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बुधवार, 11 सितंबर 2013

राधाष्‍टमी पर विशेष: राधा और आइंस्‍टीन



प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्‍टाइन ने जो फॉर्मूला ईज़ाद किया- E=mc2, वह पूरी तरह ब्रह्मांड के नियमों को हमारे सामने जिस तरह खोलता है। उसमें ''पदार्थ पर पड़ने वाला प्रकाश और उससे उत्‍पन्‍न ऊर्जा व उसका कुछ भाग परमाणु ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया'' को समझाने की कोशिश की गई है।
यह तो रहा महा-वैज्ञानिक तरीका जिसे आम जनमानस को कभी भी नहीं समझाया जा सकता, मगर जैसे ही हम कहते हैं कि कृष्‍ण और राधा के बीच भी इसी ऊर्जा का रिश्‍ता था तो साधारण से साधारण व्‍यक्‍ति फौरन समझ जाता है कि शक्‍ति का संचरण यदि अपने अंदर करना है, अज्ञान को हराना है, संसार को प्रेममयी बनाना है तो कृष्‍ण जैसा प्रेम जगाये बिना अपनी अपनी शक्‍तियों यानि अपनी अपनी राधा को नहीं पाया जा सकता।
कृष्‍ण और राधा कोई व्‍यक्‍ति नहीं हैं और ना ही इन दोनों में से किसी एक की चर्चा दूसरे को अलग करके की जा सकती है इसीलिए जन्‍म दिन भले ही राधा का है मगर बात कृष्‍ण की भी करनी होगी। कभी आपने सोचा है कि प्रकृति में जो साम्‍य है वह कृष्‍ण और राधा की पूरक एनर्जी से मिलकर बना हुआ है। राधा व कृष्‍ण की पूरक एनर्जी के नाम अलग-अलग हो सकते हैं मगर इन सबका ध्‍येय एक है। एक के बिना दूसरे का कोई अस्‍तित्‍व ही नहीं। संयुक्‍त ऊर्जा पर टिका जीवन किसी एक ऊर्जा के संग तो अधूरा ही रहेगा।
आज कृष्‍ण की आराध्‍या राधा का जन्‍मदिन है। राधा को राधा सब कहते हैं मगर वो राधा क्‍यों हैं, क्‍या है उनके राधा होने और बने रहने का प्रयोजन, इस पर बात जब तक नहीं होगी तब तक धर्म-आध्‍यात्‍म-कर्तव्‍य-सुख-करुणा और वीरता व परोपकार जैसे विषयों पर बात करना बेमानी होगा।
कृष्‍ण को पूर्ण पुरुष कहा गया है और उनकी सभी विशेषताओं में से हम अपने अपने हिस्‍से की सोच के अनुसार व्‍याख्‍या कर लेते हैं जबकि व्‍याख्‍या करने की प्रक्रिया में ही कृष्‍ण से तो दूरी बनाते ही हैं अपने भीतर की ऊर्जा यानि राधा को भी दूर कर लेते हैं।
अब ये देखना आपका और हमारा काम है कि कृष्‍ण और राधा की पूर्ण ऊर्जा को अपने लिये किस तरह प्रयोग में लाते हैं।
जिस दिन हम अपने इस मकसद में सफल हो गये, उस दिन मानव से महामानव तथा महामानव से देवता होने का सफर पूरा कर लेंगे। तब न तो किसी कृष्‍ण को बार-बार जन्‍म लेने की जरूरत नहीं होगी और ना ही राधा व कृष्‍ण की पूरक ऊर्जा को अपनी आधी-अधूरी सोच से परिभाषित करने की।
तभी हम राधा-कृष्‍ण के जन्‍म और उनके प्रेम का सही मायनों में अर्थ समझने के लायक होंगे। तभी हम राधा अष्‍टमी और कृष्‍ण जन्‍म अष्‍टमी को मनाने के लायक होंगे। जब तक ऐसा नहीं होगा, राधा और कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमियां हमारे लिए मात्र बस एक त्‍यौहार बने रहेंगे। या अधिक से अधिक उत्‍सव।

- अलकनंदा सिंह