बुधवार, 30 मार्च 2016

''शौकीनों'' गले में पट्टा डालने जा रही है महाराष्ट्र सरकार

अदालत के आदेश के बाद महाराष्ट्र में डांस बार भले ही फिर से शुरू होने जा रहे हैं लेकिन ''शौकीनों'' गले में पट्टा भी डालने जा रही है महाराष्ट्र सरकार क्योंकि सरकार डांस बार को नए लाइसेंस देने के लिए जो नियम बना रही है, वो काफी कड़े हैं।

सरकार के ड्राफ्ट के मुताबिक अगर डांस बार के शौकीनों ने आज्ञा का पालन किया तो उन्हें इन बाधाओं को पार करना ही होगा। ये नियम देख‍िए -

1. बार बालाओं पर पैसे लुटाने वाले या फिर उन्हे छूने की कोशिश करने वालों पर 50 हजार का जुर्माना या 6        महीने की जेल हो सकती है।

2. इतना ही नहीं, बार डांसर्स की उम्र कम से कम 25 साल होनी चाहिए। अब डांस बार सिर्फ रात 11:30 तक ही खोले जा सकेंगे।
3.डांस बार में महिला सेक्यॉरिटी गार्ड और महिला वेटर रखना होगा।

4.डांस बार के गेट पर और डांस फ्लोर पर भी सीटीवीवी लगाने का प्रस्ताव ड्राफ्ट में है।

5. बार बालाओं पर पैसे लुटाने वाले या फिर उन्हे छूने की कोशिश करने वाले ग्राहकों पर 50 हजार का जुर्माना या 6 महिने की जेल या दोनों सजा हो सकती है।

6. डांस बार के परफॉर्मेंस एरिया में शराब पर भी पाबंदी होगी।

7. 25 साल से कम उम्र की लड़कियों को बार बाला के तौर पर नहीं रख सकते।

8. तीस दिनों तक सीसीटीवी की फुटेज रखनी होगी।

9. बार बालाओं का उत्पीड़न करने वाले बार मालिक पर 10 लाख का जुर्माना या 3 साल की सजा या फिर दोनों।

10. 11.30 बजे तक ही डांस बार खुले रह सकते हैं पहले 2 बजे तक डांस बार खुले रखने की इजाजत थी।

11. महिला सिक्यॉरिटी गार्ड, महिला वेटर को नियुक्त करना होगा।

12. काम करने वाले सभी बार बालाओं का रिकॉर्ड रखना होगा।

13. बार बालाओं के साथ बार मालिक को बॉन्ड साईन करना होगा इस बॉन्ड में बारबालाओं की सैलरी, उनके पीएफ सहित अन्य सुविधाएं देनी होंगी।

14. बायोमेट्रीक सिस्टम के जरिए बार बालाओं की हाजरी का रिकॉर्ड रखना होगा।

15. अवैध बार मालिक पर 25 लाख का जुर्माना और 5 साल तक की सजा हो सकती है।

16. किसी भी ग्राहक को डांस फ्लोर पर जाने की इजाजत नहीं होगी।

20. बारबाला और ग्राहक के बीच में 5 फिट की दूरी होना अनिवार्य है।

21. इस ड्राफ्ट को स्टडी करने के लिए सरकार ने 30 सदस्यों की एक कमेटी बनाई है और इस कमेटी का नेतृत्व मुख्यमंत्री फडणवीस कर रहे हैं।

22. सरकार ने कहा है की इस ड्राफ्ट को अगर कमेटी ने मंजूर कर लिया तो इसी सत्र में इस ड्राफ्ट को सदन में रखा जाएगा।

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 19 मार्च 2016

पंडित छन्नू लाल मिश्र जी की राग काफी में गाई होली आज अपनी ओर खींच रही है

हमारे ब्रज में 40 दिन तक चलने वाले होली उत्सव का चरम है फिर भी मुझे बरसाने से उठी होली के समाज गायन की आवाज के साथ साथ बरबस ही पंडित छन्नू लाल मिश्र जी की राग काफी में गाई होली अपनी ओर खींच रही है। ये हर होली पर्व पर ही होता आया है कि मैं उनकी गाई हुई ''खेलें मसाने में होरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी...''  हो  या  '' रंग डारूंगी ... डारूंगी नंदलालन पै... '' हो दोनों को सुनकर भावविभोर हो जाती हूं।
पंडित जी की राग काफी में गाई एक होली है ।

https://www.youtube.com/watch?v=LPHBdIB06SU

होली पर होने वाले लोकगायन और समाज गायन से अलग अपनी शास्त्रीय उपस्थ‍िति बताने को काफी है राग काफी में गाई जाने वाली होली । होली के अध‍िकांश गीतों में  जिस राग को बहुतायत में गाया गया , वह है राग काफी।
यूं तो  भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हाँलाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है परंतु मनमोहक राग - काफी में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। जैसे कि फिल्म ' गोदान ' में पं. रविशंकर का संगीतबद्ध की हुई एक होली है -
बिरज में होरी खेलत नंदलाल ...
https://www.youtube.com/watch?v=S-4nRKGRRAM
 
होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है , सुनिए राग काफी में निबद्ध एक होली...

https://www.youtube.com/watch?v=cTieTuVatRY

उन्हीं की गाई राग गारा में उड़त अबीर गुलाल को भी सुनिए...

https://www.youtube.com/watch?v=CRVyFBfvku8

राग काफी की संरचना की अगर बात करें तो राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं।
आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है।
इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है।
कभी-कभी वादी कोमल गांधार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है।
हालांकि दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है।
ठुमरियों में प्रायः दोनों गांधार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गांधार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

हमारे ब्रज में कहा जाता है कि ''फागुन ना माने जात कुजातन और ना माने उमरन कौ भान, जाई तै  सब परबन पै भारी पड़्यौ फागुन कौ मान....

इसी पर पंडित छन्नू लाल मिश्र जी ने गाया है ... रंग डारूंगी ... डारूंगी नंदलालन पै... सुनिए

https://www.youtube.com/watch?v=bgyrScI3T5c

इसके अलावा कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें हैं ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग काफी के अलावा भी कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं, जैसे कि बसंत, बहार, हिंडोल। कुछ तो ये होली का पर्व ऐसा कि बसंत की खुमारी और मादकता के कारण गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है, उस पर ऐसी बंदिशें कि मन झूम उठे सुनकर ही । और ऐसे में यदि पंडित छन्नूलाल मिश्र  की आवाज हो तो क्यों ना रंग छाए ... बरबस रंग छाने ही लगता है।
उपशास्त्रीय संगीत विधा में भी चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली पड़ गया जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन , स्थान , इतिहास व  धार्मिक महत्व छुपा मिलता है।

ब्रज की होली के बारे में यदि मैं कुछ ना कहूं तो कुछ अधूरा सा लगता है होली का आनंद ...फाग खेलन मतवारे आए हैं , नटवर नंद किशोर ... हो या होरी खेलन आयौ स्याम आजु जाय रंग में बोरौ री... के साथ श्री कृष्ण जन्मस्थान से होरी के गीतों और ढप तथा बम की धमक यहां तक सुनाई दे रही है..... ।

चलिए होली के इन शास्त्रीय रंगों को पंडित छन्नूलाल मिश्र की ही चैती से आगे बढ़ाते हैं ... सुनिए...

https://www.youtube.com/watch?v=kOiVPLw0rKI&ebc=ANyPxKpa8QdbRGPb1CCGdEuodj7YUBOKBIvJC0BRv6-cpon8ONTH-Scl8wN4cdJ-xiXtBOfVmdpRDc_7Ggn88v1LMckc4nO30w
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 8 मार्च 2016

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: थैक्यू 8 March 1914


आज सर्च इंजिन गूगल ने #OnedayIwill लिंक के साथ एक वीडियो-डूडल बनाया है जिसमें दुनिया भर की महिलाओं की इच्छा, कार्य और उसकी प्रगति के साथ जुड़ी यात्रा को दिखाया गया है। कुल एक मिनट चौबीस सेंकेंड का ये वीडियो-डूडल 8 मार्च को मनाए जाने वाले उस पोस्टर का फॉलोअप है जो सबसे पहले 8 March 1914 को लिंगभेद विरोध दिवस के रूप में  दुनिया के सामने आया। जिसका मजमून था-
''अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, 8 March 1914 को दर्शाता हुआ एक जर्मन पोस्टर; हिन्दी अनुवाद: “हम महिलाओं को मताधिकार दो। महिला दिवस, 8 मार्च 1914.
अब तक भेदभाव और प्रतिक्रियावादी नज़रिए ने उन महिलाओं को पूर्ण नागरिक अधिकार से वंचित रखा है, जिन्होंने श्रमिकों, माताओं और नागरिकों की भूमिका पूरी निष्ठा से निभाई तथा अपने कर्त्तव्य का पालन किया है एवं जिन्हें नगर पालिका के साथ-साथ राज्य के प्रति भी करों का भुगतान करना होता है। इस प्राकृतिक मानवाधिकार के लिए हर औरत को दृढ़ एवं अटूट इरादे के साथ लड़ना चाहिए। इस लड़ाई में किसी भी प्रकार के ठहराव या विश्राम करने की अनुमति नहीं है। सभी महिलाएँ और लड़कियाँ आएं, रविवार, 8 मार्च 1914 को, शाम 3 बजे, 9वीं महिला सभा में शामिल हों''।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम अपने हको-हुकूक की बातें करते हुए हमेशा उन महिलाओं को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने सबसे पहले अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर यह दिवस २८ फ़रवरी १९०९ को मनाते हुए हर साल फरवरी के आखि‍री इतवार को मनाये जाने का दिन सुनिश्चित किया। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में तो इसे अगले ही साल 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन सम्मेलन में मान्यता मिली।
उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था।
अध‍िकार की यह यात्रा सात साल में चलते- चलते रूस तक जा पहुंची जब 1917 में रूस की महिलाओं ने महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी क्योंकि ज़ार ने सत्ता छोड़ी और उसके बाद बनी अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिया। उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर जबकि इन दोनों कैलेंडर्स की तारीखों में थोड़ा अन्तर होता है। जूलियन कैलेंडर के मुताबिक 1917 में फरवरी का आखि‍री इतवार २३ तारीख को पड़ा था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। चूंकि पूरी दुनिया में अब, यहां तक रूस में भी ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है इसीलिये ८ मार्च महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
ये थी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जाने की वो यात्रा जब महिलाओं ने कामकाजी होने के साथ अपने अध‍िकारों के लिए आगे आने का साहस किया, और जिसके लिए आज हमें उनका आभार व्यक्त करना चाहिए कि दुनिया की आधी आबादी आवाज उठाने और उसे आगे बढ़ाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता बनाए हुए है। हालांकि यह यात्रा अपने उत्तरोत्तर पड़ाव स्थापित करती जा रही है । ये पड़ाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका में महिला को राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार्यता दिलाने का हो या बोको हरम के जुल्म, यज़ीदी महिलाओं को सेक्स गुलाम बनाए जाने, होंडुरास से लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान होती हुई हमारे देश में भी ऑनर किलिंग के नाम पर महिलाओं के कत्ल जैसी गतिविध‍ियों तक आगे बढ़ रहे हैं। भारत में इस यात्रा के और भी पड़ाव हैं।
बात निकली है महिला अध‍िकारों की, लिंगभेद को मिटाने की तो ऑफिस से लेकर घर तक और बाजार से लेकर मंदिरों तक हर जगह यह अपनी जद्दोजहद के साथ संकल्पबद्ध है। हर स्तर पर महिलाओं की मौजूदगी तथा उनके होने को स्वीकृति का माहौल तो बन ही चुका है, अब लड़ाई की जगह आम सहमति लेती जा रही है। आगे आने वाला समय इसके लिए और अनुकूल ही होगा क्योंकि कम से कम नई पीढ़ी के लड़के इस बात से बावस्ता हैं, वह लिंगभेद और पुरुषों की ठेकेदारी वाली सोच से आगे जाकर सोच रहे हैं।
शनि सिंगणापुर में प्रवेश, त्रयम्बकेश्वर में प्रवेश, सबरीमाला में युवा महिलाओं के प्रवेश निषिद्धि के ख‍िलाफ उठी आवाजें जहां अपने स्त्रीत्व के कारण पूजा करने के अध‍िकार से वंचित कर दिए जाने को चुनौती दे रही हैं वहीं हैपी टू ब्लीड अभ‍ियान नई चेतना को टैबू बनाकर रख दिए जाने के ख‍िलाफ है।
ये सोच में आ रहे क्रांतिकारी बदलाव ही तो हैं। 1914 से चली यह यात्रा महिला को एक इंसान के रूप में अध‍िकार हासिल होने तक जारी रहने वाली है। अब इतना तो सुकून है कि ढर्रे पर चलने का रिवाज जा चुका है। नई पीढ़ी की सोच लिबरल है जो साथ- साथ चलेगी मगर बराबरी के अध‍िकारों के साथ। लड़कियों को कमतर आंकने की कुंठाएं अब धूल में दबे कंकड़ की तरह होती जा रही हैं जो समय-समय पर चुभेंगीं तो सही, मगर वह सिर नहीं उठा सकेंगी।
निश्चित जानिए कि अब महिला अध‍िकारों की यह यात्रा धर्म, मजहब, राजनीति, संस्कार, श‍िक्षा , रोजगार आदि क्षेत्रों से आगे जाने को प्रतिबद्ध हो चुकी है, कमर कस चुकी है।   

 - अलकनंदा सिंह

सोमवार, 7 मार्च 2016

एक टूल बन गया है ''ऊं नम: श‍िवाय''

आज महाशिवरात्री है... मंदिरों में रुद्राभिषेक और ''ऊं नम: शिवाय'' मंत्र के जाप तथा बेल पत्र ,फल-फूल, धतूरे व अन्य पूजा सामग्री से श‍िवलिंगों की पूजा-अर्चना हो रही है। इसी गहमागहमी के बीच भीड़ का एक रेला कांवड़‍ियों का भी है जो श‍िवभक्ति के खुमार में न तो रास्ते जाम करने से बाज आता  है और ना ही राहगीरों से बदसलूकी करने से।
अजीब सी स्थ‍िति है , समझ में नहीं आ रहा कि इस पूरे के पूरे माहौल को भक्ति के किस एंगिल से देखा जाए...।

महाशिवरात्रि को श‍िव और शक्ति के मिलन स्वरूप मनाए जाने के पीछे भौतिक कारण कम और आध्यात्मिक कारण ज्यादा हैं, ऐसे में कांवड़ियों की तथाकथति भक्ति के रूप को देखकर चिंति‍त होना स्वाभावि‍क है कि क्या महाशिवरात्रि जैसे पर्व को एक बेलगाम भीड़ द्वारा विकृत नहीं कर दिया गया। कांवडि़ये स्वयं को सर्वश्रेष्ठ श‍िवभक्त मानकर कुछ भी करने पर आमादा है... कुछ भी यानि कुछ भी जो अराजक... ।  भीड़ सिर्फ कांवडि़यों की ही नहीं बल्कि मंदिरों में तो पुरुष , स्त्री , बच्चे, नवयुवतियां, नवयुवक एक दूसरे को लगभग धकियाये जा रहे हैं।   

''ऊं नम: शिवाय'' मंत्र का जाप करते जा रहे हैं मगर सारी भक्ति... सब सतही.. . आडंबर । इस भीड़ में कोई नहीं जानना चाहता कि इस महामंत्र ''ऊं नम: शिवाय'' के आख‍िर मायने क्या हैं।

इस भीड़ में कोई नहीं जानना चाहता कि बीज यदि पृथ्वी की सतह पर डाल दिया जाए तो उसके उगने की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं मगर यही बीज यदि पृथ्वी को थोड़ा कुरेद कर उसमें दबा दिया जाये तो वह ज़रा सी नमी पाकर ही उग आता है। 

ठीक यही बात महामंत्र ''ऊं नम: श‍िवाय'' के जप को लेकर भी है। आज श‍िवरात्रि पर इस महामंत्र की मालाएं जपी जा रही हैं, काउंटिंग की जा रही है, पंडित बता रहे हैं कि फलां को इतने हजार मंत्र की इतनी मालाएं जपने का इतना लाभ हुआ। भीड़ के बीच से कराह- कराह कर दर्शन करके निकल रहे भक्त भी सुमरनी में माला दर माला तो घुमाए जा रहे हैं किंतु उनका ध्यान महामंत्र से होने वाले लाभ पर टिका हुआ है।

इन बगुला भक्तों और माला जपाऊ सिद्ध लोगों को कौन बताए कि यह महामंत्र इसलिए कहा गया क्योंकि इसके साथ कोई मांग नहीं जुड़ी केवल आत्मा का जागरण, चैतन्य का जागरण, आत्मा के स्वरूप का उद्घाटन और आत्मा के आवरणों का विलय जुड़ा है।

आत्मा की शुद्धता तभी संभव है जब आप प्रकृति के साथ तालमेल कर सकें। आत्म जागरण परमात्मा स्वरूप प्रकृति के विनाश में कम से कम सहभागी ना बनें।

इस महामंत्र के साथ जुड़ा हुआ है-केवल चैतन्य का जागरण। सोया हुआ चैतन्य जाग जाए। सोया हुआ प्रभु, जो अपने भीतर है वह जाग जाए, अपना परमात्मा जाग जाए और यह तभी संभव होगा जब हम अपनी अनुभूतियों को जड़ ना होने दें। मनोकामनाएं हावी होगीं तो स्वार्थ पनपेगा और स्वार्थ से अहंकार , फिर यही अहंकार 'मैं' की राह पर चलता हुआ दूसरों को नीचा दिखाता कब श‍िव के इस महामंत्र से दूर ले जाएगा, पता ही नहीं चलेगा।
कम से कम '' ऊं नम: श‍िवाय ''महामंत्र का ऐसा प्रयोग हममें से कोई नहीं चाहेगा।

आध्यात्मिक दृष्ट‍ि से देखा जाए तो शब्द को ब्रह्म माना गया है, उसमें अचिंत्य शक्ति होती है इसीलिए शब्दात्मक होने के कारण मंत्र को शक्तिपुंज माना गया है। और यही शक्तिपुंज मन के तीनों कार्य- स्मृति, कल्पना एवं चिन्तन को अपनी क्षमता के अनुसार संचालित करता है।

मन इतिहास की स्मृति करता है, भविष्य की कल्पना करता है और वर्तमान का चिन्तन करता है  किन्तु शब्द के बिना न स्मृति होती हैं, न कल्पना होती है और न चिन्तन हो पाता है। सारी स्मृतियां, सारी कल्पनाएं और सारे चिन्तन 'शब्द' के माध्यम से चलते हैं। हम जब किसी की स्मृति करते हैं तब तत्काल शब्द की एक आकृति बन जाती है। उस आकृति के आधार पर हम स्मृत वस्तु को जान लेते हैं।

इसी तरह कल्पना एवं चिन्तन में भी शब्द का बनाया वही बिम्ब हमारे लिए सहायक होता है। यदि मन को शब्द का सहारा न मिले, यदि मन को शब्द की वैशाखी न मिले तो मन चंचल हो नहीं सकता। मन लंगड़ा है। मन की चंचलता वास्तव में ध्वनि की, शब्द की या भाषा की चंचलता है। मन को निर्विकल्प बनाने के लिए शब्द की साधना बहुत जरूरी है और इसीलिए '' ऊं नम: श‍िवाय '' महामंत्र के माध्यम से हम श‍िव को अपने जैसा मानकर उनसे अपनी कामनाओं को पूरा करने की बात कहते हैं, मगर अब ये प्रवृत्त‍ि अपने विकृत रूप में हमारे सामने है।
मंदिरों का भी अब व्यवसायीकरण हो गया है और यह एक ऐसी आड़ भी बन गया है जो एक विशेष काउंटिंग की माला जपने और उनके नंबरों से प्राप्त फल का हिसाब किताब लगा रहा है। महाश‍िवरात्र‍ि को बेलपत्रों के बोझ के बीच दबे श‍िवलिंग को बताया जा रहा है कि इतनी माला कर ली हैं, अब आपकी जिम्मेदारी है, कामनाऐं पूरी करने की। शेष रहा '' ऊं नम: श‍िवाय'', तो यह एक टूल है जिसे जब चाहे तब वह इस्तेमाल कर ही लेगा।

- अलकनंदा सिंह







गुरुवार, 3 मार्च 2016

आख‍िर एक अनपढ़ मां ...और कहे भी क्या

Mother advice: Betrayals are avoiding Kanhaiya

आख‍िर एक अनपढ़ मां ...और कहे भी क्या। सच में जिन मांओं के बच्चे दूरदराज के गांवों से निकल कर मेट्रो सिटीज में अपनी श‍िक्षा पूरी करने आते हैं और लक्ष्य प्राप्ति से पहले ही राजनीति के ग्लैमर में फंस जाते हैं , उनकी मांऐं और कहें भी क्या अपने बच्चों से ....।
आज जेएनयूएसयू के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की रिहाई पर उसकी मां मीना देवी ने कहा, “मैं उन्हें सलाह दूँगी ग़द्दारों से बचकर रहो. दोस्त भी ग़द्दारी करता है, उससे बचकर रहो.” वे पूछती हैं, “इसके सिवाय मां और क्या सलाह दे सकती है.” मां का हृदय उस राजनीति को नहीं समझ सकता जो उच्च श‍िक्षण संस्थानों में छात्रों-छात्रों के बीच, छात्रों. श‍िक्षकों के बीच और राजनैतिक पार्टियों के हाथों खेली जाती है।
कल शाम को कन्हैया को पटियाला हाउस कोर्ट ने सशर्त ज़मानत दे दी। ज़मानत देने की शर्त में कोर्ट को हिदायत देनी पड़ी कि ...........
कोर्ट ने अंतरिम जमानत देने के साथ ही कन्हैया से कहा कि वह ऐसी किसी गतिविधि में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेंगे, जिसे राष्ट्रविरोधी कहा जाए।

हाईकोर्ट ने उनके जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष होने के नाते आदेश दिया कि वह कैंपस में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए अपने सभी अधिकार के तहत प्रयास करेंगे।    

न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी ने कहा, तथ्य और हालात को देखते हुए मैं याचिकाकर्ता को छह महीने की अवधि के लिए अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश देती हूं। साथ ही स्पष्ट किया कि उन्हें जांच में सहयोग करना होगा और जरूरत होने पर जांचकर्ताओं के सामने खुद पेश होना पड़ेगा।
   
न्यायाधीश ने कन्हैया की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर भी विचार किया। उनकी मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के तौर पर महज 3000 रुपए कमाती हैं और परिवार में अकेली कमाने वाली हैं। कन्हैया को राहत देते हुए उन्हें 10,000 रुपए की जमानत राशि और इतनी राशि का ही मुचलका भरने को कहा गया।
   
न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि आरोपी का जमानतदार संकाय के सदस्य या उनसे जुड़े हुए ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जो उन पर न सिर्फ अदालत में पेशी के मामले में नियंत्रण रखता हो बल्कि यह भी सुनिश्चित करने वाला होना चाहिए जो उनकी सोच और ऊर्जा सकारात्मक चीजों में लगाना सुनिश्चित करे।
   
जमानत के लिए राशि जमा करने में वित्तीय छूट देते हुए कोर्ट ने कहा कि कन्हैया को इस संबंध में एक शपथ पत्र देना होगा कि वह ऐसी किसी गतिविधि में सक्रिय या निक्रिय रूप से ऐसी किसी भी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे, जिसे राष्ट्रविरोधी कहा जाए।

न्यायाधीश ने 23 पन्ने के आदेश में कहा कि बिना निचली अदालत की अनुमति के कन्हैया देश से बाहर नहीं जा सकते और उनके जमानतदार को भी आरोपी की तरह का शपथपत्र देना होगा।
   
न्यायाधीश ने यह भी कहा कि न्यायिक हिरासत में याचिकाकर्ता के गुजारे हुए वक्त में उसे घटनाक्रमों के बारे में आत्मनिरीक्षण का मौका मिला होगा। उसे मुख्यधारा में बने रहने के लिए उपचार का रूढि़वादी तरीका प्रदान करने के लिए मैं तैयार हूं।
   
न्यायाधीश ने कहा, अंतरिम जमानत पर याचिकाकर्ता को रिहा करने का फैसला हो जाने पर अब सवाल उठता है कि जमानत की राशि कितनी होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने 11 फरवरी 2016 के अपने भाषण में दावा किया था कि उसकी मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं और 3,000 रुपए कमाती हैं और परिवार का गुजारा उन्हीं से होता है।
   
न्यायाधीश ने कहा, अगर इस पहलू पर विचार किया जाए तो जमानत राशि और मुचलका इतना नहीं होना चाहिए कि उसे जमानत ही नहीं मिल पाए।
   
उन्होंने कहा, वक्त की मांग है कि जमानत देने के मकसद से याचिकाकर्ता को वित्तीय पहलू में कुछ ढील देने के लिए उसे शपथपत्र देना होगा कि वह ऐसी किसी गतिविधि में सक्रिय या निक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेगा जो कि राष्ट्रविरोधी हो सकता है।

न्यायाधीश ने कहा, इसके अलावा जेएनयूएसयू अध्यक्ष होने के नाते उन्हें कैंपस में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को काबू में करने की पूरी कोशिश करनी होगी।
   
कन्हैया की अंतरिम जमानत के लिए शर्तें निर्धारित करते हुए कोर्ट ने कहा कि 10,000 रुपए की जमानत राशि और जमानतदार जो कि जेएनयू के संकाय के सदस्य हो सकते है, उन्हें संबंधित मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या लिंक मजिस्ट्रेट को इस शर्त से संतुष्ट करना होगा कि वह अदालत की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे।

अब ये तो समय और स्वयं कन्हैया का अपना रुख बतायेगा कि वह मां की कितनी बात सुनेगा , हालांकि इसकी संभावना कम ही है, फिर भी मां है तो न तो हिदायत देना भूलेगी और ना ही मुश्किलों से अपने बेटे को आगाह करते रहना और बचाते रहना ।
 बहरहाल  मीना देवी का कहना है कि उनका बेटा निर्दोष है और उसका बरी होना पहली जीत है. उन्हें संविधान पर पूरा भरोसा है और झूठ-सच का यह जो मामला फँसाया गया था इस पर आए फ़ैसले के बाद वे खुश हैं.

जिंदगी की जद्दोजहद पर पहले एक सूत्र वाक्य जो आज के हालातों पर फिट बैठता है...

Lessons of Life : For all those moments that you should have said no, but could not muster the courage, remember, its not over yet.

- अलकनंदा सिंह

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