गुरुवार, 30 जुलाई 2015

गुरू पूर्ण‍िमा पर विशेष - हमारी तो आध्यात्मिक परंपरा में ही हैं गुरू का स्थान

'तत्व मसि श्वेतकेतोः' अर्थात्  'तू ही वह चिदानंद ब्रह्म है' कहकर आरुणी ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को जो ब्रह्म विद्या संबंधी आख्यान सुनाया वह और कुछ नहीं अपने शि‍ष्य पर पड़े अज्ञान का आवरण हटाने का एक गुरुमंत्र था।
इसी तरह कठोपनिषद् की वल्लियों में गुरू के रूप में यम एवं शिष्य के रूप में बैठे नचिकेता का आपसी संवाद पंचाग्नि विद्या के रूप में हमारे सामने आया , तब से अब तक उपनिषदों के माध्यम से चली आ रही  यह ज्ञान देने और गृहण करने की परंपरा ने गुरू के पद को शाश्वत घोष‍ित कर दिया।
ये मात्र दो उदाहरणभर हैं जो यह बताते हैं कि किसी जिज्ञासु श‍िष्य की जिज्ञासा शांत करके न केवल श‍िष्य की बल्कि स्वयं गुरू की श्रेष्ठता भी सिद्ध होती है।

हमारी सांस्कृतिक परम्परा रही है जिसमें जिज्ञासु शिष्य की जिज्ञासा का समाधान एक ऐसी गुरूसत्ता करती है जिसने स्वयं उसका अपने जीवन में साक्षात्कार कर लिया हो।

गुरु-शिष्य परम्परा के कारण ही उपनिषद काल की ज्ञानसंपदा का संरक्षण श्रुति के रूप में क्रमबद्ध हो पाया। इस परंपरा के अंतर्गत समर्पण भाव , अहंकार को गला कर ज्ञान प्राप्ति के अनेक उदाहरण शास्त्रों में दिए गए हैं। सुकरात व उनके शिष्य प्लेटो तथा प्लेटो के शिष्य एलेक्जेंडर एवं गुरजिएफ व आस्पेन्स्की की परम्पराएँ तो बाद में आईं जबकि हमारे देश में आदिकाल से ही यह परम्परा चली आयी है कि गुरु अपने ज्ञान द्वारा उचित पात्र समझे गए शिष्य पर पड़े अविद्या-अज्ञान के पर्दे को हटाएँ व उसका उँगली पकड़ कर मार्ग दर्शन करें।

गुरु कौन हो व कैसा हो-  
'विशारदं ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं गुरुकाश्रयेत्'-  'श्रोत्रिय' अर्थात् जो श्रुतियों से शब्द ब्रह्म को जान सके , उनका तत्व समझ सके, 'ब्रह्मनिष्ठ' अर्थात् आचरण से श्रेष्ठ व ब्राह्मण जैसा ब्रह्म में निवास कर परोक्ष साक्षात्कार कर चुका हो तथा 'विशारद' अर्थात् जो अपने आश्रय में शिष्य को लेकर उस पर शक्तिपात करने की सामर्थ्य रखता हो। 
गुरू के लिए संत ज्ञानेश्वर ने भी गीता की भावार्थ दीपिका में लिखा है कि “यह दृष्टि (गुरु की दृष्टि) जिस पर चमकती है अथवा यह करार विन्दु जिसे स्पर्श करता है वह होने को तो चाहे जीव हो, पर बराबरी करता है महेश्वर-श्रीशंकर की”।

गुरु मानवी चेतना का मर्मज्ञ माना गया है। वह शिष्य की चेतना में उलट फेर करने में समर्थ होता है। गुरु का हर आघात शिष्य के अहंकार पर होता है तथा वह यह प्रयास करता है कि किसी भी प्रकार से डाँट से, पुचकार से, विभिन्न शिक्षणों द्वारा वह अपने समर्पित शिष्य के अहंकार को धोकर साफ कर उसे निर्मल बना दे। प्रयास दोनों ओर से होता है तो यह कार्य जल्दी हो जाता है नहीं तो कई बार अधीरतावश शिष्य गुरु को समझ पाने में असमर्थ हो भाग खड़े होते हैं।
हमारी आध्यात्मिक परम्परा गुरु प्रधान ही रही है। इसी परम्परा के कारण साधना पद्धतियाँ भी सफल सिद्ध हुईं। सदैव गुरुजनों ने अपने जीवन के सफल प्रयोगों का सुपात्र साधकों के ऊपर रिसर्च लैबोरेटरी की तरह परीक्षण किया है। उन्हें श्रेष्ठ देवमानव बनाने का प्रयास किया है। गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

गुरू की श्रेष्ठता के साथ शिष्य में गुरु के प्रति श्रद्धा भी उतनी ही आवश्यक है। सामान्यतया व्यक्ति का मन बिखराव लिए होता है। चित्त वृत्तियाँ लोकद्वेषों में रुचि लेने के कारण बिखरी होती हैं। इसी बिखराव को समेट कर मन को समग्र बना लेना-महानता की ओर मोड़ लेना ही श्रद्धा है। इस मन को 'इन्टीग्रेटेड माइण्ड' कहा गया है। समग्रता के संग श्रद्धायुक्त मन से जब संशय मिट जाए तब  गुरू के प्रति पूर्ण समर्पण-विसर्जन-विलय-तादात्म्य हो जाता है। निश्चय ही गुरु-शिष्य संबंध इसी स्तर के आध्यात्मिक होते हैं जिनमें उच्चस्तरीय आदान-प्रदान होता है।जहां एक ओर शिष्य अपनी सत्ता को, अहं को गुरु के चरणों में समर्पित करता है वहीं दूसरी ओर गुरु आध्यात्मिक शक्ति द्वारा उसे ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी बनाकर जीवन मुक्त कर देता है।

- अलकनंदा सिंह

रविवार, 26 जुलाई 2015

कुंठित मंशा वालों के लिए सबक

जिस तरह अति कट्टरवादिता किसी भी समाज के लिए ज़हर बन जाती है उसी तरह अति उदारवादिता भी ज़हर का ही काम करती है। मानवाध‍िकारवादी इसी अति का श‍िकार होते रहे हैं। कोई आतंकी को फांसी दिए जाने का विरोध करता है तो कोई आतंकवाद को धर्म और मजहब से जोड़ कर दहशत फैलाने वाले को ‘बेचारा’ घोषि‍त करने पर आमादा रहता है। कोई नक्सलवाद को सरकार, पूंजीवाद और भेदभाव जनित समस्या बताकर नक्सलवाद की भेंट चढ़े जवानों की शहादत से मुंह फेर लेने की बात कहता है तो कोई बलात्कारी के भी मानवाध‍िकार की बात करता है।
कानून के लचीलेपन का फायदा वो गैर सरकारी संगठन भी उठाते रहे हैं जो मानवाधिकारवादी होने का तमगा स्वयं लटकाए घूमते हैं। बिना ये सोचे कि देश और समाज के दुश्मन सिर्फ सजा के हकदार होते हैं और इनके अध‍िकारों की बात करना कानून-व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करना है। इसके अलावा भी दोषी की तरफदारी करना अपराधी के साथ शामिल होने जैसा ही है।
हकीकत में ऐसा करने वालों की मानसिकता सिर्फ खबरों में रहने और सेंसेशन फैलाकर अपने लिए सुर्खियां बटोरने तक ही होती है, वे न अपराधी का भला चाहते हैं ना देश का, और न कानून को सही मानते हैं।
बहरहाल, अब केंद्र सरकार ने कुछ नए फैसले लेकर इन कथ‍ित मानवाध‍िकारवादियों की मानसिकता पर लगाम लगाने का प्रयास किया है। अपराधि‍यों  को जानने के बहाने व अभ‍िव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपनी सेंसेशनल खबरें, डॉक्यूमेंटरी और आर्टिकल को प्रकाश‍ित या प्रदर्श‍ित करना अब उनके लिए आसान नहीं रहेगा।
अब नए सरकारी फैसले के मुताबिक जेल में बंद कैदियों पर आर्टिकल लिखने या इंटरव्यू लेने के इरादे से कोई जर्नलिस्ट, एनजीओ ऐक्टिविस्ट्स या फिल्ममेकर्स को जेल में एंट्री नहीं दी जाएगी। हां, इस पाबंदी से कुछ स्पेशल मामलों में छूट होगी।
खबर के मुताबिक यह फैसला इसलिए लिया गया है क्‍योंकि जेल में बंद कैदियों के कई इंटरव्यूज़ लगातार सामने आए। इंटरव्यू लेने वालों में ब्रिटिश फिल्ममेकर लेसली उडविन का नाम भी शामिल है, जिन्होंने 16 दिसंबर को हुए रेप ममाले में कैद, आरोपी से इंटरव्यू लेकर इस घटना पर एक डाक्युमेंट्री बनाई थी। उनकी इस इंडियाज डॉटर नाम की डॉक्युमेंट्री ने दोषियों की मानसिकता को सबके सामने लाकर रखा, जिसे देखकर लोगों की भावनाएं भड़क उठी थीं।
गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव कुमार आलोक ने सभी प्रांतों और केंद्र शासित राज्यों को भेजे एडवाइज़री में कहा है कि किसी भी व्यक्ति, प्रेस, एनजीओ, कंपनी को जेल के भीतर शोध करने, डाक्युमेंट्री बनाने, आर्टिकल या इंटरव्यू के मकसद से प्रवेश की इजाजत सामान्य रूप से नहीं दी जानी चाहिए।
हालांकि, वैसे विज़िटर्स, प्रेस या डॉक्युमेंट्री मेकर्स को कंसिडर करने की भी बात की गई है, जिनके आर्टिकल, डॉक्यूमेट्री या रिसर्च से अथॉरिटी को किसी पॉज़िटिव सोशल मेसेज का एहसास होगा।
खबर है कि यदि जेल के अधिकारियों से इस तरह की अनुमति मिल भी जाती है तो विज़िटर्स को सिक्यॉरिटी अमाउंट के रूप में एक लाख रुपए जमा करना पड़ेगा।
इतना ही नहीं, इंटरव्यू या डॉक्युमेंट्री बनाने वालों को केवल हैंडीकैम, कैमरा, टेप रिकॉर्डर ले जाने की इजाजत मिलेगी जबकि मोबाइल, पेपर्स, किताब या कलम वे अंदर नहीं ले जा सकेंगे।
यदि जेल के सुपरिन्टेंडेंट को लगेगा कि कोई खास रिकॉर्डिंग गलत है या वह गैर-जरूरी है तो उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप करने का भी अधिकार होगा।
कुल मिलाकर इससे एक लाभ यह जरूर होगा क‍ि जो मीडियाकर्मी, मीडिया हाउसेस, सामाजकि संगठन आद‍ि अपने पेशे या सामाजिक जिम्मेदारी की आड़ में अपनी कुंठित मंशा पूरी करते हैं, उन्हें वो मौका नहीं मिल पायेगा। और हां, नेक नीयत वालों के लिए सरकार ने अब भी रास्ता छोड़ दिया है।
 अतिवाद के इन मानवाध‍िकारवादियों को एक सबक हदें पहचानने के लिए एक शेर मुजफ्फर हनफी का कुछ यूं है कि-
हक़-दारों की छुट्टी कर दो ,  इस्तिग़्ना के एक सबक में..... 
- अलकनंदा सिंह 

बुधवार, 22 जुलाई 2015

ब्रिटेन में 1370 साल पुराने कुरान के अंश !

ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय में कम से कम 1370 साल पुराने कुरान की पांडुलिपि के अंश मिले हैं.
पन्नों की रेडियो कार्बन डेटिंग तकनीक से जांच से पता चला कि कुरान के ये पन्ने कम से कम 1370 साल पुराने हैं.
शोधकर्ताओं ने साथ ही इस बात की संभावना जताई है कि जिस शख्स ने कुरान की ये पांडुलिपि लिखी होगी वह पैगंबर मोहम्मद से मिला हो.
कुरान के ये पन्ने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में मध्य पूर्व की अन्य किताबों और दस्तावेज़ों के संग्रह के साथ करीब एक सदी तक पहचाने बग़ैर रखे रहे.
एक पीएचडी शोधार्थी अल्बा फ़देली ने इन पन्नों को ध्यान से देखा तो तो फिर इनका रेडियोकार्बन डेटिंग टेस्ट करवाने का फ़ैसला किया गया और उसके परिणाम ‘आश्चर्यजनक’ आए.
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की रेडियोकार्बन एक्सेलेरेटर यूनिट में किए गए परीक्षणों से पता चला कि भेड़ या बकरी की खाल पर लिखे गए कुरान के यह अंश संभवतः इस पवित्र पुस्तक के सबसे पुराने बचे हुए अंश हैं.

विश्वविद्यालय में ईसाइयत और इस्लाम के प्रोफ़ेसर डेविड थॉमस कहते हैं, “यह दस्तावेज़ हमें इस्लाम की स्थापना के कुछ सालों के अंतराल में पहुंचा सकते हैं.”
वो कहते हैं, “मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार पैगंबर मोहम्मद को अल्लाह का पैगाम 610 से 632, उनकी मृत्यु का साल, के बीच ही मिला था जो कुरान का आधार बना.”
प्रोफ़सर थॉमस कहते हैं कि इससे यह भी अर्थ निकलता है कि जिस व्यक्ति ने उसे लिखा है वह पैगंबर मोहम्मद के समय ज़िंदा रहा हो.
वह कहते हैं, “वह व्यक्ति जिसने इसे वास्तव में लिखा होगा संभवतः पैगंबर मोहम्मद को जानता होगा. शायद उसने उन्हें देखा होगा, हो सकता है उसने उन्हें उपदेश देते देखा हो. ऐसा भी हो सकता है कि वह व्यक्तिगत रूप से उन्हें जानते हों और यह वास्तव में मंत्रमुग्ध करने वाला ख़याल है”.
यह पांडुलिपि ‘हिजाज़ी लिपि’ में लिखी गई है जो अरबी का एक पुराना रूप है.
हालांकि इन परीक्षणों से कई तरह की तारीखें मिलती हैं, इसलिए 95% संभावना इस बात की है कि यह अंश 568 ईस्वी से 645 ईस्वी के बीच के हैं.
- एजेंसी

रविवार, 19 जुलाई 2015

सुन्नी बरेलवी मरकज़ का फतवा: ये ईदी तो देश हमेशा याद रखेगा… मौलवी साहब

”हमें जा जा के कहना पड़ता था हम हैं यहीं हैं,
कि जब मौजूदगी मौजूदगी होती नहीं थी।”
देश , समाज या परिवार में बदलाव कहीं भी लाना हो , पहले खुद को बदलना होता है… परेशानी कुछ भी हो पहले खुद को संभलना पड़ता है …दूसरों में खामियां ढूंढ़ने से पहले खुद को पाक करना होता है… कल ऐसा ही कुछ ऐतिहासिक घटा उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की आला हज़रत दरगाह पर जब एक फतवा बरेली के प्रभावशाली आला हजरत दरगाह के मौलवियों ने जारी किया। प्रगतिशील फतवे जारी करने के लिए मशहूर तहरीक-ए-तहफ्फुज सुन्नियत ने यह ऐतिहासिक फतवा जारी करके इंसानियत को बचाए रखने वाला निर्णय किया है जो न जाने कितने भटके हुए नौजवानों पर मनोवैज्ञानिक असर करेगा।
फतवे में कहा गया किअगर कोई व्‍यक्‍ति आतंकी कनैक्‍शन के कारण मारा जाता है तो उसे दफन करते समय ‘नमाज-ए-जनाजा’ नहीं पढ़ा जाएगा। सुन्नी बरेलवी मरकज़ का ये मनोवैज्ञानिक सुधार वाले कदम  की जितनी तारीफ  की जाए , वह कम ही है।
कल ईद-उल-फितर के मौके पर गुमराह नौजवानों और कट्टरपंथ‍ियों को एक कड़ा संदेश देते हुए मौलवियों के इस फतवे को जहां आम मुसलमानों की आतंकवाद से जुड़े होने की इमेज को बदलने का कदम माना जएगा। वहीं सियासतदानों को आतंकवाद के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने से भी रोकेगा।
बस, ये ही हिंदुस्तान है… और यहां सुधारों का कदम उठाने के लिए हर संस्था आजाद भी है और काबिल भी, बस जरूरत थी उस श‍िद्दत को समझने की कि इसकी शुरुआत कहां से हो।
बरेली के प्रभावशाली अला हजरत दरगाह के मौलवियों ने आतंकवाद से जुड़े किसी भी शख्स और उसके हिमायतियों को दफन करने से पहले पढ़ी जाने वाली आखिरी नमाज पर रोक लगा दी है। इससे बड़ी उस व्यक्ति के लिए ज़‍िल्लत की बात और क्या हो सकती है कि उसे आख‍िरी नमाज भी हासिल ना हो सके।
ज़ाहिर है कि मौलवियों का ये एक कदम भ्रमित होकर आतंकवाद की ओर जाने वालों व उसके घरवालों पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाएगा।   कल मस्जि़द में ईद की इबादत के बाद दरगाह के मौलवियों ने अपने समर्थकों से आतंकवाद से जुड़े लोगों का बहिष्कार करने की अपील की। दरगाह अला हजरत की एक शाखा तहरीक-ए-तहफ्फुज सुन्नियत के जनरल सेक्रटरी मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी ने कहा कि ईद के इस मौके पर सुन्नी बरेलवी मरकज़ ने एक कड़ा संदेश भेजा है कि कोई भी मौलाना, मुफ्ती या कोई अन्य धार्मिक नेता आतंकवाद से जुड़े किसी भी शख्स को दफन करने से पहले ‘नमाज-ए-जनाजा’ नहीं पढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि ‘हम आतंकवाद के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहते हैं।’
गौरतलब है कि ‘नमाज-ए-जनाजा’ एक विशेष प्रार्थना होती है जो किसी की मौत पर मौलवियों द्वारा पढ़ी जाती है। यह किसी को दफन करने से पहले पढ़ी जाती है।
अभी तक फतवों को लेकर फैली हुई भ्रांतियों को भी सुन्नी बरेलवी मरकज़ ने बता दिया है कि समाज व देश का भला सोच कर ही कौम को तरक्की हासिल हो सकती है, आतंकवाद और आतंकवादी न किसी के हुए हैं ना ही हो सकते हैं। उनके एक कदम का भुगतान पूरा परिवार करता है।
गौरतलब है कि तहरीक-ए-तहफ्फुज सुन्नियत को प्रगतिशील फतवे जारी करने के लिए जाना जाता है। यह संस्था पहले भी ऐसे फतवे जारी करती रही है।
इससे पहले 18 जुलाई को मौलवियों ने फतवा जारी किया था कि इस्लाम में अनिवार्य ‘ज़कात’ आधुनिक शिक्षा और हाई-टेक गैजेट्स के लिए दान किया जाना चाहिए। इसके अलावा जून में जारी किए गए एक अन्य फतवे में मौलवियों ने फैसला सुनाया था कि महिलाएं अपना व्यापार खुद चला सकती हैं।
अफसोस होता है उस मीडिया पर जो विवादित फतवों पर तो चार चार दिन तक बहस कर सकती है मगर इस तरह के देशहितकारी और समाजहितकारी फतवों पर चुप्पी साध जाती है।
- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 15 जुलाई 2015

ज़रा इधर भी गौर फरमाइये... मेनका जी

अंगवर्द्धक यंत्रों, तेलों और वैक्यूम थेरेपियों के साथ साथ , अब तो जापानी तेलों की मैन एंड वुमैन रेंज भी पूरे विवरण के साथ जब अखबारों के पेजों की शोभा बढ़ा रही हों तब उम्र के दो साल इधर उधर करने से क्या सच में कोई फर्क पड़ेगा ....?

कभी आपने दीमक लगे पेड़ को देखा है ? दीमक लग जाने पर भी उसकी पत्तियां हरी बनी रहती हैं बहुत दिनों तक जब तक कि पेड़ पूरी तरह खोखला ना हो जाए...क्योंकि दीमक हमेशा जड़ को पकड़ती है। ऐसे में हम चाहे जितने भी पेस्टीसाइड्स और ग्रोथ हारमोन्स उसके पत्तों पर छिड़कें, उस पेड़ को पूर्वावस्था में लाना लगभग नामुमकिन ही होता है। जब तक जड़ में लगी दीमक को खत्म न किया जाए, तब तक कोई प्रयास उस पेड़ को नहीं बचा सकते। 
ठीक यही बात समाज, उसकी शुभचिंतक इकाइयों और उसकी चुनी गई संस्थाओं पर भी लागू होती है, जो कि भारी परिवर्तन के दौर में स्थापित समाजिक मूल्यों से उपजी दीमक की आहट को नहीं पहचान रही हैं। और बस असमंजस में नित नये कानून थोपे चली जा रही हैं।

पिछले दिनों केंद्रीय महिला एवं बालविकास मंत्री मेनका गांधी की अध्यक्षता वाले एक पैनल ने सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र 18 से घटाकर 16 साल करने की सिफारिश की है। इस पैनल ने यह भी सुझाव दिया कि 16 साल की उम्र के बाद दोनों में यौन समझ रहती है।
फिलहाल प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेंस्ट सैक्सुअल ऑफेंसस (पोक्सो) और क्रिमिनल लॉ अमेन्डमेन्ट ऐक्ट (ऐन्टी रेप लॉ) दोनों में सहमति की उम्र 18 साल है। 18 साल से कम उम्र वालों को नाबालिग माना गया है।
रिपोर्ट की इस विवादास्पद संस्तुतियों समेत अन्य मुद्दों पर विचार के लिए 20 जुलाई को कानून, गृह, स्वास्थ्य समेत अन्य लोगों की बैठक बुलाई गई है। इस प्रस्ताव को महिला एवं बाल अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा समर्थन दिए जाने की सम्भावना है क्योंकि सहमति से यौन सम्बंध बनाने पर उम्र के आड़े आने से युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ रही है ( ऐसा इस पैनल का मानना है ) ।
प्रस्ताव से सहमत होने वालों का यह भी मानना है कि थानों और अदालतों में भी ऐसे झूठे मामलों की संख्या बढ़ रही है जहां लड़की के अभिभावक उम्र का हवाला देते हुए लड़कों पर शिकंजा कस देते हैं।
उल्लेखनीय है कि निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद सहमति से सम्बंध बनाने की उम्र 16 से 18 वर्ष कर दी गई थी। उम्र बढ़ाने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे श्रम और यौन व्यापार के लिए लड़कियों के अवैध व्यापार पर रोक लग सकेगी।
तर्क वितर्कों के बीच जो एक अहम बात है, वह यह कि उम्र घटाने या बढ़ाने की इस कवायद से पहले उन प्रचार माध्यमों पर रोक लगाई जाए जो अश्लीलता फैलाने  के कारखाने बने हुए हैं। जिनकी लालसा ने किशोरों, युवाओं को न केवल सेक्स सामग्री का प्रथम उपभोक्ता मान लिया है बल्कि उसे अपराध की ओर जाने का मार्ग भी बता दिया है । 
मीडिया के लगभग सभी माध्यम अश्लील विज्ञापनों को बेरोकटोक दिखा रहे हैं । वो समाज के लिए अपने उत्तरदायित्व से भी मुंह मोड़े हुए हैं। आम आदमी वो चाहे किसी भी आयुवर्ग का हो, जब उसे खुलेआम दिखाया जा रहा है कि फलां तेल और कैप्सूल से 'जवानी के मजे' लिए जा सकते हैं तो क्या हम किशोरों- किशोरियों से उम्मीद करें कि वो इन विज्ञापनों की ओर ध्यान नहीं देंगे। वह भी तब जबकि यह उम्र भावनाओं के विचलन का सबसे कमजोर समय होता है।
कुछ समाचार वेबसाइट्स तो बाकायदा डेटिंग साइट्स चलाती हैं, कुछ अपना एक निश्चित कॉलम या पूरा वेबजेज ही सेक्स समस्याओं के लिए समर्पित रखती हैं ताकि हिट्स ज्यादा मिल सकें, इसी तरह हिंदी के राष्ट्रीय अखबारों में पेज नं. 10 से लेकर पेज नं.15 तक तरह-तरह के अंगवर्द्धक यंत्रों, तेलों और वैक्यूम थेरेपियों को समर्पित होते हैं, अब तो जापानी तेलों की मैन एंड वुमैन रेंज भी पूरे विवरण के साथ अखबारों के पेजों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
हर रोज इन जैसे तमाम विज्ञापनों की भरमार न जाने कितने किशोरों, युवाओं, अधेड़ों और तो और वृद्धों की नजर से रूबरू होती होगी और उनकी नैतिकता का इम्तिहान लेती होगी। इनमें से हर उम्र को ये अपने अपने तरह से प्रभावित अवश्य करती होगी। किसी को उत्सुकता होती होगी तो किसी की अतृप्त इच्छायें ''कुछ भी'' करने को उकसाती होंगी, उनमें से कितने नैतिकता के इम्तिहान में खरे उतरते होंगे, कहना मुश्किल है। ज़ाहिर है कि  यौन अपराधों की नींव तो ये मीडिया के विज्ञापन ही रख रहे हैं । इस ग्लोबल युग में जब कि कमोवेश हर तीसरे चौथे व्यक्ति के पास स्मार्टफोन और नेट की सुविधा है, अखबार भी पढ़े ही जा रहे हैं, तब इन विज्ञापनों की ओर से आंखें नहीं मूंदी जानी चाहिए।
मेनका गांधी हों या निर्भया कांड के बाद चेती मनमोहन सरकार, दोनों अपने-अपने तरीके से उम्र को कम या ज्यादा करने के पीछे पड़ी हैं, जबकि वो जिस वजह से सहमति से सेक्स की उम्र पर इतनी रस्साकशी करती रहीं या कर रही हैं, तब तक निष्फल ही रहेगी जब तक अखबारों और चैनलों और वेबमीडिया के जरिये फैलाई जा रही इस अश्लीलता को पाबंद नहीं किया जाता।
यूं भी किसी अपराध के लिए उकसाना जब कानूनन जुर्म है तो क्या इन विज्ञापनों की भाषा-शैली-और अश्लीलता हदें पार देने वाले चित्रों के लिए सरकार कोई कदम क्यों नहीं उठाती । अश्लील साहित्य रखना और बेचना जब अपराध है तो समाचार माध्यमों को ऐसा ही अपराध करने पर सरकारें चुप क्यों लगाए हैं। 
सहमति से सेक्स की उम्र दो साल इधर हो या उधर, इस पर बहस से पहले अश्लीलता के इस खुलेआम व्यापार पर रोक लगाई चाहिए । किशोर वय हो या अधेड़, पुरुष हो या स्त्री, नैतिकता के दायरे तो सभी के लिए हैं, कोई यदि इन्हें पार करता है तो निश्चित ही वह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
जहां तक बात है सेक्स पर सहमति और असहमति की, तो 16 वर्ष की उम्र में सेक्स की समझ भले ही आ जाती हो मगर रासायनिक, मनोवैज्ञानिक शरीरिक परिवर्तनों को सिर्फ सेक्स तक ही सीमित करके नहीं देखा जा सकता , इसके आफ्टर इफेक्ट्स का सामना क्या 16 साल की उम्र में किया जा सकता है।
सो मेनका गांधी जी ! सेक्स हार्मोन बनने की प्रक्र‍िया  तो सरकारी पैनल डिसाइड नहीं कर सकते ना ... मगर जो अनैतिक हो रहा है और सम्मानीय समाचार माध्यमों द्वारा किया जा रहा है, उसे रोक कर आप समाज में महामारी की तरह फैलती जा रही बलात्कार की घटनाओं से नई पीढ़ी को बचा अवश्य सकती हैं। उसे जबरन पढ़वाये जा रहे अश्लील विज्ञापनों से निजात दिला सकती हैं।
वेबहिट्स, सर्कुलेशन, विज्ञापन रेवेन्यू के लिए समाज और खासकर नई पीढ़ी को दीमक की तरह चाटने वालों का इलाज, सहमति से सेक्स की उम्र पर बतियाने से आगे जाकर करना होगा। आख‍िर तो आप महिला व बाल विकास दोनों के कल्याण वाला मंत्रालय संभाल रही हैं... और दोनों ही समाज में अश्लीलता फैलाने वालों के पहले श‍िकार बनते हैं। दीमक का ये रूप लाइलाज नहीं है, बस कुछ हिम्मतभरी गाइडलाइन्स की आवश्यकता है और जो माध्यम ऐसा कर रहे हैं, उन्हें समाज के प्रति जिम्मेदारी का अहसास करवाने की भी...।
प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेंस्ट सैक्सुअल ऑफेंसस (पोक्सो) और क्रिमिनल लॉ अमेन्डमेन्ट ऐक्ट (ऐन्टी रेप लॉ) भी तभी असरदार हो सकेंगे। ये युवाओं का जीवन है, कोई जापानी तेल के शोध का कारखाना नहीं।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

.... ताकि बची रहे जीवन में ऊर्जा

अधि‍कांश लोग जीवन में सब कुछ अपने मन के अनुसार करने के लिए अपनी बहुमूल्य ऊर्जा को नष्ट करते रहते हैं। जब ऐसा नहीं हो पाता तो मन व शरीर पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है, हावभाव बदल जाते हैं, ऐसे में तनाव होना निश्चित है। विपरीत असर को झेलने में मन व शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा व्यय करनी पड़ती है और यही ऊर्जा का ह्रास हमें शक्तिहीन बनाता है।
इस शक्तिहीनता की स्थ‍िति से बचने का एक ही उपाय है कि ऊर्जा का संचयन किया जाये। इसके लिए उन ऊर्जा स्रोतों को पहचानना होगा जो हमारे दैनंदिन उपयोगों में आते हैं ताकि संचयन के स्रोत हमें अपने आस-पास ही मिल सकें।
इस संचित ऊर्जा से न केवल शरीर शक्तिवान बनेगा बल्कि मन अपने आध्यात्मिक चरम को छू सकेगा , तनाव से जूझने का ये सबसे बेहतर उपाय है। 
इस सबंध में श्री श्री रविशंकर कहते हैं कि हमारे शरीर को ऊर्जा चार स्रोतों से प्राप्त होती है। पहला स्रोत भोजन होता है। भोजन का सेवन पर्याप्त मात्रा में होने से आपके शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है।
ऊर्जा का दूसरा स्रोत पर्याप्त मात्रा में नींद लेना है। पर्याप्त नींद से शरीर के अवयवों को प्राकृतिक विश्राम मिल जाता है ।
ऊर्जा का तीसरा स्रोत है ज्ञान। ज्ञान के  कारण ही हम किसी वस्तु, परिस्थिति, घटना और भावना से खुश या परेशान एवं दुखी नहीं होते। ज्ञान के अभाव में दुखी और अधिक ज्ञान होने से अहंकार के बढ़ने की पूरी पूरी संभावना रहती है।
ऊर्जा का चौथा व प्रमुख स्रोत श्वास है जो प्राण शक्ति या आत्मा व शरीर को ऊर्जा देती है।
श्वास के प्रति समय के साथ सजग हो जाना ही जीवन की कलात्मकता है और यही सकारात्मक जीवन जीने की पद्धति बन सकती है।
श्वास के आवागमन की स्थ‍िति को लेकर स्वामी विवेकानंद ने कहा भी है कि श्वास के संयमित रहने से मन की शक्ति सुदृढ़ होती है, जो कि शारीरिक ऊर्जा को संरक्षित करने व इसे मानसिक व आध्यात्मिक ऊर्जा में बदलने के काम आती है ।
वास्तव में हमारे शरीर का शक्तिगृह होता है मन, जो नसों के माध्यम से संकेत भेजता है और शरीर उसी के अनुसार कार्य करता है या प्रतिक्रिया करता है। हालांकि इसमें शरीर के बलों का भी योगदान रहता है। 'शरीर के बल' वे पदार्थ हैं जो हमारे अस्तित्व को भरते हैं और जो भोजन, पानी और हवा के माध्यम से चयापचय द्वारा रिचार्जिंग जारी रखते हैं।
अत: यदि हम शरीर की ऊर्जा को बचाना और जीवन को सुखी व समृद्ध बनाना चाहते हैं तो अपनी श्वास से उपजी ऊर्जा को बचाने की ओर ध्यान दें, जिससे न सिर्फ शरीर ऊर्जावान बने वरन मन भी आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाये। तनावमुक्त जीवन को जीने के लिए ऊर्जावान मन के साथ शरीर का ऊर्जावान होना अत्यंत आवश्यक है।

- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 1 जुलाई 2015

हैल्थ पैकेज और ऑफर्स के संग... आज नेशनल डॉक्टर्स डे कितना प्रासंगिक ?

कहते हैं कि किसी बीमारी को ठीक करने के किसी नेक दिल की दुआ और अच्छे डॉक्टर की दवा दोनों की जरूरत होती है । चूंकि ईश्वर प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होता इसलिए डॉक्टर को ही ईश्वर तुल्य माना जाता रहा, अभी कुछ वर्ष पूर्व तक ये होता भी था कि डॉक्टर ने हाथ पकड़ा नहीं कि मरीज आधा तो उसी वक्त ठीक महसूस करने लगता था। डॉक्टर नब्ज़ थामता हुआ पूछता जाता घर के हालचाल , मौसम की बातें करता हुआ वह न केवल रोग की तह तक जा पहुंचता बल्कि रोगी की मनोदशा का आंकलन करके दवाऐं देता था। इस पूरी प्रक्रि‍या में चंद मिनट ही तो लगते थे। मगर यह मरीज को आश्वस्त कर देती थी कि अब उसे कुछ नहीं होगा, वह सुरक्ष‍ित हाथों में है । बीमार तन को ठीक करने का ये मन से होता हुआ रास्ता बिना खर्च किये, बिना समय बरबाद किये बखूबी चल रहा था जो फैमिली डॉक्टर जैसे रिश्तों को जन्म दे गया ।
समय बदला , उदारीकरण आया, ग्लोबलाइजेशन ने श‍िक्षा को धंधा बना दिया , च‍िकित्सा जगत भी इसकी चपेट में आया। मेडीकल कॉलेज में काबिलों के साथ साथ नाकाबिल भी डोनेशन के बूते  एडमीशन- इंटर्नश‍िप से लेकर बड़े बड़े आलीशान नर्सिंग होम बनाकर आई एम ए जैसी एसोसिएशन्स के जरिये मरीजों को कमोडिटी की तरह ट्रीट करने लगे। सब बदल गया मगर ये बदलाव डॉक्टर और मरीज के बीच ईश्वरतुल्य वाली छवि को ध्वस्त कर गया। जो सेवा थी वो पेशा बन गई। जहां स्पर्शमात्र से आधा दर्द चला जाता था, वहां मिनीमम एक दर्ज़न टेस्ट कराके भी परिणामों की श्योरिटी नहीं होती। लापरवाहियों के उदाहरण आम हो गये हैं। प्रत्यक्षत: लिंग परीक्षण पर रोक लगी है मगर कौन नहीं जानता कि भ्रूण हत्याओं का ऊंचा ग्राफ सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर्स की इस प्रोफेशनलिज्म की प्रवृत्त‍ि की वजह से आगे चढ़ा और खुद आईएमए ने कभी कोई कार्यवाही नहीं की,वरना सरकार को क्यों तरह तरह से भ्रूण हत्या रोकने को उपाय करने पड़ते। इसके बावजूद जब आज नेशनल डॉक्टर्स डे पर कुछ डॉक्टर्स से बात की तो उन्होंने मरीज और डॉक्टर्स के बीच पनप रहे अविश्वास को लेकरअनगिनत मजबूरियां तो गिना दीं मगर प्रोफेशनलिज्म को सेवा मानने को वे हरगिज़ तैयार न थे ।
बदलते समय की ये नई परिभाषायें अपने साथ बहुत से बदलाव लाई जिसने डॉक्टर्स को भी सेवा की जगह प्रोफेशनल और प्रैक्टीकल बना दिया और अब आलम ये है कि एक बड़े डॉक्टर कहते हैं कि आज बिना प्रेाफेशनल बने खर्चे निकालना मुश्किल है, तो वहीं दूसरे डॉक्टर ने कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट को ही इस सबका दोष दे दिया । वे बोले, सीपीए यानि  कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट की वजह से डॉक्टरों में कोर्ट में घसीटे जाने का डर लगा रहता है। किसी एक बीमारी के लिए भी तमाम  टेस्ट कराने पर वो अपनी सफाई देते हैं कि कोई डॉक्टर रिस्क सीपीए की वजह से नहीं लेना चाहता इसलिए वह एक सिर दर्द होने पर भी सभी टेस्ट कराके आश्वस्त हो जाने के बाद ही इलाज करना शुरू करता है ताकि कोई कोताही न होने पाए।
एक डॉक्टर तो कहते हैं कि आजकल प्रोफेशनल होना  हमारी मजबूरी है , वरना इतने महंगे इक्विपमेंट्स , स्टाफ की सैलरी , बिजली से लेकर मैडीकल वेस्ट तक का खर्चा कहां से निकले।इस सफाई में वो असल सवाल टाल ही गए कि मरीज और डॉक्टर से बीच आए अविश्वास को कैसे कम किया जाए।
तमाम बहानों के साथ ही ये तो निश्चत हो गया कि विश्वास का संकट तो स्वयं डॉक्टर्स ने ही उपजाया है । जहां तक मरीजों द्वारा कानून की शरण लेने की बात है तो जो रोग से जूझ रहा हो , क्या वो शौकियातौर पर जाना चाहेगा कोर्ट । हमारे देश में कोर्ट जाना या न्याय पाना क्या इतना आसान है।
इनकी तरह कई और डॉक्टर्स ने भी बहानों का पहाड़ खड़ा किया मगर सभी के सभी टोटल इललॉजिकल। समस्या को फिलहाल वो सतही तौर पर देख रहे हैं जो पूरी के पूरी स्वास्थ्य सेवाओं के खतरनाक है।
अब बताइये कि एक पर्ची पर केवल एक हफ्ते ही दिखाया जा सकता है, अगले हफ्ते के लिए फिर से दूसरी पर्ची पूरी फीस चुकाकर बनवानी पड़ेगी, चाहे कितना भी रेग्यूलर चेकअप क्यों न करवा रहे हों । इसी तरह नर्सिंग होम के अंदर ही मेडीकल स्टोर, पैथेलॉजी लैब, कैंटीन और ऐसी ही सुविधाओं के साथ पूरा बिजनेस सेटअप ... दवा कंपनियों के ऑब्लीगेंटरी गिफ्ट्स पर विदेशों की सैर का लालच के चलते जेनेरिक दवाओं को डॉक्टर्स प्रेस्क्राइब ही नहीं करते ....आलीशान 5 और 7 स्टार्स हॉस्पीटल्स के '' ऑफर्स '' के साथ पैम्फलेट बांटा जाना, एक बीमारी के इलाज के साथ दूसरे टेस्ट्स फ्री... बताने वाले आदि ऐसे सच हैं जिनसे आप  सभी कभी ना कभी तो दोचार हुए ही होंगे। इसके अलावा गांवों में जाना तो स्वयं सरकारी डॉक्टर्स पसंद नहीं करते , वो भी शहरों के नर्सिंग होम्स के साथ कांट्रेक्ट्स करके रखते हैं ताकि प्रोफेशनल हो सकें... । ये कुछ सच्चाइयां हैं जो मरीज को मरीज नहीं बल्कि कमोडिटी बनाकर उसके विश्वास के साथ  खेल रही हैं... इस स्थ‍िति से बाज आना होगा और विश्वास बहाली का पहला कदम तो डॉक्टर्स को ही उठाना होगा ।
और अंत में आज नेशनल डॉक्टर्स डे है जो डॉ बी सी रॉय की याद में प्रति वर्ष १ जुलाई को मनाया जाता है , यही उनका जन्मदिन भी है और पुण्य तिथि भी। 1961 में भारत रत्न से सम्मानित डा. रॉय के नाम पर १९७६ में सरकारें उनके सम्मान में चिकित्सा , विज्ञानं , आर्ट , और राजनीति के क्षेत्र में विशिष्ठ कार्य के लिए डॉ बी सी रॉय नेशनल अवार्ड देती आई हैं।
इस दिन हर वर्ष सभी चिकित्सक संस्थाएं अपने उन डॉक्टर्स को सम्मानित करती हैं , जो अपने क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रहे हैं । तो डॉक्टर्स डे के इस हीरों के नाम पर ही सही आज के इस सेवाकार्य के बदलते प्रोफेशनल रूप को लेकर हम सभी को सोचना होगा। दोषारोपण से नहीं बल्कि सार्थक बदलाव लाकर हम मानवीय आधार पर सर्वश्रेष्ठ कर पाऐं , ऐसा उपाय करना होगा।

- अलकनंदा सिंह 

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