mathura लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
mathura लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

आज हुई मथुरा में श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान पर Holi

 आज श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान मथुरा पर हुई Holi: रंगभरनी एकादशी पर भगवान श्रीकृष्‍णजन्‍मस्‍थान की होली ने सभी दर्शकों को भी सराबोर कर दिया। इस अवसर पर ब्रज की मनभावन होली के रंगभरे उल्लास तो दिखाई ही दिया साथ ही परंपरागत ‘मयूर नृत्य’ की उमंग ने समां बांध दिया। ‘रसिया’ की तान पर नटखट गोपाल की संगीतमय आराधना ने अपनी छटा बिखेरी तो यह ब्रज की पांच हजार वर्ष पुरानी कृष्णमयी संस्कृति और लोकपरम्परा साक्षात हो गई। ब्रज की संस्‍कृति का अभिन्न अंग है श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान की ये होली।


भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के लीला मंच पर रंगभरनी एकादशी 26 फरवरी को लठामार Holi का आयोजन किया गया। होली के लिए अयोध्या से गुलाल मंगाया गया। ब्रज की होली से जुड़े स्थलों की पवित्र रज मिश्रित गुलाल की बरसात की जाएगी। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और जय श्रीकृष्ण लठामार होली समिति ने व्यवस्थाओं को पूरा कर लिया है।
संस्थान के सचिव कपिल शर्मा, सदस्य गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी ने बताया कि जन्मभूमि की अलौकिक Holi के लिए ढाल, बारह¨सगा, ढोल, नगाड़े रंग-पुत कर तैयार किए जा रहे हैं। तेल में भीगी हुरियारिनों की लाठियां भी प्रिया-प्रियतम की होली के लिए तैयार हैं। कार्यक्रम का शुभारंभ दोपहर दो बजे ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा करेंगे। महिलाओं के बैठने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। उन्होंने बताया कि होली के लिए भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या से गुलाल मंगाया गया है। ब्रज में भगवान की होली लीला से जुड़े स्थलों की पवित्र रज मिश्रित गुलाल, पुष्प की बरसा मशीनों द्वारा की गई।
251 हुरियारे-हुरियारनों ने खेली लठामार होली
श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर इस बार रावल और श्रीकृष्ण संकीर्तन मंडल के 251 हुरियारे और हुरियारिनें लठामार होली का हिस्सा बने। लहरिया रंग के लहंगा-फरिया पहनें हुरयारिनें-हुरियारों पर लाठियों से प्रहार करतीं नजर आईं वहीं पीले और सफेद धोती-कुर्ता में सजे हुरियारे उनसे हंसी-ठिठोली करते दिखे।
श्रीकृष्ण जन्मस्थान के सचिव कपिल शर्मा ने बताया कि रंगभरनी एकादशी पर परिसर में होने वाली लठामार होली को खास बनाने के लिए मंदिर प्रबंधन ने थोड़ा बदलाव किया है। पूर्व की अपेक्षा इस बार अधिक संख्या में हुरियारे व हुरियारिनों को आमंत्रित किया गया है।
विगत वर्ष 151 हुरियारे व हुरियारिनों ने इसमें भाग लिया था, इस वर्ष इनकी संख्या में इजाफा किया गया है और 251 हुरियारे और हुरियारिनों को आमंत्रित किया गया है।
भक्त यहां प्रभु के साथ Holi खेलने आते हैं,  यहां आने वाला प्रत्येक भक्त यह अहसास करता है कि वह वास्तव में ठाकुरजी के साथ ही होली खेल रहा है।
-Legend News

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

हारून भाई को किसने मारा...

वो फैमिली हेयर ड्रेसर थे, दुबई रिटर्न...जी हां...''दुबई रिटर्न'', ये तमगा 90 के दशक में बड़ी बात  हुआ करती थी, वो बताते थे कि वो स्‍वयं तब वहां शेखों के पर्सनल सैलून्‍स में हजामत किया करते  थे।
खुशदिल, मिलनसार और ओवरऑल एक अच्‍छी पर्सनालिटी के मालिक थे हारून भाई। मथुरा में  उनकी दुकान हमेशा शिफ्ट होती रहती, कभी चौराहे के पास किसी नन्‍हीं सी गली में तो कभी  नामालूम वीरानी सी रोड पर। दुकान कहीं भी पहुंच जाए, मगर हारून भाई के ''हुनर'' के मुरीद  उनको तलाश ही लेते थे। उनकी कस्‍टमर लिस्‍ट में एक ओर जहां शहर के अमीरजादे, नवधनाढ्य,  गणमान्‍य नागरिक, फैशनपरस्‍त थे वहीं दूसरी ओर आमजन भी उसी शिद्दत से उन्‍हें आजमाते थे।  एक अजब सा सम्‍मोहन था उनके उंगलियों में जो नन्‍हें बच्‍चों को भी चुपचाप हेयर ड्रेसिंग कराने  को बाध्‍य कर देता।

लगभग एक साल पहले की बात है कि अचानक एक दिन उनके बेटे का फोन आया कि ''मेरे अब्‍बा  और आपके हारून भाई नहीं रहे...''। उनका जाना हमारे लिए किसी अज़ीज की रुखसती जैसा था।  बेटे से तफसील जानी तो पता लगा कि वो डायबिटिक थे, उनका शहर के जाने माने  एंडोक्रायनोलॉजिस्‍ट से इलाज चल रहा था, डॉक्‍टर ने उन्‍हें इतनी हैवी मैडीसिन्‍स दी कि उनका  पैन्‍क्रियाज ही बस्‍ट हो गया, उन्‍हें जो इंजेक्‍शन्‍स इंट्रामस्‍कुलर दिए जाने थे, वो इंट्रावेनस दिए गए,  जिससे उनका दिमाग डेड हो गया, जब शरीर में जहर फैलता देखा तब जाकर डॉक्‍टर ने उन्‍हें  दिल्‍ली के अपोलो अस्‍पताल के लिए रैफर किया, वहां का हाल भी कमोबेश ऐसा ही था, बस बच्‍चों  को सुकून था कि सर्वोच्‍च सुविधा का हॉस्‍पीटल है तो अच्‍छे रिजल्‍ट आऐंगे, परंतु कुछ दिन  वेंटीलेटर पर रखने के बाद उनका मृत शरीर ही हाथ आया।

इस तफसील का लब्‍बोलुआब ये कि अच्‍छे खासे हारून भाई को डायबिटीज ने नहीं, बल्‍कि गलत  और एक की जगह दस दवाओं के हाईडोज ने मारा और इसका जिम्‍मेदार कौन...? ज़ाहिर है वही  जिम्‍मेदार माना जाएगा जिसने दवाइयां दीं...जिसने जानबूझकर उन्‍हें कई दिनों तक अपने यहां  सिर्फ हैवी बिल बनाने के लालच में एडमिट रखा और बिगड़ती तबियत को 'अंडरकंट्रोल' बताता रहा।

ज़रा बताइये कि मरीजों की जान से खेलने वाले झोलाछाप डॉक्‍टर्स को जब हम गलत ठहराते हैं तो  ये स्‍पेशलिस्‍ट क्‍या कहे जाने चाहिए। बेशर्मी की हद देखिए कि डॉक्‍टर्स की संस्‍था ''इंडियन मेडीकल  एसोसिएशन'' यानि आईएमए इस जानलेवा अपराध को चुप्‍पी साधे देखती रहती है। डॉक्टर्स की  लापरवाही के ऐसे किसी भी मामले पर आईएमए का बोलना तो दूर, बल्‍कि उन्‍हें इस लूट-खसोट की  मौन स्‍वीकृति देती है।

कौन नहीं जानता कि हर नर्सिंग होम के भीतर मेडीकल स्‍टोर रखना नाजायज है, फिर भी रखा  जाता है, या ये कौन नहीं जानता कि पैथोलॉजीकल लैब बाकायदा कमीशन-सेंटर के तौर पर डॉक्‍टर्स  की ''साइड-इनकम'' का ज़रिया होती हैं, कैसे एक ही टेस्‍ट के लिए हर पैथलैब का रिजल्‍ट अलग  अलग होता है।

आईएमए के साथ साथ मेडीकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) भी इस बावत आंखें फेरे रहती  है कि जिन मेडीकल प्रैक्‍टिशनर्स को उसने प्रैक्‍टिस के लिए मान्‍यता दी है, वे उसका पालन कर भी  रहे हैं या नहीं। यूं तो स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय भी आंखें मूंदे था, यदि गत दिनों प्रसिद्ध हॉस्‍पीटल फोर्टिस   में डेंगू से बच्‍ची के मर जाने तथा उसके पिता को 18 लाख रुपए का बिल थमा देने जैसा गंभीर  मामला सामने न आता। अस्‍पताल की असंवेदनशीलता तथा लूट को सभी ने सुना होगा कि कैसे  अस्‍पताल के संचालकों द्वारा कई दिन पहले मर चुकी बच्‍ची का शव सिर्फ मोटा बिल बनाने के  लिए उपयोग किया जाता रहा और अंतत: बच्‍ची का निर्जीव शरीर उन्‍हें थमा दिया गया।

ये कोई किस्‍सा नहीं बल्‍कि ऐसी हकीकत है जिसे हर वो परिवार भोगता है जिसका कोई अपना  धरती पर भगवान कहलाने वाले चिकित्‍सकों की शरण में पहुंचने को मजबूर होता है।
फोर्टिस अस्‍पताल की ब्‍लैकमेलिंग के मामले ने वो सारे ज़ख्‍म ताज़ा कर दिए जो हमने हारून भाई  की मौत के बाद जाने थे।

संभवत: इसीलिए आमजन की तो अब यह धारणा हो गई है कि मल्‍टीस्‍पेशलिटी हॉस्‍पीटल, हैल्‍थ  पैकेजेज, भारी-भरकम डिग्रियों से सुसज्‍जित डॉक्‍टर्स के ये सिर्फ आधुनिक कसाईखाने हैं। हालांकि  अपवाद अभी भी शेष हैं, मगर कितने।

अब तो बस ये देखना है कि केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय की ओर से जो राज्‍यों को ''क्‍लीनकल  स्‍टैब्‍लिशमेंट एक्‍ट'' लागू करने को कहा गया है, उसे कितने समय और कितने राज्‍यों द्वारा लागू  किया जाता है क्‍योंकि इस ''क्‍लीनकल स्‍टैब्‍लिशमेंट एक्‍ट'' के तहत अस्‍पतालों को विभिन्‍न सेवाओं  व चिकित्‍सकीय प्रक्रियाओं के लिए तय फीस का ब्‍यौरा देना होगा। यदि ऐसा होता है तो अब भी  समय है कि मेडीकल जगत जनता का भरोसा कायम रख सकता है। हकीकतन तो आज कोई  डॉक्‍टर ऐसा नज़र नहीं आ रहा जो उस शपथ की सार्थकता सिद्ध कर पाने के  लायक भी हो  जिसमें पूरी मानवता की सेवा को सर्वोपरि मानने की बात कही गई थी।

बहरहाल, अफसोस तो इस बात का है कि व्‍यावसायिकता की अंधी दौड़ में पता नहीं कब धरती के  भगवानों ने शैतान का रूप धारण कर लिया और कैसे उनकी पैसे को लेकर हवस इस कदर बढ़ गई  कि उनके लिए इंसानी जान की कोई कीमत ही नहीं रही। अगर कुछ रहा तो केवल इतना कि किस  तरह मरीज के परिजनों की भावनाओं का खून की अंतिम बूंद तक दोहन किया जा सके। 

-अलकनंदा सिंह 

रविवार, 13 अगस्त 2017

सावधान! कन्‍हैया निशाने पर हैं...


जन्‍माष्‍टमी को दो दिन बचे हैं और मथुरा के मंदिरों-घाटों-आश्रमों-गेस्‍ट हाउसों में भारी  भीड़ है। इस भीड़ में अधिकांशत: पूर्वी प्रदेश के दर्शनार्थी ही हैं, इसके बाद क्रमश: अगले  नंबरों पर पंजाब, दिल्‍ली, हरियाणा और राजस्थान व पश्‍चिम बंगाल के लोग आते हैं। हर  बार की तरह इस बार भी शहर के वाशिदों को आशंका है कि जन्‍माष्‍टमी के ठीक बाद इन  दर्शनार्थियों द्वारा छोड़े गए अपने खाने-पीने-रहने-निवृत होने के अवशेषों से महामारी फैल  जाएगी। ब्रज पिछले कई वर्षों से इस आशंका को वास्‍तविक रूप में भुगत भी रहा है।

सरकारी अमला और धार्मिक व समाजसेवी संस्‍थाऐं सब मिलकर दर्शनार्थियों की हर संभव  सेवा और सुरक्षा करता है मगर सड़कों के किनारे बसें रोककर झुंड के झुंड जब निवृत होते  हैं और स्‍नान कार्य संपन्‍न करते हैं तो शहर वासी चाहकर भी उनके प्रति सेवाभाव नहीं  रख पाता और अपने ही अतिथियों के प्रति एक आशंका से भर उठता है।

पिछले लगभग 20 साल के आंकड़े बताते हैं कि गुरूपूर्णिमा और जन्‍माष्‍टमी के ठीक बाद  से पुरे ब्रज क्षेत्र में वायरल, चिकनगुनिया जैसे रोग महामारी की तरह फैलते हैं। पिछले दो  दिन से जापानी इंसेफेलाइटिस के कारण गोरखपुर मेडीकल कॉलेज में जब से बच्‍चों की  मौत का मंज़र देखा है, तब से ब्रज क्षेत्र में ऐसी ही किसी बीमारी की आहट से लोग  चिंतित हैं।

बाबा जयगुरुदेव के अधिकांश अनुयायी पुर्वी उत्‍तरप्रदेश से ताल्‍लुक रखते हैं और शहरी  क्षेत्र में आने वाले हाईवे का आधे से अधिक हिस्‍से पर इनका कब्‍ज़ा रहता है। अतिथियों  की सेवा धर्म होती है मगर अतिथि इस सेवा का जो ''प्रसाद'' ब्रजवासियों को सौंप कर  जाते हैं, वह इस बार भयभीत कर रहा है क्‍योंकि गोरखपुर में हुई मौतों का ताजा उदाहरण  सामने है।  

अधिकांशत: बच्‍चों को ही डसने वाली जापानी इंसेफेलाइटिस नामक इस महामारी से अकेले  पूर्वी उत्‍तरप्रदेश में ही 1978 से अब तक मरने वाले बच्‍चों की संख्‍या लगभग ''एक  लाख'' होने जा रही है। इसमें वो बच्‍चे शामिल नहीं हैं जो नेपाल के तराई इलाकों और  बिहार के सीमावर्ती  क्षेत्रों से गोरखपुर मेडीकल कॉलेज में दाखिल किए गए।

अब तक ''गोरखपुर ट्रैजडी'' को ना जाने कितने कोणों से देखा जांचा जा रहा है, एक ओर  सरकार पर विपक्ष हमलावर हो रहा है तो दूसरी ओर मीडिया ट्रायल करने में कोई कसर  नहीं छोड़ी जा रही है। कहीं कुछ कथित समाजसेवी अपनी पूर्व में व्‍यक्‍त की गई  आशंकाओं को ''सच'' साबित करने पर तुले हैं।

नि:संदेह प्रदेश की योगी सरकार से मेडीकल कॉलेज प्रशासन पर निगरानी रखने में भारी  चूक हुई और इतने बच्‍चों की मौत का कलंक उसे ढोना ही होगा क्‍योंकि लापरवाही के  उत्‍तरदायित्‍व में वह तथा स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय सहभागी रहा परंतु दूसरों पर दोष लादने की  राजनैतिक पृवृत्‍ति को छोड़ अब मरीजों को, मृत बच्‍चों के परिजनों को हालिया राहत देते  हुए खुले में शौच से संपूर्ण प्रदेश (खासकर पूर्वी उत्‍तर प्रदेश) को मुक्‍त करने के अभियान  को कागजों से नीचे उतारने का काम कमर कस कर किया जाना चाहिए।
प्रशासनिक अधिकारियों पर ही नहीं, ग्रामीण स्‍तर पर इसके लिए ''जागरूकता अभियान  इकाईयां'' बनाकर स्‍वयं सरकार के ''राजनैतिक समाजसेवी'' इस अभियान में जुटेंगे तो  स्‍थिति काबू में लाई जा सकती हैं। ये इतना असाध्‍य भी नहीं है।

डिजिटलाइजेशन के इस युग में इस तरह की मौतों के लिए हम जैसे पढ़े-लिखे लोग भी  कम जिम्‍मेदार नहीं हैं यानि वो वर्ग जो अपने सुख तक सिमटा है और दोषारोपण करती  बहसों का आनंद ले रहा है, बजाय इसके कि स्‍वच्‍छता और अशौच के प्रति लोगों को  जागरूक करे।

बहरहाल, मैं वापस मथुरा और ब्रज के अन्‍य धार्मिक स्‍थानों पर फैले उस भय से सभी को  परिचित कराना चाहती हूं जो कि अतिथियों का स्‍वागत करने से पहले उसके आफ्टर  इफेक्‍ट्स से डर रहा है। हमारे कन्‍हाई भी अबकी बार इंसेफेलाइटिस के निशाने पर  हैं...नंदोत्‍सव और राधाष्‍टमी तक वे खतरे में रहेंगे...हमें तैयार रहना ही होगा।

जन्‍माष्‍टमी पर हमारे यहां तो कन्‍हाई जन्‍मेंगे ही, लेकिन हम सभी ब्रजवासी गोरखपुर के  उन कन्‍हाइयों की अकाल मौत से भी बेहद दुखी हैं जो सरकारी खामियों, अपनों के अशौच  और उनकी लापरवाहियों का शिकार बन रहे हैं।

सरकार पर दोषारोपण इलाज मुहैया न कराने के लिए किया जा सकता मगर सफाई की  सोच जब तक हमारे भीतर नहीं बैठेगी, तब तक हम अपने बच्‍चों को यूं ही गंवाते रहेंगे।  हमें गरीब के नाम पर रहम परोसने की राजनीति छोड़नी होगी क्‍योंकि कोई कितना भी  गरीब क्‍यों ना हो, गंदे हाथ धोने को मिट्टी और राख तो सभी जगह मिल सकती है, नीम-  तुलसी हर घर में हो सकता है इसलिए बहानेबाजी, दोषारोपण तथा मौतों के आंकड़े गिनने  से बेहतर है कि सच्‍चाई को स्‍वीकार किया जाए और अपने स्‍वच्‍छता की जिम्‍मेदारी खुद  उठाई जाए।

हम तैयार हैं अपने अतिथियों की तमाम निवृत पश्‍चात फैली गंदगियों को साफ करने के  लिए और अपने कन्‍हाई पर आ रहे महामारियों के खतरे से जूझने के लिए मगर  अतिथियों से भी आशा करते हैं कि वे ब्रज रज के सम्‍मान को तार-तार न करें।
अपनी श्रद्धा के नाम पर ब्रजवासियों को सौगात में ऐसा कुछ परोसकर न जाएं जो उन पर  और उनके परिवार पर भारी पड़े।  

-अलकनंदा सिंह

सोमवार, 16 जनवरी 2017

अपभ्रंशित रूप में डरा रहे हैं मथुरा के चतुर्वेदी परिवारों के संस्‍कार

मानवीय व्‍यवहार की जटिलता पर बड़े-बड़े शोध करने वाले मनोवैज्ञानिकों के लिए एक सरल साधन (माध्‍यम)  हो सकते हैं हमारे लोक जीवन के रीति रिवाज और संस्‍कार।
लोक जीवन में बच्‍चे के जन्‍म से लेकर वृद्धावस्‍था तक इतने कायदे-कानून बिखरे पड़े हैं कि हर एक का जस का तस पालन कर लेना अनेक सीख दे जाता है।
साथ  ही इन्‍हीं परंपराओं और रीतियों-रिवाजों का स्‍याह पहलू भी है ,  वि  यह  है कि ये तकरीबन सब की सब अब अपने अपभ्रंश रूप में हमारे जीवन में मर्यादा व अनुकूलन कम,बल्‍कि  खीझ अधिक लाने लगी हैं।

वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध अच्‍छी रीति को भी अपभ्रंशित रूप दुष्‍परिणाम देने लगे हैं। समृद्ध और प्रगतिवादी सोच रखने वाला मथुरा का चतुर्वेद समाज ऐसी ही कुछ कुरीतियों के चंगुल में फंसता जा रहा है और ऐसी कुरीतियों को बढ़ाने में महिलाओं का बड़ा हाथ है। इस समाज में आज भी दहेजरहित विवाह होते हैं, आज भी लड़की अपनी पसंद नापसंदगी को जाहिर कर सकती है। आज भी छेड़खानी, चोरी , छीनाझपटी, हत्‍या या ऐसे कोई भी अपराध चौबियापाड़ा में ना के बराबर होते हैं। संकरी गलियां आज भी सुरक्षा की दृष्‍टि से अभेद्य मानी जाती हैं। आज भी पूरा समाज आपसी झगड़े झंझट मिलबांटकर सुलझाा लेता है। ऐसे समाज में यदि कुरीतियां सिर उठाने लगें तो समाज की आगामी दशा का  अंदाजा लगाया जा सकता है।

चूं कि मथुरा के चतुर्वेदी परिवार में मेरा ससुराल है, तो एक कुटुंबीजन की मृत्‍यु के बाद पिछले 13  दिनों से रीति-रिवाजों और संस्‍कारों का जो नाटकीय रूप यहां देखने को मिला, उसने सनातन धर्म में जीवन की मर्यादाओं का महत्‍व बताने वाली सारी विधियों-सारे नियमों की जिस तरह धज्‍जियां बिखेरीं, वह बताती हैं कि कुछ भी शाश्‍वत नहीं। ना ही कोई धर्म और ना उसकी मर्यादाएं। हम ही धर्म बनाते हैं और हम ही उसे ज़मींदोज भी करते  जाते  हैं, अपने कृत्‍यों से ।
इन 13 दिनों में मानवीय व्‍यवहार की वीभत्‍सता अपने चरम पर देखने को मिली।रिश्‍तों का खोखलापन , आधा अधूरा अपनापन के साथ  कुछ रीतियां तो ऐसी देखीं कि मैं स्‍वयं को लिखने से रोक ना सकी।

कृष्‍ण के सखा रूप में प्रसिद्ध ''मथुरा के चतुर्वेदी'' स्‍वयं को ब्राह्मणों में ही सर्वोच्‍च 'मानते' हैं और यमुनापुत्र कहे जाते हैं। चारों वेदों के ज्ञाता माने जाते हैं और ये अधिकांशत: सत्‍य भी है। माथुर-चतुर्वेद समाज में जो अच्‍छी रीतियां हैं जैसे कि  महिलाओं को पुरुषों से अधिक अधिकार मिले हुए हैं। महिलायें ही रिश्‍ते कराने से लेकर शादी-ब्‍याह तक में सारी जिम्‍मेदारियों का वहन करती हैं। महिला का मायका पक्ष अन्‍य जाति व समाजों से इतर अपने पूरे अधिकार व दखल रखता है, यहां वह दोयम नहीं है।

पुरुषों में आज भी सनातन संस्‍कार पूरी तरह विद्यमान हैं, जिनमें एक है ''उपनयन संस्‍कार'' जिसका यथारूप में नई पीढ़ी द्वारा भी पूरी उम्रभर निभाया जाना, बेशक आज के भौतिकतावादी युग में आश्‍चर्य से कम नहीं वो भी तब जबकि आज नई पीढ़ी दुनिया के हर कोने में अपनी उपस्‍थिति दर्ज करा रही है। मगर  बात यहां भी वही है कि संतुलन गड़बड़ा गया है, महिलाओं को जो अधिकार मिले वह उनका दुरुपयोग करने लगीं। रीतियों  को निभाने में जो वैज्ञानिक तत्‍व मौजूद था ,वह अपने विकृत रूप में सामने आ रहा है।

इसी दुरुपयोग की बानगी है भोजन का अपव्‍यय। पिता की मृत्‍यु के बाद बेटे द्वारा दायित्‍व  निभाने के क्रम में सूतक के दौरान उसके लिए प्रतिदिन रसोई से जो भोजन निकाला जाता है, वह आज के  समय में 5 लोगों का भोजन हो सकता है। बेटे के खाने के बाद बचा हुआ भोजन यूं ही आवारा जानवरों, बंदरों व कुत्‍तों के लिए डाल दिया जाता है जिसे जानवरों द्वारा पूरी गली (अमूमन सारा समाज आज भी मथुरा के अंदरूनी क्षेत्र के पुश्‍तैनी घरों में निवास करता है) में बिखेर दिया जाता है, इस रिवाज को बदलने के फिलहाल दूर-दूर तक कोई आसार दिखाई नहीं देते। 13 दिन के बाद अर्थात् तेरहवीं हो जाने के बाद भी ये सिलसिला पूरे एक वर्ष तक चलता है, बस भोजन ग्रहणकर्ता बदल जाता है, वह कोई  ब्राह्मण या कोई बहन-बेटी-बुआ-भांजी या भांजा होता है मगर भोजन का दुरुपयोग जस का तस होता रहता है। ऐसे में जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवार और भी विपन्‍न होता जाता है। शायद इसीलिए पंजाबियों से ली गई एक कहावत चतुर्वेदी पुरुषों ने अपनाई भी है ”जिवते बात ना पुछ्छियां और मरे धड़धड़ पिट्टियां।  अर्थात् इस पूरे कर्मकांड में जो गरीब है उसका तो मरना हो जाता है ना।

सूतक की अवधि में साबुन, शैम्‍पू, तेल आदि प्रसाधन का प्रयोग वर्जित है, चाहे गंदगी से युक्‍त भोजन-कपड़े  कितना भी संक्रमित हो जाएं। तेरहवीं के संस्‍कार के बहाने मुझे जो मानवीय व्‍यवहार के कटु-किस्‍से सुनने को मिले उनका ज़िक्र फिर कभी करूंगी…कैसे…किस रूप में…यह अभी नहीं पता मगर करती रहूंगी ताकि एक संभ्रांत समाज अपने भीतर पल रही बुराइयों को दूर कर आत्‍मावलोकन तो कर सके।
संस्‍कारों को अपने हिसाब से चलाने की ”रीति” चतुर्वेदी महिलाओं की तमाम ''अच्‍छाइयों'' पर भारी पड़  रही है। डर है कि कहीं जेनेटिकली यानि विरासतों में मिली अच्‍छाइयां पूरे समाज के सुसंस्‍कारों को विपरीत दिशा में ना मोड़ दें और अपभ्रंशित समाज अपनी अनमोल विरासतों  को भूलने के लिए अभिशप्‍त ना हो जाए।
– सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

बुधवार, 24 अगस्त 2016

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर: मातृत्व के बाजार को बचाने का प्रयास है सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016

कर्मण्यवाध‍िकारस्ते मा फलेषु कदाचन्
श्रीमद्भगवत गीता का यह उपदेश हम ना जाने कितनी बार दोहराते आए हैं परंतु जब इसे सार्थक सोच के साथ क्रियान्वित होते देखते हैं तो निश्च‍ित ही भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाना भी सार्थक हो जाता है।

आज और कल भगवान श्री कृष्ण के जन्म की धूम मची है। हमारे यहां ब्रज में तो जन्माष्टमी मनाने  का अपना एक अलग आनंद , एक अलग अंदाज़ होता है, इस बार भी है , चारों ओर भक्ति का अंबार उड़ेला जा रहा है। मां यमुना अपने  उसी रूप में दर्शन दे रही हैं जैसे कि श्री कृष्ण जन्म के समय उफन रही थीं और आज से लेकर अगले एक हफ्ते तक ब्रज में उत्सव का यही हाल रहना है मगर आज ऐन जन्माष्टमी से पहले  भारत सरकार की ओर से एक समाचार ऐसा आया है जिसे श्री कृष्ण जन्म पर ''मातृत्व और नवजातों'' के अस्तित्व को बाजार की वस्तु बनाने पर रोक लगाने के क्रम में देखा जाना चाहिए।

मोदी कैबिनेट ने आज उस बिल को मंजूरी दे दी जिसमें Surrogacy (किराये की कोख) पर लगाम लगाने का प्रावधान है। साथ ही Surrogacy वाली मां के अधिकारों की रक्षा के उपाय भी किये गये हैं। इसके साथ ही सरोगेसी से जन्मे बच्चों के अभिभावकों को कानूनी मान्यता देने का प्रावधान है।

सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 कैबिनेट से पास

कैबिनेट से पास सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 मुताबिक अविवाहित पुरुष या महिला, सिंगल, लिव इन में रह रहा जोड़ा और समलैंगिक जोड़े अब सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते. इसके साथ ही अब सिर्फ रिश्तेदार महिला महिला ही सरोगेसी के जरिए मां बन सकती है.
केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सरोगेसी बिल पर कहा, “आज कल प्रसव पीड़ा से बचने के लिए सरोगेसी फैशन बन गई है. भारत लोगों के सरोगेसी हब बन गया था इसलिए बिल की जरूरत महसूस हुई.”

फिल्मी हस्तियों पर भी निशाना साधा

सुषमा स्वराज ने इशारों-इशारों में फिल्मी हस्तियों पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा, ”बड़े सितारे जिनके न सिर्फ दो बच्चे हैं, बल्कि एक बेटा और बेटी भी है, वे भी सरोगेसी का सहारा लेते हैं.”
स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रस्ताव के अनुसार किराये की कोख मसौदा विधेयक 2016 का लक्ष्य देश में किराये की कोख संबंधी प्रक्रिया के नियमन को समुचित ढंग से अंजाम देना है.

क्या है कैबिनेट से पास हुए सरोगेसी बिल में
कैबिनेट से पास हुए बिल में व्यावसायिक सरोगेसी पर पूरी तरह बैन लगाने का प्रस्ताव है. इसके साथ ही अब सिर्फ रिश्तेदार ही सेरोगेट मां बन सकती है.
जिन माता-पिता के पहले से एक संतान है या उन्होंने एक संतान को गोद लिया है तो वे दूसरी संतान के लिए सरोगेसी का सहारा नहीं ले सकते.
देश भर में सरोगेसी के लिए 2000 क्लीनिक हैं. अब सिर्फ भारतीय भारतीय नागरिक ही सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे सकते हैं.
पांच साल से शादीशुदा जोड़े, जिनकी कोई संतान नहीं है वो ही सरोगेसी के लिए आवेदन कर सकते हैं. अविवाहित, सिंगल, लिव इन में रह रहा जोड़ा और समलैंगिक जोड़े सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते.
सरोगेसी के लिए सरोगेसी में उम्र की सीमा भी तय कर दी गई है. इसके मुताबिक पुरुष की उम्र 26-55 साल और महिला की उम्र 25-50 साल होगी तभी वे सरोगेसी के लिए आवेदन कर सकते हैं.
अगर सरोगेसी के लिए आवेदन करने वाला जोड़ा किसी बीमारी से ग्रसित है तो वो आवेदन नहीं कर सकता.
इसके साथ ही एक महिला सिर्फ एक बार ही सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे सकती है.
सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे जा रही महिला का शादीशुदा होना जरूरी है. इसके साथ ही वह पहले भी एक बच्चे को जन्म दे चुकी हो.
सभी सरोगेसी क्लीनिक का रजिस्टर होना जरूरी है. अगर सरोगेसी के बाद जन्मे बच्चे को अपनाने से इनकार किया जाता है तो उसके लिए बिल में 10 साल की जेल और 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है.
सरोगेसी के जरिए पैदा हुए बच्चे के पास वो सभी कानूनी अधिकार होंगे सामान्य रूप से पैदा हुए बच्चे के पास होते हैं. सरोगेसी क्लीनिक को पच्चीस सालों का रिकॉर्ड मौजूद रखना होगा.
स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री की अध्‍यक्षता में केंद्र पर नेशनल सरोगेसी बोर्ड, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्तर तक स्टेट सरोगेसी बोर्ड का गठन किया जाएगा.

क्यों पड़ी सरोगेसी बिल की जरूरत
सरकार ने हाल में स्वीकार किया था कि वर्तमान में किराये की कोख संबंधी मामलों को नियन्त्रित करने के लिए कोई वैधानिक तंत्र नहीं होने के चलते ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों सहित विभिन्न क्षेत्रों में किराये की कोख के जरिये गर्भधारण के मामले हुए जिसमें शरारती तत्वों द्वारा महिलाओं के संभावित शोषण की आशंका रहती है।

हालांकि ये भी सच है कि कथ‍ित महिला अध‍िकारवादियों द्वारा इस बिल के ख‍िलाफ कल से ही आलोचनाओं का अंबार लगने वाला है  मगर श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर सरकार की ओर से मातृत्व को बाजार की वस्तु बनाने और उपभोक्तावाद से बचाने के लिए किया गया प्रयास काबिलेतारीफ है।
कुल मिला कर बात इतनी है कि मां की गरिमा को आज तक कोई ना खरद सका है ना ही कोई बेच पाया है मगर बेहद मुफलिसी और बेहद अमीरी के इस खाईनुमा वातावरण में सरोगेसी एक व्यापार बन चुकी थी, इसे समय रहते रोका जाना जरूरी था ताकि कोख खरीदना फैशन ना बन पाए ।

- अलकनंदा सिंह 

शुक्रवार, 10 जून 2016

ये कैसे संत और कैसी इनकी संतई… !

कुछ समय पहले एक शब्द हमारी संवेदनाओं को खंगालता हुआ आया, ”असहिष्णुता”, जितना लिखने में कठिन उतना ही बोलने और समझने-समझाने में। सारी सोशल साइट्स पर यह अपने अपने तरीके से ट्रेंड करने लगा। एक स्थापित सी मान्यता बन गई कि हिंदू बनाम मुसलमान यदि कुछ भी घटित हुआ तो बड़ी असहिष्णुता है जी, घटना घटित हुई नहीं कि सोशल मीडिया पर हाय- हाय शुरू।
इस असहिष्णुता के दायरे में हिंदू-मुसलमान के मनमुटाव तो आ गए मगर वो अत्याचार दब गए जो सबल किसी निर्बल पर करते हैं।
वृंदावन में इसी असहिष्णुता का हाल ही में एक वाकया सामने आया, जिसका हीरो था तथाकथि‍त संत समाज और असहिष्णुता सह रही थीं मृत देहें।
जी हां, मथुरा के जवाहर बाग कांड में कथित सत्याग्रहियों की मृत देहें ।
पूरा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार था कि मथुरा में उद्यान विभाग की भूमि ”जवाहर बाग ” पर लगभग सवा दो साल पहले बाबा जय गुरुदेव के बागी श‍िष्य पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के रहने वाले रामवृक्ष यादव ने कब्जा कर लिया, कब्जा करने को बहाना शुरुआत में तो सिर्फ धरना कहा गया फिर उनकी असली मंशा जवाहर बाग की कुल 280 एकड़ भूमि को कब्जाने की थी इसीलिए उसने न सिर्फ अपना जनबल, धनबल बढ़ाया बल्कि बारूद का ढेर इकठ्ठा कर लिया। मंसूबे खतरनाक थे। कहा जा रहा है प्रदेश सरकार के मंत्रियों की शह पर सब कुछ हुआ, कब्जा हटवाने के लिए हुए आख‍िरी रण में दो पुलिस अफसर एसपी सिटी मुकुल द्व‍िवेदी और एस ओ संतोष यादव शहीद हो गए। अफसरों के शहीद होते ही पुलिस ने जवाहर बाग में मौजूद रामवृक्ष के सहयागियों पर गोलियां दागीं, तो कुछ कब्जाधारी अपनी ही लगाई आग में घ‍िर कर मर गए। ऐसे मरने वालों की संख्या ऑन रिकॉर्ड कुल 27 बताई जा रही है। ये कथ‍ित कब्जाधारी मथुरा प्रशासन को ही नहीं, स्थानीय जनता को भी बेहद परेशान करते थे। जाहिर है क‍ि उनके प्रति जो घृणा थी वह पुलिस अफसरों के शहीद होने पर भयंकर रूप ले चुकी थी। ऐसे में जो कब्जाधारी बच गए, वो भाग खड़े हुए, कुछ जनता के हाथ पड़ गए। जो मर गए उनका अंतिम संस्कार किया जाना था, सो कुछ मथुरा के मोक्षधाम (श्मसान) पर लाए गए तो कुछ को वृंदावन ले जाया गया।


पुलिस पोस्टमॉर्टम के बाद जिन मृतकों को वृंदावन के मोक्ष धाम पर अंतिम संस्कार के लिए ले गई उनको स्थानीय संतों के विरोध का सामना करना पड़ा और मोक्षधाम में प्रवेश करने की इजाजत नहीं मिली।
संतों का नेतृत्व कर रहे महामंडलेश्वर नवल गिरि और संत फूलडोल बिहारीदास महाराज ने मोक्षधाम पर धरना देते हुए पुलिस वालों से कहा कि यह पुण्यात्माओं की भूमि है, यहां इन पापात्माओं की मृत देहों के लिए कोई स्थान नहीं। हारकर पुलिस उन मृत देहों को लेकर पानीगांव, यमुना किनारे गई और वहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।
 
मेरा सवाल यहीं से है– कि मरने वाला पापात्मा था या पुण्यात्मा, ये कौन निर्णय करेगा। हमारे यहां तो अर्थी को नमन करने का प्रावधान इसीलिए गया बनाया गया है कि मृत देह में कोई व्यसन, कोई दुर्गुण शेष नहीं रहता, वह देह ही हमें भान कराती है कि जो कुछ था अच्छा या बुरा हमें सब यहीं छोड़ जाना है। फिर वृंदावन के इन संतों को इतनी सी बात कैसे समझ नहीं आई। और यदि वे संत होने के बाद भी किसी के प्रति इतनी घृणा रख सकते हैं तो उनकी संतई किस काम की, इनसे अच्छे तो वे मूढ़ हैं जो दोस्ती, दुश्मनी, घृणा व प्रेम सब जो करते हैं उसके लिए उन्हें चोले की आवश्यकता नहीं पड़ती।
 
मेरा दूसरा सवाल इन्हीं संतों से– कि वे किस आधार पर पुण्यात्मा और पापात्मा में विभेद कर रहे थे। ये कैसे संत हैं जो इसी पुण्य भूमि में पल रहे अपराधों पर चुप्पी साधे रहते हैं।

वृंदावन आने वाले दर्शनार्थी जानें या न जानें मगर हम तो जानते हैं, और इसी आधार पर इन संतों से पूछ भी सकते हैं कि ये कैसे संत हैं जो अपनी आंखों के सामने ड्राई एरिया होते हुए भी लगातार पनप रहे शराब के अड्डों, पांच सितारा आश्रमों में ब्लैकमनी का अंधाधुंध इन्वेस्टमेंट करके उनमें बाहर से आकर अय्याशी करने वाले धनाढ्य वर्ग के लिए पलक पांवड़े बिछाए रहते हैं।

ये कैसे संत हैं जो निर्बल संतों के जर्जर से दिखने वाले आश्रमों पर भूमाफिया के कब्जे को लेकर कुछ नहीं बोलते, एक शब्द भी नहीं… क्यों।

ये कैसे संत हैं जो किसी दुकान या प्रतिष्ठान का उद्घाटन करने की एवज में भारी धन राश‍ि ”दान” स्वरूप लेते हैं। गोया अपना आशीर्वाद भी बेच रहे हों।

अन्य धार्मिक स्थलों का तो पता नहीं लेकिन मथुरा-वृंदावन की बात मैं बता सकती हूं कि रातों रात उग आने वाले आश्रमों के पीछे की हकीकत क्या है और कौन कितना बड़ा ”संत” है।
ये कैसे संत हैं जो ”भक्तों” के रूप में राष्ट्रपति, सांसद हेमा मालिनी, प्रदेश सरकार की पूरी मंडली को अपने आश्रमों पर लाने के लिए बाकायदा मार्केटिंग करते हैं ।

ये किस्सा जवाहर बाग के कथ‍ित सत्याग्रहियों की मृत देहों को मोक्षधाम में स्थान न दिए जाने से शुरू अवश्य हुआ मगर यही इनके ”चोलों” के भीतर झांकने का माध्यम भी बन गया और इनकी लाइमलाइट पॉलिटिक्स का सच भी बता गया।

मृत देहों के प्रति वृंदावन के इन प्रसिद्ध संतों द्वारा दिखाई असहिष्णुता के लिए किसी ने भी दो शब्द नहीं बोले और ना ही लिखे, हां हर समाचार पत्र ये जरूर लिखता रहा कि पुलिस अफसरों की शहादत के कारण संत भी रोष में आ गए, जबकि हकीकत तो कुछ और ही थी ।

हिंदू-मुसलमान के इतर इस असहिष्णुता पर किसी की भी संवेदनशीलता नहीं जागी, क्योंकि यह अंधभक्ति का जमाना है और संतों के मुखालफत अपराध हो जाता है। सच तो ये है कि असहिष्णुता हिंदू व मुसलमानों का मुद्दा तो है ही नहीं, ये तो इस दौर की खालिस पॉलिटिक्स है जो मौके पर चौका लगाती है…बस।

बहरहाल, गीता में कहा भी गया है कि आत्मा एक शरीर को छोड़ते ही दूसरे में तत्काल प्रवेश कर जाती है तो भी इनके विरोध का क्या औचित्य रहा। मृत देहों को तो अंतत: यमुना किनारा मिल ही गया और ब्रज की रज भी।
इन जैसे (अब तो अध‍िकांशत: ऐसे ही शेष हैं) संतों के लिए कबीर दास का कहा सही लगता है,

“संत न छोड़े संतई, चाहे कोटिक मिले असंत |
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग ||”

– अलकनंदा सिंह

शनिवार, 19 मार्च 2016

पंडित छन्नू लाल मिश्र जी की राग काफी में गाई होली आज अपनी ओर खींच रही है

हमारे ब्रज में 40 दिन तक चलने वाले होली उत्सव का चरम है फिर भी मुझे बरसाने से उठी होली के समाज गायन की आवाज के साथ साथ बरबस ही पंडित छन्नू लाल मिश्र जी की राग काफी में गाई होली अपनी ओर खींच रही है। ये हर होली पर्व पर ही होता आया है कि मैं उनकी गाई हुई ''खेलें मसाने में होरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी...''  हो  या  '' रंग डारूंगी ... डारूंगी नंदलालन पै... '' हो दोनों को सुनकर भावविभोर हो जाती हूं।
पंडित जी की राग काफी में गाई एक होली है ।

https://www.youtube.com/watch?v=LPHBdIB06SU

होली पर होने वाले लोकगायन और समाज गायन से अलग अपनी शास्त्रीय उपस्थ‍िति बताने को काफी है राग काफी में गाई जाने वाली होली । होली के अध‍िकांश गीतों में  जिस राग को बहुतायत में गाया गया , वह है राग काफी।
यूं तो  भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हाँलाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है परंतु मनमोहक राग - काफी में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। जैसे कि फिल्म ' गोदान ' में पं. रविशंकर का संगीतबद्ध की हुई एक होली है -
बिरज में होरी खेलत नंदलाल ...
https://www.youtube.com/watch?v=S-4nRKGRRAM
 
होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है , सुनिए राग काफी में निबद्ध एक होली...

https://www.youtube.com/watch?v=cTieTuVatRY

उन्हीं की गाई राग गारा में उड़त अबीर गुलाल को भी सुनिए...

https://www.youtube.com/watch?v=CRVyFBfvku8

राग काफी की संरचना की अगर बात करें तो राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं।
आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है।
इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है।
कभी-कभी वादी कोमल गांधार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है।
हालांकि दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है।
ठुमरियों में प्रायः दोनों गांधार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गांधार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

हमारे ब्रज में कहा जाता है कि ''फागुन ना माने जात कुजातन और ना माने उमरन कौ भान, जाई तै  सब परबन पै भारी पड़्यौ फागुन कौ मान....

इसी पर पंडित छन्नू लाल मिश्र जी ने गाया है ... रंग डारूंगी ... डारूंगी नंदलालन पै... सुनिए

https://www.youtube.com/watch?v=bgyrScI3T5c

इसके अलावा कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें हैं ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग काफी के अलावा भी कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं, जैसे कि बसंत, बहार, हिंडोल। कुछ तो ये होली का पर्व ऐसा कि बसंत की खुमारी और मादकता के कारण गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है, उस पर ऐसी बंदिशें कि मन झूम उठे सुनकर ही । और ऐसे में यदि पंडित छन्नूलाल मिश्र  की आवाज हो तो क्यों ना रंग छाए ... बरबस रंग छाने ही लगता है।
उपशास्त्रीय संगीत विधा में भी चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली पड़ गया जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन , स्थान , इतिहास व  धार्मिक महत्व छुपा मिलता है।

ब्रज की होली के बारे में यदि मैं कुछ ना कहूं तो कुछ अधूरा सा लगता है होली का आनंद ...फाग खेलन मतवारे आए हैं , नटवर नंद किशोर ... हो या होरी खेलन आयौ स्याम आजु जाय रंग में बोरौ री... के साथ श्री कृष्ण जन्मस्थान से होरी के गीतों और ढप तथा बम की धमक यहां तक सुनाई दे रही है..... ।

चलिए होली के इन शास्त्रीय रंगों को पंडित छन्नूलाल मिश्र की ही चैती से आगे बढ़ाते हैं ... सुनिए...

https://www.youtube.com/watch?v=kOiVPLw0rKI&ebc=ANyPxKpa8QdbRGPb1CCGdEuodj7YUBOKBIvJC0BRv6-cpon8ONTH-Scl8wN4cdJ-xiXtBOfVmdpRDc_7Ggn88v1LMckc4nO30w
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

आर्य समाज : पुनरुद्धारक विचार का उद्धार भी जरूरी है


(स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती के जन्‍मदिन पर विशेष)
जीवन में अधिकांशत: ऐसा होता है कि हम किसी भी घटना, व्‍यक्‍ति  या संदर्भों को पूरी तरह से जाने बिना उस पर प्रतिक्रिया जताने में  अपनी ऊर्जा खर्च कर देते हैं परन्‍तु समाज में जो कुछ भी  नकारात्‍मक घट रहा है उसे बेहतर बनाने में इस ऊर्जा का प्रयोग नहीं  करते। ऊर्जा के ध्‍वस्‍त होते रहने को नियति मान लेते हैं, कर्म से  बचने के अनेक उपाय खोज लेते हैं और विघटित होते मूल्‍यों के लिए  कोसने लगते हैं। इसीलिए कृष्‍ण ने गीता में स्‍वयं कर्म करने का  मार्ग हमें बताया है। कृष्‍ण के बाद आधुनिक काल में इसी कर्ममार्ग  का अनुसरण कर अपने भीतर बैठी 'ऊर्जा' को समाज सुधार के लिए  उपयोग करने का सर्वोत्‍तम मार्ग दिखाया स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती ने।
आज स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती का जन्‍मदिन है, जिन्‍होंने स्‍वयं को  धर्म की शुद्धता के लिए उसमें बैठ चुके पाखंड को उखाड़ फेंकने को  आर्यसमाज की स्‍थापना की।
ये अद्भुत संयोग नहीं तो और क्‍या है कि हजारों साल पहले शांति  और धर्म की स्‍थापना को भगवान कृष्‍ण ने जिस गुजरात को चुना,  आधुनिक काल में एक बार फिर गुजरात से धर्म के पुनर्रुद्धार करने  को यात्रा करके एक काठियावाड़ी युवक मूलशंकर मथुरा आया और  स्वामी विरजानंद से दीक्षा ले स्‍वामी दयानंद के रूप में प्रसिद्ध हुआ।  श्रीकृष्‍ण के बाद गुजरात से मथुरा का संबंध फिर से एक नये धर्म की स्‍थापना का केंद्र बना।
सन् १८६३ से चली धर्मसुधार की इस यात्रा ने अनेक सोपानों को पार  करते हुये, हिन्‍दू धर्म में गहरे पैठ गईं कमजोरियों को दूर करने के  लिए 'पाखण्ड खण्डिनी पताका' फहराई, जो ७ अप्रैल १८७५ को मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना के साथ वेदों की ओर लौटो के नारे में बंधी थी परंतु बदलते समय में आज आर्यसमाज स्‍वयं ही अनेक  विसंगतियों और उपेक्षाओं का शिकार हो रहा है। हम आयेदिन देखते  हैं कि अनेक मूढ़ व कथित धर्मज्ञ आज आर्यसमाज के नाम पर जिस  तरह अनाचारों को समाज में बढ़ते देख कर भी चुप हैं और पाखंडों  को अपने तरह से बढ़ाने में लगे हैं, उसे निश्‍चित ही स्‍वामी दयानंद  सरस्‍वती के प्रयासों का ह्रास माना जायेगा।
जीवन में विचारों की शुद्धता के लिए स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश  तथा वेदभाष्यों की रचना की। इन्होंने कुरीतियों से दुखी होकर या अशिक्षा के कारण धर्म परिवर्तन  कर चुके लोगों को पुन: निज धर्म में वापस आने के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया  जो १८८३ में स्वामी जी के देहांत के बाद भी उनके निकट अनुयायियों लाला  हंसराज और स्वामी श्रद्धानंद के प्रयासों से आगे बढ़ता रहा।  इसकी कड़ी बने १८८६ में लाहौर के 'दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज' व  १९०१ में हरिद्वार के कांगड़ी में बनाया गुरुकुल, शिक्षा के माध्‍यम से धर्मजागरण का माध्‍यम बने।
कहावत है ना कि रुके हुये जल में सड़ांध आ जाती है आज धर्म के  रास्‍ते जनजागरण के लिए चलाये गये ये पाखंड विरोधी शैक्षिक  अभियान भी इसी सड़ांध का शिकार हो रहे हैं। आर्यसमाज के लिए  दान दी गई संपत्‍तियों पर पाखंडियों ने कब्‍जे कर रखे हैं।
जिन स्‍वामी दयानंद ने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना और  कर्म सिद्धांत, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा संन्यास को अपने दर्शन के लिए चार स्तम्भ के रूप में स्‍थापित किया, आज ये सभी सिद्धांत पुस्‍तकालयों में धूल फांक रहे हैं या शोधकर्ताओं के अध्‍ययन तक सिमट गये हैं।
स्वामी जी हिन्‍दू धर्म में ही नहीं बल्‍कि सभी प्रचलित धर्मों में व्याप्त बुराइयों का कड़ा खंडन करते थे, चाहे वह सनातन धर्म हो या इस्लाम हो या ईसाई धर्म हो। अपने महाग्रंथ "सत्यार्थ प्रकाश" में स्वामी जी ने सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया है। उनके समकालीन सुधारकों से अलग,  स्वामी जी का मत शिक्षित वर्ग तक ही सीमित नहीं था अपितु आर्य  समाज की स्‍थापना के माध्‍यम से भारत के साधारण जनमानस को भी अपनी ओर आकर्षित किया। यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया  स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारंभ हुआ था। आर्यसमाज सिद्धांतों के अंतर्गत  शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते हुये मूर्ति पूजा, अवतारवाद,  बलि, झूठे कर्मकाण्ड व अंधविश्वासों को अस्वीकारता थी। इसमें सबसे महत्‍वपूर्ण तथ्‍य ये था कि छुआछूत व जातिगत भेदभाव का विरोध किया तथा स्त्रियों व शूद्रों  को भी यज्ञोपवीत धारण करने व वेद पढ़ने का अधिकार दिया था।  स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ  आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है।
आर्य समाज का आदर्श वाक्य है:  कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
अर्थात - विश्व को आर्य बनाते चलो।
आर्यसमाज एक जनविचारधारा थी जिसने भारत में राष्ट्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में  महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इसके अनुयायियों ने भारतीय स्वतंत्रता  आंदोलन में बढ-चढ कर भाग लिया। आर्य समाज के प्रभाव से ही  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर स्वदेशी आन्दोलन आरंभ हुआ  था।आर्य समाज ने हिन्दू धर्म में एक नयी चेतना का आरंभ किया  था। स्वतंत्रता पूर्व काल में हिंदू समाज के नवजागरण और पुनरुत्थान  आंदोलन के रूप में आर्य समाज सर्वाधिक शक्तिशाली आंदोलन था।  यह पूरे पश्चिम और उत्तर भारत में सक्रिय था तथा सुप्त हिन्दू  जाति को जागृत करने में संलग्न था। यहाँ तक कि आर्य समाजी  प्रचारक फिजी, मारीशस, गयाना, ट्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका में भी  हिंदुओं को संगठित करने के उद्देश्य से पहुँच रहे थे। आर्य समाजियों  ने सबसे बड़ा कार्य जाति व्यवस्था को तोड़ने और सभी हिन्दुओं में  समानता का भाव जागृत करने का किया।
आर्य, चूंकि शुद्धता का पर्याय माने गये इसलिए मानसिक अनार्यता के इस समय में स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती की प्रसंगिकता, उनके सिद्धांतों की जरूरत बहुत अधिक महसूस की जा रही है ताकि न केवल क्षीण होते आर्य समाज को बचाया जा सके बल्‍कि मानवता को भी उच्‍च आदर्शों के साथ सींचा जा सके,तभी सार्थक होगा स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती का धर्म को जनजन तक लाने का सपना।

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 19 जनवरी 2014

मैंने ही नहीं पी, तूने भी तो पी है.....

मैंने ही नहीं पी, तूने भी तो पी है.....वे दोनों दोस्‍त पंचों के फरमान को तोड़ने का दुस्‍साहस करने जा रहे थे मगर अभी ये बहस कानाफूसी स्‍टाइल में चल ही रही थी कि एक ग्रामीण  पंचों को ले आया और पंचों के सामने दोनों दोस्‍तों को आर्थिक दंड के साथ शराब को फिर कभी हाथ न लगाने के लिए अपने बच्‍चों की कसम खानी पड़ी।
इतना ही नहीं, भीषण ठण्‍ड के बावजूद उन पर ये ज़िम्‍मेदारी भी डाली गई कि वो आसपास  के चालीस कोसों तक शराब पर प्रतिबंध को लेकर जनजागरण करेंगे। चूंकि पंच जानते हैं कि शराब के लती या शौकीनों को बच्‍चों की कसम और आर्थिकदंड से नहीं रोका जा सकता, इसलिए उन्‍होंने इस कोहरे से लदी-फदी ठंड में बाहर निकलने की जिम्‍मेदारी डाल दी जो उन्‍हें शराब से दूर रखने में ज्‍यादा कारगर थी। अब वे दोनों रोज़ाना सुबह निकलते हैं और हर दिन एक गांव में जाकर शराब बंदी के प्रति लोगों को जागरूक करते हैं। इससे आगे का काम फिर पंचों का होता है।
जी हां! ये ब्रजक्षेत्र में शराब, शराबियों, ठेकेदारों और शराब माफियाओं के खिलाफ चलाया जाने वाला एक अनोखा अभियान है जिसे महज एक ग्राम पंचायत ने यूं ही एक प्रयोग के तौर पर शुरू किया था लेकिन आज एक दर्जन ग्राम पंचायतों में यह अभियान सफल रहा है । कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली के दूरदराज गांवों में ये अलख जगाकर पंचों ने तमाम नेतागिरी को आइना दिखाया है कि यदि इच्‍छाशक्‍ति हो तो कोई भी सुधार कार्यक्रम अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए न बजट की जरूरत है... न सरकारी लावलश्‍कर की.... और ना ही अफसरशाही की।
अब तो आलम ये हो चला है कि जनपद मथुरा की हरियाणा और  राजस्‍थान से लगी सीमाओं तक इस अभियान ने अपना दायरा फैला लिया है। शराब माफियाओं के पैर उखड़ने लगे हैं, हालांकि अभी माफिया से पूरी तरह निजात मिलना बाकी है ।
 ये वही क्षेत्र है जहां गौकशी, अवैध हथियार सप्‍लाई, टटलुओं (पीतल को सोना बताकर अपराध करने वालों) की भारी मौजूदगी, बड़े बड़े ट्रकों की लूट एवं उनके चालक-परिचालकों की हत्‍या के साथ-साथ गांव के गांव वाहन चोरी के ऐसे गढ़ बन चुके हैं, यहां पुलिस को नाकों चने चबाने पड़ते हैं। पुलिस  के तमाम अधिकारी तो इसे बर्र के छत्‍ते की संज्ञा भी दे चुके हैं क्‍योंकि यहां अपराधी खोजे नहीं मिल सकता ।
ग्राम पंचायतों द्वारा सख़्ती के साथ लागू किए गये इस सुधार कार्यक्रम को अब आसपास की ग्राम पंचायतें स्‍वेच्‍छा से चलाने को रोज मशक्‍कत कर रही हैं। कोसी, छाता, शेरगढ़ से चलता हुआ ये अभियान अब राजस्‍थान के सीमावर्ती गांवों तक भी पहुंच गया है।
आज नज़ारा ये आम होता है कि न कोई भवन.. ना कोई चाय-नाश्‍ते का इंतजाम.. न कोई फाइलों का अंबार...और ना कोई वाहन..हर रोज पैदल चलकर जनजागरण की धुन... बस खुले में जल रहे अलावों के  आसपास खालिस ग्रामीण वेशभूषा में जमा होते पंच और जनता से उठती शपथ लेने की आवाजें बता रही हैं कि शराबबंदी के लिए चलाया जा रहा ये अभियान अब थमने वाला नहीं है। सिर्फ शराब पिलाकर ही शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी बरबादियों के इस मंज़र को भुगतने के लिए जो ग्रामीण अभिशप्‍त थे, वे आज सुधारक की भूमिका में हैं ।  जिस शिद्दत से  ग्रामीणों ने अपने इस अभियान को परवान चढ़ाने का जिम्‍मा अपने ही कंधों पर लिया है,उससे माफिया , अफसरों और उन नेताओं के होश फ़ाख्‍़ता हुये हैं जो अभी तक ग्रामीणों को अपनी उंगलियों पर नचाते आये थे।
एक बात और जनआंदोलन सरीखी दिखने वाली शराबबंदी की ये अनूठी कोशिश अभी तक विलुप्‍त हो चुकी पंचायत-व्‍यवस्‍था के प्रति 'आस्‍था' को वापस ला रही है। जनहित के निर्णय में युवाओं का वापस बढ़चढ़कर हिस्‍सा लेना शुभ संकेत है 'ग्राम - सुराज' का । इन पंचायतों ने नशाबंदी क्षेत्र में शराब विक्रेताओं पर 5100 रु. और शराब पीने वाले व्‍यक्‍ति पर 1100 रु. का दंड रखा है । साथ ही दंडस्‍वरूप दोषी व्‍यक्‍ति जनजागरूकता के लिए नये गांवों में जाकर अन्‍य लोगों को इस अभियान के प्रति चेतायेगा।
निश्‍चित ही इस एक लत से निजात दिलाकर तमाम अपराधों को न केवल रोका जा सकता है बल्‍कि संपन्‍नता और समृद्धि का नया ककहरा भी गढ़ा जा सकता है...बस ये अभियान यूं ही चलते रहना चाहिए...।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

साहित्य महारथी देवपुरा जी का निधन

मथुरा। 
राजस्थान की अग्रणी साहित्यिक संस्था के संस्थापक-प्रधान मंत्री और हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के अध्यक्ष वयोवृद्ध विद्वान भगवती प्रसाद देवपुरा के निधन का समाचार आते ही ब्रज के साहित्यकार, कवि एवं कलाकारों में शोक व्याप्त हो गया। देवपुरा जी के निधन का एक दूसरे से समाचार सुनते ही बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक सहज रूप में गोवर्धन रोड स्थित ज्ञानदीप विद्यालय पहुंचने लगे और कई दशकों के सम्बन्ध से जुड़े संस्मरणों को साझा करते हुए वे भाव विभोर हो उठे। पाँच माह पूर्व 4 अगस्त को ज्ञानदीप में देवपुरा जी मोहन स्वरूप भाटिया अभिनन्दन ग्रंथ विमोचन समारोह में अपने पुत्र श्याम देवपुरा के साथ आये थे और तब उन्होंने मंच पर साहित्य मंडल द्वारा दो वृहद खण्डों में प्रकाशित ‘सूर सागर’ स्वामी गुरुशरणानन्द जी महाराज को भेंट किया था।
साहित्य मंडल नाथद्वारा द्वारा कई दशकों से प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस तथा माह फरवरी में श्रीनाथ जी के पाटोत्सव के अवसर पर राष्ट्रीय स्तर के जो आयोजन किये जाते रहे हैं उनमें बहुत बड़ी भागीदारी ब्रज की रहती थी। इन दोनों ही अवसरों पर ब्रजभाषा साहित्य एवं संस्कृति से सम्बन्धित पत्र-वाचन तथा ब्रजभाषा कवि सम्मेलन के अतिरिक्त विशिष्ट विभूतियों को सम्मानित किया जाता रहा है।
ज्ञानदीप में सम्पन्न श्रद्धांजलि सभा में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष मोहन स्वरूप भाटिया ने कहा कि नाथद्वारा वल्लभ कुल सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थ होने के साथ वर्तमान समय में देवपुरा जी के अथक प्रयासो से ब्रजभाषा का सबसे बड़ा तीर्थ बन गया था।
उन्होंने कहा कि साहित्य मंडल द्वारा 2700 पृष्ठों के सूर सागर तथा अष्टछाप के सभी कवियों के ग्रन्थों सहित लगभग चालीस ग्रन्थों के सम्पादन-प्रकाशन का बड़ा कार्य किया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि देवपुरा जी की साहित्य-साधना के कारण नाथद्वारा में ब्रज और ब्रज में नाथ्द्वारा के दर्शन होते थे। वह ब्रज और नाथद्वारा के मध्य सेतु बने हुए थे और ऋषितुल्य साहित्य महारथी थे ।
मासिक पत्रिका ‘हरिनाम’ के सम्पादक डा0 भागवत कृष्ण नांगिया ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि प्रचार-प्रसार से दूर रहे देवपुरा जी सरस्वती के उपासक और साहित्य के सच्चे साधक थे।
लोक संगीत विदुषी श्रीमती वन्दना सिंह ने कहा कि देवपुरा जी कलाकारों के लिए पितामह थे। साहित्य मंडल के मंच पर ‘महारास’ की प्रस्तुति के पश्चात् उन्होंने राधा-कृष्ण के स्वरूपों के चरण स्पर्श कर तथा अन्य सभी कलाकारों को स्नेह-आशीष प्रदान कर सम्मान से अभिभूत कर दिया था।
ब्रजभाषा कवि राधागोविन्द पाठक ने इन पंक्तियों के द्वारा देवपुरा जी को श्रद्धांजलि अर्पित की-
जबु ते सुन्यौ करुन कर्कस स्वर, आरत भर्यौ रुदन।
झरत अश्रु धार बहुत, भारी-भारी है मन।।
देवपुरा जी देह त्याग कैं, देवलोक पहुँचे।
सत्संकल्पी, कर्म पथिक कूँ, श्रद्धा भरे सुमन।।
राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गोपाल प्रसाद मुद्गल ने श्रद्धांजलि व्यक्त की-
देवपुरा जी ने किया, देवलोक प्रस्थान।
बेहद व्याकुल हो रहा, पूरा हिन्दुस्तान।।
हिन्दी हित सेवा करी, सदा लुटाया प्यार।
स्वीकारो श्रद्धांजलि, मन से बारम्बार।।
ब्रजभाषा कवि श्याम सुन्दर शर्मा ‘अंकिचन’ ने भावांजलि प्रस्तुत की-
शिक्षाविद्, साहित्य पुरोधा, सदा सृजन हित रहे समर्पित।
संस्कृति रक्षक, समय समीक्षक, हिन्दी प्रहरी, ट्टढ़ संकल्पित।।
आशातीत अतीत हो गया, काल चक्र से लड़ते-लड़ते।
दुःखी हृदय और बोझिल बनते, श्रद्धा सुमन आपको अर्पित।।
 श्रद्धांजलि सभा में राधा विहारी गोस्वामी ने कहा कि कई संस्थाएँ जो कार्य नहीं कर सकतीं वह अकेले देवपुरा जी ने किया। वह मन-प्राण से ब्रजभाषा और ब्रजभाषा साहित्यकारों के उन्नयन के लिए सदैव समर्पित रहे थे।
डा0 राजेन्द्र कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि देवपुरा जी के अवसान के साथ ब्रजभाषा साहित्य के प्रकाशन और साहित्यकारों को प्रोत्साहन प्रदान करने वाले प्रयासों के युग का भी अवसान हो गया है।
संगीतज्ञ विजय केलकर ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि देवपुरा जी ने बड़ी संख्या में कवि-कलाकारों को मंच प्रदान कर सराहनीय सेवा कार्य किया है।श्रद्धांजलि सभा में विवेक सक्सैना आशीष अग्रवाल, रामगोपाल चैधरी, डा0 गिरिराज नाँगिया आदि ने देवपुरा जी के निधन को अपूरणीय क्षति बताते हुए वेदना व्यक्त की।