ही थे जिन्‍होंने रावण, कंस, दुशासन, दुर्योधन, तैमूर लंग, गोरी, गजनवी, बाबर, औरंगजेब, हिटलर के बाद नाथूराम गोडसे को भी सदैव के लिए खलनायक बना दिया। अफजल गुरु और कसाब को कैसे याद किया जाए, ये भी बताइये ज़रा। शासक के कार्यों की समीक्षा करके ही जनता सर्वश्रेष्‍ठ चुनती है, यही लोकतंत्र है परंतु एक बात निश्‍चित है कि अच्‍छे हों या बुरे कर्म कभी मनुष्‍य का पीछा नहीं छोड़ते।
राजीव गांधी यदि सिख नरसंहार की भर्त्सना करते तो शायद उन्‍हें अलग तरह से याद किया जाता परंतु उन्‍होंने इसे जायज ठहराया और ये इबारत इतिहास में दर्ज हो गई कि बड़ा पेड़ गिरने पर धरती तो हिलती ही है। नरसंहार से उपजी आहें उनके नाम को कभी इज्‍ज़त नहीं बख्‍शेंगीं, ये निश्‍चित है। चिदंबरम साहब, चाटुकारिता ही करनी थी तो मिसाल अच्‍छी देते। मेरी मानिए तो गीतापाठ शुरू कर दीजिए जिसमें अतिज्ञानी महात्‍मा और वरिष्‍ठतम भीष्‍म को भी शासन के पायों से बंधे रह कर अधर्म का साथ देने के लिए अर्जुन के हाथों मृत्‍युशैया तक पहुंचना पड़ा था। इस तरह राजीव गांधी का महिमामंडन कर सहानुभूति के रूप में राजनैतिक लाभ लेने की धूर्ततापूर्ण कोशिश ना करिए क्‍योंकि सच्चाई तथ्यों के साथ जनता के सम्मुख रखना धर्मानुरूप है।
”मृत व्यक्ति के लिए कभी बुरा ना बोलकर” हम लोकतंत्र का ही अपमान करेंगे।

मंगलवार, 7 मई 2019

दया के पात्र हैं ये दसवीं और बारहवीं परीक्षा के टॉपर

कल सीबीएसई का दसवीं का रिजल्‍ट आया, इससे पहले सीबीएसई का ही 12वीं का और यूपी बोर्ड की भी दोनों कक्षाओं का रिजल्‍ट आ चुका है। सीबीएसई में जहां बच्‍चों ने टॉपर होने के सारे रिकॉर्ड्स को धराशायी किया वहीं यूपी बोर्ड ने भी ऐसे ही रिकॉर्ड बनाए। यानि कदम दर कदम , इन दोनों ही बोर्ड परीक्षाओं में अंतर सिर्फ इतना रहा कि यूपी बोर्ड के लिए एनरोल होने वाले लाखों बच्‍चों ने ”नकल न कर पाने” की प्रतिकूल परिस्‍थितियों में अपना समय जाया नहीं किया और परीक्षा ही छोड़ दी। शेष रहे बच्‍चों ने अपनी अपनी मानसिक काबिलियत को ”स्‍कोरिंग” बना कर बता दिया।
बोर्ड रिजल्‍ट के बाद टॉपर्स की तस्‍वीरों से भरे अखबार और इन अखबारों में मोटे चश्‍मों से झांकते तथा माता-पिता की आकांक्षा के बोझ तले इंटरव्‍यू देते जा रहे बच्‍चों ने अभी सिर्फ 10वीं-12वीं की परीक्षाएं ही पास की हैं लेकिन इनसे कहलवाया जा रहा है कि वो ”क्‍या-क्‍या” बनेंगे।
इन टॉपर्स के अदना से मन पर आपदा की तरह गिराई जा रही यह स्थिति सहन नहीं हो रही क्‍योंकि ये ही वो स्‍थिति है जो बच्‍चों को समय से पहले प्रौढ़ बना रही है।
आप भी देखिए अखबार उठाकर कि क्‍या किसी बच्‍चे के चेहरे पर टॉपर बनने की आत्‍मसंतुष्‍टि, शांति है। या कितने हैं जो स्‍वस्‍थ दिखाई दे रहे हैं। हर चेहरा चिंतातुर है कि अब आगे क्‍या?
प्रिंट मीडिया कुछ अधिक ही बौरा गया है और उसके कई-कई पन्‍नों में सिर्फ टॉपर ही छाए हुए हैं। ज़रा सोचकर देखिए कि उन बच्‍चों के मन पर क्‍या गुजर रही होगी जो किसी भी कारणवश टॉप नहीं कर पाए, मां बाप तो उनके भी आकांक्षी रहे होंगे, उन बच्‍चों के मन में आ रहा होगा कि वे ऊंचे ओहदे पर पहुंचें।
ये मीडिया का कसाईपन टॉप न कर पाए बच्‍चों का जो मानसिक शोषण कर रहा है, उस पर सोचने का यही वक्‍त है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के ज़माने में जब हम टेक्‍नीकली, सोशली इतने एक्‍टिव हैं कि एक क्‍लिक पर लोगों के मन, घर और जीवन में क्‍या क्‍या चल रहा है, ये जान सकते हैं तो इन बच्‍चों का मन क्‍यों नहीं पढ़ पा रहे।
सच पूछा जाए तो आज के ये टॉपर बच्‍चे अधिक दया के पात्र हैं क्‍योंकि जाने अनजाने इनके मन पर ”आकांक्षाओं का इतना बोझ” लादा जा रहा है कि वो उसी को पूरा करने की उधेड़बुन में लगे हैं। टापर बनने की खुशी महसूस करने से पहले उन्‍हें ये चिंता सताने लगी है कि अब आकांक्षाओं से कैसे जूझा जाए। उन्‍हें इस गर्त में से तो उनके माता पिता भी नहीं उबारने वाले क्‍योंकि ये देन उन्‍हीं की है।
बहरहाल टॉप आने वाले बच्‍चे, टॉप कराने वाले स्‍कूल-संस्‍थान एक ऐसे चक्रव्‍यूह को रच रहे हैं जिसके बीच ”नेचुरल इंटेलीजेंस, नेचुरल क्‍यूरिओसिटी और नेचुरल बिहेवियर” शायद ही कभी पनप पाए।
बच्‍चों के ऊपर लदा यही वो बोझ है जो गत कई वर्षों से कोचिंग सेंटर्स भुना रहे हैं। याद आते हैं वो चेहरे जो कोटा (राजस्‍थान) के कोचिंग हब में अपने जीवन को खत्‍म करने पर बाध्‍य हुए क्‍योंकि उनके मन में भी कुछ ऐसा ही चल रहा होगा। टॉप आने का खेल मेधा को चाट रहा है। स्‍कूल, कोचिंग संस्‍थान और ट्यूशन तो खैर बाजार हैं, कम से कम हम तो अपने बच्‍चों को बाजार की कमोडिटी ना बनाएं। मेधा जीवन की थाती बने ना कि शोषक। निश्‍चित ही इंसान बने रहने के लिए ये एकमात्र आवश्‍यकता है, बाकी तो नई पीढ़ी स्‍वयं अपना रास्‍ता खोज ही लेगी।

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

बदजुबानियों का ये युद्ध

उत्‍तर प्रदेश की रामपुर लोकसभा सीट आजकल चर्चा में है, एक ओर आजम खान  हैं जो अपनी विरोधी प्रत्‍याशी जयाप्रदा के अंडरवियर का रंग बता रहे हैं तो दूसरी  ओर जयाप्रदा हैं जो हमलावर होकर कह रही हैं कि क्‍या आज़म खान के  बहू-बेटी-मां नहीं हैं, क्‍या वे उनके लिए भी ऐसा ही बोलते हैं। मगर जया जी, बात  तो यही है कि मां ने ही यदि संस्‍कार दिये होते तो आज़म खान बदजुबानी करते  ही नहीं। इसलिए चोर से ज्‍यादा चोर की मां ही दोषी है।

आमलोग इसे राजनीतिक गिरावट के रूप में देख रहे हैं, चुनाव आयोग ने भी  आज़म खान पर प्रतिबंध लगा दिया है, कानपुर की मेयर ने आज़म खान के  खिलाफ मुकद्दमा दर्ज़ करा दिया है, महिला आयोग ने भी संज्ञान लिया है...आदि  आदि वे प्रक्रिया हैं जो संस्थागत रूप से अपनी-अपनी प्रक्रियात्‍मक कार्यवाही बढ़ाती  रहेंगी।

परंतु...परंतु सवाल तो यह है कि क्‍या ये सब पहली बार है, क्‍या आज़म पहले  व्‍यक्‍ति हैं ऐसा कहने वाले, क्‍या जयाप्रदा अकेली हैं ऐसा सुनने वाली, सड़क से  लेकर घरों तक क्‍या हममें से अधिकांश ऐसे वाकियातों से रोजबरोज रूबरू नहीं  होते। क्‍या हम नहीं जानते कि पुरुष जब भी स्‍वयं को कमजोर और कमतर  समझता है तो महिला के शरीर और उसकी स्‍वतंत्रता को ही भिन्‍न-भिन्‍न लांक्षनों  से शिकार बनाता है। इसीलिए आखिरी हथियार के रूप में सारी गालियों का  शब्‍दांकन महिला के अंगों से चलकर उसी के चरित्र पर जाकर ठहरता है।

ये अलग बात है कि पुरुषों के डॉमिनेट करने के ये अंदाज़ उन्‍हीं को कठघरे में भी  खड़ा करते रहे हैं। दरअसल गालियां उन कुसंस्‍कारों का आइना होती हैं जो बच्‍चे  की परवरिश, मनोविकार और कमजोरी को ढकने के लिए बचपन में ही पिरो दिए  जाते हैं।

हालांकि ये भी दुखद है कि गालियों द्वारा शक्‍ति प्रदर्शन की इस अनोखी विधा पर  महिलाओं ने भी सरेआम जोर-आजमाइश शुरू कर दी है, बदजुबानी का संक्रामक  पक्ष अब उन्‍हें भी जद में ले रहा है।

अब लड़कियों को भी इस ''गालीगिरी'' में फंसकर लड़कों की भांति मां-बहन की  छूछ गाली बकते सुना जा सकता है। स्‍वतंत्रता का ये विध्‍वंसक रूप अभी नया है  परंतु इसके आफ्टर इफेक्‍ट्स आने वाली पीढ़ियों के लिए भयावह हो सकते हैं  क्‍योंकि अब चोर की मां ही स्‍वयं चोर को सही ठहराने चल पड़ी है।

फिलहाल आज़म खान के ज़रिए ही सही, अब इतने ऊंचे मंचों से टपकते ''समाज  के कोढ़'' को कार्यवाही की ज़द में लाया तो गया। वरना इससे पहले ऐसे कई  उदाहरण हैं जब बड़े-बड़े नेता अपनी ''रसिया प्रवृत्‍ति'' का सरेआम प्रदर्शन चुके हैं।  सैफई महोत्‍सव की ''उत्‍सवी रातों'' के बारे में कौन नहीं जानता।

आज़म खान के इसी मंच पर बैठे अखिलेश यादव की जयाप्रदा संबंधी इस  लज्‍जाजनक बयान को लेकर चुप्‍पी, महिलाओं पर अत्‍याचारों के बावत महिला  पत्रकार से उल्‍टा प्रश्‍न करना कि आपके साथ तो नहीं हुई ना छेड़खानी, मुलायम  सिंह का बलात्‍कार पर ये कहना कि लौंडों से गलती हो जाती है, तमाम ऐसे वाकये  हैं जिनकी मानसिकता कोई आज़म खान से अलग नहीं है। सोचकर देखिए इनके  संपर्क में आने वाली महिलायें किस वीभत्‍स माहौल में जीती होंगी।

बदजुबानियों का ये युद्ध, हमारे ( पुरुष व महिला दोनों ही के) लिए सबक भी है  और सुधरने के लिए चेतावनी भी, जिसे सिर्फ बेहतर संस्‍कारों से ही सकारात्‍मकता  की ओर मोड़ा जा सकता है ताकि राजनीति ही क्‍यों बल्‍कि सड़कों व घरों में भी  हम इस आतंक से बचे रह सकें। तो ''चोर की मां'' बनने से पहले हम ''सिर्फ मां''  बनें जिससे कोई आज़म फिर किसी महिला के अंडरवियर का रंग बताने की  हिम्‍मत ना कर सके और ना ही हमारी बेटियां गालियों के दलदल में खुद की  स्‍वतंत्रता ढूंढ़ने पर मजबूर हों। 

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

राम की शक्‍ति पूजा और स्‍वशक्‍ति जागरण

चैत्र नवरात्रि की विदाई व रामनवमी का त्‍यौहार हो और ”राम की शक्‍ति पूजा” की बात ना हो, तो चर्चा कुछ अधूरी ही लगती है।
शक्‍तिपूजा अर्थात् नकारात्‍मकता से लड़ने को स्‍वशक्‍ति का जागरण। और इसी स्‍वशक्‍ति जागरण पर पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने रचा था ३१२ पंक्तियों का छंद काव्‍य ” राम की शक्‍तिपूजा”। यह स्‍वशक्‍ति के जागरण का ही प्रभाव था कि मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्रीराम ने शक्‍तिपूजा के समय एक कमलपुष्‍प कम पड़ने पर अपने नेत्र को अर्पण करने का साहस किया।
और इस तरह अधर्म पर धर्म की विजय को शक्‍ति आराधना के लिए एक कमल पुष्‍प की कमी पूरी करने को अपने नेत्र देने हेतु तत्‍पर हुआ पुरुष महानायकत्‍व का सर्वोत्‍कृष्‍ट उदाहरण बन गया। अपने नेत्र देवी को समर्पित करने के लिए तूणीर उठा लिया था, सहर्ष समर्पण की ये मिसाल ही श्रीराम को भगवान और महानायक बनाती है। वो महानायक जो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के लिए प्रतिपल जुटा रहा, इसीलिए तो आज भी श्रीराम जनजन के हैं, संभवत: इसीलिए वे भगवान हैं।
निराला की पंक्‍तियों के अनुसार-
“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”
शक्‍ति की आराधना और महानायकत्‍व की स्‍थापना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, इसके लिए आज का दिन हम सनातनधर्मियों के लिए विशेष महत्‍व रखता है। जहां हम अपनी आंतरिक शक्‍तियों को जगाकर महानायकत्‍व की यात्रा की ओर कदम बढ़ाते हैं।
इस यात्रा में जो कुछ ”किंतु-परंतु” हैं भी तो वे हमारे स्‍वजागरण के बाद ही पूरे हो सकते हैं। निश्‍चित ही ना तो ये समय त्रेता युग के श्री राम का है और ना ही तूणीर उठाकर संकल्‍प सिद्धि का परंतु छोटे छोटे कदमों से ही लंबी यात्रा पूरी की जा सकती है, तो क्‍यों ना वैचारिक स्‍वतंत्रता, समाज व राष्‍ट्र को श्रेष्‍ठ, संपन्‍न व सुरक्षित बनाने के कुछ संकल्‍प स्‍वयं से किए जायें जिसमें व्‍यक्‍तिगत स्‍वतंत्रता तो हो परंतु उच्‍छृंखलता ना हो, अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी हो परंतु देश व व्‍यक्‍ति की अस्‍मिता से खिलवाड़ ना हो।
निश्‍चितत: समाज की प्रथम इकाई अर्थात् स्‍वयं हम और हमारे विकास के लिए भी स्‍वशक्‍ति का जागरण अब समय की अनिवार्यता है क्‍योंकि स्‍वशक्‍ति को जाग्रत किये बिना हम वंचित कहलायेंगे और वंचित बने रहना, दयनीय दिखते या दिखाते रहना रुग्‍णता है, और रुग्‍णता ना तो व्‍यक्‍ति को शक्‍तिवान बनाती है ना ही समाज को।
हालांकि स्‍वशक्‍ति जागरण की इस यात्रा को कुछ अतिक्रमणों से भी गुजरना पड़ रहा है जिसमें शामिल है- रात रात भर आवाजों के सारे डेसीबल तोड़ती देवीजागरण, जहां ”लाउडस्‍पीकर का शक्‍तिजागरण” तो होता है परंतु व्‍यक्‍तियों की सारी शक्‍ति इन आवाजों की भयंकरता से जूझते ही बीत जाती है।
बहरहाल समाज में मूल्‍यों की स्‍थापना के लिए महानायक अथवा महानायिका कहीं अलग से उतर कर नहीं आते, यह तो आमजन के बीच से ही निकलते हैं। शक्‍ति की आराधना के बाद भगवान राम की भांति ही सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के लिए कार्य करना ही आज के इस पर्व का अभीष्‍ट होना चाहिए।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 31 मार्च 2019

Court martial: क्‍या है और कैसे होता है, जिसका सामना कर रहे हैं मेजर गागोई

बॉलीवुड फिल्मों के चलते हमारे दिमाग में court martial की बहुत फिल्मी छवि है जबकि कोई मिलिट्री कोर्ट अपने किसी आर्मीपर्सन के खिलाफ जब ट्रायल शुरू करता है उसे ही court martial कहा जाता है. इसके बाद मिलिट्री कोर्ट अपने मिलिट्री लॉ के हिसाब से उसके अपराध के मामले में सजा देते हैं. मिलिट्री लॉ में 70 तरह के अपराधों के लिए सजा का प्रावधान है.
लगभग सारे ही देशों की मिलिट्री में कोर्ट मार्शल का सिस्टम है. अक्सर इसे तब काम में लाया जाता है जब सैनिक किसी मिलिट्री से जुड़े अनुशासन का कभी उल्लंघन होता है. कुछ देशों में जब युद्ध न चल रहा हो, ऐसे वक्त कोर्ट मार्शल का कोई प्रावधान नहीं है. फ्रांस और जर्मनी ऐसे ही उदाहरण हैं जहां पर ऐसे मामलों में ही आम अदालतें सैनिकों के मामलों की भी सुनवाई करती हैं.
court martial का इस्तेमाल युद्ध बंदियों पर युद्ध अपराध के केस चलाने के लिेए भी किया जाता है. जेनेवा कन्वेंशन में यह तय किया गया था कि युद्ध बंदी जिन पर युद्ध अपराध का केस है. उनकी सुनवाई भी वही अदालत करेगी जो आर्मी के अपना जवानों के मामलों में केस की सुनवाई करती है.
चार तरह का होता है कोर्ट मार्शल
जनरल कोर्ट मार्शल : इसमें आर्मी के जवान से लेकर अफसर तक सारे लोग आते हैं. इसकी सुनवाई करने वाले लोगों में जज के अलावा 5 से 7 आर्मी पर्सन का पैनल होता है. इस सुनवाई के बाद उसे आजीवन प्रतिबंध, सैन्य सेवा से बर्खास्त किए जाने से लेकर फांसी तक की सजा सुनाई जा सकती है. मिलिट्री लॉ के अनुसार युद्ध के दौरान अपनी पोस्ट छोड़कर भागने वाले आर्मी पर्सन को फांसी की सजा देने का प्रावधान है.
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल : इस कोर्ट मार्शल में सिपाही से लेकर जेसीओ लेवल तक के आर्मीपर्सन आते हैं. इन मामलों की सुनवाई 2 या 3 मेंबर की बेंच करती है. ऐसे मामलों में अधिकतम 2 साल तक की सजा हो सकती है.
समरी जनरल कोर्ट मार्शल : जम्मू-कश्मीर जैसे प्रमुख फील्ड इलाके, जहां अक्सर सेना तैनात रहती हो में अपराध करने वाले आर्मी पर्सन के खिलाफ इस तरह की सुनवाई होती है.
समरी कोर्ट मार्शल : यह सैन्य अपराधों के लिए सबसे निचली अदालत होती है. इसमें सिपाही से लेकर एनसीओ लेवल के आर्मी पर्सन पर इसमें केस चलता है. इसमें भी अधिकतम 2 साल की सजा दिए जाने का प्रावधान है.
किन मामलों में कोर्ट मार्शल नहीं हो सकता
आर्मी कोर्ट को दुष्कर्म, हत्या और गैर इरादतन हत्या जैसे मामलों की सुनवाई का अधिकार नहीं है. फील्ड इलाकों में भी अगर सैन्यकर्मी का कोई अपराध सामने आता है तो उसकी जांच सेना सिविल पुलिस को सौंप देना होता है. हालांकि अपवाद स्वरूप कई बार ऐसे मामलों में भी सेना सुनवाई कर चुकी है. वैसे जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में ऐसे मामले सामने आते हैं तो सेना उन्हें अपने हाथों में ले सकती है. इसमें त्वरित सुनवाई कर आरोपी को सजा देने का प्रावधान है.
दो चरणों के बाद होता है कोर्ट मार्शल
1. कोर्ट ऑफ इंक्वायरी
सेना में किसी तरह का अपराध या अनुशासनहीनता होने पर सबसे पहले कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के आदेश जारी होते हैं. जांच में आर्मीपर्सन पर लगाए गए आरोप प्रमाणित होने और गंभईर मामला होने पर जांच अधिकारी तुरंत ही सजा दे सकता है. इसके अलावा बड़ा मामला होने पर केस समरी ऑफ एविडेंस को रिकमेंड कर दिया जाता है.
2. समरी ऑफ एविडेंस
प्रारंभिक जांच में दोषी सिद्ध होने पर सक्षम अधिकारी मामले और सबूत जुटाने के लिए जांच करता है. इस आधार पर तुंरत सजा देने का भी प्रावधान है. इस दौरान सभी कानूनी दस्तावेज इकट्ठा किए जाते हैं. इनकी जांच के बाद अधिकारी तुरंत सजा या कोर्ट मार्शल के लिए रिकमेंडेशन करता है.
3. कोर्ट मार्शल
कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू होते ही आरोपी आर्मीपर्सन उसके खिलाफ आरोपों की प्रति देकर वकील नियुक्त करने का अधिकार दिया जाता है.
सजा के बाद निचली अदालत में हो सकती है सुनवाई
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल में अगर किसी आर्मी पर्सन को सजा हुई है तो वह इसे सेशन कोर्ट में चुनौती दे सकता है. वहीं कोर्ट मार्शल में सुनाए गए फैसले को आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) में चुनौती दी जा सकती है. एएफटी के फैसले से अगर अभियुक्त संतुष्ट नहीं होता तो फैसले को वह हाईकोर्ट में चुनौती दे सकता है.
सिविल कोर्ट ही नियम होते हैं फॉलो
मिलिट्री कोर्ट में ऑफिसर्स की जूरी इस मामले की सुनवाई करती है. यह सुनवाई भी सिविल कोर्ट जैसी ही होती है. आरोपी यहां भी ऑब्जेक्शन ले सकता है. अपने सबूत पेश कर सकता है. वकील रख सकता है. कोर्ट मार्शल की कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए इसमें एक एडवोकेट जनरल होता है. यह आर्मी का लीगल ब्रांच अफसर होता है.
सिविल कोर्ट की तरह ही ज्यूरी भी वैसे ही सबूतों की जांच के बाद अपराध के लिए सजा तय करती है. अगर ऊपर की कोर्ट में अपील के बाद भी आर्मीपर्सन की सजा बनी रहती है तो आरोपी इसके खिलाफ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ या राष्ट्रपति के पास अपील कर सकता है.
किस-किस सजा का है प्रावधान?
1. कोर्ट मार्शल की सुनवाई में फांसी और उम्रकैद की सजा भी दी जा सकती है.
2. आर्मीपर्सन को उसकी नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है.
3. रैंक कम करके लोअर रैंक और ग्रेड किया जा सकता है. यह एक तरह का डिमोशन होता है.
4. वेतन में बढ़ोत्तरी और पेंशन रोकी जा सकती है. आर्मी पर्सन के अलाउंसेज खत्म किए जा सकते हैं. इसके अलावा आर्मीपर्सन पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है.
5. इनके अलावा कई मामलों में सैनिक की नौकरी छीनी जा सकती है. आर्मी की नौकरी से उसे भविष्य में होने वाले फायदे जैसे पेंशन, कैंटीन की सुविधा, एक्स सर्विसमैन होने के फायदे आदि खत्म किए जा सकते हैं.

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

रामधारी सिंह दिनकर की कविता से सेना ने दी Air strike पर पहली प्रतिक्रिया

पुलवामा आंतकी हमले का बदला लेते हुए इसके 12 दिन बाद भारतीय वायुसेना ने 26 फरवरी को तड़के करीब 3 बजे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कई जगह भारतीय वायुसेना द्वारा एयर स्ट्राइक की।

आतंकवादी कैंपों पर हमले के बाद (Air strike by india) भारतीय सेना ने पहली प्रतिक्रिया व्यक्त की है. भारतीय सेना (Indian Army) ने राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता के जरिए भावनाओं का किया इजहार-
क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ, कब हारा?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।
तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।
सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।
-अलकनंदा सिंह