बुधवार, 29 जनवरी 2014

DCW अध्‍यक्ष के लिए मैत्रेयी पुष्‍पा का नाम!


नई दिल्ली। 
दिल्ली सरकार ने प्रख्यात उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा का नाम दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) की नयी प्रमुख के लिये उपराज्यपाल नजीब जंग के पास भेजा है। एक सरकारी अधिकारी ने बुधवार को कहा कि डीसीडब्ल्यू के अध्यक्ष पद पर किसी गैर राजनीतिक और जानीमानी हस्ती को नियुक्त करने के अपने वायदे के तहत सरकार ने मैत्रेयी पुष्पा का नाम उपराज्यपाल के पास भेजा है। यह सुझाव आम आदमी पार्टी (आप) सरकार द्वारा डीसीडब्ल्यू की अध्यक्ष बरखा सिंह पर अपने पद का राजनीतिकरण  करने के आरोप के परिप्रेक्ष्य में आया है। आप ने उस रात के छापे की घटना को लेकर यह आरोप लगाया था जिसमें कानून मंत्री सोमनाथ भारती शामिल थे।
69 वर्षीय पुष्पा हिंदी उपन्यासकार हैं जिन्होंने दस उपन्यास और सात लघुकथा संग्रह लिखे हैं। उनकी कतियों में चाक  अल्मा कबूतरी, झूला नट और एक आत्मजीवनी कस्तूरी कुंडली बसे  शामिल हैं।
उनकी अधिकृत वैबसाइट के अनुसार वे महिलाओं से जुड़े सामयिक मुद्दों पर अखबारों में लिखती हैं और अपने बेबाक विचारों के लिये जानी जाती हैं। पुष्पा का जन्म अलीगढ जिले के सिर्कुरा गांव में हुआ था। उनका बचपन झांसी के पास बुंदेलखडं में खिल्ली नामक गांव में बीता और उन्होंने झांसी के बुंदेलखंड कालेज से स्नातोकोत्तर की डिग्री ली।
इससे पहले दक्षिण दिल्ली में कुछ अफ्रीकी महिलाओं के खिलाफ छापेमारी के लिये डीसीडब्ल्यू ने भारती को तलब किया था । भारती को 24 जनवरी को पेश होना था लेकिन उनकी जगह उन्होंने अपना वकील भेजा। -एजेंसी

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

...हमारा द्रौपदी हो जाना

संबंधों के सिमटते दायरों और सभ्‍यता व संस्‍कृति के क्षरण को लेकर बहसों से जुड़ा अरबों का  करोबार दुनिया में फैला है । स्‍वयं हिन्‍दुस्‍तान में न जाने कितने साधु संत,न जाने कितने आश्रम, नाजाने कितनी स्‍वयंसेवी  व समाजसेवी संस्‍थायें हैं फिर भी आज तक संबंधों को बचाने की और उनमें निरंतरता लाने की मशक्‍कत जारी है जबकि इसका समाधान हमारे इतिहास और हमारे पूर्वजों के ज्ञान में बाकायदा मिलता है ।
अकसर ऐसा होता है कि हम दूसरों को जानने का तो प्रयास लगातार करते रहते  हैं मगर कभी खुद अपने भीतर झांकने की कोशिश तक नहीं करते। यह हमारी, स्‍वयं को  सर्वज्ञ समझने व औरों में ताकाझांकी, करने जैसी दो बुरी प्रवृत्‍तियां हैं।
इन दोनों ही प्रवृत्‍तियों से निकला हमारी सोच का एक अच्‍छा पक्ष ये रहा कि इसने हमें न सिर्फ अपनी आत्‍मिक वृहदता का ज्ञान कराया बल्‍कि हमें एक पूर्ण पुरुष दिया और उसके सखाभाव का परिचय कराती एक पूर्ण स्‍त्री भी दी जो हमें स्‍वयं को हर रूप में जानने की सीढ़ी बन सकते हैं।  संबंधों की पूर्णता पर बहस यदि इन दोनों ही सखा-सखी से जुड़े अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों से जोड़कर की जाये तो परिणाम सार्थक निकल सकते हैं। जो भी हो हमारी इन्‍हीं ताकाझांकी वाली प्रवृत्‍तियों ने ही, हमारे हजारों वर्ष पुराने इतिहास से और उसके ऐसे चरित्रों से भी परिचित कराया है जो आज भी प्रेरणादायी हैं।
जी हां, और वो पूर्ण पुरुष हैं श्रीकृष्‍ण और उनसे जुड़ी प्रत्‍येक वो घटना, जो मात्र घटना न होकर प्रसंग बन गई। इन्‍हीं प्रसंगों में 'द्रौपदी से श्रीकृष्‍ण का नाता' भी आता है जिसे  आजतक पूर्णरूपेण तो कोई भी परिभाषित नहीं कर पाया है परन्‍तु सखी और सखा का ये अनूठा रिश्‍ता आज भी अपनी सतही सोच के चलते सतही  तौर पर ही जाना जा सका है और संबंधों की ये सतही स्‍थिति आज हमारे अनेक प्रश्‍नों की वजह भी बनी हुई है। हमें स्‍वयं को जानने और समाज को बताने के लिए हमारे ये ऐतिहासिक चरित्र काफी सहायता कर सकते हैं।
अब देखिए ना, जिसतरह कृष्‍ण हमारे लिए किसी पहेली से कम नहीं रहे ठीक वैसे  ही द्रौपदी भी बनीं रही। वो असामान्‍य हस्‍ती थीं- क्‍योंकि धर्म, न्‍याय और प्रेम के साथ धीरज का  सामंजस्‍य बनाकर चलना आसान नहीं होता, वह भी अपनी अस्‍मिता को अक्षुण्‍ण रखकर।
अभी तक जितने भी धर्म और इतिहास के ज्ञाता हुये हैं उन्‍होंने द्रौपदी को मात्र  'पांच पतियों की स्‍त्री' या 'जिसके पीछे महाभारत हुआ' के रूप में एक सामान्‍य से  लगने वाले चरित्र के रूप में पेश किया, द्रौपदी के आध्‍यात्‍मिक पक्ष को उन्‍होंने नकार सा दिया जबकि कृष्‍ण ने उन्‍हें इसी आध्‍यात्‍मिक आधार पर अपनी सखी बनाया था।
साहित्‍यिक दृष्‍टि से भी अपनी अपनी कल्‍पनाओं के आधार पर द्रौपदी को जानने का बहुत प्रयास किया गया तो वहीं आलोचनाओं का अंबार भी द्रौपदी के  हिस्‍से खूब ही आया बल्‍कि इतना कि मां-बाप अपनी संतानों का नाम द्रौपदी रखने से बचने लगे। चारित्रिक आचरण पर भी लांक्षन खूब झेले द्रौपदी ने द्वापर युग से लेकर अब तक झेल रही है । हद तो तब होती है जब पुरुष आज भी अपने 'अनेक स्‍त्रियों के साथ संबंधों ' को उचित ठहराते हुये स्‍वयं की तुलना कृष्‍ण से कर बैठते हैं ठीक इसी प्रकार स्‍त्रियां भी अपने 'इतर संबंधों' को द्रौपदी की तुला पर तोलती हैं। यह बिल्‍कुल ऐसा ही है कि थाली के पानी में दिखने वाले चंद्रमा को हम वास्‍तविक समझने लगते हैं।
द्रौपदी और कृष्‍ण के संबंधों को मापने पर आज तक बहस जारी है क्‍योंकि बहस का मुद्दा भी तो वहीं से पनपता है जो अबूझ रह जाता है और ये तब तक मौजूद रहेगा जब तक हम स्‍वयं को जानने से दूर भागते रहेंगे। हम अकसर उतना ही जान पाते हैं जितना हम जानना चाहते हैं या अपने बारे में जानते हैं, अपने से आगे बढ़ता हुआ कुछ दिखाई ही नहीं देता । इसीलिए आज भी यह मानना कठिन हो रहा है कि आखिर कोई स्‍त्री अपनी 'शुचिता' बनाये रखकर भी पांच पांच पतियों के साथ कैसे पत्‍नीधर्म निभा पाई। यदि द्रौपदी इतनी ही सामान्‍य या लांक्षना की पात्र होतीं तो क्‍या कृष्‍ण धर्म स्‍थापना के लिए 'महाभारत' और महाभारत के लिए द्रौपदी का चयन करते ? संभवत: नहीं, क्‍योंकि द्रौपदी सामान्‍य स्‍त्री नहीं थी। वह संबंधों की एक ऐसी निरंतरता थी जो व्‍यक्‍ति से व्‍यक्‍ति तक धर्म का अलग अलग संदेश देती रही अपने अंतिम समय तक। बिल्‍कुल कृष्‍ण की तरह जिन्‍होंने व्‍यक्‍तिगत आक्षेपों को लेकर सिर्फ धर्म का प्रतिदान किया। जहां तक बात है पांच पतियों के बावजूद शुचिता की तो वह भी उसके प्रेम की अनन्‍तता के कारण ही संभव हो सका, जिसमें कहीं कोई दुविधा नहीं ,कहीं कोई द्वैत नहीं। संभवत: इसीलिए श्रीकृष्‍ण ने कहा कि 'तुम कौन हो, तुम्‍हारे जन्‍म का औचित्‍य क्‍या है?' इसका उत्‍तर तुम्‍हारे अपने अंतर में अपनी आत्‍मा में छुपा है, यदि तुमने उससे सवाल करना शुरू कर दिया तो तुम्‍हें किसी से सवाल करने की जरूरत ही नहीं रह जायेगी और जब एकबारगी ये सिलसिला चल निकलेगा तो...द्रौपदी की शुचिता पर सारे सवाल बेमानी हो जायेंगे।
बात इतनी सी है कि जिनसे हमें संबंधों को उचित ढंग से निबाहने और समाज को सुदृढ़ बनाने की प्रेरणा लेनी चाहिए उनमें द्रौपदी और श्रीकृष्‍ण का सखी - सखा संबंध सर्वोत्‍तम उदाहरण है। धर्म पर चलने के लिए व्‍यक्‍तिगत स्‍वार्थों और व्‍याक्‍तिगत हितों से आगे बढ़कर हम जब तक नहीं सोचेंगे तब तक हम द्रौपदी जैसे चरित्रों पर उंगली तो उठाते ही रहेंगे, संशयों में भी जियेंगे कि आखिर कैसे द्रौपदी को पांच महासतियों में गिना गया। महासतियां मतलब पांच पवित्रतम स्‍त्रियां...ये सिर्फ इसलिए नहीं था कि वो कृष्‍ण की सखी थीं। ये बात बढ़ी अर्थपूर्ण मानी जाती रही है और ये इस तथ्‍य की सूचक है कि द्रौपदी प्रेम की अनंतता को स्‍वयं परिभाषित कर पाई और स्‍त्रियों के लिए उन मानदंडों की स्‍थापना कर पाई कि जिनमें वह एक ही समय कई कर्तव्‍यों को पूरा कर सकती है। आज भी स्‍त्रियां यह सब कर हरी हैं परंतु अपनी अपनी खूंटियों से बंधकर और ये खूंटी कोई प्रत्‍यक्ष हों ,ऐसा नहीं हैं ,कई अप्रत्‍यक्ष भी हैं,उनकी अपनी सोचों को जो बांधे हुये हैं। जब तक ऐसा बना रहेगा तब तक  पुरुष और स्‍त्री दोनों ही समाज में संबंधों की शुचिता के लिए प्रश्‍नों को खड़ा करते रहेंगे। निश्‍चित ही ये स्‍थिति समाज के ,धर्म के ठेकेदारों के लिए मुफीद बनी रहेगी वहीं हम स्‍वयं को जानने से बहुत दूर निकल गये होंगे।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 19 जनवरी 2014

मैंने ही नहीं पी, तूने भी तो पी है.....

मैंने ही नहीं पी, तूने भी तो पी है.....वे दोनों दोस्‍त पंचों के फरमान को तोड़ने का दुस्‍साहस करने जा रहे थे मगर अभी ये बहस कानाफूसी स्‍टाइल में चल ही रही थी कि एक ग्रामीण  पंचों को ले आया और पंचों के सामने दोनों दोस्‍तों को आर्थिक दंड के साथ शराब को फिर कभी हाथ न लगाने के लिए अपने बच्‍चों की कसम खानी पड़ी।
इतना ही नहीं, भीषण ठण्‍ड के बावजूद उन पर ये ज़िम्‍मेदारी भी डाली गई कि वो आसपास  के चालीस कोसों तक शराब पर प्रतिबंध को लेकर जनजागरण करेंगे। चूंकि पंच जानते हैं कि शराब के लती या शौकीनों को बच्‍चों की कसम और आर्थिकदंड से नहीं रोका जा सकता, इसलिए उन्‍होंने इस कोहरे से लदी-फदी ठंड में बाहर निकलने की जिम्‍मेदारी डाल दी जो उन्‍हें शराब से दूर रखने में ज्‍यादा कारगर थी। अब वे दोनों रोज़ाना सुबह निकलते हैं और हर दिन एक गांव में जाकर शराब बंदी के प्रति लोगों को जागरूक करते हैं। इससे आगे का काम फिर पंचों का होता है।
जी हां! ये ब्रजक्षेत्र में शराब, शराबियों, ठेकेदारों और शराब माफियाओं के खिलाफ चलाया जाने वाला एक अनोखा अभियान है जिसे महज एक ग्राम पंचायत ने यूं ही एक प्रयोग के तौर पर शुरू किया था लेकिन आज एक दर्जन ग्राम पंचायतों में यह अभियान सफल रहा है । कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली के दूरदराज गांवों में ये अलख जगाकर पंचों ने तमाम नेतागिरी को आइना दिखाया है कि यदि इच्‍छाशक्‍ति हो तो कोई भी सुधार कार्यक्रम अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए न बजट की जरूरत है... न सरकारी लावलश्‍कर की.... और ना ही अफसरशाही की।
अब तो आलम ये हो चला है कि जनपद मथुरा की हरियाणा और  राजस्‍थान से लगी सीमाओं तक इस अभियान ने अपना दायरा फैला लिया है। शराब माफियाओं के पैर उखड़ने लगे हैं, हालांकि अभी माफिया से पूरी तरह निजात मिलना बाकी है ।
 ये वही क्षेत्र है जहां गौकशी, अवैध हथियार सप्‍लाई, टटलुओं (पीतल को सोना बताकर अपराध करने वालों) की भारी मौजूदगी, बड़े बड़े ट्रकों की लूट एवं उनके चालक-परिचालकों की हत्‍या के साथ-साथ गांव के गांव वाहन चोरी के ऐसे गढ़ बन चुके हैं, यहां पुलिस को नाकों चने चबाने पड़ते हैं। पुलिस  के तमाम अधिकारी तो इसे बर्र के छत्‍ते की संज्ञा भी दे चुके हैं क्‍योंकि यहां अपराधी खोजे नहीं मिल सकता ।
ग्राम पंचायतों द्वारा सख़्ती के साथ लागू किए गये इस सुधार कार्यक्रम को अब आसपास की ग्राम पंचायतें स्‍वेच्‍छा से चलाने को रोज मशक्‍कत कर रही हैं। कोसी, छाता, शेरगढ़ से चलता हुआ ये अभियान अब राजस्‍थान के सीमावर्ती गांवों तक भी पहुंच गया है।
आज नज़ारा ये आम होता है कि न कोई भवन.. ना कोई चाय-नाश्‍ते का इंतजाम.. न कोई फाइलों का अंबार...और ना कोई वाहन..हर रोज पैदल चलकर जनजागरण की धुन... बस खुले में जल रहे अलावों के  आसपास खालिस ग्रामीण वेशभूषा में जमा होते पंच और जनता से उठती शपथ लेने की आवाजें बता रही हैं कि शराबबंदी के लिए चलाया जा रहा ये अभियान अब थमने वाला नहीं है। सिर्फ शराब पिलाकर ही शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी बरबादियों के इस मंज़र को भुगतने के लिए जो ग्रामीण अभिशप्‍त थे, वे आज सुधारक की भूमिका में हैं ।  जिस शिद्दत से  ग्रामीणों ने अपने इस अभियान को परवान चढ़ाने का जिम्‍मा अपने ही कंधों पर लिया है,उससे माफिया , अफसरों और उन नेताओं के होश फ़ाख्‍़ता हुये हैं जो अभी तक ग्रामीणों को अपनी उंगलियों पर नचाते आये थे।
एक बात और जनआंदोलन सरीखी दिखने वाली शराबबंदी की ये अनूठी कोशिश अभी तक विलुप्‍त हो चुकी पंचायत-व्‍यवस्‍था के प्रति 'आस्‍था' को वापस ला रही है। जनहित के निर्णय में युवाओं का वापस बढ़चढ़कर हिस्‍सा लेना शुभ संकेत है 'ग्राम - सुराज' का । इन पंचायतों ने नशाबंदी क्षेत्र में शराब विक्रेताओं पर 5100 रु. और शराब पीने वाले व्‍यक्‍ति पर 1100 रु. का दंड रखा है । साथ ही दंडस्‍वरूप दोषी व्‍यक्‍ति जनजागरूकता के लिए नये गांवों में जाकर अन्‍य लोगों को इस अभियान के प्रति चेतायेगा।
निश्‍चित ही इस एक लत से निजात दिलाकर तमाम अपराधों को न केवल रोका जा सकता है बल्‍कि संपन्‍नता और समृद्धि का नया ककहरा भी गढ़ा जा सकता है...बस ये अभियान यूं ही चलते रहना चाहिए...।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

नहीं रहे मराठी कवि नामदेव ढसाल

मुंबई। 
मशहूर मराठी कवि नामदेव लक्ष्मण ढसाल का आज मुंबई में निधन हो गया है. वे लंबे समय से आंत के कैंसर से पीड़ित थे. सितंबर, 2013 में इलाज के लिए उन्हें मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था जहां आज सुबह करीब 4 बजे उनका निधन हो गया। बताया गया है कि नामदेव लक्ष्मण ढसाल के शव को कल अंतिम दर्शन के लिए बाबा साहब हॉस्टल ग्राउंड में रखा जाएगा और दोपहर बाद एक बजे उनकी अंतिम यात्रा मुंबई के वडाला के डॉक्टर अंबेडकर कॉलेज से शुरू होगी. नामदेव ढसाल का जन्म 15 फरवरी 1949 को पुणे के एक दलित परिवार में हुआ था. ग़रीबी के बीच ढसाल का बचपन मुंबई के गोलपिठा में बीता. युवा होते होते नामदेव ढसाल आजीविका चलाने के लिए टैक्सी ड्राइवर बन गए थे हालांकि अपने और अपने समाज के दर्द को उकरेने के लिए साहित्य और राजनीति उनका स्थायी मुकाम बन गया.
वरिष्ठ हिन्दी लेखक उदय प्रकाश ने नामदेव ढसाल के योगदान को याद करते हुए बताया कि ढसाल सही मायने में विद्रोही कवि थे. उन्हें आप प्रगतिशील नहीं कह सकते. उनकी कविताओं में बहुत ही तीव्र और बहुत तीखी प्रतिक्रिया थी. सड़कों और गटरों में पैदा होने वाली भाषा को उन्होंने कविता में आयात किया और कविता की परंपरा को बदल दिया.
ढसाल का पहला काव्य संग्रह 'गोलपिठा' मराठी साहित्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशियाई साहित्य में अहम जगह बनाने में कामयाब रहा.
इसके बाद उनके कई काव्य संग्रह 'मुर्ख महात्राणे', 'तुझी इयाता कांची', 'खेल' और 'प्रियदर्शिनी' चर्चित रहे. उन्होंने दो उपन्यास भी लिखे. 'आंधले शतक' और 'आंबेडकरी चालवाल' नाम से लिखे राजनीतिक पत्र भी चर्चित हुए. ढसाल बीते कुछ दिनों तक मराठी दैनिक 'सामना' में स्तंभ लिखते रहे. इससे पहले 'साप्ताहिक सत्यता' का संपादन भी उन्होंने किया.
नामदेव ढसाल को पद्मश्री, सोवियत लैंड पुरस्कार, महाराष्ट्र राज्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका था. साहित्य अकादमी ने उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया था. जीवन के आखिरी सालों में लगातार बीमारी के वजह से उनकी सक्रियता कम हुई थी. इसी पड़ाव पर वे राजनीतिक तौर पर शिवसेना से जुड़ गए, जिसके चलते उनकी आलोचना भी हुई.
उनके जीवन में पहला अहम पड़ाव साल 1972 में तब आया जब अपने मित्रों के साथ उन्होंने दलित पैंथर आंदोलन की शुरुआत की. ढसाल इस आंदोलन का मुख्य चेहरा बनकर उभरे. इस संगठन ने दलित उत्पीड़न का जवाब बेहद रैडिकल तरीके से दिया और 1972-75 तक इसका प्रभाव देश भर में देखने को मिला. दलित पैंथर्स आंदोलन मुंबई के अभिजात्य तबके के ख़िलाफ़ कविता के क्षेत्र में बड़ा हस्तक्षेप था.- एजेंसी

शनिवार, 11 जनवरी 2014

लाइमलाइट में आइये..अचूक नुस्‍खा

जब से दामिनी केस हुआ है तब से अचानक ही औरतों के शुभचिंतक उनके हितों  को लेकर लाइमलाइट में आने का बहाना ढूढ़ने लगे हैं.. गोया औरत...औरत ना  हुई इज्‍़जत के ठेके का सामान हो गई कि जिसे जब चाहें..जो चाहे.. तब उठाने पर आमादा हो जाये.. और अगर इस प्रक्रिया में साथ ही खबरों की सुर्खियां भी बन जाये तो..यानि हर्र लगे ना फिटकरी रंग चोखा भी आ जाये। इन्‍हीं सुर्खियों में आने को औरतें अपनी बेचारगी का रोना रोने से नहीं कतरातीं और मीडिया उन्‍हें बेचारा बनाने से बाज नहीं आता। फिलहाल इसका केंद्रबिंदु कॉमेडी नाइट्स के कपिल शर्मा बने हुये हैं जिन्‍हें दो संस्‍थाओं ने महिलाओं का अपमान करने के मामले में नोटिस थमा दिया है।

आजकल ऐसे ऐसे मुद्दों को औरतों के सम्‍मान से जोड़कर अदालतों तक ले जाया जा रहा है  जिन्‍हें हम रोजमर्रा में बस यूं ही हंसी में उड़ा देते हैं। औरत-मर्द अलग अलग हों  या पति- पत्‍नी, किसी भी रूप में हों, ठिठोलियों में तो ये लगभग सेंटर प्‍वाइंट  ही होते  हैं। अब अगर हर मजाक को हम सम्‍मान और असम्‍मान से जोड़ने बैठ जायें तो जो मौके आज हमें अपनी ज़िंदगी की बजाय टीवी में से तलाश करने पड़ रहे हैं वे फिर वहां से भी नदारद हो जायेंगे। अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से मजाक गायब करने में वैसे ही कितने नियम कानूनों के रोड़े हैं ।

फिर प्रचार पाने को लोग क्‍या क्‍या हथकंडे नहीं अपनाते , यह महाराष्‍ट्र की दोनों  सामाजिक संस्‍थाओं ने बता दिया। महाराष्‍ट्र के महिला आयोग की पब्‍लिक  रिलेशन आफीसर मनीषा निर्भावने द्वारा दो सामाजिक संस्‍थाओं- कादियाने वागा  और भारतीय मुस्‍लिम महिला आंदोलन की शिकायत के आधार पर 'कॉमेडी  नाइट्स विद कपिल' के खिलाफ एक्‍शन लिया है कि शो के प्रस्‍तोता  कपिल शर्मा ने महिलाओं की बेइज्‍जती की है। अपने एक मजाक में कपिल शर्मा ने गर्भवती महिलाओं  को भद्दे रूप में पेश किया है। इतना ही नहीं ये दोनों ही संस्‍थायें चाहती हैं कि  कपिल शर्मा आइंदा से शो में प्रस्‍तुति दे रहीं अन्‍य महिला कलाकारों को भी नीचा  दिखाना बंद करें।
जिसने भी शो को देखा हो वह एकबारगी भी यह नहीं कहेगा कि शो  नॉनफैमिलियर है या इसमें फूहड़ता है बल्‍कि इसके ठीक उलट इसके कंटेंट की वजह से ही ये शो बच्‍चों से लेकर बूढ़ों तक लोकप्रिय है। रात को देर से आने की वजह भी इसकी ऑडिएंस को कम नहीं कर सकी। दूसरी ओर दोनों ही संस्‍थायें अपने किसी सामाजिक कार्य के लिए खबरों में नहीं आ सकीं तो उन्‍होंने ये हथकंडा अपनाया। अब इस एक प्रकरण से महिला हित के नाम पर उनकी झंडाबरादार बन जायेंगीं सो फायदा अलग से ।
हकीकतन, शो में आने वाली सेलेब्रिटी हों या शो की ऑडिएंस सभी जानबूझकर ऐसी बातें करते हैं कि कपिल शर्मा को उनकी खिल्‍ली उड़ाने का मौका मिलता है और यहीं ये ह्यूमर पैदा होता है।

ज़रा इन गुमनाम सी संस्‍थाओं से कोई ये पूछे कि सास-बहू टाइप जो नाटक टीवी पर चल रहे हैं, उनमें औरतों को कितने गिरते हुये स्‍तर तक दिखाया जाता है या जो अन्‍य कॉमेडी शो जिनमें अश्‍लील जोक औरतों को लेकर सुनाये जाते हैं अथवा अश्‍लीलता भरे एक्‍ट किये जाते हैं...या जो विज्ञापन दिखाये जा रहे हैं लगभग निर्वस्‍त्र स्‍त्रीदेह के संग... उनपर तो इन्‍होंने कोई एक्‍शन नहीं लिया और अचानक अब इन्‍हें औरतों के सम्मान की बात सताने लगी।मुझे तो लगता है कि ये संस्‍थायें भी अपना मजाक ही उड़वाने को ऐसा कर रही हैं।
बहरहाल इन संस्‍थाओं द्वारा हफ्ते में बमुश्‍किल दो दिन मिलने वाला ''बुक्‍का फाड़कर हंसने'' का एक मौका दर्शकों से जरूर छीना जा रहा है क्‍योंकि स्‍टैंडअप कॉमेडी में स्‍क्रिप्‍ट नहीं होती..ऑन द स्‍पॉट ह्यूमर ढूढ़ना और बनाना पड़ता है । और फिर वो हंसी ही क्‍या जो पहले सोचे समझे और फिर होठों पर आये।
रही बात गड्ढों वाली सड़क पर से गर्भवती महिलाओं को होने वाली परेशानियों की तो कौन नहीं जानता कि ये हकीकत है ,कपिल शर्मा तो माध्‍यम बने इसे व्‍यंग्‍य में सुनाने के..बस।
-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

नाटक उस आख़िरी आदमी की आवाज़ है

मोहन राकेश, हबीब तनवीर, बादल सरकार, महाश्वेता देवी...भारतीय रंगमंच के आधुनिक युग के नाटककारों की यह सूची पुरानी सी लगती है, इसमें नए नाम क्यों नहीं जुड़ते दिखते? राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक भी मानते हैं कि भारत में नए नाटककारों और नाटकों की ज़बर्दस्त कमी है. इस व़क्त दिल्ली में चल रहे भारत रंग महोत्सव के नाटकों में भी कुछ ही कहानियां नई हैं.
और इन्हें लिखने वाले नए नाटककार नहीं बल्कि वो निदेशक हैं, जो रंगमंच से लंबे समय से जुड़े रहे हैं. मसलन बंगाल के ‘रंगकर्मी’ नाटक ग्रुप की निदेशक ऊषा गांगुली, दिल्ली के ‘थिएटरवाला’ नाटक ग्रुप के निदेशक राम जी बाली और बिहार के राजेश चन्द्र.
रंगमंच पर इन सबका निजी सफ़र चाहे जितना अलग रहा हो, एक अनुभव साझा है– आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़े सरोकारों पर नए नाटकों का अभाव, जिसे पूरा करने के लिए इन्होंने ख़ुद कलम उठा ली.
‘बाज़ारवाद के सामने सिर्फ़ रंगमंच ही खड़ा है’
ऊषा गांगुली का नाटक ‘हम मुख़्तारा’, पाकिस्तान की मुख़्तारन माई की सच्ची कहानी पर आधारित है. यौन हिंसा झेलने के बाद चुप रहने की जगह अपनी आवाज़ उठाने वाली मुख्तारन माई के ज़रिए वह सभी महिलाओं की बात रखना चाहती हैं.
उन्होंने कहा, “मेरे मन में उलझन थी क्योंकि कुछ बदल नहीं रहा. कभी दिल्ली, कोलकाता और कभी मुंबई, यौन हिंसा का लगातार सिलसिला चला जा रहा है. इसलिए तय किया कि मुख़्तारन पर लिखी किताब को प्रेरणा बनाकर मैं लिखूं.”
ऊषा के मुताबिक़ यौन हिंसा के बारे में भारत में ज़ोरदार साहित्य जिस पर नाटक बनाया जा सके, नहीं मिलेगा. हालांकि पश्चिमी देशों में इस मुद्दे पर बहुत नाटक मिलते हैं.
वह कहती हैं कि पुराने नाटकों को 30-40 साल बाद भी परोसते रहना उबाऊ है और यह नए सरोकारों के साथ न्याय भी नहीं करता.
भारत ही नहीं विश्व की बदलती परिस्थितियों में ऊषा के मुताबिक़, “बाज़ारवाद के सामने रंगमंच ही है जो अब भी झुका नहीं है, जो अब भी अपनी आवाज़ बुलंद कर सकता है और इसके लिए नए नाटक लिखा जाना बहुत ज़रूरी है.”
‘नाटक उस आख़िरी आदमी की आवाज़ है’
बिहार से आए ‘राग रेपरटरी’ का नाटक ‘जहाज़ी’ राजेश चन्द्र ने लिखा है. नाटक उन विस्थापित लोगों की कहानी है, जो विकास की बड़ी परियोजनाओं के चलते अपने घरबार छोड़ कहीं और बसने पर विवश हो जाते हैं, और वहां भी उनके साथ दुर्व्यवहार ही होता है.
राजेश बताते हैं, “बिहार और बंगाल से जहाज़ के ज़रिए नौकरी के लिए विदेश जाने वाले लोगों को हमारे इलाक़े में जहाज़ी कहा जाता था, पर विस्थापन इस व़क्त पूरी दुनिया की एक बड़ी सच्चाई है. मैंने इसी से जुड़ी कठिनाइयों को उभारने की कोशिश की है.”
इससे पहले राजेश दलितों के रोज़गार से जुड़ा नाटक लिख चुके हैं और कहते हैं कि उनका प्रयास अपने नाटकों को बहुत मौलिक रखने का होता है.
उनके मुताबिक़, “नाटक उस आख़िरी व्यक्ति की आवाज़ है जिसकी कोई पूछ नहीं है, जिसके बारे में कोई बात नहीं करता.”
राजेश बताते हैं कि पिछले तीन दशकों में साहित्य कला परिषद की ओर से नाटकों में पारंपरिक संगीत और अभिनय पर बहुत ज़ोर दिया गया और ऐसे काम के लिए वित्तीय सहायता भी दी गई.
पर राजेश के मुताबिक़ इससे बहुत अलग तरीक़े के नाटकों को प्रोत्साहन मिला और समकालीन मुद्दों पर वही रंगकर्मी काम करते रहे जो व्यक्तिगत स्तर पर इनसे विचलित थे.
‘सभी कलाओं में अभाव’
राम जी बाली का नाटक ‘कोई बात चले’ एक ऐसे शख़्स की कहानी है, जिसकी उम्र बढ़ती जा रही है और शादी के लिए वधू नहीं मिल रही है.
राम जी बताते हैं कि नाटक है तो प्रेम कहानी, लेकिन उसमें हर पात्र के ज़रिए समाज के दबाव, परंपराओं और आम मध्यमवर्गीय लोगों की शंकाओं को उभारा गया है.
वह कहते हैं, “मेरे नाटक में एक संवाद में लड़की अग्रेज़ी में ही बात करती है और लड़का हिंदी बोलने पर आमादा रहता है, भाषा का ये द्वंद बहुत सामयिक है जो समाज में एक इंसान की अपनी पहचान बनाने की कोशिश को उभारता है.”
राम जी के मुताबिक़ ऐसा बहुत सा अच्छा साहित्य है, जिस पर नाटक नहीं बनाए जा सकते क्योंकि वह नाटक का स्वरूप ज़ेहन में रखकर नहीं लिखा गया.
वह आगे कहते हैं, “हर तरह के नाटक का अभाव है, और नाटक ही क्यों सभी कलाओं में, गायन और नृत्य में भी दूसरी लता मंगेशकर या दूसरे बिरजू महाराज नहीं सामने आए हैं.”
राम जी को लगता है कि निर्देशन का उनका लंबा अनुभव उन्हें रंगमंच की ज़रूरतों के मुताबिक़ अच्छा नाटक लिखने में मदद करता है.
-दिव्‍या आर्य

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

फिर भी...खुशी क्‍यों नहीं मिलती हमें

अरबों का कारोबार है धर्म का, अब तो लाख के आंकड़े को भी पर कर गई होगी उन संतों की संख्‍या जो धर्म के धंधे में लगे हैं। टीवी पर धार्मिक चैनलों की बाढ़ आई हुई है । मीडिया के सभी माध्‍यमों में भी मोस्‍ट सेलेबल बना हुआ है धर्म का धंधा । फिर क्‍यों गायब होती जा रही हमारी खुशी। हर चेहरे पर खुशी का नकाब तो है मगर खुशी नदारद है। सब एक्‍सपोजर नामक बीमारी से संक्रमित हुये जा रहे हैं और फायदा उठा रहे हैं धर्म के नाम पर व्‍यापार करने वाले। ऐसा क्‍यों है ? कभी सोचा है।
दरअसल भाव और भावना टेक्‍नोलॉजी से नहीं आते, इसकी कोई टेक्‍नीक नहीं कि भाव जो मन से उपजते हैं वो कब और किस तरह आयेंगे। भावों का हमारे मन पर छाने का कोई समय निर्धारित नहीं होता। वो तो बस आते हैं और जब आते हैं तब सारा विज्ञान और सारी टेक्‍नीक पीछे छूट जाती है। भावों के साथ अगर कोई चलता है तो केवल मन। एक मन ही है जिससे ही संचालित होती है सोचने और विचारने की शक्‍ति।
आज के महा तकनीकी काल में भावों का मन पर आच्‍छादित होना बिल्‍कुल ऐसे ही है जैसे कहीं वीराने में बहार से उपजा हो कोई आल्‍हादन और इसी आल्‍हादन से उपजेगी खुशी...।
श्रीमद्भगवतगीता का मनन इस ऊहापोही स्‍थिति से बचायेगा और निश्‍चित ही जिस खुशी के लिए हम ग्राहक बनते जा रहे हैं वह हमारे भीतर ही से उपजेगी। अब यह तो प्रामाणिकता के साथ सिद्ध भी किया जाता रहा है कि हमारी समस्‍याओं का हल श्रीमद्भगवतगीता में मौजूद है ।
गीता, हमें मन और भावों के स्‍तर पर जाकर इनकी यानि 'भावों की' व्‍याख्‍या करती दिखती है जिसे टैक्‍नोसेवी समाज से इतर रहकर ही समझा जा सकता है, फिजिकली या मेंटली दोनों ही स्‍थितियों में  गीता को शब्‍दरूप में ना देखकर उसे यदि अपने आत्‍मा पर ठकठका के देखा जाये तो ना जाने कितने और गूढ़ रहस्‍य स्‍वयं अपने ही पता  चलेंगे। अपनी साइकोलॉजी अपनी फीलिंग्‍स और अपने भीतर बैठे तमाम डर को किनारे कर यदि देखा जाये तो निश्‍चित ही अपने उन भावों तक पहुंचाजा सकता है जो मन की अपनी बात कहता है। और अपने मन के भीतर झांक पानाही तो खुशी का रास्‍ता है। यकीन मानिए कि यदि ऐसा कर पाये तो फिर किसी मंत्र बांटने वाले की जरूरत नहीं रह जायेगी। जरूरत है तो बस...साइकोलॉजी की इनर फीलिंग से चलकर आती अपनी टेलीपैथिक कम्‍युनिकेशन को बस एक बार आजमाने की....खुशी स्‍वयं सामने होगी।

 - अलकनंदा सिंह

बुधवार, 8 जनवरी 2014

"द लाउडेस्ट वॉयस इन द रूम"

न्यूयार्क। 
फॉक्स न्यूज़ चैनल के न्यूज़ चीफ द्वारा अपनी महिला सहकर्मी को सेक्स के बदले रुपए ऑफर करने का मामला सामने आया है। फॉक्स न्यूज़ चीफ रोजर एल्स ने एक महिला कर्मचारी को हर सप्ताह सेक्स के बदले 100 डॉलर ऑफर किए थे। यह खुलासा जल्द आ रही पुस्तक "द लाउडेस्ट वॉयस इन द रूम" में किया गया है। पुस्तक रेंडम हाउस द्वारा 21 जनवरी को प्रकाशित की जाएगी। न्यूयार्क मैगजीन के कं. ट्रिब्यूटिंग एडिटर गैबरियल शेरमन द्वारा लिखी गई यह पुस्तक दावा करती है कि इसमें फॉक्स न्यूज़ के बेहद विवादास्पद घटनाओं को शामिल कि या गया है।
शेरमन ने पुस्तक के लिए 600 लोगों का इंटरव्यू लिया है जो कि एल्स को जानते हैं जिनमें से सौ से ज्यादा फॉक्स न्यूज़ में काम करने वाले लोगों के हैं। पुस्तक में एक पूर्व कर्मचारियों ने उनके दबंग और गुस्से से भरे व्यवहार की चर्चा की है। पुस्तक में एक टीवी प्रोडयूसर रेंडी हरिसन ने बताया कि जब मैं एनबीसी में 1980 में एल्स के साथ मेरी सैलरी पर बात कर रही थी तो उन्होंने मुझे सौ डॉलर हर सप्ताह सेक्स के बदले देने की बात कही थी। एल्स ने उस महिला से कहा था कि वे सप्ताह में 100 डॉलर देंगे और उसके बदले में उसका मन होगा तब उससे सेक्स करेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फॉक्स न्यूज ने उसके खिलाफ कोई भी कार्यवाही करने से मना कर दिया है। 

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

श्रममूलं ...च वैभवम्

सामर्थ्य्मूलं स्वातन्त्र्यं, श्रममूलं च वैभवम्। 
न्यायमूलं सुराज्यं स्यात्, संघमूलं महाबलम्॥
इस सुभाषित के मुताबिक शक्ति स्वतन्त्रता की जड़ है, मेहनत धन-दौलत की जड़ है, न्याय सुराज्य का मूल होता है और संगठन महाशक्ति की जड़ है। यह बात जितनी किसी समाज या संगठन विशेष के लिए उचित है, उससे कहीं अधिक किसी राष्‍ट्र के लिए उचित बैठती है। 
निश्चित ही एक राष्‍ट्र तीन शक्तियों के अधीन होता है। ये  शक्तियाँ मंत्र, प्रभाव और उत्साह हैं जो एक-दूसरे से  लाभान्वित होकर अपने कर्तव्यों के क्षेत्र में प्रगति करती  रहती हैं। विस्‍तार से कहें तो पहली शक्‍ति है मंत्र अर्थात्  योजना- यानि परामर्श से कार्य का ठीक निर्धारण होता है।  दूसरी शक्‍ति है- प्रभाव अर्थात् राजोचित शक्ति जिसके  कारण तेजी से कार्य का आरम्भ होता है और तीसरी शक्‍ति  है- उत्साह अर्थात् उत्‍साह पूर्वक उद्यम करने से कार्य सिद्ध होता है ।
2013 के आखिरी दिनों में सोशल मीडिया पर एक  कैलेंडर सन् 1947 का बड़ी तेजी से दौड़ाया गया जिसकी  सारी तारीखें हूबहू 2014 की तारीखों जैसी थीं। सोशल मीडिया पर कैलेंडर दौड़ाने  वालों ने इतिहास को एक बार फिर हमारे सामने ला दिया  कि जो बदलाव 1947 के बाद देश में आया अब 2014 में  भी वैसा ही होता नज़र आयेगा और ऐसा ही होता भी दिख  रहा है।
साल की शुरुआत में ही यानि 5 जनवरी को पूर्णस्‍वदेशी  क्रायोजेनिक इंजन के उपयोग से GSLV-D-5 का प्रक्षेपण हो  या कल 7 जनवरी को पृथ्‍वी-2 परमाणु मिसाइल का सफल परीक्षण, देश के नये अतिआधुनिक वर्चस्‍व की ओर बढ़ते कदम हैं जिन्‍होंने वर्षों पूर्व बताये गये उक्‍त सुभाषित  के अनुसार स्‍वयंसिद्ध कर दिया। बतौर एक संप्रभु राष्‍ट्र देश के खाते में उपलब्‍धियों का आगमन तो हो  ही चुका है वरना क्‍या ये संभव था कि कल तक जो एक आम नागरिक था आज वो मुख्‍यमंत्री है या फिर क्‍या ये संभव था कि सवा दो दशक तक जिस व्‍यक्‍ति को कत्‍लोगारद करने वाला बताया जाता रहा हो वह देश के उन्नयन के लिए न केवल अपने राज्‍य का विकसित मॉडल पेश करेगा बल्‍कि उसकी नीतियों की सराहना करने को विरोधी भी बाध्‍य होंगे अथवा सत्‍तारूढ़ पार्टी को अब स्‍वआंकलन करने को बाध्‍य होना पड़ेगा। अंतत: हम सुभाषित में बताये गये.... 'न्यायमूलं  सुराज्यं स्यात्, संघमूलं महाबलम्' को इस तरह सच होते देख रहे हैं। इसके अलावा  यदि हम कैलेंडर की तिथियों को भी भविष्‍य का आधार मानें तो देश के नये ,साफ-सुथरे और मजबूत कलेवर को हम आने वाले महीनों में देखेंगे।
यूं तो वर्ष के उत्‍तरार्द्ध में ही इसके पूरे दर्शन होंगे लेकिन उपर्युक्त सुभाषित के तीन बिंदुओं में से प्रथम बिंदु तो संपन्‍न हो ही गया है। शेष दो के लिऐ देश पूरे वर्षभर इंतज़ार करेगा। निश्‍चित ही 'इसरो' और 'डीआरडीओ' ने अपनी उपलब्‍धियों से शुभ की शुरुआत कर दी है। इन दोनों ही संस्‍थानों की तकनीकी स्‍वतंत्रता ने देश को शक्‍तिशाली बनाया है...जिससे राष्‍ट्र का वैभव बढ़ेगा...और इस तरह वर्ष के अंत तक हम अपने देश को एक नये जमाने के नये राष्‍ट्र के रूप में देखेंगे।

- अलकनंदा सिंह

साहित्य महारथी देवपुरा जी का निधन

मथुरा। 
राजस्थान की अग्रणी साहित्यिक संस्था के संस्थापक-प्रधान मंत्री और हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के अध्यक्ष वयोवृद्ध विद्वान भगवती प्रसाद देवपुरा के निधन का समाचार आते ही ब्रज के साहित्यकार, कवि एवं कलाकारों में शोक व्याप्त हो गया। देवपुरा जी के निधन का एक दूसरे से समाचार सुनते ही बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक सहज रूप में गोवर्धन रोड स्थित ज्ञानदीप विद्यालय पहुंचने लगे और कई दशकों के सम्बन्ध से जुड़े संस्मरणों को साझा करते हुए वे भाव विभोर हो उठे। पाँच माह पूर्व 4 अगस्त को ज्ञानदीप में देवपुरा जी मोहन स्वरूप भाटिया अभिनन्दन ग्रंथ विमोचन समारोह में अपने पुत्र श्याम देवपुरा के साथ आये थे और तब उन्होंने मंच पर साहित्य मंडल द्वारा दो वृहद खण्डों में प्रकाशित ‘सूर सागर’ स्वामी गुरुशरणानन्द जी महाराज को भेंट किया था।
साहित्य मंडल नाथद्वारा द्वारा कई दशकों से प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस तथा माह फरवरी में श्रीनाथ जी के पाटोत्सव के अवसर पर राष्ट्रीय स्तर के जो आयोजन किये जाते रहे हैं उनमें बहुत बड़ी भागीदारी ब्रज की रहती थी। इन दोनों ही अवसरों पर ब्रजभाषा साहित्य एवं संस्कृति से सम्बन्धित पत्र-वाचन तथा ब्रजभाषा कवि सम्मेलन के अतिरिक्त विशिष्ट विभूतियों को सम्मानित किया जाता रहा है।
ज्ञानदीप में सम्पन्न श्रद्धांजलि सभा में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष मोहन स्वरूप भाटिया ने कहा कि नाथद्वारा वल्लभ कुल सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थ होने के साथ वर्तमान समय में देवपुरा जी के अथक प्रयासो से ब्रजभाषा का सबसे बड़ा तीर्थ बन गया था।
उन्होंने कहा कि साहित्य मंडल द्वारा 2700 पृष्ठों के सूर सागर तथा अष्टछाप के सभी कवियों के ग्रन्थों सहित लगभग चालीस ग्रन्थों के सम्पादन-प्रकाशन का बड़ा कार्य किया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि देवपुरा जी की साहित्य-साधना के कारण नाथद्वारा में ब्रज और ब्रज में नाथ्द्वारा के दर्शन होते थे। वह ब्रज और नाथद्वारा के मध्य सेतु बने हुए थे और ऋषितुल्य साहित्य महारथी थे ।
मासिक पत्रिका ‘हरिनाम’ के सम्पादक डा0 भागवत कृष्ण नांगिया ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि प्रचार-प्रसार से दूर रहे देवपुरा जी सरस्वती के उपासक और साहित्य के सच्चे साधक थे।
लोक संगीत विदुषी श्रीमती वन्दना सिंह ने कहा कि देवपुरा जी कलाकारों के लिए पितामह थे। साहित्य मंडल के मंच पर ‘महारास’ की प्रस्तुति के पश्चात् उन्होंने राधा-कृष्ण के स्वरूपों के चरण स्पर्श कर तथा अन्य सभी कलाकारों को स्नेह-आशीष प्रदान कर सम्मान से अभिभूत कर दिया था।
ब्रजभाषा कवि राधागोविन्द पाठक ने इन पंक्तियों के द्वारा देवपुरा जी को श्रद्धांजलि अर्पित की-
जबु ते सुन्यौ करुन कर्कस स्वर, आरत भर्यौ रुदन।
झरत अश्रु धार बहुत, भारी-भारी है मन।।
देवपुरा जी देह त्याग कैं, देवलोक पहुँचे।
सत्संकल्पी, कर्म पथिक कूँ, श्रद्धा भरे सुमन।।
राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गोपाल प्रसाद मुद्गल ने श्रद्धांजलि व्यक्त की-
देवपुरा जी ने किया, देवलोक प्रस्थान।
बेहद व्याकुल हो रहा, पूरा हिन्दुस्तान।।
हिन्दी हित सेवा करी, सदा लुटाया प्यार।
स्वीकारो श्रद्धांजलि, मन से बारम्बार।।
ब्रजभाषा कवि श्याम सुन्दर शर्मा ‘अंकिचन’ ने भावांजलि प्रस्तुत की-
शिक्षाविद्, साहित्य पुरोधा, सदा सृजन हित रहे समर्पित।
संस्कृति रक्षक, समय समीक्षक, हिन्दी प्रहरी, ट्टढ़ संकल्पित।।
आशातीत अतीत हो गया, काल चक्र से लड़ते-लड़ते।
दुःखी हृदय और बोझिल बनते, श्रद्धा सुमन आपको अर्पित।।
 श्रद्धांजलि सभा में राधा विहारी गोस्वामी ने कहा कि कई संस्थाएँ जो कार्य नहीं कर सकतीं वह अकेले देवपुरा जी ने किया। वह मन-प्राण से ब्रजभाषा और ब्रजभाषा साहित्यकारों के उन्नयन के लिए सदैव समर्पित रहे थे।
डा0 राजेन्द्र कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि देवपुरा जी के अवसान के साथ ब्रजभाषा साहित्य के प्रकाशन और साहित्यकारों को प्रोत्साहन प्रदान करने वाले प्रयासों के युग का भी अवसान हो गया है।
संगीतज्ञ विजय केलकर ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि देवपुरा जी ने बड़ी संख्या में कवि-कलाकारों को मंच प्रदान कर सराहनीय सेवा कार्य किया है।श्रद्धांजलि सभा में विवेक सक्सैना आशीष अग्रवाल, रामगोपाल चैधरी, डा0 गिरिराज नाँगिया आदि ने देवपुरा जी के निधन को अपूरणीय क्षति बताते हुए वेदना व्यक्त की।

सोमवार, 6 जनवरी 2014

यहां....लेज़बियन होने की सजा 'बलात्‍कार'

दक्षिण अफ्रीका की म्वुलेनी फाना का कसूर सिर्फ इतना कि वह लेज़़बियन हैं। उनका यह 'गुनाह' इतना बड़ा है कि उन्हें जीने का अधिकार नहीं। अगर जीना है, तो रेप का शिकार होना पड़ेगा क्योंकि यह रेप उसे सुधारने के लिए होगा। 'द इंडिपेंडेंट' अखबार के मुताबिक, बीते दिनों जोहानिसबर्ग में जब फाना अपना फेवरिट गेम फुटबॉल खेल कर लौट रही थीं तो चार आदमियों ने उन्हें घेर लिया। इससे पहले कि वह विरोध करतीं, चारों उन्हें उठाकर वापस फुटबॉल ग्राउंड ले गए और फिर बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया। लड़की के विरोध पर उसे बुरी तरह मारा-पीटा गया, जिससे वह अधमरी हो गईं। बाद में बलात्कारियों ने उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया।
फाना को बस इतना याद है कि वे जाते-जाते कह गए, हमने जो तुम्हारे साथ किया वह बिल्कुल सही था। इससे तुम्हें अहसास होगा कि असल औरत क्या होती है और उसे कैसे रहना चाहिए। आज के बाद तुम जैसी थी, वैसी नहीं रहोगी बल्कि एक औरत की तरह पेश आओगी।
दरअसल फाना समलैंगिक हैं और यह उनकी खुशकिस्मती थी कि वह बच निकलीं क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में इससे पहले लेज़बियन के खिलाफ ऐसे जितने भी केस हुए हैं, उनमें से ज्यादातर लेज़बियन लड़कियां जिंदा ही नहीं बच पाईं। इस तरह के रेप को 'करेक्टिव रेप' कहा जा रहा है।
दक्षिण अफ्रीका में इन दिनों 'करेक्टिव रेप' पर बहस छिड़ी हुई है। करेक्टिव रेप में किसी समलैंगिक व्यक्ति का रेप इस मकसद से किया जाता है, जिससे उसे अपने सही लिंग का पता चल सके। बलात्कारी रेप इसलिए करते हैं, जिससे समलैंगिक व्यक्ति सामान्य लोगों की तरह बर्ताव करे। बलात्कारियों का मानना होता है कि रेप के बाद होमोसेक्शुअल (समलैंगिक) व्यक्ति हेट्रोसेक्शुअल (सामान्य) हो जाएगा और फिर इसके बाद से वह अपने विपरीत लिंग के साथ ही रिश्ते रखेगा। करेक्टिव रेप की यह थिअरी आपके गले नहीं उतरेगी क्योंकि समलैंगिकता के कुछ प्रकारों में जेंडर का तो पता ही नहीं चलता और इसलिए ही यह समस्या होती है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट की मानें तो पूरी दुनिया में दक्षिण अफ्रीका में सबसे ज्यादा रेप होते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इस देश में एक साल में 5 लाख रेप के मामले दर्ज होते हैं। यानी हर 17 सेकेंड में एक रेप होता है। यही वजह है कि दक्षिण अफ्रीका को दुनिया का रेप कैपिटल कहा जाता है। हिंसा विरोधी एनजीओ सीआईईटी के मुताबिक रेप से पीड़ित लोगों में 20 फीसदी पुरुष होते हैं।
मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने हाल में एक सर्वे किया था जिससे मालूम चला कि पूर्वी केप प्रांत में करीब एक चौथाई पुरुषों ने कबूल किया कि उन्होंने अपने जीवन में कम से कम एक बार रेप जरूर किया है। साथ ही इन व्यक्तियों ने बताया कि उनके निशाने पर ज्यादातर 20 वर्ष से कम के लड़के-लड़कियां होते हैं। इन पुरुषों ने कहा कि यह सब सिर्फ वह मजे के लिए करते हैं।
इन आंकड़ों को देख कर दक्षिण अफ्रीका में रेप की समस्या के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है। महिला हो या पुरुष, वहां कोई भी सुरक्षित नहीं है। और अब करेक्टिव रेप के कई मामले सामने आने पर दक्षिण अफ्रीका समेत अन्य देशों की भी चिंता बढ़ गई है। अब तक कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध तो नहीं है लेकिन अगर एक्शनएड रिसर्चर्स नामक संस्थान की मानें तो उनके पास हर हफ्ते 10 करेक्टिव रेप के मामले सामने आ रहे हैं।
-एजेंसी

शनिवार, 4 जनवरी 2014

आज नीरज के जन्‍मदिन पर....

साहित्य के उज्जवल नक्षत्र नीरज का नाम सुनते ही सामने एक ऐसा शख्स उभरता है जो स्वयं डूबकर कविताएँ लिखता है और पाठक को भी डुबो देने की क्षमता रखता है। जब नीरज मंच पर होते हैं तब उनकी नशीली कविता और लरजती आवाज श्रोता वर्ग को दीवाना बना देती है। जब नीरज गुनगुनाते हैं ‘’अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई, मेरा घर छोड कर सारे शहर में बरसात हुई।‘’ सुनने वाले सचमुच सावन की तरह झूम उठते हैं। नीरज के सुहाने गीतों कारवां लेकर आए हैं; ‘’पेंगुईन बुक्स इंडिया प्रकाशन‘’।
इस महकती पुस्तक में नीरज के उन सभी गीतों को जगह मिली है; जिन्हें हम बरसों से सुनते, गुनगुनाते आए हैं। दिल को छू लेने वाले गीत ‘’स्वप्न झरे फूल से मीत चुभे शूल से’’ से पुस्तक आरम्भ होती है और हर पन्ने पर सजे गीत पर रुकने का आग्रह करती है। मुद्रण की शुद्धता पेंगुईन की खासियत है।
नीरज के गीतों का आवेग इन पन्नों से बरबस ही हमें बहा ले जाता है। आध्यात्मिक अनुभूति परत दर परत छुपे उस मन को सहलाती है ! जो कहीं बहुत भीतर बैठा हैं। बाहर आने से डरता है। नीरज मूलत: प्रेम और दर्द के कवि हैं। प्रेम ऐसा जो पवित्र और शाश्वत है और दर्द ऐसा जो अव्यक्त है। ‘’प्रेम को न दान दो: न दो दया, प्रेम तो सदैव ही समृद्ध है।‘’ नीरज के गहरे गीतों में जन-जन के कवि कबीर के दर्शन होते हैं। वहीं वे अपनी पूरी ऊर्जा के साथ युवा वर्ग में भी चिंतन स्फुरित करते दिखाई देते हैं।
‘’छिप छिप अश्रु बहाने वालों मोती व्यर्थ लूटाने वालों कुछ सपनों के मर जाने से -जीवन नहीं मरा करता है।‘’ नीरज -कारवां गीतों का’’ हर सुधी पाठक के मन को मोहने की क्षमता रखती है। बकौल नीरज ---‘’विश्व चाहे या न चाहे लोग समझे या न समझे, आ गए हैं हम यहाँ तो गीत गाकर ही उठेंगे।’’ और सचमुच पाठक यह पुस्तक पढ़कर ही उठेंगे।

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

रंगमंच पर नये नये रंग

बीते 2013 में राजनैतिक उथलपुथल और सरोकारों से लड़ते   देश के मतदाताओं ने जहां निष्‍ठाओं से लेकर भाग्‍यों के  बदलने को देखा, वहीं जाते जाते 2013 राजनैतिज्ञों के हाथों  में कुछ ऐसी मजबूरियां थमा गया कि वे कुंए और खाई के  बीच से ही रास्‍ता निकालने को विवश हो गये।
अब जबकि 2014 आ गया तब पूरे देश में सरकारों और  विपक्षियों द्वारा अचानक अपनी 'जनता' पर मेहरबानियां  लुटाई जा रही हैं। अचानक से ऐसा लग रहा है कि शासक  वर्ग में दयालुता का महासागर फूट पड़ा है..चारों ओर उत्‍सवी  माहौल है।
राजनैतिक रंगमंच पर रहमदिली का प्रदर्शन जोरों पर है, सब  के सब नायक बनने की होड़ लगाये बैठे हैं। भाजपा प्रोजेक्‍टेड  नरेंद्र मोदी के गुड गवर्नेंस के प्रयोग से चलकर अरविंद  केजरीवाल के रूटबेस्‍ड गवर्नेंस तक के प्रयोग इसी रंगमंच पर  किये जा रहे हैं। इसी बीच में कभी कभी तिलूले की तरह  तीसरे मोर्चे की भी आमद इसी रंगमंच पर तैरती हुई आ  जाती है।
इन सबके बीच जो दृष्‍टा है, वही मतदाता आज कन्‍फ्यूज्ड है।  मतदाता को जो अभीतक मंदबुद्धि, कम याददाश्‍त वाला समझे  बैठे थे उनके लिए केजरीवाल ने नमूना सामने रख दिया  सबक के लिए, फिर भी कुछ पारंपरिक जोड़ तोड़ और 
ढर्रे पर चलने वाले राजनेता बदलाव के लिए कतई तैयार नहीं  हैं उनमें ही हैं एक हैं समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम  सिंह। प्रदेश के अराजक माहौल के लिए वे सारी दूसरी पार्टियों  को, उनकी नीतियों को तो ज़िम्‍मेदार ठहरा रहे हैं मगर पूरे  प्रदेश में जो उनके अनुचर कहर ढा रहे हैं, उसके परिणाम  अभी से नज़र आने लगे हैं। प्रदेश की जनता ने तो  समाजवादी पार्टी के लिए पॉलिटकल आफ्टरइफेक्‍ट्स भी  लगभग तय कर दिये हैं। पूरे प्रदेश का हाल उस अंधे की  तरह हो गया है जिसके पास लाठी तो है मगर आंखों के  अभाव में वह अपनी ही लाठी से अपने ही पांव घायल कर  बैठता है। उस पर भी तुर्रा यह कि उसके अंधत्‍व से जलने  वालों ने उसकी लाठी का इस्‍तेमाल घायल करने को किया।
बहरहाल 'राज' के लिए मच रही ये धमाचौकड़ी देश की सत्‍ता  किसके हाथों में सौंपेंगी,अभी तो कयास ही लगाये जा सकते  हैं मगर इतना अवश्‍य है कि राजनैतिक रंगमंच की ये  कठपुतलियां तमाशा जरूर बहुत मनोरंजक तरीके से दिखा रही  हैं।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

2014 के शुभागमन पर.....इस प्रार्थना के साथ करें दिन की शुरुआत....



स तन्‍मयो ह्यमृत ईशसंस्‍थो ज्ञ: सर्वगो भुवनस्‍यास्‍य गोप्‍ता।
य ईशेस्‍य जगतो नित्‍यमेव नान्‍यो हेतुर्विद्यत ईशनाय।।
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्‍च प्रहिणोति तस्‍मै ।
तं ह देवमात्‍मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ।।


---'वह विश्‍व की आत्‍मा है ; वह अमर है ; उसीका शासकत्‍व  है ; वह सर्वज्ञ, सर्वगत और इस भुवन का रक्षक है, जो सर्वदा  इस जगत् का शासन करता है; क्‍योंकि इस जगत् का  चिरन्‍तन शासन करने के लिए और कोई समर्थ नहीं है।'

---'जिसने सृष्‍टि के आरम्भ में ब्रह्मा (सार्वभौम चेतना) को  उत्‍पन्‍न किया और जिसने उसके लिए वेदों को प्रवृत्‍त किया,  आत्‍मबुद्धि को प्रकाशित करने वाले उस देव की मैं मुमुक्षु  शरण ग्रहण करता हूं।'
            
         साभार: श्‍वेताश्‍वतरोपनिषद् ।। 6 । 17-8 ।।

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