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शनिवार, 11 नवंबर 2017

खबर आई है कि उनका दम घुट रहा है...

सुना है कि धुंध ने दिल्‍ली में डेरा जमा लिया है। ये कैसी धुंध है जो  एक कसमसाती ठंड के आगमन की सूचना लेकर नहीं आती बल्‍कि  एक ज़हर की चादर हमारे अस्‍तित्‍व पर जमा करती चली आती है।

इस धुंध ने आदमी की उस ख्‍वाइश को तिनका-तिनका कर दिया है  जो अपने हर काम और अपनी हर उपलब्‍धि को ''दिल्‍ली'' ले जाने में  लगा रहता है। सचमुच अब दिल्‍ली दूर भले ही ना लगे, मगर दिल्‍ली  से दूर रहने में ही ज्‍यादा भलाई है।

पिछले दो-तीन दिनों से दिल्‍ली पूरे विश्‍व के पटल पर चर्चा का विषय  बनी हुई है। यूं चर्चा का विषय तो स्‍मॉग है जो दिल्‍ली-एनसीआर की  बड़ी आबादी को तिल-तिल करके मार रहा है मगर वजह तो और भी  हैं जो दिल्‍ली को ज़हरीला बना रही हैं जिनमें मुख्‍य है देशभर से आई  आबादी का दिल्‍ली-एनसीआर क्षेत्र में विस्‍फोटक रूप में आकर बसना।  यहां सेर में सवासेर नहीं, बल्‍कि सेर में दस सेर समा रहा है। यानि  सब-कुछ जब कई गुना बढ़ रहा है तो स्‍मॉग कम कैसे हो सकता है।

कुल मिलाकर बात ये है कि सब जानते हैं ये समस्‍या कोई आज की  नहीं है, इसकी जड़ तो उस मूल अवधारणा में छुपी है जो हर  दिल्‍लीवासी (चाहे वह झुग्‍गीवासी ही क्‍यों ना बन गया हो) को  अतिविशिष्‍ट बनाती है। इसी सोच ने दिल्‍ली को नरक बनाकर रख  दिया है। हम सभी ये भी जानते हैं कि इस अतिविशिष्‍टता ने दिल्‍ली  को स्‍मॉग का शहर बनाने के साथ-साथ क्राइम सिटी भी बनाया है।

'सर्वसुख...? सर्वसुलभ...?' की मृगतृष्‍णा ने दिल्‍ली को आज इस  नारकीय स्‍थिति में ला खड़ा किया है कि वह आकर्षित करने की  बजाय सुरसा के मुंह की भांति भयावह नज़र आती है जो अपनी  ज़मीन पर आने वाले हर वाशिंदे को निगलने को आतुर है।

जहां तक बात है स्‍मॉग की, तो स्‍मॉग कोई सिर्फ दिल्‍ली की समस्‍या  नहीं है, इस मौसम में लगभग हर शहर इस समस्‍या से दो-चार होता  है मगर चूंकि नेशनल मीडिया दिल्‍ली में बैठा है और एक एक खबर  पर वो 24 घंटे चीखने की कुव्‍वत रखता है सो स्‍मॉग की ''चपेट'' में  आ जाती है दिल्‍ली, और आननफानन में एनजीटी से लेकर सुप्रीम  कोर्ट तक अतिसक्रिय हो जाते हैं। बाजार में 'एअरप्‍यूरीफायर' और  'मास्‍क' के ब्रांड मॉल्स से लेकर फुटपाथों तक सजा दिए जाते हैं।

हकीकतन दिल्‍ली की हवा में ज़हर की ये समस्‍या पलायन से उपजी  है, समस्‍या हर किसी के दौड़ने और दौड़कर लक्ष्‍य पाने की आपाधापी  से उपजी है, समस्‍या हर किसी के भीतर पैदा हुए बेशुमार लालच से  उपजी है, समस्‍या गांवों के खाली होने से और शहरों में भीड़ के  पहाड़ों से उपजी है, समस्‍या उस सोच से भी उभरी है जो दिल्‍ली वाला  बनने के लिए अपने जीवन, अपने रिश्‍तों, अपने बच्‍चों, अपने सुकून  को दांव पर लगा देती है मगर उसे बदले में हासिल होता है ज़हरीली  सांसों का उपहार।

यूं रस्‍मी तौर पर स्‍मॉग चर्चा में है और अगले कुछ दिनों तक रहने  भी वाली है, इस ज़हरीली धुंध के कारण-निवारण ढूढ़े जाऐंगे, हर बार  की तरह इस बार भी सर्दी के पूर्ण आगमन से पूर्व ये तमाशा चलता  है...चलता रहेगा।

लीजिए इसी हमारी 'धुंध' यानि दिल्‍ली की 'स्‍मॉग' पर मेरा एक शेर -

कोई हमें मारने को आए क्‍यूं भला
हम खुद अपने ताबूतों को नीलाम किए बैठे हैं।

-- अलकनंदा सिंह

रविवार, 6 नवंबर 2016

तस्‍वीरें बता रही हैं कि हम ”किस तरह से” सूर्य की उपासना कर रहे हैं


प्रत्‍येक ‘उदय’ का ‘अस्त’ जहां भौगोलिक नियम है, वहीं ‘अस्त’ का ‘उदय’ प्राकृतिक व  आध्यात्मिक सत्य है। सूर्य की अस्‍ताचलगामी रश्‍मियां इस सत्‍य को सार्वभौम कर देती हैं।

आज अस्‍ताचलगामी सूर्य को अर्घ्‍य देती स्‍त्रियों की एक फोटो ने बहुत कुछ ऐसा कह दिया  कि पूरे पर्व के औचित्‍य पर दोबारा सोचना पड़ रहा है। हालांकि गत 3 नवम्‍बर को  यमद्वितीया पर मथुरा के यमुना किनारे का दृश्‍य भी कुछ इसी तरह का था।

बहन-भाई दोनों ही सोच रहे थे कि आखिर अपने प्रेम को ”किस यमुना” में डुबकी लगाकर  अमर किया जाए… वो यमुना जो पवित्र है, जिसे यम की बहन कहा गया, जो कृष्‍ण को  छूकर धन्‍य हुई थीं या उस यमुना को जो पूरे शहर का मैला ढोने को अभिशप्‍त है। ठीक  यही हाल आज दिल्‍ली की यमुना का भी दिखा।

सूर्य की उपासना का पर्व ”छठ” भी लोक में आकर अपनी दिव्यता का मूलभाव तिरोहित कर  चुका है, यदि ऐसा ना हुआ होता तो आज दिल्‍ली के कालिंदी कुंज की ये तस्‍वीरें हमें यह  सोचने पर बाध्‍य ना कर रही होतीं कि आखिर हम ”किस सूर्य की उपासना” कर रहे हैं,  ”किस तरह से” सूर्य की उपासना कर रहे हैं। पूरी तरह प्रदूषित जल में कमर तक खड़े  होकर, इसी प्रदूषण से उपजे झागों में घिर कर हम आखिर सूर्य की आराधना से किस  मनोकामना को पूरा करने की चाहत रख रहे हैं।

सूर्य की आराधना का ये लोक-भावन स्‍वरूप संभवत: कर्ण द्वारा सूर्य की उपासना से  प्रभावित दिखता है जिसमें जल में कमर तक खड़े होकर अर्घ्‍य दिया जाता है, मगर तब  जल और खासकर बहते हुए जल को पवित्र रखा जाता था। संभवत: इसीलिए संकल्‍प के  लिए जल से ज्‍यादा पवित्र कुछ नहीं था मगर अब स्‍थितियां एकदम बदल चुकी हैं।

यूं तो वैदिक मन्त्रों में सर्वश्रेष्ठ माने गये गायत्री महामन्त्र का देवता भी सविता अर्थात् सूर्य  ही है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है ‘‘सविता वा देवानां प्रसविता।’’ अर्थात् सविता ही देवों  का प्रसव करने वाला, अपने अंश से उत्पन्न करने वाला है। इसके अनुसार जो सूर्य आकाश  में दिखाई देता है, वह उस सूर्य का एक स्थूल रूप है जिसका विस्तार अनन्त है। शास्‍त्रों में  माना जाता रहा है कि यह ब्रह्माण्ड कितने ही सूर्यों से जगमगा रहा है और ये सभी सूर्य  उस अज्ञात महासूर्य की ही उपज हैं इसीलिए प्राणदायिनी ऊर्जा एवं प्रकाश का एक मात्र  स्रोत होने से सूर्य का नवग्रहों में भी सर्वोपरि स्थान है।

निश्चय ही भारतीय संस्कृति ने सूर्य के इस लोकोपकारी स्वरूप को पहले ही जान लिया था,  इसीलिए भारतीय संस्कृति में सूर्य की उपासना पर पर्याप्त बल दिया गया है।

सूर्योपासना के लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार के लाभ हैं। निष्काम भाव से दिन-  रात निरंतर अपने कार्य में रत सूर्य असीमित विसर्ग- त्याग की प्रतिमूर्त है, इसी तरह यह  कर्म प्रधानता को आगे रखता है। सूर्यदेव सबको समर्थ बनाएं, यही सूर्योपासना का मूल  तत्व है। भारतीय संस्कृति भी सभी को समर्थ बनाने की इसी भावना से ओत- प्रोत रही है।  इसी आधार पर आदि सविता तो परब्रह्म कहा जा सकता है किन्तु प्रत्यक्ष सूर्य को भी  ‘सविता’, अर्थात् परब्रह्म का सर्वोत्त्म प्रतीक कहा गया है।

अथर्ववेद में लिखा है-
‘संध्यानो देवःसविता साविशद् अमृतानि।’ अर्थात् यह सविता देव अमृत तत्त्वों से परिपूर्ण  है। और — ‘तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः।’
अर्थात् यह परम पुरुष सविता तेज का भण्डार और अमृतमय है।

कहा जाता है कि वेदों में जितने भी मंत्र हैं, वे तन-मन को आरोग्‍य देते हैं मगर अथर्ववेद  की इसी पंक्‍ति को आज जब कालिंदी कुंज के झागदार प्रदूषित पानी में खड़े होकर सूर्य को  अर्घ्‍य देते समय दोहराया गया होगा तो क्‍या ये मंत्र अपना कोई प्रभाव छोड़ पाए होंगे, मुझे  तो भारी संशय है।

प्रदूषण की मार से यूं तो अब जल, जंगल, नदी और वायु सहित समूची प्रकृति प्रभावित है  किंतु यमुना और गंगा जैसी जीवनदायिनी नदियों के तो अस्‍तित्‍व पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लगने  लगा है। यमुना को सूर्य की पुत्री माना गया है। ऐसे में अब सूर्योपासना के इस पर्व की  सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब इस पर्व को मनाने वाला समूचा वर्ग सूर्यपुत्री को प्रदूषणमुक्‍त  कराने का संकल्‍प ले और संकल्‍प ले इस बात का भी कि अगले छठ पर्व पर वह डूबते सूर्य  को अर्घ्‍य तो देगा लेकिन प्रदूषित यमुना में खड़े होकर नहीं।
यमुना ही क्‍यों, किसी भी  प्रदूषित नदी में खड़े होकर नहीं। सूर्य को अर्घ्‍य स्‍वच्‍छ व निर्मल जल की धारा में खड़े  होकर दिया जाएगा। फिर चाहे इसके लिए कितना ही कठिन व्रत और कितना ही कठिन  संकल्‍प क्‍यों न लेना पड़े।
– अलकनंदा सिंह