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गुरुवार, 19 सितंबर 2024

मथुरा की गल‍ियों में बसा करते थे कवि और साहित्यकार, पढ़‍िए डॉ. नटवर नागर की ल‍िखी ये पाती


 मथुरा नगर पूरा ही, अनेक कवियों का नगर रहा है परन्तु वर्तमान के पत्रकारों को मथुरा में कवि और साहित्यकार, दिखाई ही नहीं देते। मथुरा आरम्भ से अब तक हिन्दी के आधारभूत साहित्यकारों का गढ़ रहा है। आज हिन्दी दिवस है हिन्दी के उन आधार स्तम्भों का स्मरण करना तो बनता ही है। 

रीतिकाल का कुछ समय ऐसा रहा है जब 'तिलक द्वार' से लेकर कंसखार तक का क्षेत्र विशेष रूप से मथुरा में महाकवियों की बस्ती रहा है। इस क्षेत्र में 'बिहारीपुरा' मोहल्ला लगभग इस क्षेत्र के मध्य में है, यह मोहल्ला मथुरा का एक प्राचीन मौहल्ला है। बिहारीपुरा और उसके चारों ओर के मोहल्लों में अनेक प्राचीन श्रेष्ठ कवियों के आवास रहे हैं।

मैं इसी 'बिहारीपुरा' में रहता हूँ, मेरे मकान की बाईं ओर की दीवार से सटे हुआ मकान में कभी प्रतिष्ठित  भाषा- वैज्ञानिक एवं साहित्यकार डाॅ. कैलाशचन्द्र भाटिया रहते थे जो बाद में देहरादून और अन्त में अलीगढ़ में जा कर रहे, यह उनका पैतृक आवास था। एक बार किसी साहित्यिक आयोजन में मेरी डाॅ. भाटिया जी से भेंट हुई तब उन्होंने ही मुझे यह बताया कि वे बिहारीपुरा मुहल्ले में, हमारे पड़ौसी रहे हैं। उन्होंने मुझे यह भी बताया कि रीति कालीन कवि बिहारीलाल अपने अन्तिम समय में जयपुर से मथुरा आकर इसी बिहारीपुरा में रहे थे। बाद में कविवर बिहारीलाल के नाम पर ही मोहल्ले का नाम बिहारीपुरा हुआ। बिहारी कवि के विषय में मुझे यह तो ज्ञात था कि वे माथुर चौबे थे, उनकी ससुराल मथुरा में थी और वे अपने अंतिम समय में मथुरा में आकर बस गये थे पर वे मथुरा में बिहारीपुरा में आकर बसे थे, यह बात मुझे सर्वप्रथम डॉ. कैलाशचन्द्र भाटिया से ही ज्ञात हुई थी।

बिहारीपुरा से पूर्व की ओर 'मारू गली' है, मारू गली में 'उद्धव शतक' के रचनाकार जगन्नाथदास 'रत्नाकर' के काव्य गुरु, उद्भट कवि आचार्य नवनीत जी चतुर्वेदी का आवास है। ये रीति काल के अन्त में हुए हैं। इनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर इनके पौत्र डाॅ. मानिकलाल चतुर्वेदी जो केन्द्रीय हिन्दी संस्थान से सेवानिवृत्त हुए थे, उन्होंने शोधकार्य किया था। जगन्नाथदास 'रत्नाकर' के अतिरिक्त महाकवि आचार्य गोविंद चतुर्वेदी, अमृतध्वनि छंद सम्राट कविवर रामलला आदि अनेक श्रेष्ठ कवि इनके शिष्य हुए हैं।

बिहारीपुरा के दक्षिण में मोहल्ला 'चूनाकंकड़ है, इस मोहल्ले में महाकवि ग्वाल का आवास था। वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. भगवानसहाय पचौरी ने ग्वाल कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोधकार्य किया है। इनका कार्यकाल भी रीति काल के अन्त में ही रहा है। चूनाकंकड़ पर आज भी ग्वाल कवि का शिव मंदिर है। चूनाकंकड़ से थोड़ा आगे, तिलक द्वार के समीप ही बल्ला गली में कविवर बल्लभसखा का आवास है। बल्लभसखा की होली बहुत प्रसिद्ध रही है। इनके नाम पर ही इनकी गली का नाम बल्ला गली रखा गया प्रतीत होता है।

बिहारीपुरा के पश्चिम में छत्ताबाजार को पार करके 'ताज पुरा' है। यहाँ मुग़ल बेगम ताज का आवास था। ताज बेग़म ब्रजभाषा की कृष्ण भक्त कवयित्री हुई हैं। इन्होंने वल्लभाचार्य जी के द्वितीय पुत्र गो. विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली थी। इन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति से युक्त बहुतसे पद और छंद लिखे हैं। इनकी यह पंक्ति "हों तौ मुग़लानी हिंदुआनी बन रहों गी मैं" बहुत प्रसिद्ध हुई है। कहा जाता है, श्रीनाथजी के समक्ष होली की धमार गाते गाते ताज बेगम ने अपनी देह छोड़ी थी। महावन में कविवर रसखान की समाधि के निकट ही, एक स्थान पर इनकी भी समाधि बनी हुई है।

बिहारीपुरा के उत्तर में रामजीद्वारा है, जहाँ महाकवि गो. तुलसीदास को श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीराम के दर्शन हुए थे। रामजीद्वारा के आगे अष्टछाप के कृष्ण भक्त कवि छीतस्वमी का आवास था, इनके वंशज आज भी वहाँ रहते हैं। इन कवियों के अतिरिक्त भी समय-समय पर इस क्षेत्र में अनेक कवि हुए हैं जिन्होंने भारती के भण्डार को भरा है। 

ब्रज विकास परिषद और मथुरा-वृंदावन नगर निगम को इस क्षेत्र का विकास एक साहित्यिक परिक्षेत्र के रूप में करना चाहिए। मारू गली और चूनाकंकड़ मोहल्लों के नाम क्रमश: कविवर नवनीत जी और कविवर ग्वाल के नाम पर रखे जाने चाहिए, यह माँग मैं बहुत समय से करता रहा हूँ। यथा स्थान सम्बन्धित कवियों के संक्षिप्त जीवन वृत्त शिलालेख के रूप में लगने चाहिए जिससे आगे आने वाली पीढ़ियों को उनके विषय में जानकारी मिलती रहे।


डॉ. नटवर नागर, मथुरा (उ. प्र.)

लेखक, पत्रकार एवं शिक्षाविद्

सोमवार, 13 जून 2022

सरकारी ओहदेदारों में कॉमनसेंस अभाव, उदाहरण देखें

 

मुझे नहीं मालूम… मेरा लेख पढ़ने वालों में से कितने लोग सरकारी पदों पर रहे होंगे और कितने अब भी सरकार को अपनी ”सेवाएं” दे रहे होंगे परंतु मुझे इतना अवश्‍य मालूम है कि सरकारी सेवाएं देने वाले अधिकांश सज्‍जन कॉमनसेंस का बेहद अनकॉमनली इस्‍तेमाल करते हैं। सरकारी ओहदेदारों की बात इसलिए कर रही हूं कि आमजन के मुकाबले उनसे ‘कॉमनसेंस’ के इस्‍तेमाल की अपेक्षा अधिक की जाती है क्‍योंकि समाज और सरकार दोनों ही उन्‍हें इसकी जिम्‍मेदारी सौंपते हैं परंतु अपने अनकॉमन-सेंस के चलते अधिकारों का दुरुपयोग इसी बिरादरी के एक व्‍यक्‍ति ने उस स्‍तर तक पहुंचा दिया है जिसके बारे में लिखते हुए भी मुझे बहुत कोफ्त हो रही है।

आज दो तीन खबरें ऐसी पढ़ीं कि जहां कानूनन काम करने, सरकारी योजनाओं के मुताबिक विकास कराने और फिर उस विकास से आमजन को सुविधाएं उपलब्‍ध कराने का अधिकार रखने वाले इन ‘सज्‍जनों’ की सोच पर तरस आता है, कि क्‍या हम सभ्‍यता के उस कंगलेपन तक पहुंच चुके हैं जहां से ये ‘काठ के उल्‍लू’ हमें अपनी उंगलियों पर नचाने के लिए ही सरकार से इतना वेतन पाते हैं। क्‍या सचमुच हम भी इस स्‍थिति के लिए जिम्‍मेदार नहीं हैं, जहां एक अदद सरकारी नौकरी से ‘निश्‍चित भविष्‍य’ पाने की आशा अब जुगुप्सा में बदल चुकी है, जहां राजा बनने की चाह ‘सरकारी नौकरी’ ही नहीं दिलवाती बल्‍कि कॉमनसेंस को परे रख कर उन्‍हें अपना चाबुक चलाने की भी छूट देती है।

चलिए वो खबरें भी बता ही दूं जिसने मुझे इतना कटु सोचने पर बाध्‍य किया

तो पहली खबर ये है उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध धार्मिक नगरी मथुरा के जिलाधिकारी नवनीत चहल की, जिन्‍होंने डेढ़ साल का कार्यकाल यहां बीत जाने पर अब जाकर विकास कार्यों की समीक्षा की और पाया कि गोवर्धन में 50 करोड़ रुपये के ड्रेनेज सिस्‍टम प्रोजेक्‍ट में जिस 25 किमी तक नाले का निर्माण किया जाना था, वह पिछले 5 सालों में सिर्फ 15 किमी तक ही बना है। जैसा कि हर बार होता है, उन्‍होंने खानापूरी करते हुए जल निगम के अधिकारियों को डांटा, जलनिगम के अधिकारी ने अधीनस्‍थों को, उन्‍होंने 15 किमी नाले की रिपोर्ट थमा कर प्रोसीडिंग आगे सरका दी …और बस हो गया काम। क्‍या डीएम ये बता सकते हैं कि पिछले डेढ़ साल में उन्‍होंने इतने बड़े प्रोजेक्‍ट की खबर क्‍यों नहीं ली, और ऐसे कितने ही प्रोजेक्‍ट हैं जिनकी फाइलें अभी भी बस सरकाई जा रही हैं।

दूसरी खबर एक यूपी पुलिस से जुड़ी है, जिसकी कारस्‍तानी सुनकर आप भी अपना माथा पीट लेंगे। दरअसल, यूपी के जिला कन्नौज की कोतवाली छिबरामऊ का है। यहां एक युवती की शिकायत पर एक युवक के खिलाफ सिर्फ इसलिए केस दर्ज कर लिया क्‍योंकि उस युवती ने सपने में देखा था कि वह युवक उससे छेड़खानी कर रहा है। अनकॉमनसेंस की ऐसी पराकाष्‍ठा…देखी है कहीं आपने। आखिर ऐसा क्‍यों ?

तीसरी खबर है जिला अस्‍पताल मथुरा के सीएमएस की। मथुरा नगरी में बंदरों का आतंक किसी से छुपा नहीं है, लेकिन यहां के सरकारी अस्‍पताल में रैबीज के इंजेक्‍शन ही नहीं हैं, और जब मंकीपॉक्‍स की खबर फैली तब जाकर इंजेक्‍शन्‍स के लिए सरकारी ऑर्डर भेजा। इतना ही नहीं, जिले के अस्‍पतालों में सफाई, दवाइयों के स्‍टॉक, एक्‍सपायरी दवाओं को फेंकने, मरीजों के लिए पानी तक की सुविधा के लिए मंत्रियों को इनकी क्‍लास लेनी पड़ती है। आखिर ऐसा क्‍यों?

चौथी खबर जुड़ी है मथुरा नगर निगम के ईओ अनुनय झा से, जो शहर में नए नए वेंडिंग जोन का फीता काटकर स्‍वयं तो अखबारों के पन्‍नों पर आ जाते हैं परंतु दोचार दिन में ही वेंडिंग जोन गायब हो जाते हैं और ढकेल वाले फिर से वहीं सड़क किनारे खड़े दिखाई देते हैं। यहां भी कॉमनसेंस की ही समस्‍या है, जब वेंडिंग जोन ग्राहकों की पहुंच से दूर बनाए जाएंगे, तो भला दुकानदार क्‍योंकर इस व्‍यवस्‍था को स्‍वीकार करेंगे।

उक्‍त संदर्भ तो कुछ उदाहरणभर हैं कॉमनसेंस की धज्‍जियां उड़ाने के, जिसकी अपेक्षा कम से कम डीएम और नगरनिगम के ईओ जैसे आईएएस अधिकारियों से तो की ही जा सकती है। बहरहाल, यदि आप में से कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी हैं तो वह अपने काम को लेकर इसका मनन अवश्‍य करें कि आखिर क्‍यों हमें ”ऊपर से” ऑर्डर लेने की इतनी आदत पड़ गई है…आखिर क्‍यों सरकार के ताबेदारों में कॉमनसेंस नदारद हो गया है…। कॉमनसेंस का अभाव जो मुझे दिख रहा है, क्‍या वो आपको भी महसूस होता है।

- अलकनंदा सिंंह

बुधवार, 25 जुलाई 2018

स्‍वयं ही साधना होगा अपने गुरूत्‍व को

हम सनातनधर्मी सदैव दो धाराओं में बहते हैं और समयानुसार इनका उपयोग-सदुपयोग-दुरूपयोग  भी कर लेते हैं। अब देखिए ना गुरूपूर्णिमा के उत्‍सव को लेकर भी तो यही हो रहा है। 

मथुरा में गुरू पूर्णिमा पर गोवर्धन में होने वाला मुड़िया मेला शुरू हो चुका है। शासन द्वारा मेले  का घोषित समय 23 जुलाई से लेकर 27 जुलाई तक है। कहा जा रहा है कि इस बार श्रद्धालुओं  की संख्‍या एक करोड़ भी हो सकती है परंतु हम ब्रजवासी जानते हैं कि शासन की तय तिथियां  और व्‍यवस्‍थाएं श्रद्धा के इस ज्‍वार के आगे कोई मायने नहीं रखतीं। हालांकि ब्रज के ग्रामीण  इलाकों में खास बदलाव नहीं आता परंतु शहरवासियों के लिए अघोषित कर्फ्यू की स्‍थिति होती है  और साथ ही होती है श्रद्धालुओं के लिए स्‍वागत की भावना भी। एक ओर सड़कों के किनारे  चलने वाले परिक्रमार्थी अटूट मानवश्रृंखला बनाकर इस पर्व का आनंद लेते हैं तो दूसरी ओर  ब्रजवासी उस श्रृंखला में घुसकर अपने गंतव्‍य के लिए रास्‍ता तलाशते रहते हैं।   

27 जुलाई अर्थात् शुक्रवार को गुरू पूर्णिमा है, इसी दिन चंद्रग्रहण भी है, सूतक लगने और गुरू  पूजन के लिए सभी मंदिरों, मठों, आश्रमों ने अपने-अपने अनुयायियों को सूचनाएं दे दी हैं कि  कब तक गुरू पूजन और गुरुओं का ''दर्शनलाभ'' लिया जा सकता है़।

ब्रज में गुरु पूर्णिमा का महत्‍व इसलिए भी बढ़ जाता है क्‍योंकि चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता  और आदिगुरु महर्षि वेदव्‍यास की तपस्‍थली मथुरा के कृष्‍णगंगा घाट पर है। अपने-अपने गुरुओं  में इन्‍हीं आदि गुरू का अंश मानकर श्रद्धालु 'ब्रज में गुरूपूर्णिमा' को अधिक महत्‍व देते हैं। गुरू  पूर्णिमा पर ही गोवर्द्धन में मुड़िया पूनों मेले का महत्‍व इसलिए है क्योंकि आषाढ़ मास की इसी  पूर्णिमा पर सनातन गोस्वामी का तिरोभाव हुआ था जिनके अनुयायी अपना सिर मुंडवाकर गुरू  के प्रति भक्‍ति जताते हैं, इसलिए इसे मुड़िया पूनों कहा जाता है।

गुरु-वरण की महिमा शास्त्रों में इतनी बतायी गयी है कि बिना गुरु वाले व्यक्ति को “निगुरा” नामक निंदक उपाधि देकर अपमानित किया गया है परंतु अब तमाम प्रवचनों-श्रद्धाओं-मान्‍यताओं की परंपराओं से ज़रा हटकर देखें तो गुरू के प्रति श्रद्धा जताने का ये पर्व अब खालिस व्‍यापारिक रूप में हमारे सामने है। इस बार चूंकि चंद्रग्रहण भी है तो गुरू स्‍वयं अपने शिष्‍यों (कर्मचारियों और मैनेजरों) के माध्‍यम से ये घोषणा करवा रहे हैं कि अमुक तिथि और अमुक समय पर अमुक विधि से गुरू का ''आशीर्वाद'' ले लें अन्‍यथा ''लाभ'' नहीं होगा, इस चेतावनी और धमकी के बाद अब ये लाभ कैसे और किसे होगा, इस पर फिर कभी लिखूंगी।
शासन की तमाम व्‍यवस्‍थाओं पर भारी पड़ती गुरूभक्‍तों की भीड़ बताती है कि श्रद्धा भी अब  कितनी दिखावटी हो गई है। देवता भले ही सो गए हों परंतु मंदिरों में उन्‍हें जगाने प्रक्रिया जारी  है। जिन गुरुओं पर अपने शिष्‍यों के भीतर उनके ''स्‍व-तत्‍व'' को जगाने की जिम्‍मेदारी है, वे अब  परिवर्तित होकर स्‍वयं को ईश्‍वर बनाने और घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।  गुरूदक्षिणा के पैकेज जारी कर दिये गए हैं। जो अच्‍छी दक्षिणा देगा, वह आश्रम का एसी रूम  लेने का अधिकारी है और जिनकी सामर्थ्‍य कम है, उसे खुले में, टेंट में, आश्रम के बरामदे में  डेरा डाल कर ''गुरू के आशीर्वाद से'' काम चलाना होगा। गुरुओं के ठिकानों पर बाकायदा  फूल-फल-मिठाई-कंठी-टेंट आदि के ठेके उठा दिये गए हैं।

जहां तक बात गुरुओं की है तो धर्म के इस व्‍यापार में गुरू पूर्णिमा एक ऐसा मौका है जिसके  माध्‍यम से धर्मगुरू पूरे साल का ''भंडारण'' कर लेंगे परंतु क्‍या धर्म के इस उथले रूप के लिए  सिर्फ गुरू ही जिम्‍मेदार हैं, नहीं...बिल्‍कुल नहीं। अपने भीतर झांकने को, अपना गुरू स्‍वयं बनने  को प्रेरित करने वाली शिक्षाओं का क्‍या कोई अर्थ नहीं। अशिक्षितों को बहलाया जाना तो फिर  भी समझ आता है परंतु उनका क्‍या जो धन, बुद्धि और विवेक वाले हैं। 
वास्‍तविक गुरू कौन है, गुरूदक्षिणा का अर्थ क्‍या है, ईश्‍वर को पाने का माध्‍यम गुरू कौन है,  धर्म-अधर्म का ज्ञान देने वाला गुरू क्‍या स्‍वयं इससे निरपेक्ष है...आदि ऐसे कितने ही प्रश्‍न हैं  जिनका उत्‍तर हमें इस गुरूपूर्णिमा पर जानने का प्रयास तो करना ही चाहिए। शेष रही बात हम  ब्रजवासियों की, तो हर श्रद्धालु का स्‍वागत करना हमारा कर्तव्‍य है और धर्म के बिगड़ते रूप के  सत्‍य से अवगत कराना भी, सो हम करते रहेंगे। जड़ता छोड़कर गुरू दत्‍तात्रेय ने 22 गुरू यूं ही  नहीं बनाये थे, उन्‍होंने बाकायदा उनकी खूबियां देखी थीं। ब्रज तो यूं भी कटुसत्‍य कहने वाले  कान्‍हा की नगरी है जिन्‍होंने सड़ीगली परंपराओं को बांसुरी के सहारे ही जागरूकता फैलाई थी।
महाभारत के अध्‍याय ११.७ में बताया गया है कि अमरता और स्वर्ग का रास्ता सही ढंग से तीन गुणों का जीवन जीना है: स्व- संयम (दमः), उदारता (त्याग) और सतर्कता (अप्रामदाह) अर्थात् स्‍वयं को स्‍वयं से परिचित कराना ही गुरूत्‍व को प्राप्‍त करने की संपूर्ण विधि है, तो स्‍वयं अपने गुरू बनो।

-अलकनंदा सिंह