सोमवार, 28 सितंबर 2015

विसर्जन किसका होना चाहिए ?

धर्म अगर शब्दों, प्रतीकों, मूर्तियों तक सिमट कर रह जाए तो उसमें जड़ता आना स्वाभाविक है... और यही जड़ता जब 'सिर्फ मैं' की संतुष्टि के लिए मरने-मारने पर उतारू हो जाए तो ज़रा बताइये, धर्म बचेगा क्या ?
धर्म पालन के नाम पर नियम-कानून से भी ख‍िलवाड़ किया जाना पिछले कुछ दिनों से एक शगल बनता जा रहा है। स्थ‍िति तब और खतरनाक हो जाती है जब कानून को स्वयं धर्मध्वज ही तोड़ने लगें। ऐसे में धर्म का कौन सा स्वरूप आमजन के बीच स्थापित होगा, इसकी परिणति लोगों की मानसिकता को कितना धस्त करेगी, इसे आसानी से समझा जा सकता है ।
गणेश प्रतिमा विसर्जन की आड़ में वाराणसी, गोंडा और मुंबई की घटनाएं धर्म के नाम पर असहिष्णु स्वरूप को लेकर यह सोचने के लिए काफी हैं कि आखिर किस ओर जा रहे हैं हम, कौन सी सोच को प्राश्रय दे रहे हैं?
भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापना के पीछे जो उद्देश्य होता है, उसे किस आतातायी युग में ले जा रहे हैं?
वाराणसी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सहित बजरंग दल व अन्य हिंदू धर्मावलंबियों ने गणेश प्रतिमा का गंगा में विसर्जन करने के लिए काशी के प्रशासन के समक्ष धरना दे रखा था। कोर्ट के आदेशों की वजह से प्रशासन उन्हें रोक रहा था जिसके परिणाम स्वरूप टकराव बढ़ा और वह लाठीचार्ज में तब्दील हो गया।
अब इस पर स्थानीय नेताओं के साथ-साथ प्राची जैसी बेलगाम जुबान वाली साध्वी भी इसे प्रशासन की हिंदू विरोधी कार्यवाही बताकर बरगलाने की कोशि‍श कर रही है ।
दूसरा मामला गोंडा में प्रतिमा विसर्जन को लेकर दो पक्षों के आपस में भि‍ड़ जाने का है। यहां भी कोर्ट के आदेशानुसार प्रतिमा विसर्जन के लिए बनाए गए कुंड में विसर्जन न करने पर कथ‍ित भक्तगण अड़े हुए थे और उसे नदी में प्रवाहित करना चाहते थे।
तीसरा मामला कुछ अलग है। मुंबई में प्रतिमा विसर्जन के दौरान गुटबाजी के चलते एक गुट के लोगों ने दूसरे गुट के व्यक्ति को प्रतिमा के साथ ही कुंड में डुबोकर मार दिया, सीसीटीवी फुटेज में मिले सबूतों से पता चला वरना वो महज हादसा बताकर रफा दफा कर दिया जाता।
वाराणसी और गोंडा की घटनाएं नदियों में प्रदूषण के प्रति आमजन की लापरवाही को ही नहीं, बल्कि धर्म को सिर्फ और सिर्फ ढोंग बनाकर पेश कर रही हैं। सदियों पूर्व नदियों की स्वच्छता के लिए स्वयं समाज ने जिन नियमों को बनाया था, आज वही अपने उन नियमों को तोड़ रहा है और नतीजा यह कि अब जीवनदायिनी नदियों को धर्म के इस रूप से ही बचाने को कोर्ट को सामने आना पड़ रहा है।
यह क्या लज्जा की बात नहीं कि हमें हमारी नदियों की शुद्धता व पवित्रता बनाए रखने के लिए कोर्ट को आदेश देना पड़ रहा है। समाज के इन धर्माध‍िकारियों से ये पूछा जाना चाहिए कि हर व्यक्ति को धर्म का उपदेश देने से पहले ये स्वयं ही धर्म को अपने आचरण में ढाल कर क्यों नहीं दिखाते ।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पुलिस प्रशासन की लाठियां खाते समय चीख रहे थे ''मैं अपने भगवान को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा'' ...तो  क्या अविमुक्तेश्वरानंद को यह नहीं बताया जाना चाहिए कि भगवान ''छोड़ने और पकड़ने'' की वस्तु नहीं होते। जो छोड़ना है वह है अपना अंधविश्वास, नदियों को प्रदूषित करने की अंधविश्वासी प्रवृत्ति।
इसी तरह गोंडा की घटना में मूर्ति विसर्जन को लेकर जो जिद अपनाई गई वह क्या गणेश की मूर्ति स्थापना का मज़ाक नहीं थी?
मुंबई में गणेश विसर्जन के साथ ही किसी की हत्या भी क्या धर्म के इसी बिगड़ते स्वरूप की बानगी नहीं है?
बहरहाल, पिछले कुछ दिनों से धर्म और उनके अनुयायियों की इतनी जमातें सामने आई हैं कि इन सब में इंसानियत तो कहीं पीछे छूटी ही, वो मुद्दे भी पीछे छूट गये जिनके लिए सरकारें अभी तक ना जाने कितना धन और समय बर्बाद कर चुकी हैं।
देश में लाखों की संख्या में साधु संत मौजूद हैं मगर आज तक कितनों ने नदियों के प्रदूषण को दूर करने की पहल की है। पूरा का पूरा जीवन साधना के नाम पर 'आराम' फरमाने पर जाया कर दिया।
स्वयं अविमुक्तेश्वरानंद चाहते तो एक अलग मिसाल कायम कर सकते थे, लीक से हटकर प्रतिमा विसर्जन की नई पद्धति ईज़ाद करते, कुछ अलग करने की पहल तो करते .... निश्च‍ित जानिए उन्हें सर आंखों पर बैठा लिया जाता ... । मगर धर्म की पट्टी बांधे लोगों से धर्म को इंसान व देश की बेहतरी के लिए प्रयुक्त करने की आशा करना बेमानी है। कट्टरवादिता का ये स्थापित रूप अब असहनीय होता जा रहा है।    
- अलकनंदा सिंह

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