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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

UP Election में BJP की ”चीता चाल” तो नहीं स्मृति को हटाना ?

कहीं UP Election 2017 के लिए ये एक चीता चाल तो नहीं, कहीं स्मृति ईरानी को बड़ी जिम्मेदारी देने के लिए ही तो कम महत्व का मंत्रालय नहीं दिया गया, कहीं अमेठी में राहुल गांधी को कड़ी टक्कर देने वाली स्मृति को यूपी की कमान तो नहीं दी जा रही…?
ऐसे तमाम प्रश्न चुनावी पंडितों के जहन में तैर रहे हैं, लाजिमी भी है ऐसा होना क्योंकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाकर अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण कपड़ा मंत्रालय यदि प्रखर वक्ता और मीडिया में मोदी जी के बहुत करीबी मानी जाने वाली मंत्री को दे दिया जाए तो ये चर्चा तो होगी ही। लोग तो सोचेंगे ही कि आख‍िर उनके पर क्यों कतरे गए।
चुनावी विश्लेषक तो ये भी कह रहे हैं कि चीता सी चाल यानि ‘दो कदम आगे फिर एक कदम पीछे’ रहकर अटैक करने में विश्वास करने वाले प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, स्मृति ईरानी के लिए यूपी में किसी रोल की पटकथा तैयार कर चुके हों तो कोई हैरानी नहीं होगी।
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद आए इस बड़े बदलाव पर भले ही स्मृति का कद छोटा करने की चर्चा आम हो गई पर राजनीतिक पंडित मानते हैं कि ये स्मृति ईरानी के पर कतरने नहीं, बल्कि पर फैलाने का इंतजाम किया गया है। इसकी वजह भी है कि कपड़ा मंत्रालय के जरिए रोजगार के सर्वाध‍िक अवसर और उत्तर प्रदेश में चुनावों तक इसे जमीन पर उतारना व इसके जरिए युवा वोटरों को भाजपा तक लेकर आना। इस पूरी कवायद में एक तो स्मृति का चेहरा, उनकी आक्रामकता और रोजगार… ये तीनों ही कारण निम्न वर्ग व मध्यम वर्ग के युवाओं को भाजपा के वोट में तब्दील कर सकते हैं।
इन पॉलिटिकल पंडितों की मानें तो स्मृति ईरानी की छवि जिस तरह से युवाओं में लगातार बढ़ रही है और जिस तरह से लोकसभा चुनाव से ही वह गांधी परिवार से उनके ही गढ़ में लोहा लेती रही हैं, उसे देखते हुए उन्हें यूपी महासमर का प्रणेता बनाया जा सकता है।
भाजपा लगातार यूपी के चुनावी महासंग्राम की न सिर्फ तैयारी में लगी है बल्कि विरोधी पार्टियों की चाल को भी पढ़ने में जुटी है। मंत्रिमंडल में फेरबदल इसी का नतीजा है व इसके बाद संगठन और संघ में भी फेरबदल इसी चाल को पढ़ कर किया जाने वाला है।
कांग्रेस द्वारा जिस तरह से यूपी के लिए प्रियंका वाड्रा के रूप में ब्रह्मास्त्र छोड़ने का लगभग ऐलान किया जाना तय माना जा रहा है, उसी तरह से भाजपा भी स्मृति को मुख्यमंत्री के तौर पर यूपी चुनाव में उतार सकती है, हालांकि अभी दोनों पार्टियां इनके लिए किसी भी तरह की घोषणा से बच रही हैं।
कुछ दिन पहले हुए भाजपा के एक आंतरिक सर्वे में भले ही वरुण गांधी और राजनाथ सिंह को यूपी की कमान संभालने पर बराबर का वोट मिला हो लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि स्मृति ईरानी ने भी वहां जबरदस्त प्रदर्शन किया था। एक असम को छोड़कर कई अन्य राज्यों की भांति भाजपा मुख्यमंत्री के लिए कोई एक नाम लेकर चलने की बजाय इन तीनों को ही लेकर चले तो भी अप्रत्याश‍ित नहीं कहा जाएगा। ये उनकी पॉलिटकल स्ट्रेटजी भी रही है, इससे मुख्यमंत्री पद को लेकर आंतरिक कलह से बचा जा सकता है और हर प्रत्याश‍ित व्यक्ति की क्षमताओं का भरपूर उपयोग भी किया जा सकता है ।
जहां तक बात स्मृति ईरानी की है तो लोकसभा चुनाव के दौरान अमेठी में वह भले ही राहुल गांधी से हार गईं थी लेकिन उस चुनाव में राहुल को अगर 4 लाख वोट मिले थे तो स्मृति भी 3 लाख वोट पाकर दूसरे स्थान पर रही थीं और चुनावों के बाद भी जितनी बार स्मृति अमेठी गई हैं उतनी बार राहुल गांधी नहीं गये।
अमेठी में लोकसभा चुनाव जैसा करिश्मा करने वाली वह पहली भाजपा नेता हैं। स्मृति के इस बढ़ते कद से कांग्रेस भी एक बार सकते में आ गई थी इसलिए भाजपा आलाकमान स्मृति ईरानी के इस करिश्मे को भुलाए बिना और कैश कराना चाहती है, इसके पूरे पूरे आसार है।
बहरहाल, अभी स्मृति के कद को छोटा करने की रणनीति को किसी पनिशमेंट के बतौर सोचना जल्दबाजी होगी, वह भी उत्तर प्रदेश जैसे राजनैतिक रूप से अतिमहत्वपूर्ण राज्य के आसन्न चुनावों को देखते हुए। यही वजह रही कि कल स्मृति से उनके मंत्रालय को लेकर टिप्पणी जब की गई तो उन्होंने लगभग ठहाका लगाते हुए कहा था कि कुछ तो लोग कहेंगे और मेरा व आपका (मीडिया) साथ तो और आगे बढ़ेगा ही।
  • Alaknanda singh

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

अभ‍िव्यक्ति की आजादी: यद‍ि मैथलीशरण गुप्त जिंदा होते तो ....


जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है। वह नर नहीं, पशु निरा है और मृतक सामान है। राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त द्वारा रचित ये कविता आज बेहद प्रासंगिक हो गई है क्योंकि संसद, जेएनयू और महिषासुर दिवस से लेकर जो चर्चा मां दुर्गा के लिए आपत्त‍िजनक शब्दों तक पहुंच गई है, वह काफी कुछ बयान करती है।
संसद सत्र की शुरुआत जिस तरह के ज्वलंत मुद्दे से हुई, वह उक्त कविता की प्रासंगिकता को और पुष्ट करती है।
पहले दिन ही केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जिस तरह ''जेएनयू के छात्रों द्वारा राष्ट्र विरोधी नारों को अभ‍िव्यक्ति की आजादी ''बताए जाने पर प्रश्नचिन्ह लगाया, फिर इसी अभ‍िव्यक्ति की आजादी के बहाने उन्होंने महिषासुर दिवस मनाये जाने व मां दुर्गा के चरित्र को लेकर आपत्तजिनक पैंपलेट बांटे जाने की घटना पर उपस्थ‍ित सभी नेताओं से पूछा कि क्या यही अभ‍िव्यक्ति की आजादी है।
सचमुच अभ‍िव्यक्ति की आजादी को लेकर अभी तक जितने भी ढोंग रचे गए, स्मृति ने उन सभी ढोंगों को तार-तार कर दिया और कम से कम पहले दिन तो किसी नेता या दल की हिम्मत नहीं हुई कि वह अचानक हुए इस अकाट्य वार से स्वयं को बचा पाता।
अभ‍िव्यक्ति की आजादी को राजनेताओं ने अभी तक अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए यूज किया था और विचारों की कथ‍ित स्वतंत्रता के नाम पर उनकी सोच घातक खेल खेलकर देश के साथ विश्वासघात करती रही। अभ‍िव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश की एकता व अखंडता का मजाक उड़ाया जाता रहा।
भारतीय संविधान में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धारा 19 के तहत छह स्वतंत्रता के अधिकारों में से एक है। किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of expression) कहलाती है परंतु इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हर जगह कुछ न कुछ सीमा अवश्य होती है।
रोहित वेमुला की खुदकुशी और जेएनयू में लगे देशद्रोही नारों को लेकर बुधवार को सदन में स्मृति ईरानी अपने तल्ख तेवर में दिखीं और वामपंथी विचारधारा पर करारा प्रहार किया। जेएनयू में कुछ छात्रों की ओर से महिषासुर दिवस मनाए जाने पर सवाल खड़े करते हुए स्मृति ईरानी ने कहा कि ये छात्र महिषासुर को पूर्वज (ऐतिहासिक) मानते हैं लेकिन मां दुर्गा का अपमान करते हैं।
स्मृति ईरानी ने महिषासुर दिवस के आयोजन का एक पर्चा पढ़कर सुनाते हुए कहा कि ' मुझे ईश्वर माफ करें इस बात को पढ़ने के लिए। इसमें लिखा है कि दुर्गा पूजा सबसे ज्यादा विवादास्पद और नस्लवादी त्योहार है। जहां प्रतिमा में खूबसूरत दुर्गा मां द्वारा काले रंग के स्थानीय निवासी महिषासुर का वध करते हुए दिखाया जाता है। महिषासुर दिवस मनाने वालों के अनुसार महिषासुर एक बहादुर, स्वाभिमानी नेता था, जिसे आर्यों द्वारा शादी के झांसे में फंसाया गया। आर्यों ने एक सेक्स वर्कर का सहारा लिया, जिसका नाम दुर्गा था। दुर्गा ने महिषासुर को शादी के लिए आकर्षित किया और 9 दिनों तक सुहागरात मनाने के बाद उसकी हत्या कर दी।" स्मृति ने गुस्से से तमतमाते हुए सवाल किया कि क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? कौन मुझसे इस मुद्दे पर बहस करना चाहता है?
स्मृति ईरानी के सदन में दिए इस बयान से एक बार फिर कई सालों बाद फिर ये मुद्दा गर्म हो गया है। बीजेपी समेत कई दलों ने देवी-देवताओं के अपमान के मुद्दे पर आपत्ति जताई है।
कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने कहा कि आपकी आस्था महिषासुर में हो सकती है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि आप दूसरों की भावनाओं का अपमान करें।
 बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि ये एक बड़ी साजिश है। इसे आर्यों और द्रविड़ों की फिलॉसफी फैलाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, जो कि अंग्रेजों की थ्योरी थी।
वीएचपी नेता विनोद बंसल ने कहा कि इस देश की मूल विचारधारा इसी धर्म की है लेकिन उसके बावजूद ये सब क्यों होता है। जेएनयू में सालों से ये हो रहा है और मैं इसके खिलाफ लगातार FIR दर्ज करवाता रहा हूं लेकिन कोई कार्यवाही नहीं होती क्योंकि अगर कार्यवाही होगी तो CPI बिलबिला जाती। हालांकि अब भी सीपीआई नेता दिनेश वार्ष्णेय ने कहा कि ये मामला राजनीति से प्रेरित होकर उठाया जा रहा है क्योंकि बंगाल में चुनाव आने वाले हैं और वहां दुर्गा पूजा का बहुत ज्यादा महत्व है।
कितने आश्चर्य की बात है कि यह जहरीला विचार उसी बंगाल की धरती से उपजा जहां दशकों तक वामपंथ‍ियों का शासन रहा और दुर्गापूजा भी होती रही मगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झुनझुना इस कदर आम जन के गले में घंटी की तरह लटका दिया गया कि कोई इसके औचित्य तक पर सवाल नहीं उठा पाया और जिसने उठाया भी तो तत्काल उसे रूढ़‍िवादी और मनुवादी करार दे दिया गया।
आज भी राज्यसभा में कांग्रेस के नेता आनंद शर्मा स्मृति ईरानी से इस बात पर तो इस्तीफा मांग रहे हैं कि उन्होंने मां दुर्गा को लेकर आपत्त‍िजनक पर्चा संसद में सार्वजनिक रूप से पढ़कर सुनाया जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती थीं मगर उस हकीकत पर वे कुछ नहीं बोले कि जेएनयू में आख‍िर ये सब घटित होता रहा और वे चुप क्यों बैठे रहे ?
गौरतलब है कि साल 2012 में जेएनयू के भीतर वामपंथी छात्र संगठनों ने महिषासुर को भारत के आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों का पूर्वज बताते हुए शरद पूर्णिमा को उसकी शहादत मनाने की घोषणा की थी और जगह-जगह कैंपस में पोस्टर भी लगाए गए थे। उस वक्त जमकर बवाल मचा था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार असुरों के राजा महिषासुर का देवी दुर्गा ने वध किया था लेकिन वामपंथी फोरम से जुड़े स्टूडेंट्स मानते हैं कि महिषासुर देश के जनजातीय, दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के पूर्वज थे, जिन्हें देवी दुर्गा का इस्तेमाल कर आर्यों ने मारा था। बात इतने पर रुक जाती तो भी ठीक था, लेकिन जिस तरह से देवी दुर्गा और महिषासुर के संबंधों के बारे में कहा गया था वो शर्मनाक है।
देश ने कई दशक गुजार दिये इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाली ऊहापोह में । अब समय आ गया है कि राजनेता देश के सामने जहरीली मानसिकताओं को प्राश्रय देने से बाज आ जायें।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अभी तक जो घ‍िनौना खेल खेला जाता रहा है, उसकी बख‍िया उधड़ने लगी है और उनकी सोच सरेआम हो गई है कि वे देश के लिया कितना कुत्स‍ित सोचते रहे हैं... करते रहे हैं।
और फिर... मैथिलीशरण गुप्त की ही कविता ''आर्य'' के अंश जिस पर हर भारतीय को अभि‍मान होगा ....
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े
वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा
संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में
वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे।

अंत में इतना कहना पर्याप्त होगा क‍ि आज यद‍ि मैथलीशरण गुप्त जिंदा होते तो कुछ नेता न केवल उनसे उनकी राष्ट्रकवि की उपमा छीन लेते बल्क‍ि निज गौरव और निज देश पर अभमिान न होने वाले को पशुतुल्य व मृतप्राय: बताए जाने पर कन्हैया, उमर खालिद जैसों के साथ जेल भेजने का कोई न कोई बंदोबस्त भी जरूर कर देते।

 - अलकनंदा सिंह

बुधवार, 3 सितंबर 2014

शब्‍दों के द्वंद में शिक्षक दिवस !

'अबे सुन...' और 'सुनिए...' में कितना फर्क है ..क्‍या आप  बता सकते हैं ?
दोनों शब्‍दों को सुनकर बारी-बारी से जो पहली प्रतिक्रिया मस्‍तिष्‍क देता है...वह कितनी भिन्‍न होती है... क्‍या ये बता सकते हैं ?
जरूर बता सकते हैं, दोनों शब्‍द पुकारने के सिर्फ लहजे पर ही टिके हुए हैं, बस इतना ही ना । ठीक ऐसा ही फर्क है 'टीचर्स डे' और 'गुरू उत्‍सव' में...।
जी हां! पुकारने का लहजा...जिसमें टीचर्स कहने पर मन तरंगित नहीं होता, न ही श्रद्धा पैदा होती है परंतु यदि किसी को गुरू कहा जाये तो अनायास ही हम उस व्‍यक्‍ति के समक्ष श्रद्धावनत हो जाते हैं, वह व्‍यक्‍ति हमारे सामने हो तो हाथ उसके पांवों की ओर खुद-ब-खुद बढ़ जाते हैं जबकि टीचर्स कहने से मन में ऐसी किसी भावना का जन्‍म नहीं होता। यह सब संस्‍कारों का खेल है जो हमारे जीवन में तमाम विकृत उठापटकों के बावजूद अभी भी मन  के किसी कोने में चुपके से बहते हैं।
आज सुबह से मन बेचैन था उन बयानबाजियों को पढ़-सुनकर जो कि राजनैतिक ही नहीं बल्‍कि बौद्धिक स्‍तर पर भी मेरे सामने एक-एक करके 'ओढ़ी हुई प्रगति' के दृश्‍यों को नमूदार कर रही थीं, कि किस तरह से केंद्र सरकार द्वारा शिक्षक दिवस के उपलक्ष में स्‍कूली छात्रों को गुरू उत्‍सव संबंधी निबंध लिखने की बात करने पर कोहराम  मचाया जा रहा है ।
विपक्षी पार्टियों और कथित सेक्‍युलरवादियों द्वारा इतना हो हल्‍ला मचाया गया कि अंतत: मानव संसाधन मंत्री स्‍मृति ईरानी को कहना ही पड़ा कि मंत्रालय द्वारा सम्‍मानित करने के लिए कराई जा रही निबंध प्रतियोगिता पर इतनी आपत्‍ति जताने वालों की सोच सचमुच रहम के लायक है, और कुछ नहीं क्‍योंकि गुरू उत्‍सव एक निबंध प्रतियोगिता है और इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज़ सभी भाषाओं में आयोजित करवाया गया है। यह शिक्षकों के योगदान का उत्‍सव है ।
निश्‍चित ही इसका विरोध करने वाले नहीं चाहते कि नई पीढ़ी को दिशा दिखाने वाले शिक्षकों को सम्‍मानित किया जाये और इतना ही नहीं सम्‍मान देने वाले बच्‍चों में अपने शब्‍दों से उन्‍हें सम्‍मानित करने की होड़ लगे ।
इन कथित समाजवादियों की सोच का ही परिणाम है कि हमारी समृद्ध परंपराओं में से एक गुरू-शिष्‍य परंपरा को मात्र शिक्षक और विद्यार्थी के दायरे में समेट दिया गया है। जहां शिक्षा देने  वाला एक दुकानदार की भूमिका में आता गया और विद्यार्थी एक उपभोक्‍ता बनकर उनका शिकार बनता रहा।
नतीजा हम सबके सामने है कि ना विद्यार्थी शिक्षकों का सम्‍मान कर पाते हैं और ना ही शिक्षक उन्‍हें अपना ज्ञान दे पाते हैं, अव्‍वल तो चल चला कर सारी बात हताशा से उपजे एक जर्जर से बयान पर आकर  टिक जाती है कि ''क्‍या करें...हमारे जमाने में गुरू जी के सामने गर्दन नहीं उठा पाते थे, मगर अब देखो बच्‍चे उन्‍हें सम्‍मान ही नहीं देते फिर पैर छूना तो दूर...चाहे जहां, चाहे जैसे मिसबिहेव कर देते हैं...छात्रों और शिक्षकों में मारकुटाई तो इतना आम हो गया है कि पूछो मत...ज़रा सा कुछ कहो तो सौ सौ आफतें ...कभी छात्रों के हमले तो कभी अभिभावकों के जोर-जंग आदि आदि ।'' ये रोतलू-टाइप शिकायत हर उस व्‍यक्‍ति से सुनने को मिल जायेगी जो उम्र के चौथे या पांचवें दशक में चल रहा होगा, जिसने शिक्षा का उदारीकरण भी भलीभंति देखा होगा और उसके सामाजिक दुष्‍परिणाम भी ।
 हालांकि इस उदारीकरण में कौन उदार हुआ और कौन निष्‍ठुर, किसने कितना पाया और किसने कितना खोया या संस्‍कारों की बलि देकर हमने ग्‍लोबलाइजेशन की जो चकाचौंध हासिल की, वह कितनी अपनी है और कितनी पराई  ...आदि । यह बहस बहुत लंबी खिंचेगी इसलिए आज इस पर इतना ही। बात सिर्फ उस लहजे की है जो एक शब्‍द के उच्‍चारण मात्र से नई पीढ़ी की दशा व दिशा तय कर सकती है ।
शिक्षक दिवस को टीचर्स डे कहा जाये या इसे गुरू उत्‍सव  बताकर इस पर निबंध की प्रतियोगिता आयोजित की जाये, इसे स्‍कूलों में किस तरह मनाया जाये, या इसे प्रधानमंत्री संबोधित करें तो वे कैसे  करें...बच्‍चे प्रधानमंत्री के भाषण से कितने प्रभावित  होंगे ...आदि खोखली बातें इस बारे में सोचने पर विवश कर सकती है कि केंद्र सरकार भले ही भाजपा की हो या भले ही उस पर संघ की सोच का ठप्‍पा लगा हो मगर हम सब इस बात से तो सहमत ही होंगे कि बीते दशकों में ना केवल शिक्षा का स्‍तर गिरा है बल्‍कि संस्‍कारों की भी बलि चढ़ गई और ये बलि कुछ इस तरह चढ़ी कि गुरू को गुरू मानना तो बहुत दूर की बात, किसी शिक्षक पर किसी छात्र या छात्रा को भरोसा नहीं रह गया, कोई शिक्षक अब छात्र को अपने बच्‍चे की तरह देखने को तैयार नहीं। इस राजनीति से क्षति तो दोनों की हुई ना, इस टूटते भरोसे के बारे में सेक्‍युलरवादी क्‍या संघ या भाजपा को ही दोषी ठहरायेंगे ।
हद तो तब हो गई जब सुना कि अभिषेक मनु सिंघवी कह रहे हैं कि यह मासूम बच्‍चों के दिमाग  को प्रभावित करने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का सीधा उदाहरण है। तो सिंघवी से यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्‍या महिला वकील को जज बनवाने का लालच देकर उसके साथ अंतरंग होने में क्‍या सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग नहीं था । कम से कम सिंघवी जैसे लोग तो अपना मुंह ना ही खोलें तो अच्‍छा। नैतिकता या शुचिता की बातें उन्‍हीं के  मुंह से अच्‍छी लगती हैं जो स्‍वयं भी नैतिक दृष्‍टि रखता हो।
बहरहाल, किसी को सम्‍मान देकर यदि हम अपने बच्‍चों के लिए भरोसा कमा पायें तो इस शिक्षक दिवस पर यह बहुत बड़ी कमाई होगी।
अपने लिए ना सही अपनी पीढि़यों के लिए कुछ तो वृहद सोच अपनानी ही होगी और राजनीति व कथित बौद्धिक विवेचनाओं से अलग होकर बच्‍चों को शिक्षित ही नहीं संस्‍कारवान कैसे बनाया जाये, यह भी विचारना होगा ताकि वे स्‍वयं देश के बेहतर नागरिक बन सकें, तो क्‍यों ना हम अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिए अपनी सोच को भी थोड़ा संस्‍कारों की ओर ना मोड़ें । लीक से हटकर फिर से सोचें कि पिछले दशकों में जो गंवा चुके हैं, उसे वापस कैसे लाया जाये । बात सिर्फ लहजे की ही तो है...'अबे सुन...' की जगह 'सुनिए...' को अपनाकर तो देखिए ।   
- अलकनंदा सिंह