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मंगलवार, 10 जुलाई 2018

क्रूरता की हदें पार करने पर veal का विरोध अभीतक क्‍यों नहीं हुआ

veal के रूप में क्रूरता को तो हम अपनी थाली में परोसकर चल रहे हैं , मैं किसी के आहार को नियंत्रित करने की बात यहां नहीं कह रही परंतु मगर भक्ष और अभक्ष का भेद तो करना ही होगा अन्‍यथा ये क्रूरता हमारी हमारे दिमाग को कहीं का नहीं छोड़ेगी।

पिछले कई दिनों से जब लगातार नन्‍हीं बच्‍चियों के साथ बलात्‍कार की खबरें पढ़-सुन कर मुझे बहुत बेचैनी हो रही है तो उन मांओं के साथ क्‍या बीतती होगी जिनके बच्‍चों को सिर्फ 'मारने के लिए ही' जन्‍माया जाता है। जी हां, मांसाहारियों में एक नाम बड़ा प्रचलित है 'वील'। जो वील खाता है, वह शेखी बघारता है कि उसका पसंदीदा भोजन वील है।

इसी 'वील' से जुड़ी एक मार्मिक खबर आपको सुनाती हूं... कि भारत के तकरीबन सभी फाइव स्टार होटलों में 'वील' की खास डिमांड होती है और दावत का स्‍टैंडर्ड नापने के लिए इसे मेजबान और मेहमान के बीच बड़ी अहमियत दी जाती है। सभी मांसाहारी का तो पता नहीं परंतु जो बीफ की बात करते हैं या इनमें से जो उच्‍चशक्षित और संपन्‍न परिवार के हैं, वे बखूबी परिचित होंगे ‘वील’ से परंतु उनमें से कम ही होंगे जो यह जानते होंगे कि आखिर वील तैयार कैसे होता है, मैं यह दावे से कह सकती हूं कि वील तैयार करने के प्रक्रिया जानकर उनमें से तमाम मांसाहार ही छोड़ देंगे।

फाइव स्‍टार की मांसाहारी पार्टियों में अपने स्‍टैंडर्ड को दिखाने के लिए परोसा जाने वाला वील आखिर है क्या? दरअसल यह गाय के उस नन्हें बछड़े का मांस होता है, जिसे भूखे रखकर मार दिया गया हो ताकि उसका मांस हल्‍का (सफेद-पीला) रंग लिए हुए गुलाबी भी नज़र आए, इतना ज़र्द कि उजले रंग का सा लगे। जन्म के तकरीबन 14 हफ्ते बाद ऐसे बछड़े को काट दिया जाता है।

‘veal’ मांस के लिए बछड़े तैयार करने की वीभत्‍सता जानकर दिल को थाम लेंगे आप भी। यह मांस-उद्योग के लिए पशुपालन के बाकी सभी रुपों में सबसे ज्यादा वीभत्‍स है। पशु की इस नियति से तो कहीं उसकी मौत अच्छी। ‘वील’ तैयार करने के लिए जन्म के एक- दो दिन बाद ही नन्हें बछड़े को उसकी मां से अलग कर दिया जाता है। इस बछड़े को काठ के एक तंग और 22 इंच गुणे 54 इंच के अंधेरे दड़बे में जंजीर से बांधकर रखा जाता है। दड़बा इतना तंग होता है कि उसमें बछड़े का शरीर बमुश्किल समा पाता है। चल-फिर ना पाने के कारण बछड़े की मांसपेशियां एकदम शिथिल पड़ जाती हैं और मांसपेशियों की यही शिथिलता मांस को मुलायम बनाती है। बछड़ा कभी खड़ा भी नहीं होता, सिवाय उस एक वक्त के जब उसे काटने के लिए ले जाया जाता है और इस घड़ी तक बछड़े की टांगें बेकाम हो चुकी होती हैं।

अंधेरे और मिट्टी की छुअन से दूर, बिना मां के दूध और घास के, इस बछड़े के मुंह में कुछ घंटों के अंतराल पर जबरदस्ती एक बोतल उड़ेली जाती है जिसे भोजन कहा जाता है जबकि भोजन के नाम पर यह लुगदीनुमा दवाई तरल वसा (फैट) होती है। बछड़े की चमड़ी में सूइयां चुभायी जाती हैं और यह सब इसलिए किया जाता है ताकि बछड़ा जिन्दा रहे और मोटा होता जाए। उसमें जान-बूझकर लौह-तत्व (आयरन) या ऐसे ही जरुरी पोषक तत्व नहीं डाले जाते। ऐसे भोजन के कारण पशु में आयरन की कमी हो जाती है। आयरन की कमी के ही कारण बछड़े का मांस जर्द पीला या कह लें तकरीबन उजला नजर आता है जो कि वील के लिए जरूरी माना जाता है।

‘वील’ मांस के लिए बछड़े को तैयार करने वाले किसान उसे जरुरत भर का पानी भी नहीं पिलाते, प्यास से बेहाल बछड़ा भोजन के नाम पर दिए जा रहे बदबूदार तरल वसा को पीने के लिए बाध्य होता है।
इस बछड़े को भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्‍स दी जाती हैं ताकि न्यूमोनिया और डायरिया से वह बचा रहे। यह एंटीबॉयोटिक्स वील खाने वाले के शरीर में भी पहुंचता है लेकिन सिर्फ एंटीबॉयोटिक्स ही नहीं पहुंचता बहुत कुछ और भी पहुंचता है।

वील का उत्पादन करने वाली ज्यादातर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां बछड़े को एक खतरनाक और अवैध दवा क्लेनबुटेरॉल भी देती हैं। यह बछड़े के शरीर को बढ़ाता और उसमें आयरन की ज्यादा कमी पैदा करता है ताकि बछड़े का मांस ज्यादा उजला दिखे, मांस जितना उजला दिखेगा, उसकी कीमत उतनी ज्यादा लगेगी। दूसरे 16 हफ्ते की जगह उसे 12-13 हफ्ते में ही काटने के लायक मान लिया जाता है।

गौरतलब है कि वील के ज़रिए क्लेनबुटेरॉल मांस-उपभोक्ता के शरीर में जाने पर हृदय की धड़कन का बढ़ना, कंपकंपी आना, सांस लेने में कठिनाई होना, बुखार होना और मौत होने तक का खतरा 90% बढ़ जाता है।
हालांकि भारत के होटलों में वील गैरकानूनी, चोपी छिपे मिलता है क्‍योंकि भारत में वील का उत्पादन करना गैरकानूनी है परंतु फाइवस्‍टार होटलों ने इसकी काट निकाल ली है, वे कहते हैं हमने वील का आयात किया है।
मुझे पक्का यकीन है कि होटलों पर छापेमारी की जाए तो पता चलेगा कि इम्पोर्ट लाइसेंस और वील की खरीदी की मात्रा उससे कम निकलेगी जितना कि बेचा गया है। बहुत से होटल वील बेचते हैं और अपने मैन्यू में वील के नीचे ‘इम्पोर्टेड’ (विदेश से मंगाया) लिखते हैं। 'इम्पोर्टेड' लिखने का अर्थ ही यह है कि हमारे देश में भी चोरी-छुपे इसका व्यवसाय चल तो रहा है।

बहरहाल 'इम्पोर्टेड' के तर्क को पेश करने से उनका ''वीभत्‍सता के ज़रिए व्‍यापार करने'' का दोष तो खत्म नहीं हो जाता ना।

यह भी सत्‍य है कि कानूनी तौर पर वील का आयात DGFT (Directorate General of Foreign Trade) के अंतर्गत हमेशा प्रतिबंधित रहा है और जिन होटलों में स्वदेशी या आयातित वील परोसा जाता है उनपर एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई की जा सकती है परंतु अभी तक ऐसी कार्यवाही कहीं नहीं हुई।

निश्‍चित रूप से वील मांस की तैयारी के लिए पाले जा रहे बछड़े की नियति और व्यवस्थित क्रूरता क्‍या हमें ये सोचने पर बाध्‍य नहीं करती कि जैसा खाओगे अन्‍न वैसा बनेगा मन। दरअसल क्रूरता को तो हम अपनी थाली में परोसकर चल रहे हैं फिर यह आशा कैसे करें कि वे ''आहें'' हमारा विनाश नहीं करेंगी, फिर चाहे विनाश बुद्धि का हो या शरीर का।
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

देश को बेइज्‍ज़त करने के कुत्‍सित-अभियान... क्‍या ये देशद्रोह नहीं

सूचनाओं की बेलगाम आवाजाही एक ओर जहां कानून-व्‍यवस्‍था और  शासन-प्रशासन पर सवालिया निशान लगाती है वहीं दूसरी ओर समाज  को भी संवेदनाहीन बनाने का काम करती है। पिछले लगभग तीन चार  साल से मैं देख रही हूं कि 'यूं ही' तैरती भ्रामक सूचनाओं के आधार  पर अर्धसत्‍य और यहां तक कि अफवाहों को भी सत्‍य सिद्ध करने की  कोशिश में लोग 'किसी भी हद तक' चले जाते हैं। दु:ख की बात यह है  कि इस झूठ को कोई अन्‍य नहीं, बल्‍कि मीडिया ही जनजन तक पहुंचा  रहा है और सिलसिलेवार ढंग से कुछ गैरसरकारी संगठन इसे प्रदर्शनों  के जरिए देश से लेकर विदेशों तक पहुंचाने में मदद करते हैं। जिससे  देश और समाज की छवि बिगड़ रही है।

यूं तो इस नकारात्‍मकता को समय-समय पर मुंहतोड़ जवाब भी मिला  है, मगर बुरी तरह लताड़े जाने के बावजूद विध्‍वंसकारी सोच इतनी  आसानी से कहां रुकती हैं।

पिछले तीन दिनों में तीन घटनाओं का जो सच सामने आया है, वह  यह बताने के लिए काफी है कि देश की छवि को ध्‍वस्‍त करने के लिए  किस तरह बाकायदा ''कुत्‍सित-अभियान'' चलाए गए और देश-विदेशों में  इस आशय का विभ्रम फैलाया गया कि भारत में एक खास किस्‍म के  लोग, एक खास पार्टी तथा एक खास विचारधारा द्वारा ''कितने जघन्‍य  अपराध'' किए जा रहे हैं।

पहली घटना का सच

गत दिनों ''हिंदू आतंकवाद'' जैसे शब्‍द को फैलाए जाने का सच तब  सामने आना जब एनआईए कोर्ट ने 2007 में हुए हैदराबाद की मक्का  मस्जिद ब्लास्ट केस के मुख्‍य आरोपी स्वामी असीमानंद सहित सभी 5  सह आरोपियों को 11 साल बाद कुल 226 गवाहों के बयान और 411  कागजाती सुबूत पेश किए जाने के बावजूद बरी कर दिया। कोर्ट के  आदेश ने परोक्ष रूप से तत्‍कालीन रॉ अधिकारी आरवीएस मणि की  उस निजी तहकीकात को भी सच साबित किया जिसके अनुसार घटना  के लिए दोषी पाए गए पाकिस्‍तान के हूजी आतंकियों  को बाकायदा  रचे गए एक षड्यंत्र के तहत रिहा करते हुए निर्दोष लोगों को फंसाकर  हिंदू आतंकवाद अथवा भगवा आतंकवाद का नाम दिया गया। खैर ''हिंदू  आतंकवाद'' के नाम पर प्‍लांट की गई इस स्‍टोरी का ''द एंड'' तो कोर्ट  के निर्णय से गत 16 तारीख को हो ही गया, साथ ही वह इस हकीकत  से भी परिचित करा गया कि किस तरह हिंदू अब तक खास  राजनीतिक पार्टियों का सॉफ्ट टारगेट रहा है।

दूसरी घटना का सच

पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने कल बताया कि ट्रेन में सफर कर रहे  जुनैद की हत्‍या बीफ के कारण नहीं, बल्‍कि सीट को लेकर हुए झगड़े  के कारण हुई। इसी जुनैद को लेकर असहिष्‍णुता का ढिंढोरा पीटने वाले  गिरोह ने किस तरह बैनरों सहित देश-विदेश तक प्रदर्शन किया था,  यह आपको भी जरूर याद होगा।

अब सुनिए तीसरी घटना का सच

मुझे लगता है कि ये सर्वाधिक घिनौनी घटना है। होली के अवसर पर  दिल्‍ली यूनीवर्सिटी के रामजस कॉलेज की एक छात्रा ने अपने ऊपर  सीमेन से भरा गुब्‍बारा फेंके जाने की बात कही थी। कथित पीड़िता ने  इसके लिए सोशल मीडिया को हथियार बनाया और उसके बाद सक्रिय  हुए तथाकथित हिमायती तख्‍तियां लेकर निकल पड़े थे।इस घिनौने  लेकिन आधारहीन दुष्‍प्रचार की हवा भी कल आई फोरेंसिक रिपोर्ट ने  निकाल दी और बता दिया कि गुब्‍बारों में सीमेन नहीं था।

इन तीनों घटनाओं का सच सामने आने के बाद आप क्‍या सोच रहे हैं?  यही ना कि कोई सोच के इतने निचले स्‍तर तक कैसे जा सकता है।  कोई भी संगठन, पार्टी, व्‍यक्‍ति या मीडिया हाउस अपने समाज और  अपने देश का सिर इस तरह शर्म से झुकाने पर आमादा क्‍यों हो जाता  है, और वह भी विदेशों तक में।
दरअसल, ये वही तत्‍व हैं जो गांव-खेतों में, आदिवासी लिबास में,  अपनी गृहस्‍थी चला रही महिलाओं में, मां-बाप की सेवा करते बच्‍चों   में देश के पिछड़ेपन को खोजते हैं। ये वही तत्‍व हैं जो अब तक  देश-विदेश से ''मिल रहे'' धन में कमी आने पर बिलबिला रहे हैं। गोया  कि समाजसेवा सिर्फ प्‍लेकार्ड्स और प्रदर्शनों से ही चलती हो।

उक्‍त तीनों घटनाओं को लेकर प्रोपेगंडा खड़ा करने में कई तो मीडिया  हाउसेज चलाने वाले वो ''तथाकथित सेक्‍यूलर शामिल हैं, जो ''बेचारे'' व ''सत्‍यान्‍वेषी'' होने का ठेका लिए हुए हैं''।

बहरहाल, अच्‍छी खबर यह है कि कल दिल्‍ली हाईकोर्ट ने कठुआ  मामले में बच्‍ची की तस्‍वीर ज़ाहिर करने पर मीडिया घरानों को ऐसी  ही गैरजिम्‍मेदारी पर दंडित करते हुए 10-10 लाख का ज़ुर्माना लगाया  है और आइंदा के लिए ताक़ीद भी किया है कि वे 'सनसनी' और  'ब्रेकिंग न्‍यूज' के लिए नियमों के विपरीत जाकर कोई ऐसी सूचना  समाज के सामने पेश ना करें जो घृणा और विद्वेष फैलाती हो अथवा  किसी की प्रतिष्‍ठा को ध्‍वस्‍त करती हो।

भले ही हाईकोर्ट ने कठुआ गैंगरेप व हत्‍या के मामले में बच्‍ची की  फोटो ज़ाहिर करने पर ये ज़ुर्माना लगाया है परंतु बात ''इतनी सी ही''  नहीं है। अब समय आ गया है कि हम स्‍वयं किसी भी घटना पर जस  का तस विश्‍वास ना करें, देश की छवि को बिगाड़ने वाले कोई भी हों,  उनका सच जानने के लिए हमें स्‍वयं सब्र के साथ रियेलिटी चेक  अवश्‍य कर लेना चाहिए।

सोशल मीडिया और खबरों के इस भयावह बवंडर में देश की नकारात्‍मक छवि पेश करने वालों की ये हरकतें क्‍या किसी देशद्रोही कृत्‍य से कम हैं...और क्‍या अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी के नाम पर देश के खिलाफ षड्यंत्र रचने की छूट दी जा सकती है। किसी खबर को प्‍लांट करना और उसे चरणबद्ध तरीके से ''खास मकदस'' पाने  तक प्रसारित करते रहना भी देशद्रोह है। देशद्रोह सिर्फ तभी नहीं होता  जब हम देश के दुश्‍मनों का पक्ष लेकर बोलें...देशद्रोह तब भी होता है  कि जब हम अपने देश को बेइज्‍ज़त करने के लिए साजिश के तहत  किसी भी हद तक चले जायें।

शायद वह समय आ गया है कि अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का दायरा निर्धारित किया जाए और यह भी तय किया जाए कि अभिव्‍यक्‍ति की  स्‍वतंत्रा का मतलब देश की अस्‍मिता से खिलवाड़ करना कभी नहीं  हो सकता।
दलगत राजनीति की निकृष्‍टता वहां तक तो सहन की जा सकती है  जहां तक उससे मात्र 'दल' ही प्रभावित हो रहे हैं किंतु जब देश को  उसकी ''दलदल'' में घसीटा जाने लगे तो निश्‍चित ही वह अक्षम्‍य  अपराध बन जाता है। 
- अलकनंदा सिंह     

रविवार, 4 जून 2017

पूर्वाग्रही राजनीति की भेंट चढ़ता संविधान का अनुच्‍छेद 48

पूर्वाग्रह व्‍यक्‍ति के प्रति हों, समाज के प्रति अथवा राजनैतिक पार्टी के प्रति, किसी  भी विषय पर तिल का ताड़ बनाने और उसी आधार पर शंकाओं को वास्तविकता  जैसा दिखाने का माद्दा रखते हैं। रस्‍सी को सांप बनाकर पेश करने की यह ज़िद  किसी के लिए भी अच्‍छी नहीं होती। यही पूर्वाग्रह रीतियों को कुरीतियों में और  सुशासन को कुशासन में बदलते दिखाई देते हैं।
आजकल ”बीफ” के बहाने बड़ी हायतौबा हो रही है। जैसे गौमांस नहीं खाऐंगे तो  मर जाएंगे अथवा अस्‍मिता पर संकट छा जाएगा। पशु बाजार के रेगुलेशन पर जो केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन जारी किया है, उसे कुछ राजनैतिक पूर्वाग्रहियों ने आजकल ”बीफ” खाने की ज़िद बना लिया है।
क्‍या  कहता  है  संविधान
संविधान का अनुच्‍छेद 48 कहता है कि ”राज्‍य, कृषि व पशुपालन दोनों को आधुनिक व वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने को प्रयास करेगा, विशिष्‍ट गायों बछड़ों और अन्‍य दुधारू पशुओं की नस्‍लों में सुधार के साथ-साथ उनके वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएगा।” केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना महज इसलिए की जाए कि वह गैरकांग्रेसी और अपार बहुमत वाली सरकार है, तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं, वह भी तब जबकि संविधान के उक्‍त अनुच्‍छेद को ना तो भाजपा ने बनाया ना तब नरेंद्र मोदी ही राजनीति में आए थे। इसी अनुच्‍छेद में गाय को भारतीय संस्कृति का वाहक माना गया है। तो क्‍या जिन सिरफिरों ने केरल के कन्‍नूर में गाय के बछड़े के साथ जो वीभत्‍सता दिखाई, वह संविधान के इसी अनुच्‍छेद का उल्‍लंघन नहीं माना जाना चाहिए।

फिलहाल के विवाद में पशु बाजार को लेकर सरकार ने जो नए नियम बनाए हैं, उन्हें इस ”बीफ” विवाद ने परोक्ष कर दिया है जबकि नए नियमों में जानवरों की तस्करी और निर्दयता के पहलुओं पर काफी गौर किया गया है।

गौरतलब है कि 23 मई को जब केंद्र सरकार ने पशु बाजार के लिए नए नियमों की  घोषणा की तभी से कुछ तत्‍व केरल व पश्‍चिम बंगाल में बीफ को हाइलाइट करके बवाल काट रहे हैं। हालांकि ये समझ से परे है कि केरल में सिर्फ मांस ”निर्यात” करने वाले बूचड़खानों को लाइसेंस मिला हुआ है तो उन्‍हें दिक्‍कत क्‍यों हो रही है।
यूं भी गतवर्षों से जो घटनाऐं सामने आ रही हैं उनके आधार पर ये कहा जा सकता  है कि केरल को तो किसी को मारने की ”वजह” भी तलाशने की जरूरत नहीं, वहां  तो कुत्ते, गाय, औरत, बच्चे, हाथी और राजनैतिक कार्यकर्ताओं का कत्ल होता  आया है।

पश्चिम बंगाल ने भी मवेशियों की खरीद-फरोख्त को लेकर हो-हल्ला मचाया मगर  उतना नहीं जितना केरल में हुआ, तमिलनाडु में भी नए नोटिफिकेशन को लेकर  थोड़ा बहुत हंगामा हुआ। इसकी बड़ी वजह ये है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु  में ही पशुओं का सबसे ज्यादा अवैध कारोबार होता है। जहां पश्चिम बंगाल से  बांग्लादेश को गर्भवती गायों, बीमार और छोटे जानवरों की अवैध सप्लाई होती है  वहीं तमिलनाडु यही काम केरल के लिए करता है।

नेताओं और छात्र संगठनों ने पशुओं को लेकर जिन नए नियमों पर बयानबाजी की, वह बेहद ही खोखली थी। ये जिस तबके से आते हैं…निश्‍चित जानिए कि इनमें से तमामों ने तो कभी पशु् बाजार की ओर देखा भी नहीं होगा। ये बयानबाजी सिर्फ  सियासी तूफान खड़ा करने के लिए हुई और अब भी हो रही है, इस के चक्कर में  जो नए नियम बनाए हैं उनकी भी हत्या कर दी गई।

अब देखिए कि आखिर पशु बाजारों पर लगाम लगाना क्यों है जरूरी है। पहले हमें  इन बाजारों को नियमित करने की जरूरत को समझना होगा। पशु बाजारों में सिर्फ  दो तरह के जानवर बेचने के लिए लाए जाते हैं। पहले तो वो जो दुधारू होते हैं या  जिन्हें खेती के काम में इस्तेमाल किया जा सकता है, दूसरे वो जो मांस के लिए  बेचे जाते हैं।

यहां यह बात भी जान लेना जरूरी है कि जो उपयोगी जानवर होते हैं उनकी ठीक से  देख-रेख भी की जाती है और उन्हें लाने-ले जाने में भी अपेक्षाकृत कम क्रूरता दिखाई  जाती है, उनकी तस्करी भी कम होती है। इसकी वजह ये है कि उन्हें आसानी से  खरीदार मिल जाते हैं और उनकी सेहत का मालिकों को खयाल रखना पड़ता है, तभी  तो उन जानवरों की अच्छी कीमत मिल सकेगी।

इसके ठीक विपरीत जो जानवर मांस के लिए बेचने लाए जाते हैं, उनकी हालत बेहद  खराब होती है। किसान आम तौर पर वो जानवर मांस के लिए बेचते हैं, जो उनके  लिए बेकार हो चुके होते हैं।

किसान इन जानवरों को दलालों को बेच देते हैं। फिर ये दलाल दर्जन भर या इससे  ज्यादा जानवर खरीदते हैं जिन्‍हें वो बड़े बाजारों में ले जाते हैं, ताकि बड़े दलालों को  बेच सकें। कई बिचौलियों और बाजारों से गुजरते हुए ये जानवर इकट्ठे करके गाड़ियों  में ठूंस करके दूसरे राज्यों में ठेकेदारो को बेचे जाते हैं।
उत्तरी भारत के राज्यों में सबसे ज्यादा जानवर पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं जो  झारखंड, ओडिशा और बिहार से होकर गुजरते हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक,  तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र से जानवरों को केरल भेजा जाता है।

ज्यादातर राज्यों में जानवरों के वध या ट्रांसपोर्ट करने के लिए पशुपालन और  राजस्व विभाग से इजाजत लेनी होती है हालांकि किसी भी राज्य में इन नियमों का  पालन नहीं होता।
पुलिस चौकियों में पैसे देकर यानि ‘हफ्ता’ देकर जानवरों की तस्करी का ये कारोबर  बरसों से चलता आ रहा है। जाने-अनजाने ये सभी लोग जानवरों की तस्करी का  हिस्सा बने हुए हैं और ये बीमारी पूरे देश को लगी हुई है।
कुलमिलाकर ये कहा जाए कि जानवरों की तस्करी का ये बहुत बड़ा रैकेट है, जो हर  राज्य में सक्रिय है तो गलत ना होगा।

देखिए सरकारी रिपोर्ट क्‍या कहती है इस रैकेट के बारे में
गृह मंत्रालय ने 2006 में ही ये पाया था कि जानवरो की तस्करी का आतंकवादी  फंडिंग से सीधा ताल्लुक है। 2008 में असम धमाकों के बाद गिरफ्तार हूजी के  आतंकवादियों ने माना था कि उन्होंने धमाकों के लिए पैसे जानवरों की तस्करी से  जुटाए थे। हर साल सिर्फ उत्तर प्रदेश में जानवरों के तस्करों के हाथों सौ से ज्यादा  पुलिसवाले मारे जाते हैं।
भारत-बांग्लादेश की सीमा पर कई बीएसएफ जवान इन तस्करों के हाथों  कत्ल हो जाते हैं। खाड़ी देशों को मांस के निर्यात में जबरदस्त मुनाफा होता है।  इसीलिए मांस माफिया इसके लिए कुछ भी करने को तैयार होता है।
दिल्ली के गाजीपुर स्थित पशु बाजार में महिलाओं के प्रवेश की अलिखित पाबंदी है।  वो कहते हैं कि मंडी का मंजर बेहद डरावना और विचलित करने वाला होता है।
बिहार के सोनपुर मेले में जहां जानवर कटते हैं, वहां सिर्फ परिचित दलालों को ही  जाने दिया जाता है। स्‍थिति इतनी भयावह है कि अगर कोई वहां कैमरा लेकर जाता  है, तो वो कैमरे के साथ वापस नहीं आ सकता। कई केस में तो उसे स्ट्रेचर पर  लादकर लाना पड़े।
पशु बेदर्दी का अंतहीन सिलसिला
वजह वही है कि कसाईखाने का मंजर बेहद खतरनाक होता है. जानवरों को छोटी  रस्सियों से बांधा जाता है, खरीदार के इंतजार में जानवर कई दिनों या कई बार  हफ्तों तक खड़े रखे जाते हैं। फिर खरीदार उन्हें गाड़ियों में ठूंसकर दूसरे नर्क ले  जाते हैं. बदसलूकी के चलते जानवरों की हालत दयनीय होती है। छोटे जानवर बेचने  के बाद अपनी मां को तलाशते दिखाई देते हैं।

पशु वध में बेदर्दी एक बड़ा मसला है। किसान के घर से कसाई खाने तक के इस  मौत का ये सफर किसी एक खरीदार के मिल जाने से नहीं खत्म होता।

जानवर कई बार बिकते हैं। कई हाथों से गुजरते हैं। हर खरीदार उनसे बदसलूकी  करता है। जानवरों को ठीक से खाना-पानी नहीं मिलता क्योंकि हर खरीदार को पता  होता है कि इसे आखिर में कत्ल ही होना है। कई बार तो जानवरों को फिटकरी  वाला पानी दिया जाता है, जिससे उनके गुर्दे फेल हो जाएं। इससे उनके शरीर में  पानी जमा हो जाता है। इससे जानवर हट्टे-कट्टे दिखते हैं। इससे उनकी अच्छी कीमत  मिलती है। उन्हें पैदल ही एक बाजार से दूसरे बाजार ले जाया जाता है।

दक्षिण भारत के राज्यों में तो जानवरों की आंखों में मिर्च ठूंस दी जाती है ताकि दर्द  से वो खड़े रहें। भले ही खड़े-खड़े थकान से उनकी मौत ही क्यों न हो जाए। मुनाफा  बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा जानवर ट्रक में ठूंसकर ले जाए जाते हैं। वो मंजर  देखकर कई बार बेहोशी आने लगती है।

तस्करी के दौरान कई जानवर दम घुटने से मर जाते हैं। कई की हड्डियां टूट जाती  हैं, आंखें खराब हो जाती हैं, या पूंछ टूट जाती है। किसी के दूसरे अंग बेकार हो  जाते हैं।

चढ़ाने-उतारने के दौरान जानवरों को गाड़ियों में फेंक दिया जाता है, जिससे वो  जख्मी हो जाते हैं। उन्हें खींचकर गाड़ियों में भर दिया जाता है। उन जानवरों पर ये  जुल्म नहीं होता जो दुधारू होते हैं या जिनका खेती में इस्तेमाल हो सकता है।
अत: पशु बाजारों का नियमन और काटने के लिए जानवरों को सीधे किसान से  खरीदने से सबसे ज्यादा नुकसान जानवरों के तस्कर माफिया को होगा। उन ठेकेदारों  और दलालों को होगा जो तस्करी में शामिल हैं।
क्‍या होगा नए नियमों से-
नए नियमों से डेयरी के कारोबार से जुड़े लोगों की जवाबदेही भी तय होगी। उनके  कारोबार से पैदा हुए बाईप्रोडक्ट को लेकर वो जिम्मेदार बनेंगे। भारत सरकार के  इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने दूध न देने वाले जानवरों के बेहतर  इस्तेमाल के लिए भी कुछ नुस्खे सुझाए हैं।
राज्य सरकारों को इन नुस्खों को भी लागू करना होगा। डेयरी उद्योग को-ऑपेटिव  के जरिए संगठित तरीके से चलता है। इनके जरिए बेकार जानवरों को काटने के  लिए बेचा जा सकता है। इससे जवाबदेही तय होगी और जानवरों के साथ निर्दयता  भी कम होगी।

मवेशियों को लेकर नए नियमों का विरोध हताशा और कायरता के सिवा कुछ नहीं।
बाकी देशवासियों ने इन नियमों के जारी होने के बाद राहत की सांस ली है। दिवंगत  पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने इन नियमों की शक्ल में देश को सबसे बड़ी  विरासत दी है।
और इसी बात पर एक शेर दाग़ देहलवी का-
सब लोग, जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं ।

- अलकनंदा सिंह