शनिवार, 28 दिसंबर 2013

जीते जी मक्‍खियों को निगलती पीढ़ी

हमारे यहां अकसर कहा जाता है कि किसी भी क्षेत्र में प्रसिद्धि पाने के लिए जितनी मेहनत करनी होती है, उससे कहीं ज्‍यादा उसे बरकारार रखने में जरूरी होती है लेकिन कई बार ऐसा देखा गया है कि बरकरार रखने वाली यही चुनौती उन पीढ़ियों के लिए बोझ बन जाती है जो इन विरासतों की गवाह बनती हैं। फिर उनके लिए इस तरह प्रसिद्धि पाने और उसे बनाये रखने के लिए स्‍थापित नियमों में फेरबदल की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती...पीढ़ियां फिर भी इन चुनौतियों से जूझ रही हैं क्‍योंकि जीवन है तो आशा है और आशा है तो चुनौतियां भी अवश्‍य बनी ही रहती हैं।
अब देखिए न ...लगभग पूरे देश में ही चल निकली कांग्रेस विरोधी लहर की रफ्तार धीमी करने के लिए, पार्टी के 'युवराज' और मोदी द्वारा दिये गये नये नाम 'शहजा़दे' के वज़न को ढोते हुए राहुल गांधी पिछले दिनों जब मुज़फ्फ़रनगर के दंगापीड़ितों से मिलने पहुंचे तो तमाम राजनैतिक बातों, नारों और सांत्‍वनाओं के बीच उनके चेहरे पर एक 'बेचारगी' झलक रही थी। ये बेचारगी किसी गरीब की नहीं थी, बल्‍कि गरीबों और असहायों के सामने 'बड़े होने' की लाचारगी से उपजी 'कुछ ना' कर पाने की थी।
दरअसल, राजनीति ने राहुल गांधी को लेकर आमजन के बीच कुछ ऐसी धारणाएं स्‍थापित  कर दी हैं कि हम इनका नाम आते ही एक भ्रष्‍टाचारी पार्टी के किसी गेम खेलने वाले विलेन की तस्‍वीर को सामने पाते हैं या फिर देश के अहम मुद्दों पर चुप्‍पी साधे तमाशबीन नेता के तौर पर आंकने लगते हैं और इस सबके बीच जो कुछ घटित होता है उसे हम एक रटे रटाये अंदाज़ में देखते हैं कि वो सोनिया गांधी के बेटे हैं..फिलहाल सत्‍ताधारी पार्टी के सबसे ताकतवर नेता हैं...आदि आदि।
बेशक, दागी सांसदों को लेकर संसद के रुख पर अध्‍यादेश को नॉनसेंस कहने वाले,पार्टी का कुनबा बढ़ाने के लिए भी नई-नई तकनीकें आजमाने वाले, और अब आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच रिपोर्ट को खारिज करने वालों पर सवालिया निशान लगाकर राहुल गांधी ने बार-बार यह जताने की कोशिश की है कि सरकार जिस तरह काम करती रही है वह बिल्‍कुल भी सही नहीं है परंतु उनके कहने की टाइमिंग गड़बड़ रहती है और वो अपने शब्‍दों को जाया करते दिखते हैं। यह महज इसलिए कि विरासत की राजनीति को ढोने की मजबूरी उन्‍हें ''अपनी तरह'' से कुछ करने नहीं दे रही।
एक दूसरा उदाहरण हैं उत्‍तर प्रदेश की कमान संभालने वाले मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव का। मुलायम सिंह के स्‍थापित नियम अखिलेश के राजनैतिक कॅरियर को पूरी तरह ज़मींदोज करने पर उतारू हैं।अपने बेटे को मुलायमसिंह अभी तक मुख्‍यमंत्री मान ही नहीं पाये ।अखिलेश के हर कदम पर उन्‍हें मंच से सरेआम डांट देना ,उनकी आलोचना करना, जबरन उनकी टीम पर अपनी पसंद थोपना, कुछ ऐसे बिंदु हैं जो अखिलेश की लाचारगी को बढ़ा ही रहे हैं, काम करना तो दूर वो अपनी तरह से सोच भी नहीं पा रहे वरना क्‍या कारण है कि जो अखिलेश ,पद की शपथ लेने के बाद जोश से लबरेज़ दिखते थे आज वो हर बात पर खुंदक निकालते नज़र आते हैं।
सोनिया गांधी हों या मुलायम सिंह..... या ऐसे ही दूसरे राजनैतिक धुरंधर, सभी को समझ लेना चाहिए कि राजनीतिक विरासतों को ढोने का वक्‍त अब बीत चुका है। यह नये प्रयोगों का दौर है। जब हम आज की पीढ़ी को स्‍कूलों से लेकर कॅरियर तक अपना रास्‍ता खुद चुनने की वकालत करते हैं तो राजनीति में इससे परहेज क्‍यों ? राजनीति तो खालिस पब्‍लिक से जुड़ा ऐसा मामला है, जो कॅरियर कम और जनसेवा अधिक है। ''आप'' की दिल्‍ली में जीत एक नये दौर की कहानी रच गई है । राहुल गांधी और अखिलेश यादव भी इस परिवर्तन को भलीभांति समझ रहे हैं मगर वो विरासत की राजनीति ढोने पर मजबूर हैं और दूध में पड़ी मक्‍खी को जीते जी निगलने के लिए सिर्फ इसलिए विवश हैं क्‍योंकि वह उन राजनैतिक हस्‍तियों (व्‍यापारियों) के  उत्‍तराधिकारी  हैं  जिन्‍होंने अपने बच्‍चों को भी नहीं बख्‍शा।
- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

कश्‍मीर में मुस्लिम महिलाएं दोबारा कर सकेंगी निकाह

श्रीनगर। 
जम्मू कश्मीर में पिछले कई सालों से गायब अपने पतियो का इंतजार कर रही महिलाओं को मुस्लिम धार्मिक गुरूओं ने बड़ी राहत दी है। उन्होंने गुरूवार को दिए एक फतवे में उन महिलाओं को दोबारा निकाह (शादी) करने की इजाजत दे दी है जिनके पति पिछले चार या उससे अधिक सालों से गायब हैं। दो दशक पहले घाटी में आतंक पनपना शुरू हुआ था जिसके कारण कई महिलाओं के पति गायब हो गए थे। ये धार्मिक धर्मगुरू ऎसी महिलाओं के दोबारा निकाह करने को लेकर आयोजित एक समारोह में हिस्सा लेने आए थे।
समारोह का आयोजन करने वाले गैर सरकारी संगठन "एहसास" के प्रमुख बशीर अहमद डार ने कहा कि धार्मिक गुरू इस बात के समर्थन में थे कि राज्य में पिछले दो दशक में आतंकी घटनाओं के कारण जिन महिलाओं के पति इस दौरान गायब हुए, वे गायब होने के चार साल बाद दोबारा निकाह कर सकेंगी।
मामले को लेकर तीन चरणों में चली मंत्रणा के बाद धार्मिक गुरू इस बात पर राजी हो गए कि जो महिलाएं दोबारा निकाह करना चाहती हैं, वे गायब होने के चार साल बाद ऎसा कर सकती हैं। ऎसे मामलों में संपत्ति को लेकर कोई भी फैसला पवित्र कोरान और हदीश में दिए गए नियमों के अनुसार लिया जाएगा।
देश में लागू मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 के तहत मुस्लिम कानून के तहत जिस महिला ने निकाह किया है, वह तलाक के लिए अर्जी दायर कर सकती है अगर उसका पति चार या उससे अधिक समय से गायब है। इस फतवे का महिलाओं ने खुलकर समर्थन किया है।

रविवार, 22 दिसंबर 2013

महिलाओं की तस्‍करी का रेड अलर्ट

देश में छोटी बच्चियों से लेकर बड़ी लड़कियों को देह व्यापार के दलदल में झोंकने का गोरखधंधा जोरों पर है, वो अलग बात है कि दिल्ली जैसे कुछ बड़े शहरों में देह-व्यापर को सरकार ने कानूनी तौर पर "रेड अलर्ट" घोषित कर रखा है, लेकिन एक चौंकानी वाली रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि बड़ी उम्र की महिलाओं को तस्करी के जरिए देह व्यापार के हवाले किया जा रहा है।

मजदूर तबका लगाता है बोली
राष्ट्रीय महिला आयोग ने पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार में महिला तस्करी के मामलों पर संज्ञान लेकर एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें लड़कियों और 40-45 साल की अविवाहित महिलाओं तस्करी होती है, जिन्हें मजदूर वर्ग बोली लगाकर खरीदकर जिंदगी भर चाहरदीवारी की जंजीरों में गुलाम बनाकर रखता है, जिसमें यह औरत घर के काम करने से लेकर घर के कई मर्दो के साथ शारीरिक संबध बनाने को भी मजबूर होती है।

काम के बदले धोखा
महिला आयोग की रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है इन महिलाओं और लड़कियों की गरीबी का फायदा उठाकर इन्हें काम देने की बात कहकर इनका 20-25 हजार में सौदा कर दिया जाता है, इन्हें खरीदने वाले लोग घर में कैद करके हवश का शिकार बनाते हैं, जब ये महिलाएं मौका मिलने पर पुलिस से शिकायत करती हैं, तो पुलिस भी कोई सहयोग नहीं करती है। तस्करी के चंगुल में फंसने वाली यह ज्यादातर महिलाएं अनूसूचित या जनजाति से ताल्लुक रखती हैं।


रीति-रिवाज भी जिम्मेदार
महिला आयोग ने अपनी इस रिपोर्ट में बंगाल के कई क्षेत्रों शादी की पारंपरिक रीति- रिवाजों को तस्करी के लिए जिम्मेदार बताया है, जिसमें शादी के बाद दूल्हा- दुल्हन लापता हो जाते हैं, और कई बार ऎसे मामलों में पति ही अपनी पत्नी का सौदा कर देता है। लड़की के माता-पिता गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराते हैं, लेकिन पुलिस का लचर रवैया, शेल्टर होम्स का अभाव, हेल्प लाइन नंबर के ठीक से काम नहीं करने के कारण महिला तस्करी को रोकने में बड़ी बाधा है।

सख्त कानून की मांग
देहव्यापार के लिए लड़कियों और महिलाओं की तस्करी पर शिकंजा कसने के लिए महिला आयोग ने इमॉरल ट्रैफिकिंग प्रीवेंशन एक्ट 1956 को सख्त बनाने की मांग की है, और आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में घर के बड़े सदस्यों और लड़कियों को कार्यक्रमों के जरिए भी जागरूक करने की मांग की है। जांच में इस बात का खुलासा हुआ है कि एससी-एसटी प्रीवेंशन ऑफ एट्रोसिटी एक्ट 1989 के तहत कई मामलों में पुलिस केस भी दर्ज नहीं करती है, इससे महिला तस्करों को और बढ़ावा मिल रहा है। -एजेंसी

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

भारत में क्रिस्टी ने की पहली नीलामी


ब्रिटिश नीलाम घर क्रिस्टी ने गुरुवार को अपने इतिहास में पहली बार भारत में नीलामी की। यह सूचना स्थानीय आम सूचना साधनों द्वारा दी गयी। नीलामी में शामिल की गयी सबसे महंगी चीज़ भारतीय अमूर्त चित्रकार वासुदेव गायतोंडे द्वारा बनायी गयी एक शीर्षकहीन तसवीर रही जो करीब 33 लाख डालर में बिक गयी। नीलामी मुंबई में हुई।

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ग्रहक का नाम नहीं बताया गया। नीलाम की गयी दूसरी सबसे महंगी चीज़ तैय्यब मेहता का चित्र है जो 27 लाख डालर में बिक गया। इस नीलामी का विषय 20वीं सदी की भारतीय कला है। कुल मिलाकर उस में 83 कलाकृतियाँ पेश की गयीं जिन में पेंटिंगें, स्केच और मूर्तियाँ शामिल हैं। उनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर की कलाकृतियाँ भी शामिल हैं जिनको भारत की राष्ट्रीय संपदा माना जाता है।



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_ Alaknanda singh

नई पुस्‍तक: अजय- रोल ऑफ दी डाइस

भारत के महान महाकाव्य का दूसरा पक्ष भी हो सकता है इसको अपनी कल्‍पना व तथ्‍यों को नए रूप में प्रस्तुत करती है अजय।
आनन्द नीलाकान्तन की दूसरी पुस्तक - अजय पार्ट 1- रोल ऑफ दि डाइस, जय या सामान्य रूप से विख्यात महाभारत  की कहानी है लेकिन इसमें कुछ अलग बात है। इतिहास को विजेताओं द्वारा लिखा जाता है और हारने वाली पक्ष को निंदा सहनी पड़ती है और उसे चुप करा दिया जाता है। अजय- रोल ऑफ डाइस  में सुयोधन (जिसे तिरस्कृत रूप से दुर्योधन के रूप में जाना जाता है)- हस्तिनापुर के युवराज, कौरव वंश, उसके समर्थक जो कि अपने-अपने विश्वास के अनुसार मृत्यु तक लड़ते रहे, के पक्ष को मजबूती से पेश किया गया है।
पुस्तक की शुरूआत कौरवों और पांडवों के बाल्यकाल से होती है जिस दौरान प्रत्येक बालक द्वारा अपने अपने स्वभाव और कौशल को दिखाया जाता है, जिन्हें भावी घटनाओं में बड़ी भूमिकाएं निभानी हैं। भीम के पास शारीरिक और बाहुबल है लेकिन उसके पास दिमाग की कमी है। सुयोधन, मूर्खतापूर्ण दुस्साहस तक जोशीला तथा जिद्दी है। ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठर वह ब्राह्मण विचारधाराओं और मान्यताओं के रंग में रंगा हुआ था। राजकुमारों के बड़े होने के साथ साथ हस्तिनापुर के राजमहल में साजिश और भी गहरी होती चली जाती है, इसीकी छाया में उनकी शक्तिशाली माताओं की द्वन्द्वात्मक महत्वकाक्षाएं तथा शासक के प्रभुत्वशाली प्रतिनिधि के रूप में काम करने वाले भीष्म द्वारा लागू कड़ी क्षत्रिय आचार संहिताएं भी निहित थीं। निहित स्वार्थों के हाथों में भाग्य के मोहरे, चचेरे भाई तथा उनके संगी साथी, अपरिहार्य रूप से परस्पर विंध्वंसकारी द्वन्द्व तथा परम अराजकता की ओर अग्रसर होते हैं।
गुरू द्रोणाचार्य को आमतौर पर ब्राह्मण वंश के महान योद्धा के रूप में अभिकल्पित किया जाता है परंतु हमें यहां पर उसकी कुछ मूलभूत कमजोरियों या कमियों तथा उसकी कठोर विचारधारायें  भी देखने को मिलती हैं जिनके कारण वह कमजोर तथा घमंडी दोनों ही बन जाता है।हमारे देश में एकलव्य की कहानी तथा द्रोण के शिष्य बनकर एक कुशल धनुर्धर बनने की उसकी ललक से सभी परिचित हैं। अंतत:, द्रोण उसे गुरूदक्षिणा  के रूप में अपना अंगूठा काट कर देने के लिए कहते हैं। आमतौर पर इस बात का संबंध स्थापित नहीं किया जाता है कि द्रोण द्वारा इस भयावह अनुरोध को क्यों किया गया था। उसने कुन्ती से यह वादा किया था वह अर्जुन को इस धरा का सर्वाधिक सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाएगा। एकलव्य, जो कि एक गरीब निषाद (निम्न जाति) से संबंधित था, उसके रास्ते का रोड़ा था। कुरूओं ने, द्रोण की जीविका तथा उसके पुत्र के भविष्य को अपने हाथों में रखा था। उनकी कृपाओं के कारण ही द्रोण ने एकलव्य की प्रतिभा का हनन किया और उसे क्षत्रिय राजकुमार अर्थात अर्जुन को सौंप दिया।
आनन्द नीलकान्तन ने महाभारत  काल की सोच, जीवनशैली तथा जातिगत प्रभुत्व को बहुत ही शानदार ढंग से प्रस्तुत किया है जिसमें दक्षतापूर्वक युद्ध से पूर्व घटनाओं तथा चुनौतियों की श्रृंखलाओं को दक्षतापूर्वक बुना गया है जो अंतत: एक नाटकीय रूप से दुखद घटना से सहबद्ध हो जाती हैं। महाभारत  के परम्परागत व्याख्याकार उन तथ्यों की उपेक्षा करते हैं जिन्हें लेखक ने कुशलतापूर्वक अपने व्याख्यान में शामिल किया है; अर्जुन वह पहला व्यक्ति नहीं था जिसने द्रौपदी के स्वयम्बर  में मछली की आंख में तीर मारा था, बल्कि ऐसा कर्ण, अंग के राजा ने किया था; कृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा के दिल में सुयोधन के प्रति नफरत तथा अर्जुन के प्रति प्रेम पैदा किया था जिसके कारण उसने सुयोधन को छोड़कर कर अर्जुन से शादी की थी; वैदिक कानून के अनुसार एक महिला चार पुरूषों से शादी कर सकती है लेकिन इसके बाद उसे वेश्या माना जाता था। इसके ठीक उलट पांडवों के बीच में शत्रुता को रोकने के लिए कुन्ती ने इस कानून के प्रति आंखें मूंद लीं तथा द्रौपदी को पांच भाइयों की एक पत्नी बनने के लिए मजबूर किया गया।
पुस्तक में सुयोधन द्वारा उन मानकों के प्रति प्रश्नों का उल्लेख किया गया है जिनमें कुछ लोगों के उत्थान तथा शेष लोगों को निर्धनता की ओर धकेल दिया जाता है। उन्हें वरिष्ठ जातियों की मनमानियों के आधार पर जीवित रहने के लिए मजूबर किया जाता है। एक विरल तथा पारदर्शी रूप से पुस्तक में उसे दृढ़ प्रतिबद्धताओं को मानने वाला व्यक्ति दर्शाया गया है। यहां तक कि जब अर्जुन द्वारा उसके पहली प्रेमिका अर्थात सुभद्रा को छीन लिया जाता है, वह विरोध नहीं करता है तथा इस बात को समझता है कि सुभद्रा ऐसा चाहती होगी न कि उसके चचेरे भाई की ऐसी चाहत रही होगी। सुयोधन को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है जो कि दृढ़तापूर्वक इस बात पर यकीन करता है कि शिक्षा, पुरस्कार तथा मान्यता का आधार गुण होने चाहिए न कि जाति। वह परम्परागत व्यहार के युग में अकेला ही अपनी बात को कहता है। पुस्तक के चरम बिन्दु पर, शिक्षा अध्ययन की समाप्ति पर, जब अर्जुन जाति के आधार पर कर्ण से द्वन्द्व करने के लिए इंकार कर देता है, तो इसी सुयोधन द्वारा हर मानक को तोड़ा जाता है और वह कर्ण को अर्जुन के समकक्ष बनाने के लिए उसे अंग देश का सम्राट नियुक्त कर देता है जिसके कारण उसे कुलीन वर्ग तथा पुरोहितों दोनो की ही नाराज़गी का सामना करना पड़ता है
शकुनि, जो गंधार का राजकुमार है तथा पारिवारिक लड़ाई-झगड़े पुरोधा है। उसे आमतौर पर परम्परागत व्याख्याकारों द्वारा न उठाई गई अनेक बुराईयों के साथ प्रस्तुत किया गया है। जीवन्तता के साथ, हम यह देखते हैं कि किस प्रकार से भारत को नष्ट करके उसके मन में प्रतिशोध की ज्वाला धधकती रहती है और उसके द्वारा उठाए गए हर कदम के पीछे यही बदले की आग काम करती है कि किस प्रकार से भीष्म ने उसके स्वयं के देश गंधार को नष्ट किया था, उसकी बहन राजकुमारी गंधारी का अपहरण किया था ताकि उसे हस्तिनापुर के नेत्रहीन राजकुमार धृतराष्ट्र की पत्नी बनाया जा सके। वह बहुत ही चतुर तथा समझदार है, और वह सुयोधन को युधिष्ठर, जो कि जुआ खेलने का शौकीन है, को द्युतक्रीड़ा में चुनौती देने का सुझाव देता है। उसके पिता की हड्डियों से बने हेरफेर किए जा सकने वाले पांसों के साथ खेलते हुए, शकुनि द्वारा कौरवों की तरफ से तब तक जीत हासिल की जाती है, जब तक कि पांडव अपना सबकुछ –जमीन, सम्पत्ति, जाति तथा यहां तक कि उन सभी की एक पत्नी द्रौपदी को भी नहीं हार जाते हैं। जब द्रौपदी को कौरव वंश के सामने लाए जाने का आदेश दिया जाता है, तो पुस्तक यहीं समाप्त होती है जबकि द्रौपदी का भाग्य अब कौरवों के हाथ में होता है।

यही समीक्षात्‍मक व्याख्या ''अजय'' बुक के दूसरे पार्ट अर्थात् 'राइज ऑफ काली' के साथ जारी रहेगी, संभवत: जिसे 2014 में जारी किया जाना है।
Book- AJAYA- Role of the Dice
Author- Anand Neelkantan
Publication- Leadstart publication

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

कबूतरों की तरह आंख क्‍यों मूंदे रहें हम ?

कल पूरा दिन 16 दिसंबर के बलात्‍कार कांड पर जिस तरह कैंडल मार्च और बयानबाजी की होड़ सी लगी रही उसने महिला सुरक्षा से संबंधित एक साथ कई बिन्‍दुओं पर सोचने को विवश कर दिया। मैं पूरे दिन, दिन के उजाले में निकाले जाने वाले कैंडल मार्च देखती रही, उनमें घटना की गंभीरता से कतई अनजान हंसते-खेलते लोगों को देखा, इलेक्‍ट्रोनिक मीडियाई बहस में शामिल होने वाली शख्‍सियतों को देखा, अपने गांव से लेकर दिल्‍ली तक मकान, रोजगार व अन्‍य सुविधाभोगी वस्‍तुओं को राज्‍य व केंद्र सरकार की अनुकंपा से जुटाने वाले मां- बाप के आंसुओं में सराबोर कहानी देखी व सुनी...बड़ा अजीब था सब-कुछ, एकदम घालमेल हुए जा रहे थे सारे सीन।
इस पूरे दिन के आक्रोष और अपनी-अपनी तरह से भावनाओं को कैश करते लोगों के बीच गायब होती जा रहीं वो घटनायें भी मुझे साल रहीं थीं जिनका ग्राफ मेरे सामने था, यह बताने के लिए कि आज हम किसी बलात्‍कार को किस तरह लेते हैं, यह मात्र एक घटना बनता है या इससे भी इतर कुछ और सोचने पर बाध्‍य करता है, क्‍या यह लिंगानुपात के गड़बड़ाने का ख़ामियाजा है जिसे औरतें-लड़कियां चुका रही हैं या कानूनी और सामाजिक जवाबदेही को आईना दिखा रहा था।  
इसी संदर्भ में एक रिपोर्ट पढ़ रही थी जिसे न्‍यूज एजेंसी रायटर्स के माध्‍यम से हाल ही में लंदन की कानूनी सहायता देने वाली संस्‍था ''TrustLaw (www.trust.org/trustlaw)'' संस्‍था द्वारा 'महिला सुरक्षा' की बावत, एक सर्वे के रूप में जारी किया गया।
इसमें ''महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक'' देशों की श्रेणी में भारत को  अफगानिस्‍तान- कांगो- पाकिस्‍तान के बाद चौथे नंबर पर रखा गया है। सर्वे का आधार भ्रूण हत्‍या से लेकर जघन्‍य बलात्‍कार तक होने वाले अपराधों की संख्‍या को बनाया गया है।
गौरतलब है कि TrustLaw ने सिर्फ सरकारी व अधिकृत आंकड़ों को ही अपने सर्वे का आधार का आधार बनाया है। इनमें वो आंकड़े और हकीकतें शामिल नहीं हैं जो तमाम कारणों से सरकारी फाइलों तक पहुंच ही नहीं सके। TrustLaw ने पूर्व गृहसचिव मधुकर गुप्‍ता से प्राप्‍त अधिकृत जानकारी के आधार पर दर्ज़ किया कि करीब 100 मिलियन (दस करोड़) महिलायें प्रतिवर्ष ह्यूमन ट्रैफिकिंग में झोंक दी जाती हैं तो दूरदराज़ के गांवों से शहरों में मजदूरी और घरेलू नौकरी का लालच देकर लाई गई तमाम बच्‍चियां और औरतें वेश्‍यालयों के हवाले कर दी जाती हैं, यदि उन्‍हें सामाजिक संगठन छुड़ा भी लें तो उनके ही परिवारीजन उन्‍हें स्‍वीकार नहीं करते । सर्वे रिपोर्ट में बालिग होने से पूर्व ही शादी और भ्रूण हत्‍या के ज़रिये गायब हुई लड़कियां तो पूरी महिला-आबादी का 44.5% बतायी गईं। विश्‍व में हम चाहे कितनी भी तरक्‍की का ढिंढोरा पीट लें मगर इस सर्वे से इतना तो ज़ाहिर हो ही गया कि देश में महिलाओं की स्‍थिति व उनकी सुरक्षा को लेकर विश्‍वभर में हमारी छवि सवालों के घेरे में आ गई है।
नैतिकता की बात तो सामाजिक स्‍तर पर इतना पीछे धकेल दी गई है कि आज घर में ही माता पिता अपने बच्‍चों, खासकर बेटों को, रिश्‍तों की अहमियत नहीं बता पाते। संस्‍कारों की बात को पिछड़ेपन की निशानी और इमोशंस को टैक्‍नोलॉजी के सहारे छोड़ा जाना महिलाओं के लिए जानलेवा बन गया है। अब अकेली निर्भया ही क्‍यों, आसाराम बापू..नारायण साईं...से लेकर तरुण तेजपाल व जज अशोक गांगुलिओं से पीड़ितों की...लंबी फेहरिस्‍त है जिन्‍होंने 'शिकारियों' समेत नैतिकता और समाज के सारे स्‍थापित नियमों का वो चेहरा सामने ला दिया है जिससे घिन आती है। बहरहाल, इसका इलाज भी खुद हम ही ढूढ़ सकते हैं। इसका हल कैंडल मार्च और आंसुओं भरी दासतां से अब आगे बढ़ना चाहिये। बस ।
इसका इलाज ढूंढने के लिए एकबार हमें फिर उस सनातनी दौर में लौटना होगा जिसने धर्म को साथ लेकर बड़े ही वैज्ञानिक और सामाजिक तरीकों से इंसानी मनोदशा का न केवल अध्‍ययन किया बल्‍कि हर समस्‍या का सहज व सरल उपाय भी दिया। सनातन धर्म में निहित संस्‍कारों की बुनियाद को जब से हमने खोखले आदर्श बताकर खारिज करना शुरू किया है तभी से हम सामाजिक विकृतियों के शिकार हो रहे हैं। यकीन न हो तो थोड़ा सा समय निकाल कर उस ओर मुड़कर देखिए.....यक़ीनन सच्‍चाई का अहसास जरूर होगा...और उन खामियों का भी जिनका बड़ा खामियाजा आधी आबादी को भुगतना पड़ रहा है।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

गीता जयंती पर विशेष: धर्म संस्‍थापनार्थाय...

कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सग्ङोस्त्वकर्मणि।।
अर्थात्
"तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए  तू कर्मों के फल की इच्‍छा मत कर तथा तेरी कर्म 'न' करने में भी  आसक्ति न हो।।"
इस सहित करीब 700 श्‍लोकों को बोलने में लगभग 4 घंटे का समय  लगता है मगर कृष्‍ण ने अर्जुन को 'साइकिकली कम्‍युनिकेट' करके इसे  महाभारत का अध्‍यात्‍मिक रणवाक्‍य बना दिया जो आज भी अक्षरश:  हमारे जीवन में लागू होता रहता है और जब हम ऐसा नहीं कर पाते तो  अतिक्रमणवादी हो जाते हैं, ये निश्‍चित है। फिर चाहे वह अतिक्रमण  किसी भी स्‍तर पर हो। अतिक्रमण से क्‍लेश और युद्ध का जन्‍म लेना  स्‍वाभाविक है। सो इन विकट होती स्‍थितियों को जनकल्‍याणकारी बनाने  का एक सुनिश्‍चित मार्ग है श्रीमद्भगवद्गीता।
आज के दिन यानि मार्गशीर्ष महीना, शुक्‍लपक्ष की एकादशी (मोक्षदा) को  ऐतिहासिक व पौराणिक दृष्‍टि से महत्‍वपूर्ण श्रीमद्भगवद्‌गीता शब्‍दरूप में  जनकल्‍याण के लिए श्रीकृष्‍ण द्वारा कही गईं। महाभारत की महागाथा में  श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया यह  कर्म-संदेश एक उपनिषद् है जिसमें अलग अलग 11 उपनिषदों का  ज्ञान-मर्म समाया है।
श्रीकृष्‍ण ने जानबूझकर इसकी पृष्ठभूमि युद्धक्षेत्र रखी ताकि सिर्फ अर्जुन  ही नहीं बल्‍कि आज (वर्तमान) तक और आने वाले (भविष्‍य) समय में  भी ये संदेश दिया जा सके कि जीवन की समस्याओं में उलझकर उन  से पलायन करना कायरता है, पुरुषार्थ नहीं। महाभारत के महानायक  अर्जुन की तरह ही हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में हताश  हो जाते हैं और यही हताशा यही अनिश्‍चयकारी व विनाशकारी हो जाती  है। श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को माध्‍यम बनाकर दरअसल पूरी मानवजाति के  लिए संदेश दिया कि स्‍वकर्म करो, सफलता निश्‍चित है।
श्रीकृष्‍ण कहते हैं, ''पार्थ! अपने कर्म को अपने स्वभाव के अनुसार सरल  रूप से करते रहो, अपनी आत्‍मा के लिए करो। निजस्‍वभाव से किया  गया कर्म प्राकृतिक होगा, और जो प्राकृतिक होगा वह अनिष्‍टकारी हो ही  नहीं सकता। अनिष्‍ट वही करेगा जो अप्राकृतिक हो, जो अप्राकृतिक है  उसके अनैतिक होने की संभावना है और अनैतिकता कभी भी  धर्मस्‍थापना या धर्मपालन नहीं करेगी, ये निश्‍चित है। सो हे योद्धा! तू  निजकर्म कर, युद्ध कर, धर्मस्‍थापन के लिए। स्वाभाविक कर्म करते हुए  बुद्धि का अनासक्त होना सरल है अतः इसे ही निश्चयात्मक मार्ग मान।''
समस्‍या से भयभीत होने और पलायन करने का अपुरुषार्थकारी काम
जीवन की श्रेष्‍ठता को अनुपयोगी बना देता है और जो अनुपयोगी है उसी  को कर्मशील बनाने के लिए श्रीकृष्‍ण ने गीता के कर्मप्रधान होने का  प्रेरणादायी संकलन हमें उपलब्‍ध कराया यानि हम जैसे हैं वैसे ही अपनी  मूलप्रकृति के अनुरूप आचरण करें, धर्म का मोलभाव नहीं किया जा  सकता इसलिये उचित कर्तव्‍य करें।
गीता जयंती पर इतना ही कहना है कि अब फिर से समय हमें इस  महाग्रंथ के एक एक श्‍लोक की ओर ले जा रहा है कि अब तो मानवता  व धर्मस्‍थापन के लिए एकजुट हो जाना चाहिए।
- अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

महायोद्धा की महागाथा है अर्जुन

भारतीय पौराणिक साहित्‍य में महाकाव्‍य महाभारत की कथाओं को आम जनमानस सर्वाधिक अपने करीब पाता आया है और संपूर्ण महाभारत भगवान कृष्‍ण द्वारा अर्जुन से कहे गये गीता के उपदेशों में सिमट आती है अर्थात् कृष्‍ण और अर्जुन के आसपास घूमती कथाओं और इनमें सिमटे जीवनदर्शन को आमजन ने सर्वाधिक करीब से देखा और इस तरह इसके केंद्रबिंदु बने कृष्‍ण और अर्जुन।
पौराणिक अध्‍ययनकर्ताओं के अनुसार गीताप्रेस गोरखपुर ने कुछ वर्षों पहले 16 खंडों में महाभारत का प्रकाशन किया था और इन 16 खंडों में जितनी भी कथायें अर्जुन से संबंधित थीं, वे सभी अगर एक स्‍थान पर देखनी हों तो अनुजा चंद्रमौलि द्वारा लिखी हुई पुस्‍तक ''अर्जुन'' को देखना-पढ़ना एक सुखद अनुभव रहेगा।अंग्रेजी माध्‍यम के पाठकों के लिए पौराणिक महत्‍व की पुस्‍तकों को वैज्ञानिक व सामाजिक दृष्‍टिकोण से सामने लाने में लीडस्‍टार्ट पब्‍लिकेशन ने कई लेखकों का व उनकी कृतियों का परिचय समय समय पर हमसे कराया है। इसी श्रंखला में लीडस्‍टार्ट पब्‍लिकेशन की प्‍लेटिनम प्रेस द्वारा प्रकाशित और अनुजा चंद्रमौलि द्वारा लिखी गई पुस्‍तक -
''Saga of a Pandava Warrior - Prince ARJUNA '' महाभारत के धनुर्धर नायक अर्जुन को जानने का सर्वथा उचित माध्‍यम जान पड़ता है। मूलत: अंग्रेजी भाषा में लिखी गई यह पुस्‍तक पाण्डव योद्धा राजकुमार अर्जुन की गाथा को इतना विस्‍तृत रूप में पढ़कर ये तो कहना ही पड़ेगा कि लेखिका अनुजा ने जिस भाषागत सरलता व गाथाओं के मर्मस्‍पर्शी शिल्‍प का प्रयोग किया है उसकी प्रशंसा किये बिना कोई नहीं रह सकता।
पुस्‍तक की अलग अलग कथाओं में किसी प्रकरण को अर्जुन के द्वारा बताया जाना तो कहीं लेखिका द्वारा सुनाया जाना, कथाओं में विविधिता लाने के उद्देश्‍य से किया गया है, हालांकि इसे प्रथम दृष्‍टया पढ़कर भ्रम की स्‍थिति उत्‍पन्‍न होती है कि कथा कौन कह रहा है, पाठक किस को लेकर पात्रों को अपने करीब महसूस करे । सभी कथायें सर्वथा शुभ माने जाने वाले 21 भागों में विभाजित की गई हैं , इसलिए कोई भी कथा नीरसता से दूर रही। पूरी पुस्‍तक में अर्जुन के जन्‍म, उनका पालन पोषण, अर्जुन में संबंधों का निर्वाह करने की कुशलता , पारिवारिक मूल्‍यों के लिए किये जाने वाले त्‍याग, भाइयों के सुख व एकता के लिए सर्वाधिक प्रिय द्रोपदी से दूरी बनाये रखना और जहां  उनके नायकत्‍व को एक आयाम देता है, वहीं कृष्‍ण के प्रति उनका प्रेम-विश्‍वास, क्षत्रियोचित दृढ़ता के साथ साथ तत्‍कालीन राजनैतिक परिस्‍थितियों के अनुरूप विवाह करना और उन्‍हें सम्‍मानपूर्वक निभाना आदि कुछ विशेषताओं ने अर्जुन को संपूर्ण महाभारत के केंद्र में ला दिया। संभवत: लेखिका को भी ''अर्जुन'' इन्‍हीं विविधताओं के कारण अपने लेखन के लिए उचित ''नायक'' लगे ।
अनुजा द्वारा लिखी इस पहली कृति ने हमें यह उत्‍सुकता व भरोसा दोनों दिया है कि हमें हमारे इतिहास के पौराणिक महत्‍व को पुन: नये सिरे से जानने के अवसर असीमित हैं । अनुजा के ''अर्जुन'' न केवल पढ़ने योग्‍य हैं बल्‍कि इसे यदि नई पीढ़ी में पारिवारिक मूल्‍यों व संस्‍कारों को आधुनिक समय के अनुसार अपनाने का प्रयास करती कृति कहा जाये तो गलत ना होगा।    
Book : Saga of a Pandava Warrior-Prince 'ARJUNA'
Writer: Anuja Chandramouli,
       contact at - anujamouli@gmail.com
Publication : Platinum Press, An Imprint of --
             LEADSTART PUBLICATION Pvt.Ltd
             www.leadstartcorp.com

                                                                                                   - अलकनंदा सिंह,
                                                                                                      www. Legendews.in

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

ऐतिहासिक चित्रों की नीलामी 19 को

मुंबई। 
नीलामी गृह "क्रिस्टी" भारतीय चित्रकारों की उन कलाकृतियों की भारत में ही नीलामी करेगी जिन्हें "राष्ट्रीय सम्पदा" माना जाता है। नीलामी का आयोजन मुम्बई में 19 दिसंबर को किया जाएगा। "क्रिस्टी" के एक प्रवक्ता ने नीलामी का आयोजन भारत में करने का यह कारण बताया है कि भारतीय संग्रहकर्ता "क्रिस्टी" द्वारा आयोजित कई अंतर्राष्ट्रीय नीलामियों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
मुम्बई में रवीन्द्रनाथ टैगोर, अबनीन्द्रनाथ टैगोर, गगनेंद्रनाथ टैगोर, नंदलाल बोस, जामिनी रॉय और अमृता शेरगिल जैसे चित्रकारों के 83 चित्रों की नीलामी की जाएगी।

चंद्रप्रकाश देवल को बिहारी पुरस्कार

नईदिल्‍ली। 
के. के. बिड़ला फाउंडेशन ने वर्ष 2013 के 23वें बिहारी पुरस्कार के लिए चंद्रप्रकाश देवल के राजस्थानी भाषा में लिखे गये काव्य संग्रह हिरणा़ मूंन साध वन चरणा को चुना गया है।फाउंडेशन द्वारा यहां आज जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। बिहारी पुरस्कार के रूप में एक प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और एक लाख रूपये का पुरस्कार दिया जायेगा।
इसमें बताया गया है कि वर्ष 2013 का 23वां बिहारी पुरस्कार राजस्थानी भाषा के लेखक चंद्रप्रकाश देवल को दिया जायेगा। यह पुरस्कार उनके काव्य संग्रह हिरणा़ मूंन साध वन चरणा के लिये दिया जायेगा।
बिहारी पुरस्कार राजस्थान के हिन्दी या राजस्थानी भाषा के लेखकों को प्रदान किया जाता है। पहला बिहारी पुरस्कार 1991 में डा़ जयसिंह नीरज को उनके काव्य संग्रह ढाणी का आदमी के लिए प्रदान किया गया था।
- एजेंसी

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

पराजितों के मनोविज्ञान की गाथा है..... 'असुर'

मुंबई । 21वीं सदी का वर्तमान युग, पौराणिक गाथाओं को वैचारिक कसौटी पर कसे जाने का युग है और इस युग में ऐसे कहानीकारों और उपन्‍यासकारों का सामने आना कम से कम नई पीढ़ी और नई सोच वालों के लिए बेहद अहम है जो गाथाओं को वैज्ञानिक तथ्‍यों के साथ सामाजिक सरोकारों से भी जोड़कर देखते हैं या देखने को आतुर रहते हैं।
भारतीय संस्‍कृति के अनुसार अपने लेखन को माता-पिता को समर्पित करने वाले तथा उन्‍हें अपना पौराणिक ज्ञान का प्रेरणास्रोत बताने वाले लेखक आनंद नीलकांतन की कृति ASURA : TALE OF THE VANQUISHED अर्थात् ''असुर : पराजितों की कहानी'' है। ये न केवल अपने ध्‍येय को साधती है बल्‍कि हमें सावधान भी करती है, कि समाज के द्वारा प्रतिपादित जन ही नायक हों या हमारे आराध्‍य हों, ऐसा आवश्‍यक तो नहीं। समाज में वे भी हमारे लिए सोचने का विषय हो सकते हैं जो वंचित हैं, शोषित हैं या जिन्‍हें जीतकर कोई अभिजात्‍य वर्गीय 'नायक' बना।

संभवत: पहली बार असुरों को घृणा की दृष्‍टि से देखने वाले समाज को लेखक आनंद ने यह सोचने पर विवश किया है कि प्रत्‍येक सच का एक दूसरा पहलू भी होता है जिसे पूर्णरूपेण न जानकर हम उसके साथ अन्‍याय ही करते हैं।

लीडस्‍टार्ट पब्‍लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक 'असुर' में निश्‍चितत: ही पुस्‍तक का नायक रावण है और शुरू से अंत तक पूरी कहानी को वह अपने दृष्‍टिकोण से व्‍याख्‍यायित करता जाता है। हालांकि लेखक आनंद ने मानवजनित गलतियों का ठीकरा, किस तरह जनता को भोगना होता है, इसे भी बखूबी बयान किया है। पुस्‍तक में सोच का धरातल सामान्‍य रखा गया है जहां दो सभ्‍यताओं के वाहक हैं, उनके बीच द्वंद हैं, महात्‍वाकांक्षाओं के टकराव हैं, सुर यानि संभ्रांतजन और असुर यानि वंचित-शोषित-असभ्‍य, एक ओर अपनी दस विशेष शक्‍तियों के साथ अतिमहात्‍वाकांक्षी रावण है तो दूसरी ओर संभ्रांत समाज को हांकने वाले समाज के प्रतिपादित नायक देवगण हैं।

पुस्‍तक में लेखक आनंद रावण के माध्‍यम से यह बताने में सफल हुये हैं कि एक सामान्‍यजन अपनी महात्‍वाकांक्षाओं से आत्‍मबल विकसित कर ले तो वह अद्भुत-अभूतपूर्व बन सकता है, वह समाज में व्‍याप्‍त सामंती सोच और श्रेष्‍ठता के पक्षपाती मानदंडों को आमजन के लिए सुलभ बना सकता है।

वर्तमान में जो स्‍थितियां हमारे समाज में अवनमन का कारण बनी हुई हैं, देखा जाये तो आनंद का ये 'असुर' समाज के स्‍थापित दकियानूसी कायदे कानूनों से जूझने का व सामंती सोचों को बदलने का एक उपक्रम दिखाई देता है। पुस्‍तक में कहानी को रावण के माध्‍यम से कहा जाना, हो सकता है कि प्रथमदृष्‍टया अतिशीघ्र प्रचार पाने का माध्‍यम लगे परंतु पौराणिक गाथाओं को लेकर कुछ अलग सोचने वालों के लिए लेखक की यह कोशिश शोध का विषय तो होगी। यूं भी लकीर के फकीर न बनना और समाज को गाथाओं के दबे पक्ष से परिचित कराये रखना आज के साहित्‍यवर्ग में भारी चुनौती है जिसे आनंद ने बखूबी पार किया है।नि:संदेह आज के प्रयोगवादी व वैचारिक प्रगतिवादी युग में सभी के लिए 'असुर' एकउत्‍कृष्‍ट कृति है।       

Book :  ASURA- Tale of the  vanquished

Author : Anand neelkantan

Publication : Platinum Press, An Imprint of --
 LEADSTART PUBLICATION Pvt.Ltd

 -अलकनंदा सिंह,   Legend News

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

पूर्ण तो करना बाकी है....अभी

5 दिसंबर: श्री अरविंद की पुण्‍यतिथि पर विशेष


एक वाकये से शुरुआत करना चाहूंगी जिसे कहीं बहुत पहले पढ़ा था मैंने कि- जब गुरू रवीन्‍द्रनाथ टैगोर अपनी मृत्‍यु के कुछ क्षण पहले आंखें मूंदे पड़े थे तो किसी मित्र ने सांत्‍वना देने के लिहाज से उनसे कहा कि तुम ने अब तक बहुत कुछ कर लिया..बहुत कुछ पा  लिया...बहुत कुछ गुन लिया...बहुत कुछ गा लिया ..बजा लिया...लिख पढ़ लिया ...अब तुम अपने मन को एकदम शांत रखो और ईश्‍वर के चरणों में मन रमाओ। गुरूदेव ने तुरंत अपनी थकी हुई .. अलसाई सी आंखों में चमक लाकर लगभग गुस्‍साते हुये उस मित्र से कहा - ये क्‍या बकवास करते हो...मैं अभी तक कुछ गा कहां सका हूं..मैं तो अभी तक साज ही जमा रहा था...कभी मृदंग, तो कभी सितार, तो कभी बांसुरी को उलट पलटभर पाया हूं....जिसे तुम या और लोग मेरा गाना समझ रहे थे वो तो अभी तक गाने की तैयारी मात्र थी बस ! गाना तो अभी सीखना है , उसमें पहले मन रमाना होगा तब कहीं जाकर  सुर साध पाऊंगा...और देखो मैं इस तरह बिना गाये ही संसार से चले जा रहा हूं, इसका मुझे खेद हो रहा है...मैं बिना गाये मरना तो नहीं चाहूंगा...इस अधूरेपन के साथ मुझे शांति किस तरह मिलेगी भला...  ।
यूं तो आज से दो दिन बाद अर्थात् 5 दिसंबर को मनाये जानी वाली श्री अरविंद की पुण्‍यतिथि पर गुरू रवीन्‍द्रनाथ टैगोर को लेकर इस वाकये का ज़िक्र करना आपको कुछ अटपटा जरूर लग रहा होगा मगर जो कुछ श्री अरविंद के बारे में कहना है, वह इसके बिना पूरी तरह से कहा भी नहीं जा सकता। 'विज्ञान के दर्शन को कविता में ढालने' की अद्भुत क्षमता के कारण ही श्री अरविंद एकमात्र ऐसे व्‍यक्‍ति हुए जो पूरी तरह से अलग दिखने वाली तीन धाराओं का सम्‍मिश्रण कर सके। विज्ञान विकास की बात करता है तो दर्शन बुद्धि और आध्‍यात्‍म की सीढ़ी है और कविता ...कविता न तो विज्ञान के नियमों को मानती है और न दर्शन की बुद्धिवादिता को, फिर भी श्री अरविंद ऐसा कर पाने में समर्थ रहे कि तीनों को एक ही दृष्‍टि से तीन तीन कोणों से देखा जा सके।
पश्‍चिमी शिक्षा के प्रभाव को श्री अरविंद के दर्शन में बड़े स्‍तर पर पाया जाता है जो हमेशा वैज्ञानिक तरीके से अपने तर्क प्रस्‍तुत करता है, सब-कुछ सटीक दिखाने की कोशिश में परफेक्‍शनिस्‍ट बनने को प्रेरित करता है। श्री अरविंद का दर्शन उनके गणितज्ञ होने को भी दिखाता है । जो खालिस गणितज्ञ है या विज्ञानी सोच के  दायरे में रहता है, वह बेहद कैलकुलेटिव भी हो जाता है और जो कैलकुलेटिव हो जाता है वह संसार के अस्‍तित्‍व को भी गणित के ज़रिये ही हल करना चाहता है । ऐसा करने में बुद्धि एक उपकरण बन जाती है
और उपकरणों से प्रयोग किये जा सकते हैं ...बहुत ज्‍यादा बुद्धिवादियों के बीच पहुंचा जा सकता है ..उन्‍हें शरीर से लेकर आत्‍मा के विकास की कैमिस्‍ट्री समझाई जा सकती है मगर यही उक्‍ति कुछ कम बुद्धिवालों पर फिट नहीं बैठती...वहां तर्क नहीं चलते ..वहां कोई स्‍थापित नियम नहीं चलता ...सब कुछ अपने हृदय के स्‍पंदन पर निर्भर करता है। कम ज्ञानियों में बुद्धि पर हावी रहता है हृदय का स्‍पंदन । उनमें विचार होता है मगर वह वैज्ञानिक कसौटियों पर उतरने को कतई तैयार नहीं होता ,उसका अपना ही सिद्धांत होता है कि जो महसूस हुआ ..वह तो है ...महसूस हो रहा है तो ईश्‍वर भी है और जीवन भी और नहीं हो रहा तो किसी भी गणित से उसे महसूस नहीं करवाया जा सकता ..अर्थात्  हृदय वालों के लिए बाकी सब थ्‍योरी बेमानी होती हैं।
श्री अरविंद ने अपने महाकाव्‍य सावित्री के ज़रिये जो आत्‍मा और योग के नये सूत्रों का विचार किया, वह निश्‍चितत: ही नया और अद्भुत प्रयोग सिद्ध हुआ है विश्‍व में परंतु वह आम जनमानस में रवीन्‍द्रनाथ टैगोर से कुछ अलग रहा । श्री अरविंद हमेशा ही पूर्णता के सिद्धांत की बात करते रहे , हमेशा पूर्णता के अनुभव बांटते रहे और कविता में भी वे पूर्णता को पाने के लिए लालायित रहे । भारतीय जनमानस में पूर्णता को सिर्फ ईश्‍वर तक ही माना गया है वह कभी मनुष्‍य में समायेगी, ऐसा कम सोचा जाता है । पूर्णता की उच्‍चता के कारण श्री अरविंद का आमजन  में 'प्रभाव' किसी तरह कम रहा, ये तो हरगिज़ नहीं कहा जा सकता परंतु यह तो निश्‍चित है इसी 'पूर्णता' के कारण ही वह आमजन से उतना घुलमिल नहीं पाया, जितना टैगोर का प्रभाव आमजन में घुला हुआ था ।
इसीलिए मुझे आज कहीं पढ़ी हुईं रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की उक्‍त पंक्‍तियां  याद हो आईं कि अभी  तो मैंने साज संभाले हैं ...अभी गाया कहां है..गाना तो शेष है... सब-कुछ अपूर्ण है ...पूर्ण करना बाकी है...इसीलिए अपने अपने समय में श्री अरविंद और रवीन्‍द्रनाथ दोनों ही सार्थक बने रहे। श्री अरविंद को याद करना यानि दर्शन सिद्धांतों की पूर्णता पर फिर से गर्व करने के अहसास को जीना है।
- अलकनंदा सिंह



सोमवार, 2 दिसंबर 2013

अंतर्राष्ट्रीय दासता उन्मूलन दिवस आज

आज यानि 2 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय दासता उन्मूलन दिवस मनाया जाता है | इसी दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानव-व्यापार और वेश्यावृत्ति से संघर्ष की अभिसंधि स्वीकृत की थी| यह दिवस मनाने का उद्देश्य यह है कि आधुनिक युग में दासता के जो रूप प्रचलित हैं उनसे संघर्ष किया जाए| इन रूपों में प्रमुख हैं - मानव-व्यापार, यौन शोषण, बाल-श्रम, ज़बरन विवाह, वधुओं की बिक्री, विधवाओं को धरोहर में दिया जाना, तथा सशस्त्र टकरावों में उपयोग के लिए बच्चों को ज़बरदस्ती भरती किया जाना|
आजकल संसार में दो करोड़ दस लाख स्त्री-पुरुष और बच्चे दासता में जी रहे हैं| - एजेंसी

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

कमल तो कमल ही रहता है...

धर्म और अपराध के घालमेल से उपजे अविश्‍वास ने आमजन को इतना भ्रमित कर दिया है कि यकायक आये किसी अच्‍छे समाचार पर भी हम आसानी से विश्‍वास नहीं कर पाते, लगभग भौंचक सी स्‍थिति में हैं आज वो सनातन धर्मावलंबी जो शंकराचार्यों को ईश्‍वरतुल्‍य मानते हैं , उनमें विश्‍वास रखते हैं  ।
कल जब से पुड्डुचेरी कोर्ट ने कांची काम कोटि पीठ के शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्‍वती को पिछले नौ वर्षों की लंबी अदालती लड़ाई के बाद बरी किया तो उनके अनुयायियों समेत अनेक सनातन   धर्मावलंबियों का तो अदालत के इस फैसले के बाद खुश होना लाजिमी था मगर इस बात की दाद दी जानी चाहिए कि स्‍वयं जयेंद्र सरस्‍वती ने शंकराचार्य पद की गरिमा के अनुरूप अपने सौम्‍य व्‍यवहार से अदालत के प्रति विश्‍वास और भरोसा बनाये रखा।
धर्म को व्‍यापार बना देने वालों की  यूं तो लंबी फेहरिस्‍त है और इन्‍हीं वजहों से धर्म व संतों की प्रतिष्‍ठा को समय समय पर आघात भी पहुंचता रहा है । फिर चाहे वह स्‍व. कृपालु जी के विवादित कृत्‍य रहे हों या आसाराम बापू कारनामे, सभी ने भी सनातन धर्म को और आस्‍थावानों की भक्‍ति भावना को भारी नुकसान पहुंचाया है । इनके अलावा नित्‍यानंदों - शिवानंदों की भी कमी नहीं रही है, जिन्‍होंने धर्म की आड़ लेकर वो सब किया जो एक सामान्‍य अपराधी कर सकता है, परंतु आज बात शंकराचार्य जैसी पदवी और उस पर बैठे बेहद सरल व सुलझे हुये व्‍यक्‍तित्‍व की हो रही है जिसके प्रति आदर व आस्‍था कोई प्रपंच करके हासिल नहीं की गई, तो निश्‍चितत: ये कहना पड़ेगा कि धर्म की विजय हुई। हालांकि जिस अपराध के लिए जयेन्‍द्र सरस्‍वती को उनके उत्‍तराधिकारी समेत दो दर्जन लोगों के साथ दोषी बताया गया था , उसका मूल अपराधी अभी तक पता नहीं चल पाया है और गुत्‍थी अनसुलझी ही रह गई है ।
 सनातन धर्म के सर्वोच्‍च प्रतिनिधि के तौर पर माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने जिन धार्मिक  व दार्शनिक परंपराओं को स्‍थापित किया , आज तक उन्‍हीं पद्धतियों पर चलकर धर्म को आमजन के बीच विस्‍तार दिया जा रहा है और ऐसे में जब कोई उंगली इन्‍हीं धर्मिक परंपराओं के निर्वाहकों पर उठती है तो उस संशय का निराकरण होना आवश्‍यक हो जाता है। कल आये निर्णय में समय भले ही नौ साल का लग गया हो मगर अब कोई संशय न रहा।
बहरहाल, इससे एक बात स्‍पष्‍ट हो जाती है कि सच्‍चा संत वही जो निरपेक्ष भाव से सभी स्‍थितियों में एक समान रहे और जयेन्‍द्र सरस्‍वती इसके प्रत्‍यक्ष उदाहरण बने।
इस पूरे प्रकरण से एक और बात महत्‍वपूर्ण यह निकल कर आई है कि  राजनैतिक दलों ने भी शंकराचार्यों की पीठों को अपने अपने हिसाब से बांट रखा है और इनके भव्‍य ऐशोआराम व शिष्‍यों में जिस तरह से वर्ग भेद कर रखा है, कोई ना कोई शंकराचार्य भी इसी तरह या तो राजनीति का शिकार होता रहेगा या फिर अपराधी तत्‍व इनके प्रांगणों में पनपते रहेंगे। बेहतर होगा कि राजनीति और अपराध की जुगलबंदी से  मठों व धर्म के पुरोधाओं को बचाया जाये अन्‍यथा सनातन धर्म की दुर्दशा निष्‍चित है।
- अलकनंदा सिंह


गुरुवार, 21 नवंबर 2013

‘नेशनल बुक अवार्ड’ से चूकीं झुंपा

वाशिंगटन। 
पुलित्जर पुरस्कार विजेता भारतीय मूल की अमेरिकी लेखिका झुंपा लाहिड़ी का नया उपन्यास ‘द लोलैंड’ काल्पनिक कथा श्रेणी में 2013 अमेरिकी ‘नेशनल बुक अवार्ड’ जीतने से चूक गया। यह पुरस्कार लेखक जेस मैकब्राइड की कृति ‘द गुड लॉर्ड बर्ड’ ने जीत लिया है। मैकब्राइड की रचना ‘द गुड लॉर्ड बर्ड’ 1850 दशक के एक युवा दास की यात्रा कहानी है जबकि लाहिड़ी का उपन्यास 1960 के दशक के कोलकाता निवासी दो भाइयों की कहानी है। कल्पित कथा श्रेणी के अंतिम दौर में जगह बनाने वालों में रशेल कुशनर की ‘द लैमथ्रोवर्स’, थॉमस यनछोन की ‘ब्लीडिंग ऐज’ और जॉर्ज सॉडंर्स  की ‘टेंथ ऑफ दिसेंबर’ शामिल थीं।
न्यूयॉर्क में हुए पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान निर्णायक मंडल ने मैकब्राइड की कृति की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘यह कृति कॉमिक जैसी ध्वनि दर्शाती है और अब तक मार्क ट्वेन की सुनी कृतियों जैसी ही वास्तविक है।’’ पुरस्कार जीतने के बाद 56 वर्षीय मैकब्राइड ने कहा कि वह पुरस्कार जीतने के बाद किए जाने वाले संबोधन के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे क्योंकि उन्हें यनछोन, लाहिड़ी और सॉडंर्स के आगे अपने जीतने की कतई उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कहा, ‘‘वह लाजवाब लेखक हैं। लेकिन यकीनन यहां रहना अच्छा है।’’
यह वार्षिक पुरस्कार नेशनल बुक फाउंडेशन द्वारा उन अमेरिकी लेखकों को दिया जाता है, जिन्होंने काल्पनिक कथा, कथेतर साहित्य, गद्य और युवा साहित्य के लिए काम किया हो। वहीं, कथेतर साहित्य पुरस्कार ‘द अनवाइंडिंग: ऐन इनर हिस्ट्री ऑफ द न्यू अमेरिका’ के लिए जॉर्ज पेकर ने जीता। गद्य पुरस्कार ‘इंकार्नडिन’ के लिए मैरी जिबिस्ट को मिला। इसके अलावा युवा साहित्य पुरस्कार सिंथियाका दोहता को उनकी रचना ‘द थिंग अबाउट लक’ के लिए दिया गया। लाहिड़ी (46 वर्ष) पिछले माह समकालीन कथा श्रेणी के प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘मैन बुकर प्राइज’ में कॉमनवेल्थ और आयरलैंड से पिछड़ गई थीं।
-एजेंसी

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

कैश,काइंड और हम कबीर

जीवन का सिक्‍का तो एक ही है ...उसके पहलू दो... कभी-कभी पहलुओं को जानने के  लिए फेंका गया सिक्‍का किसी एक तरफ गिरने की बजाय खड़ा रह  जाता है , एकदम हक्‍का-बक्‍का सा करता हुआ ...और असमंजस में रह जाते हैं हम परंतु बाजार में तब्‍दील हुई इस  दुनिया का सच बस इतना है कि जो फेंके जाने पर  खड़ा रह गया.. स्‍थिर हो गया..वो किसी तवज्‍जो के  लायक नहीं समझा जाता ।  अर्थात् जो खड़ा रह जाता  है वह अर्थहीन है । निरंतरता आवश्‍यक है, जीवन में  भी और बाजार में भी ।वर्तमान में तो कैश एंड काइंड के बीच झूलते  जीवन में हम, अब यह ढूंढ़ने पर बाध्‍य हैं कि आखिर  हम हैं क्‍या ...पूरा का पूरा एक सिक्‍का, या उसका कोई एक पहलू। या  फिर खड़े रह गये और हाशिये पर धकेल दिये गये  आमलोग..बस,इससे ज्‍यादा कुछ भी नहीं।
इसी बाजार पर बनते बिगड़ते जीवन को लेकर कबीर कहते हैं -
कबिरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर,
ना काहू से दोस्‍ती ना काहू से बैर।
बाजार के सिद्धांतों में ना तो वो समय कबीर के लिए  अलग था और न अब अलग है। बाजार तब भी अपने  अस्‍तित्‍व को उसी तरह आमजन पर हावी किये हुये  था।इसीलिए कबीर ने जो भी कहा वह दोस्‍ती और बैर को बाजारवाद से जोड़ कर ही देखा गया  । इसका सीधा मतलब था कि सिक्‍के का किसी एक पहलू की  ओर झुकना...जबकि जीवन में या तो दोनों पहलू हैं या नहीं हैं...और जब कोई पहलू नहीं दिखता तो जीवन का सिक्‍का स्‍थिर हो जाता है यानि किसी  एक पहलू की ओर ध्‍यान न देकर जो भी अच्‍छे-बुरे,  कम-ज्‍या़दा के बीच स्‍थिर हो गया वो ही कबीर बन  गया, निश्‍छल हो गया, निष्‍काम हो गया।  परंतु स्‍थिर  हो गया और स्‍थिरता बाजार के प्रवाह को नष्‍ट कर  देती है तो कबीर ने इसी नष्‍ट होते जाने की प्रक्रिया को  अपना ध्‍येय बनाया और दोस्‍ती व बैर के स्‍थापित बाजार पर  वे हावी होते गये, सिक्‍के के दो पहलुओं को मिलाया और  स्‍वयं बीच में खड़े हो गये।
इस तरह संस्‍कारों की नई परिभाषाओं ने जन्‍म लिया।तब भी  रूढ़ियों की जकड़न जिस समाज के लिए आकंठ डूबने  और धीरे धीरे मूल्‍यहीन होते जाने का कारण बनी, वह  भी तो बाजारवाद का सामाजिक रूप ही तो था जो  समाज के मूल्‍यों का तोलमोल कर रहा था।
उन्‍हें चुनौती देते हुये कबीर ने मनुष्‍य और परमात्‍मा  के बीच संबंधों पर नये सिरे से फिर बहस शुरू की  और स्‍थिति यहां तक पहुंची कि आज देखिये कि हम  सैकड़ों साल पुराने 'निरक्षर' कबीर को अपने शोधों का  विषय बनाने को बाध्‍य हुये।
प्रश्‍न तो अब यह उठता है कि यदि वे बाजार की  निरंतरता को ही जीवन का ध्‍येय बना लेते तो क्‍या  आज वे कबीर हो पाते, हम जो कि बाजार के लिए  सिक्‍के भर हैं, चाहे वह बाजार हमारी आम उपभोगी  वस्‍तुओं का हो या धर्म का, रूढ़ियों को और वीभत्‍स  बनाकर हमें 'स्‍वयं' से दूर करता जा रहा है।
संभवत:  यही कारण है कि हम स्‍वयं अपने भीतर के कबीर को  न तो पहचान रहे हैं और ना ही पहचानना चाहते हैं क्‍योंकि अपने कबीर को पहचानने के लिए स्‍थिर होना पड़ेगा, चित्‍त से भी और प्रवृत्‍तियों से भी मगर ऐसा हो नहीं पा रहा । नतीजा हमारे सामने हैं कि सिक्‍के के किसी एक पहलू  की भांति हमें बाजार के बीच नचाया जा रहा है। कभी  धर्म के नाम पर कभी रिवाजों के नाम पर ।इसीलिए  जन्‍म होता जा रहा है उन बाजारों का जहां आस्‍था   बिक रही है, अरबों का कारोबार करने वाले मनोरंजन  के साधन सामने आते जा रहे हैं , अभाव है तो बस उस इच्‍छाशक्‍ति का जो कबीर बनने में सहायक हो सके। देखते हैं बाजार अपनी और कौन कौन सी रंगत हमें दिखाता है जिसमें रंगे जाते हुये हम मौन न साधें तो अच्‍छा होगा।
- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 13 नवंबर 2013

ये ऊबे हुये लोगों का शगल है या...?

''हर सिक्‍के के दो पहलू होते हैं'' अकसर ये जुमला भारतीय जीवन दर्शन को  बेहद सकारात्‍मक ढंग से समझाने के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है। इसी प्रक्रिया  में जो अपने पास है उसकी खुशी मनाने और जो नहीं है, उसका शोक न मनाने  के लिए भी कहा जाता है।
आज एक सर्वे की रिपोर्ट पढ़ी जिसके अनुसार विश्‍वभर में होने वाली कुल  आत्‍महत्‍याओं में से एक बड़ा प्रतिशत विकसित देशों के उन लोगों का है जो  अपने जीवन से ऊबे हुये थे, सुविधा-समपन्‍नता से ऊबे हुये थे। इन्‍हें भौतिक  सुख-सुविधाओं में डूबने के बाद भी चैन नहीं मिला, वे कुछ और भी चाहते थे  जीवन से...अपने आप से, दोस्‍तों से, व्‍यवसाय से, नौकरी से और अपने परिजनों  से...।
मैं इस संदर्भ में अपने देश की उस सनातन सोच को धन्‍यवाद देती हूं जिसके  द्वारा स्‍थापित हर नियम में समग्र समाज के हित को साधकर चला गया और  उसी के आधार पर सबका कल्‍याण करने की परिपाटी बनी। तभी तो वसुधैव  कुटुंबकम की परिकल्‍पना साकार हुई। और जब बात समग्र की हो तो आत्‍महत्‍या  की वजह कम से कम ऊब तो कभी नहीं हो सकती। शायद यही कारण है कि  जीवनदर्शन के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाले हमारे देश की गिनती  इस सर्वे में नहीं है। यूं तो दर्शन शास्‍त्र में भी कहा गया है कि ऊबने का सीधा  सीधा संबंध सब्‍जेक्‍ट और ऑब्‍जेक्‍ट से है।
सर्वे के इस आंकलन में सब्‍जेक्‍ट हैं वो व्‍यक्‍ति जो अपनी विशेषता ''सुविधा  संपन्‍नता'' के अतिवाद से ग्रस्‍त हुए और आत्‍महत्‍या करने तक की स्‍थिति में  पहुंचे। निश्‍चित ही उन्‍हें अपनी संपन्‍नता को दर्शाने के लिए एक ऑब्‍जेक्‍ट की  तलाश रही होगी। किसी भी व्‍यक्‍ति को किसी वस्‍तु या जीवन से ऊब तभी हो  सकती है जब उसके पास संसाधन तो पर्याप्‍त हों परंतु उन्‍हें प्रयोग करने के लिए  कोई ऑब्‍जेक्‍ट मौजूद न हो। खैर, आत्‍महत्‍या की वजह चाहे जो हो लेकिन  नि:संदेह यह कायरता है, जीवन देने वाले ईश्‍वर का अपमान है।
दरअसल हर भारतीय के संस्‍करों में यह शामिल होता है कि जीवन है.. तो  कठिनाइयां भी हैं, कठिनाइयां हैं तो उन्‍हें पार करने की चुनौतियां भी। हर  भारतीय के जीवन का पल-पल चुनौतियों से जूझने और उससे पार होने की  कसौटी के पेंडुलम पर नाचता रहता है। हां, कुछ लोग इनसे घबराकर तो  आत्‍महत्‍या करते हैं मगर इसमें सुविधा-संपन्‍नता से ऊबे हरगि़ज नहीं होती।  विकसित देशों की इस 'ऊब' से हम यानि भारतीय कब तक अछूते रह पायेंगे,  यह कहना तो मुश्‍किल है मगर इतना अवश्‍य कहा जा सकता है कि यदि हम  अपनी लोकोक्‍तियों में निहित जीवन दर्शन पर अमल करते रहें और ''कम खाने  व गम खाने'' जैसी कहावतों का मर्म समझें तो देश में अति अमीर और अति  गरीब के बीच बढ़ती खाई को रोका जा सकता है और इससे नाकामियों के कारण  उपजी आत्‍महत्‍याओं को बहुत कम किया जा सकता है।
बस, जरूरत है तो उस सनातन जीवनदर्शन को फिर से समझने और समझाने  की, जहां बाकायदा हर उम्र के लिए एक नियत दर्शन उपस्‍थित है...जहां ब्रह्मचर्य  से लेकर संन्‍यास तक का प्राविधान है...जहां आत्‍महत्‍या के लिए न कोई जगह  तब थी और ना ही कोई वजह अब है।
 - अलकनंदा सिंह

रविवार, 10 नवंबर 2013

गोपाष्‍टमी: पर्व या औपचारिकता ?

ज़मीनी हकीकत और किताबों के बीच जब सामंजस्‍य नहीं होता तो अराजकता को प्राश्रय मिलना शुरू हो जाता है और ऐसा तभी संभव भी होता है जब इसी अराजकता की जड़ें तलाशने की बजाय उसके फलने फूलने पर व्‍याख्‍यान दिये जाते हैं। कुछ ऐसा ही सीन ब्रजभूमि में दिखाई दे रहा है। गौपालक गोपाल की ब्रजभूमि में।
एक अनुमान के अनुसार ब्रज चौरासी कोस में लगभग एक हजार गौशालायें हैं और हजारों की तादाद में साधु संतों का जमावड़ा है। भागवत वक्‍ताओं की भी अच्‍छी-खासी फौज है। गायों के नाम पर यहां दान के रूप में देश व विदेशों से आती करोड़ों की धनराशि....जैसी खबरें हमारे सामने एक ऐसी तस्‍वीर पेश करती हैं कि यदि धरती पर कहीं भी गायों को साक्षात् मां का दर्जा प्राप्‍त है तो वह अकेला ब्रज क्षेत्र है।
यहां एक ओर वृंदावन में ही गायों को भोजन कराने के लिए हर मंदिर के नुक्‍कड़ पर मुट्ठीभर हरा चारा हाथ लेकर खड़े होने वाले भिखारियों के बच्‍चे मिल जायेंगे तो दूसरी ओर बेशकीमती जमीनों पर बड़ी-बड़ी 'ए. सी.' गौशालायें बनाकर करोड़ों का दान हजम करने वाले भी कम नहीं होंगे।
इन सबके बीच जिसके नाम पर ये कारोबार चल रहा है, वो गौ माता कहीं या तो विलुप्‍त कर दी जाती है या उसे कूड़े-करकट के ढेर पर अपनी भूख मिटाने को भेज दिया जाता है। ये हकीकत जहां यह बताती है कि जो कुछ कहा जा रहा है या सुनाया जा रहा है, असल में गायों को माध्‍यम बनाकर धंधा करने के पारंपरिक तरीकों से हटकर और कुछ भी नहीं। यूं भी कह सकते हैं कि स्‍टाइल बदल गया है धंधे का। हां, इस नए तरीके में जिन गायों के नाम पर दान का धंधा चल रहा है, वे गायें कभी दानदाताओं के समक्ष रूबरू नहीं होतीं। सब-कुछ कागजों से चलता हुआ हवा में तैर रहा है....गाय भी और गौशाला भी। यदि कोई मौजूद हैं तो बस गायों के नाम पर दान के धंधेबाज।
अब प्रश्‍न उठता है कि जब इतना दान और इतने गौसेवी व इतनी गौशालायें अकेले इस धर्मनगरी में ही मौज़ूद हैं तो...तो... सड़कों पर मानवीय अपशिष्‍ट- कूड़े के ढेर पर मुंह मारती गायें कहां से आ रही हैं, क्‍यों पुलिस व चंद समाजसेवियों द्वारा आये दिन कट्टीघरों को जाता गौवंश पकड़ा तो जाता है लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की जाती। तभी तो इसे फिर से उन्‍हीं गलियों-चौराहों पर देखा जाता है और तभी वो सिर्फ दुत्‍कारों को पर जीवित रहने को विवश हैं जबकि इस हकीकत में वो तथ्‍य शामिल नहीं हैं जो कट्टीघर से जुड़े हैं ।
आज गोपाष्‍टमी पर पूरे ब्रज में गायों की सेवा, उनकी महिमा, उनके अंग में मौजूद देवी-देवताओं को लेकर बड़े-बड़े व्‍याख्‍यान देने की होड़ लगी रहेगी लेकिन इतिश्री हो जायेगी कल सारे अखबारों में मयफोटो के छपी खबरों से। इसमें गाय का साक्षात् रूप कहीं नहीं होगा....उसे तो हम किसी कूड़े के ढेर में मुंह मारते हुये ही देखेंगे। इस स्‍थिति के लिए ऐसा नहीं है कि सिर्फ गायों के नाम पर पैसा हजम करने वाले ही दोषी हों, बल्‍कि वे अधिक दोषी हैं जो पात्र-कुपात्र का ज्ञान किये बिना अपने पापों से पल्‍ला झाड़ने के लिए 'दान' की मंशा पाले यहां आते हैं।
बेहतर होगा कि गोपाष्‍टमी की औपचारिकता पूरी करने से पहले ब्रजवासी कोई ऐसा संकल्‍प भी लें जो कृष्‍ण के गौपालक होने की संज्ञा पूरी करता हो और जिससे ब्रजभूमि की गरिमा का आभास हो।
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

निशा की गली में तिमिर राह भूले....


कवि गोपालदास नीरज ने भी दीवाली के दीयों पर क्‍या खूब कहा है-
''जलाओ दिये, पर रहे ध्‍यान इतना
अंधेरा धरा पर, कहीं रह ना जाये....
नयी ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाये, निशा आ ना पाये |''
इसके अलावा उन्‍हीं की एक और कविता है ...
''अंधियारा जिससे शरमाये,
उजियारा जिसको ललचाये,
ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
मेरा गीत दिया बन जाये ''
इन दोनों ही कविताओं में नीरज ने 'दिये' को अपने भीतर का अंधेरा दूर करने के लिए एक प्रेरणा के तौर पर प्रयुक्‍त किया है, मगर इन्‍हें लिखते समय नीरज को ये तो पता नहीं ही रहा होगा कि दिए जलाने के लिए जो हौसला चाहिए, वह कहां मिलेगा ।
बाजारवाद ने उत्‍सव मनाने के हौसलों को अपना ग्रास बना लिया इसीलिए आज धरा के जितने भी अंधेरे हैं वे स्‍वयं हमारे ही नहीं, बल्‍कि 'दिए' की अपनी रोशनी के भी दिये हुये हैं।
वर्तमान में समाज के आर्थिक हालात अतिवाद से घिरे हुये हैं, समाज का अति विपन्‍न और अति सम्‍पन्‍न में कुछ इस तरह वर्गीकरण हो गया है कि दीवाली में दीओं को जलाने की औपचारिकता निभाते प्रतीत होते हैं या यूं कहें कि नाटक सा करते हैं। संभवत: यही वजह है कि जिस तनावभरी जीवनशैली पर हम आज के भारतीय गर्व करते नहीं अघाते, उसी के चलते मात्र 'एक दिए' को खरीदने की भी हिम्‍मत करनी पड़ती है।  बिजली की रौशनी व चकाचौंध में अंतस का अंधेरा भी बौखलाया हुआ है, तभी तो समाज में जिन उद्देश्‍यों को लेकर दीपावली मनाई जाती रही, आज वे ही मौजूद नहीं हैं ।
भारतीय जनमानस के उत्‍सवधर्मी होने के कारण दीपोत्‍सव मनाने के उदाहरणों से हमारा पौराणिक व ऐतिहासिक काल भरा हुआ है। जैसे कि श्रीराम के वन से लौटने पर, श्रीकृष्‍ण द्वारा नरकासुर का वध कर बंदी राजकुमारियों को आजाद कराने व उनसे विवाह की खुशी पर, राजा बलि के दान व इससे खुश होकर विष्‍णु द्वारा पृथ्‍वीवासियों को दीपोत्‍सव मनाने का आदेश आदि। इनके अलावा स्‍वामी शंकराचार्य द्वारा कामशास्‍त्र सीखने के लिए किए गये परकाया प्रवेश की घटना को भी दीपावली से ही जोड़ा जाता है। इसी दिन आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्‍वती का निर्वाण हुआ था। जैन  धर्म के 24वें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी ने भी इसी दिन शरीर त्यागा था। गुरु हर गोविन्द ने दीपावली के ही दिन ग्वालियर के किले से मुक्ति पाई थी। वेदों में पारंगत श्री रामतीर्थ का जन्म और निर्वाण दिवस इसी दिन पड़ता है।
दीओं द्वारा सुख-शांति की अपेक्षाओं को जगाने और किसी भी कलुष को दूर करने वाले इस पंचदिवसीय उत्‍सव पर अब हमें ही अपने भीतर झांककर होगा कि हमें 'दिओं का रूप' किसके अनुरूप चाहिए... यह बाजार पर टिका हो या अपने अंतस की खुशी पर...। क्‍योंकि दिओं की जगमगाहट तभी प्रभावित करती है जब मन के किसी कोने में भी दीओं की श्रृंखला जली हो और उससे अपना ही नहीं समाज का अंतस भी रोशन करने की अभिलाषा बाकी हो।
दीपोत्‍सव पर विशेष-
- अलकनंदा सिंह





सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

योगियों के जटिल पहलुओं की प्रदर्शनी

शुरुआती दौर के योगी केवल आकर्षक योग मुद्राएं ही नहीं बनाते थे बल्कि भीषण लड़ाइयों में शिरकत भी करते थे. वॉशिंगटन में आयोजित एक प्रदर्शनी में योगियों के जीवन से जुड़े जटिल पहलुओं को दिखाया गया है. आप कैसा योग पसंद करेंगे- ताकतवर या हॉट? हो सकता है कि आप निर्वस्त्र अभ्यास करना चाहें या ताज़ा-तरीन लाइक्रा को आजमाएं. क्या आप बीकेएस आयंगर के अनुयायी हैं या आप विन्यास या अष्टांग योग को तरजीह देंगे?
आप जो भी चाहें, अमरीका में योग पांच अरब डॉलर पौने चार हज़ार करोड़ का रुपयों के बराबर की इंडस्ट्री है, लाखों लोग फ़िज़िकल फ़िटनेस, स्वास्थ्य को बेहतर रखने या आध्यात्मिक ज्ञान के लिए इसका अभ्यास करते हैं. आमतौर पर सभी जिम इसकी एक कक्षा की पेशकश करते हैं और ख़ास तरह की चाय और शांत संगीत इसके अनुभव को और बढ़ा सकता है.
भारतीय सरकार योग के व्यवसायीकरण को लेकर इस कदर चिंतित रही है कि हाल के वर्षों में उसने इसकी सैकड़ों मुद्राओं को पेटेंट कराने का अभियान शुरू कर दिया है ताकि उन्हें पश्चिमी कंपनियों द्वारा हथियाए जाने से बचाया जा सके.
योग को खंगालने वाली प्रदर्शनी
विश्व की ये पहली प्रदर्शनी है जो तस्वीरों के ज़रिए योग को खंगालती है. वो इसकी प्राचीन परंपराओं के उन पहलुओं को भी सामने लाती है जिससे बहुत से शुद्धतावादियों को मुश्किल हो सकती है.
इसके 2500 वर्षों के ज्ञात इतिहास में योग का कोई एक सर्वमान्य तरीका रहा हो, ऐसा नहीं है.
स्मिथसोनियन सैकलर गैलरी ऑफ़ एशियन आर्ट में लगी प्रदर्शनी 'योग: द आर्ट ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन' के क्यूरेटर डेब्रा डायमंड कहती हैं, ''पांच साल पहले मैंने सोचा था कि मैं योग की अकेली परंपरा के बारे में जान लूंगी.''
वह कहती हैं, ''योग लगातार पूरी तरह से बदलता और समय के साथ विकसित होता रहा हालांकि उसके कई मुख्य लक्ष्य रहे हैं, ऐसा कुछ नहीं जिसे एक तरीके से बताया जा सके.''
उनके अनुसार, ''कुछ परंपराओं में ये अत्यधिक चैतन्यता की स्थिति है जिसके जरिए जन्म, मृत्यु और फिर जन्म के पीड़ादायक चक्र से छूटा जा सकता है लेकिन योग की कुछ अन्य परंपराओं में इसके कुछ लक्ष्य अलौकिक शक्तियों और दूसरों पर नियंत्रण की क्षमता हासिल करना थे.''
प्रदर्शनी में दुनियाभर के 25 संग्रहालयों और व्यक्तिगत संग्रहों से लाई गई 130 चीजों को दिखाया गया है. जिनमें कुछ का प्रदर्शन कभी सार्वजनिक तौर पर नहीं हुआ तो कुछ को उत्कृष्ट कृति के तौर पर जाना जाता है.
इसमें एक हज़ार साल से ज्यादा पुराना एक चित्र भयंकर योगिनियों के समूह का है. तांत्रिक योग के अभ्यास से दैवत्व को प्राप्त कर चुकी ये उड़ती हुई देवियां हैं, जो पैने दांत फाड़े निडर मुद्रा में बैठी हैं, खुले बालों के साथ ये प्रचंड लगती हैं.
सांपों के साथ ये शोभा बढ़ा रही हैं, कुछ ने अपनी ऊंगलियां मुंह में डाली हुई हैं, ये बेखटके युद्ध की दुदुंभि बजाते आकाश मार्ग से जा रही हैं.
डॉयमंड बताते हैं कि वो ग्यारहवीं शताब्दी की उपद्रवी शिशु हैं.
प्रदर्शनी की विषय वस्तु लगातार 'योद्धा योगी' के तौर पर दिखती है, इसमें वाटरकलर चित्रों के जरिए उत्तर भारत के एक पवित्र स्थान थानेश्वर में योगियों को लड़ते-मरते दिखाया गया है.
सशस्त्र योगियों के झुंड बहते खून के साथ भयंकर तरीके से विरोधियों की मार-काट में लगे हैं और त्योहार पर नहाने के अधिकार को लेकर लड़ रहे हैं.
संस्कृत विशेषज्ञ और प्रदर्शनी सलाहकारों में एक सर जेम्स मेलिसन कहते हैं कि इसके बाद जो कुछ हुआ उससे अगर तुलना करें तो ये अपेक्षाकृत हल्की-फुल्की झड़प थी.
18वीं सदी में ताकतवर
सर जेम्स मेलिसन बताते हैं, ''18वीं शताब्दी तक योगी वर्ग इतना ताकतवर था और ये इतनी बड़ी तादाद में था कि हमारे पास इन त्योहारों पर बड़ी लड़ाइयों की रिपोर्ट है, जहां हज़ारों-हज़ार योगी मार दिए जाते थे.''
पेंटिंग शुरुआत में योगियों के बीच लड़ाई के बारे में बताती है जिन्हें भाड़े पर मुगल शासकों द्वारा रखा जाता था.
सर जेम्स खुद भी योगी हैं और भारत में रहने और योगा का अध्ययन करने में कई साल गुजार चुके हैं. वह पहले ऐसे पश्चिमी शख्स हैं जिन्होंने प्रधान योगियों के वर्ग में जगह बनाई और विधिवत महंत बनाए गए. उन्हें खुद का दल बनाने का अधिकार मिला हुआ है.
वह शांति की तलाश में आध्यात्मिक प्रबोधन के लिए योग और इसके कहीं हिंसात्मक प्रदर्शन में कोई टकराव नहीं देखते.
वह कहते हैं, ''आज भी इसमें कोई विरोधाभास नहीं है. वह योग समझते हैं और उसके अन्य अभ्यास एक तरह की आंतरिक ताकत पैदा करते हैं, जिसका इस्तेमाल वो एकदम अलग तरीकों से कर सकते हैं, चाहे आशीर्वाद या शाप देने में या फिर वास्तव में लडाइयों में.
योगियों का खूनी इतिहास देखते हुए अजीब सा लगता है कि अमरीका में इसका अभ्यास बड़े पैमाने पर महिलाएं तनाव दूर करने के लिए करती हैं. इस ट्रेंड ने 19वीं शताब्दी की शुरुआत में तब जोर पकड़ा, जब महिलाओं के बीच लचक के लिए अभ्यास पर जोर दिया जाने लगा.
वॉशिंगटन में यूनिटी वुड्स योग सेंटर के डायरेक्टर जॉन शुमाकर कहते हैं कि लोगों के लिए एक्सरसाइज़ खेल और प्रतिस्पर्धा है, ऐसा ही योग के बारे में भी माना जाता है लेकिन असलियत ये नहीं है. पुरुष नहीं जानते कि योग क्या है. शुमाकर कुछ उन चंद अमरीकी योग शिक्षकों में हैं जिनकी दीक्षा आयंगर के हाथों हुई.
वह कहते हैं, "वो खासियतें, जिनसे कोई शीर्ष एथलीट बनता है, वैसी ही खासियतें योग में उत्कृष्ट बनने के लिए आवश्यक हैं- ये केवल शारीरिक लचक, क्षमता और ताकत नहीं है बल्कि ध्यान की समग्र खासियतें हैं. जो ध्यान केंद्रीत करने और स्पष्टता से युक्त होती हैं."
धारणा बदली
ये प्रदर्शनी यह भी खंगालती है कि संस्कृतियों और महाद्वीपों को पार करने के बाद योग को लेकर लोगों की धारणा बदलती चली गई.
डेब्रा डायमंड कहती हैं, ''ये बहुत जटिल और पेचीदा वर्ग है क्योंकि हम अक्सर यूरोपीय आकांक्षाओं के साथ वो छवि बनाते हैं जो आमतौर पर यूरोपीय लोग भारत और योगियों के बारे में सोचते आए हैं.''
वह कहती हैं, ''योगियों को डरावने और संदिग्ध लोगों के तौर पर देखा जाता था. वो अलौकिक ताकतों से लैस होने का दावा करते थे. वो कम कपड़े पहनते थे या नग्न रहते थे, जो 19वीं सदी की संवेदनशीलता को झटका देने वाली थी, वो हमेशा घूमते रहते थे और अक्सर नशा करते थे. वो भारत की नकारात्मक तरह के छवि के प्रतीक बन गए.''
लेकिन इस अवधारणा को तोड़ने वाली प्रदर्शनी ये दिखाती है कि योग खुद को बदल कर फिर नई पहचान और ताकत हासिल कर रहा है. हालांकि 11वीं शताब्दी की योगिनियां 21वीं सदी की बहनों को शायद ही पहचान पाएं. क्या वो ऐसा कर पाएंगी?

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

घरों में पलते गुलाम

मानव तस्करी सुन कर लगता है कोई ऐसी बात है जो हमसे बहुत दूर की और सिर्फ पुलिस खुफिया एजेंसियों के मतलब की है. भारत के लोग यह देख ही नहीं पा रहे कि इस अपराध के शिकार उनके पास पड़ोस या खुद उनके घर में रह रहे हैं. दिल्ली के एक अस्पताल में बिस्तर पर लेटी 18 साल की लड़की के सिर पर बंधी मोटी पट्टी उन जुल्मों की कहानी बता रही है जो उसने चार महीनों में अपनी मालकिन के घर में सहे. होश में आई तो बोली, "वो मेरे बाल उखाड़ देंगी, मेरे सिर पर जोर से मारेंगी...हर वक्त वो मुझसे नाराज ही रहती हैं." इस लड़की का कहना है कि अकसर उसे बेल्ट, झाड़ू और जंजीरों से पीटा जाता है और उस घर में कैद कर रखा गया है जहां वह घर के काम करने आई थी. इस लड़की की बायीं गाल और सीने पर जख्मों के निशान हैं और उसका कहना है, "वो मुझे मेरा पैसा नहीं देंगी, मुझे फोन नहीं करने देतीं, किसी से मिलने नहीं देतीं, मेरे सारे दस्तावेज फाड़ डाले और वो कागज भी जिसमें रिश्तेदारों के नंबर थे."

इसी महीने पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसे मालकिन की कैद से छु़ड़ा कर अस्पताल में भर्ती कराया. यह कहानी सिर्फ इसी लड़की की नहीं, दुनिया में गुलामों की तरह जी रहे आधे से ज्यादा लोग भारत में रहते हैं. दुनिया के गुलामों पर रिपोर्ट तैयार करने वाले संगठन वाक फ्री फाउंडेशन के प्रमुख निको ग्रोनो का कहना है, "लोगों को हिंसा के जरिए काबू में किया जाता है. वो छलावे से या फिर जबर्दस्ती इस तरह की हालत में डाले जाते हैं जहां उनका आर्थिक शोषण किया जा सके. उन्हें पैसा नहीं मिलता या मिलता भी है तो बहुत मामूली और उनके पास काम छोड़ने की आजादी नहीं होती."
जुल्म का शिकार हुई झारखंड की यह लड़की महज तीन साल स्कूल गई, काम से पैसा कमाकर घर भेजने का लक्ष्य लेकर दिल्ली आई थी. नौकर मुहैया कराने वाली एजेंसी के संपर्क में आने से पहले उसने कई घरों में काम किया. लड़की का नाम कानूनी वजहों से नहीं दिया जा सकता. इसी एजेंसी ने उसे इस घर में काम के लिए रखवाया. घर के मालिक को गिरफ्तार भी किया गया लेकिन वो आरोपों से इनकार करते हैं. मामला अभी अदालत में है. उसकी मां उसे वापस घर ले जा कर स्कूल में डालने की बात कह रही है.
 हर तरह का शोषण

भारत में प्रमुख रूप से महिलाओं को घरेलू कामों से लेकर वेश्यावृत्ति या जबरन विवाह के लिए मानव तस्करी और धोखे से या फिर डरा धमका कर इस काम में धकेला जाता है. जानकारों का कहना है कि निराश और परेशान मां बाप अपने बच्चों को बेच देते हैं जहां से उन्हें जबर्दस्ती भीख मांगने, यौन शोषण या फिर कोयले की खदानों में मजदूरी जैसे कामों में लगा दिया जाता है. संयुक्त राष्ट्र के नशीली दवाओं और अपराध से जुड़े विभाग यूएनडीओसी के मुताबिक अब भी इस तरह के जुल्मों के शिकार पहले दिल्ली लाए जाते हैं. यूएनडीओसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के साथ नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश से तस्करी के जरिए लाए गए लोगों की "दिल्ली मंजिल है और वहां से आगे जाने का केंद्र भी." इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि खासतौर से राजधानी में मानव तस्करी का यह धंधा बुरी शक्ल ले चुका है. आपराधिक गैंग अपने काम बढ़ाने के लिए प्लेसमेंट एजेंसी और मसाज पार्लर के रूप में कारोबार की तरह इसे चला रहे हैं.
 अपनों की तलाश

पश्चिम बंगाल की राबिया बीबी अपनी सबसे छोटी बेटी 17 साल की रानू के साथ खाने का सामान खरीदने बाजार गई थीं. वहां से उनकी बेटी को अगवा कर लिया गया. अब वो उसे ढूंढने दिल्ली आईं. कभी गांव से बाहर नहीं गईं राबिया बीबी दिल्ली के बारे में ना तो कुछ जानती हैं, ना ही उनके पास पैसे हैं. कई हफ्तों से पुलिस ने उनके साथ जगह जगह छापे मारे. वो बताती हैं, "तीन मछुआरों ने मेरी बेटी को एक तेज भागती कार में चीखते देखा था." गरीब मजदूर नवीन हारू भी इसी तरह अपनी 13 साल की बेटी ज्योति मरियम को ढूंढने का फैसला कर दिल्ली आए. दिन के उजाले में उनकी बेटी को छत्तीसगढ़ में स्कूल से लौटते वक्त अगवा कर लिया गया. दोनों घटनाएं एक जैसी लग रही हैं, लेकिन लड़कियां अलग अलग हालत में मिलीं. रानू को एक होटल के कमरे में बंद कर रखा गया था जबकि मरियम प्लास्टिक में लिपटे शव के रूप में बरामद हुई. आधिकारिक रूप से मौत की वजह मलेरिया दर्ज की गई और पुलिस की इसके पीछे के अपराध को जानने समझने में कोई दिलचस्पी नहीं है.
 भारत में अपराध की घटनाओं का लेखा जोखा रखने वाली एजेंसी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने बताया कि पिछले साल कुल 38,200 महिलाओं और बच्चों को अगवा किया गया. इससे पहले के साल में यह तादाद 35,500 थी. हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वास्तव में यह संख्या इससे बहुत ज्यादा है. मानव तस्करी रोकने के लिए नीतियां बनाने पर केंद्र सरकार के साथ मिल कर काम कर रही भामती कहती है, "अपराध का कोई क्षेत्र नहीं है, वह देशों या एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमा नहीं जानता."

मानव तस्करी रोकने के लिए काम कर रहे गैर सरकारी संगठन शक्ति वाहिनी से जुड़े ऋषिकांत इन सबके पीछे आर्थिक विषमताओं को भी जिम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है, "अमीर लोग अपने घरों में ऐसे नौकरों के लिए कोई भी पैसा देने को तैयार हैं जो उनके घर साफ करें और बचे हुए खाने पर जिंदा रहें. नौकर मुहैया कराने वाली अवैध एजेंसियां बड़ी संख्या में सभी बड़े शहरों में उग आई हैं.

रानू या वो लड़की तो किसी तरह बच कर वापस जा रही है लेकिन मरियम और उसकी जैसी हजारों या तो मारी जा रही हैं या मौत से मुश्किल जिंदगी जी रही हैं.



कला का सबसे महंगा कद्रदान क़तर

दोहा . कला के क्षेत्र में कतर तेजी से आगे बढ़ रहा है. भले ही कतर के कलाकार दुनिया भर में मशहूर नहीं हों लेकिन सबसे महंगी पेंटिंग्स खरीदने की ताकत कतर ही रखता है. कला की दुनिया में सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में कतर के शासक की बहन को पहले नंबर पर शामिल किया गया है. ब्रिटेन की कला समीक्षा पत्रिका ने प्रभावशाली लोगों की सूची जारी की है. कतर संग्रहालय प्राधिकरण, क्यूएमए की प्रमुख होने के नाते शेख अल मयस्सा बिन्त हम्द बिन्त अल थानी के पास सालाना एक अरब डॉलर खर्च करने का बजट है. ये बजट न्यू यॉर्क के आधुनिक कला संग्रहालय से तीन गुना ज्यादा है. पत्रिका ने 'शक्ति 100' की सूची छापते हुए लिखा है, "कोई आश्चर्य नहीं है, तभी तो जब भी शेख अल मयस्सा शहर में होती हैं सरकार और प्रशासन के लोग उनके अभिवादन में कतार लगाते हैं."

दोहा में इस्लामी कला संग्रहालय

चीनी कलाकार अई वेई-वेई पिछले साल सूची में शीर्ष पर थे. 2013 के लिए वेई-वेई सर्वोच्च रैंकिंग कलाकार हैं. प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में वे नौवे स्थान पर हैं. जर्मनी में पैदा हुए कला के व्यापारी डेविड ज्वर्नर कला की दुनिया के प्रभावशाली लोगों में दूसरे नंबर पर आए हैं. डेविड की न्यूयॉर्क में चित्रशालाएं हैं. खाड़ी के सबसे अमीर देशों में शामिल कतर अपने आपको इस क्षेत्र के सांस्कृतिक केंद्र के तौर स्थापित करना चाहता है.

कला का गढ़ बनता कतर
कला समीक्षा पत्रिका के मुताबिक शेख अल मयस्सा इस बार सूची में पहले स्थान में सिर्फ अपनी खरीदारी की ताकत की वजह से हैं. क्यूएमए ने पिछले साल महान फ्रेंच चित्रकार पॉल सिजेन की उत्कृष्ट कृति ''कार्ड प्लेयर्स'' 25 करोड़ डॉलर में खरीदी थी. ये अब तक की सबसे महंगी बिकने वाली पेंटिंग है. कला समीक्षा पत्रिका के मुताबिक, "दोहा को जिस दिन यह अहसास हो गया कि उसने पर्याप्त खरीदारी कर ली है तो बाजार में ऐसा खालीपन आ जाएगा जिसे कोई भर नहीं सकेगा."
कतर में कई संग्रहालय और चित्रशाला हैं, इनके अलावा इस क्षेत्र का सबसे बड़ा इस्लामी कला संग्रहालय भी यहीं है. कला के क्षेत्र में कतर की दिलचस्पी के कारण ही भारत के महान कलाकार मकबूल फिदा हुसैन को वहां की नागरिकता मिली थी. एक जमाने में भारतीय चित्रकला के बेहद खास रहे हुसैन को अपने बनाए चित्रों के कारण भारत में गुस्सा झेलना पड़ा. 1970 के दशक में उनकी बनाई गई कुछ पेंटिंग्स पर खासा विवाद पैदा हुआ, जिसके बाद उनके खिलाफ केस भी दर्ज किए गए. अपने खिलाफ हो रहे विरोध के बाद हुसैन कतर चले गए थे. 2010 में उन्हें कतर की नागरिकता मिली.
- एजेंसी

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

अरे...प्रेम क्‍या कोई कमोडिटी है ?

आज उत्‍तर भारत की विवाहिताओं के लिए खास दिन है अपने दांपत्‍य को सुखमय बनाने का। उनके लिए  इस दिन का खास महत्‍व 'माना' जाता है। 'माना' जाना शब्‍द इसलिए मैंने प्रयोग किया कि अच्‍छी खासी  वैज्ञानिक आधार वाली हमारी प्राचीन भारतीय खोजों को, उनके सिद्धांतों को कब मात्र कुछ रूढ़िवादी परंपराओं  में ढाल दिया गया, यह तब जाकर पता चलता है जब किसी परंपरा के पीछे उसे मनाने के कारण खोजे जाते  हैं। स्‍त्रियों ने इस रूढ़िवाद को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। हर बदलाव को जस का तस स्‍वीकार  करने की 'स्‍त्री-प्रवृत्‍ति' ने ही न केवल स्‍वयं उसकी महत्‍ता को कम किया बल्‍कि जिन वैज्ञानिक खोजों का  वो स्‍वयं केंद्रबिंदु रहीं, उन्‍हें भी रूढ़िवाद और परंपराओं की भेंट चढ़ा दिया।
नतीजा यह कि गांव-गिरांव की बात तो छोड़ ही दीजिए, आज अधिकांश अच्‍छी खासी शिक्षित युवतियां भी  'दांपत्‍य की संपूर्णता' के इस महोत्‍सव को महज गिफ्ट पाने, साजो-श्रृंगार के लिए पहले ब्‍यूटीपार्लर्स और फिर  गहनों व कपड़ों पर लार टपकाते देखी जा सकती हैं। बाजार की वस्‍तु बनने में उन्‍होंने ही स्‍वयं को अर्पित  किया है...आज वे टारगेट हैं ..कमोडिटी हैं..वो सब-कुछ हैं...बस वो स्‍त्री नजर नहीं आतीं, जो ऋषियों की  खोज का आधार बनी थी।
अच्‍छा लगता है ये देखकर कि इन सारी स्‍थितियों के बावजूद अब कुछ युवा सामने आ रहे हैं उन   जिज्ञासाओं को लेकर जो प्राचीन भारतीय खोजों और दर्शनों पर आधारित हैं। देर से ही सही, इस युवा पीढ़ी  में बढ़ती जिज्ञासाओं को धन्‍यवाद देना चाहिए कि वे समय-समय पर उभर तो रही हैं...कम से कम हमसे  प्रश्‍न तो कर रही हैं...हमें बाध्‍य तो कर रही हैं कि हमने जिन बुनियादों पर अपनी रूढ़ियों की अमरबेल  चढ़ाई है, आखिर उनकी वास्‍तविकता क्‍या रही होगी?
तभी तो आज हम अपनी परंपराओं को निभाने के पीछे के कारण जानने पर विवश हैं। चाहे अनचाहे ही सही,  हम उत्‍तर खोजते-खोजते अपनी जड़ों की ओर देख तो पा रहे हैं कि जंगलों में रहने वाले ऋषि मुनियों ने  कितने कम संसाधनों में वो सिद्धांत और वैज्ञानिक विश्‍लेषण हमें सौंप दिये जो जीवन के लिए आवश्‍यक थे  और जिनके लिए आज प्रयत्‍न करने पर भी अपेक्षित परिणाम हमें नहीं मिल पाते।
मैं आज की यानि करवा चौथ जैसे दांपत्‍य को समर्पित खास पर्व की नींव की बात कर रही हूं कि प्राचीन  भारतीय शोधकर्ताओं को अच्‍छी तरह से मालूम था कि अच्‍छी सृष्‍टि की रचना तभी संभव है जब परस्‍पर  विरोधी प्रकृति व प्रवृति के होते हुए भी स्‍त्री व पुरुष एक दूसरे को लेकर सकारात्‍मक सोचें, सहिष्‍णु बनें, प्रेम  की उत्‍पत्‍ति शांत मन के साथ हो, प्रेम में उद्वेग से क्रोध और क्रोध से उत्‍पन्‍न संतान सृष्‍टि के लिए घातक  हो सकती है। इन दुष्‍परिणामों से बचने के लिए ही उन्‍होंने चंद्रमा की किरणों में प्रेम की उत्‍पत्‍ति को  सर्वोतम बताया और सिद्धांत बनाये स्‍त्री व पुरुष अपनी अपनी विपरीत ऊर्जाओं का इस्‍तेमाल करके जिस  संतति को आगे बढ़ायें वह दोनों का 'सुयोग' हो यानि सकारात्‍मक सोच वाली संतान के माध्‍यम से स्‍त्री-पुरुष  न केवल अपना, बल्‍कि विश्‍व का कल्‍याण करने के काम आयें।
इन्‍हीं खोजों में चंद्रमा की शीतलता और उसकी किरणों में कामना बढ़ाने वाले गुणों का पूरी तरह उपयोग  किया गया अर्थात् स्‍त्री-पुरुष दोनों में मौजूद ऊर्जा को सकारात्‍मक दिशा में बढ़ाने के लिए ही इस तरह  प्रयोग किया गया कि विरोधी ऊर्जाओं को धनात्‍मक ऊर्जा में बदल भी दिया जाये और प्रेम को आम  जनजीवन का स्‍थाई भाव बनाया जा सके।
खैर, आज हमें मिट्टी के करवों और खांड के करवे से अपने दांपत्‍य को समेटने के बारे में फिर से सोचना  चाहिए कि क्‍या प्रेम सिर्फ एक दिन का उत्‍सव है...इसकी निरंतरता बनी रहनी चाहिए मगर रूढ़िवाद और  इसे भुनाते बाजार के सहारे हम भला क्‍यों अपने प्रेम को सौंपें...बचना होगा इससे हरहाल में वरना इसके  सुरसा वाले मुंह ने हमें लिव इन रिलेशन तक तो पहुंचा दिया है, आगे की सोच कर मन चक्‍करघिन्‍नी हुये  जा रहा है।
Goodluck For Karwachauth
- अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

कॉस्‍मिक इफेक्‍ट वाले रासाचारी

शारदीय दुर्गा नवरात्रि के समाप्‍त होते ही शरद ऋतु का स्‍वागत उत्‍सव यानि शरदोत्‍सव मनाने का क्रम शुरू हो चुका है।
शरद पूर्णिमा को उत्‍सव व परंपरा के रूप में ढालने वाले सबसे पहले थे कृष्‍ण, जिन्‍हें संभवत: तभी से एक और नाम मिल गया- रासाचारी कृष्‍ण का। आज  इस रासाचारी शब्‍द को भले ही अन्‍यथा संदर्भों में देखा जाता है परंतु द्वापर काल में कृष्‍ण ने जिस तरह से इस उत्‍सव को पूरे आनंद के साथ मनाने के लिए अपनी साथी गोपियों को भी बाध्‍य कर दिया और एक नई परंपरा की नींव डाली, वह सब सिर्फ कृष्‍ण के ही वश में था।
संभवत: इसीलिए महाभारत में शरद पूर्णिमा पर महारास को देखकर कृष्‍ण और राधा की आराधना में कहा गया है-
'तत्रारभत गोविन्दो रासक्रीड़ामनुव्रतै।
स्त्रीरत्नैरन्वितः प्रीतैरन्योन्याबद्ध बाहुभिः।।'
श्‍लोक के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की प्रेयसी और सेविका गोपियाँ एक दूसरे की बाँह में बाँह डाले खड़ी थीं। उन स्त्री रत्नों के साथ यमुना के किनारे पर भगवान ने अपनी रासक्रीड़ा प्रारंभ की। श्‍लोक स्पष्ट करता है कि सामान्य गोपियों से अलग एक गोपी भगवान की परम प्रेयसी भी थी। अनुमान है कि वह राधा के अलावा और कौन हो सकती है।
भागवत पुराण के अनुसार तो कृष्‍ण का महारास संपूर्ण प्रकृति के लिए एक ऐसी अनूठी घटना थी, जो न कभी घटी और न घटेगी। मगर आज इस पूरे प्रसंग को तार्किक कसौटी पर कसा जाने लगा है। संभवत: कृष्‍ण और उनकी सभी क्रियाओं को लेकर युवा पीढ़ी में एक कौतूहल है क्‍योंकि वह आंख बंद करके भरोसा करना नहीं चाहती।
यूं तो समाज के स्‍थापित नियमों को नया रूप देने में कृष्‍ण सदैव आगे ही रहे और इसीलिए कृष्‍ण तथा उनके उठाये हुये कदम हमेशा शोध का विषय बने। कृष्‍ण ने तत्‍कालीन समाज के स्‍थापित नियमों को इस तरह बदला कि वह गूढ़ होते हुए सहज बने रहे...स्‍वीकार्य रहे।
यहां यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि आखिर इतनी सहजता से इतना कुछ कैसे कर पाये...श्रीकृष्‍ण ।
आज के समाज में भी नियमों को बदलना और समाज के विरुद्ध जाना बहुत मुश्‍किल होता है, कई बार तो खून-खराबे तक की नौबत आ जाती है। फिर कृष्‍ण ने कैसे सबका मुकाबला किया होगा?
परंतु जीवन के हर क्षण को उत्‍सव बनाकर यदि स्‍वस्‍थ परंपराओं का प्रतिपादन किया जाये तो सामाजिक ताने-बाने की दृढ़ता निश्‍चित है। कृष्‍ण जानते थे कि बदलते समय की चुनौतियों का सामना करने की बजाय यदि उन्‍हें जिया जाये, उनका स्‍वागत किया जाये तो जीवन सहज व सरल हो जायेगा और सहजता के साथ जीवन का उत्‍सव ही तो था शरद पूर्णिमा पर किया गया महारास।
आज भी ये रहस्‍य ही बना हुआ है कि कृष्‍ण रासाचारी होते हुये भी ब्रह्मचारी क्‍यों कहलाये। हर गोपी को वे अपने साथ नृत्‍य करते दिखे और सिर्फ नृत्‍य ही नहीं, स्‍वयं में एकाकार होते भी दिखाई दिए। ऐसा कैसे संभव था कि एक ही समय में हर गोपी का अलग-अलग शैली व भंगिमा वाला नृत्‍य फिर भी कृष्‍ण उसके साथ उसी की नृत्‍य मुद्रा में नृत्‍य करते हैं, एकाकार हैं...क्‍या शारीरिक रूप से किसी व्‍यक्‍ति द्वारा ऐसा किया जाना संभव है? नहीं, परंतु वही सब कृष्‍ण के लिए संभव है। असंभव को संभव कर दिखाना और उसे प्रतिस्‍थापित करना ही तो कृष्‍ण के महारास का अभिप्राय है। इसका अर्थ है कि सहजता से जिया जाने वाला हर क्षण, रास है।  मेटाफिजिकली देखें तो 'रास' हर समय हमारे आसपास घटने वाले क्षण हैं जो सिर्फ और सिर्फ परस्‍पर विरोधी गुणों, रंगों और व्‍यवहारों के सम्‍मिश्रण से जन्‍म लेते हैं।
आधुनिक अर्थों में कहा जाये तो रास एक कॉस्‍मिक इफेक्‍ट है प्रकृति का... मनुष्‍य के ऊपर। इसे व्‍यक्‍तिवादी मानना भूल हो सकती है क्‍योंकि यह किसी एक पुरुष का अनेक स्‍त्रियों के साथ नृत्‍य मात्र नहीं हैं। प्रकृति और पुरुष तत्‍व के सम्‍मिलन का माध्‍यम बनता है नृत्‍य, और इस तरह गढ़ा जाता है महारास...नृत्‍य को भी माध्‍यम महज इसकी सर्वग्राह्यता के कारण  बनाया श्री कृष्‍ण ने। वे कृष्‍ण जो सब की सोचते हैं..सबको गुनते हैं और सब के हित साधते हैं। ऐसे ही हैं कृष्‍ण... और जैसे कृष्‍ण हैं वैसा ही है उनका महारास, एकदम पूर्ण... बिल्‍कुल शरद के स्‍वागत को अधीर सोलह कलाओं से पूर्ण चंद्रमा की भांति।
-अलकनंदा सिंह



बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

एलीनोर कैटन बनी सबसे युवा बुकर पुरस्कार विजेता

न्यूजीलैंड की 28 वर्षीय लेखिका एलिनोर कैटन अपने उपन्यास 'द लूमिनरीज़' के लिए सबसे कम उम्र में मैन बुकर पुरस्कार जीतने वाली लेखक बन गई हैं. भारतीय मूल की अमरीकी लेखिका झुंपा लाहिड़ी का उपन्यास 'दी लोलैंड' भी इस साल बुकर पुरस्कारों की होड़ में शामिल था.
बुकर पुरस्कारों के 45 साल के इतिहास में कैटन का 832 पेज का उपन्यास ये पुरस्कार जीतने वाली सबसे लंबी कृति भी बन गया है. उन्होंने ये उपन्यास उन्नीसवीं सदी की सोने की खानों पर लिखा है. कैटन ने यह उपन्यास 25 साल की उम्र में लिखना शुरू किया था.
लंदन के गिल्डहॉल में मंगलवार रात हुए एक समारोह में कैटन को विजेता घोषित किया गया. पुरस्कार के साथ पचास हज़ार पाउंड की इनामी राशि भी दी जाती है.
कैटन के उपन्यास की संरचना बेहद जटिल है. इसका हर हिस्सा पिछले हिस्से की तुलना में ठीक आधा लंबा है.
विजेता तय करने वाले जजों के चैयरमैन रॉबर्ट मैकफ़ारलेन ने कहा, "यह एक चमकदार कार्य है जो लंबा हुए बिना विशाल काम है." वे कहते हैं, "आप इसे पढ़ना शुरू करते हैं और आपको लगने लगता है कि आप एक दैत्य की पकड़ में हैं."
इस साल के पुरस्कार को डचेज़ ऑफ कार्नवेल कैमिला ने प्रस्तुत किया.
मैकफ़ारलेन ने बताया कि दो घंटे की बहस के बाद जजों ने कैटन को विजेता घोषित करने का फ़ैसला लिया.
कनाडा में जन्मी कैटन न्यूज़ीलैंड में पली-बढ़ी हैं और वे मैन बुकर पुरस्कार जीतने वाली न्यूज़ीलैंड की दूसरी लेखक हैं.
इस साल नोवॉयलेट बुलावायो, जिम क्रेस, झुंपा लाहिड़ी, रुथ ओज़ेकी और कॉल्म टोईबिन को बुकर पुरस्कार के लिए चयनित किया गया था.
विजेता कैटोन को पचास हज़ार पाउंड की इनामी राशि जबकि बाकी अन्य को ढाई हज़ार पाउंड दी गई.
यह बुकर पुरस्कारों का पैंतालीसवां साल था. पिछले साल हिलेरी मेंटेल ने 'ब्रिंग अप द बॉडीज़' के लिए यह पुरस्कार जीता था.
-एजेंसी

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

जवाब मांगती सोनागाछी

श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बराधरा शुचिरू।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

नवरात्रि के अंतिम दिन जब महागौरी की आराधना के लिए ये मंत्र उच्‍चारित किया जाता है तो शायद ही कोई इसके शब्‍दों में छिपे उस संदेश को देख पाता हो जो जीते जागते इंसान को सीख देता है। सीख देता है कि नौ दिनों तक आत्‍मशुद्धि के लिए किये गये व्रत से शुरू होकर कन्‍यापूजन पर आकर स्‍थगित हो जाने वाला यह अवसर मात्र एक त्‍यौहार मात्र नहीं, बल्‍कि अपने अंदर मानवता को जगाने का एक माध्‍यम है।
पूरे सालभर कभी गुप्‍त तो कभी प्रत्‍यक्ष रूप में आने वाली नवरात्रियां, यह भी देखने का माध्‍यम हैं कि सदियों से चली आ रही शक्‍ति जागरण की इस प्रक्रिया के बावजूद तमाम ऐसे प्रश्‍न अनुत्‍तरित रह जाते हैं, जिनके जवाब आज तक ढूंढे जा रहे हैं जैसे कि .....
स्‍त्री पुरुष एक जैसा जीवन जीते हुये भी एक जैसा अधिकार पाने के हकदार क्‍यों नहीं बन पाये ,
स्‍वशक्‍ति को पहचानने और जो सुप्‍त शक्‍तियां हैं- उन्‍हें जाग्रत करने के लिए निर्धारित दिनों को ही क्‍यों व्‍यक्‍ति यानि कन्‍या अथवा स्‍त्री पूजा से जोड़ दिया गया,
क्‍यों पुरुष को श्रेष्‍ठ और क्‍यों स्‍त्री को हीन माना जाये,
क्‍यों सिर्फ चंद दिन नियत हों कि बच्‍चियां स्‍वयं को देवी मानें,
क्‍यों सिर्फ अंतिम नवरात्रि को कुछ कन्‍याओं को भोजन कराकर ही 'देवी' को प्रसन्‍न करने का उपक्रम किया जाये,
क्‍या ये पूरे वर्ष या फिर पूरे जीवन भर जारी नहीं रखा जा सकता,
क्‍या औरत को दो ही श्रेणियों में रखना नियंताओं को ज्‍यादा आसान लगा कि या तो वह देवी हो अन्‍यथा भोग्‍या, सवाल तो ढेर सारे हैं मगर जवाब अभी भी नहीं मिले। इन दोनों स्‍थितियों के अलावा ''स्‍त्री का स्‍व'' कहीं विलुप्‍त हो गया है।
कहने को पूरे नौ दिन तक समाचारपत्रों से लेकर गली के नुक्‍कड़ों, पंडालों, मंदिरों में नारी-शक्‍ति का गुणगान करने की प्रतियोगिता सी लगी होती है। चौतरफा ऐसा माहौल ''प्रतीत'' होता है मानो अब देश में नारीवादियों को बेरोजगार करने की होड़ लग पड़ी हो मगर नौ दिनों का ये उत्‍सवी स्‍वप्‍न तब अपनी हकीकत हमारे सामने रख देता है जब कुछ खबरें इन पर पानी फेरती नज़र आती हैं। जैसे आज ही खबर पढी कि कोलकाता की सोनागाछी के रेडलाइट एरिया में इस बार देवी प्रतिमा की स्‍थापना की गई है और इतना ही नहीं पूरे आठ दिन ठीक वैसे ही उत्‍सव जारी रहा जैसे आम ज़िदगी में आम लोगों में मनाया जाता है, गौर करने वाली बात यह रही कि इस दौरान व्रत रखकर सभी सेक्‍सवर्कर्स ने अपने 'प्रोफेशन' को कतई नज़रंदाज नहीं किया। उनके लिए आत्‍मगर्वित करने वाली है ये बात कि पूजा का अधिकार भी उन्‍होंने हासिल कर लिया और कर्तव्‍य भी अनदेखी भी नहीं की।
ऐसा कोर्ट के आर्डर पर संभव हो सका वरना आसपास की कथित सोसाइटीज ने तो इसका विरोध जमकर किया था। अब ये ''एक खबर'' पूरे उत्‍सव के औचित्‍य पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लगाने को काफी है। हो सकता है अतिधार्मिक लोग मेरे इन प्रश्‍नों से सहमत न हों मगर इससे कौन इंकार कर सकता है कि ''सोनागाछी'' जैसी बाड़ियों को जन्‍म इन्‍हीं वजहों से हुआ। खैर उन्‍हें अब जाकर ये अहसास तो हो गया कि वे अपने आंगन की मिट्टी जब दुर्गापूजा में दे सकती हैं तो भला स्‍वयं समाज के द्वारा त्‍याज्‍य क्‍यों हैं...बस बहुत हुआ...खुद ही करेंगे अपनी जंग की समीक्षा और...नतीजा ये कि आज वे अपनी बाड़ी में दुर्गापूजा करेंगीं।
बहरहाल सनातन धर्म में 'स्‍व' को जगाने, 'स्‍व' की शक्‍तियों को पहचानने और 'स्‍व' के ही उत्‍थान को जितने विस्‍तृत उपाय व मार्ग बताये गये हैं वे सभी के सभी आत्‍मउत्‍थान के लिए काफी हैं मगर इनका अपभ्रंशित रूप इनके औचित्‍य को स्‍वयं ही कठघरे में खड़ा किये दे रहा है तभी तो ..... आज इन भक्‍तों पर श्रद्धा नहीं उमड़ती...तभी तो....स्‍त्री के भोग्‍या रूप को देखकर उन नारीवादियों के षडयंत्र पर रहम आता है कि उनके द्वारा औरत को जिसतरह भुनाया जा रहा है वह भी मंज़ूर नहीं होना चाहिये...यहां भी स्‍त्री के स्‍व का प्रश्‍न हमारे सामने है कि जो स्‍त्री खुद को ही ना समझे उसे भला कोई और समझेगा भी क्‍यों...।
- अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

साहित्य का नोबेल एलिस मुनरो को

स्टॉकहोम 
कनाडा की लघुकथा लेखक एलिस मुनरो को साहित्य का नोबेल पुस्कार प्रदान किया गया है. 82 वर्षीय इस कथाकार को पुरस्कार देने की आज घोषणा की गयी और उन्हें एक महान लघुकथा लेखक बताया गया.
-एजेंसी

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

डॉक्‍टर तोगड़िया... प्‍लीज! ..आप तो समझ ही सकते हैं

 
कभी आपने यदि गीता पढ़ी हो तो ये भी अवश्‍य पढ़ा होगा कि
''कर्मण्‍येवाधिकारस्‍ते मा फलेषु कदाचन्'' से कर्म करने की प्रेरणा देने वाले श्रीकृष्‍ण ने गीता के  18वें अध्‍याय में
''सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।'
अहंत्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।
कहकर अपना उपदेश समाप्‍त किया। गीता के उपदेश हर काल में जन-जीवन के लिए  प्रायोगिक तौर पर खरे उतरते रहे हैं, आज की दिशाहीन-गतिहीन राजनैतिक स्‍थितियों में यदि  कोई लीक-लीक चलने की बजाय कुछ नया करने का साहस दिखाता है तो उसे पोंगापंथियों  की चिल्‍लपों से दोचार होना ही पड़ता है।
उक्‍त श्‍लोकों की यात्रा हर क्षण यह बताती है कि हमें बस कर्म करना है, बाकी फल मिलने  के रास्‍ते तो समय अपने आप बनाता जाता है।
कल जब से नरेंद्र मोदी ने युवाओं के सामने अपनी बात रखी, तभी से हंगामा बरपा है। सब  अपने-अपने तरीके से समीक्षा कर रहे हैं।
मोदी ने कहा, 'मैं एक हिंदुत्ववादी नेता के रूप में जाना जाता हूं। मेरी छवि मुझे ऐसा कहने  की इज़ाज़त नहीं देती, लेकिन मैं ऐसा कहने का 'साहस' कर रहा हूं। मेरा वास्तविक विचार है  यह है कि पहले शौचालय, फिर देवालय। हमारे देश में बहुत देवालय हैं अगर इतने ही  शौचालय हों तो लोगों को बाहर शौच करने की जरुरत नहीं होगी।'
अब इस पर कट्टर हिंदूवादियों का खून खौल रहा है कि मोदी, देवालय से पहले शौचालय क्‍यों  ले आए। ये लोग 'हिंदू' शब्‍दभ्रम के जाल में इस कदर फंसे हुए हैं कि हमारी सनातनी सोच  को भी भुला बैठे हैं । इन्‍हें ज़मीन पर रहने वाले वो लोग दिखाई नहीं देते जिन्‍हें नित्‍यकर्म के  लिए अपनी ही नज़रों से दिन भर में कम से कम एक बार तो गिरना ही पड़ता है। सरेआम  उनको यानि गरीबों की बच्‍चियों व महिलाओं को इस शर्मिंदगी से दो-चार होते शायद ये  तथाकथित हिंदूवादी अपने अपमान से जोड़कर नहीं देखते।
..तो प्रवीण तोगड़िया जी, राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से लेकर पूरे देश के हर शहर व गांव से  गुजरने वाली वो रेलवे पटरियां तो आपने भी देखीं होंगी, जिनके किनारे तमाम औरत-मर्दों को  बैठना पड़ता है। कृपया आप ये बतायेंगे कि इन्‍हें लेकर कभी आपको किसी प्रकार की शर्मिंदगी  का अहसास हुआ है या नहीं..।
और ये भी बतायें कि जीवन की मूलभूत आवश्‍यकता को पूरा करना ज्‍यादा जरूरी है या घंटे  घड़ियाल बजा कर गरीबों की समस्‍याओं को हल करने का कोरा ढोल पीटना। समय बदल  चुका है.....जिन युवाओं की बात नरेंद्र मोदी कर रहे हैं वो कोई युवाओं पर कृपा नहीं बरसा रहे,  ना ही उन्‍हें सर आंखों पर बैठा रहे हैं.....वो तो बस समय की मांग के अनुसार युवाओं की  आधुनिक सोच व क्रिएटिव कैपेबिलिटी का राजनैतिक संदर्भ में प्रयोग करने की राह बना रहे  हैं। मोदी की पूरी स्पीच में शौचालय और देवालय के सन्दर्भ में जो कहा गया है, उसमें ऐसा  कुछ नहीं है कि हिन्दू या हिंदुत्व को इतना धक्का लगे। सो इस पर इतनी हायतौबा मचाना  जरूरी नहीं है। यूं भी जो समय के अनुसार नहीं चलते, उन्‍हें इतिहास बनते देर भी नहीं  लगती। विरोधी पार्टियों की तो छोड़ें तोगड़िया जी, अपनी सोच को थोड़ा विस्‍तार दें और  श्रीकृष्‍ण के गीतासार को पढ़ें ताकि समझ सकें कि समय और जरूरत के अनुसार बनाई गई  रणनीति ही देश का भला कर सकती है। बेहतर होगा कि देवालयों से बाहर आकर भगवान को  भी ज़मीनी हकीकतों से रूबरू होने दें।
मोदी युवाओं की आवाज़ बनने की इस प्रक्रिया में कितने सफल होंगे, यह तो नहीं कहा जा  सकता मगर इतना अवश्‍य है कि देश का युवा भी ''कर्मण्‍यवाधिकारस्‍ते मा फलेषु कदाचन्'' की  व्‍याख्‍या करते हुए उन नेताओं का हश्र भी बखूबी देख रहा है, जिन्‍होंने अपनी कलाबाजियों से  जनता का मनोरंजन करके उसे ढंग से धोया-पोंछा और कंगाल होने को छोड़ दिया। बात  इतनी सी है कि श्रीकृष्‍ण के ''मामेकं शरणं व्रज'' की जरूरत आज हर उस राजनीतिज्ञ को है  जो 2014 की चुनौतियों को देख पा रहा है। आप भी मोदी से अपने मतभेदों को शौचालय की  आड़ लेकर सार्वजनिक न करें तो बेहतर है क्‍योंकि उनसे भी सड़क पर पड़े शौच जैसी ही  दुर्गंध आ रही है। हिंदू हित भी इसकी इजाजत नहीं देता कि इस नाजुक दौर में आप मोदी से  अपने मतभेदों को सार्वजनिक करके दूषित वातावरण पैदा करें।
-अलकनंदा सिंह 

बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

2 अक्‍तूबर: कंपलीट नॉनसेंस

आज का दिन...यानि 2 अक्‍तूबर... यानि शांति के मसीहा-महात्‍मा गांधी का जन्‍मदिन... आज  के दिन सियासी गलियारों से लेकर सामाजिक चौखटों तक शांति का दिखावटी राग अलापा  जायेगा लेकिन लालबहादुर शास्‍त्री को शायद ही याद किया जाए जबकि आज शास्‍त्रीजी का भी  जन्‍मदिन है। दोनों की उन प्रतिमाओं को धोया संवारा भी जायेगा, जहां वर्षभर कबूतरों का  सुलभ शौचालय आबाद रहता है। राजघाट से लेकर पब्‍लिक स्‍कूलों-मांटसरियों में भी गांधी के  स्‍वदेशीपन को तरह-तरह से कैश किया जायेगा। कहीं उन्‍हें कांग्रेसी चश्‍मे से तो कहीं भाजपाई  चश्‍मे से नापा-तोला जायेगा, फिर कल से शुरू होगी इन पार्टियों द्वारा दिये गये बयानों की  उधेड़-बुनाई कि फलां ने ये कहा और फलां ने वो....बयानों के इतर इस बीच न गांधी बचेंगे न  उनके सिद्धांत।
खैर, ये तो रहे गांधी जयंती समारोह के आफ्टर इफेक्‍ट्स.. मगर कुछ सवाल जो 1947 में  अनुत्‍तरित रह गये थे, वो आज भी वहीं खड़े हैं। जैसेकि हिंदू-मुसलमानों को स्‍वयं महात्‍मा  गांधी अपनी दो आंखें कहा करते थे.. और कहते थे कि इनमें से किसी एक के बिछुड़ने से  भारत अपूर्ण रहेगा। आज उन्‍हीं के इस 'पूर्ण देश' में हिंदुओं की बात करने भर से माहौल  सांप्रदायिक हो जाता है और मुसलमानों को तो 'मुसलमान' कह कर संबोधित करने तक में  आपत्‍ति है। मुसलमानों के लिए एक शब्‍द ईज़ाद किया गया ''संप्रदाय विशेष''। देश में कहीं भी  यदि हिंदू-मुसलमान के बीच है कोई फसाद हो जाए तो मीडिया रिपोर्टिंग में कहा जाता है.. दो  संप्रदायों के बीच ये हुआ... दो संप्रदायों के बीच वो हुआ..आदि-आदि ।
हिंदू का नाम लिया जा सकता मगर मुसलमान का नहीं..क्‍यों ? क्‍या मुसलमान इस देश के  वाशिंदे नहीं हैं या उन्‍हें ऐसा 'संप्रदाय विशेष' कहकर ''छेक देने'' की प्रवृत्‍ति जान-बूझकर  पनपाई जा रही है ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्‍तेमाल राजनीति के मोहरों बतौर किया जा  सके। कहीं भी दंगे हों तो सबसे पहले आवाज उठती है कि संप्रदाय विशेष को पाकिस्‍तान चले  जाना चाहिए। क्‍यों भाई..जिन देशों में अकेले मुस्‍लिम आबादी है तो क्‍या वहां मारकाट नहीं हो  रही। सच तो यह है कि सामाजिक हिंसा के सर्वाधिक मामले विश्‍व के उन देशों में दिखाई दे  रहे हैं जिन्‍हें इस्‍लामिक मुल्‍क कहा जाता है। वहां तो न कांग्रेस है ना बीजेपी.. ना दो  ''संप्रदाय'' और ''संप्रदाय विशेष'' जैसे शब्‍द।
आज गांधी को याद करने की और उनके शब्‍दों को दोहराने की रस्‍म अदायगी बखूबी निभाई  जायेगी मगर उनकी दोनों आंखों की सेहत और उनका मोल ये तथाकथित गांधीभक्‍त समझेंगे,  ऐसा फिलहाल तो नहीं लगता।
ये देश की कौन सी तस्‍वीर है हमारे सामने जिसमें राजनीति ने अपने पांसे कुछ इस कदर  फेंके हैं कि ना हिंदू, हिंदुस्‍तानी रह पा रहे हैं ना मुसलमान, भारतीय। भाषाएं तो कब की  विभाजित की जा चुकी हैं, अब लिबास भी सियासत के लिए विभाजित किया जा रहा है। तभी  तो जरूरतमंदों को साड़ी बांटते-बांटते अखिलेश सरकार सलवार सूट बांटने की बात करने लगी  है क्‍योंकि मुस्‍लिमों में साड़ी पहनने का रिवाज नहीं है।
सच तो यह है कि सांप्रदायिकता को लेकर सियासत के हमाम में सब नंगे हैं। कोई किसी से  कम नहीं।
रहा सवाल गांधी बाबा का.. तो उनका भी स्‍मरण सिर्फ और सिर्फ इसलिए किया जाता है  ताकि सांप्रदायिकता को लेकर की जा रही सियासत से उनके नाम को कैश किया जा सके।
चूंकि लालबहादुर शास्‍त्री इस फ्रेम में फिट नहीं बैठते और उनके नाम को सांप्रदायिकता के  लिए भुनाया नहीं जा सकता इसलिए वह आउटडेटेड मान लिए गए हैं। संभवत: इसलिए 2  अक्‍टूबर गांधी जी के नाम आरक्षित है।
 - अलकनंदा सिंह