रविवार, 29 मार्च 2015

जश्न-ए-बहार मुशायरे में इस बार चीन और पाकिस्तान के शायर भी आयेंगे

नई दिल्‍ली। ‘जश्न-ए-बहार’ मुशायरे में इस बार पाकिस्तान और चीन समेत दुनियाभर के नामचीन उर्दू शायर शमा रौशन करेंगे.
तीन अप्रैल को आयोजित होने जा रहा यह मुशायरा देश का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक जश्न होता है और इस बार 17वें मुशायरे में जावेद अख्तर और वसीम बरेलवी जैसी हस्तियां शिरकत करेंगी.
इनमें बीजिंग से झांग शिचुआन, न्यूयार्क से अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह, टोरंटो से अशफाक हुसैन जैदी और जेद्दाह से उमर सलीम अल एदरूस प्रमुख हैं.
उर्दू शायरी के चाहने वालों को इस सालाना जश्न का बेसब्री से इंतजार रहता है जिसमें पाकिस्तान के शायरों को खासतौर से पसंद किया जाता है. इस बार इस्लामाबाद से किर नाहीद, लाहौर से अमजद इस्लाम अमजद और कराची से आम्बरीन हासिब मुशायरे की रौनक बढ़ाने के लिए आ रहे हैं.
मुशायरे का आयोजन दिल्ली पब्लिक स्कूल मथुरा रोड में किया जाएगा. अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय के वाइस चांसलर जमीनउद्दीन शाह मुशायरे के खास मेहमान होंगे और वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर इसकी अध्यक्षता करेंगे.
भारतीय शायरों में कोलकाता से मुनव्वर राना, मुरादाबाद से मंसूर उस्मानी और मेरठ से पोपुलर मेरठी भी अपनी शायरी पेश करेंगे.
जश्न-ए-बहार ट्रस्ट की संस्थापक और उर्दू कार्यकर्ता कामना प्रसाद कहती हैं कि भारत में मुशायरे को हमेशा से ही धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से देखा जाता रहा है जिसकी पहचान उर्दू और हिंदुस्तानी चरित्र को समेटे हुए है. हम इस संस्थान को जिंदा रखने तथा इसे और बेहतरीन बनाने की कोशिश में हैं.

शनिवार, 28 मार्च 2015

कन्या पूजन का प्रोफेशनलिज़्म

सामने के घर से कन्या पूजन के बाद बाहर आती बच्चियों की उम्र  बमुश्किल 5 से 8 वर्ष के बीच रही होगी। एक हाथ में  हलवा, पूरी और दूसरे हाथ में ऑब्लिगेशन गिफ्ट्स। कई घरों से बुलावे सुबह ही आ चुके थे। कुछ के अभी भी आ रहे थे। इतने बिजी कि घरों में पूजन करते हुए जो पूरियां खाने को दी जा रही थीं, उन्हें गेट से निकलते ही सही जगह पर फेंकने तक की फुरसत ना थी, वे यूं ही डस्टबिन के बाहर की ही ओर फेंकी जा रही थीं। तभी एक बच्ची जो उनमें सबसे छोटी थी, ने पूछा, ''अब कहां जाना है '' । कन्या ग्रुप की लीडर ने कहा, देखो अब नंबर तो सक्सेना आंटी के यहां जाने का है... मगर ... ! सब बच्चियां उसका मुंह देख रही थीं ।
वे सब बड़ी लड़की के ''मगर'' के बाद कुछ कहने का इंतज़ार कर रही थीं। लड़की आगे बोली, ''देखो ऐसा करते हैं कि सक्सेना आंटी के यहां चलते हैं मगर वहां खाना नहीं खायेंगे, उनसे कह देंगे कि पैक कर दो।'' छोटी बच्ची ने फिर पूछा, क्यों... खाना क्यों नहीं खायेंगे, उन्होंने तो मेरे मन पसंद की सब्जी और बूंदी का रायता भी बनाया है, मुझे तो वही खाना है ... ।
बड़ी लड़की ने कहा, मैंने खाने से थोड़े ही मना किया है पागल, खाना हम उनसे पैक करा लेंगे, फिर तू घर जाकर खा लेना।'' वो आगे बोली, हम खाना तो अग्रवाल आंटी के यहां का खायेंगे, वो साथ में महंगे गिफ्ट भी देती हैं और उनके ए. सी. भी तो है ना... डाइनिंग रूम में। सक्सेना आंटी तो बस कुरकुरे का पैकेट, एक पेंसिल बॉक्स और थोड़ी सी एक्लेयर्स दे देतीं हैं बस, जैसे कि ये कोई खजाना पकड़ा रही हों। वो 3 सेक्टर वाला चिंटू बता रहा था कि अग्रवाल आंटी ने तो इस बार स्मार्टफोन्स मंगाए हैं, कन्याओं को देने के लिए ... अब तुम्हीं बताओ, मैं सही कह रही हूं ना। ''सबने एक सुर से अपनी लीडर की हां में हां मिलाई।
सक्सेना आंटी के घर के सामने पहुंचते ही उन्होंने अपने जोरदार अभ‍िनय से बता दिया, ''आंटी, अभी भूख नहीं है, आप तो खाना पैक कर दो, हम घर जाकर खा लेंगे।''
परंपरा और देवी भक्ति की मारी बेचारी सक्सेना आंटी मन मसोस कर रह गईं कि कन्याओं के वे सिर्फ पैर ही पूज पायेंगीं और अपने सामने भोजन खिलाने के पुण्य से वंचित रह जायेंगी। क्या करतीं, उन्होंने खाना पैक किया, गिफ्ट भी पैक किया और पैर पूज कर हर कन्या को विदा किया।
अगले पांच मिनट में वे कन्याएं अग्रवाल आंटी के घर ए. सी. डाइनिंग रूम में विराजमान थीं। देवी जो ठहरीं, स्मार्ट फोन्स के पैकेट देखकर अचानक उनके भरे हुए पेट खाली हो गये थे। सक्सेना आंटी के तुच्छ पैकेट वो बाहर ही छोड़ कर आई थीं।
मेरी सामने घटे इस पूरे वाकये ने ना जाने कितने ही प्रश्नों को जन्म दे दिया... मसलन जिन्हें हम कन्या समझते हैं ...क्या वास्तव में  वे उस परिभाषा को पूरा करती हैं... , या कि भरे पेट पर किसी को भोजन कराने से क्या सचमुच पुण्य मिल सकेगा... क्या भोजन के साथ गिफ्ट्स का चलन छोटे छोटे बच्चों में लालच को जन्म नहीं दे रहा ... यदि इसी लालच के चलते बच्चे अपने फायदे, कम फायदे या ज्यादा फायदे के बारे में नहीं सोचेंगे क्या...  क्या करें जो कुछ 'हासिल' हो सके जैसी सोच के कारण क्या वो कन्याएं हम ढूढ़ पायेंगे जो निष्कपट, निश्छल हों, जिनके लिए सब बराबर हों चाहे वो सक्सेना आंटी हों या अग्रवाल आंटी ...  आदि।
प्रश्न बहुत हैं मगर उत्तर हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम उसे किस दायरे में रखकर देखना चाहते हैं।
खैर, ये वो सच है जो हमें अपना अंतस खंगालने पर विवश करता है कि इस हाइटेक युग में हम अपनी परंपराओं के साथ कहां खड़े हैं। और कहीं हम उन्हें ढोने के चक्कर में पुण्य की जगह कुछ और तो नहीं कमा रहे।

- अलकनंदा सिंह  

रविवार, 15 मार्च 2015

ये भी तो असंसदीय ही है ना ...

कहते हैं कि शब्द ब्रह्म होता है और शब्द अच्छा है या बुरा, उसके उपयोग पर निर्भर करता है। आज तक देखा गया है कि सामाजिक व्यवहार में कोई भी शब्द अपनी उपयोगिता व अनुपयोगिता उसके प्रयोग पर निर्भर करती है  । ऐसे ही कुछ शब्द हैं जिन्हें अच्छा या बुरा कहा जाता है और उन्हें संभ्रांत व निकृष्ट की श्रेणी में रखा जाता है । इस पूरी जद्दोजहद में उन शब्दों का अपना क्या दोष जो बुरे, अछूत या असंसदीय कहे जाते हैं अथवा उन शब्दों का क्या योगदान माना जाए जो व्यक्त‍ि या परिस्थ‍िति को महान बनाती है ।

फिर शब्द असंसदीय कैसे हो सकता भला , उसे प्रयोग करने वाले व्यक्ति या उस मानसिकता को तो असंसदीय कहा जा सकता है जो देश , काल या समाज के लिए घातक हो परंतु शब्द किसी भी कोण से असंसदीय नहीं कहा जा सकता।

जब से पढ़ा है कि शिवसेना के सांसद हेमंत ' गोडसे ' ने लोकसभा और राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन को पत्र लिखकर कहा है कि उनकी जाति को असंसदीय शब्दों की सूची से हटाया जाए। लोकसभा सचिवालय ने सांसद के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा कि महात्‍मा गांधी के हत्यारे नाथूराम ' गोडसे ' के नाम से जुड़ी जाति गोडसे को लेकर कुछ गलती हुई है पर इस विषय में अंतिम निर्णय लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्ष ही लेंगे। संसद के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि किस 'गोडसे' को असंसदीय शब्द के तौर पर प्रतिबंधित किया गया है मगर इसका भुगतान पूरी जाति को असंसदीय कहलाने के रूप में भुगतना पड़ रहा है ।

रिकॉर्ड्स के अनुसार इस बारे में अप्रैल 1956 में लोकसभा के डिप्टी स्पीकर हुकुम सिंह ने इस बाबत जब आदेश दिए थे तो उस समय स्टेट रिऑर्गनाइजेशन बिल पर चर्चा हो रही थी। तभी दो सांसदों ने नाथूराम गोडसे के नाम को उछाला था। इसके बाद हुकुम सिंह ने ऐसे आदेश दिए थे। इसके बाद वर्ष 2014 में संसद के शीत सत्र के दौरान सीपीएम सांसद पी राजीव ने हिंदू महासभा की तरफ से देश भर में नाथूराम गोडसे के बुत लगाने के खिलाफ आवाज उठाई थी। तब पी जे कुरियन ने एक बार फिर से पूर्व में लिए गए निर्णय की तरफ लोगों का ध्यान खींचा था।

यह राजनीतिज्ञों की अजब सी मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह तो लगाती ही है। यूं भी गुनाह किसी एक ने किया और सजा पूरी की पूरी जाति को मिले , क्या ये न्याय कहा जाएगा। संसद के रिकॉर्ड के मुताबिक 'गोडसे' शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। यह एक असंसदीय शब्द है। हेमंत गोडसे ने पत्र ‌में लिखा है कि यह कैसे किया जा सकता है कि एक पूरी की पूरी जाति को ही असंसदीय शब्द की सूची में रख दिया जाए। यह मेरी गलती नहीं है कि मेरी जाति गोडसे है। इसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता हूं और न ही अपनी जाति को बदलने जा रहा हूं। सांसद हेमंत गोडसे ने कहा कि गोडसे शब्द को असंसदीय शब्द की श्रेणी में शामिल करना एक समुदाय विशेष और मेरे लिए बहुत ही पीड़ा की बात है। इस जाति के साथ महाराष्ट्र में बहुत से लोग रहते हैं।

निश्चति ही गोडसे लिखा जाना क्या पूरी की पूरी जाति को महात्मा गांधी का हत्यारा बना देना नहीं है ? 'गोडसे' को बैन या असंसदीय घोषि‍त किए जाने से आहत सांसद की बात हमें उस पीड़ा का अहसास कुछ कुछ इसी तरह कराती है कि जैसे किसी पिछड़े इलाके के लोगों ने किसी एक जाति को समाज से निकाल बाहर किया हो वह भी किसी एक व्यक्ति की गलती के कारण।

ये शब्दों पर हमारी तानाशाही ही है कि जिस जाति में आप पैदा हुए उस को सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित कर दिया जाए कि वह किसी एक शख्स से किसी खास वजह से जुड़ी हुई रही है ....  तो क्या हम पीढि़यों को भी उसी गुनाह का भागीदार बना रहे हैं , यह तो ज्यादती हुई ना ?  असंसदीय क्या है ... वह सोच जो पूरी जाति को देश की मुख्यधारा से अलग कर दे या वह शब्द 'गोडसे' ।

- अलकनंदा सिंह

रविवार, 8 मार्च 2015

महिला दिवस: इंडियाज डॉटर और ग्रे शेड्स से आगे भी हैं जहां...

आज महिला दिवस है, 8 मार्च... यानि लफ़्जों के हुनरमंदों की एक और शालीन दिखने वाली आजमाइश होगी....जिस पर समाज के हर तबके से लंबे चौड़े व्याख्यानों की झड़ी भी लगेगी।
पूरे दिन मीडिया में सभी स्तर से तर्कों-वितर्क करके औरत पर रहमोकरम का अंबार खड़ा किया जायेगा। साहित्यिक भद्रजन (स्त्री व पुरुष दोनों) स्त्री-विमर्श का पोथी-पत्रा खोलकर '' बेचारी स्त्री'' के लिए, उसके उत्थान के लिए कसीदों का पुलिंदा मुंह पर मारने को तत्पर दिखाई देंगे। ये सारी कवायद सिर्फ इसलिए होगी ताकि इस घोर कलियुगी संसार में एक निरीह प्राणी स्त्री ही तो है जो बड़ी शिद्दत से इस दिन का इंतज़ार करती है कि आओ... और मेरे होने पर एक दिन का रहम खाओ। फिर .... ? ओह.... !

सब अपने- अपने हिस्से का रहम आज उड़ेल देंगे और ये सब राष्ट्रीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हो रहा है। जिस तरह कि इसी एक दिन को कैश करने की मुसलसल कोशि‍श की है बीबीसी 4 के लिए बनाई डॉक्यूमेंटरी ''इंडियाज डॉटर'' के माध्यम से। ब्रिटिश फिल्म मेकर लेज्ली उडविन चर्चा में हैं अपनी इस फिल्म को लेकर। जिसमें एक सच बड़े ही वीभत्स ढंग से सामने आया है। बलात्कारी की सोच क्या हो सकती है, उसे बयान करने के बहाने बहसों का लंबा चौड़ा काफिला तैयार हो चुका है। संभवत: लेज्ली को बलात्कारी के दुष्कृत्य से, उसकी हैवानियत से, निर्भया के हश्र से, उसके माता पिता का फटता हृदय देखने भर से शायद संतुष्ट‍ि नहीं मिली थी और इसलिए उन्होंने उसकी मानसिकता को शब्दों में पिरोकर पूरा प्रचार करवाया।

इसी तरह महिला दिवस के बहाने खास चर्चा में हैं ब्रिटि‍श लेखिका ईएल जेम्स की किताब  ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’।  ये किताब दुनियाभर में अपनी ख्याति बटोरने के बाद अब भारत में उन लोगों के बीच पैठ बनाने की कोश‍िश कर रही है जो स्त्री की स्वतंत्रता को उसकी यौन-उन्मुक्तता के चश्मे से देखते हैं।
ईएल जेम्स की किताब एक कारोबारी और एक कॉलेज स्टुडेंट के ‘अजीबो-गरीब’ कामुक रिश्ते पर आधारित है जो 2012 में आते ही लोकप्रिय हो गई थी।
आश्चर्य होता है यह जानकर कि शुचिता की बात करने वाले भारतीय समाज में  तीन भागों वाले इस उपन्यास की अब तक तीन लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं।
सचमुच प्रगति के नए आख्यान बन चुके हैं और समय काफी आगे बढ़ चुका है, तभी तो अमेरिका और ब्र‍िटेन की तरह इस उपन्यास पर बनी फिल्म अब हमारे देश में सेंसर बोर्ड की अनुमति का इंतज़ार कर रही है....हद है...।
हद ये भी है...कि इस बीच महिला दिवस पर बाजार अपनी ही  टेक्नोलॉजी से काम कर रहा है। अब देखि‍ए ना कि... बाजार ने चाहा तभी तो उसने 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' को टोटल ब्राइट बनाकर बेच डाला और बाजार ने चाहा तभी उसने निर्भया की डॉक्यूमेंटरी को विवादित बनाकर अपनी टीआरपी बढ़वा ली।  इससे फायदा तो सिर्फ बाजार नियामकों को ही हुआ, उनमें किताब के प्रकाशक हैं,  सेक्स ट्वॉयज बेचने वाली वेबसाइट्स हैं, बीबीसी और उनकी डॉक्यूमेंटरी पर पैनल्स बैठाकर बहस करने वाले टीआरपी-क्रेजी भारतीय चैनल भी हैं।
गौरतलब है कि 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' में उस सैडिस्ट जीवनशैली का उल्लेख है जिसमें लोग सेक्स के दौरान एक-दूसरे को दर्द देते हैं, क्योंकि दर्द के लेन-देन और ताकत की अभिव्यक्ति उनकी कामुकता को एक नए मुकाम तक ले जाती है। इस जीवन शैली को बीडीएसएम के नाम से भी जाना जाता है।
इस जीवनशैली में एक शख्स ‘डॉमिनेन्ट’ यानी प्रधान है और दूसरा ‘सबमिसिव’ यानी अधीन है। पहले का हक है अपना जोर आजमाना और दूसरे की जिम्मेदारी है उस शक्ति के प्रदर्शन को बर्दाश्त करना।
क्या यह किसी भी दुष्कर्म से अलग है... क्या इस किताब की बिक्री हमें सावधान नहीं करती कि समाज में डॉमिनेंट और सबमिसिव को बराबरी पर लाने की बातें सिर्फ मंचीय ड्रामे हैं... उनमें आज बेडरूम के अंदर थ्र‍िल पैदा करने के लिए किताब का सहारा लिया जा रहा है... तो क्या गारंटी है कि कल यही किताब पढ़ने वाले अपने थ्र‍िल के लिए उसे सड़कों पर या नन्हीं बच्चि‍यों  पर नहीं आजमाऐंगे, फिर इसमें चाहे डॉमिनेंट औरत हो या मर्द, इससे क्या फ़र्क पड़ता है ? 
निश्चति ही ये ग्रे शेड्स का भुगतान हमारे देश में औरतों-लड़कियों-बच्चि‍यों को ही ज्यादा करना होगा क्योंकि थ्र‍िल के लिए दर्द देना तो बलात्कार ही हुआ ना, फिर ग्रे शेड्स की नायिका में और निर्भया या अन्य वीभत्स बलात्कारियों में फ़र्क ही कहां है?
डॉमिनेंट और सबमिसिव की थ्योरी उसी देश से आ सकती है जो भरे पेट पर जुगाली करते- करते सोचते हैं कि पेट तो भर गया... अब इसे पचाने के लिए और क्या खाया जाए... मगर यही पचाने के लिए कुछ थ्रिल खोजने वाली थ्योरी,  उस देश में सिर्फ और  सिर्फ बलात्कार ही परोस सकती है जहां तन भर कपड़ा- मन भर चैन के लिए सारी जिंदगी खटते-खटते निकल जाती है । हमारे देश में  'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' की बेतहाशा बिक्री हो या इंडियाज डॉटर  पर बहस,  एक ऐसे बदबूदार कचरे को जन्म दे रही है जो समस्या की जड़ों तक नहीं पहुंचने देगा।
आज जब औरत शरीर से लेकर मन तक की स्वतंत्रता को पाने के लिए  घर से लेकर बाहर तक नित नए युद्ध लड़ रही है तब, 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे'  और 'इंडियाज डॉटर'  से आगे जाकर हमें सोचना होगा क्योंक‍ि यही सोच बलात्कारि‍यों की सोच को जानने जैसे वाहियाती सवालों और कामुकता को डॉमिनेंट व सबमिसिव के बीच लटका कर पूरी की पूरी स्त्री अस्मिता पर ही प्रश्नच‍िन्ह ही नहीं लगाती बल्कि उन जाहिलाना करतूतों को भी ग्लैमराइज करती है जो  हमेशा स्त्री-देह पर अटकी रहती हैं।
 
ये स्त्री को लेकर उथली-छिछली समीक्षाएं बंद होनी चाहिए। ना तो स्त्री सिर्फ बाजार का मोहरा है और ना ही रसोई-बेडरूम में चस्पा की गई कोई तस्वीर जिसे जब चाहो तब अपने मन के रंग भर दो ...जब चाहो तब बेरंग कर दो ... पश्चिम ही नहीं तथाकथित  आधुनिक भारतीयों को भी ये सच जान लेना चाहिए ... 
ज़ाहिर है कि पश्चिम अब भी स्त्री को एक शरीर के दायरे से बाहर देख ही नहीं पा रहा जबकि भारतीय संदर्भ में इसकी व्याख्या काफी आगे बढ़ चुकी है। देखते हैं अभी इस यात्रा को लक्ष्य तक पहुंचने में अभी और कितने पड़ावों से जूझना होगा।
गौर से देखि‍ए तो पानी, हवा तथा चींटी का भाग्य और जज़्बा एक सा होता है ....वह अपना रास्ता खुद ही खोजती है, बनाती है .. उसे अपने शेड्स दिखाने के लिए अपने ही समाज, अपनी  ही संस्कृति में से रास्ते निकालने पड़ते हैं और वही वह कर भी रही है वरना आज इतनी कंपनियों के उच्चासन पर वो पहुंची ही ना होती । हां, कुछ कहावतें हैं जो बदलनी चाहिए ताकि औरत अपने लिए भी जी सके ...जैसे कि किसी पुरुष की कामयाबी के पीछे स्त्री का हाथ होता है,  तो ये कहावत उल्टी क्यों नहीं हो सकती ... अब समय है कि ये कहावत उल्टी बहनी चाहिए ... ।


- अलकनंदा सिंह 

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