शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

लाशों को गिनने का सिलसिला बंद होना चाहिए

महाभारत युद्ध के दौरान कई बार कृष्ण ने अर्जुन से परंपरागत नियमों को तोड़ने के लिए कहा था जिससे  धर्म की रक्षा हो सके, युद्ध के दौरान कर्ण ''निःशस्त्र'' थे तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, ''हे पार्थ, धर्म की  जीत के लिए कर्ण का वध जरूरी है, वह नि:शस्‍त्र ही क्‍यों ना हो।


मौत तो हर एक को एक ना एक दिन आनी ही है मगर कुछ ऐसी होती हैं जो सवालों को छोड़ जाती हैं,  नेताओं के बड़े बड़े निंदा प्रस्‍तावों के बीच बूढ़े कांधों पर जवान बेटे की अर्थी या कहीं नन्‍हा बच्‍चा मुखाग्‍नि  देता, ये सीन अब आम हो चले हैं, जवानों को अब अपनी आवाज अपनी नौकरी को दांव पर लगाकर  उठानी पड़ रही है। नासूर सिर्फ वो समस्‍यायें नहीं जो बॉर्डर पर खून बिखेर रही हैं, नासूर ये भावनायें भी हैं  जो रणनीतियों का बोझ ढोती हैं और अनुशासनहीनता का दंड भी।

आज फेसबुक पर अपना वीडियो पोस्‍ट करने वाला सीआरपीएफ जवान आरा/बिहार निवासी पंकज मिश्रा हो  या कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर ही बीएसएफ का जवान तेजबहादुर यादव हो, गाहे-ब-गाहे ''भीतर  सबकुछ ठीक'' है को नकारते हैं तो इसे अनुशासनहीनता से जोड़कर बात को दबा दिया जाता है और यही  दबाने की आदत आज पूरे देश पर भारी पड़ रही है।

दंतेवाड़ा, बस्तर, उड़ी , सुकमा… लगातार हमारे जवान शहीद हो रहे हैं और हम बस शहीद गिन रहे हैं।  एक रस्‍मआदयगी के तहत हमारे राजनेता निंदा के साथ मुंहतोड़ जवाब देने की बात करते हैं। कश्‍मीर की  अलगाववादी हुर्रियत हो या नक्सलवादी विचारधारा दिन पर दिन हावी होती जा रही है। कुछ  मानवाधिकारवादी इन नक्सलियों को आतंकी नहीं मानते तो कुछ मानवाधिकारवादी पत्थरबाजों को मासूम  कहने से नहीं हिचकते, भ्रमित विचारधारा के शिकार कहकर इनका बचाव किया जाता है।

ये रस्‍साकशी का खेल खेलकर भारत नक्सलियों से पचासों साल से जूझ रहा है,मगर हर हमले के बाद  राजनेता ट्वीट कर निंदा कर देते हैं और मीडिया एक दिन बहस कराकर अगले दिन मानवता के पाठ  पढ़ाते हुए अलगावादियों-नक्‍सवादियों को मासूम बताने लगती है।

फिलहाल सुकमा के इन 26 जवानों की शहादत के बाद भी क्या अब भी वे मानवाधिकारवादी नक्सलियों  को ही सही ठहराएंगे? यदि नहीं तो कब तक हम श्रद्धांजलि देते रहेंगे?

आज का नक्सल आंदोलन 1967 वाला आदर्शवादी आंदोलन नहीं रहा है बल्कि यह साम्यवादियों द्वारा  रंगदारी वसूलनेवाले आपराधिक गिरोह में बदल चुका है। इन पथभ्रष्ट लोगों का साम्यवाद और गरीबों से  अब कुछ भी लेना-देना नहीं है। हां, इनका धंधा गरीबों के गरीब बने रहने पर ही टिका जरूर है इसलिए ये  लोग अपने इलाकों में कोई भी सरकारी योजना लागू नहीं होने देते हैं और यहां तक कि स्कूलों में पढ़ाई भी  नहीं होने देते।

आप ही बताईए कि जो लोग देश के 20 प्रतिशत क्षेत्रफल पर एकछत्र शासन करते हैं वे भला समझाने से  क्यों मानने लगे? हर दिन, हर सप्ताह, हर महीना, हर साल भारतीय जवान मरते रहते हैं, राजनेता आरोप  प्रत्यारोप लगाकर इस खून सनी जमीन पर मिटटी डालते रहते हैं।

हमारी वर्तमान केंद्र सरकार नक्सली समस्या को जितने हल्के में ले रही है यह समस्या उतनी हल्की है  नहीं। यह समस्या हमारी संप्रभुता को खुली चुनौती है। हमारी एकता और अखंडता के मार्ग में सबसे बड़ी  बाधा है।

हमेशा से नक्सलवादी इलाकों में सरकार योजना लेकर जाती है। लेकिन लाशे लेकर आती है। भला क्या  कोई ऐसी समस्या स्थानीय हो सकती है? क्या यह सच नहीं है कि हमारे संविधान और कानून का शासन  छत्तीसगढ़ राज्य के सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही चलता है? क्या यह सच नहीं है कि वहां के नक्सली क्षेत्रों में  जाने से हमारे सुरक्षा-बल भी डरते हैं तो योजनाएं क्या जाएंगी?

आज इन सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि भारत के मध्य हिस्से में नक्सल बहुल इलाकों में इन  लोगों के पास धन और हथियार कहां से आता है? कौन लोग इन्हें लाल क्रांति के नाम पर उकसा रहे हैं?  यदि सरकार विश्व के सामने अपनी उदार छवि पेश करना चाहती तो उसे सुरक्षित भारत की छवि भी पेश  करनी होगी। जम्मू-कश्मीर और मिजोरम के बाद कई राज्य संघर्ष के तीसरें केंद्र के रूप में उभरे हैं जहां  पर माओवादियों के विरूद्ध सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती हुई है। पिछले लगभग साढ़े चार दशकों से चल  रहा माओवाद जैसा कोई भी भूमिगत आंदोलन बिना व्यापक जन सर्मथन और राजनेताओं के संभव है?  लंबे अरसे से नक्सल अभियान पर नजर रखे सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बिना तैयारी के सुरक्षा  बलों को नक्सल विरोधी अभियान में झोंक देना भूखे भेडि़यों को न्योता देने के बराबर है।

नक्सल अकसर ही गुरिल्ला लड़ाई का तरीका अपनाते हैं और उनकी हमला कर गायब होने जाने की  रणनीति सुरक्षा बलों के लिये खतरनाक साबित हुई है। नक्सली जिन इलाकों में अपना प्रभाव रखते हैं वहां  पहुंचने के साधन नहीं हैं। पिछले दस सालों से इन इलाकों में न ही सरकार और न ही सुरक्षा एजेंसियों ने  प्रवेश करने का जोखिम लिया है जिस कारण यह लोग मजबूत होते गये।

‘जब मौत केवल आंकड़ा बन जाए, जवाब केवल ईंट और पत्थर में तोला जाए, जब हमदर्द ही दर्द देने लगें  तो सुकमा बार बार होगा।’

महाभारत में कहा गया कि धर्म की रक्षा के लिए नि:शस्‍त्र का वध भी उचित है तो क्‍यों नहीं हमारी  सरकारें, हमारी सुरक्षा एजेंसियां और कथित मानवाधिकारवादी व मीडिया मिलकर उन लोगों का सच खोलते  और उन्‍हें जनता के सामने नंगा करते , कर्ण तो तब भी निशस्‍त्र थे मगर जो हमारे जवानों को मार रहे हैं  वे अत्‍याधुनिक हथियारों से लैस हैं तो इन कॉकरोचों की सफाई क्‍यों न घर से की जाए।

-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

#PresidentMukherjee conferred the 52nd Jnanpith Award on Prof. Sankha Ghosh in New Delhi today



Jnanpith Award has been the 52st Jnanpith Award to veteran modern Bengali poet Shankha Ghosh for year 2016. He is a leading authority on Rabindranath Tagore. Ghosh was conferred the Padma Bhushan in 2011 and the Sahitya Academi award in 1999. Shankha Ghosh is the seventh Bengali author to win India’s highest literary award.

Last year eminent Gujarati Litterateur Shri Raghuveer Chaudhary was declared recipient of 2015 Jnanpith Award. Prior Gyanpith award 2014 was given to Bhalchandra Nemade. Since some time, the Jnanpith Awards are being given a few years later than their year of award. Following the new precedent, Kedar Nath Singh was given the awarded in 2014 for year 2013.

- Alaknanda Singh

रविवार, 23 अप्रैल 2017

नाजनीन और हमसर हयात निजामी तो सिर्फ बानगीभर हैं

धर्म का काम है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना और राजनीति का  काम है लोगों का ध्‍यान रखना, उनके हित के लिए काम करना। जब धर्म  और राजनीति साथ-साथ नहीं चलते तब हमें भ्रष्‍ट राजनीतिज्ञ और कपटी  धार्मिक नेता मिलते हैं।

एक धार्मिक व्‍यक्‍ति जो सदाचारी व स्‍नेही है, अवश्‍य ही जनता के हित  की सोचेगा, उसका ख्‍याल रखेगा इसीलिए वह सच्‍चा राजनीतिज्ञ बनेगा।  सभी अवतार और महान उपदेशकों ने लोकहित का ध्‍यान रखा और  इसलिए वो धार्मिक बने रहे। अधार्मिक व्‍यक्‍ति या अधार्मिक सोच, दोनों  ही स्‍थितियां भ्रष्‍टाचार और अराजकता फैलाती हैं। धर्म कोई भी हो जो  ''संयम व स्‍वछंदता'' दोनों के साथ सामंजस्‍य बैठाकर चलता है, वही  पल्‍लवित होता है, अन्‍यथा वह अतिवाद का शिकार हो अपना मूल उद्देश्‍य  ही खो देता है।

अब देखिए ना, बात बहुत छोटी सी है मगर असर गहरा है। वाराणसी की  वरुणानगरम कालोनी का वाकया है जहां रामनवमी पर मुस्‍लिम महिला  संस्‍था की अध्‍यक्ष नाजनीन साहिबा ने भगवान श्री राम की आरती उतारी  और मुस्‍लिम महिलाओं को तीन तलाक की लड़ाई में जीत दिलाने का  आशीर्वाद मांगा।

बात यहां धर्म ''कौन सा है'' की है ही नहीं, बात तो सिर्फ उस आस्‍था की  है जिसके वशीभूत हो ये विश्‍वास जन्‍मा कि श्री राम का आशीर्वाद होगा  तो औरतों के हक की लड़ाई निर्णायक साबित होगी और उनके जज्‍़बे को  कोई हरा नहीं पाएगा।
ये मुस्‍लिम और हिंदू के बीच की बात ही नहीं थी कि नाजनीन साहिबा को  रामनवमी पर आरती करने तक ले गई। यह तो श्रीराम जैसे लोकनायक  के प्रति वो विश्‍वास था जो तीन तलाक के मुद्दे पर उनसे जीत का  आशीर्वाद मांगने पहुंचा।

नाजनीन तो एक उदाहरण है उनके लिए जिनके लिए धर्म, राजनीति की  मौजूदा अवधारणा से चार कदम आगे की बात है। जो स्‍पष्‍ट करती है कि  ''धर्म का काम है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना और राजनीति  का काम है लोगों का ध्‍यान रखना, उनके हित के लिए काम करना''।

यह उस अपनेपन और विश्‍वास की बात है जो मनौतियों के लिए किसी  धर्म के बीच बाकायदा ''प्‍लांट किए'' गए अंतर्विरोधों को लांघ जाती  है।

धर्म और राजनीति से ऊपर उठते हुए लोगों का एक और उदाहरण है --  हाल ही में एक सप्‍ताह तक वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में चले   संगीत महोत्‍सव का।

महोत्‍सव में दरगाह अजमेर शरीफ के कव्वाल हमसर हयात निजामी के  सूफी कलाम को संकट मोचन संगीत महोत्‍सव में जिसने भी सुना होगा  उसे यह अहसास तो हो ही गया होगा कि प्रार्थना हो इबादत हो, उन सभी  बंधनों और लकीरों से परे होती है जो हर रोज हर घड़ी लोगों के दिलों पर  खींची जाती हैं।

यह बात अलग है कि इन लकीरों को हर रोज नाजनीन, कव्वाल हमसर  हयात निजामी, श्रीराम मंदिर के पुजारी और संकटमोचन मंदिर का मंच  जैसे कई लोग व संस्‍थाएं मिलकर मिटाते भी जाते हैं। 

आजकल कुछ लोग मौजूदा राजनैतिक हालातों से बेहद ख़फा ख़फा से हैं  क्‍योंकि उन्‍हें खामियां निकालने को स्‍पेस नहीं मिल पा रहा और जो मिल  भी रहा है उसे वे परवान नहीं चढ़ा पा रहे, धर्म के नाम पर जिन मुद्दों को  वे उछालना चाहते हैं, वे अपने धब्‍बों के साथ उन्‍हीं के दामन पर जाकर  चिपक जाते हैं। एक अजब सी बौखलाहट है उनमें तभी तो कहते फिर रहे  हैं कि ''हमारी स्‍वतंत्रता'' बंधक बन गई है। धर्म और राजनीति का ये  सम्‍मिश्रण मठाधीशों-मौलवियों को जो आइना दिखा रहा है, वे उससे  विचलित हैं। कभी इन्‍हीं डरों पर वे अपना आधिपत्‍य रखते थे। 

बहरहाल, जो आजकल की राजनीति से निराश हैं, जो धर्म पर बोलने  वाली जुबानों से आहत हुए जा रहे हैं उनके लिए हिंदी के कवि शमशेर  बहादुर सिंह कहते हैं---

‘ईश्वर अगर मैंने अरबी में प्रार्थना की
तू मुझसे नाराज हो जाएगा?
अल्लमह यदि मैंने संस्कृत में संध्या की
तो तू मुझे दोजख में डालेगा?
लोग तो यही कहते घूम रहे हैं
तू बता, ईश्वर?
तू ही समझा, मेरे अल्लाह!
बहुत-सी प्रार्थनाएं हैं
मुझे बहुत-बहुत मोहती हैं
ऐसा क्यों नहीं है कि एक ही प्रार्थना
मैं दिल से कुबूल कर लूं
और अन्य प्रार्थनाओं को करने पर
प्रायश्चित करने का संकल्प करूं!
क्योंकि तब मैं अधिक धार्मिक
अपने को महसूस करूंगा,
इसमें कोई संदेह नहीं है.’


शमशेर जिस अधिक धार्मिकता की बात कर रहे हैं, वह सद्भाव से उपजती  है और सारी प्रार्थनाओं को संगीत बना देती है। सद्भाव से ही उपजा है वह  संगीत जो सबका है जिसे कव्वाल हमसर हयात निजामी गाते हैं ‘छाप  तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के...’ वहीं नाजनीन भी आरती  गाकर सद्भाव के द्योतक श्रीराम को मनाती हैं।

धर्म और राजनीति के बीच पैदा हो चुका ये अद्भुत समन्‍वय निश्‍चित ही  धर्म और राजनीति दोनों के अतिवादियों को बढ़िया सबक सिखायेगा, भला  बताइये कि उभरती अर्थव्‍यवस्‍था व शांति का संदेश देने वाले हमारे देश के  भविष्‍य के लिए इससे अच्‍छी खबर और क्‍या हो सकती है।

- अलकनंदा सिंह


बुधवार, 19 अप्रैल 2017

धार्मिक गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज़ उठाना ज़ुर्म है क्‍या


कबीर, रैदास, रसखान की भक्‍ति परंपरा वाले देश में धर्म के मूलभाव की धज्‍जियां किस तरह उड़ाती हैं, यह हम देख सकते हैं सोनू निगम द्वारा अजान पर कहे गए शब्‍दों के बाद आई प्रतिक्रियाओं से। इन शब्‍दों को लेकर सोनू निगम सुर्खियों में हैं, बॉलीवुड यूं भी आजकल अपनी रचनाओं और कृतियों से नहीं बल्‍कि ट्विटर पर अपने विचारों से सुर्खियों में रहने की कला आजमा रहा है।

दरअसल सोनू निगम ने एक के बाद एक लगातार तीन ट्वीट किये और अपनी  नींद में खलल डालने के लिए अजान की आवाज को दोषी बताते हुए कहा कि  इस गुंडागर्दी पर लगाम लगनी चाहिए। अजान का नाम आया तो ज़ाहिर है  बवाल होना ही था।

बवाल यहां तक बढ़ा कि आज बुधवार को सुबह सोनू निगम ने पश्चिम बंगाल के एक मौलवी के बयान पर अपने बाल मुंडवाने का एलान कर दिया था. सोनू निगम ने ट्वीट करते हुए कहा, ' आज दोपहर 2 बजे आलिम आएगा और मेरा सिर मुंडेगा. अपने 10 लाख रुपये तैयार रखो मौलवी'. सोनू ने इसके साथ ही अपने अगले ट्वीट में प्रैस को भी इसके लिए निमंत्रण दे दिया.
दरअसल डीएनए में छपी एक खबर में पश्चिम बंगाल अल्‍पसंख्‍यक युनाइटेड काउंसिल के एक वरिष्‍ठ सदस्‍य का बयान दिया है, 'यदि कोई उनका सिर मुंडवा कर, उनके गले में जूते की माला डालकर देश में घुमाएगा तो मैं खुद उस शख्‍स के लिए 10 लाख रुपये के पुरस्‍कार का एलान करता हूं.'

सोनू निगम ने अपने ट्वीट पर उठे विवाद पर की प्रेस कॉन्‍फरेंस में यह साफ कर दिया है कि वह किसी धर्म के विरोध में नहीं हैं और वह अपने मुस्लिम दोस्‍तों से उतना ही प्‍यार करते हैं. सोनू निगम ने अपने बाल कटवा लिए हैं. सोनू निगम ने कहा कि मेरा उद्देश्‍य किसी को चोट पहुंचाना या किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं था. उन्‍होंने दुख जताया है कि लोगों ने उनका मुद्दा समझने के बजाए उनकी बात को पकड़ा और उसके खिलाफ विवाद खड़ा कर दिया. सोनू ने अपने दावे को पूरा करते हुए अपना सिर मुंडवा का फैसला लिया है और इस काम के लिए उन्‍होंने अपने मुस्लिम दोस्‍त आलिम को चुना. आलिम हकीम सेलेब्रिटी हेयरस्‍टाइलिस्‍ट हैं. सोनू निगम ने कहा, मैं सोच भी नहीं सकता था कि इतनी छोटी सी बात इतनी बड़ी बन जाएगी.

सोनू ने कहा कि मगर आज भी मैं यही कहूंगा  कि ये गुडागर्दी है कि मैं मुस्‍लिम नहीं हूं फिर  भी जबरन मैं अजान क्‍यों सुनूं,  यही बात मंदिर-चर्च-गुरुद्वारा या ऐसे किसी भी ऑरगेनाइजेशन के लिए भी  कहूंगा।  

भारतीय जनमानस में धर्म के प्रति कटमुल्‍लावाद और कट्टरता इस हद तक  समाहित होता गया कि धर्म से जुड़ी कोई बात उठी नहीं कि हाज़िर हो जाते हैं  आलोचक एक दम बर्र के टूटे छत्‍ते की तरह। यही हुआ और आज सुबह तक  सोनू निगम अपने आलोचकों को अपनी बात का मर्म समझा रहे हैं।

कला की आलोचना समालोचना करते हुए किसी को कोई तकलीफ नहीं होती  मगर धर्म की बात आते ही इतिहास से निकल-निकल के सामने आती हैं  आलोचनाऐं।

चिंतन, मनन और कर्म का संदेश देते आए कमोवेश सभी धर्मों ने कभी भी  किसी दूसरे को आहत करने की बात नहीं कही।

कबीर का तो पूरा निर्गुण दर्शन प्रैक्‍टीकैलिटी पर ही टिका है जो मुस्‍लिमों को  असल धर्म बताते हुए कहते हैं कि-
कांकर पाथर जोरि कै मज्‍ज़िद लई बना।
ता पर मुल्‍ला बांग दे क्‍या बहरा हुआ खुदा।।

इसी तरह वे हिंदू धर्मावलंबियों से भी अंधे-बहरे बन कर जड़ होने से बाज आने  को कहते हैं-
पाथर पूजें हरि मिलें तौ  मैं पूजूं पहार।
जा ते तो चाकी भली पूज खाय संसार।।

हम सब जानते हैं कि लाउडस्‍पीकर लगाकर आए दिन कानफोड़ू संगीत के साथ  देवी जागरण, अखंड रामायण, श्री मद्भागवत कथा धर्म और ईश्‍वर से  हमें  मिलान के नाम पर ध्‍वनि प्रदूषण फैलाते हैं जिन्‍हें ना किसी बीमार की फिक्र  होती है और न किसी की नींद की।देर रात ड्यूटी से आने वालों की, परीक्षा देने  वाले छात्रों की शामत आ जाती है जब घर या पड़ोस में कोई ऐसा कार्यक्रम  होता है। अजीब बात यह भी है कि चिंतन और मनन करके ईश्‍वर प्राप्‍ति का शांति वाला उपदेश भी इन्‍हीं लाउडस्‍पीकर्स के द्वारा ही दिया जाता है।

तो फिर सोनू निगम कहां गलत हैं। सोनू निगम ने भी यह सच ही तो कहा है ये तो गुंडागर्दी है भाई।

धर्म के आतंक का यह रूप नि:संदेह भर्त्‍सनायोग्‍य है। मस्‍जिद हो, मंदिर हो, चर्च  हो या गुरूद्वारा सभी में लाउडस्‍पीकर्स पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। कई बार  तो सांप्रदयिक विवादों की जड़ में ये लाउडस्‍पीकर ही होते हैं। हालांकि कानूनी  तौर पर निश्‍चित फ्रीक्‍वेंसी पर लाउस्‍पीकर बजाने की इजाजत है मगर कानून  का पालन कितना होता है यह मौजूदा विवाद बता रहा है।

ईश्‍वर की खोज और पूजा पद्धतियों में शामिल होते गए इस शोरशराबे पर क्‍या  हम कबीर के कहे को सच नहीं कर सकते।

- अलकनंदा सिंह


गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अकेली कविता कृष्‍णन ही क्‍यों…इस अराजकता के हम सभी साक्षी हैं

हमारे देश में जिन शब्‍दों को ब्रह्म माना गया, सोशल मीडिया पर या इंटरनेट की दुनिया ने उनको  धराशाई करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। यहां शब्‍दों का ऐसा सैलाब आया हुआ है कि क्‍या  सही है क्‍या गलत, इनके प्रयोग से समाज में क्‍या प्रतिक्रिया होगी, कोई समझने को तैयार नहीं।

इंटरनेट पर अभिव्‍यक्‍ति को जिन उच्‍छृंखल शब्‍दों का सामना करना पड़ रहा है, उससे तो अर्थ का  अनर्थ होते देर नहीं लगती। सड़कछाप और संभ्रांत भाषा के बीच अब अंतर कर पाने में विचारधारा के  संकट से भी जूझना पड़ता है सो अलग। शब्‍दों के इन वीभत्‍स रूपों का डिसेक्‍शन कर पाना आसान  नहीं होता, वह भी तब जब लिखने वाला (चूंकि हर लिखने वाला लेखक नहीं होता) नकारात्‍मक सोच  वाला हो तो उसके लिखे गए शब्‍द अच्‍छाई में भी बुराई ढूंढ़ ही लेते हैं।

मुकम्‍मल कानून की कमी और पेचीदगियों के कारण इंटरनेट पर इन अपशब्‍दों ने हद से बाहर जाकर शर्मनाक स्‍थिति पैदा कर दी है। यह अपशब्‍दों का ऐसा मायाजाल तैयार कर चुका है कि इस  पर यदि समय रहते रोक नहीं लगाई तो हम इस शब्‍दजनित अराजकता के लिए स्‍वयं भी उतने ही  दोषी माने जाऐंगे जितने कि अपशब्‍दों के आविष्‍कारक हैं।

हाल ही में एक मामला वामपंथी सोशल एक्‍टिविस्ट कविता कृष्‍णन पर अपशब्‍दों के इसी आतंक का  आया है जिसने खूब सुर्खियां बटोरीं। ये बात इसलिए भी गंभीर है कि कथित स्‍वतंत्रता की आड़ लेकर  एक समाचार वेबसाइट द्वारा आपत्‍तिजनक शब्‍दों के साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ  कविता कृष्‍णन की विवादित टिप्पणी को पब्‍लिश किया जाता है।

जी हां, यह घृणित कारनामा किया है www.Hamariawaz.in नामक वेबसाइट ने जिसमें हाल ही में छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में वामपंथी महिला संगठनों की नेता कामरेड कविता कृष्णन ने  हवाले से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विवादित टिप्पणी को पब्‍लिश किया गया है।  वेबसाइट के अनुसार कविता कृष्णन ने कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री ने अपने बाप अमेरिका के  इशारे पर 1000 और 500 के नोट बंद कर दिए है, जिससे हमारे बस्तर में रहने वाले आदिवासी  भाइयों को आज भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है।
वेबसाइट के ही अनुसार कविता कृष्णन ने कहा कि.. ये देश का दुर्भाग्य है, जो पहली बार भारत को  नरेंद्र मोदी जैसा नपुंसक प्रधानमंत्री मिला। वो यही नहीं रुकी उसने कहा कि जो अपनी पत्नी और माँ  का नहीं हुआ वो देश का कैसे होगा। मोदी एक हिजड़ा है, और अगर ऐसा नहीं है, तो मेरे साथ  हमबिस्तर होकर अपनी मर्दानगी साबित करे। पूँजीपतियों का अरबों-खरबों का टैक्स माफ करने वाला  यह प्रधानमंत्री देशद्रोही और गद्दार है। वामपंथी नेता कविता कृष्णन ने आदिवासी महिलाओं के एक  सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि हम महिलाओं को भी फ्री सेक्स की आजादी चाहिए, जिस  तरह कोई भी पुरुष किसी भी महिला के साथ शारीरिक संबंध बना सकता है उसी तरह महिलाओं को  भी किसी भी पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाने का अधिकार होना चाहिए। हम महिलाएं भी अपने  मनपसंद पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाकर अपने काम वासना की पूर्ति कर सकें।
वामपंथी नेता कविता कृष्णन ने कहा कि सीआरपीएफ के जवान बस्तर में नक्सलियों के नाम पर  दलित आदिवासियों का एनकाउंटर कर रही है और आदिवासी महिलाओं के साथ सीआरपीएफ के  जवान बलात्कार करते हैं, हम इसका विरोध करते हैं।
वामपंथी महिला संगठनों की नेता कामरेड कविता कृष्णन ने कहा कि हमारी आदिवासी महिलाओं के  साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ हम लड़ाई लड़ेंगे और आजादी दिलाएंगे।

हालांकि कविता कृष्‍णन ने वेबसाइट Alt News में स्‍वयं की छवि को इस घृणित अंदाज़ में पेश किए  जाने को लेकर एक इंटरव्‍यू भी दिया है और www.Hamariawaz.in पर अदालती कार्यवाही किए जाने  की बात भी की है मगर यह सब तो आगे की बात है। एक प्रतिरोध की बात है।

मैं ये नहीं कहती कि कविता को लेकर उक्‍त वेबसाइट ने ऐसा क्‍यों लिखा, कविता को लेकर ही क्‍यों  लिखा, कविता अब क्‍या करेगीं या इस वेबसाइट पर अश्‍लील सामिग्री ही क्‍यों परोसी जाती  है…नेगेटिव ही सही पब्‍लिसिटी तो वेबसाइट को मिली ही आदि आदि…।

इन सबसे कविता भी निबट  लेंगी और सरकार व कानून भी, मगर बात वहीं आ जा जाती है कि अपशाब्‍दिक होती घातक सोच  और आधा गिलास भरा देखने की बजाय आधा गिलास खाली देखने की आदी हो चुकी इस प्रवृत्‍ति ने  देश की यह दशा कर दी है कि आज ऐसे लोगों ने प्रधानमंत्री को गरियाने की सारी हदें पार कर दी  है।

श्री श्री रविशंकर कहते हैं कि जो अधिक गालियां अथवा अपशब्‍द निकालते हैं वह स्‍वयं में अपने ही  भीतर से उतना ही अधिक असुरक्षित होते हैं। संभवत:यही असुरक्षा अपशब्‍द लिखकर पब्‍लिसिटी स्‍टंट  का रूप लेती है। हमें यदि इंटरनेट के पॉजिटिव इफेक्‍ट्स पता हैं तो इसकी बेलगाम दुष्‍प्रवृत्‍ति को भी  तो झेलना होगा।

हमें अपशब्‍दों की इस बेलगाम दुनिया का प्रतिकार करना होगा और कानूनी रूप से  भी आमजन में यह संदेश देना होगा कि नंगी सोच हो या नंगा बदन आकर्षण पैदा नहीं करते। हां,  एक क्षोभ भरा  कौतूहल अवश्‍य देते हैं वह भी मानसिक विकृति के लक्षणों के साथ। और इस  मानसिक विकृति से कोई भी ग्रस्‍त हो सकता है, हमें सावधान रहना होगा और दूसरों को सचेत भी  करना होगा।

– अलकनंदा सिंह

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

बात तो आलस्‍य की ही है ना...

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस आगामी 7 अप्रैल को मनाया जाएगा तब तक देखें आप स्‍वयं को स्‍वस्‍थ रखने के लिए क्‍या क्‍या कोशिश करते हैं। इस बार वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑरगेनाइजेशन ने इसकी थीम रखी है ''अवसाद''..; और अवसाद है मन की बीमार अवस्था जिसे सिर्फ स्‍वयं के मन से ही ट्रीट किया जा सकता है।

जब बात मन और इच्‍छाशक्‍ति की ही है तो इस संबंध में चार्वाक का "यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः" सिद्धांत पूरी तरह निरर्थक हो जाता है क्‍योंकि सुख से जीने के लिए यदि ऋण ले भी लिया तो उसे चुकाने के लिए भी मन पर जो बोझ रहेगा ,वह हमेशा के लिए रोगों को आमंत्रित कर सकता है।

इसलिए चार्वाक् के सिद्धांत से हटकर आप स्‍वयं अपनी तरह अपने लिए अपनी इच्‍छा से सोचें कि हमने क्‍या क्‍या किया और क्‍या क्‍या करना है।

हममें से अधिकतर को आपने यह कहते सुना होगा, '' क्‍या करें...रोग है कि जाने का नाम ही नहीं ले रहा...इस बीमारी ने तो नाक में दम कर रखा है...ना जाने कब इससे छुटकारा मिलेगा'' या आपके द्वारा कोई सहज और सर्वथा साधारण व प्रभावी उपाय बताए जाने पर कुछ लोग ये भी कहते सुने होंगे,'' क्‍या करें इतना समय ही कहां है जो हम ये कर पाऐं'' मगर ये  100 प्रतिशत सही मानिए कि जो आपके कहने पर अपना जवाब तैयार रखते हैं और चट से आपकी सारी सलाहों पर दे मारते हैं , वे स्‍वयं के लिए भी ये चाहते ही नहीं कि वे निरोग रहें।

कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो आपसे स्‍वस्‍थ रहने की या अपनी बीमारी की चर्चा इस उद्देश्‍य से करते हैं कि आप कोई उपाय सुझाऐं ,आपके द्वारा इलाज की विधि बताते ही वे अपना ज्ञान कमजोर होते देख आक्रामक मुद्रा में कहते हैं कि '' हां, ये तो हमें पता है...मगर करने का टाइम किसके पास है''। ऐसे में आप उनकी इस आक्रामक प्रतिक्रिया से आहत ना हों..ना...ना कतई नहीं। ऐसे व्‍यक्‍ति स्‍वयं को निरोग रखना चाहते हैं परंतु उनके भीतर इच्‍छाशक्‍ति की बेहद कमी होती है जो चाहती है कि कार्य पूरा हो मगर वे स्‍वयं ना करें। हालांकि ऐसा वे जानबूझकर करते हैं या आदतन अभी इस बावत कोई शोध भले ही ना आया हो मगर हमारी-आपकी कहानी है  जो रोज-ब-रोज घटती है। निरोग रहने की इच्‍छाशक्‍ति के आगे ऐसा कोई कारण नहीं कि रोग ठहर जाए, देर हो सकती है मगर रोग को जाना ही होगा।

संक्रामक रोगों की बात छोड़ दें तो लाइफस्‍टाइल से उपजे रोगों के उपजने और फैलने में मन और इच्‍छाशक्‍ति का रोल बेहद अहम होता है। मन की तैयारी और उसका शरीर पर अनुपालन करने तक निरोग रहने के लिए किए उपाय स्‍वयं ही करने होंगे।

किसी भी प्रकार का आलस्‍य ''रोग- आमंत्रण'' का पहला कारण है।  प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति की कामना होती है सर्वथा निरोग रहने की मगर उसके लिए वह स्‍वयं जब तक प्रयास नहीं करेगा तब तक निरोग रहने की उसकी आकांक्षा सिर्फ मन की कल्‍पना तक ही सीमित रह जाएगी। अगर आप सुबह जल्‍दी नहीं उठते, अगर आप रात को देर से सोने का बहाना अपने लिए बचाकर रखते हैं , अगर आप योग और किसी अन्‍य कसरत से दूरी बनाकर रखते हैं, अगर आप कर्म की अपेक्षा प्रवचन में विश्‍वास रखते हैं, अगर आप परहेज से अधिक अधिक दवाओं पर विश्‍वास करते हैं, अगर आप शारीरिक श्रम कम करते हैं और अनेकानेक बहानों की तलाश में रहते हैं तो निश्‍चित जानिए आप का निरोग रहने का सपना महज सपना ही रह जाने वाला है।

बाबा रामदेव हो, श्री श्री रविशंकर या प्रधानमंत्री मोदी ये तीनों ही भरपूर कोशिश कर रहे हैं कि निरोग रहने के लिए देश का हर व्‍यक्‍ति अपने स्‍तर पर ऊर्जावान बने, वह मानसिक और शारीरिक तौर पर स्‍वस्‍थ रहे। योजनाओं के साथ साथ ये तीनों ही अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ रहे मगर अब भी रोगियों की संख्‍या घटने का नाम नहीं ले रही क्‍योंकि जो पहला कारण है '' अपनी देह के रखरखाव के प्रति आलस्‍य '' उसे लेकर तो स्‍वयं संबंधित व्‍यक्‍ति को ही सोचना होगा।
इसीलिए देश में नित्‍य बढ़ रहे रोगियों में संक्रामक -लाइलाज रोगियों का आंकड़ा उतना नहीं है जितना कि लाइफस्‍टाइल रोगियों का।

निश्‍चित ही चार्वाक् के सिद्धांत में से ऋण लेकर घी पीने को यदि निकाल देने का समय है अब क्‍योंकि वह ना तो समयानुकूल है और ना ही परिस्‍थितनुकूल, तो सुख से जीने के लिए निरोग रहना जरूरी है और इसके लिए स्‍वयं ही (अपने भीतर से भी) आपको ही कोशिश करनी होगी।

-  अलकनंदा  सिंह

गुरुवार, 30 मार्च 2017

क्‍या आपने मृणाल पांडे का लेख पढ़ा?

क्‍या आपने मृणाल पांडे का लेख पढ़ा? नहीं पढ़ा तो 29 मार्च के दैनिक जागरण का संपादकीय पृष्‍ठ पढ़  लीजिएगा। कल यानि 29 मार्च को छपा यह लेख मृणाल जी में मौजूद गजब की प्रतिभा को दर्शाता है,  वो प्रतिभा जो उन्‍हें विरासत में मिली और जिसके बूते उन्‍होंने राष्‍ट्रीय समाचार पत्र दैनिक हिन्‍दुस्‍तान  में संपादन का भारी भरकम बोझ अपने कांधों पर लादे रखा। इसी प्रतिभा में चार चांद लगाती है उनके  भीतर की एक और प्रतिभा, और वो प्रतिभा है- ''हद दर्जे की नेगेटिविटी को जाहिर करने और उसे  छपवाकर गौरवान्‍वित होने की''। वो प्रतिभा जिसके वशीभूत हो उन्‍होंने अपने संपादनकाल में जो  नेगेटिविटी भाजपा के प्रति संजोई थी। उसी प्रतिभा को उन्‍होंने 29 मार्च के अपने लेख में पूरीतरह उड़ेल  दिया, मानो कल मौका मिले ना मिले। वे भाजपा, मोदी और वर्तमान में जीएसटी बिल की जबरन  बखिया उधेड़ रही थीं।
लोकतंत्र की खासियत ही ये है कि किसी भी सरकार को जब हम चुनते हैं तो उसके कामकाज की  समीक्षा करने का भी हक हमें हासिल होता है। मगर समीक्षा करते समय यह देखा जाना जरूरी है कि  हम निरपेक्ष रहें। खासकर हम मीडिया वालों को सावधानी, सकारात्‍मकता और तुलनात्‍मक दृष्‍टि रखनी  चाहिए, बिना किसी पूर्वाग्रह या विचारधारा को पालने के। देश हित में और आमजन के लिए नीतियों  को लागू करने में जो कमी हो, उसे जरूर उजागर करना चाहिए मगर किसी सोच का ठप्‍पा लगने से  बचना चाहिए। मृणाल जी की भाषा शैली और चुनचुन कर सरकार के हर कदम को आरोपों से घेर देना  ठीक नहीं। वामपंथ हो या दक्षिणपंथ, लोग सभी का सच जानते हैं और इनकी कार्यशैली भी।

बहरहाल मृणाल पांडे जी ने इस लेख में लिखा-
1. 2014 तक आधार कार्ड की बखिया उधेड़ रहे नरेंद्र मोदी ने जहां आधारकार्ड को सरकारी योजनाओं  का लाभ उठाने वालों के लिए अनिवार्य कर दिया है वहीं सुरक्षा संबंधी उपायों के लिए आमजन की  निजी सूचनाऐं जुटाने के लिए प्राइवेसी में सेंध लगाने का बंदोबस्‍त कर दिया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने  इसे गैर जरूरी बताया है।
उन्‍होंने लिखा कि-
2. जीएसटी बिल के संशोधनों पर बिना संसद में चर्चा कराए तिकड़म से वित्‍तमंत्री अरुण जेटली ने इसे  पास करा लिया।

उन्‍होंने लिखा कि-
3. उत्‍तरप्रदेश में आरएसएस का एजेंडा वाली राज्‍य सरकार ने पदभार संभालते ही एंटीरोमिओ स्‍क्‍वायड  बनाकर युवाओं में दहशत फैलाने का काम शुरू कर दिया है। अवैध बूचड़खानों के नाम पर वे  अल्‍पसंख्‍यकों की बड़ी आबादी को बेरोजगार बना रहे हैं आदि आदि।

फिलहाल ये  तीनों प्‍वाइंट्स पर मुझे घोर आपत्‍ति है। ये उसी तरह का लेख है जो जेएनयू में कथित  आजादी छाप छात्रों का बयान हुआ करता था, जिन्‍हें राष्‍ट्रवाद से अभिव्‍यक्‍ति की आजादी खतरे में  दिखाई देती थी।

मृणाल जी क्‍या बताऐंगी कि देश में ''एक कर प्रणाली'' से क्‍या नुकसान हो सकते हैं। सिवाय महंगाई  घटने, टैक्‍स डिपार्टमेंट के भ्रष्‍ट कर्मचारियों-ऑफीसर्स द्वारा व्‍यापारियों से वसूली बंद हो जाने, टैक्‍स दर  टैक्‍स की लंबीचौड़ी फाइल दौड़ बंद होने जैसी दिमाग-खपाऊ कार्यपद्धति से निजात मिल जाना क्‍या उन्‍हें  अच्छा नहीं लग रहा। क्‍या देश के तेज विकास में लालफीताशाही रोड़ा नहीं रही। मृणाल जी क्‍या ये भी  बताऐंगीं कि इससे निपटने की सारी कवायद पिछली सरकारों ने भी कीं मगर वे सफल क्‍यों नहीं हो  सकीं।

मृणाल जी, आधार कार्ड जरूरी बिल्‍कुल नहीं मगर अपनी प्राइवेसी का बहाना बनाकर उन ग्रामीण और  वंचितों को हम क्‍यों भूल रहे हैं जो आज आधार कार्ड के जरिए ही सरकार से तमाम योजनाओं का  लाभ उठा पा रहे हैं। गैस सब्‍सिडी के पैसे, बैंक में आसान काम और जनधन योजना, पेंशन योजना,  बीमा योजना से लाभान्‍वित हुए हैं।

मृणाल जी का अगला क्षोभ था उत्‍तरप्रदेश में एंटीरोमिओ स्‍क्‍वायड के अभियान पर, मगर उन्‍होंने उन  एसिड अटैक विक्‍टिम्‍स का दर्द अनदेखा कर दिया जिनके ऊपर जुल्‍म की शुरुआत ही छेड़छाड़ से होती  है, जबरदस्‍ती से होती है, वे आजीवन उस घृणास्‍पद अनुभूति के साथ जीती हैं।

मृणाल जी उन लड़कियों के प्रति क्‍या कहेंगी जिन्‍हें छेड़छाड़ के कारण स्‍कूल-बाजार-आना जाना सब  छोड़ना पड़ता है, दहशत में घर से निकलते वक्‍त सौ सौ घूंट अपनी बेबसी के पीने पड़ते हैं। इसी  छेड़छाड़ ने अपने जेंडर पर शर्म करना लड़कियों की किस्‍मत बना दिया।

मृणाल जी क्‍या अपनी बेटियों-बहनों को इस शर्मिंदगी से और शोहदों की जाहिलाना हरकतों से बचाने  वाली राज्‍य सरकार गलत कर रही है। अपराधों को बढ़ावा देने की ये कथित ''मानवाधिकारी सोच''  घातक है।

मृणाल जी ने अवैध बूचड़खानों को बंद करने पर जो क्षोभ जताया, तो कोई भी राज्‍य सरकार यदि  अपने राज्‍य में अवैध गतिविधि रोकने को कदम उठाती है तो उसे किस एंगिल से गलत कहा जा  सकता है। समझ से परे की है ये बात।

सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध करना और अपनी मानसिकता को उसमें डालकर ऊलजलूल लिखते  जाना मृणाल जी जैसी हस्‍ती के लिए समाज में अच्‍छा संदेश नहीं देती। आलोचना करते समय यह भी  ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि उसकी तुलना जायज के साथ हो रही है या नाजायज के साथ।

मृणाल जी से कहना चाहूंगी कि प्रकृति हर पल सहायक और प्रेरक है, जो लोग प्राकृतिक, स्वाभाविक  और मर्यादित जीवन के अभ्यासी होते हैं वे प्राकृतिक सहजता, सरसता और आनंद के अधिकारी बन  जाते हैं। इतनी नेगेटिविटी अच्‍छी नहीं। भरोसा रखें तो परिणाम भी पॉजिटिव मिलेंगे। गिलास आधा  भरा दिखेगा, खाली नहीं।

-अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 28 मार्च 2017

''नवरात्रि'' एक ऊर्जा संकलन का प्रवाह : अजा, अनादि शक्ति अविनाशिनी...

सकारात्‍मक सोचों के ऊपर हावी होते इस क्रिटिकल समय में जब कि राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर नेगेटिव ऊर्जा को प्रवाहित करने वाले अनेक लोग विध्‍वंसक सोचों के साथ उपस्‍थित हों तब उत्‍सवरूप में ''नवरात्रि'' एक ऊर्जा संकलन का प्रवाह बनकर हमारे समक्ष उपस्‍थित होती हैं। तभी तो सनातन धर्म में मनाए जाने वाले उत्‍सवों में एक नवरात्रि ही है जो मुख्‍य ऋतुओं के संधिकाल में आती है।

आज से नवरात्रि का शुभारंभ हो रहा है जिसे शक्‍ति, ऊर्जा, आस्‍था के आव्‍हान के साथ साथ नकारात्‍मक वृत्‍तियों को दूर रखने वाले दिनों के रूप में जाना जाता है और प्रतीकात्‍मक रूप से मूर्तिरूप में ध्‍यान का एक केंद्र बनाकर स्‍वयं को आदिशक्‍ति (आंतरिक ऊर्जा) को समेटने की क्रिया को मन शांति की ओर ले जाया जाता है और पूरे नौ दिन तक यह क्रिया अपने एक एक चरण पूरे करते हुए हमारे मन को आंतरिक व नैतिक रूप से सबल बनाती है।
नवरात्रि ‘शक्ति तत्व’ का उत्सव है। अगमा के अनुसार ‘शक्ति’ को तीन रूप में पूजा जाता है – इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति। पुराणों (या कल्पों) के अनुसार शक्ति को महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में पूजते हैं।  नौ दिनों तक देवी महात्यम और श्रीमद देवी भागवतम का जाप किया जाता है|

यह अद्भुत है जहाँ एक ओर बाहरी तौर पर उत्सवी रूप है तो दूसरी ओर आप अपने भीतर की गहराई में जाकर आत्मज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया से गुजरते हैं|

मन के छह विकार होते हैं – काम, क्रोध, लोभ, मद , मोह और ईर्ष्या। ये विकार किसी भी मनुष्य में नियंत्रण के बाहर हो सकते हैं और तब ये आध्यत्मिक पथ पर बाधा बन जाते हैं| इन नौ दिनों में ‘शक्ति’ की कृपा से ये विकार स्वतः ही मिट जाते हैं|

इसीलिये इन नौ दिनों में तपस्या और उपासना को महत्‍व दिया गया है जिसमें ध्यान बहुत महत्वपूर्ण है|

ध्‍यान से मन शांत होकर स्‍वयं में विश्‍व और विश्‍व में स्‍वयं को देख सकता है, ये ध्‍यान ही है जो दूसरों में कमियां देखने से पहले अपनी ओर देखता है, ये ध्‍यान ही है जो व्‍यक्‍ति को निर्लिप्‍त बना सकता है। और जब ऐसा होता है तो नकारात्‍मकता स्‍वयं उस दृष्‍टि में बदलने लगती है जो दूसरों के प्रयासों की सराहना, उनके औचित्‍य को समझ सके।

नवरात्रि देवी मंदिरों में जाकर नौ दिनों तक निराहार रहने का ही उत्‍सव नहीं बल्‍कि यह कर्म-ऊर्जा को शक्‍ति बनाकर उसे आमजन की ओर प्रवाहित करने का उत्‍सव है। यह उत्‍सव है नकारात्‍मकता को सकारात्‍मक प्रवाह की ओर ले जाने का। मौजूदा समय में इस ऊर्जा-उत्‍सव की बहुत आवश्‍यकता है।

देश की हवा में तैर रही नकारात्‍मक प्रवृत्‍तियों और व्‍यक्‍तियों पर अंग्रेजी का एक quote याद आ रहा है-

"stay way from negative people. they have a problem for every solution"

सो जोर शोर से मनाइये नवरात्रि उत्‍सव और मन से मनाइये ताकि ऊर्जा आपके भीतर बहे और इसका प्रवाह समाज के सकारात्‍मक कल्‍याण की ओर हो। सकारात्‍मकता और शांति के संवाहक भगवान श्रीराम ने भी की कुछ इस तरह थी नवरात्रि पूजा-

अजा, अनादि शक्ति अविनाशिनी सदा शंभु अरघंग निवासिनी,
जगसंभव पालन कारिनी निज इच्छा लीला वपु धारिणी।

-अलकनंदा सिंह

शनिवार, 25 मार्च 2017

BITS पिलानी का शोध- वेद , मंत्र और मनोविज्ञान

वेदों की बात करते ही क्‍या हम दक्षिणपंथी हो जाते हैं, क्‍या वेद की बात से नकारात्‍मकता खत्‍म होती है, क्‍या वेदों में जिन मंत्रों का उल्‍लेख है-उनकी बात पिछड़ेपन की मानी जाए...आज इन सबपर सोचने का समय आ गया है जब चारों ओर ऋणात्‍मक ऊर्जा तैर रही हो तब इस संदर्भ में सोचा जाना जरूरी है।

मैथिली शरण गुप्‍त, सुभद्राकुमारी चौहान से लेकर रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी  अनेक कविताओं में देश की स्‍वतंत्रता से पहले निज स्‍वतंत्रता और मन की  स्‍वतंत्रता को चाहे जिस तरह भी व्‍याख्‍यायित किया हो मगर आज तक हम  स्‍वतंत्रता के अर्थ नहीं समझ सके। इसका नतीजा यह कि हमारे ही सबसे पुराने  और वैज्ञानिक प्रयोगों से आच्‍छादित वैदिक कालीन निष्‍कर्षों पर अब फिर से शोध  करने की आवश्‍यकता महसूस होने लगी।
गनीमत यह रही कि विदेशी वैज्ञानिकों की ओर से इसकी शुरुआत की गई वरना  हमारे देश में वैदिक कालीन सभ्‍यता और उसकी वैज्ञानिकता की बात करने वालों  को दक्षिणपंथी, संघी, पोंगापंथी और कथित तौर पर घोषित अल्‍पसंख्‍यकों को  प्रताड़ित करने वाला बताकर उनका अंधविरोध किया जाता है। नकारात्‍मकता की  सारी हदें पार करने वाले हालांकि अपने खाते में ''सिर्फ और सिर्फ बातें'' ही रखते  हैं, कोई ऐसी उपलब्‍धि उनके पास नहीं जो वो वैदिक कालीन वैज्ञानिक प्रयोगों को  झुठला सकें। 

हमारे देश में आक्रमणकारियों ने जितना नुकसान नहीं पहुंचाया उतना तो इन  आयातित सोचों पर पलने वाले कथित बुद्धिजीवियों ने नकारात्‍मक सोच और  विध्‍वंसक दृष्‍टि का प्रचार करके किया है।

मंत्रों पर शोधकार्य की वैदिक कालीन वैज्ञानिक प्रयोगों के संदर्भ में कल हैदराबाद  से एक रिपोर्ट आई। बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी (BITS) पिलानी के  हैदराबाद कैम्पस की एक रिसर्च में यह दावा किया गया है कि वैदिक मंत्रों का  जाप करने से छात्रों को पढ़ाई से होने वाले तनाव से निपटने और परीक्षा में  बेहतर अंक मिलने में मदद मिलती है।

इतना ही नहीं, वैदिक मंत्रों के जाप से छात्र मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तौर पर  बेहतर होते हैं और उन्हें एकाग्रता बढ़ाने में भी मदद मिलती है।

रिसर्च में हिस्सा ले रहे छात्रों ने 5 मंत्रों का उच्चारण किया जिनमें गायत्री मंत्र  (ऋगवेद से), विष्णु सहस्रनामम (भगवान विष्णु के एक हजार नाम), ललिता  सहस्रनामम (माता के हजार नाम), पुरुष सुक्तम (ब्रह्मांड से जुड़ा मंत्र, ऋग्वेद  से), आदित्य हृदयम (सूर्य देव की स्तुति) शामिल रहे। मंत्रोच्चारण के बाद छात्रों  की सामान्य खुशहाली और बुद्धि की स्पष्टता में बेहतरी दर्ज की गई।

बिट्स पिलानी, हैदराबाद कैम्पस में सोशल साइंस और ह्यूमैनिटी विभाग की डॉ.  अरुणा लोला ने कहा, ‘हमने इस शोध के पहले और बाद में मनोवैज्ञानिक टेस्ट  किया गया। इसमें विषयों को लेकर दिमागी स्पष्टता और सामान्य खुशहाली में  बढ़ोत्तरी देखी गई।
मंत्रोच्चारण एक शक्तिशाली आवाज या वाइब्रेशन है जिसकी मदद से कोई भी  अपने दिमाग को स्थिर रख सकता है।
''ओम'' के उच्चारण से तनाव से राहत मिलती है और याददाश्त भी बढ़ती है।’  यह शोध धर्म और स्वास्थ्य के नए अंक में पब्लिश हुआ है।
डॉक्टर लोला ने बताया, ‘यह शोध मंत्र के प्रयोग और इंसानी दिमाग पर इसके  प्रभाव के साथ ही इसके पीछे के आध्यात्मिक विज्ञान को जानने के मकसद से  किया गया।’

इस रिसर्च पर अभी तक किसी नकारात्‍मक सोच वाले कथित बुद्धिजीवी की कोई  ''प्रगतिवादी'' टिप्‍पणी नहीं आई है, हालांकि मैं इसका इंतज़ार कर रही हूं।

बहरहाल, अभी तक मंत्र चिकित्‍सा से अनेक रोगों का निदान संभव किया जा  चुका है। मंत्र से विविध शारीरिक एवं मानसिक रोगों में लाभ मिलता है। यह बात  अब विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि मनुष्य के शरीर के साथ-साथ यह समग्र  सृष्टि ही वैदिक स्पंदनों से निर्मित है। शरीर में जब भी वायु-पित्त-कफ नामक  त्रिदोषों में विषमता से विकार पैदा होता है तो मंत्र चिकित्सा द्वारा उसका  सफलता पूर्वक उपचार किया जाना संभव है।

अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार कैंसरयुक्त फेफड़ों,  आंत, मस्तिष्क, स्तन, त्वचा और फाइब्रो ब्लास्ट की लाइनिंग्स पर जब सामवेद  के मंत्रों और हनुमान चालीसा के पाठ का प्रभाव परखा गया तो कैंसर की  कोशिकाओं की वृद्धि में भारी गिरावट आई। इसके विपरीत तेज गति वाले  पाश्चात्य और तेज ध्वनि वाले रॉक संगीत से कैंसर की कोशिकाओं में तेजी के  साथ बढ़ोत्तरी हुई।

मंत्र चिकित्सा के लगभग पचास रोगों के पांच हजार मरीजों पर किए गए  क्लीनिकल परीक्षणों के अनुसार दमा, अस्थमा रोग में सत्तर प्रतिशत, स्त्री रोगों  में 65 प्रतिशत, त्वचा एवं चिंता संबंधी रोगों में साठ प्रतिशत, उच्च रक्तदाब,  हाइपरटेंशन से पीड़ितों में पचपन प्रतिशत, आर्थराइटिस में इक्यावन प्रतिशत,  डिस्क संबंधी समस्याओं में इकतालीस प्रतिशत, आंखों के रोगों में इकतालीस  प्रतिशत तथा एलर्जी की विविध अवस्थाओं में चालीस प्रतिशत औसत लाभ हुआ।  निश्चित ही मंत्र चिकित्सा उन लोगों के लिए तो वरदान ही है जो पुराने और  जीर्ण क्रॉनिक रोगों से ग्रस्त हैं।

कहा गया है कि जब भी कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करता है तो अनेक  प्रकार की संवेदनाएं इस मंत्र से होती हुई व्यक्ति के मस्तिष्क को प्रभावित करती  हैं। जर्मन वैज्ञानिक कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मुंह से कुछ बोलता  है तो उसके बोलने में आवाज का जो स्पंदन और कंपन होता है, वह 175 प्रकार  का होता है। जब कोई कोयल पंचम स्वर में गाती है तो उसकी आवाज में 500  प्रकार का प्रकंपन होता है लेकिन जर्मन वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि दक्षिण  भारत के विद्वानों से जब विधिपूर्वक गायत्री मंत्र का पाठ कराया गया, तो यंत्रों  के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि गायत्री मंत्र का पाठ करने से संपूर्ण स्पंदन के  जो अनुभव हुए, वे 700 प्रकार के थे।

जर्मन वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति पाठ न भी करे, सिर्फ पाठ  सुन भी ले तो भी उसके शरीर पर इसका प्रभाव पड़ता है। उन्होंने मनुष्य की  आकृति का छोटा सा यंत्र बनाया और उस आकृति में जगह-जगह कुछ छोटी-छोटी  लाइटें लगा दी गईं। लाइट लगाने के बाद यंत्र के आगे लिख दिया कि यहां पर  खड़ा होकर कोई आदमी किसी भी तरह की आवाजें निकालें तो उस आवाज के  हिसाब से लाइटें मनुष्य की आकृति में जलती नजर आएंगी, लेकिन अगर किसी  ने जाकर गायत्री मंत्र बोल दिया तो पांव से लेकर सिर तक सारी की सारी लाइटें  एक साथ जलने लग जाती है। दुनियाभर के मंत्र और किसी भी प्रकार की आवाजें  निकालने से यह सारी की सारी लाइटें नहीं जलतीं। एक गायत्री मंत्र बोलने से सब  जलने लग जाती हैं क्योंकि इसके अंदर जो वाइब्रेशन है, वह अद्भुत है।

हमारे देश के पास इतने आश्‍चर्यजनक वैज्ञानिक प्रयोगों की थाती है और हम  आज भी इनके परिणामों पर यदि संदेह करते हैं तो जिन कवियों ने जिन  स्‍वतंत्रता सेनानियों ने जिन दार्शनिकों ने मन की स्‍वतंत्रता हासिल करने की बात  कही वह सब निरर्थक ही हो जाएगा। हम अपने ही मंत्रों की सार्थकता सिद्ध करने  के लिए औरों पर निर्भर रहें, इससे बड़ी परतंत्रता और क्‍या होगी।
वेदों ने जो मंत्रों की थाती हमें सौंपी है, उस पर हमें गर्व होना चाहिए संशय नहीं।  संशय विवेक को खा जाता है और हमारे कथित बुद्धिजीवी संशयों से ग्रस्‍त रहे हैं  तो उन्‍हें मंत्रों की शक्‍ति-वैज्ञानिकता और उसकी वृहद शक्‍तियों पर विश्‍वास हो भी  तो कैसे।

बहरहाल, हैदराबाद के शोधकार्य ने उनके भी मुंह बंद कर देने का इंतज़ाम कर  दिया जो कहते थे कि मंगलयान से पहले वैज्ञानिकों ने पूजा और अपने-अपने  इष्‍ट देवों का ध्‍यान क्‍यों किया। अब संभवत: वे समझ जाऐं कि मंत्र से  मंगलयान जैसे अभियान को सफलता तक आखिर किस कॉन्‍फीडेंस ने पहुंचाया।
मंत्रों पर अनेकानेक शोधों की आवयश्‍कता है, तभी हम अपनी आने वाली पीढ़ियों  के लिए एक सकारात्‍मक वातावरण बना सकेंगे।

- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 15 मार्च 2017

नाक पै आफत

अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस गुजर गया, होली भी हो ली और हुरंगा भी... मगर इस बीच कुछ घटनाऐं ऐसी  घटीं जिनसे बात बात में 'नाक' आड़े आई। कहीं तीन तलाक मामले में मुस्‍लिम महिलाओं ने उलेमाओं  की नाक को नीचा किया तो कहीं महिला प्रधान फिल्‍मों पर सेंसर बोर्ड की नाक नीची हुई और चलते  चलाते इन दोनों ही बदलावों में 'नाक' की आफत आ गई।

बड़ी नाइंसाफी है रे...कि चेहरे पर मौजूद एक अदने से अंग को लेकर गांव के गांव रंजिशों में स्‍वाहा हो  रहे हैं। अरे भई! नाक को लेकर हम इतना सेंसिटिव क्‍यों हैं। नाक को स्‍त्रीलिंग क्‍यों माना गया और  माना गया सो तो ठीक मगर इज्‍जत के साथ नाक को क्‍यों जोड़ा गया। ज़ाहिर है जब स्‍त्रीलिंग माना  गया और इज्‍ज़त से जोड़ा गया तो इसका ठीकरा महिलाओं के माथे फूटना था।

विशेषणों में ज़रा देखिए नाक का सवाल, नाक का बाल, नाक बहना, नाक में दम, नाक की बात, ऊंची  नाक, नकटी नाक, नाक नीची आदि जो भी मुझे याद आ रहा सभी में स्‍त्रीलिंग को दोषी या कारक  बताया गया है।

फिर सवाल उपजता है कि नाक कटना या नाक नीची होने को स्‍त्रियों के माध्‍यम से पुरुषों  द्वारा   हासिल इज्‍ज़त से जोड़ा जाना क्‍या ठीक है। क्‍या पुरुषों के अंदर इतनी हिम्‍मत नहीं या ताकत नहीं कि  वे अपने बल पर अपनी नाक खुद ऊंची कर सकें और अपनी इज्‍जत खुद कमा सकें।

परिवार की सबसे पहली इकाई घर है जहां महिलाऐं स्‍वयं को सुरक्षित समझती हैं, होती हैं या नहीं, यह  अलग बात है। यह हमेशा की तरह अब भी यक्ष प्रश्‍न है जिसका अधिकतर उत्‍तर हां में होता है मगर  इस हां में भी नाक अपने पूरे रुतबे के साथ मौजूद रहती है। जहां इस घरेलू सुरक्षा का कवच ना में  बदलता है वहीं नाक कटती है, नीची होती है यानि सवाल यहां भी नाक का ही है महिलाओं की सुरक्षा  का नहीं क्‍यों कि नाक यहां भी पुरुष की अस्‍मिता से चिपकी हुई रहती है। पारिवारिक परंपरा में कम ही  उदाहरण ऐसे देखने को मिले कि पुरुष की वजह से नाक कटी हो, नाक नीची हुई हो, हां नाक में दम  अवश्‍य देखा जा सकता है।

इस तरह महिलाओं की सुरक्षा में नाक के विशेषणों का महत्‍वपूर्ण योगदान है। नाक नहीं जानती कि  महिलाओं को सुरक्षा शारीरिक स्‍तर के साथ मानसिक सुरक्षा भी चाहिए जो यह महसूस कराए कि वे जो  चाह रही हैं, मांग रही हैं, कह रही हैं, लिख रही हैं, वह हकीकतन ज़मीन पर उतरना चाहिए।
वो जो अहसास कर रही हैं उसे ज़ाहिर भी करा पाएं।

घर हो या बाहर, घरेलू हो या कामकाजी हर हाल में स्‍त्रियों को अपनी रक्षा खुद ही करनी होती है-  शारीरिक स्‍तर पर भी और मानसिक स्‍तर पर भी। मानसिक स्‍तर पर असुरक्षा का अहसास ही 'नाक के  नाम पर' महिलाओं को सुरक्षित ''दिखाता'' है।

बहुत पुरानी उक्‍ति है-
"जो व्यक्ति केवल आपकी ख़ुशी के लिये अपनी हार मान ले,
उससे आप कभी जीत ही नहीं सकते"...

नाक का भी यही हाल है। नाक के बूते जो भी इज्‍ज़त घरों से लेकर समाज तक बनाई जाती है वह ही  नाक में दम की वजह भी बनती रही है।
बहरहाल, इज्‍जत के लबादे को ओढ़े महिलाऐं क्‍या लिख रही हैं, क्‍या बोल रही हैं, क्‍या हासिल कर रही  हैं, कृपया इसे अब बेचारी नाक से ना जोड़ा जाए। मीडिया के विभिन्‍न माध्‍यमों में लिखे गए शब्‍द बता  रहे हैं कि इज्‍ज़त-बेइज्‍ज़ती का ठीकरा नाक पर फोड़ नाक को तो बेवजह घसीटा जाता रहा है।

अभी तक तो नाक बचाए रखने के नाम पर सामाजिक ठेकेदारों को ''ताकत'' महिलाओं द्वारा ही बख्‍शी  जाती रही है। मगर अब अपनी इज्‍ज़त का प्रदर्शन करने के लिए नाक को बीच में ना लाइये और अपनी  हिम्‍मत को अपने बूते ही साबित कीजिए। आमने सामने की बात होने दीजिए।
मनुष्‍य के शरीर का एक अदना सा अंग बेचारी ''नाक'' को स्‍त्रियों की अस्‍मिता, खानदान का नाम और पुरुषोचित अहंकार पर बेवजह बलि चढ़ाई जा रही है, ये अच्‍छी बात नहीं। नाक की भी अपनी अस्‍मिता है, स्‍वतंत्रता है, गुण हैं। नाक को नाक ही रहने दीजिए। इज्‍ज़त, सवाल, कटना, बाल, ऊंची, नीची जैसे अलंकरणों की ज़रूरत नहीं।

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 11 मार्च 2017

क्रोध लाल रंग, ईर्ष्‍या हरे रंग, आनंद जीवंतता पीले रंग से जुड़े होते हैं

श्री श्री रविशंकर  ने  कहा कि चैतन्य होकर हम अज्ञानता और नकारात्मकता के काले रंग को मिटा सकते हैं। इससे हमारे जीवन में आनंद और जीवंतता के पीत रंग के साथ-साथ और भी कई रंग भर जाते हैं। इस आनंद का उत्सव शरीर और मन के साथ-साथ चेतना भी मनाती है
होली (13 मार्च) पर श्री श्री रविशंकर का चिंतन…
संसार रंग भरा है। प्रकृति की तरह ही रंगों का प्रभाव हमारी भावनाओं और संवेदनाओं पर भी पड़ता है। हमारी प्रत्येक भावना एक निश्चित रंग से सीधी जुड़ी होती है। जैसे माना जाता है कि क्रोध लाल रंग से, ईष्र्या हरे रंग से, आनंद और जीवंतता पीले रंग से जुड़े होते हैं। गुलाबी रंग को हम प्रेम से, नीले को विस्तार से, सफेद रंग को शांति से, केसरिया  को त्याग से और जामुनी को हम ज्ञान से जोड़कर देखते हैं। कुल मिलाकर, प्रत्येक मनुष्य रंगों का एक फ व्वारा प्रतीत होता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा हिरण्यकशिपु प्रजा के बीच स्वयं को ईश्वर के रूप में स्थापित करना चाहता था, जबकि उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु-भक्त था। अपने पुत्र के विचारों को बदलने का हिरण्यकशिपु ने हर संभव प्रयास किया। बहन होलिका की गोद में बैठाकर उसे अग्निकुंड में भी जलाने का प्रयास किया, लेकिन वह विफल रहा। प्रह्लाद की भक्ति में इतनी गहराई थी कि पिता का कोई भी अनुचित कार्य उसे अपने विचारों से डिगा नहीं सका।
दरअसल, प्रह्लाद ने चैतन्य होकर अज्ञानता के काले रंग को मिटाने में पूर्ण सफलता पा ली थी। देखा जाए तो हिरण्यकशिपु स्थूलता का प्रतीक है और प्रह्लाद आनंद और श्रद्धा का प्रतीक है। चेतना को भौतिकता तक सीमित नहीं किया जा सकता। हिरण्यकशिपु भौतिकता से सब कुछ प्राप्त करना चाहता था। कोई भी जीव अपने विचारों की शक्ति से भौतिकता से परे हो सकता है।
होलिका अतीत की प्रतीक है और प्रह्लाद वर्तमान के आनंद का प्रतीक है। यह प्रह्लाद की भक्ति ही थी, जो उसे आनंद और जीवंत (पीत रंग) बनाए रखती थी। आनंद और जीवंतता के होने से जीवन उत्सव बन जाता है। भावनाएं आपको अग्नि की तरह जलाती हैं, पर यह रंगों की फु हार की तरह होनी चाहिए, तभी जीवन सार्थक होता है। अज्ञानता में भावनाएं कष्टकारी होती हैं, लेकिन ज्ञान के साथ जुड़कर यही भावनाएं जीवन में रंग भर देती हैं। जीवन रंगों से भरा होना चाहिए। हम कई भूमिका निभाते हैं।
ये भूमिकाएं और भावनाएं स्पष्ट होनी चाहिए, अन्यथा कष्ट निश्चित है। घर में यदि आप पिता का रोल निभा रहे हैं, तो अपने कार्यस्थल पर वैसा रोल नहीं निभा सकते। जब अलग-अलग भूमिकाओं का हम जीवन में घालमेल करने लगते हैं, तो फिर उलझने लगते हैं और गलतियां करने लग जाते हैं। जीवन में जो भी आप आनंद का अनुभव करते हैं, वह आपको स्वयं से ही प्राप्त होता है।
आपको जो जकड़ कर बैठा है, जब आप उसे छोड़कर शांत बैठ जाते हैं, तो इसी समय से आपकी ध्यानावस्था शुरू हो जाती है। ध्यान में आपको गहरी नींद से भी ज्यादा विश्राम मिलता है, क्योंकि आप सभी इच्छाओं से परे होते हैं। यह मस्तिष्क को गहरी शीतलता देता है और आपके तंत्रिका-तंत्र को पुष्ट करता है।
उत्सव चेतना का स्वभाव है, जो उत्सव मौन से उत्पन्न होता है, वह वास्तविक है। यदि उत्सव के साथ पवित्रता जोड़ दी जाए, तो वह पूर्ण हो जाता है। केवल शरीर और मन ही उत्सव नहीं मनाता है, बल्कि चेतना भी उत्सव मनाती है। इसी स्थिति में जीवन रंगों से भर जाता है।

प्रस्‍तुति : अलकनंदा सिंह 

सोमवार, 6 मार्च 2017

कंकाल के साथ

बचपन में पढ़े थे सुभाषितानि...हमें संस्‍कृत पढ़ाने वाले शास्‍त्री जी कक्षा में एक एक बच्‍चे को खड़ा करके एक एक श्‍लोक रटवाते थे, फिर उनके अर्थ और प्रयोग पूछते थे तब हमें ये कतई नहीं पता था कि इनका हमारे जीवन में किस तरह पग पग पर प्रयोग होगा और किस तरह हमें जीवन की अनेक  परीक्षाओं में सफल होने और असफलताओं के पीछे छुपे हुए कारण खोजने में ही सुभाषित हमारी मदद करेंगे।

शास्‍त्री जी तेज आवाज़ में रटाया करते थे समयोचित पद्यमालिका का ये श्‍लोक -

अतिरूपाद् हृता सीतातिगर्वाद्रावणो हत:।
अतिदानाद् बलिर्बद्ध: अति सर्वत्र वर्जयेत्।।

फिर हमसे इसका अर्थ भी पूछते थे-

अति रूपवान होने के कारण सीता का हरण हुआ, अति गर्व के कारण रावण मारा गया। अतिदानशीलता के कारण बलि को अपना सर्वस्‍व देना पड़ा, इसलिए किसी भी वस्‍तु, इच्‍छा और कार्य की अधिकता अच्‍छी नहीं मानी गई।

English Translation
Too much  beauty  is  what  lead to  the kidnapping od Sita] Ravana got killed beacause of too much Pride. Bali's Progress was curtailed because of too much  charity, oe should refrain from  "Too Much" of Anything.

शास्‍त्री जी के तब याद कराये हुए इस श्‍लोक के अंतिम भाग को तो  आज आप और हम हर दूसरे तीसरे वाक्‍य में उद्धृत करते रहते हैं कि अति सर्वत्र वर्ज्‍यते मगर इसके निहितार्थ को भूल सा गए हैं कि ''बैलेंस हर जगह जरूरी है'' चाहे वह निजी जीवन हो, प्रोफेशनल हो या फिर सार्वजनिक, गली हो, मोहल्‍ला हो या अपना घर ही क्‍यों ना हो। समाज से जुड़ी हर कड़ी में इस श्‍लोक की अनिवार्यता  देखी जा सकती है। जरूरत से ज्‍यादा भोजन, सुदरता, ज्ञान, शिक्षा, मेलजोल हो या फिर जरूरत से ज्‍यादा अकेले रहने की प्रवृत्‍ति। घातक सभी हैं।

इसी हफ्ते पहली खबर कोलकाता से और फिर दूसरी खबर आगरा से आई कि अपने प्रियजन के कंकाल के साथ रह रहे व्‍यक्‍ति की भी मौत हो गई। इनका शव घर में कई दिनों से सड़ रहा था, बदबू उठने पर पड़ोसियों द्वारा पहले पुलिस को बुलाया गया फिर दरवाजा खोला गया तो उनकी कहानी सामने आई। कहानी दोनों की ही एक सी थी।
दोनों ही घटनाओं में साम्‍य यह था कि अलग-अलग पृष्‍ठभूमि में रहने वाले ये ''अकेले'' कई कई दिनों तक वे ना तो घर से नहीं निकलते थे, दोनों ने ही ''अकेलेपन'' को अपना लाइफस्‍टाइल बना लिया था। कोलकाता में अकेला रहने वाला पुरुष था तो आगरा में महिला।

यूं तो अकेलेपन  के कई कारण हो सकते हैं। लोग अनेक कारणों से अकेलापन महसूस करते हैं, जैसे सामान्य सामाजिक परेशानी एवं सुविचारित एकाकीपन। कुछ लोगों को तो भीड़ में भी अकेलापन लगता है, क्योंकि वे उन लोगों से अर्थपूर्ण संबंध ही नहीं जोड़ पाते। सभी को कभी न कभी अकेलेपन का एहसास होता है, मगर अकेलेपन को किन्‍हीं भी परिस्‍थितियों में अच्छा नहीं माना गया।

हमारे समाज में संभवत: इसीलिए रिश्‍ते-नाते, दोस्‍ती और सामाजिक गतिविधियों को इतना महत्‍व दिया जाता रहा है। न्‍यूक्‍लिर फैमिली के रिवाज, पड़ोसियों से भी संबंध रखने को प्राइवेसी के नाम पर जिस अकेलेपन को पिछले कुछ दशकों से तरजीह दी जाती रही है, उसके अब दुष्‍परिणाम सामने आने लगे हैं। ये मेट्रो कल्‍चर हमारी मानसिकता पर हावी हो चला है।

इसके अलावा स्‍वयं को सर्वोत्‍कृष्‍ट मानने की जिद भी अकेलेपन का कारण बन रही है। मैं का प्रवेश जब व्‍यक्‍तित्व में होने लगता है तो दूसरे के दुखसुख, दूसरे की इच्‍छा गौण हो जाती है और जब यही ''मैं'' किसी कारणवश परास्‍त होता है तो अकेलापन घेरने लगता है। अपेक्षाओं की अधिकता, पूरा न हो की स्‍थिति में उपेक्षा का उपजना, इससे उपजी कुंठा और अवसाद और यही अवसाद ''अकेलेपन'' को जन्‍म देती है।

नितांत अकेलेपन के ''अतिवाद'' की ओर हमारा यूं बढ़ते जाना अब जानलेवा होता जा रहा है। समाज और हमारे अपनों के मानसिक स्‍वास्‍थ के लिए ये जरूरी है कि हम औरों की खबर भी लेते रहें, उनसे जुड़े रहें। उन्‍हें अपेक्षाओं के अतिवाद से बचाने के लिए उनमें सकारात्‍मक विचारों का प्रवेश करायें।

अब ये जानना जरूरी हो गया है कि कहीं हम आधुनिक बनने की बड़ी कीमत तो नहीं चुका रहे। सोचिए कि अपने परिवार और दोस्तों से आप कितना मिलते हैं, ये आपकी सेहत को काफ़ी प्रभावित करता है। अकेलापन आपको बीमार कर देता है और सिर्फ मानसिक रूप से नहीं, शारीरिक रूप से भी।

स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्‍टि से भी देखें तो एक अध्ययन 2006 में स्तन कैंसर की शिकार 2800 महिलाओं पर किया गया कि जो मरीज़ तुलनात्मक रूप से परिवार या दोस्तों से कम मिलती थीं, उनकी बीमारी और उससे मौत की आशंका पांच गुना ज़्यादा हो गई थी। इसी तरह शिकागो विश्वविद्यालय में मनोवैज्ञानिकों ने देखा कि सामाजिक रूप से अलग-थलग लोगों की प्रतिरोधक क्षमता में बदलाव हो जाता है तथा अकेले लोग रोज़मर्रा के कामों को ज़्यादा तनावकारी पाते हैं। बड़ी संख्या में स्वस्थ लोगों में सुबह और शाम के वक्त तनाव के हार्मोन कोर्टिसोल की मात्रा की जांच की। कोर्टिसोल तनाव के वक्त पैदा होने वाला एक हार्मोन है जो अकेले लोगों में ज़्यादा पाया गया।

यूं तो हमारी सांस्‍कृतिक और सामाजिक रवायतों में अकेलेपन से निबटने की कई विधियां मौजूद हैं, जैसे नए लोगों से मिलना, अपने एकांत का आनंद लेना और परिवार से पुनर्मिलन।

कारण और निदान हमें ही खोजना है कि अकेले होते हुए लोगों को उनके अपने ''अतिवाद'' से कैसे छुटकारा दिलाया जाए।

योग व आध्‍यात्‍म की ओर रुझान अकेलेपन को खत्‍म करने की गारंटी होता है मगर योग तक लाने के लिए उनकी सोच के अतिवाद को नीचे लाना होगा, क्‍योंकि अतिवाद कोई भी हो, कई कोणों से नुकसान पहुंचाता है  इससे जूझने के लिए शारीरिक, मानसिक स्‍तर पर भी काम करना होगा अर्थात् अति सर्वत्र वर्ज्‍यते के नुकसान अब वृहद रूप में हमारे सामने है।

अकेलेपन के शिकार लोगों के संदर्भ में मुझे अपने शास्‍त्री जी याद आ रहे हैं कि जो अति के नुकसान बताया करते थे। हम जब उनकी बात पूरी तरह नहीं समझ पाते थे ...तब भी वो थकते नहीं थे...फिर फिर कहते रहते कि- बिटिया एक और कहन सुनावैं तुमका...जो कबीर बाबा बोल गए कि-

अति का भला न बोलना,
अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना,
अति की भली न धूप।

तब शास्‍त्री जी की बात कुछ समझते, कुछ समझने का नाटक करते हम बच्‍चे आज इस तथ्‍य को अच्‍छी तरह समझ पा रहे हैं कि अकेलेपन की अति अर्थात् ''कंकालों के साथ रहने की प्रवृत्‍ति'' जब खबरों में आती है तो सोचने को बाध्‍य करती है कि हजारों साधु-संन्‍यासियों, सूफी संतों, बाबाओं, साध्‍वियों और मोटीवेशनल स्‍पीकर्स के रहते भी समाज में अकेलापन क्‍यों ज़हर बनता जा रहा है।
हम भी सोचें कि आसपास कोई अकेला ना रहे, और अपना ईगो छोड़कर उसको इस विकट स्‍थिति से बाहर लायें। इसके लिए कोई खास प्रयास नहीं बल्‍कि छोटी सी कोशिश की जरूरत है...बस।

-अलकनंदा सिंह




शनिवार, 4 मार्च 2017

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्‍मदिन आज: 'मैला आंचल' लिखकर रेणु ने रेणु की ही बात कही


रेणु का मतलब होता है बालू- रेत- रेती सो अपने नाम को सार्थक करते  वो धूल से सने रस्‍ते, गली गांव चौबारे से निकलती खुश्‍बुऐं, दामन को  बच बचाकर चलती बतकहियों और हकीकतों को समेटते रहे। जी हां !  'इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन  भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी – मैं किसी से दामन बचाकर नहीं  निकल पाया' कहने वाले फणीश्‍वर नाथ रेणु का आज जन्‍मदिन है।

उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु ने 'घर की बोली' की आंचलिक पहचान  को जनजन तक पैठ बनाने में जितनी विशेषज्ञता दिखाई वह उनके  शब्‍दों से आम जन को जोड़ती है। किसी भी जन समुदाय की  भलाई-बुराई को अत्‍यधिक प्रमाणिक उसकी अपनी बोली में रचे गए  साहित्‍य से ही तो आसानी से किया जा सकता है।

'रेणु' ने अपनी अनेक रचनाओं में आंचलिक परिवेश के सौंदर्य, उसकी  सजीवता और मानवीय संवेदनाओं - दृश्यों को चित्रित करने के लिए  उन्होंने गीत, लय-ताल, वाद्य, ढोल, खंजड़ी नृत्य, लोकनाटक जैसे  उपकरणों का सुंदर प्रयोग किया है। इतना ही नहीं 'रेणु' ने मिथक,  लोकविश्वास, अंधविश्वास, किंवदंतियां, लोकगीत- इन सभी को अपनी  रचनाओं में स्थान दिया है।


उन्होंने 'मैला आंचल' उपन्यास में अपने अंचल का इतना गहरा व  व्यापक चित्र खींचा है कि सचमुच यह उपन्यास हिन्दी में आंचलिक  औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति तो बन ही गया वरन  अमानवीयता, पराधीनता और साम्राज्यवाद का प्रतिवाद भी करता है।

अपने प्रथम उपन्यास मैला आंचल के लिये उन्हें पद्मश्री से सम्मानित  किया गया।

उनकी कहानी 'मारे गए गुलफ़ाम' पर आधारित फ़िल्म 'तीसरी क़सम'  को हममें से कोई भी नहीं भूल सकता। राजकपूर, वहीदा रहमान की  इस 'तीसरी क़सम' को बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था और इसके  निर्माता सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र थे। आज भी यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा  में मील का पत्थर मानी जाती है।

रेणु सरकारी दमन और शोषण के विरुद्ध ग्रामीण जनता के साथ प्रदर्शन  करते हुए जेल गये, आपातकाल का विरोध करते हुए अपना 'पद्मश्री' का  सम्मान भी लौटा दिया। इसी दौरान उन्‍होंने पटना में 'लोकतंत्र रक्षी  साहित्य मंच' की स्थापना के साथ उस समय भयानक रोग रेणु को  'पैप्टिक अल्सर' की गंभीरता को झेला, इस बीमारी के बाद भी रेणु ने  1977 ई. में नवगठित जनता पार्टी के लिए चुनाव में काफ़ी काम किया  परंतु 11 अप्रैल 1977 ई. को रेणु उसी 'पैप्टिक अल्सर' की बीमारी के  कारण चल बसे।

फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत  की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर  रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने  के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने  'बटबाबा' नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। 'बटबाबा' 'साप्ताहिक  विश्वमित्र' के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी  कहानी 'पहलवान की ढोलक' 11 दिसम्बर 1944 को 'साप्ताहिक  विश्वमित्र' में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी 'भित्तिचित्र  की मयूरी' लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है।  'रेणु' को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको  उनकी कहानियों से भी मिली। 'ठुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम रात्रि की  महक', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'अच्छे आदमी', 'सम्पूर्ण कहानियां',  आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।

फिलहाल ये सब इतिहास है जिसे आज की पीढ़ी सिर्फ सहेज सकती है,  उसे महसूस करना है तो रेणु की ही तरह ज़मीन पर उतर कर सोचना  होगा।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

ख़ुदा के वास्‍ते !: कविता- ये गरल तुम्‍हें पीना होगा

ख़ुदा के वास्‍ते !: कविता- ये गरल तुम्‍हें पीना होगा: सृष्‍टि की खातिर शिव ने तब एक हलाहल पीया था, अब एक हलाहल तुमको भी इसी तरह पीना होगा, समरस सब होता जाए, निज और द्विज में फर्क मिटे, आग्रह...

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

मतभेद या राष्‍ट्रभेद ?

''भारत तेरे टुकड़े होंगे, हम क्‍या चाहें- आज़ादी'' जैसे नारों ने पिछले साल तो बवाल मचाया ही, अब इस साल भी दिल्‍ली यूनीवर्सिटी के रामजस कॉलेज से जो कुछ शुरू हुआ है, उसे सिर्फ और सिर्फ देश में अस्‍थिरता लाने व सेना के खिलाफ एक ''खास सोच वाले'' तबके की शरारती सोच ही कहा जाएगा जो किसी ना किसी तरह खबरों में रहना चाहता है।
कोई एक कारण गिनायें ये कि इन्‍हें देशविरोधी मानसिकता का क्‍यों ना कहा जाए। कश्‍मीर में सालों पूर्व हुए रेपकांड को सेना के विरोधस्‍वरूप और कश्‍मीर की आजादी की बात करते हुए 22 फरवरी को कॉलेज में आइसा के छात्र सेमीनार के आयोजन का आखिर औचित्‍य क्‍या था। पत्‍थरबाजों के खिलाफ इनका मुंह क्‍यों नहीं खुलता, कश्‍मीरी पंडितों के लिए ये कोई अभियान क्‍यों नहीं चलाते। क्‍यों अफजल गुरू को अपना आदर्श मानते हैं।
तो क्‍या संविधान, संसद और न्‍यायपालिका से भी इनका विरोध है। क्‍यों नहीं ये लोग नक्‍सल प्रभावित क्षेत्रों में जाकर सरकार के साथ आदिवासियों के पुनर्वास का काम करते हैं। नक्‍सल समस्‍या के जड़ में गरीबी नहीं है, वह प्रवृत्‍ति है जो धन और हथियारों से पोषित होती है, ठीक कश्‍मीर की तरह। नोटबंदी ने काफी सच उगल भी दिया है, अब और क्‍या सच बाकी है कहने को।

उमर खालिद को बाकायदा बुलाया जाना, गुरमेहर से एबीवीपी के खिलाफ कहलवाया जाना कोई इत्‍तिफाक नहीं है, रणनीति के तह में वही हैं जो लाइमलाइट पसंद हैं। सवाल का जवाब तो हम जैसे आमजन भी जानना चाहते हैं कि क्‍यों रामजस जैसे ऐतिहासिक कॉलेज की फैकल्‍टी ने उमर खालिद को बुलाया। जो एबीवीपी ने किया उसे तो स्‍वयं फैकल्‍टी ने ही सामने परोसा ताकि असहिष्‍णुता, अवार्ड वापसी और जेएनयू, कन्‍हैया कुमार या नजीब अहमद के बाद जो खामोशी ''उनकी प्रोपेगंडा राजनीति'' में छा गई थी, वह फिर से चमके। जिस वामपंथ को पूरे देश में लगभग (केरल, त्रिपुरा को छोड़कर) नकारा जा चुका है और जो आउटडेटेड हो चुका है, उसे फिर प्रकाश में लाया जाये।

यदि ऐसा ना होता तो सिमी के एक्‍टिव मेंबर रहे पिता की औलाद व जेएनयू में छात्र नेता उमर खालिद ने बाकायदा कश्‍मीर के एक आतंकवादियों के हित में और सेना के विरोध में जो अभियान चलाया हुआ है, उसका प्रसार रामजस कॉलेज तक इस तरह ना पहुंचता।

ज़ाहिर है छात्र राजनीति होनी ही थी। बवाल हुआ, मारपीट हुई, पुलिसिया कार्यवाही भी हुई मगर इसी बीच रामजस कॉलेज में पढ़ने वाली कारिगल शहीद मंदीप सिंह की बेटी गुरमेहर ने सोशल मीडिया पर "I love this country and I am not frightened of anyone. I have got these threats many times. No one can threaten women, I will take a bullet for my country. This is not about politics, this is about students. No matter who you are, one cannot threaten women." लिखा जिसने सही जगह चोट की, अचानक जो उमर खालिद खबरों में नहीं था, जो अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता खबरों में नहीं थी, वह खबरों में आ गई। गुरमेहर का एक वाक्‍य तो सही है कि मैं किसी से नहीं डरती। सही बात है, आखिर कोई भी किसी से क्यों डरे? गुरमेहर से मेरा सवाल यह है कि उसे या उस जैसे अन्‍य छात्रों को एबीवीपी से डर क्यों लगता है?
रामजस के बवाल को शांत करने की बजाय इसकी आग में घी गुरमेहर ने एक बार और डाला। गुरमेहर ने आज फिर एक पोस्‍ट अपनी फेसबुक पर लिखी, हाथ में प्‍लकार्ड लिए हुए वही स्‍टाइल, एक जिस पर  लिखा था "Pakistan did not kill my dad, war killed him"। कितना वहियात सा वाक्‍य था यह, करगिल के शहीदों का अपमान है यह। सोशल मीडिया और तिस पर वो इलेक्‍ट्रानिक मीडिया जिसके सभी धुरंधर इस ताक में बैठे रहते हैं कि कब अपनी भड़ास निकालने का मौका मिले, उन्‍होंने प्राइम टाइम इसी के नाम कर दिया।
प्रश्‍न उठना लाजिमी है कि युद्ध के लिए हरवक्‍त जो सेना अपनी जान हथेली पर लिए सीमा पर मुस्तैद रहती है, देश के हर भूभाग को बचाने के लिए दिनरात एक किए रहती है यदि उसके अपने बच्‍चे ही उसकी राष्‍ट्रभक्‍ति पर सवाल उठाने लगेंगे तो देश की अखंडता किसी न किसी स्‍तर पर शर्मिंदा जरूर होती है। कहीं नक्‍सली, कहीं आतंकी, कहीं अलगाववादी, तो कहीं भारत से आजादी चाहने वाले सिर उठाते रहेंगे। अफजल गुरूओं को फिर संसद पर हमले की जरूरत क्‍या रह जाती है।

दुखद ही नहीं यह शर्मनाक भी है कि आज जब ‘भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी जंग रहेगी’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे लगाने वाले लोगों का समर्थन करने वालों के विरोध में कोई खड़ा होता है तो मीडिया उसे विलेन की तरह पेश करता है। अभिव्यक्ति की आजादी सबको है मगर देश के प्रति अपने दायित्व को नजरंदाज करके आजादी की बात करना बेईमानी है।

सही मायनों में विभिन्न संगठनों की राजनीति के चक्कर में देश के लिए अपने व्यक्तिगत सुख को त्याग कर शहादत स्वीकार करने वालों के बलिदान का उपयोग करना पूरी तरह से गलत है। उन बलिदानियों के बलिदान का सम्मान करना हमारी नौतिक जिम्मेदारी है। गुरमेहर से कुछ सवाल पूछे जाने चाहिए लेकिन ये सवाल दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली उस लड़की से नहीं हैं जिसके पिता शहीद हो गए। बल्कि सवाल उस बेटी से हैं जो स्कूल में पढ़ाई के दौरान पीटीएम में अपने पिता को मिस करती थी, जो हर त्योहार को इस उम्मीद में बिना पिता के मना लेती थी कि इस बार न सही लेकिन अगले त्योहार पर उसके पिता जरूर घर आएंगे, जो आज अपने पिता की तस्वीर देखकर उनकी शहादत पर गर्व करती है।

तो बताओ गुरमेहर कि क्या तुम्‍हारे पिता उन लोगों का समर्थन करते जो कहते हैं कश्मीर को, बस्तर को, पूर्वोत्तर के राज्यों को भारत से ‘आजादी’ दे देनी चाहिए?
आज अगर कश्मीर में आपके पिता पर कुछ ‘आजादी के परवाने’ पत्थर चला रहे होते तो क्या तुम उन पत्थरों को कश्मीरियों का गुस्सा करार देतीं?
तुम अपने जिस पिता की शहादत का राजनीतिकरण कर रही हो, क्या वह उन लोगों का समर्थन करते जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर पर नाजायज कब्ज़ा किया हुआ है?
क्या तुम्‍हारे पिता बुरहान वानी जैसे आतंकवादियों को शहीद अथवा आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाला मानते हुए उसके जनाजे में शामिल होने वालों का समर्थन करते?
क्या तुम उन लोगों से सहमत हो जो कहते हैं कि भारतीय सेना के जवान बलात्कारी हैं?
ऐसे बहुत से सवाल हैं, क्‍या दोहरी नीति पर चलने वाले कथित वामपंथियों में यह हिम्मत है कि वे इन सवालों का सामना कर सकें। जो रिसर्च के नाम पर भारी भरकम राशि सरकार से लेते हैं, हमारे टैक्‍स से पलते हैं और भारत के टुकड़े करने वालों को सेमीनार में बतौर अतिथि आमंत्रित करते हैं।

देश का दुर्भाग्य है कि एक शहीद की बेटी अपने पिता की शहादत को अपमानित कर रही है। वह स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर नहीं खोज पा रही। उसे शहादत का अर्थ ही नहीं समझ आ रहा है क्योंकि अगर उसे शहादत का दर्द पता होता तो वह उस दर्द को भी महसूस करती जो भारतीय सेना के जवानों को पत्थर खाते वक्त होता है। निश्‍चित ही हम किसी तरह की हिंसा के समर्थक नहीं, एबीवीपी के भी नहीं। जिस किसी ने कानून हाथ में लेने की कोशिश की है तो उसे सजा मिलनी चाहिए लेकिन इसके साथ ही एक सवाल भी कि जो देश को तोड़ने की बात करने वालों का समर्थन करते हैं, उनके लिए संवैधानिक मानवाधिकार की बात आखिर किस आधार पर?

दिल्ली के रामजस कॉलेज में तथाकथित एबीवीपी/वामपंथी कार्यकर्ताओं ने जिस तरह का हिंसक प्रदर्शन किया, उसकी भर्त्‍सना होनी चाहिए मगर साथ ही उन लोगों का विरोध भी जो कश्मीर को भारत का अवैध कब्जा बताने वालों का, देश विरोधी नारे लगाने वालों का, भारतीय सेना को रेपिस्ट कहने वालों का, राष्ट्र की एकता, अखंडता और अस्मिता पर प्रहार करने वालों का समर्थन करने वालों को मंच देने की बात करते हैं। जो लोग संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास नहीं करते, संविधान में दिए गए मौलिक दायित्वों यानी कर्तव्यों का पालन नहीं करते, उनका संविधान में दिए गए ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार’ पर अधिकार कैसे है?

आप भी सोचिएगा ज़रा...क्‍योंकि चुप्पी ऐसी उच्‍छृ़ंखलताओं को और बढ़ावा ही देगी।

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

हम भी आदि शंकराचार्य की भांति कह सकते हैं शिवोहम् ...शिवोहम् ...शिवोहम्


आज शिवचतुर्दशी=शिवरात्रि=शिवविवाह का दिन=शिव महिमा के चौतरफा गायन का दिन है, आज ही  से ब्रज में बरसाना की प्रसिद्ध लठामार होली की पहली चौपाई उठेगी जिसे लाड़ली महल से निकाल कर  रंगीली गली के शिव मंदिर तक लाया जाएगा और होली का जो जोर बसंत पंचमी से शुरू हुआ था वह  अपने चरम की ओर बढ़ता जाएगा।

कोयम्बटूर में आज ही ईशा फाउंडेशन के ईशा योग केंद्र द्वारा स्‍थापित की जा रही एक विशालकाय  शिव प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे।

हमेशा की तरह इन प्रसिद्ध मंदिरों के उत्‍सव और शिव भजनों के कोलाहल में जिस शिव तत्‍व को  अनदेखा किया जाएगा, वह किस तरह हमें प्राप्‍त हो सकता है, इस पर शायद ही कोई चर्चा होगी। ईशा  फाउंडेशन के सद्गुरू कहते हैं कि आदि योगी शिव ने मानवता को आत्‍मरूपांतरण की 112 विधियां भेंट  कीं, इसी के सम्‍मान में आदियोगी के 112 फुट ऊंचे दिव्‍य चेहरे को प्रतिष्‍ठित किया जाएगा।

कितना बचकाना है ये विचार। मेरे ख्‍याल से तो यह सिर्फ उसी राह को आगे बढ़ाने करने का ज़रिया है  जिसके तहत लोग ''ईश्‍वर को इंगित करने वाली उंगली ही पकड़ कर बैठ जाते हैं और उसे ईश्‍वर  समझ लेते हैं, जिसकी ओर उंगली उठाकर ''गुरू'' उसे बतौर ईश्‍वर प्रतिष्‍ठापित करते हैं और इस तरह  अनुयायियों की एक लंबी चौड़ी फौज खड़ी हो जाती है। गाहे-बगाहे सनातन धर्म की रक्षा की बातें या यूं  कहें कि प्रोपेगंडा किया जाता है ताकि धर्म का असली स्‍वरूप इन उंगली पकड़ने वालों की समझ में  कैसे भी ना आने पाए। फिर किसके कितने अनुयायी, किसके कितने मंदिर- मठ, किसके कितने ''5  स्‍टार भक्‍त'' और किसका कितना बाहुबल, कितनी संपत्‍ति आदि तो प्रतिस्‍पर्द्धा में होता ही है।

ऐसे में ''शिव'' और ''शिव तत्‍व'' का अध्‍ययन कौन करेगा, निश्‍चित ही कोई नहीं। शिव योगी थे तो  उस योग का मूल तत्‍व ''स्‍वयं पर नियंत्रण'', सर्वप्रथम इन मंदिर-मठ-गुरुओं के सानिध्‍य में नहीं बल्‍कि  ''स्‍वयं को स्‍वयं के द्वारा ही'' जानकर हो सकता है। प्रतिमाओं की स्‍थापना से हो सकता है कि आंखें  आश्‍चर्य से फटी की फटी रह जायें, हम कौतूहलवश ये तो कह सकते हैं कि ओह, कितनी विशाल है,  किस तरह बनाई गई होगी, कितना धन व्‍यय हुआ होगा परंतु इसे देखकर शिवतत्‍व पाने
की कामना नहीं जागेगी। कदापि नहीं।

आस्‍थाओं के बाजार के बीच शिव को समझने और हृदय के तल तक उतारने के लिए आदि गुरू  शंकराचार्य का उदाहरण देना चाहूंगी जो आज धर्म, गुरुओं और उनकी उंगली पकड़ने वालों के लिए  बिल्‍कुल सही बैठती है-

''आदि गुरू शंकराचार्य की जब अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका  परिचय मांगा। बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन  जाता है…

यह परिचय ‘निर्वाण-षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||1||

अर्थात्

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश,  भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…।
अब आप ही बताइये कि शिव के किस रूप को पाने के लिए हम इतने लालायित रहते हैं, जो हमारे  भीतर घुला हुआ है उसे हम विलग करके कैसे देख सकते हैं। और जो ऐसा देखने का प्रयास करते हैं  वह कोरा नाटक है क्‍योंकि शिव तो हमारे भीतर हर श्‍वास-नि:श्‍वास में है। प्रतिमाओं- मंदिरों-  मठों-सिद्धपीठों में ही यदि शिव विराजते तो ना तो शंकराचार्य होते और ना ही कबीर और सूर को  शायद ही कभी ब्रह्म का ज्ञान होता।

जहां तक बात है शिवचौदस पर लोक के मनोरंजन की तो जब मन आल्‍हादित होगा...प्रफुल्‍लित होगा...
तो ईश्‍वर तक उतनी ही सहजता से जा मिलेगा...शिव को भोला भंडारी इसीलिए तो कहा गया है कि  वो नाचना चाहता है तो नटराज बन जाता है गाना चाहता है तो विशिष्‍ट रागों का निर्माण करता  है...और प्रेमी ऐसा कि सती के विरह में संपूर्ण ब्रहमांड को उथलपुथल कर देता है और जब वह योग  साधना में रत होता है तो 112 विधियों को प्रतिपादित कर देता है...। हम लोक में सहज रहकर भी  शिव को अपने ''भोलेपन'' से पा सकते हैं।

स्‍वयं के ''शिव'' बनने की प्रक्रिया स्‍वयं को मिटाकर आती है, ''शिव तत्‍व'' को पाने की लालसा नहीं,  अनुभूति जाग्रत करनी होगी तभी शिव दर्शन हो सकता है और हम भी आदि शंकराचार्य की भांति कह  सकते हैं शिवोहम् ...शिवोहम् ...शिवोहम् ।

- अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

NASA opportunity: धरती के आकार वाले सात नए ग्रहों का पता लगा, इन सभी ग्रहों पर पानी मिलने की पूरी संभावना

NASA  ने आज एक ऐसी खुशखबरी दी है  जिससे पूरा अंतरिक्ष  शोध  जगत खुश  है और अपने अपने दलों  के साथ शोध  की दशा और दिशा नए  सिरे से तय करने में लग गया है। जी हां, धरती के आकार के सात ग्रहों का पता लगाया है जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. अमरीकी स्पेस एजेंसी NASA के वैज्ञानिकों ने एक तारे के इर्द-गिर्द
मिले इन सभी सात ग्रहों की सतह पर, इनकी दूसरी विशेषताओं के कारण पानी मिलने की पूरी संभावना जताई है.
जैसा नासा ने कहा  

NASA's Spitzer Space Telescope has revealed the first known system of seven Earth-size planets around a single star. Three of these planets are firmly located in the habitable zone, the area around the parent star where a rocky planet is most likely to have liquid water.
The discovery sets a new record for greatest number of habitable-zone planets found around a single star outside our solar system. All of these seven planets could have liquid water – key to life as we know it – under the right atmospheric conditions, but the chances are highest with the three in the habitable zone.
“This discovery could be a significant piece in the puzzle of finding habitable environments, places that are conducive to life,” said Thomas Zurbuchen, associate administrator of the agency’s Science Mission Directorate in Washington. “Answering the question ‘are we alone’ is a top science priority and finding so many planets like these for the first time in the habitable zone is a remarkable step forward toward that goal.”


माना जा रहा है कि इनमें से तीन ग्रह पर जीवन की संभावना है और ये “बसने लायक” हैं.
ये सातों ग्रह ट्रैप्पिस्ट-1 नाम के तारे के इर्द-गिर्द मौजूद हैं. यह तारा धरती से 40 प्रकाश वर्ष दूर है. यह आकार में छोटा और और ठंडा तारा है.



नेचर पत्रिका में बताया है कि नासा के स्पलिट्जर स्पेस दूरबीन और सतह से जुड़े कुछ वेधशालाओं की मदद से इन ग्रहों को खोजा गया है.
बेल्जियम यूनिवर्सिटी ऑफ लेज के जाने माने लेखक माइकल गिल्लन का कहना है, “ये सारे ग्रह एक दूसरे के करीब हैं. साथ ही ये सातों ग्रह अपने तारे से काफी नजदीक स्थित हैं. इनकी स्थिति बृहस्पति के आसपास मौजूद चंद्रमाओं से काफी मिलती है.”
माइकल के मुताबिक़, “तारा इतना ठंडा और आकार में इतना छोटा है कि माना जा रहा है कि सातों ग्रह का तापमान समशीतोष्ण है. इसका ये अर्थ है कि वहां लिक्विड वाटर हो सकता है. और संभव है कि वहां की सतह पर जीवन संभव हो सके.”
ट्रैप्पिस्ट-1 के तीन ग्रह परिभाषा के अनुसार पारंपरिक आवासीय क्षेत्र में है. यहां की सतह पर पर्याप्त वायुमंडलीय दबाव के कारण पानी हो सकता है.
बीबीसी के विज्ञान संपादक डेविड शुकमैन बताते हैं कि नई खोज के बारे में वैज्ञानिक केवल इसलिए उत्साहित नहीं है कि ये ग्रह धरती के आकार के हैं, बल्कि ट्रैप्पिस्ट-1 बेहद छोटा और धुंधला तारा है. इसका मतलब ये है कि दूरबीन को ग्रहों का अध्ययन करने में उतनी परेशानी नहीं हुई जितनी उन्हें इससे अधिक चमकीले तारों का अध्ययन करते समय होती है.
इससे अब बहुत दूर स्थित इस दुनिया और उनके वायुमंडल के बारे में शोध करने के कई नए अवसर पैदा हुए हैं.
शोध का अगला चरण शुरू हो चुका है. इसमें वैज्ञानिकों ने ऑक्सीजन और मिथेन जैसे महत्वपूर्ण गैसों की खोज कर रहे हैं. इससे ग्रहों की सतह पर हो रही हलचल और बदलाव के बारे में साक्ष्य मिल सकते हैं. 

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

जिन्‍हें हम परदे के पीछे से संचालन का भार देते हैं उनके प्रयासों को खुले मन से स्‍वीकार करने में अब भी हिचक क्‍यों

आज  स्‍टोरीपिक वेबसाइट  पर इसरो  की  महिला  वैज्ञानिकों पर एक स्‍टोरी आई  है '' 8 Hardworking ISRO Women Scientists Who Are Breaking The Space Ceilings With Their Work'' , बहुत  प्रभावित  करने  के  साथ  साथ विचलित  भी  करती  है ये  जानकारी,  कि जिन्‍हें  हम  परदे  के  पीछे से संचालन  का  भार  देते  हैं उनके प्रयासों  को खुले  मन  से  स्‍वीकार  करने  में  अब  भी  हिचक क्‍यों है।
आप  भी पढ़िए इस  स्‍टोरी  को ताकि मंगलयान  मिशन  और 104 सेटेलाइट लांचिंग तक के रिकॉर्ड्स के पीछे लगी मेहनतकश महिलाओं पर गर्व  कर  सकें और उस 80 प्रतिशत उन  महिलाओं  को  आगे ला सकें जो आज भी घुट घुटकर जीने को बाध्‍य हैं।

8 Hardworking ISRO Women Scientists Who Are Breaking The Space Ceilings With Their Work - Vinay Devnath

 

Behind every successful man, there is a woman.
Let’s just tweak it a little bit.
“Behind every successful space mission in India, there are a thousand woman scientists.”
India has successfully launched satellites into space, put an orbiter around the Moon and Mars. That too with a frugality even the developed nations admire.
But behind the scenes, away from the public eye, quiet, unassuming and positively brilliant women spearhead many important missions of the Indian Space Research Organisation. These women have not only broken the glass ceilings but have not even thought of the sky as their limit – quite literally.
They are passionate, strong and independent women of science that look like our neighborhood aunties, but pack a scientific punch that would impress the likes of Tony Stark and Elon Musk. Today, let’s take a look at the women in ISRO.

1. Ritu Karidhal, mother of two worked on most weekends, brainstorming with ISRO engineers


As a kid, Mrs. Ritu Karidhal used to wonder why the moon becomes bigger and smaller. She also wondered what lay in the dark side of the moon.
And decades later, she became the Deputy Operations Director of the Mars Orbiter Mission. After reading each and everything related to space science as a kid, she now heads one of the most well-known missions of ISRO.
Fact Source

2. Moumita Dutta – read about the Chandrayaan mission as a student, now works as a Project Manager for the Mars Mission


She is the project manager for payloads for the Mars Mission. She completed her M. Tech in Applied Physics from the University of Kolkata.
Today, she leads a team to make indigenious progress in optical sciences as a part of ‘Make in India’ initiative.
“The entire mission has 20% of women scientists deeply involved in the Mars Mission”
Fact Source

3. Nandini Harinath – her first job was at ISRO and 20 years later there is no looking back


She became inspired to study science after she saw the Star Trek series. Coming from a family of teachers and engineers, she was naturally drawn to science and technology.
Today as a Deputy Director, she feels proud to see the Mars Orbiter Mission on the new 2000 rupee notes. She works extremely hard, and despite having children, she did not go home for days just before the launch.
That’s called commitment.
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4. Anuradha TK – As a Geosat Programme Director, she is the senior-most woman officer at ISRO


She first thought about becoming a space scientist when she was just 9 years old. That was when Neil Armstrong first walked on the moon, and Mrs. Anuradha was hooked.
As the senior-most officer, she is the inspiration for every woman scientist working in ISRO. As a student, she loved the logical subjects as compared to the subjects in which she had to memorise everything. Today, she applies the same logical brain to head one of the most important departments in ISRO.
“Sometimes I say that I forget that I’m a woman here. You’re treated as an equal here.”
Fact Source

5. N Valarmathi – led the launch of India’s first indigenously developed the radar imaging satellite, the  RISAT-1


She was the second woman after T K Anuradha to head a satellite mission at ISRO. At 52, she has made her state of Tamil Nadu proud.
She is the first woman to head a mission that involves a remote sensing satellite.
Too cool.
Fact Source

6. Minal Sampath, worked 18 hours a day for the Mars Orbital Mission


She led a team of 500 scientists as a systems engineer at ISRO. For two years, she said goodbye to Sundays and even national holidays.
The sacrifice showed fruit when she was overjoyed with the success of the Mars Mission.
What’s next? She aims to become the first woman director to head a national space agency. A hardworking woman like that, fingers crossed!
Fact Source

7. Kriti Faujdar – computer scientist who works at the Master Control Facility, keeping satellites in their proper orbits


Kriti Faujdar is a part of the team that monitors the satellites and the other missions continuously. She is the person that makes the corrections if something goes wrong.
Her work shifts are erratic too. On some days she has a day shift and on some, it is from dusk to dawn. She is unfazed by this because she loves her job.
She wants to pursue MTech in the future to be a better scientist for ISRO in the future.
Fact Source

8. Tessy Thomas – the missile woman of India who headed the Agni IV and Agni V mission


Tessy Thomas technically works for the DRDO and not ISRO, but she deserves to be on this list. We could not leave her out.
It is her hard work and dedication that has brought India close to becoming a member of the exclusive club of countries with ICBMs (Inter Continental Ballistic Missiles). Because of her achievements, she is fondly called ‘Agniputri’ by the media.
Fact Source
Today, there are more than 16,000 women working for ISRO and the number is growing every day. It is easy to imagine ISRO completely comprised of men because all 7 heads have been men.
But the fact is that thousands of women work hard for our premier space agency.
For these women, even sky is not a limit.

 

  प्रस्‍तुति -अलकनंदा सिंह

 

 

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

सुरेंद्र वर्मा को व्यास सम्मान

हिन्दी के साहित्यकार और नाटक लेखक सुरेंद्र वर्मा को वर्ष 2016 का व्यास सम्मान उनके 2010 में प्रकाशित उपन्यास के लिए दिया जायेगा।
केके बिड़ला फाउंडेशन द्वारा आज यहां जारी विज्ञप्ति के अनुसार, वर्ष 2016 का व्यास सम्मान हिन्दी के प्रख्यात लेखक सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास ‘काटना शमी का वृक्ष : पद्मपखुरी की धार से’ को चुना गया है। इस उपन्यास का प्रकाशन वर्ष 2010 में हुआ था।
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में हुई चयन समिति की बैठक में सुरेंद्र वर्मा के नाम का चयन किया गया। उन्हें बतौर सम्मान साढ़े तीन लाख रूपये प्रदान किए जायेंगे। इस पुरस्कार का आरंभ 1991 में किया गया था।
वर्मा को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुके है। वह लंबे समय तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े रहे हैं।
सुरेन्‍द्र वर्मा के बारे में
सुरेन्द्र वर्मा का जन्म १९४१ में हुआ था,वे हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास ”मुझे चाँद चाहिए” के लिये उन्हें सन् 1996 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
सुरेन्‍द्र वर्मा का उपन्‍यास – मुझे चाँद चाहिए के बारे में 
कई दशकों से हिन्दी उपन्यास में छाये ठोस सन्नाटे को तोड़ने वाली कृति आपके हाथों में है, जिसे सुधी पाठकों ने भी हाथों-हाथ लिया है और मान्य आलोचकों ने भी !
शाहजहाँपुर के अभाव-जर्जर, पुरातनपंथी ब्राह्मण-परिवार में जन्मी वर्षा वशिष्ठ बी.ए. के पहले साल में अचानक एक नाटक में अभिनय करती है और उसके जीवन की दिशा बदल जाती है। आत्माभिव्यक्ति के संतोष की यह ललक उसे शाहजहाँनाबाद के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तक लाती है, जहाँ कला-कुंड में धीरे-धीरे तपते हुए वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता प्रमाणित करती है और फिर उसके पास आता है एक कला फिल्म का प्रस्ताव !
आत्मान्वेषण और आत्मोपलब्धि की इस कंटक-यात्रा में एक ओर वर्षा अपने परिवार के तीखे विरोध से लहूलुहान होती है और दूसरी ओर आत्मसंशय, लोकापवाद और अपनी रचनात्मक प्रतिभा को मांजने-निखारने वाली दुरूह, काली प्रक्रिया से क्षत-विक्षत। पर उसकी कलात्मक आस्था उसे संघर्ष-पथ पर आगे बढ़ाती जाती है।
वस्तुतः यह कथा-कृति व्यक्ति और उसके कलाकार, परिवार, सहयोगी एवं परिवेश के बीच चलने वाले सनातन द्वंद्व की और कला तथा जीवन के पैने संघर्ष व अंतर्विरोधों की महागाथा है।
परंपरा और आधुनिकता की ज्वलनशील टकराहट से दीप्त रंगमंच एवं सिनेमा जैसे कला-क्षेत्रों का महाकाव्यीय सिंहावलोकन ! अपनी प्रखर संवेदना के लिए सर्वमान्य सिद्धहस्त कथाकार तथा प्रख्यात नाटककार की अभिनव उपलब्धि । – Legend News

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उनको मुबारक...फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के हस्‍ताक्षर



इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उनको मुबारक, 
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे !!
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जब कोई शख्‍स अपनी मिट्टी से...वतन से...मोहब्‍बत से...बच्‍चों से...अलग कर दिया जाये और वह शायर हो तो अलफ़ाज खुदबखुद कलम से बाहर तैरने लगते हैं...और बहते हुए किन्‍हीं किनारों पर मौजूद लोगों को उन अहसासों में भिगो देते हैं जो इन्‍होंने अपने लिए जिए होते हैं।
आज यानि 13 फरवरी को ही आधुनिक उर्दू शायरी को एक नई ऊँचाई देने वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्‍म हुआ था। साहिर लुधियानवी , क़ैफ़ी आज़मी और फ़िराक़ गोरखपुरी आदि उनके समकालीन शायर थे।

लियाकत खान के जब पाकिस्‍तान के वजीरे-आज़म थे तब उन्‍हें सरकार के तख़्तापलट की साजिश रचने के जुर्म में कैद कर लिया गया था। इस दौरान (१९५१‍ - १९५५) में लिखी गई उनकी कविताएँ बाद में बहुत लोकप्रिय हुईं और उन्हें "दस्त-ए-सबा (हवा का हाथ)" तथा "ज़िन्दान नामा (कारावास का ब्यौरा)" नाम से प्रकाशित किया गया।
इनमें जो सबसे अधिक लोकप्रिय हुई ,वह उस वक़्त के शासक के ख़िलाफ़ साहसिक लेकिन प्रेम रस में लिखी गई शायरी थी जिसको आज भी याद किया जाता है -

    बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
    बोल, ज़बाँ अब तक तेरी है
    तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
    बोल कि जाँ अब तक तेरी है

    आईए हाथ उठाएँ हम भी
    हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
    हम जिन्हें सोज़-ए-मुहब्बत के सिवा
    कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं

    लाओ, सुलगाओ कोई जोश-ए-ग़ज़ब का अंगार
    तैश की आतिश-ए-ज़र्रार कहाँ है लाओ
    वो दहकता हुआ गुलज़ार कहाँ है लाओ
    जिस में गर्मी भी है, हरकत भी, तवानाई भी
    हो न हो अपने क़बीले का भी कोई लश्कर
    मुन्तज़िर होगा अंधेरों के फ़ासिलों के उधर
    उनको शोलों के रजाज़ अपना पता तो देंगे
    ख़ैर हम तक वो न पहुंचे भी सदा तो देंगे
    दूर कितनी है अभी सुबह बता तो देंगे
    (क़ैद में अकेलेपन में लिखी हुई)

    निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन
    के जहाँ चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले
    गर कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
    नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले

    चंद रोज़ और मेरी जाँ, फ़क़त चंद ही रोज़
    ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पर मजबूर है हम
    और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
    अपने अजदाद की मीरास हैं, माज़ूर हैं हम

    आज बाज़ार में पा-बेजौला चलो
    दस्त अफशां चलों, मस्त-ओ-रक़सां चलो
    ख़ाक़-बर-सर चलो, खूँ ब दामां चलो
    राह तकता है सब, शहर ए जानां चलो ।

...और इस तरह शायरी की एक अज़ीम शख्‍सियत फ़ैज अहमद फ़ैज हमारे दिलों को हमेशा अपने लफ़्जों से तरबतर करते रहेंगे।

- अलकनंदा सिंह


गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

जज साहब...सवाल उठना लाजिमी है

किसी भी समाज की प्रगति उसकी इस वैचारिक तरलता से  मापी जाती है कि वहां अभिव्‍यक्‍ति की आजादी और विचारों  की तरलता का प्रवाह कितना है। कुंद विचारों के साथ पूछे  गए सवाल या उन सवालों के जवाब अपने मनमाफिक  सुनने की आकांक्षा वैचारिक तरलता को बाधित करते हैं।  अदालतों के कुछ मापदंड आजकल इसी अवधारणा पर काम  करने लगे हैं।
आज अदालती चक्रव्‍यूह से कौन वाकिफ नहीं है, और इसी  चक्रव्‍यूह पर बनी फिल्‍म ''जॉली एलएलबी 2'' से बॉम्‍बे  हाईकोर्ट ने चार सीन सिर्फ इसलिए हटाने का आदेश दे दिया  कि वो अदालत की अवमानना करते हुए उनके कार्यपद्धति  पर ही सवाल उठा रहे थे। कला व साहित्‍य में अभिव्‍यक्‍ति  की आजादी क्‍या सिर्फ सड़कों पर नारे लगाने तक ही है,   क्‍या ये माध्‍यम हमारी कानूनी व अन्‍य नियामक संस्‍थाओं  को अपने भीतर झांकने का इशारा भी नहीं कर सकते।  फिल्‍म से सीन हटवा कर क्‍या बॉम्‍बे हाईकोर्ट उस जड़ता का  परिचय नहीं दे रहा जिसका प्रदर्शन आज तक सेंसर बोर्ड  करता आया है और कभी कहानी की मांग पर तो कभी  समाज में कड़वाहट फैलाने का भय दिखाकर इंडीविजुअल  सोच के तहत फिल्‍मों को सर्टिफिकेट्स देती रही हैं। यानि  सब-कुछ अपने मनमुताबिक हो तो भला, वरना अवमानना  के कोड़े से फिल्‍म को डब्‍बे में डाल देने का रास्‍ता तो है ही।
कौन नहीं जानता कि अवमानना के नाम पर सवाल पूछने  की इसी आजादी को छीन लेने के कारण आज स्‍वयं कुछ  जज भी अपारदर्शिता के इल्‍ज़ाम लगाने पर बाध्‍य हुए हैं।  अदालतों में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार सामने नहीं आ पा रहा जबकि  सब जानते हैं कि सच क्‍या है। फिल्‍म अगर सच दिखा रही  हैं तो उससे सबक लेते हुए सुधार की गुजाइशें खोजी जानी  चाहिए ना कि सवाल करने के मौलिक अधिकार को ही  अवमानना का भय दिखाकर ''चुप्‍प'' कर देना चाहिए। इससे  सवाल उठने बंद नहीं होंगे बल्‍कि ज्‍यादा शिद्दत के साथ  उठाए जाऐंगे।
समाज के विकास के लिए सवाल छलनी की तरह होते हैं,  हालांकि यह भी सत्‍य है कि सवाल पूछने वाले की मनोदशा  और उसके पूर्वाग्रह इसमें अहम रोल अदा करते हैं क्‍योंकि  नकारात्‍मक या किसी खास मकसद से किए गए सवालों का  जवाब मिल भी जाए तो संतुष्‍टि मिलना जरूरी नहीं मगर  जहां तक बात ''जॉली एलएलबी 2'' फिल्‍म की है तो इसके  प्रिक्‍वल जॉली एलएलबी में भी दिखाया गया है कि अदालतों  में किस प्रकार वकीलों को बेरोजगारी से बचने के लिए  दलाली तक करनी पड़ती है और अदालती चक्रव्‍यूह में फंसने  वालों को किन किन समस्‍याओं से रूबरू होना पड़ता है,  फिल्‍म में ''स्‍वविवेक'' के नाम पर जज वादी-प्रतिवादियों से  क्‍या-क्‍या नहीं कराते हैं। तो फिर आज जॉली एलएलबी 2  के सीन्‍स पर अदालत की अवमानना कैसे हुई। चेहरा  मोड़कर हकीकतों से मुंह छिपा लेना समस्‍याओं के समाधान  का जरिया नहीं हो सकता। इसके लिए समाज से उठ रहे  सवालों का जवाब तो अदालतों को ही तलाशना होगा। सीन  काटकर फिल्‍म तो रिलीज हो जाएगी मगर आमजन में  गहरे तक पैठ चुकी अदालतों में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार की  कहानियां जिन सवालों के साथ खड़ी हैं उनका जवाब कौन  देगा।
किसी भी समाज के विकास को पारदर्शी सवाल-जवाब होते  रहने चाहिए। सवाल उठना और उठाना जीवंतता की निशानी  हैं।

लाजिमी है कि यदि हम ज़िंदा समाज हैं तो सवाल उठायेंगे  ही और जवाब मिलने पर समाज व इसकी नियामक  संस्‍थाओं का संचालन, समाज में सकारात्‍मक सुधार लाएगा  बशर्ते अदालत अथवा कोई भी संस्‍था स्‍वस्‍थ सोच के साथ  ''सिर्फ अपनी'' नहीं पूरे समाज का हित सोचे।
निश्‍चित जानिए कि फिल्‍म से चार सीन हटावाने की बजाय  यदि अदालत उसमें उठाए गए सवालों पर गौर करती और  अपने यहां फैली भ्रष्‍ट व अराजक स्‍थितियों को दूर करने के  लिए कोई टिप्‍पणी करती तो इसका संदेश दूर तक जाता।

गुलज़ार साहब का एक शेर याद आ रहा है-

आंखों में जल रहा है क्‍यूं,
बुझता नहीं धुआं
उठता तो है घटा सा
बरसता नहीं धुआं


 ऐसा नहीं कि अदालतों के अंदर बैठे विद्वान व माननीय  न्‍यायाधीश, न्‍याय प्रक्रिया में पूरी तरह समा चुके भ्रष्‍टाचार  से वाकिफ नहीं हैं। वह भली प्रकार वाकिफ हैं किंतु उस पर  गौर नहीं करना चाहते। गौर इसलिए नहीं करना चाहते  क्‍योंकि वह अपनी निजी शख्‍सियत को ही न्‍याय की तराजू  मान चुके हैं। उनकी दृष्‍टि से देखें तो किसी जज की  व्‍यक्‍तिगत सोच को ही अंतिम सत्‍य मान लेना बेहतर है  अन्‍यथा कोई फिल्‍म हो या लचर कानून-व्‍यवस्‍था को दिखाने  वाला दूसरा माध्‍यम, सबके सब अदालती अवमानना के  दायरे में आते हैं। 

- अलकनंदा सिंह

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