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शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

जान‍िए … चर्चा में आया टूलकिट आख‍िर है क्या


 क‍िसान आंदोलन को समर्थन देने के नाम पर ज‍िन व‍िदेशी सेलेब्र‍िटीज ने ट्वीट क‍िये उनमें ग्रेटा थनबर्ग के एक ट्वीट ने बहुत सुर्ख‍ियां बटोरीं, वजह थी ग्रेटा के ट्वीट के साथ उसने वो टूलक‍िट (Toolkit) भी ट्वीट कर द‍िया जो प्रोपेगंडा की सारी पोल खोलता चला गया।

तो आखिर ये टूलकिट होता क्या है और कैसे काम करता है, जो सोशल मीडिया पर एक्टिव तो रहते हैं उनके ल‍िए इसके बारे में जानना ज्यादा जरूरी है।

क्या है टूलकिट?

दरअसल टूलकिट एक ऐसा दस्तावेज होता है जिसमें किसी मुद्दे की जानकारी देने के लिए और उससे जुड़े कदम उठाने के लिए इसमें विस्तृत सुझाव दिए गए होते हैं। आमतौर पर किसी बड़े अभियान या आंदोलन के दौरान उसमें हिस्सा लेने वाले वॉलंटियर्स को इसमें दिशानिर्देश दिए जाते हैं। टूलकिट का पहली बार जिक्र अमेरिका में किया गया था।

कब चर्चा में आया टूलकिट

आप को याद होगा कि अमेरिका में एक अश्वेत शख्स की हत्या कर दी गई और अमेरिका सुलग उठा था। उसी दौरान ब्लैक लाइफ मैटर नाम से आंदोलन भी अस्तित्व में आया, जिसे बाहरी मुल्कों के लोगों ने भी समर्थन दिया था उसी दौरान आंदोलन से जुड़े लोगों ने ही टूलकिट बनाया, जिसमें तरह-तरह की जानकारी थी।

उदाहरण के लिए आंदोलन में किन जगहों पर जाएं या दूर रहें, सोशल मीडिया पर किस तरह से सक्रिय रह सकते हैं, किन हैशटैग के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाई जा सकती है। इसके साथ ही अगर पुलिस कोई कार्यवाही करती है तो उससे किस तरह से बचा जा सकता है।

इस वजह से अब यह स्पष्ट हो गया है कि टूलकिट वह डिजिटल हथियार है, जो सोशल मीडिया पर एक बड़े वर्ग पर किसी आंदोलन को हवा देने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को उसमें जोड़ने के लिए किया जाता है। टूलकिट में वो सभी चीजें मौजूद होती हैं, जो लोगों को अपनाने की सलाह दी जाती है, ताकि आंदोलन भी बढ़े और किसी तरह की कोई बड़ी कार्यवाही भी न हो सके।

ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट से चर्चा में आया टूलकिट


ग्रेटा के इस ट्वीट में  docs.google.com/document/d/10G  लिखा हुआ है वो टूलकिट है, इसी पर क्लिक करने पर ये एक अलग फाइल खुलती है। ये उनके ट्वीट का एक स्क्रीन शॉट है।


टूलकिट की शुरुआत चाइल्ड एक्टिविस्ट के तौर पर चर्चित रहीं ग्रेटा थनबर्ग (Greta Thunberg) के ट्वीट से फिर से हो गई है। किसान आंदोलन के समर्थन में ग्रेटा ने एक ट्वीट किया और एक टूलकिट (toolkit) नाम का एक डॉक्यूमेंट शेयर किया। इसको देखकर सोशल मीडिया पर काफी हंगामा हुआ। हंगामा होने के बाद ग्रेटा ने ये ट्वीट डिलीट कर दिया और दूसरा ट्वीट कर दूसरा टूलकिट डॉक्यूमेंट शेयर कर दिया। ग्रेटा द्वारा शेयर की गई इस टूलकिट में किसान आंदोलन के बारे में जानकारी जुटाने और आंदोलन का साथ कैसे करना है इसकी पूरी डिटेल दी गई थी।
भारत में चल रहे किसान आंदोलन का समर्थन

इस टूलकिट में समझाया गया है कि कैसे भारत में चल रहे किसान आंदोलन के बारे जरूरी अपडेट लेने हैं? अगर कोई यूजर किसान आंदोलन पर ट्वीट कर रहा है तो उसे कौन-सा हैशटैग लगाना हैं? अगर कोई दिक्कत आए तो किन लोगों से बात करनी है? ट्वीट करते वक्त क्या करना जरूरी है? क्या करने से बचना है? ये सारी बातें इस टूलकिट में मौजूद थीं।

टूलकिट ट्वीट किया फिर डिलीट कर दिया

ग्रेटा ने बुधवार को किसानों की परेशानी को लेकर बात करने वाला ट्वीट किया। इसे लेकर भारत में काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई। इस ट्वीट के साथ ही उन्होंने एक ऐसा डॉक्युमेंट भी ट्विटर पर शेयर कर दिया, जिसमें किसानों को लेकर सोशल मीडिया पर कैसे समर्थन जुटाया जाए उसके बारे में जानकारी दी गई थी। इसमें पूरे प्लान के तहत 4 फरवरी और 5 फरवरी को किए गए ट्वीट में सेलेब्रिटी ट्वीट की बात लिखी गई। साथ ही उन सभी हैशटैग का वर्णन भी है, जिन्हें इस्तेमाल किया जाना है।

- अलकनंदा स‍िंंह 

गुरुवार, 9 मई 2019

चिदंबरम साहब…अतीत पीछा नहीं छोड़ता, आपकी चाटुकारिता भी इतिहास में दर्ज़़ होगी

आइना सच नहीं बोलता बल्‍कि आपकी उस इमेज को रैप्‍लिकेट करता है जो पब्‍लिकली दिखाई देती है, आइने द्वारा दिखाई गई इमेज आपकी अंतरात्‍मा की इमेज से अलग होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि सच अंतरात्‍मा में छुपा होता है ना कि आइने की इमेज में ।
यूपीए शासनकाल में वित्‍तमंत्री रहे वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता, वरिष्‍ठ वकील, वरिष्‍ठ आर्थिक विद्वान पी. चिदंबरम ने कल एक ऐसा ट्वीट किया जिसने उनकी तमाम ”वरिष्‍ठ उपाधियों” की पोल खोलते हुए उनके इस आइनाई इमेज का सच सामने ला दिया।
ट्वीट में उन्‍होंने लिखा – ‘De mortuis nihil nisi bonum’ “मृत व्यक्ति के लिए कभी बुरा ना बोलें”। क्या पीएम ने यह प्राचीन कहावत सुनी है?
क्या कोई भी धर्म किसी मृत व्यक्ति को अपमानित करने की इजाज़त देता है?
चिदंबरम साहब चूंकि इंटरनेशनल स्‍तर के ज्ञानी व्‍यक्‍ति हैं इसलिए उन्‍होंने लैटिन कहावत का इस्‍तेमाल पीएम नरेंद्र मोदी को गरियाने के लिए किया वरना देसी ज्ञानी होते तो भगवद्गीता को बांचते जहां कर्मप्रधान माना गया है। अर्थात् मनुष्‍य जैसा कर्म करता है, समाज उसे वैसे ही विभूषित करता है।
लैटिन कहावत ”De mortuis nihil nisi bonum and De mortuis nil nisi bene” का उद्धरण, चिदंबरम साहब द्वारा कहा गया वो अधूरा सच है जो आइने में तस्‍वीर तो दिखाता है मगर उल्‍टी। ये सच अधूरा इसलिए भी है क्‍यों कि इस कहावत में कहीं भी ”मृत व्‍यक्‍ति के कर्म” के आधार पर उसका ”आंकलन” करने से नहीं रोका गया। इस आंकलन के आधार पर ही भगवान श्रीकृष्‍ण ने गीता में अच्‍छे और निष्‍काम कर्म करने के लिए प्रेरित किया।
चिदंबरम साहब, आप तो पीएम मोदी की आलोचना करने में भगवद्गगीता तक को भूल गए और राजीव गांधी का पूरा सच बताने पर भड़क गए जबकि 1984 के जिस ”सिख नरसंहार” को कांग्रेसियों और उनके तत्‍कालीन मीडियाहाउसेस ने सिख दंगा कहकर कातिलों के सिर से इल्‍ज़ाम हल्‍का करने का गुनाह किया, वह आज भी राजीव गांधी सहित समूची कांग्रेस का पीछा कर रहा है। संभवत: इसीलिए गत दिनों सिखों के एक समूह ने बाकायदा चिठ्ठी लिखकर राहुल गांधी से अनुरोध किया है कि वह अपने पिता को ‘शहीद’ न कहें।
आप अपनी अतिबुद्धिमता के अहंकार में शायद ये भी भूल गए कि हमारे सनातन धर्म में कर्म ही राजा और प्रजा का भाग्‍य तय करते आए हैं। कर्म ही होते हैं जो पीढ़ियों तक अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कर्म ही थे जिन्‍होंने रावण, कंस, दुशासन, दुर्योधन, तैमूर लंग, गोरी, गजनवी, बाबर, औरंगजेब, हिटलर के बाद नाथूराम गोडसे को भी सदैव के लिए खलनायक बना दिया। अफजल गुरु और कसाब को कैसे याद किया जाए, ये भी बताइये ज़रा। शासक के कार्यों की समीक्षा करके ही जनता सर्वश्रेष्‍ठ चुनती है, यही लोकतंत्र है परंतु एक बात निश्‍चित है कि अच्‍छे हों या बुरे कर्म कभी मनुष्‍य का पीछा नहीं छोड़ते।
राजीव गांधी यदि सिख नरसंहार की भर्त्सना करते तो शायद उन्‍हें अलग तरह से याद किया जाता परंतु उन्‍होंने इसे जायज ठहराया और ये इबारत इतिहास में दर्ज हो गई कि बड़ा पेड़ गिरने पर धरती तो हिलती ही है। नरसंहार से उपजी आहें उनके नाम को कभी इज्‍ज़त नहीं बख्‍शेंगीं, ये निश्‍चित है। चिदंबरम साहब, चाटुकारिता ही करनी थी तो मिसाल अच्‍छी देते। मेरी मानिए तो गीतापाठ शुरू कर दीजिए जिसमें अतिज्ञानी महात्‍मा और वरिष्‍ठतम भीष्‍म को भी शासन के पायों से बंधे रह कर अधर्म का साथ देने के लिए अर्जुन के हाथों मृत्‍युशैया तक पहुंचना पड़ा था। इस तरह राजीव गांधी का महिमामंडन कर सहानुभूति के रूप में राजनैतिक लाभ लेने की धूर्ततापूर्ण कोशिश ना करिए क्‍योंकि सच्चाई तथ्यों के साथ जनता के सम्मुख रखना धर्मानुरूप है।
”मृत व्यक्ति के लिए कभी बुरा ना बोलकर” हम लोकतंत्र का ही अपमान करेंगे।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

धार्मिक गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज़ उठाना ज़ुर्म है क्‍या


कबीर, रैदास, रसखान की भक्‍ति परंपरा वाले देश में धर्म के मूलभाव की धज्‍जियां किस तरह उड़ाती हैं, यह हम देख सकते हैं सोनू निगम द्वारा अजान पर कहे गए शब्‍दों के बाद आई प्रतिक्रियाओं से। इन शब्‍दों को लेकर सोनू निगम सुर्खियों में हैं, बॉलीवुड यूं भी आजकल अपनी रचनाओं और कृतियों से नहीं बल्‍कि ट्विटर पर अपने विचारों से सुर्खियों में रहने की कला आजमा रहा है।

दरअसल सोनू निगम ने एक के बाद एक लगातार तीन ट्वीट किये और अपनी  नींद में खलल डालने के लिए अजान की आवाज को दोषी बताते हुए कहा कि  इस गुंडागर्दी पर लगाम लगनी चाहिए। अजान का नाम आया तो ज़ाहिर है  बवाल होना ही था।

बवाल यहां तक बढ़ा कि आज बुधवार को सुबह सोनू निगम ने पश्चिम बंगाल के एक मौलवी के बयान पर अपने बाल मुंडवाने का एलान कर दिया था. सोनू निगम ने ट्वीट करते हुए कहा, ' आज दोपहर 2 बजे आलिम आएगा और मेरा सिर मुंडेगा. अपने 10 लाख रुपये तैयार रखो मौलवी'. सोनू ने इसके साथ ही अपने अगले ट्वीट में प्रैस को भी इसके लिए निमंत्रण दे दिया.
दरअसल डीएनए में छपी एक खबर में पश्चिम बंगाल अल्‍पसंख्‍यक युनाइटेड काउंसिल के एक वरिष्‍ठ सदस्‍य का बयान दिया है, 'यदि कोई उनका सिर मुंडवा कर, उनके गले में जूते की माला डालकर देश में घुमाएगा तो मैं खुद उस शख्‍स के लिए 10 लाख रुपये के पुरस्‍कार का एलान करता हूं.'

सोनू निगम ने अपने ट्वीट पर उठे विवाद पर की प्रेस कॉन्‍फरेंस में यह साफ कर दिया है कि वह किसी धर्म के विरोध में नहीं हैं और वह अपने मुस्लिम दोस्‍तों से उतना ही प्‍यार करते हैं. सोनू निगम ने अपने बाल कटवा लिए हैं. सोनू निगम ने कहा कि मेरा उद्देश्‍य किसी को चोट पहुंचाना या किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं था. उन्‍होंने दुख जताया है कि लोगों ने उनका मुद्दा समझने के बजाए उनकी बात को पकड़ा और उसके खिलाफ विवाद खड़ा कर दिया. सोनू ने अपने दावे को पूरा करते हुए अपना सिर मुंडवा का फैसला लिया है और इस काम के लिए उन्‍होंने अपने मुस्लिम दोस्‍त आलिम को चुना. आलिम हकीम सेलेब्रिटी हेयरस्‍टाइलिस्‍ट हैं. सोनू निगम ने कहा, मैं सोच भी नहीं सकता था कि इतनी छोटी सी बात इतनी बड़ी बन जाएगी.

सोनू ने कहा कि मगर आज भी मैं यही कहूंगा  कि ये गुडागर्दी है कि मैं मुस्‍लिम नहीं हूं फिर  भी जबरन मैं अजान क्‍यों सुनूं,  यही बात मंदिर-चर्च-गुरुद्वारा या ऐसे किसी भी ऑरगेनाइजेशन के लिए भी  कहूंगा।  

भारतीय जनमानस में धर्म के प्रति कटमुल्‍लावाद और कट्टरता इस हद तक  समाहित होता गया कि धर्म से जुड़ी कोई बात उठी नहीं कि हाज़िर हो जाते हैं  आलोचक एक दम बर्र के टूटे छत्‍ते की तरह। यही हुआ और आज सुबह तक  सोनू निगम अपने आलोचकों को अपनी बात का मर्म समझा रहे हैं।

कला की आलोचना समालोचना करते हुए किसी को कोई तकलीफ नहीं होती  मगर धर्म की बात आते ही इतिहास से निकल-निकल के सामने आती हैं  आलोचनाऐं।

चिंतन, मनन और कर्म का संदेश देते आए कमोवेश सभी धर्मों ने कभी भी  किसी दूसरे को आहत करने की बात नहीं कही।

कबीर का तो पूरा निर्गुण दर्शन प्रैक्‍टीकैलिटी पर ही टिका है जो मुस्‍लिमों को  असल धर्म बताते हुए कहते हैं कि-
कांकर पाथर जोरि कै मज्‍ज़िद लई बना।
ता पर मुल्‍ला बांग दे क्‍या बहरा हुआ खुदा।।

इसी तरह वे हिंदू धर्मावलंबियों से भी अंधे-बहरे बन कर जड़ होने से बाज आने  को कहते हैं-
पाथर पूजें हरि मिलें तौ  मैं पूजूं पहार।
जा ते तो चाकी भली पूज खाय संसार।।

हम सब जानते हैं कि लाउडस्‍पीकर लगाकर आए दिन कानफोड़ू संगीत के साथ  देवी जागरण, अखंड रामायण, श्री मद्भागवत कथा धर्म और ईश्‍वर से  हमें  मिलान के नाम पर ध्‍वनि प्रदूषण फैलाते हैं जिन्‍हें ना किसी बीमार की फिक्र  होती है और न किसी की नींद की।देर रात ड्यूटी से आने वालों की, परीक्षा देने  वाले छात्रों की शामत आ जाती है जब घर या पड़ोस में कोई ऐसा कार्यक्रम  होता है। अजीब बात यह भी है कि चिंतन और मनन करके ईश्‍वर प्राप्‍ति का शांति वाला उपदेश भी इन्‍हीं लाउडस्‍पीकर्स के द्वारा ही दिया जाता है।

तो फिर सोनू निगम कहां गलत हैं। सोनू निगम ने भी यह सच ही तो कहा है ये तो गुंडागर्दी है भाई।

धर्म के आतंक का यह रूप नि:संदेह भर्त्‍सनायोग्‍य है। मस्‍जिद हो, मंदिर हो, चर्च  हो या गुरूद्वारा सभी में लाउडस्‍पीकर्स पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। कई बार  तो सांप्रदयिक विवादों की जड़ में ये लाउडस्‍पीकर ही होते हैं। हालांकि कानूनी  तौर पर निश्‍चित फ्रीक्‍वेंसी पर लाउस्‍पीकर बजाने की इजाजत है मगर कानून  का पालन कितना होता है यह मौजूदा विवाद बता रहा है।

ईश्‍वर की खोज और पूजा पद्धतियों में शामिल होते गए इस शोरशराबे पर क्‍या  हम कबीर के कहे को सच नहीं कर सकते।

- अलकनंदा सिंह