बतौर उदाहरण दुष्प्रचार के पहले मामले में केजरीवाल सरकार ने लगातार ऑक्सीजन सिलेंडर्स, ऑक्सीजन कंसेंटेटर्स, वेंटीलेटर्स की कमी बताई और इसकी जिम्मेदारी केंद्र पर डाली। भ्रम और झूठ का भरपूर भूत खड़ा किया गया परंतु जैसे ही ऑडिट हुआ तो सारा सच सामने आ गया और जिन उपकरणों को लेकर वे कमी का रोना रो रहे थे, अचानक वो इतनी बहुतायत में आ गए कि वे उन्हें दान देने की बात करने लगे।
इसी तरह अब वैक्सीन पर रोना जारी है। दो दिन पहले दिल्ली में ही पोस्टर लगाए गए कि ‘मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दी?’ इस दुष्प्रचार के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत जिन 25 लोगों को गिरफ्तार किया गया उनके पक्ष में राहुल गांधी, दिग्विजय सिंह समेत दिल्ली के आप विधायक अमानतुल्ला खान आदि ने ट्विवर पर ‘मुझे भी गिरफ्तार करो’ का अभियान चलाकर इसे प्रोफाइल पिक्चर बनाया, साथ ही लिखा कि ‘सुना है ये पोस्टर 𝗦𝗛𝗔𝗥𝗘 करने से पूरा 𝗦𝗬𝗦𝗧𝗘𝗠 कांपने लगता है…’।
विदेशों को वैक्सीन मुहैया कराने का सच
निश्चित रूप से किसी अंधे व्यक्ति को तो रास्ता दिखाया जा सकता है परंतु जो देखते हुए अंधा बनने का नाटक करे, उसे कौन दृष्टि दे। वैक्सीन को दूसरे देशों में भेजने पर किए जा रहे कांग्रेस व आप के दुष्प्रचार के पीछे भी यही बात है जबकि हकीकत यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के समझौते एवं कच्चे माल के एवज में वाणिज्यिक करार के तहत वैक्सीन देने की “बाध्यताा” है।
भारत ने 7 पड़ोसी देशों बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि को 78 लाख 50 हजार वैक्सीन अनुदान के तहत उपलब्ध कराया। इन आंख वाले अंधों को कौन समझाए कि 2 लाख डोज संयुक्त राष्ट्र संघ के उस शांति बल के लिए सहायता स्वरूप दी गईं जिसमें 6600 तो भारतीय सैनिक ही हैं, अन्य देशों को दिए गए कुल वैक्सीन का यह करीब 16% है।
विदेशों को दिए गए 6 करोड़ 63 लाख वैक्सीन के डोज का करीब 84 प्रतिशत डोज वाणिज्यिक समझौते व लाइसेंसिंग करार के तहत उन देशों को दिया गया जिनसे हमें वैक्सीन तैयार करने के लिए कच्चा माल व लाइसेंस मिला है।
यूके को बड़ी मात्रा में वैक्सीन इसलिए देनी पड़ी क्योंकि सीरम इंस्टिट्यूट जिस कोविशिल्ड वैक्सीन का निर्माण कर रही है उसका लाइसेंस यूके के ‘ऑक्सफोर्ड एक्स्ट्रा जेनिका’ से प्राप्त हुआ है और “लाइसेंसिंग करार” के तहत उसे वैक्सीन का डोज देना जरूरी है।
इसके अलावा वाणिज्यिक समझौते के तहत सऊदी अरब को 12.5 प्रतिशत वैक्सीन देनी है क्योंकि जहां उससे पेट्रोलियम का आयात होता है वहीं बड़ी संख्या में वहां रह रहे भारतीयों को दो डोज मुफ्त वैक्सीन देने का उसने भारत से समझौता किया है।
इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन से हुए एक समझौते के तहत कुल निर्यात का 30 प्रतिशत वैक्सीन ‘को-वैक्स फैसिलिटी’ को दिया जाना है।
तो कुल मिलाकर बात ये है कि जिस बुद्धि के पैमाने का प्रदर्शन राहुल गांधी करते रहे हैं, उसमें “वाणिज्यक करार” को समझ पाना मुश्किल ही लगता है। शहर और गांव के हर चौराहे पर कोई न कोई एक ऐसा नमूना आपको मिल ही जाएगा जो कपड़े फाड़ता हुआ जोर जोर से चीखता है परंतु उसे कोई गंभीरता से लेता ही नहीं, राहुल गांधी का भी यही हाल है। केंद्र सरकार की बजाय केवल पीएम के प्रति दुष्प्रचार का यह तरीका उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगा, बेहतर होगा कि वो अपनी तरह विदेशों में तो देश की फजीहत ना करायें क्यों कि इनके दिमाग और कुप्रवृत्तियों का ऑडिट तो नहीं कराया जा सकता।
– अलकनंदा सिंह
