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रविवार, 26 अप्रैल 2026

अलविदा रघु राय! भोपाल त्रासदी, सिख दंगे... कैमरे में कैद भारत का इतिहास


 उनकी हर तस्वीर में धड़कती थी जिंदगी… कैमरा से इतिहास रचने वाले रघु राय की कमी खलती रहेगी... 

महान फोटो जर्नलिस्ट रघु राय का निधन एक युग का अंत है. उन्होंने भारतीय फोटोग्राफी को नया आयाम दिया, तस्वीरों में कहानियां गढ़ना सिखाया. पद्मश्री से सम्मानित राय ने अपनी कला, कौशल और तकनीकी ज्ञान से स्टिल फोटो में जान फूंक दी. भोपाल गैस त्रासदी और वन्यजीवन पर उनकी तस्वीरें अविस्मरणीय हैं.


भारत के जाने-माने फोटोग्राफरों में शुमार रघु राय का रविवार तड़के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. वे 83 वर्ष के थे। रघु राय ने अपनी कैमरे की नजर से भारत के विविध रंगों और जीवन के अनेक पहलुओं को दुनिया के सामने पेश किया. उनके बेटे और फोटोग्राफर नितिन राय ने बताया, 'पिता को दो साल पहले प्रोस्टेट कैंसर हुआ था, जिसका इलाज हो गया था, इसके बाद कैंसर पेट तक फैला, वह भी ठीक हो गया, हाल ही में कैंसर उनके मस्तिष्क तक पहुंच गया था और उम्र से जुड़ी अन्य समस्याएं भी थीं'. उनके पीछे पत्नी गुरमीत, बेटा नितिन और बेटियां लगन, अवनी और पूर्वाई हैं. उनके निधन से मीडिया और कला जगत में शोक की लहर है. 


इस एक फ्रेम ने भोपाल गैस हादसे की भयावहता को दुनिया के सामने रख दिया. आज जब रघु राय हमारे बीच नहीं हैं, तो लोग उनकी इसी यादगार तस्वीर यादगार तस्वीर को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं. रघु राय का जन्म 1942 में झंग (अब पाकिस्तान) में हुआ था. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1960 के दशक में की. शुरुआत में वह सिविल इंजीनियरिंग से जुड़े थे, लेकिन बाद में फोटोग्राफी की ओर मुड़े. उनके भाई एस. पॉल ने उन्हें इस क्षेत्र में प्रेरित किया. एक साधारण शुरुआत ने आगे चलकर उन्हें दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फोटोग्राफरों में शामिल कर दिया. 


1966 में रघु राय ने ‘द स्टेट्समैन’ अखबार में चीफ फोटोग्राफर के रूप में काम शुरू किया. यहीं से उन्हें पहचान मिलने लगी. उनकी तस्वीरों में आम लोगों की जिंदगी और समाज की सच्चाई झलकती थी. इसके बाद उन्होंने ‘संडे’ मैगजीन और फिर ‘इंडिया टुडे’ में काम किया, जहां उन्होंने फोटो जर्नलिज्म को नई दिशा दी. 


रघु राय का ‘इंडिया टुडे’ के साथ जुड़ाव बेहद खास रहा. 1980 के दशक में उन्होंने यहां कई यादगार फोटो स्टोरीज कीं. उनकी तस्वीरों ने भारतीय पत्रकारिता की विजुअल पहचान को मजबूत किया. उनके काम को उस दौर की सबसे प्रभावशाली फोटो जर्नलिज्म में गिना जाता है. 1977 में रघु राय को मशहूर फ्रेंच फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसों (Henri Cartier-Bresson) ने Magnum Photos से जुड़ने के लिए नामित किया. यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय बने. इससे उन्हें वैश्विक पहचान मिली. उनकी तस्वीरें TIME, LIFE, न्यूयॉर्क टाइम्स और नेशनल जियोग्राफिक जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं. रघु राय ने भारत के कई बड़े ऐतिहासिक घटनाओं को कैमरे में कैद किया. 1984 की भोपाल गैस त्रासदी की उनकी तस्वीरें आज भी उस दर्द को बयां करती हैं. इसके अलावा उन्होंने 1971 के बांग्लादेश युद्ध, इमरजेंसी और सामाजिक बदलावों को भी अपने कैमरे में दर्ज किया. उनकी तस्वीरें सिर्फ फोटो नहीं, बल्कि इतिहास का दस्तावेज हैं. 


उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मदर टेरेसा, बाला साहेब ठाकरे और सत्यजीत रे जैसे बड़े व्यक्तित्वों की तस्वीरें खींचीं. उनकी खासियत थी कि वह इन हस्तियों के मानवीय पहलुओं को सामने लाते थे. उनकी फोटो में सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की कहानी भी नजर आती थी.


रघु राय को 1972 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया. 1992 में उन्हें ‘फोटोग्राफर ऑफ द ईयर’ का खिताब मिला. इसके अलावा उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड सहित कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले. उनके काम को दुनिया भर में सराहा गया और उन्हें फोटोग्राफी के क्षेत्र में एक आइकन माना गया.


- Alaknanda Singh 

सोमवार, 11 अगस्त 2025

सिविक सेंस जब तक नहीं आयेगा, तब तक इसी तरह दुत्कार जाते रहेंगे


 भारत के लोग हर जगह शोर मचाते हैं कि उनके लोग सभी बड़ी से बड़ी तकनीकी कंपनियों में छाये हुए हैं, वह सिलिकॉन वैली के रीढ़ हैं, वह अमेरिका से लेकर यूरोप तक सबसे अधिक कमाई वाले लोग हैं, उनके बच्चे सबसे अच्छी डिग्री लेने वाले लोग हैं, बावजूद उसके उनको जो सम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। 


भारत के लोगों को दुनिया में तब तक सम्मान नहीं मिलेगा जब तक उनको कुछ आधारभूत सउर नहीं होगा, बेशऊर आदमी को दुनिया में सम्मान मिलना भी नहीं चाहिए। भारत के लोगों के अंदर साफ़ सफ़ाई, व्यवस्थित रहने का ढंग, सिविक सेंस जब तक नहीं आयेगा, वह इसी तरह दुत्कार जाते रहेंगे। 

हर शहर के एक दो क्षेत्रों को छोड़ दिया जाय, गंदगी गोबर कूड़ा कीचड़ प्लास्टिक फैला हुआ मिलता है। हर चौराहा चाहे वह नया ही क्यो न बने, बिलकुल उस से सटकर दुकानें खोल दी जाती हैं, फिर वही गाड़ियाँ खड़ी हो जाती हैं, ई रिक्शा, टेम्पो से लगाए बस तक वाहन सवारी भरती हैं, पूरे शहर का ट्राफिक बर्बाद हो जाता है। कोई नेशनल हाइवे हो और शहर से गुजरता हो तो बिलकुल उसी के सामने दुकानें, प्रतिष्ठान खोल दिया जाता है, कोई सरकारी अथारटी भी यह नियम नहीं बना रही की सड़क जो की किसी भी राष्ट्र की धमनी होती हैं उसे ऐसे ब्लॉक नहीं किया जा सकता। देश में बहुत बड़ी मूक क्रांति हुई, हाथ से चलने वाले रिक्शे मात्र सात आठ साल में समाप्त हो गये और उनका स्थान ई रिक्शे ने ले लिया लेकिन किसी भी संस्था संगठन पार्टी, सिविल सोसाइटी से लगाए आम नागरिकों तक को यह नहीं लगा कि वह इन लोगों को यह शऊर सिखाए कि सड़क पर कैसा व्यवहार करना है? चौराहे पर यह सैकड़ों की संख्या में खड़े होकर जाम न लगाए इसका इंतज़ाम हो। 

आज़ तक आम नागरिकों ने भी मुद्दा नहीं उठाया कि हर बड़े चौराहे के सौ मीटर दूरी पर सरकार ज़मीन अधिग्रहण करे और सवारी उठाने की अनुमति केवल वहीं रहें। पुराने से पुराने रेस्टोरेंट, मिठाई के दुकान, जूस के दुकान खुले हैं, चाय नाश्ते की दुकान हैं, लेकिन न ग्राहकों की यह माँग है कि वह साफ़ सुथरा हो, कालिख से मुक्त हो, मक्खी वहाँ न भीनके। फिर लोग कहते हैं कि विदेश के लोग भारत के खाने पीने की दुकानों का गंदा गंदा वीडियो बनाकर बदनाम करते हैं। वह बदनाम नहीं करते, केवल आईना दिखाते हैं। तमाम इंस्टाग्राम और रील के माध्यम से पुराने पुराने प्रतिष्ठानों के वीडियो आते हैं, वह सब रोज के लाख लाख रुपया कमाते हैं लेकिन कोई यह नहीं कहने वाला है की इतनी गंदगी क्यों फैलाए रहते हो? 

लोग घर बनवाते हैं लेकिन एक इंच ज़मीन नहीं छोड़ते फिर सड़क पर स्लोप बनवाते हैं कि गाड़ी चढ़ाने की व्यवस्था हो, पूरी बेशर्मी से इस क़ब्ज़ेबाज़ी को अपना अधिकार समझते हैं। अच्छे से अच्छे कालोनी में करोड़ों का घर बनता हैं लेकिन सामने नाला खुला रहता है और इन्हें उससे दिक्कत भी महसूस नहीं होती। यह जीवन की सामान्यता बनी हुई है। कुत्ता पाल लेंगे लेकिन उसे सुबह सुबह हगाने जायेंगे दूसरे के घर के सामने। भला हो मोदी जी का जिन्होंने कम से यहाँ के लोगों को हगना सीखा दिया वरना कई जगहों पर तो निकलना मुश्किल था। लोग गरीब हैं, मैं उनकी ग़रीबी से संवेदनशीलता रखता हूँ लेकिन इतना भी क्या बेसउर होना कि दो दो दिन बच्चों की नाक भी पानी से साफ़ नहीं करना? उनके कपड़े पाँच पाँच दिन एक ही पहना कर रखना? 

सड़क पर चलेंगे तो नियम नहीं मानना, नशा भी ऐसा सीखा की देखने मे भी गंदे दिखते हैं, फिर गुटखा खा खाकर सड़क, ऑफिस, घर से लगाये लिफ्ट तक गंदा करते है। उसके बाद बीमारी भी गंदी होती है। खाना खायेंगे तो बहुत जगह मक्खी भिनकते रहना सामान्यता बनी हुई है। घर बनवायेंगे तो बाथरूम और टॉयलेट इतने कम जगह में बनवायेंगे की मानो वह कोई बहुत महत्वपूर्ण चीज नहीं है। कुल मिलाकर साफ़ सफ़ाई सबसे पीछे छूटा हुआ है। अच्छे कमाई करने वाले लोग भी अपने घर में एक एक बेडशीट, तकिये का कवर इतने इतने दिन तक इस्तेमाल करते हैं कि उसमें तेल की इतनी मोटी परत बन जाती है कि पूछिए ही नहीं। कूड़ा निकालेंगे तो घर के बाहर फेक देंगे। कार से चलते हुए प्लास्टिक, चिप्स की पन्नी कहीं भी फेंक देंगे। सुंदर से सुंदर तालाब हो, झील हो, झरना हो सब प्लास्टिक, बोतल आदि से भरे मिलते हैं। कोई सौंदर्य बोध नहीं, कोई रचनात्मकता नहीं। 

बिना सौंदर्य बोध, रचनात्मकता, व्यवस्थित रहने की चाह, सुंदरता के भारत के लोगों को कभी दुनिया में सम्मान नहीं मिल सकता, चाहे आपके पास कितना पैसा हो या कितनी बड़ी डिग्री हो। सिविक सेंस विहीन समाज कभी सम्मान नहीं पा सकता, इसलिए यह मुद्दा भी हमारे दृष्टि में होना चाहिए। इस विषय में हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम ने इसे कभी समस्या माना ही नहीं और हम गंदगी में रहना एक सामान्यता मान चुके हैं।


बुधवार, 6 मार्च 2024

भारत में अबॉर्शन को लेकर क्या कहता है कानून, जानें


 फ्रांस ने महिलाओं को गर्भपात का संवैधानिक अधिकार देने के बाद फ्रांस की राजधानी पेरिस में एफिल टॉवर पर हजारों की तादाद में महिलाएं पुरुष जमा हुए थे फ्रांस के एक ऐतिहासिक फैसले का जश्न मनाने. टॉवर पर लाइट्स के साथ बड़े बड़े अक्षरों में My Body My Choice लिखा था. 

फ्रांस ने महिलाओं को गर्भपात का संवैधानिक अधिकार देने के बाद ऐसा करने वाला वो दुनिया का पहला देश बन गया है. फ्रांस में पिछले कई दिनों से महिलाओं को गर्भपात का अधिकार दिए जाने की मांग की जा रही थी. इसे लेकर कई सर्वे भी कराए गए थे, जिनमें 85% लोगों ने इसका समर्थन किया था.

पुर्तगाल से लेकर रूस तक 40 से अधिक यूरोपीय देशों में महिलाएं गर्भपात की सुविधा ले सकती हैं लेकिन इस शर्त पर कि गर्भावस्था कितने दिनों की हो गई है.

आइये जानते हैं क‍ि अबाॉर्शन को लेकर भारत में क्या नियम हैं- 

2023 में भारत में गर्भपात का मुद्दा काफी सुर्खियों में रहा था. 26 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला गर्भपात की गुहार लगाते सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी. पर उस महिला को आखिर में निराशा ही मिली जब सुप्रीम कोर्ट ने 26 हफ्ते का गर्भ गिराने की अनुमति देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि चूंकि महिला 26 हफ्ते और पांच दिन की गर्भवती है, इसलिए गर्भावस्था को समाप्त करना कानून का उल्लंघन होगा. कानून कहता क्या है?

भारत में गर्भपात को नियंत्रित करने वाले कानून का नाम है-मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971. एक रजिस्टर्ड चिकित्सक गर्भपात कर सकता है. पर कुछ शर्तो के साथ. पहला अगर प्रेगनेंसी से महिला के मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को खतरा हो. दूसरा अगर भ्रूण के गंभीर मानसिक रूप से पीड़ित होने की संभावना हो. तीसरा यह कि अगर डॉक्टर को लगता है कि प्रसव होने पर महिला को शारीरिक असामान्यताएँ होंगी तो अबॉर्शन का अधिकार है.

ऐसे कई मामले सुनने को मिलते हैं कि कोई महिला गर्भनिरोधक लेने के बावजूद गर्भवती हो जाती है. इस स्थिती में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 में कहा गया है कि इसे गर्भनिरोधक नाकामी का नतीजा माना जाएगा और और गर्भपात की अनुमति होगी. इसके अलावा 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अविवाहित महिला को भी 24 हफ्ते तक गर्भपात कराने की अनुमति दिया जाना चाहिए. रेप के मामले में भारत का कानून कहता है कि 24 हफ्ते तक का अबॉर्शन कराया जा सकता है.

- Alaknanda Singh