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बुधवार, 21 अप्रैल 2021

राम की शक्‍ति पूजा और स्‍वशक्‍ति जागरण


 चैत्र नवरात्रि की विदाई व रामनवमी का त्‍यौहार हो और ”राम की शक्‍ति पूजा” की बात ना हो, तो चर्चा कुछ अधूरी ही लगती है।

शक्‍तिपूजा अर्थात् नकारात्‍मकता से लड़ने को स्‍वशक्‍ति का जागरण। और इसी स्‍वशक्‍ति जागरण पर पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने रचा था 312 पंक्तियों का छंद काव्‍य ” राम की शक्‍तिपूजा”। यह स्‍वशक्‍ति के जागरण का ही प्रभाव था कि मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्रीराम ने शक्‍तिपूजा के समय एक कमलपुष्‍प कम पड़ने पर अपने नेत्र को अर्पण करने का साहस किया।
और इस तरह अधर्म पर धर्म की विजय को शक्‍ति आराधना के लिए एक कमल पुष्‍प की कमी पूरी करने को अपने नेत्र देने हेतु तत्‍पर हुआ पुरुष महानायकत्‍व का सर्वोत्‍कृष्‍ट उदाहरण बन गया। अपने नेत्र देवी को समर्पित करने के लिए तूणीर उठा लिया था, सहर्ष समर्पण की ये मिसाल ही श्रीराम को भगवान और महानायक बनाती है। वो महानायक जो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के लिए प्रतिपल जुटा रहा, इसीलिए तो आज भी श्रीराम जनजन के हैं, संभवत: इसीलिए वे भगवान हैं।

निराला की पंक्‍तियों के अनुसार-

“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”

शक्‍ति की आराधना और महानायकत्‍व की स्‍थापना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, इसके लिए आज का दिन हम सनातनधर्मियों के लिए विशेष महत्‍व रखता है। जहां हम अपनी आंतरिक शक्‍तियों को जगाकर महानायकत्‍व की यात्रा की ओर कदम बढ़ाते हैं।

इस यात्रा में जो कुछ ”किंतु-परंतु” हैं भी तो वे हमारे स्‍वजागरण के बाद ही पूरे हो सकते हैं। निश्‍चित ही ना तो ये समय त्रेता युग के श्री राम का है और ना ही तूणीर उठाकर संकल्‍प सिद्धि का परंतु छोटे छोटे कदमों से ही लंबी यात्रा पूरी की जा सकती है, तो क्‍यों ना वैचारिक स्‍वतंत्रता, समाज व राष्‍ट्र को श्रेष्‍ठ, संपन्‍न व सुरक्षित बनाने के कुछ संकल्‍प स्‍वयं से किए जायें जिसमें व्‍यक्‍तिगत स्‍वतंत्रता तो हो परंतु उच्‍छृंखलता ना हो, अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी हो परंतु देश व व्‍यक्‍ति की अस्‍मिता से खिलवाड़ ना हो।

निश्‍चितत: समाज की प्रथम इकाई अर्थात् स्‍वयं हम और हमारे विकास के लिए भी "स्‍वशक्‍ति का जागरण" अब समय की अनिवार्यता है क्‍योंकि स्‍वशक्‍ति को जाग्रत किये बिना हम वंचित कहलायेंगे और वंचित बने रहना, दयनीय दिखते या दिखाते रहना रुग्‍णता है, और रुग्‍णता ना तो व्‍यक्‍ति को शक्‍तिवान बनाती है ना ही समाज को।

हालांकि स्‍वशक्‍ति जागरण की इस यात्रा को कुछ अतिक्रमणों से भी गुजरना पड़ है जिसमें रात रात भर आवाजों के सारे डेसीबल तोड़ती देवीजागरण थे तो ”लाउडस्‍पीकर का शक्‍तिजागरण” होता था परंतु व्‍यक्‍तियों की सारी शक्‍ति इन आवाजों की भयंकरता से जूझते ही बीत जाती है। 

फ‍िलहाल तो कोरोना ने सारे कायदे कानून होम आइसोलेट कर द‍िए हैं परंतु ''पूजा के नाम पर शोर मचाते उपकरण और द‍िखावा करने वाले भक्त'' बहुत ज्यादा द‍िनों तक अपनी आदतों को संभाल नहीं पायेंगे।  न‍िश्च‍ित जान‍िए क‍ि उन्हें स्वशक्त‍ि से कोई लेना देना नहीं...रहेगा। 

बहरहाल समाज में मूल्‍यों की स्‍थापना के लिए महानायक अथवा महानायिका कहीं अलग से उतर कर नहीं आते, यह तो आमजन के बीच से ही निकलते हैं। शक्‍ति की आराधना के बाद भगवान राम की भांति ही सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के लिए कार्य करना ही आज के इस पर्व का अभीष्‍ट होना चाहिए।

- अलकनंदा स‍िंंह 

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

राम की शक्‍ति पूजा और स्‍वशक्‍ति जागरण

चैत्र नवरात्रि की विदाई व रामनवमी का त्‍यौहार हो और ”राम की शक्‍ति पूजा” की बात ना हो, तो चर्चा कुछ अधूरी ही लगती है।
शक्‍तिपूजा अर्थात् नकारात्‍मकता से लड़ने को स्‍वशक्‍ति का जागरण। और इसी स्‍वशक्‍ति जागरण पर पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने रचा था ३१२ पंक्तियों का छंद काव्‍य ” राम की शक्‍तिपूजा”। यह स्‍वशक्‍ति के जागरण का ही प्रभाव था कि मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्रीराम ने शक्‍तिपूजा के समय एक कमलपुष्‍प कम पड़ने पर अपने नेत्र को अर्पण करने का साहस किया।
और इस तरह अधर्म पर धर्म की विजय को शक्‍ति आराधना के लिए एक कमल पुष्‍प की कमी पूरी करने को अपने नेत्र देने हेतु तत्‍पर हुआ पुरुष महानायकत्‍व का सर्वोत्‍कृष्‍ट उदाहरण बन गया। अपने नेत्र देवी को समर्पित करने के लिए तूणीर उठा लिया था, सहर्ष समर्पण की ये मिसाल ही श्रीराम को भगवान और महानायक बनाती है। वो महानायक जो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के लिए प्रतिपल जुटा रहा, इसीलिए तो आज भी श्रीराम जनजन के हैं, संभवत: इसीलिए वे भगवान हैं।
निराला की पंक्‍तियों के अनुसार-
“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”
शक्‍ति की आराधना और महानायकत्‍व की स्‍थापना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, इसके लिए आज का दिन हम सनातनधर्मियों के लिए विशेष महत्‍व रखता है। जहां हम अपनी आंतरिक शक्‍तियों को जगाकर महानायकत्‍व की यात्रा की ओर कदम बढ़ाते हैं।
इस यात्रा में जो कुछ ”किंतु-परंतु” हैं भी तो वे हमारे स्‍वजागरण के बाद ही पूरे हो सकते हैं। निश्‍चित ही ना तो ये समय त्रेता युग के श्री राम का है और ना ही तूणीर उठाकर संकल्‍प सिद्धि का परंतु छोटे छोटे कदमों से ही लंबी यात्रा पूरी की जा सकती है, तो क्‍यों ना वैचारिक स्‍वतंत्रता, समाज व राष्‍ट्र को श्रेष्‍ठ, संपन्‍न व सुरक्षित बनाने के कुछ संकल्‍प स्‍वयं से किए जायें जिसमें व्‍यक्‍तिगत स्‍वतंत्रता तो हो परंतु उच्‍छृंखलता ना हो, अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी हो परंतु देश व व्‍यक्‍ति की अस्‍मिता से खिलवाड़ ना हो।
निश्‍चितत: समाज की प्रथम इकाई अर्थात् स्‍वयं हम और हमारे विकास के लिए भी स्‍वशक्‍ति का जागरण अब समय की अनिवार्यता है क्‍योंकि स्‍वशक्‍ति को जाग्रत किये बिना हम वंचित कहलायेंगे और वंचित बने रहना, दयनीय दिखते या दिखाते रहना रुग्‍णता है, और रुग्‍णता ना तो व्‍यक्‍ति को शक्‍तिवान बनाती है ना ही समाज को।
हालांकि स्‍वशक्‍ति जागरण की इस यात्रा को कुछ अतिक्रमणों से भी गुजरना पड़ रहा है जिसमें शामिल है- रात रात भर आवाजों के सारे डेसीबल तोड़ती देवीजागरण, जहां ”लाउडस्‍पीकर का शक्‍तिजागरण” तो होता है परंतु व्‍यक्‍तियों की सारी शक्‍ति इन आवाजों की भयंकरता से जूझते ही बीत जाती है।
बहरहाल समाज में मूल्‍यों की स्‍थापना के लिए महानायक अथवा महानायिका कहीं अलग से उतर कर नहीं आते, यह तो आमजन के बीच से ही निकलते हैं। शक्‍ति की आराधना के बाद भगवान राम की भांति ही सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के लिए कार्य करना ही आज के इस पर्व का अभीष्‍ट होना चाहिए।
- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 28 मार्च 2015

कन्या पूजन का प्रोफेशनलिज़्म

सामने के घर से कन्या पूजन के बाद बाहर आती बच्चियों की उम्र  बमुश्किल 5 से 8 वर्ष के बीच रही होगी। एक हाथ में  हलवा, पूरी और दूसरे हाथ में ऑब्लिगेशन गिफ्ट्स। कई घरों से बुलावे सुबह ही आ चुके थे। कुछ के अभी भी आ रहे थे। इतने बिजी कि घरों में पूजन करते हुए जो पूरियां खाने को दी जा रही थीं, उन्हें गेट से निकलते ही सही जगह पर फेंकने तक की फुरसत ना थी, वे यूं ही डस्टबिन के बाहर की ही ओर फेंकी जा रही थीं। तभी एक बच्ची जो उनमें सबसे छोटी थी, ने पूछा, ''अब कहां जाना है '' । कन्या ग्रुप की लीडर ने कहा, देखो अब नंबर तो सक्सेना आंटी के यहां जाने का है... मगर ... ! सब बच्चियां उसका मुंह देख रही थीं ।
वे सब बड़ी लड़की के ''मगर'' के बाद कुछ कहने का इंतज़ार कर रही थीं। लड़की आगे बोली, ''देखो ऐसा करते हैं कि सक्सेना आंटी के यहां चलते हैं मगर वहां खाना नहीं खायेंगे, उनसे कह देंगे कि पैक कर दो।'' छोटी बच्ची ने फिर पूछा, क्यों... खाना क्यों नहीं खायेंगे, उन्होंने तो मेरे मन पसंद की सब्जी और बूंदी का रायता भी बनाया है, मुझे तो वही खाना है ... ।
बड़ी लड़की ने कहा, मैंने खाने से थोड़े ही मना किया है पागल, खाना हम उनसे पैक करा लेंगे, फिर तू घर जाकर खा लेना।'' वो आगे बोली, हम खाना तो अग्रवाल आंटी के यहां का खायेंगे, वो साथ में महंगे गिफ्ट भी देती हैं और उनके ए. सी. भी तो है ना... डाइनिंग रूम में। सक्सेना आंटी तो बस कुरकुरे का पैकेट, एक पेंसिल बॉक्स और थोड़ी सी एक्लेयर्स दे देतीं हैं बस, जैसे कि ये कोई खजाना पकड़ा रही हों। वो 3 सेक्टर वाला चिंटू बता रहा था कि अग्रवाल आंटी ने तो इस बार स्मार्टफोन्स मंगाए हैं, कन्याओं को देने के लिए ... अब तुम्हीं बताओ, मैं सही कह रही हूं ना। ''सबने एक सुर से अपनी लीडर की हां में हां मिलाई।
सक्सेना आंटी के घर के सामने पहुंचते ही उन्होंने अपने जोरदार अभ‍िनय से बता दिया, ''आंटी, अभी भूख नहीं है, आप तो खाना पैक कर दो, हम घर जाकर खा लेंगे।''
परंपरा और देवी भक्ति की मारी बेचारी सक्सेना आंटी मन मसोस कर रह गईं कि कन्याओं के वे सिर्फ पैर ही पूज पायेंगीं और अपने सामने भोजन खिलाने के पुण्य से वंचित रह जायेंगी। क्या करतीं, उन्होंने खाना पैक किया, गिफ्ट भी पैक किया और पैर पूज कर हर कन्या को विदा किया।
अगले पांच मिनट में वे कन्याएं अग्रवाल आंटी के घर ए. सी. डाइनिंग रूम में विराजमान थीं। देवी जो ठहरीं, स्मार्ट फोन्स के पैकेट देखकर अचानक उनके भरे हुए पेट खाली हो गये थे। सक्सेना आंटी के तुच्छ पैकेट वो बाहर ही छोड़ कर आई थीं।
मेरी सामने घटे इस पूरे वाकये ने ना जाने कितने ही प्रश्नों को जन्म दे दिया... मसलन जिन्हें हम कन्या समझते हैं ...क्या वास्तव में  वे उस परिभाषा को पूरा करती हैं... , या कि भरे पेट पर किसी को भोजन कराने से क्या सचमुच पुण्य मिल सकेगा... क्या भोजन के साथ गिफ्ट्स का चलन छोटे छोटे बच्चों में लालच को जन्म नहीं दे रहा ... यदि इसी लालच के चलते बच्चे अपने फायदे, कम फायदे या ज्यादा फायदे के बारे में नहीं सोचेंगे क्या...  क्या करें जो कुछ 'हासिल' हो सके जैसी सोच के कारण क्या वो कन्याएं हम ढूढ़ पायेंगे जो निष्कपट, निश्छल हों, जिनके लिए सब बराबर हों चाहे वो सक्सेना आंटी हों या अग्रवाल आंटी ...  आदि।
प्रश्न बहुत हैं मगर उत्तर हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम उसे किस दायरे में रखकर देखना चाहते हैं।
खैर, ये वो सच है जो हमें अपना अंतस खंगालने पर विवश करता है कि इस हाइटेक युग में हम अपनी परंपराओं के साथ कहां खड़े हैं। और कहीं हम उन्हें ढोने के चक्कर में पुण्य की जगह कुछ और तो नहीं कमा रहे।

- अलकनंदा सिंह