मंगलवार, 19 मई 2020

...रक्त पिपासु ने विक्रय की लाखों में तस्वीर

व्यथा व बेचारगी की ऑनलाइन सेल
सुख क‍िसे बुरा लगता है, बैठे ठाले अपना रोजगार छोड़कर कौन जाना चाहता है परंतु लगभग 2 महीने की बेकारी के बाद घटती जा रही जमापूंजी के संग आगे बढ़ती असमंजस भरी ज‍िंदगी तथा अपनों से दूरी… ऐसी कई व्यथा हैं जो आज कामगारों और मजदूरों के हालात बयां कर रही हैं, इन व्यथाओं ने ”उनके सुख” पर प्रश्नच‍िन्ह लगा द‍िया है …। एसी कमरों में बैठकर हम ना तो उन व्यथाओं का अंदाज़ा लगा सकते हैं और ना उस अन‍िश्च‍ितता का। हद तो तब होती है जब उनकी ये व्यथा बाजार में बेचने रख दी जाए।
ऑनलाइन सेल
फोटो जर्नल‍िस्ट्स द्वारा ई कॉमर्स वेबसाइट पर व्यथा व बेचारगी की ऑनलाइन सेल
जी हां, ऐसा ही क‍िया गया है इस बेबसी की ऑनलाइन सेल लगाकर। अफरातफरी के इस आलम में अगर मजबूर, फटेहाल, छाले पड़े नंगे पैर, आंसू भरी आंखें, गर्भवती का दर्द, साइक‍िल के डंडे पर सोती नन्हीं बच्च‍ियों की तस्वीरों को फोटो जर्नल‍िस्ट्स द्वारा ई कॉमर्स वेबसाइट पर ”ऑन सेल” लगा द‍िया जाये तो… ? आप इसे क‍िस श्रेणी में रखेंगे… मानवीय, अमानवीय, बाजारवाद या अपनी पेशेगत असुरक्षा की श्रेणी में?
माना क‍ि फोटोग्राफी कमरों में बैठकर नहीं हो सकती, यह जीती जागती पूरी र‍िपोर्ट होती है उस लम्हे की जो क‍िसी ने कैसे ज‍िया, परंतु मौजूदा सूरतेहाल में कामगारों की मजबूरी को ऑनलाइन सेल पर लगा देना… अमानवीय ही कहा जायगा। हम पत्रकारों के ल‍िए ये बात बेहद शर्मनाक है क‍ि मार्केट‍िंग के दौर में मानवीय और अमानवीय के बीच भेद नहीं कर पा रहे।
इंड‍िया टुडे ग्रुप की ओर से हृदयविदारक तस्वीरें ई कॉमर्स वेबसाइट पर बिक्री के लिए देख कर हैरान हूं मैं। इन कामगारों को तो पता भी न होगा कि वो बिक गए, उनके आँसू… टूटी चप्पल… फटा बैग… सब सेल पर लगे हैं । इनमें से एक एक फ़ोटो का दाम 8000 से 20000 तक रखा गया है।
माना कि सबको घर चलाना है लेकिन इन तस्वीरों से कमाई? कुछ समय बाद इनमें से कोई पुल‍ित्जर ले आए तो आश्चर्य नहीं, पुल‍ित्जर की तो पॉल‍िसी ही ” बेचारगी” को बेचने और लाचारगी को उत्कृष्ट बताने की है। फोटो पत्रकार‍िता के इसी कृत्य में शाम‍िल बीबीसी के विज्ञान, तकनीक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार पल्लव बागला ने तो ISRO के वैज्ञानिकों की फोटो तक ऑनलाइन सेल के लिए रख दी थी।
ऑनलाइन सेल पर रखी गई तस्वीरों के पीछे पूरी मार्केट‍िंग स्ट्रेटजी होती है, जो ज‍ितनी ज्यादा हृदय व‍िदारक, उसकी उतनी ही ज्यादा कीमती। बानगी देख‍िए क‍ि मज़दूर परिवार थककर चूर है, प्रेस फोटोग्राफर ने निढाल परिवार को बैठने को कहा, फिर मासूम से मां का पैर दबवाया, और फ़ोटो क्लिक, अब अगले फ़ोटो की बारी…अब मां ने बच्चे का पैर दबाया..फ‍िर फोटो क्ल‍िक। एनडीटीवी ने फोटोग्राफर ने तो थकेहारों का हुजूम के साथ यमुना पार कर आए व्यक्त‍ि को फ‍िर से कहा क‍ि वापस जाओ यमुना में…हमारी ओर देखो… ऐसा करते ही क्ल‍िक, स‍िर्फ एक ख़बर के लिए।
याद है ना! गुजरात दंगों में एक रोते व्यक्त‍ि की फोटो इतनी वायरल हुई क‍ि उसे बाकायदा कोर्ट से जाकर उस फोटो को हटवाने की गुहार लगानी पड़ी।
क‍िसी ने इनके ल‍िए ही कही हैं ये चार लाइनें और बात खत्म –
किसने समझी किसने जानी मजदूरों की पीर।
रक्त पिपासु ने विक्रय की लाखों में तस्वीर।
फ़क़त बुजुर्गों की छाया को निकले नंगे पांव।
सड़कों पर दम तोड़ गए देखो भारत के गांव।
- अलकनंदा स‍िंह 

शनिवार, 16 मई 2020

प्रवास‍ियोंं पर याच‍िका के उन्माद का अर्धसत्य

क‍िसी भी अध‍िकता की प्रवृत्त‍ि उन्मादी होती है। वह हर हाल में नुकसान पहुंचाती है। फिर चाहे वह अध‍िक मीठा हो, अध‍िक खारा या अध‍िक चुप्पी या फिर अध‍िक वाचाल प्रवृत्त‍ि….। घर में बैठे बुजुर्ग यद‍ि अध‍िक बोलने लगें तो उनकी ”अच्छी बातें” भी हम ”ये तो बस यूं ही बड़बड़ाते रहते हैं” कहकर अनसुनी कर देते हैं। ऐसे ही अनेक लोग आपको मीड‍िया, सोशल मीड‍िया या आस-पड़ोस में म‍िल जाऐंगे, जो ”हर वि‍षय पर वक्त-बेवक्‍त ”ज्ञान बघारने” का काम करते रहते हैं।
इस कोरोना संकट के समय पलायन कर रहे प्रवासियों की बात हो या कोरोना से बचाव के उपाय, उपदेशों की अध‍िकता ने द‍िमाग चकरा द‍िया है क‍ि आख‍िर इन ”कृपा बरसाने वालों” का उपाय क्या है। संभवत: इसी अध‍िकता से आज‍िज़ आ गई अदालतों ने भी अब याचि‍काकर्ताओं को दोटूक जवाब देना शुरू कर द‍िया है।
महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 16 मजदूरों के ट्रेन की पटर‍ियों पर सोने के कारण हुई मृत्यु पर कल अदालत ने एक याच‍िका रद्द करते हुए याच‍िकाकर्ता वकील से कहा क‍ि ऐसे प्रवास‍ियों को रोकना असंभव है जो सरकारों द्वारा लगातार क‍िये जा रहे उपायों के बाद भी न केवल पैदल चल रहे हैं बल्क‍ि रेल की पटर‍ियों पर सो कर स्वयं अपनी मौत को आमंत्रण दे रहे हैं। सरकारों को अपना काम करने दें, उन्हें एक्शन लेने दें, क‍िसी को भी अपनी बारी का इंतज़ार तो करना ही होगा, और यही व्यवस्था का मूल है।
हर ऐरे-गैरे व‍िषय पर याच‍िका दायर करने की अध‍िकता ना तो सरकारों को काम करने दे रही है और ना ही स्वयं नागर‍िकों को उनके कर्तव्य का बोध करा रही है। याच‍िकाएं अब स‍िर्फ अध‍िकारों को मांगने का ज़र‍िया बनकर रह गई हैं, गोया क‍ि अध‍िकार स‍िर्फ नागर‍िकों के होते हैं और कर्तव्य स‍िर्फ सरकारों के।
जहां तक बात है प्रवासी मजदूरों पर याच‍िका की तो न‍िश्च‍ित ही उनके ल‍िए ये समय सब्र और बुद्ध‍ि से काम लेने का है, ना क‍ि आवेश और गुस्से में आकर मीलों तक पैदल सफर करने का। सरकार द्वारा ट्रेन की व्यवस्था क‍िये जाने व बसों में उनके गंतव्य तक पहुंचाए जाने के बावजूद वे अपनी जेब से भारी भरकम पैसा खर्च कर यद‍ि ट्रकों में ठुंसकर सफर करने पर आमादा हैं तो उन्हें रोकना असंभव है। इसी तरह वे जो रेल की पटर‍ियों पर सो गए, ना तो अबोध थे और ना ही मंदबुद्ध‍ि फ‍िर उनके ल‍िए सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जाहिर है कि ना तो हर मृत व्यक्त‍ि ”न‍िर्दोष” होता है और न हर गरीब ”बेचारा”। ये समय सरकारों का साथ देकर व्यवस्थाओं को मानने का है।
प्रवासी मजदूरों के झुंडाें को धूप में पैदल चलते द‍िखाने वाले फोटो, सूटकेस पर लेटे हुए सफर करते बच्चे का फोटो, ब‍िवांई और छालों के साथ अपने मूल देस लौट रहे लोगों की थकान के फोटो ”लाइक्स” और सरकारों की आलोचना का ”आनंद” भले ही दे दें परंतु इस तरह के व‍िचारों की अध‍िकता मजदूरों के प्रत‍ि सहानुभूत‍ि को बहुत देर तक भुनाने नहीं देगी क्योंक‍ि ये अर्धसत्य है प्रवास‍ियों का, कर्मठता और न‍िकृष्टता के बीच मौजूद पूर्णसत्य इससे अभी बहुत दूर है।
बहरहाल पलायन करने वाले प्रवासि‍यों पर वसीम बरेलवी का एक शेर बेहद माकूल बैठता है -   
परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है
उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है
परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है
मैं क़तरा हो के तूफानों से जंग लड़ता हूँ
मुझे बचाना समंदर की ज़िम्मेदारी है
कोई बताये ये उसके ग़ुरूर-ए-बेजा को
वो जंग हमने लड़ी ही नहीं जो हारी है
दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है


शनिवार, 9 मई 2020

इस मदर्स डे पर… इन लंबी कतारों का अर्थ


आज मदर्स डे है, और जैसा क‍ि पत्रकार‍िता व लेखन जगत में ऐसे ”द‍िवसों ” पर ल‍िखा जाना एक रवायत है तो कायदे से इस रवायत को आज मुझे भी न‍िभाना चाह‍िए परंतु ऐसा कर नहीं पा रही मैं। आज मैं मांओं को ईश्वर का दर्ज़ा देने में स्वयं को असमर्थ पा रही हूं, इसकी स्पष्ट वजह हैं—लॉकडाउन में शराब की दुकानों के बाहर की बदली तस्वीरें।
Just See the Video Women and Girls in Liquor Que After LockDown

इन तस्वीरों को देखने के बाद अब ये अहसास ना जाने क‍ितनों को हो रहा होगा क‍ि जो जैसा द‍िखता है या द‍िखाया जाता है दरअसल वो वैसा होता नहीं। आज मदर्स डे पर उन मह‍िलाओं की तस्वीरें मैं अपने जेहन से नहीं न‍िकाल पा रही जो शराब की दुकानों के सामने कतारें दर कतारें लगाए खड़ी रहीं। कभी मकान को घर बनाने वाली ” ये नारी ” इतनी बदल जाएगी क‍ि उसे उसकी ”तलब” इन लाइनों में लगने से भी नहीं रोक पाएगी, कम से कम इतना तो नहीं सोचा था।

अभी तक एक स्थाप‍ित सच ये था क‍ि या तो उच्च वर्ग की या अत्यंत न‍िम्न वर्गीय मह‍िलायें ही शराब का सेवन करती हैं परंतु लॉकडाउन के बाद इस भ्रम की धज्ज‍ियां उड़ा दीं गईं लाइन में लगी मध्यमवर्गीय लड़क‍ियों द्वारा। वो मध्यमवर्ग ज‍िसके कांधों पर चलकर भारतीय समाज अपने संस्कारों को अब तक जीव‍ित रख पाया, अब उसी वर्ग की ”ये नार‍ियां” भी शराब की दुकानों पर लाइन में लगी… बोतलों को अपने अंक में समेटे… समाज में हो चुके बड़े बदलाव की पूरी कहानी स्वयं कहे दे रही हैं। ये बदलाव बड़ा है परंतु क्या हमें इस पर खुश होना चाह‍िए…क्या ये सकारात्मक है… मदर्स डे पर अब हमें इसकी समीक्षा करनी होगी क‍ि शराब की दुकानें खुलने के बाद के ये नजारे मेट्रो स‍िटीज से लेकर छोटे शहरों तक आम रहे तो आख‍िर क्यों…।
इन सारे नजारों ने हमें हमारे मूल्यों, संस्कारों के साथ मौजूदा नौजवानों की सोच को पढ़ने का एक अवसर द‍िया है। इन्होंने हमें बताया है क‍ि पुराने मूल्यों को र‍िवाइव करना ही होगा ताक‍ि समाज उच्छृंखल न होने पाए और उसके मूल्य भी बचे रहें। मह‍िलाओं की इन लंबी लाइनों ने बताया है समाज को एक चुनौतीपूर्ण र‍िवाइवल की जरूरत है और जब समाज बदलेगा तो जाह‍िर है क‍ि कानूनों को भी बदला जाना चाह‍िए।
अभी तक कानून हर मह‍िला को न‍िर्दोष मानकर काम करता है वहीं समाज भी ”लेडीज फर्स्ट” पर अपने कायदे बनाता है। ये सोच पूरी तरह बदलनी होगी। अब मामला बराबरी का होना चाह‍िए। माना क‍ि ये तस्वीरें बदलते समय का पूरा सच नहीं परंतु झांकी तो हैं ही, अब ये हमारे ऊपर है क‍ि हम अपने बच्चों को क‍िस तरह की ”लाइन” में देखना चाहते हैं, यह कुल म‍िलाकर हमारी परवर‍िश पर न‍िर्भर करता है। आज मदर्स डे पर बस इतना ही। सोच‍िएगा अवश्य!!!

- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

गैब्रियल गार्सिया मार्केज़: बौद्धिक रियासत का निर्वासित योद्धा


लोक यानि जड़ें और जड़ों का अर्थ है अपने ज़हन में झांकना या अंतर्मन की ओर देखना। व्‍यक्‍ति, कला या समाज कोई भी ,जो अपने लोक से कट जाये वह अस्‍तित्‍वहीन हो जाता है और जो अस्‍तित्‍वहीन हो जाये उसे भला कोई क्‍योंकर याद करेगा। इसका सीधा सीधा मतलब ये रहा कि जो अपनी जड़ों की ओर नहीं देखते, वो अपने ज़हन में भी नहीं झांकते और ऐसा करते हुए वे अपने ही अस्‍तित्‍व को तलाशते रह जाते हैं, बिल्‍कुल सांसविहीन जीवन की तरह । लोक में समाई है हमारे शब्‍दों की भी दुनिया । हमारा ज़हन या अंतर्मन भी वही बोलता है जिसमें वह पलता है, पोसा जाता है, संस्‍कारों के रास्‍ते वह अपने दुख और सुखों को जानता है , उन्‍हें महसूस करते हुये अनुभव करते हुये बड़ा होता है । फिर जब यही अनुभव शब्‍दों में ढलते हैं तब पैदा होता है कोई एक गैब्रियल गार्सिया मारकेज़ , जो अपने कालजयी उपन्यास ‘वन हन्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीट्यूड – One Hundred Years of Solitude (Spanish: Cien años de soledad) ‘ को गढ़ते हुये स्‍वयं बुएंडिया फैमिली के मुखिया जोस अरकाडियो बुएंडिया बनकर दुनिया को यह बता देता है कि हमारे लोकजीवन में ही कई ऐसी सच्‍चाइयां दबी हुई हैं जो कथित प्रयोगवादी और संभ्रांत जीवन का आधार रही है , वे नींव के वो पत्‍थर हैं जिनपर कई मारकेज़ छपते चले गये होंगे चुपचाप ,एकदम दम साधे… ।
आज ही के द‍िन यान‍ि 17 अप्रैल 2014 को मेक्सिको में marquez का न‍िधन हो गया 
यूरोपीय देशों की ज़हीन जीवन शैली और प्रयोगों पर आधारित सभ्‍यता वाले अपने से एकदम उलट मैक्‍सिकन और लैटिन अमरीकी सभ्‍यता को ‘अनपढ़ों-गंवारों की सभ्‍यता’ मानते रहे।इसी चलन को तोड़ा एक लेखक ने जो जीवन जीने के तौर तरीकों और संस्‍कारों के नंगे सच को लेखनीबद्ध करते गये । ये थे गैब्रियल गार्सिया मारकेज़ जिन्‍होंने शायद ही कभी सोचा हो कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ऐसे माइलस्‍टोन्‍स गढ़ के जा रहे हैं जो साहित्‍य ही नहीं जीवन के अंधेरे सचों से दोचार होने में उन्‍हें अपने ”एकांत” की ताकत का अनुभव करायेंगे।
अब वो ही गैब्रियल गार्सिया मारकेज़ नहीं रहे जिन्‍हें कभी पाठकों ने कल्पनाओं का जादूगर तो कभी आलोचकों ने मैजिक ऑफ़ रिलिजन कहा लेकिन स्‍वयं मार्खेज अपनी नज़र में एक ट्रांसलेटर से ज्‍यादा खुद को कुछ नहीं समझते थे। वो कहते थे, ‘लोगों की नज़र में जो शब्‍दों का कमाल है , वह लैटिन अमरीकी जीवन का ऐसा नंगा सच है जो बुलंदियों पर रहने वालों को आसानी से नज़र नहीं आता, मैंने तो इस खौफनाक रोमांचक सच को प्रस्तुत भर किया है,बस। मैं एक जिम्मेदार दर्शक की भूमिका निभा रहा हूं इस सच को सामने लाने में, इसके अलावा कुछ नहीं… । मैंने जो देखा,जो सुना, जो एहसास किया, उसे बस ज्यों का त्यों पूरी ईमानदारी के साथ दुनिया के सामने रख दिया|’ लैटिन अमरीका से बाहर की जो दुनिया है, वह भी इस सच से परिचित हो, मेरी यही कोशिश रही है और आगे भी रहेगी।
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुये कोलंबिया के इस महान उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मार्खेज के कालजयी उपन्यास ‘वन हन्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीट्यूड’ के लिए न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा था कि यह ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ के बाद साहित्य की पहली कृति है जिसे पूरी मानव जाति को पढ़ना चाहिए ।
यूं तो मारकेज़ का सफर १९५० में रोम और पेरिस में स्पेक्टेटर के संवाददाता के रूप में शुरू हुआ जो १९५९ से १९६१ तक क्यूबा की संवाद एजेंसी के लिए हवाना और न्यूयार्क में काम करने तक चला। पत्रकार होने के साथ साथ वह एक निर्वासित योद्धा थे, जो पत्रकारिता के कारण ही अपनी बौद्धिक रियासत के लिए जंग लड़ते रहे, वामपंथी विचारधारा की ओर झुकाव के कारण उन पर अमेरिका और कोलम्बिया सरकारों द्वारा देश में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था, लेकिन इसका उनके जीवन और चेहरे में कभी मलाल नहीं दिखा । संभवतः उनका यथार्थवाद इसीलिए इतना जीवंत था क्योंकि वो खौफनाक खूनी जीवन कल्पना में नहीं उतार रहे थे उसे यथार्थ में जी रहे थे ।
‘लीफ स्टॉर्म एंड अदर स्टोरीज’ उनका पहला कहानी-संग्रह १९५५ में प्रकाशित हुआ । इसकी कहानियां खौफ के सच से भरी थीं, ‘नो वन राइट ‘टु द कर्नल एंड अदर स्टोरीज’ और 6आइज़ ऑफ ए डॉग’ संग्रहों के साथ उनके उपन्यास सौ साल का एकांत (वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सालीच्यूड) को १९८२ में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनके तिलिस्‍मी यथार्थवाद के ग्रे वर्ल्‍ड ने यूरोपीय वैज्ञानिकों को विवश किया कि वे छायाओं में भी जीवन को मानें और तलाशें। मार्खेज का बचपन अपने नाना नानी के घर उत्तरी कोलंबिया के एक बड़े ही ख़स्ताहाल शहर आर्काटका में गुजरा था इसीलिए वह अपने लेखक होने का श्रेय अपनी नानी और किस्से कहानियों से भरी स्थितियों को देते हैं जिनमें वो पले, बढ़े। शायद इसीलिए मारकेज़ हमें यानि भरतीयों के अधिक करीब दिखाई देते हैं, जहां कहानीकारों और उपन्‍यासकारों ने अपनी रचनाओं में लोक जीवन को दादी-नानी की नज़रों से व्‍यक्‍त किया और करवाया। भारतीय सभ्‍यता में रची बसी दादी – नानी की कहानियों का अपनापन क्‍या हम भुला सकते हैं। हम भारतीयों की भांति ही मारकेज़ की कहानियां हमें बताती हैं कि अपने लोकजीवन से जुड़ा होना, उसके अच्‍छाइयां और बुराइयां दोनों ही प्रगति के हर सच को जानने का एक बढ़िया साधन हो सकती हैं। लोक से त्‍याग करके पाई हुई प्रगति अंतर्मन को खुश नहीं रख पायेगी और हम स्‍वयं से दूर होते जायेंगे, ये निश्‍चित है। हम लोक जीवन के मार्मिक अनुभवों को जियें और उन्‍हें प्रगति के लिए सहायक मानें ना कि प्रयोगवादी बनकर अपनी जड़ों का ही तिरस्‍कार करें। फिलहाल ऐसा हो रहा है तभी तो नक्‍सली जैसी समस्‍यायें देश को ग्रसित किये जा रही हैं।
आज मारकेज़ को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि तभी पूरी होगी जब हम अपनी नींवों का आदर और उनकी जीवटता से सबक लेंगे।
और अंत में मारकेज़ का ही ये सूत्रवाक्‍य कि –
“It’s enough for me to be sure that you and I exist at this moment.”
- अलकनंदा सि‍ंंह 

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

हम कायर थे तभी तो धर्मन‍िरपेक्ष बने रहे और “वे” व‍िषबेल फैलाते रहे

पुरानी कहावत है क‍ि कबूतर के आंख मूंद लेने से उसके ऊपर बिल्ली का खतरा टल नहीं जाता, वह उसे मारकर खा ही जाती है। यूं भी व‍िपत्त‍ि जब सामने हो तो उससे मुंह चुराना अक्लमंदी नहीं, कायरता है। तब्लीगी जमात द्वारा ज‍िस तरह कोरोना संक्रमण को फैलाया जा रहा है, जानबूझकर संक्रम‍ितों द्वारा इकठ्ठा होकर नमाज़ पढ़ी जा रही हैं, सरकारों द्वारा ताकीद क‍िए जाने के बाद भी स्वयं मौलाना ऐसा करते सरेआम द‍िख रहे हैं, ये कोई जाह‍िलाना हरकत या अनजाने में क‍िया गया अपराध नहीं हैं बल्क‍ि सोच समझकर ब‍िछाई गई ब‍िसात है, ज‍िसके हम सब मोहरे बने हुए हैं।
तब्लीगी जमात पर क्या अब भी हम आंखें मूंदे रहेंगे
ज़रा सोच‍िए क‍ि अब तक सारे जमाती अंडरग्राउंड क्यों हैं, सामने क्यों नहीं आ रहे हैं, उन्हें पुल‍िस को क्यों खोजना पड़ रहा है, वे आज भी ग्रुप में इकठ्ठा होकर नमाज़ क्यों पढ़ रहे हैं, वे क्वारंटाइन या इलाज के दौरान मेडीकल स्टाफ या पुल‍िस के साथ बदतमीजी क्यों कर रहे हैं। ड्रोन द्वारा न‍िगरानी के दौरान मस्ज‍िदों की छत पर भारी तादाद में ईंट पत्थर इकठ्ठा क्यों पाए गए। इंदौर में कोरोना संक्रम‍ित जमात‍ियों के ल‍िए उनकी औरतें ही शील्ड क्यों बन गईं।
माना क‍ि ये समय धर्म के बहाने आतंक के इस नए रूप पर चर्चा करने का नहीं हैं परंतु अभी भी 75 प्रत‍िशत मामले अगर तब्लीगी से जुड़े सामने आ रहे हैं तो सोचना पड़ रहा है क‍ि आख‍िर इस वायरस को फैलाने के ल‍िए तब्लीगी जमात का ही नाम क्यों… किसी स‍िख, ईसाई, पारसी, जैन या ह‍िंदू संगठन का नाम क्यों नहीं सामने आ रहा। हम क‍ितना भी बचें ये कहने से क‍ि इस्लाम में ये नहीं… वो नहीं.. परंतु सत्य तो यही है क‍ि जो अपने पेट पर बम बांधकर दूसरों को फ़ना करने के आदी हों, उनसे इंसान‍ी ज‍िंदग‍ियों को बचाने की आशा रखना ”आंखबंद कबूतर” के जैसी है। बेशक मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग तब्‍लीगी जमात की हरकतों से न सिर्फ शर्मिंदा है, साथ ही गुस्‍से से भरा हुआ भी है और इसलिए उन्‍हें अपराधी करार देने से नहीं हिचक रहा किंतु सवाल ये पैदा होने लगा है कि क्‍या अब सिर्फ उन्‍हें कोसने से काम चल जाएगा। क्‍या बिना कठोर कानूनी कार्यवाही के जमाती बाहर निकल आएंगे?

बेशक मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग तब्‍लीगी जमात की हरकतों से न सिर्फ शर्मिंदा है, साथ ही गुस्‍से से भरा हुआ भी है और इसलिए उन्‍हें अपराधी करार देने से नहीं हिचक रहा किंतु सवाल ये पैदा होने लगा है कि क्‍या अब सिर्फ उन्‍हें कोसने से काम चल जाएगा। क्‍या बिना कठोर कानूनी कार्यवाही के जमाती बाहर निकल आएंगे?
अलकायदा के हवाले से 2011 की एक खोजी र‍िपोर्ट के अनुसार तब्लीगी जमात को आतंकी संगठनों का बेस तैयार करने, भर्ती रंगरूटों को आतंकी ट्रेन‍िंग देने और हवाला व स्लीपर सेल के जर‍िये भारत में ही नहीं, बल्क‍ि व‍िश्व में आतंक फैलाने की ज‍िम्मेदारी दी गई थी।
एक और बात बेहद महत्‍वपूर्ण है क‍ि देवबंदी सुन्नि‍यों से ताल्लुक रखने वाले तब्लीगी जमात के साढ़े आठ करोड़ अनुयायि‍यों के ल‍िए अभी तक देवबंद से कोई फतवा क्यों नहीं आया जबक‍ि जानकारों के अनुसार जब तक देवबंद फतवा जारी नहीं करता तब तक ये ना तो सरकार के सामने आऐंगे और ना ही अपना इलाज़ करायेंगे। देवबंद की चुप्पी हमें बहुत कुछ बताती है खासकर उन लोगों और संगठनों को जो आतंक में धर्म को ढूढ़ते हैं। तब्लीगी जमात के मामले में अब वे भी मौन हैं। आख‍िर क्यों ? क्या इसल‍िए क‍ि अब उनके सरोकार कोरोना महामारी से हर कदम पर जूझने वाले देश के ह‍ित में अपना अह‍ित देख रहे हैं।
जमात के फ‍िदायीनों की एक लंबी ल‍िस्ट है जो जैव आतंकवाद के ल‍िए गांव-मजरे तक फैली हुई है। यह जानबूझकर फैलाया जा रहा आतंकवाद हमारे सामने अनेक प्रश्नों को खड़ा कर चुका है, अब जरूरत है तो बस इतनी क‍ि इसे धर्म के चश्मे से न देखा जाए। हम कायर थे तभी तो धर्मन‍िरपेक्ष बने रहे और तब्लीगी जैसे संगठन अपनी व‍िषबेल फैलाते रहे। तब्लीगी का ये कुकर्म उसके ल‍िए आख‍िरी पैगाम लेकर आया है और अब तक उसका जो भी साम्राज्य फैलना था फैल ल‍िया, अब और नहीं।
हम सीधे सीधे देवबंदी, बरेलवी या इस्लाम के अन्य संगठनों के मन में भरे ज़हर को नज़रंदाज़ करते रहे और कबूतर ही बने रहकर हमने देश की अस्म‍िता को फ‍िदायीनों के हाथों तक पहुंचा द‍िया, जमात‍ियों की इस कारगुजारी के ल‍िए हम भी इस अपराध की एक कड़ी हैं।
-अलकनंदा स‍िंंह

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

बताओ, इस कहानी में गलत क्या है?


एक कहानी है, जो एक जेन गुरु ने अपने शिष्यों को सुनाई। ये कहानी सुनाकर उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा था “बताओ, इस कहानी में गलत क्या है?” उनके शिष्य तो नहीं बता पाए थे, क्या आप बता पाएंगे?
कहानी : एक दिन एक ज़ेन मठ में सभी शिष्य अपने गुरु के चारों ओर इकट्ठे हुए। गुरु बोले, “मैं जो कहानी सुना रहा हूँ, उसे पूरे ध्यान से सुनो”। फिर उन्होंने कहना शुरू किया…
“एक बार बुद्ध अपनी आंख बंद किये बैठे हुए थे, उन्हें किसी की आवाज़ सुनाई दी, ‘बचाओ, बचाओ’। उन्हें समझ आ गया कि ये आवाज़ किसी मनुष्य की थी जो नर्क के किसी गड्ढे में था और पीड़ा भोग रहा था। बुद्ध को ये भी समझ में आया कि उसे ये दंड इसलिये दिया जा रहा था क्योंकि जब वो ज़िंदा था तब उसने बहुत सी हत्यायें और चोरियां की थीं। उन्हें सहानुभूति का एहसास हुआ और वे उसकी मदद करना चाहते थे।
उन्होंने यह देखने का प्रयास किया कि क्या उस व्यक्ति ने अपनी जीवित अवस्था में कोई अच्छा काम किया था? उन्हें पता लगा कि उसने एक बार चलते हुए, इसका ध्यान रखा था कि एक मकड़ी पर उसका पैर न पड़ जाये। तो बुद्ध ने उस मकड़ी से उस व्यक्ति की मदद करने के लिये कहा। मकड़ी ने एक लंबा, मजबूत धागा नर्क के उस गड्ढे में भेजा जिससे वो अपना जाला बुनती है। वह व्यक्ति उस धागे को पकड़ कर ऊपर चढ़ने लगा। तब बाकी के लोग भी, जो वहां यातना भोग रहे थे, उसी धागे को पकड़ कर ऊपर चढ़ने लगे। तो उस व्यक्ति को चिंता हुई, ‘ये धागा मेरे लिये भेजा गया है, अगर इतने लोग इसे पकड़ कर चढ़ेंगे तो धागा टूट जायेगा’। वो उन पर गुस्से से चिल्लाया। उसी पल वो धागा टूट गया और वो उस गड्ढे में फिर से गिर गया।
उस व्यक्ति ने फिर चीखना शुरू किया, बचाओ, बचाओ, लेकिन इस बार बुद्ध ने उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया”।
ज़ेन गुरु ने कहानी पूरी की और अपने शिष्यों से पूछा, ” बताओ, इस कहानी में क्या दोष है”?
एक शिष्य बोला, “मकड़ी का धागा इतना मजबूत नहीं होता कि एक व्यक्ति को ऊपर ला सके”।
दूसरे ने कहा, “स्वर्ग और नर्क जैसी कोई चीज़ नहीं होती”।
एक अन्य बोला, “जब बुद्ध आंख बंद कर के बैठे और ध्यान कर रहे थे, तब उन्हें ज़रूर ही कोई और आवाज़ सुनाई दे रही होगी”।
गुरु मुस्कुराये और बोले, “तुम सबने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया”। फिर वे उठे और चले गये।
अर्थात् जो सच्ची करुणा होती है, वो चयन नहीं करती। किसी क्षण कोई ये विचार करे कि मुझे इस व्यक्ति के लिये करुणामय होना चाहिये और फिर ऐसा सोचे कि वह दूसरा व्यक्ति मेरी करुणा का पात्र नहीं है, तो फिर ये करुणा नहीं है। किसी की मदद करने में चयन हो सकता है पर करुणा में चयन नहीं होता। यदि बुद्ध की इच्छा किसी ऐसे व्यक्ति को बचाने की होती जो नर्क में यातना भोग रहा है तो फिर वे अपना विचार बाद में, उस व्यक्ति के एक स्वार्थी कर्म के कारण बदल नहीं देते। पुण्य और पाप, अच्छा और बुरा, ये सब नैतिकता के आधार पर लिखे गये हैं। करुणा, नैतिकता, कानून और विश्वासों से परे की बात है। ऐसा नहीं हो सकता कि एक व्यक्ति पर करुणा दिखायी जाये और दूसरे पर नहीं।
ज़ेन गुरु ने अपने शिष्यों को जो कहानी सुनाई वह नैतिक मूल्यों पर आधारित बात थी जो किसी ने गढ़ी होगी। कहानी की नैतिक शिक्षा ये है कि एक स्वार्थी व्यक्ति को, जिसे दूसरों की परवाह नहीं है, बुद्ध भी नहीं बचायेंगे। यह कहानी किसी ने समाज को शिक्षा देने के लिये, लोगों पर प्रभाव डालने के लिये गढ़ी है।
जहाँ भी आवश्यकता एवं संभावना हो, एक सच्चा आत्मज्ञानी गुरु कभी भी अपनी करुणा बरसाने में हिचकिचायेगा नहीं। बुद्ध वही हो सकता है जिसने अपने अंदर पूरी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो और जो स्वीकार या अस्वीकार करने की मजबूरी से परे चला गया हो। केवल वही करुणामय हो सकता है जो पूरी तरह से आनंदमय हो। ‘बुद्ध’ उसी को कहते हैं जो बुद्धि से परे, पूर्ण आनंद की अवस्था में हो।
कुछ धार्मिक कट्टरवादियों ने, अन्य धर्मों की तरह, बौद्ध धर्म का प्रचार करने के उद्देश्य से ऐसी नैतिकतावादी कहानियां गढ़ी हैं। यही कारण है कि ज़ेन गुरु यह कह रहे हैं कि इस कहानी में दोष है।

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

तीन उपन्यासों से प्रयोगवाद को प्रतिष्ठित करने वाले थे अज्ञेय

प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि अज्ञेय … अनेक जापानी हाइकु कविताओं को अनूदित करने वाले अज्ञेय …बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि… एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी
पर्यटक … की आज 4 अप्रैल, 1987 पुण्यत‍िथ‍ि है।
सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्त, निबन्ध, गीति-नाट्य, ललित निबन्ध, डायरी जैसी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया।
अज्ञेय के विस्तृत और वैविध्यपूर्ण जीवनानुभव उनकी रचनाओं में यथार्थवादी ढंग से अभिव्यक्त हुए हैं। उनकी कविताएं हों, कहानियां या उपन्यास – सभी रचनाओं में उनके जीवन के विभिन्न कालों की संवेदना तो अभिव्यक्त हुई ही है, रचनाकालीन जीवन यथार्थ भी अपने पूर्ण रूप में अभिव्यक्ति पा सका है।
हम दे रहे हैं यहां क़रीब पांच दशक तक फैले अज्ञेय के रचना संसार के वे तीन उपन्यासों की समीक्षा , ज‍िन्हें कालजयी बना द‍िया उनके तीखेपन ने उनकी नवीनता ने। ये तीनों उपन्यास हैं – शेखर : एक जीवनी (दो भाग); नदी के द्वीप और अपने-अपने अजनबी
‘शेखर एक जीवनी’ के पहले भाग का प्रकाशन 1941 में हुआ। ये वो दौर था जब भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई थी। स्वयं अज्ञेय ने भी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य के रूप में इस आंदोलन में हिस्सा लिया था, गिरफ्तार हुए थे, जेल गए थे। चार साल के बंदी जीवन में अज्ञेय ने स्वतंत्रता का महत्व और क़रीब से जाना था।
शेखर: एक कालजयी उपन्यास
‘शेखर’ की भूमिका में लिखते हैं कि यह जेल के स्थगित जीवन में केवल एक रात में महसूस की गई घनीभूत वेदना का ही शब्दबद्ध विस्तार है ये उपन्यास है। शेखर जन्मजात विद्रोही है। वो परिवार, समाज, व्यवस्था, तथाकथित मर्यादा – सबके प्रति विद्रोह करता है। वो स्वतंत्रता का आग्रही है और व्यक्ति की स्वतंत्रता को उसके विकास के लिए बेहद ज़रूरी मानता है।
‘शेखर’ में व्यक्ति स्वातंत्र्य की अनुभूति और अभिव्यक्ति की जो छटपटाहट पूरे उपन्यास में नज़र आती है वो दरअसल प्रेमचंद के गोदान (1936) के पात्र ‘गोबर’ के चरित्र का स्वाभाविक विकास है।
‘गोबर’ की संवेदना का ही स्वाभाविक विकास है अज्ञेय का ‘शेखर’ जो अपने अंतर्मन की आवाज़ सुनता है और वही करता है जिसकी गवाही उसका विवेक देता है। वो स्कूल नहीं जाना चाहता क्योंकि वो मानता है कि स्कूलों में टाइप बनते हैं जबकि शेखर व्यक्ति बनना चाहता है। एक ऐसा व्यक्ति जो पूरी ईमानदारी से अपने जीवन के सुख-दुख से गुज़रना चाहता है। वो पिता की सलाह को नज़रअंदाज़ कर अंग्रेज़ी की बजाय हिंदी में लेखन करना चाहता है क्योंकि अंग्रेज़ी से उसे दासता की अनुभूति होती है। इस उपन्यास में ‘शेखर’ एक निहायत ईमानदार व्यक्ति है, अपनी अनुभूतियों और जिज्ञासाओं के प्रति बेहद ईमानदार. जीवन की नई-नई परिस्थितियों में उसके मन में कई सवाल उठते हैं और वह अनुभव करता चलता है, सीखता चलता है।
अज्ञेय ने मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘शेखर’ के ज़रिए एक व्यक्ति के विकास की कहानी बुनी है जो अपनी स्वभावगत अच्छाइयों और बुराइयों के साथ देशकाल की समस्याओं पर विचार करता है, अपनी शिक्षा-दीक्षा, लेखन और आज़ादी की लड़ाई में अपनी भूमिका के क्रम में कई लोगों के संपर्क में आता है लेकिन उसके जीवन में सबसे गहरा और स्थायी प्रभाव शशि का पड़ता है जो रिश्ते में उसकी बहन लगती है, लेकिन दोनों के रिश्ते भाई-बहन के संबंधों के बने-बनाए सामाजिक ढांचे से काफी आगे निकलकर मानवीय संबंधों को एक नई परिभाषा देते हैं। हिंदी साहित्य के लिए शशि-शेखर संबंध तत्कालीन भारतीय समाज में एक नई बात थी जिसे लेकर आलोचकों के बीच उपन्यास के प्रकाशन के बाद से लेकर आज तक बहस होती है।
शेखर एक जगह शशि से कहता है – ‘कब से तु्म्हें बहन कहता आया हूं, लेकिन बहन जितनी पास होती है, उतनी पास तुम नहीं हो, और जितनी दूर होती है, उतनी दूर भी नहीं हो’- ये भारतीय उपन्यास में स्त्री-पुरुष संबंधों की एक नई अभिव्यक्ति थी।
‘शेखर’ दरअसल एक व्यक्ति के बनने की कहानी है जिसमें उसके अंतर्मन के विभिन्न परतों की कथा क्रम के ज़रिए मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करने की कोशिश अज्ञेय ने की है। इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद कुछ आलोचकों ने कहा था कि ये अज्ञेय की ही अपनी कहानी है। लेकिन अज्ञेय ने इसका स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि शेखर के जीवन की कुछ घटनाएं और स्थान उनके जीवन से मिलते-जुलते हैं लेकिन जैसे-जैसे शेखर का विकास होता गया है वैसे-वैसे शेखर का व्यक्ति और रचनेवाला रचनाकार एक-दूसरे से अलग होते गए हैं।
दूसरा उपन्यास
अज्ञेय का दूसरा उपन्यास है – ‘नदी के द्वीप’ (1951). यह भी एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है जिसमें एक तरह से यौन संबंधों को केंद्र बनाकर जीवन की परिक्रमा की गई है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र हैं भुवन, रेखा, गौरा और चंद्रमाधव।
भुवन विज्ञान का प्रोफेसर है, रेखा एक पढ़ी-लिखी पति द्वारा परित्यक्ता स्त्री है, गौरा भुवन की छात्रा है। उपन्यास में दो अन्य गौण पात्र हैं हेमेंद्र और डॉक्टर रमेशचंद्र. हेमेंद्र रेखा का पति है जो केवल उसे पाना चाहता है और जब हासिल नहीं कर पाता तो उसे छोड़ देता है। उसे सौंदर्योबोध, नैतिकता जैसे मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं. डॉक्टर रमेशचंद्र रेखा का नया पति हैं जो एक सुलझा हुआ इनसान है।
‘शेखर’ की तुलना में इस उपन्यास में घटनाएं बहुत कम हैं क्योंकि उपन्यास के पात्र बाहर बहुत कम जीते हैं। वे ज्यादातर आत्ममंथन या आत्मालाप कर रहे होते हैं। ये इतने संवेदनशील पात्र हैं कि बाहर की जिंदगी की हल्की सी छुअन भी इन्हें भीतर तक हिला कर रख देती है। अज्ञेय ने उपन्यास में पात्रों की इसी भीतरी ज़िंदगी को विभिन्न, प्रतीकों, बिम्बों और कविताओं के ज़रिए उभारने की कोशिश की है।
उपन्यास में भुवन रेखा और गौरा दोनों के बेहद क़रीब है. ये तीनों ही मध्यवर्गीय संवेदना से भरे, आधुनिकता बोध वाले बुद्धिजीवी पात्र हैं. लेकिन इनकी सबसे बड़ी समस्या ये है कि ये भीतर ही भीतर चाहे जितनी ही लंबी विचार सरणि बना लें, उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाते। यहां तक कि एक-दूसरे के लिए अपनी भावनाएं भी। इस उपन्यास में व्यक्ति नदी के द्वीप की तरह है। चारों तरफ नदी की धारा से घिरा लेकिन फिर भी अकेला और अपनी सत्ता में स्वतंत्र। उपन्यास के मुख्य पात्र रेखा और भुवन एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट हैं। दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी हैं लेकिन फिर भी रेखा भुवन को छोड़कर डॉक्टर रमेश चंद्र से विवाह करती है। गौरा और भुवन के बीच भी एक-दूसरे के लिए आकर्षण है लेकिन वे उसे सही रूप में व्यक्त नहीं कर पाते।
कुल मिलाकर ये उपन्यास अलग-अलग पात्रों के जीवन, उनके सुख-दुख, उनके आंतरिक भावावेश को कवित्वपूर्ण भाषागत अभिव्यक्तियों के ज़रिए बयां तो करता है लेकिन युगीन यथार्थ को पूरी तरह स्पर्श नहीं कर पाता और इसकी वजह है पात्रों का अपने भीतर जीते जाना, बाहर या समाज में नहीं।
तीसरा उपन्यास
अज्ञेय का तीसरा उपन्यास है ‘अपने-अपने अजनबी’ (1961)। सार्त्र, किर्केगार्ड, हाइडेगर के पश्चिमी अस्तित्ववादी दर्शन पर आधारित इस उपन्यास में सेल्मा और योके दो मुख्य पात्र हैं। कथानक बेहद छोटा है. सेल्मा मृत्यु के निकट खड़ी कैंसर से पीड़ित एक वृद्ध महिला है और योके एक नवयुवती। दोनों को बर्फ से ढके एक घर में साथ रहने को मजबूर होना पड़ता है जहां जीवन पूरी तरह स्थगित है। इस उपन्यास में स्थिर जीवन के बीच दो इंसानों की बातचीत के ज़रिए उपन्यासकार ने ये समझाने की कोशिश की है कि व्यक्ति के पास वरण की स्वतंत्रता नहीं होती। न तो वो जीवन अपने मुताबिक चुन सकता है और न ही मृत्यु।
सेल्मा मृत्यु के क़रीब है और वो चाहती थी कि उस बर्फ घर में अकेले रहते हुए उसकी मृत्यु हो जाए लेकिन संयोगवश योके वहां पहुंच जाती है और उसे योके जैसी अजनबी के साथ वो सबकुछ बांटना पड़ता है जो वो अपने सगों के साथ नहीं बांटना चाहती थी। वरण की स्वतंत्रता और जीवन के विविध सत्यों को लेकर दोनों ही पात्र एक-दूसरे से जो बीतचीत करते हैं उसी के ज़रिए अस्तित्ववादी दर्शन को अज्ञेय ने पूरी तरह स्पष्ट करने की कोशिश की है लेकिन उसे एक नई भारतीय व्याख्या भी दी है।
सेल्मा मृत्यु के क़रीब है लेकिन फिर भी जीवन से भरी हुई है जबकि योके युवती है, जीवन में उसे बहुत कुछ देखना बाकी है लेकिन आसन्न मृत्यु के भय से वो इतनी आक्रांत है कि जीते हुए भी उसका आचरण मृत के समान है। वो घोर निराशा के अंधेरे में डूब जाती है। योके बार-बार सेल्मा से कहती है व्यक्ति चुनने के लिए स्वतंत्र होता है। उपन्यास में सेल्मा की मौत हो जाती है। योके बर्फ के घर से बाहर निकल जाती है लेकिन उस स्थगित जीवन में जिंदगी का जैसा क्रूर चेहरा उसने देखा था उसे भुला नहीं पाती। वरण की स्वतंत्रता की तलाश में अंत में वो ये कहते हुए ज़हर खाकर अपने जीवन का अंत कर देती है कि उसने जो चाहा वो चुन लिया।
बेहद छोटे कथानक के ज़रिए अज्ञेय ने इस उपन्यास में अस्तित्ववाद की पश्चिमी निराशावादी व्याख्या में भारतीय आस्थावादी व्याख्या को जोड़ने का प्रयास किया है। अज्ञेय ने अपने इन तीनों ही उपन्यासों के ज़रिए भारतीय औपन्यासिक विकास को एक नई ऊंचाई दी है. ‘शेखर’ एक जीवनी जहां व्यक्ति स्वतंत्रता की अनुभूति और अभिव्यक्ति की एक मार्मिक यथार्थवादी अभिव्यक्ति है वहीं ‘अपने-अपने अजनबी’ मृत्यु के आतंक के बीच जीवन जीने की कला का यथार्थवादी दस्तावेज़ है।
अज्ञेय भाषा की श्रेष्ठता और उसमें नए-नए प्रयोगों के आग्रही थे। इन तीनों ही उपन्यासों में प्रयोग और अभियक्ति दोनों ही स्तरों पर अज्ञेय ने भाषा को एक नया संस्कार दिया है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

ऐसे थे न‍िराला के राम और राम की शक्तिपूजा

आज रामनवमी है और इस अवसर पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित काव्य राम की शक्तिपूजा के राम की बात यद‍ि हम ना करें तो आज का द‍िन सार्थक नहीं होगा। राम की शक्तिपूजा का प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र ‘भारत’ में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को हुआ था। इसका मूल निराला के कविता संग्रह ‘अनामिका’ के प्रथम संस्करण में छपा।
तब से लेकर आजतक हर कोई राम के व्यक्तित्व की व्याख्या अपनी अपनी तरह से करता रहता है। यहां तक क‍ि बिना रामायण के किसी भी संस्करण को पढ़े और राम के व्यक्तित्व पर चिंतन किए बिना कई कथित बुद्धिजीवी, विशेषकर फेमिनिस्ट (नारीवादी) प्रायः राम पर सीता का त्याग करने के लिए निशाना साधते रहते हैं और ब‍िना सोचे व‍िचारे क्षमायाचक (अपॉलोजेटिक) बने हिंदू उनका अनुसरण भी करते रहते हैं।
‘राम की शक्ति पूजा’ नामक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता में राम के कुछ ऐसे भी मनोभाव देखने को मिलते हैं जो शायद रामचर‍ित मानस में भी उल्लि‍खित नहीं हैं क्यायों क‍ि इसमें राम-रावण युद्ध को साधने के लिए राम द्वारा की गई शक्ति पूजा का भी उल्लेख है जिसका संदर्भ भले ही पुराणों में मिलता है लेकिन वाल्मीकि या तुलसी रामायण में नहीं।
शक्ति पूजा से पूर्व राम देवी के विधान से निराश हैं। उनकी निराशा इस बात से है कि अधर्मी होने के बावजूद वे रावण का साथ क्यों दे रही हैं। वे अपनी व्यथा बताते हुए कहते हैं कि शक्ति के प्रभाव के कारण उनकी सेना निष्फल हुई और स्वयं उनके हस्त भी शक्ति की एक दृष्टि के कारण बाण चलाते-चलाते रुक गए थे।
निराला ने अपने शब्दों में राम की पूरी ”वो पूजा” जो शक्त‍ि आराधना को समर्प‍ित थी, को हमारे सामने ऐसे उदाहरण की तरह पेश क‍िया जो पूरे के पूरे मानवीय आदर्श को नई पीढ़ी के ल‍िए एक प्रेरणा के तौर रखेगा।
राम की शक्तिपूजा का एक अंश-
रवि हुआ अस्त, ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।
आज का तीक्ष्ण शरविधृतक्षिप्रकर, वेगप्रखर,
शतशेल सम्वरणशील, नील नभगर्जित स्वर,
प्रतिपल परिवर्तित व्यूह भेद कौशल समूह
राक्षस विरुद्ध प्रत्यूह, क्रुद्ध कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि राजीवनयन हतलक्ष्य बाण,
लोहित लोचन रावण मदमोचन महीयान,
राघव लाघव रावण वारणगत युग्म प्रहर,
उद्धत लंकापति मर्दित कपि दलबल विस्तर,
अनिमेष राम विश्वजिद्दिव्य शरभंग भाव,
विद्धांगबद्ध कोदण्ड मुष्टि खर रुधिर स्राव,
रावण प्रहार दुर्वार विकल वानर दलबल,
मुर्छित सुग्रीवांगद भीषण गवाक्ष गय नल,
वारित सौमित्र भल्लपति अगणित मल्ल रोध,
गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध हनुमत् केवल प्रबोध,
उद्गीरित वह्नि भीम पर्वत कपि चतुःप्रहर,
जानकी भीरू उर आशा भर, रावण सम्वर।
लौटे युग दल। राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरणचिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न।
‘राम की शक्तिपूजा’ की कुछ अन्तिम पंक्तियाँ देखिए-
“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम !”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वरवन्दन कर।
“होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

विश्व रंगमंच दिवस आज, हिन्दी रंगमंच दिवस 3 अप्रैल को



हर साल 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस या अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस मनाया जाता है। विश्व रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में इंटरनेशनल थियेट्रिकल इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। उसके बाद से ही हर साल 27 मार्च को विश्वभर में रंगमंच दिवस मनाया जाता आ रहा है। 

यह दिन उन लोगों के लिए एक उत्सव है जो “थिएटर” के मूल्य और महत्व को देख सकते हैं और सरकारों, राजनेताओं और संस्थानों को जगाने का कार्य कर सकते हैं। इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में रंगमंच को बढ़ावा देने और लोगों को रंगमंच के सभी रूपों के मूल्यों से अवगत कराना है। रंगमंच से संबंधित अनेक संस्थाओं और समूहों द्वारा इस दिन को विशेष दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है। 

इस दिवस का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश है, जो विश्व के किसी जाने माने रंगकर्मी द्वारा रंगमंच और शांति की संस्कृति विषय पर उसके विचारों को व्यक्त करता है। 1962 में पहला अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश फ्रांस की जीन काक्टे ने दिया था। वर्ष 2002 में यह संदेश भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड द्वारा दिया गया था।


भारत में रंगमंच का इतिहास
भारत में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है। ऐसा समझा जाता है कि नाट्यकला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ। ऋग्वेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं। इन संवादों में लोग नाटक के विकास का चिह्न पाते हैं। कहा जाता है कि इन्हीं संवादों से प्रेरणा ग्रहण कर लागों ने नाटक की रचना की और नाट्यकला का विकास हुआ। उसी समय भरतमुनि ने उसे शास्त्रीय रूप दिया। भारत मे जब रंगमंच की बात होती है तो ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ में स्तिथ रामगढ़ के पहाड़ पर महाकवि कालीदास जी द्वारा निर्मित एक प्राचीनतम नाट्यशाला मौजूद है।


कहा जाता है कि महाकवि कालिदास ने यहीं मेघदूत की रचना की थी। इस आधार पर यह भी कहा जाता है कि अम्बिकापुर जिले के रामगढ़ पहाड़ पर स्तिथ महाकवि कालिदास जी द्वारा निर्मित नाट्यशाला भारत का सबसे पहला नाट्यशाला है। बता दें कि रामगढ़ सरगुजा जिले के उदयपुर क्षेत्र में है, यह अम्बिकापुर-रायपुर हाइवे पर स्तिथ है।
विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर रंगयात्रा नाट्य समारोह में बुधवार को थर्ड विंग संस्था की ओर से शाम 6:30 बजे कैसरबाग स्थित राय उमानाथ बली ऑडिटोरियम में नाटक ‘मध्यांतर’ का मंचन किया जाएगा। इसका निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी पुनीत अस्थाना करेंगे। वहीं भारतेन्दु नाट्य आकादमी की ओर से गोमतीनगर के थ्रस्ट ऑडिटोरियम में नाटक ‘अंतर्द्वंद्व’ का मंचन प्रिवेन्द्र सिंह के निर्देशन में किया जाएगा।


हिन्दी रंगमंच दिवस 3 अप्रैल को मनाया जाएगा
इसी क्रम में कलाकार एसोसिएशन उत्तर प्रदेश की ओर से 3 अप्रैल को कैसरबाग स्थित राय उमानाथ बली ऑडिटोरियम में समारोह होगा। एसोसिएशन के अध्यक्ष संगम बहुगुणा ने बताया कि जून 1967 में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-कृत ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ के अनुसार आधुनिक विधि से रंगमंच पर हिन्दी का पहला नाटक शीतला प्रसाद त्रिपाठी कृत ‘जानकी मंगल’ था। उसका मंचन बनारस के रॉयल थियेटर में 3 अप्रैल 1868 को किया गया था। 

इंग्लैंड के एलिन इंडियन मेल के 8 मई 1868 के अंक में उस नाटक के मंचन की जानकारी भी प्रकाशित की गई थी। उसी आधार पर पहली बार शरद नागर ने ही हिन्दी रंगमंच दिवस की घोषणा 3 अप्रैल को की थी। उसी की स्मृति में कलाकारों द्वारा नाट्य क्षणिकाओं का प्रदर्शन किया जाएगा। साथ ही संगीत और नृत्य के कायक्रम भी होंगे।

गुरुवार, 19 मार्च 2020

अंतत: … कानून जीता मगर अब बड़ी लाइन खींचने का समय

7 साल बाद ही सही, लेकिन आज दर‍िंदों को फांसी पर लटका द‍िये जाने बाद न‍िर्भया को न्याय म‍िल गया। न‍िर्भया के दोष‍ियों को लेकर ऐसी न्यूज़  हेडलाइंस सुबह से ही पूरे मीड‍िया पर छाई हुई हैं।
इस पूरे प्रकरण में ऐसी लज्जाजनक बातें सामने आईं, ज‍िन्होंने यह सोचने पर बाध्य कर द‍िया है क‍ि क्या हम ”इस सजा” के बाद अब भी समाज के सामने कोई उदाहरण प्रस्तुत कर पायेंगे या ये स‍िर्फ एक ”कानूनी जीत हार” का मसला बनकर ही रह जाएगा।
मैं ये बात इसल‍िए कह रही हूं क‍ि दोष‍ियों के घरवालों ने ज‍िस तरह उनके कुकृत्य को जायज ठहराया, वह समाज में व्याप्त ऐसी वीभत्स धारणा है ज‍िसके बारे में ”अभी के अभी” सोचना उतना ही जरूरी है ज‍ितना बलात्कारी को सजा द‍िलाना। सोच कर द‍ेखि‍ए क‍ि वे कैसी पत्नी और कैसी मां रही होंगीं जो ऐसे बर्बर दर‍िदों को बचाने में लगी रहीं। क्या वे स्वयं उस दर्द को महसूस कर सकती थीं जो न‍िर्भया ने झेला। क्या बलात्कार व बर्बरता उनके ल‍िए एक सामान्य घटना है। अगर माफी म‍िल भी जाती तो क्या वे इन दर‍िंदों की गारंटी ले सकती थीं क‍ि वो अब आगे ऐसा नहीं करेंगे, और यह भी क‍ि फ‍िर कानून पर फ‍िर कौन व‍िश्वास करता।
ये हमारे ल‍िए शर्म की बात है क‍ि न‍िर्भया की मां आशा देवी और दोष‍ियों के वकील एपी स‍िंह दो ऐसे पहलू हैं ज‍िनमें से एक कानून की लाचारगी द‍िखाता है तो दूसरे में कानून का कोई खौफ नहीं, उसने अपनी पब्ल‍िस‍िटी के ल‍िए जमकर कानून का मजाक बार बार उड़ाया और इसे बड़े फख़्र के साथ अपना ”कर्तव्य कहा। यहां तक क‍ि उसने न‍िर्भया की मां को चुनौती दे डाली क‍ि चाहे कहीं (इंटरनेशनल कोर्ट) तक जाना पड़े, इन्हें फांसी तो नहीं ही होने दूंगा।
एपी स‍िंह की तरह ही कुछ तथाकथ‍ित बुद्ध‍िजीवी (ज‍िनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज भी शाम‍िल हैं) भी इस बात पर अपने ”महान व‍िचार” उगलते द‍िखाई दे रहे हैं क‍ि क्या फांसी दे देने से दर‍िंदगी रुक जाएगी और जो सात साल जेल में रहे उन को भी जीने का अध‍िकार है… आद‍ि आद‍ि… ।
तो ऐसे लोगों को अब ये बताया जाना जरूरी हो गया है क‍ि कठोर दंड ही कानून का भय समाज में बनाए रखता है ताक‍ि व्यवस्थायें सही तरीके से संचाल‍ित होती रहें। यद‍ि अपराध‍ियों के अध‍िकारों की बात करने लगेंगे तो अराजकता के स‍िवाय कुछ भी हास‍िल नहीं होने वाला। ये हम सभी को समझने और द‍िलोद‍िमाग में पूरी तरह बैठा लेनी चाह‍िए क‍ि जो कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह अधिकार का दावा भी नहीं कर सकता। बलात्कार के बाद ज‍िस तरह न‍िर्भया के साथ बर्बरता की गई, उस बर्बरता ने उनकी आपराधि‍क प्रवृत्त‍ि जाह‍िर कर दी। इसमें ये बहाना भी नहीं चलने वाला क‍ि वे आदतन अपराधी नहीं थे इसल‍िए उन्हें राहत दी जानी चाह‍िये थी ।
बहरहाल, न‍िर्भया केस ने हमें बताया क‍ि अब एक ऐसी लाइन खींचने का समय आ गया है जो कानून और समाज के बीच ”कर्तव्यों” को प्राथम‍िकता दे न क‍ि अध‍िकारों की दुहाई देकर समाज को सड़न की ओर धकेले। हद से ज्यादा ल‍िबरलाइजेशन समाज को दायि‍त्वबोध नहीं कराता, उसे उच्छृंखल बनाता है।
- अलकनंदा स‍िंंह 

सोमवार, 2 मार्च 2020

ऐसे श‍िक्षकों को तो ‘न‍िष्ठा’ कार्यक्रम या ‘प्रेरणा’ एप भी नहीं सुधार सकते

आज एक लज्जाजनक व‍िषय पर ल‍िखने जा रही हूं जो यह सोचने पर बाध्य करता है क‍ि अपने बच्चों में श‍िक्षा व संस्कार प‍िरोने की इच्छा के साथ हम उन्हें ज‍िन श‍िक्षकों के हवाले करते हैं, क्या वे श‍िक्षक स्वयं इतने संस्कारवान हैं क‍ि हमारे बच्चों को ”लायक बना सकें”?
आज एक लज्जाजनक व‍िषय पर ल‍िखने जा रही हूं जो यह सोचने पर बाध्य करता है क‍ि अपने बच्चों में श‍िक्षा व संस्कार प‍िरोने की इच्छा के साथ हम उन्हें ज‍िन श‍िक्षकों के हवाले करते हैं, क्या वे श‍िक्षक स्वयं इतने संस्कारवान हैं क‍ि हमारे बच्चों को ”लायक बना सकें”? या फ‍िर हम भी उसी अंधी और भयावह दौड़ में शामिल हैं जो क‍ि प्राइमरी से लेकर ड‍िग्रीधारक तक तो तैयार कर रही है मगर संस्कार और शैक्षण‍िक योग्यता उनमें स‍िरे से नदारद है।
और यही साब‍ित क‍िया है उत्तरप्रदेश के फ‍िरोजाबाद ज‍िले की उन श‍िक्ष‍िकाओं ने जो न केवल स्वयं सपना चौधरी के गानों पर डांस कर रही थीं बल्क‍ि अपने ऊपर पुरुष श‍िक्षकों द्वारा लुटाए जा रहे रुपयों का वीड‍ियो भी बना रही थीं। श‍िक्ष‍िकाओं के डांस करने पर भला क‍िसे आपत्त‍ि हो सकती है परंतु ट्रेन‍िंग प्रोग्राम के दौरान ”यह सब” क‍िया जाना बेहद आपत्त‍िजनक है।
देख‍िए वायरल वीड‍ियो का ल‍िंंक- https://www.youtube.com/watch?v=o_Tk7LqX0qA 
दरअसल, श‍िक्षकों के भीतर नेतृत्व क्षमता व श‍िक्षण कार्य में दक्षता प्राप्त करने के ल‍िए सरकार द्वारा सरकारी कार्यालय में चलाए जा रहे ”न‍िष्ठा प्रोग्राम” के दौरान न केवल यह डांस क‍िया गया बल्क‍ि साथी श‍िक्षकों द्वारा श‍िक्ष‍िकाओं पर रुपये लुटाए जाने का वीड‍ियो बनाया गया, फ‍िर उसे वायरल भी क‍िया गया। ये पूरा का पूरा घटनाक्रम श‍िक्षकों की घट‍िया मानस‍िकता को दर्शाता है।
हालांक‍ि अब इस पर कार्यवाही हो रही है परंतु सवाल यही है क‍ि ये सब हुआ ही क्यों…जो श‍िक्ष‍िकायें अपने ऊपर पुरुष साथ‍ियों द्वारा रुपये लुटाए जाने को एंज्वॉय कर सकती हैं, वे भला बच्चों को कौन सी श‍िक्षा व संस्कार देंगी। इससे पहले भी प्रदेश के श‍िक्षकों की स्कूलों में उपस्थ‍ित‍ि सुन‍िश्च‍ित करने के ल‍िए लाए गए ”प्रेरणा एप” को लेकर भी श‍िक्षकों का बेहद जाह‍िलाना रवैया सामने आया था। उन्हें अपनी उपस्थ‍ित‍ि को लेकर प्रेरणा एप पर बस रोजाना अपनी क्लास के बच्चों के साथ एक सेल्फी पोस्ट करनी थी … व‍िरोध का तर्क था क‍ि सरकार इस सेल्फी से श‍िक्षकों की न‍िजता पर हमला कर रही है। उन पर अव‍िश्वास जता रही है। एक तर्क ये भी द‍िया गया क‍ि सभी के पास मोबाइल नहीं हैं, सरकार मोबाइल फोन मुहैया करवाये।
कुल म‍िलाकर बात वहीं आकर ठहरती है क‍ि आख‍िर ये स्थि‍ति आई ही क्यों। सभी श‍िक्षक ज‍ितना मानदेय, सैलरी व अन्य भत्तों को लेकर ज‍ितना सचेत रहते हैं, उतना कर्तव्यों को लेकर क्यों नहीं रहते। ऐसा नहीं हैं क‍ि जो अपने कर्तव्यों को न‍िभाते हैं उन्हें नजरंदाज़ कर द‍िया जाता है, वरना राष्ट्रीय स्तर पर श‍िक्षक सम्मान नहीं द‍िये जा रहे होते। अपने कर्तव्य न‍िभाने की बजाय सरकारों के ख‍िलाफ सड़कों पर उतर कर, अपने अध‍िकार मांगने को हड़ताल और तरह-तरह से व‍िरोध प्रदर्शन करने वाले श‍िक्षकअपना सम्मान स्वयं ग‍िराते हैं।
”सरकारी नौकरी” करने वाले श‍िक्षक और श‍िक्षा संस्कार देने वाले ”गुरू” दोनों एक दूसरे से उतने ही अलग हैं ज‍ितने क‍ि पूरब और पश्च‍िम। श‍िक्षाम‍ित्रों के संगठन, बेस‍िक श‍िक्षक संघ, माध्यम‍िक श‍िक्षक संघ से लेकर यूनिवर्स‍िटीज तक आजकल यही आलम है क‍ि नौकरी करने वाले टीचर तो तमाम म‍िल जायेंगे मगर एक आदर्श गुरू नहीं मिलेगा। डांस करना बुरा नहीं है, उसको ज‍िस जगह, ज‍िस रूप और ज‍िस मानस‍िकता के साथ क‍िया गया, वह लज्जाजनक है। हर काम सरकारें नहीं कर सकतीं। बतौर अभ‍िभावक और बतौर श‍िक्षक कुछ तो ज‍िम्मेदारी हम सबको भी लेनी ही होगी, वरना ऐसी श‍िकायतें आती रहेंगी और दोषारापण हम आइस-पाइस खेल की तरह एक दूसरे पर करते रहेंगे।
- अलकनंदा स‍िंंह