मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

नीरज-शहरयार पुरस्कार हेतु आवेदन आमंत्रित

Gopal_Das_Neeraj-and-shaharyar-aligarh
अलीगढ़। अपर जिलाधिकारी नगर एवं प्रभारी अधिकारी प्रदर्शनी अलीगढ़ ने अवगत कराया है कि राजकीय औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी द्वारा अच्छे और स्तरीय काव्य लेखकों को प्रोत्साहित करने हेतु हिन्दी-उर्दू सेवा के काव्य विधाओं पर पुरुस्कार दिये जायेंगे। पुरस्कार हिन्दी कवि एवं उर्दू काव्य लेखक को दिया जायेगा।
गौरतलब है कि रख्यात शायर व ज्ञानपीठ विजेता प्रो. कुंवर अखलाक मुहम्मद खान उर्फ शहरयार ने कई फिल्मों के लिए गाने लिखे। ‘उमरावजान’ के गाने तो आज भी हर किसी की जुबान पर हैं। दर्जनों नामचीन पुरस्कार पा चुके शहरयार को वर्ष 2008 में साहित्य का सर्वोच्च ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। पुरस्कार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के हाथों नवाजा गया। वे उर्दू के चौथे शायर थे, जिन्हें ज्ञानपीठ से नवाजा गया। उन्होंने वर्ष 1978 में गमन, वर्ष 1981 उमरावजान और वर्ष 1986 अंजुमन के लिए गाने लिखे।इसी तरह गोपालदास नीरज ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह पुरुस्कार 1,01000(एक लाख एक हजार) रूपये का होगा जिसमें 18 वर्ष से 50वर्ष तक के कवि भाग लें सकेंगे। जो कवि इस प्रतियोगिता में भाग लेना चाहता है वह अपनी रचनाओं की 07 प्रतियों का सैट बनाकर,एवं जीवन-वृत्त के साथ जन्मतिथि प्रमाण पत्र भी  03 मार्च तक 2015 तक अपर जिलाधिकारी अलीगढ़ के कार्यालय में भेज सकता है । उन्होंने आगे बताया कि कवि आवेदन के रूप में अपनी कृति का नाम, अपना नाम, उम्र, जन्म स्थान, मोबाइल नं0 उत्तर प्रदेश में रहने का 10 साल का प्रमाण पत्र, काव्य की विधा/विषय, प्रकाशन का वर्ष, प्रकाशक का नाम और पता के साथ प्रमाणित करते हुए कि मेरे द्वारा रचित काव्य नाम कृति स्वेप्ररणा से स्वरचित है ।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

पुस्तक मेला : आवाज़ों के बाजारों में खामोशी पहचाने कौन....

कुछ इसी अंदाज़ में विश्व पुस्तक मेला अपनी आखि‍री रस्म को निभाता अगली साल के लिए अपना साजोसामान जुटा ले गया और साथ ही यह भी बता गया कि अब साहित्य को पाठक से ज्यादा बाजार की आवश्यकता है जो समय समय पर अपने कलेवरों के नये रुख से बाजार को अवगत कराता रहे और बुद्धि से ज्यादा वो खनकते सिक्कों में नज़र आए।
बाजार की इन आवश्यकताओं की फेसबुक पर साहित्यकारों द्वारा पोस्ट की जाने वाली ' पुस्तक विमोचन की तस्वीरों'  की भरमार ये चुगली कर गई कि तमाम सफलताओं के दावों के बाद भी पुस्तक मेले में आम साहित्य प्रेमियों की अपेक्षा प्रोफेशनल साहित्यकारों की भीड़ ज्यादा रही।

साहित्‍य भी बाजार की भाषा गढ़ने लगा है ,  बोलने लगा है । ऐसे में कालजयी कृतियां भला कैसे जन्‍म ले सकती हैं। प्रेमचंद की गंवई कहानियां आज भी प्रासंगिक हैं, दिलों पर राज करती हैं, निपट निरक्षर कबीरदास,सूरदास, रहीम रसखान पर शोधकार्य चल रहे हैं कि उनकी सोच ऐसी उनका विचार वैसा टाइप...आदि आदि।
कभी सोचें तो मिलेगा कि चाहे आधुनिक काल के प्रेमचंद हों या भक्‍तिकाल के वो कवि सभी बाजार के शस्‍त्र और बाजार के नियमों से अनभिज्ञ ही थे।उन्‍हें चिंता नहीं थी कि किसी संपादक या किसी प्रकाशक या किसी पीआर को इंप्रेस करना है तभी जाकर वो फेमस हो पायेगा , ऐसा ना करने की सूरत में उसे कोई देखना भी गवारा नहीं करेगा।
बाजार दिलों की भाषा नहीं जानता, अलबत्‍ता जरूरतें जानता है और इन्‍हीं जरूरतों का सौदा करने में आनंद महसूस करता है। बाजार ऐसी शै है कि जिसके कदम जहां भी पड़े, ज़हनी रूमानियत गायब होती गई। मानवीय दृष्‍टिकोण से सोचने का तरीका ही बदलता गया। क्‍वालिटी पर क्वांटिटी पर भारी पड़ती गई मगर उसका खुद का वजन भी तो हवा होता गया ,सोचने के दृष्ट‍िकोण हल्‍के  होते गये। पुस्तक मेलों का नजारा बताने को काफी है कि आज भी क्‍वालिटी पर क्‍वांटिटी भारी पड़ रही है। क्‍वांटिटी का  अपना गणित होता है कि कैसे भी छा जाओ, हावी हो जाओ। बाजार किसी भी वस्‍तु की आत्‍मा को मानवीय जैसे शब्‍दों पर नचाता जरूर है मगर वह रूह तक बस जाने की क्षमता नहीं रखता ..... तभी तो कालजयी कृतियों से हम दूर से दूर हो गए  हैं । बाकी जो कसर बाकी थी वो हिंग्लिश ने पूरी कर ही दी है। बहरहाल पुस्तक मेले से है लौटकर आने वालों को मालूम है जन्न्त की हकीकत लेकिन ....

साहित्य में प्रोफेशनलिज्म का ये नया आयाम दिखा। इसी प्रोफेशनलिज्म को दिखाया उन साहित्यकारों ने जो जीवन भर साहित्य की एबीसी तलाशते रहे और उम्र के अपने आखिरी दौर में एक किताब लिखकर  किसी न किसी बड़े नामचीन साहित्यकार को कैप्चर कर उससे अपनी पुस्तक का विमोचन करा मारा। कई अवसरों पर तो पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान भीड़ के रूप में साहित्यप्रेमी नहीं, बल्कि लेखक के आत्मीय व्यक्ति अधि‍क देखे गये ।ये बात कड़वी है मगर खरी खरी है।
अधिकांशत: देखा गया है कि पुस्तक मेलों में  दर्जनों पुस्तकों का लोकार्पण नामी-गिरामी साहित्यकार करते हैं। कई बार तो ये विमोचन करने वाले साहित्यकार, विमोचित हो रही पुस्तक के बारे में पढ़ना तो दूर की बात, अपना लिखा भी कभी दूसरी बार नहीं पढ़ पाते लेकिन लेखक मंच पर शान से पुस्तकों को हाथ में लेकर फोटो खिंचवाने की प्रक्रिया बदस्तूर जारी रहती है।
बेहद उबाऊ रहता है ... एक पुस्तक के बाद दूसरी पुस्तक का विमोचन और उस पर लंबी-लंबी निरर्थक चर्चाएं। जिनका वाकई कोई मतलब नहीं निकलता। ये चर्चाएं न तो आम साहित्यप्रेमियों तक पहुंचती हैं, और न ही उन्हें याद रहती हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले ही उस किताब के बारे में ‘बहुत अच्छी-अच्छी’ बातें की होती हैं।
पता तो ये भी चला है कि पुस्तक विमोचन के इस कार्यक्रम को करने कराने में न तो बड़े प्रकाशक पीछे हैं और न ही छोटे प्रकाशक। पुस्तकों पर परिचर्चा आयोजित तो होती है, लेकिन महज मंचीय हसी-मजाक से आगे कोई बात बढ़ ही नहीं पाती। परिणति होती है चाय-पान से। और फिर परिचितों के हाथ में पुस्तकें थमाकर विदा कर दिया जाता है। इन लोकार्पण कार्यक्रमों बाढ़ से सोशल मीडिया साहित्यकारों व विमोचकों की  तस्वीरों के लगाने का जो सिलसिला 15 फरवरी से शुरू हुआ है लेकिन चलेगा महीनों । तैयार रहिए्गा .... यानि कुछ कुछ खट्टी...  कुछ कुछ मीठी ।
  यहां विमर्श और साहित्य से जो दूर चला गया उसी पुस्तक मेले के बारे में तो बस इतना ही कह सकती हूं  कि  ....

ये वही आलमे दौर है , ये वही निशां हैं लफ़्जों के
जहां गुफ्तगू होती नहीं बस शोशेबाजी चस्पा है ....

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

सैफई का समाजवाद : अंडर द कार्पेट

देश की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ऐसे कई नेता हुए जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख बदल दिया जिनमें से एक थे राममनोहर लोहिया। राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डॉ. लोहिया ऐसी समाजवादी व्यवस्था चाहते थे जिसमें सभी की बराबर हिस्सेदारी रहे।
लोहिया कहते थे कि सार्वजनिक धन समेत किसी भी प्रकार की संपत्ति प्रत्येक नागरिक के लिए होनी चाहिए। वे  रिक्शे की सवारी नहीं करते थे, कहते थे एक आदमी एक आदमी को खींचे यह अमानवीय है।
कल से सोचने पर विवश कर रही हैं ये खबरें कि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव सैफई में उनके पोते और सांसद तेज प्रताप सिंह के तिलक के लिए व्यापक इंतज़ाम किए गए हैं ।
जब से देखा कि सैफई की शाही शादी में समाजवाद की धज्ज‍ियां उड़ाई जा रही हैं तब रहा नहीं गया लोहिया के इन कथित फॉलोअर्स के '' समाजवाद''  की आखि‍र ये कौन सी परिभाषा है।  जो कल तक प्रधानमंत्री  के सूट की कीमत पर भर भर आंसू बहा रहे थे , वे ही आज निजी समारोह पर पानी की तरह सरकारी और निजी कोष लुटा रहे हैं ।
ये राजनीति का कौन सा रूप है ? निश्च‍ित ही समाजवाद की इस परिभाषा को फिर से परिभाषित करने की जरूरत आ गई है कि जिस विरासत पर ये नेता अपना साम्राज्य स्थापित करते गये और कुनबे दर कुनबे ने पूरे के पूरे प्रदेश में अराजक राज के सारे पैमानों को तोड़ दिया,  आखिर ये समाजवाद का कौन सा रूप है ।
आज के इन समाजवादियों का शाही अंदाज़ राम मनोहर लोहिया के आख‍िर कौन से मूल्यों को महिमा मंडित किया जा रहा है ।
जी हां, मुलायम सिंह के बड़े भाई के पोते तेज प्रताप की शादी आरजेडी प्रमुख लालू यादव की सबसे छोटी लड़की राजलक्ष्मी से हो रही है जिसमें ....

अतिविशिष्ट लोगों के लिए  400 अत्याधुनिक टेंट लगाए गए हैं जो स्वि‍ट्जरलैंड से आयात किये गये हैं।
बिहार के मेहमानों के लिए ख़ासतौर पर स्विस कॉटेज वाला एक हिस्सा अलग कर दिया गया है।
1,500 लोगों के लिए सामान्य कॉटेज तैयार किए गए हैं।
1.25 लाख लोगों के लिए भोजन तैयार किया गया है और पानी के 100 टैंकर लगे हुए हैं।
इस मौके पर क़रीब 100 किस्म के व्यंजन पेश किए जा रहे हैं।
अतिविशिष्ट लोगों के लिए दिल्ली और मुंबई के पांच सितारा होटलों के खानसामा खाना तैयार कर रहे हैं।
इस तिलक समारोह के सुरक्षा इंतज़ाम में 3,000 पुलिस बल लगे हुए हैं जिनमें 12 आईपीएस रैंक के अधिकारी भी शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश के 30 ज़िलों के पुलिसकर्मियों को सैफ़ई बुलाया गया है।
यहां पांच सुपर एंबुलेंस और 500 सरकारी वाहन भी सेवा देने के लिए उपलब्ध हैं।
इटावा ज़िले के कई होटलों ने भी इस समारोह की वजह से बाहरी बुकिंग बंद कर दी है।

ये तो वो जानकारी है जो मीडिया के ज़रिए बाहर आ पाई है , बहुत कुछ ऐसा भी होगा जो '' अंडर द कारपेट''  होगा ।
जो भी हो राजनेताओं के मुंह लगा राजकाज का ये खून समाजवाद की नई परिभाषा गढ़ने लगा है ।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

ये तो होना ही था ... शाह जी !

1946 में लिखी बाबा नागार्जुन की ये कविता ईश्वर के प्रति आस्था की मांग के बजाय अनास्था मांगती है जो वैचारिक साहस था उनका। उस समय इस कविता को दो तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा, एक तो आश्चर्य का भाव देतीं और दूसरी निंदा का। आपातकाल के पश्चात् प्रकाशित हुए अपने कविता संग्रह 'हजार हजार बाहों वाली' में कल्पनाजनित ईश्वर से कुछ यूं बतियाते हैं बाबा ...



कल्पना के पुत्र हे भगवान।
चाहिए मुझको नहीं वरदान।।
दे सको तो दो मुझे अभिशाप।
प्रिय मुझे है जलन प्रिय संताप।।
चाहिए मुझको नहीं यह शान्ति।
चाहिए संदेह उलझन भ्रांति...।।


ईश्वर से अपने लिए अभि‍शाप, जलन, संताप, संदेह, उलझन भ्रांति मांगती यह कविता उस आमजन की कविता है जो आज के संदर्भ में एकदम फिट बैठती है कि जब इतना सब नकारने के साधन होंगे तो व्यक्त‍ि ना आलस्य करेगा और ना ही अहंकार की भावना उसमें आएगी। समस्याओं को नज़रंदाज कर देने से वे टलती नहीं,  बल्क‍ि और विशालतम रूप में सामने आती हैं। जब ईश्वर वरदान की जगह इतने  सारे कारण दे देगा चिंताओं के, तो निगाहें चौकस रहेंगी ही।
बाबा की कविता भाजपा के हार के कारणों पर सटीक बैठती है । दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जबर्दस्त जीत भारत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक 'निर्णायक मोड़' और भारतीय जनता पार्टी जैसी बड़ी पार्टी के लिए भारी पराजय का सबब है। वो  अपनी पराजय के कारण तक नहीं ढूढ़ पा रहे।

दिल्ली की जनता ने लोकतंत्र की महानता को एक बार फिर साबित कर दिखाया। कुछ ऐसा ही  लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत से जिताकर जनता ने दिखाया था।
हालांकि आम आदमी पार्टी से लेकर ममता बनर्जी तक इस जीत का क्रेडिट ले रही हैं मगर ये इनकी विजय कम, उन मुद्दों की हार ज्यादा है जो जनता को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दिला पाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी प्रयासों को छोड़कर विदेश नीति पर अच्छे परिणाम आने का मतलब ये तो नहीं हो जाता कि पूरी सरकार अच्छा ही काम कर रही है।

दिल्ली के नगर निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार, जनता की बजाय बिजली कंपनियों के हित में लिए गये केंद्र सरकार के निर्णयों ने इस हार की नींव को और पक्का ही किया ।

दिल्ली में सुरक्षा की जिम्मेदारी तो केंद्र की ही थी, तो फिर आए दिन लड़कियों के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा।

डीजल, पेट्रोल के दाम उत्तरोत्तर कम होते गये मगर खाद्य वस्तुओं के दाम जस के तस हैं। प्रधानमंत्री का स्वच्छता मिशन उनके मंत्रियों और भाजपा के पार्टीजनों द्वारा ही सिर्फ ट्विटर तक समेट दि‍या गया।
नदियों के लिए कई कई मंत्रालय काम कर रहे हैं पर केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में ही यमुना का हाल किससे छुपा है। अकेला चना आख‍िर कब तलक भाड़ फोड़ेगा, कभी तो पार्टी को अपने बलबूते भी कुछ दिखाना होगा।
इसके अलावा भाजपा जिन युवाओं को अपना वोटबैंक बताती है ,उन्हीं के सामने लव जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जब आते हैं तो,  शाह जी ....! बच्चे अपना सच स्वयं खोजने लगते हैं कि आखिर कैसा विकास ... किसका विकास ... किस तरह होगा विकास ... ।

आए दिन मंचों पर से जो आपकी पार्टी के होनहार नेता संप्रदायवादिता के ज़हरीले वाण चलाते हैं, क्या उसे आज की ये हाइटेक पीढ़ी देखती नहीं होगी। हिंदू वादिता के लिए पूरे देश में कटुवचन बोलने वालों का दुस्साहसी होना,  क्या ये युवा देख नहीं रहे ।

निश्चित ही दिल्ली विधानसभा में पहले कांग्रेस और अब की बार भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो जाना, इन्हीं युवाओं और समस्याओं के मकड़जाल में घि‍रे मध्यम वर्ग के प्रति इग्नोरेंस ही तो है। वही मध्यम वर्ग जिसे सांझ होते ही डर सताने लगता है कि उसकी बेटी सुरक्षति घर पहुंच तो जाएगी या उसकी सारी कमाई घर के राशन, बिजली और पानी के बाद उसे ठेंगा दिखा देगी। अरविंद केजरीवाल ने जनता की यही दुखती नस तो पकड़ी थी। 
बहरहाल,  बतौर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह हार जरूरी भी थी जो नरेंद्र मोदी का ही चेहरा आगे करके सारी समस्याओं पर पर्दा डालने की रणनीति पर काम कर रहे थे। अभी तो बिहार,  फिर उत्तर प्रदेश जैसे मील के पत्थर बाकी हैं  जहां पार्टी आंखें मूंदकर अब भी मोदी के भरोसे राज्य जीतने के ख्वाब देख रही है। संगठन से लेकर जनसमस्याओं तक को इस तरह देखा जा रहा है कि मानो इनसे कोई वास्ता ही ना हो।

जो भी हो दिल्ली ने ''आप''  को बहुमत देकर और आप को (अमित शाह) को आइना दिखाकर  यह  बता दिया है क‍ि शाह जी ये लोक का तंत्र है और अब तो खालिस उन युवाओं का तंत्र है जो राजनीति से परहेज नहीं करते बल्क‍ि उसे सुधारने के लिए जज़्बे के साथ जुट जाने का माद्दा रखते हैं .... सो खबरदार रहें सभी परंपरावादी राजनेता और उनकी पार्टियां .... दिल्ली के परिणाम आइना हैं उनके लिए ....
और अंत में ....

राजनीति की इसी तस्वीर के लिए बाबा नागार्जुन की 'हजार हजार बाहों वाली' इसी कविता संग्रह से कुछ पंक्तियां और ...
'सुख-सुविधा और ऐश-आराम के साधन।
डाल देते हैं दरार प्रखर नास्तिकता की भीत में।।
बड़ा ही मादक होता है, 'यथास्थिति' का शहद।
बड़ी ही मीठी होती है 'गतानुगतिकता' की संजीवनी'....।।  


- अलकनंदा सिंह

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

सलमान रुश्दी ने ज्ञानपीठ पुस्कार विजेता भालचंद्र नेमाड़े को कहा 'ओल्‍ड बास्‍टर्ड'

भारतीय मूल के लेखक सलमान रुश्दी एक बार फिर विवादों में हैं। इस बार रुश्दी ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को गाली देने की वजह से वे सुर्खियों में हैं।
सलमान रुश्दी ने शनिवार को अपने एक ट्वीट में ज्ञानपीठ पुस्कार विजेता मराठी साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को गाली दी है। नेमाड़े ने सलमान रुश्दी के साहित्यिक रचना के महत्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि रुश्दी की किताबों में साहित्य जैसा कुछ भी नहीं है। दो दिन पहले ही मराठी के मशहूर साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को 50वां ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान हुआ है।
सलमान रुश्दी ने इसी के जवाब में ट्वीट किया और गाली दी। उन्होंने ट्वीट पर पोस्ट किया, 'तुनुकमिज़ाज b*****d बूढ़े। अपना पुरस्कार लो और अच्छे से धन्यवाद बोलते हुए आगे बढ़ो। मुझे संदेह है कि तुमने मेरे जिस काम की आलोचना कि है कभी उन्हें पढ़ा भी है।' सलमान ने नेमाड़े के विवादास्पद बयान का लिंक भी अपने ट्वीट पर डाला। नेमाड़े ने कहा था कि बुक प्राइज-विनर रुश्दी ने मिडनाइट चिल्ड्रेन के अलावा कोई भी अच्छा काम नहीं किया जिसका साहित्यिक रूप में मूल्यांकन किया जा सके।
सलमान के गाली वाले ट्वीट सोशल साइट पर 198 बार री-ट्वीट हो चुके हैं। 171 लोगों ने इसे फेवरिट किया गया। सलमान को रिप्लाई में कई लोगों ने गाली देने के कारण उनकी जमकर आलोचना भी की है।
ट्वीट पर तीखी प्रतिक्रिया
एक ट्वीट में @AgentSaffron ने कहा, ' क्या रुश्दी आपने कभी नेमड़े की कोई किताब पढ़ी है? '
@dreamershivam ने एक ट्वीट में कहा कि सलमान रुश्दी आपका यह ट्वीट पढ़ने के बाद मुझे लग रहा है कि वह (नेमड़े) सही कह रहे हैं।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

हिन्दुओं की आबादी बढ़ाने के नाम पर कभी अति उत्साह में तो कभी व्यक्तिगत कुंठा का शिकार होकर सीमाएं लांघने का जो काम कुछ अतिवादी संत और साध्वी कर रहे हैं, वह दरअसल देश की फिजा में ज़हर घोल रहे हैं ।
सच तो  यह है क‍ि ऐसी सोच उनकी अपनी- अपनी राजनैतिक, सामाजिक व शारीरिक कुठाओं  से उपजी है जिन्हें वे पिछले काफी समय से हिंदुओं पर थोपने का प्रयास कर रहे हैं। थोक में बच्चे पैदा करने की नसीहत वाला ये आंकड़ा दोनों ही धर्म के लोगों के लिए खासी परेशानी खड़ी कर सकता है ।
ये नसीहतें कुछ यूं परोसी जा रही हैं जैसे हिन्दू धर्मावलंबी इनके जड़ खरीद गुलाम हों और इन्हें  उनके निजी जीवन में भी दखल देने का अधि‍कार प्राप्त हो। आश्चर्य की बात तो यह है क‍ि बच्चे पैदा करने की संख्या ऐसे कथ‍ित संत व साध्वी बता रहे हैं जो घर-परिवार को त्यागने के बावजूद न तो गृहस्थाश्रम में दखल देने से बाज आते हैं और न पद व कुर्सी का लोभ छोड़ पाते हैं लिहाजा गेरुआ वस्त्रों के साथ राजनीत‍ि करते पाये जाते हैं।
कुंठाएं किस-किस रूप में आदमी के बाहर निकलती हैं, यह कोई इन साधु संतों के आचार-व्यवहार से जान सकता है। पहले धर्म की आड़ में और फिर हिन्दुत्व को एक करने के नाम पर जो ये सीन इनके द्वारा रचा जा रहा है, उससे किसी प्रकार हिंदुओं का हित होने वाला नहीं है। यदि शास्त्रों की भी बात करें तो सभी जगह योग्य संतान पैदा करने की मंशा पर जोर दिया गया है, न कि संख्याबल पर। राजनीति में आकर धर्म का पाठ पढ़ाने वाले इन पोंगापंथियों को  समझना होगा क‍ि जिस युवा पीढ़ी ने केंद्र में सरकार बनाने का रिकॉर्ड कायम कराया है और उन्हें भी संसद में बैठने योग्य बनाया है, वही युवा पीढ़ी इनको दर-बदर करने में देर नहीं लगायेगी।  
जिनकी शक्लो-सूरत में कहीं से भी संतत्व नज़र नहीं आता, वो सनातन धर्म का झंडा हाथ में लेकर उसकी धज्ज‍ियां उड़ा रहे हैं।
...साध्वी का तमगा लगाकर राजनीति करने वाली सांसद प्राची को ही देखि‍ए जो कुछ दिन पहले हर हिंदू महिला को चार बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाले विवादास्पद बयान की सफाई में  कहती हैं कि 'मैंने चार बच्‍चे पैदा करने के लिए कहा था, 40 पिल्‍ले नहीं।
गौरतलब है कि प्राची ने विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन में ये बात कही। प्राची ने किसी समुदाय विशेष का नाम लिए बिना कहा, 'ये लोग जो 35-40 पिल्ले पैदा करते हैं, फिर लव जेहाद फैलाते हैं। उस पर कोई बात नहीं करता है लेकिन मेरे बयान के बाद इतना बवाल मच गया।
लोगों ने मुझसे कहा कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से विकास रुक जाएगा पर मैं अपने बयान पर कायम रही।' प्राची ने मंच से ऐलान करते हुए कहा कि अगर किसी के पास 5 से 10 बच्चे हैं तो वो मेरे पास आएं,  मैं उन्हें सम्मानित करुंगी।
इतना ही नहीं शनिवार को बदायूं के हिंदू कार्यकर्ता सम्‍मेलन में साध्‍वी प्राची ने कहा, '1400 साल पहले सभी हिंदू थे तो आजम खान, परवेज मुशर्रफ, गिलानी और शाही इमाम बुखारी को घर वापसी करनी चाहिए। उनके लिए घर वापसी के दरवाजे खुले हुए हैं।'...

ये एक सतत प्रक्रिया हो गई है कि पहले ऐसे ऐसे बयान दे डालो कि फिर कहते फिरो कि बयान को पूरी तरह समझा नहीं गया। या जो हिन्दू नहीं है क्या उनके बच्चे...  बच्चे नहीं कहलाऐंगे....वे पिल्ले हो जाऐंगे...  हद होती है बदजुबानी की भी। बोलने से पहले इतना तो सोच लिया होता कि जिस धर्म का हवाला देकर वह दूसरे धर्म के बच्चों को पिल्ले बता रही हैं, वह धर्म तो हर बच्चे में भगवान का रूप देखने की सीख देता है। 
हिंदुत्व को बलशाली बनाने का ये कौन सा पैंतरा है जो सिवाय कटुता फैलाने के और कुछ नहीं कर सकता। हिंदू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि उसे एसे जाहिलों से मदद की दरकार हो ।
कौन नहीं जानता कि हिन्दू धर्म की अच्छाइयों को सामने लाने, उसकी कुरीतियों का उन्मूलन करने तथा गरीबों के लिए कुछ कल्याणकारी कार्य करने की बजाय ये कथि‍त संत व साध्वियां सिर्फ अपनी ओर ध्यान आकर्षण हेतु ऐसे विध्वंसकारी बयान देते हैं। रही बात ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को सम्मानित करने की तो सम्मान से किसी का पेट नहीं भरने वाला। आज भी रेलवे स्टेशनों सहित दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर फटेहाल घूमने वाले बच्चों की तादाद कम नहीं है। करना है तो पहले उनका इंजताम करके उस भारत का सम्मान विश्व में करवाएं जिसे हर राष्ट्रवादी मां का दर्जा देता आया है।   
कोरे गाल बजाने के लिए पाकिस्तान, कश्मीर, लव जिहाद और 40 पिल्ले की बात करने वाला मंच पर नहीं, किसी पागलखाने में होना चाहिए। चोला बदलने भर से कोई साध्वी या संत नहीं हो जाता, ये वो लोग हैं जो जिम्मेदारियों से भागकर गेरुए वस्त्रों में अपनी कुंठाओं को छुपा बैठे हैं और '' फायर ब्रांड'' की खाल ओढ़कर देश को गर्त में ले जाना चाहते हैं।
किन्हीं मायनों में इन्हें देशद्रोही भी माना जा सकता है क्योंक‍ि निजी राजनीति अथवा व्यक्तिगत कुंठाओं को थोपने वाला शख्स किसी देशद्रोही से कम नहीं होता, फिर चाहे वह कोई साधु-संत हो या मुल्ला-मौलवी।

- अलकनंदा सिंह     



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