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मंगलवार, 12 नवंबर 2024

दर्दनाक कहानी: अपनी मां के मरने का व्यापार करता एक बेटा...


 आज twitter यान‍ि X पर एक आंखेंदेखा वाकया पढ़ा ज‍िसे भुक्तभोगी लंकेश ( X पर एकाउंट का नाम)  ने साझा क‍िया...आप भी पढ़ें क‍ि गांव गमाण में आज र‍िश्ते क‍िस तरह बदल चुके हैं...  


छठ प्रसाद पहुंचाने दीदी के ससुराल गए।आवभगत, दण्ड - प्रणाम के बाद, दीदी के ससुर बोले की,चलिए बगल में एक वृद्धा मरणासन्न की अवस्था "भुइयाँ सेज" में पड़ी हैं, हालत देख-सुन के आते हैं। तकरीबन तीन-चार लोग हम चल पड़े। वहाँ पहुंच मैंने देखा, एक चमचमाता चेहरा,धवल बाल,बड़ी बिंदी,भखरा सिंदूर से भरा माँग,नथनी, बाली, मंगलसूत्र पहने, हल्का चादर ओढ़े एक वृद्धा चारपाई पर आँख बंद किये लेटी हुई हैं। सांस की गति तेज और गर्दन की घरघराहट साफ सुनाई दे रहा था ।कोई अनजान इनको देख, समझेगा कि कोई दादी जी आराम से सो रही है। अम्मा की सबसे छोटी बेटी जो कल हीं अपने ससुराल से खबर मिलते हीं भाग के आई थी, तलवे को गोद में ले "घरा" कर रहीं थी। अम्मा की दो बड़ी बेटियां भी आ गयीं थी, जो बाहर खड़ी आपस में दुखम सुखम साँझा कर रहीं थीं। थोड़ा पीछे चलते हैं।

अम्मा के तीन बेटे और तीन बेटियां हैं। बात 2009 की है, जब अम्मा के बड़े बेटे (आशीष) जो कि मर्चेंट नेवी में अच्छे पद पर कार्यरत थे, नशे में जहाज से समंदर में गिरकर नुकसान हो गए थे। आशीष नॉमिनी अपनी पत्नी (प्रिया) को बनाये थे तो नेवी से मिलने वाला सारा पैसा प्रिया को मिला। प्रिया बच्चों को लेकर मायके आ गयी और शहर में किराये का फ्लैट लेकर रहने लगी। मिले रकम से एक फूटी कौड़ी भी,प्रिया ने आशीष के माँ बाप को नहीं दी। घर से लगभग नाता तोड़ हीं लिया। समय बीतता गया,आशीष के पिताजी (राम शरण जी) बहू के इस रवैये से दुःखी और विचलित तो हुए मगर, मन को दिलासा दिलाये कि चलो, दोनों नाती शहर में दो अक्षर अच्छा हीं सीख लेंगे। आदमी कितना भी दुःखी क्यों न हो, मन के किसी कोने में कोई एक किरण आशा की जलाकर अपने दुःख को कम जरूर कर लेता है। और आशा दिल के भार को ऐसे कम करता है जैसे भींगी रुई के भार को धूप। समय के साथ, आशीष की तीनों बहनों और एक भाई की शादी हो गयीं। बहनें अपने अपने घर चली गयीं। आशीष के दोनों भाई, मुकेश और दिनेश घर पर हीं रहते हैं। राम शरण जी, अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर बगल में हीं एक नया मकान बनवा लिए हैं, जिसका गृहप्रवेश इसी महीने के 26 तारीख को तय है। छोटे बेटे की शादी भी तय है जो कि, जनवरी 2025 के अंतिम हफ्ते में होना है।दोनों की तैयारी बड़े जोर शोर से चल रहा था। नाच वाले, बाजा वाले, टेंट, मिठाई, साज सज्जा वाले सभी को कुछ पैसा देकर तय कर लिया गया था कि, अचानक हीं अम्मा को पैरालाईसिस ने घेर लिया। राम शरण सिरहाने बैठे एकटक चेहरे को ऐसे निहारे जा रहे थे जैसे आँखे खोल अम्मा उनसे पानी के अब पूछेंगी की तब पूछेंगी। पति पत्नी जीवन में कितना भी नोंक झोंक करे, रुठे मनाये, डांटे फटकारे मगर, चौथेपन के पड़ाव में एक दुसरे से ऐसे अचानक हीं हमेशा हमेशा के लिए दूर जाने के लिए आँखे बंद कर ले तो दोनों के लिए ये दर्द असह्य हो जाता है। अम्मा के शरीर में कोई हरक़त नहीं हो पा रहा था, केवल सांस चल रहा था। डॉक्टर बोल दिए थे, कोमा में हैं, देखिये कितना दिन जिंदा रह पाती हैं। बेटियां बैठ के अम्मा के चादर,बाल,साड़ी को ठीक करने लगी,कोई मुंह पोंछने लगी,कोई हाथ सहलाने लगी। अब जबकि दो दिन बीत गए मुझे अपने घर आये।फोन करके पता किया तो,पता चला कि,अम्मा अभी भी उसी हालात में हैं।मैंने बोला, चलो अच्छा हीं है। पर इसके बाद दिनेश (अम्मा का छोटा बेटा) ने जो मुझसे कहा, उसे सुनकर मैं सहम हीं नहीं गया, बल्कि, मानव होने पर भी मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। "दिनेश - वो तो ठीक है कि जितना दिन जी जाए अम्मा। पर.. मैं - पर क्या?? वहीं, गृह प्रवेश का भी दिन रखा गया है, मेरी शादी का भी दिन रखा गया है. तो?? अरे आप समझ नहीं रहें हैं, अगर अम्मा आज की रात नहीं मरती हैं तो आगे सब कुछ बर्बाद हो जायेगा। आज 12 है, चौदह दिन बाद गृहप्रवेश है, वो होगा नहीं,, अगले गृह प्रवेश की तिथि वसंत पंचमी को है. मेरी शादी की तारीख वसंत पंचमी से पहले तय है। पुराने घर में शादी होगी नहीं. बेटी वाले मान नहीं रहे। आप हीं बताइये, कइसे होगा सब? अब आज गुजर जाती तो भी सब समय से हो हवा जाता। (मैं चुप!) दिनेश बोलता रहा - और वैसे भी अम्मा आगे और जी के का हीं कर लेंगी। ठीक तो होंगी नहीं,, जितना भोग भोगान लिखा है, भोग रहीं हैं। अब हमलोगों को भी जितना पेराना है, पेराएंगे। पैसा रुपिया सब साटा बाजा का बयाना दिए बर्बाद हो रहा है। अब मेरे कान, मस्तिष्क ठन्डे पड़ गए थे, दिनेश बोलता रहा, मगर मैं आगे और सुन पाने की स्थिति में नहीं था। धक्क से रह गया मेरा मन। कौन हैं हम मानव? किस हद तक गिर रहें हैं हमलोग? जिस बेटे के पेट में आने मात्र की सूचना माँ को ममता में विह्वल कर देता है, उसके द्वारा पेट में लात मारना माँ को आनन्द भर देने वाला होता है उस माँ के लिए ऐसा सोच! हे प्रभु

प्रस्तुत‍ि : अलकनंदा स‍िंंह

सोमवार, 1 मार्च 2021

#RealtionshipCrisis: आंकड़े बोल रहे हैं… बढ़ रही है कुमाताओं की संख्या


 मशहूर शायर बशीर बद्र का एक शेर है-

”काटना, पिसना
और निचुड़ जाना
अंतिम बूँद तक….
ईख से बेहतर
कौन जाने है,
मीठे होने का मतलब?”


मां भी ऐसी ही ईख होती है जो बच्चे के ल‍िए कटती, प‍िसती, न‍िचुड़ती रहती है अपनी अंत‍िम बूंद तक…और मीठी सी ज‍िंदगी के सपने के साथ साथ ही कठ‍िनाइयों से लड़ने का साहस भी उसके अंतस में प‍िरोती जाती है…ताक‍ि जब वह जाग्रत हो उठे तो संसार को सुख, उत्साह और प्रगत‍ि से भर दे।

परंतु…ऊपर ल‍िखे शब्दों से अलग भी एक दुन‍िया है ज‍िसमें मां, बच्चे के सामने ईख की तरह कोई ‘मीठा’ नहीं परोसती बल्क‍ि उसके अंतस को लांक्षना के उन कंकड़-पत्थरों से भर देती है जो अपराध का वटवृक्ष बन जाता है। मां को मह‍िमामंड‍ित करने वाले कसीदों के बीच ”कल‍ियुगी मांओं” से जुड़ी ऐसी ऐसी खबरें भी सुनने-पढ़ने को म‍िल रही हैं जो तत्क्षण यह सोचने पर बाध्य करती हैं क‍ि ”सच! क्या कोई मां ऐसा भी कर सकती है”।

इन्हीं खबरों में सबसे ज्यादा संख्या उन मांओं की होती है जो स‍िर्फ और स‍िर्फ अपनी कामनापूर्त‍ि के ल‍िए परपुरुष के साथ संबंध बनाती हैं, घर से भाग जाती हैं, अवैध संबंधों के चलते अपने साथी की हत्या तक करने- कराने से बाज नहीं आतीं, इन्हीं संबंधों के चलते कई बार इन मह‍िलाओं को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ जाता है। आए द‍िन म‍िलने वाली लाशें इन संबंधों की पर‍िणत‍ि बतातीं हैं। अंतत:  यही कृत्य उनके  बच्चों को संवेदनाहीन बनाकर अपराध‍ की ओर धकेल देते हैं। आंकड़े गवाह हैं क‍ि अध‍िकांशत: बाल अपराध‍ियों के पीछे मांओं द्वारा क‍िए गए ये कृत्य ही होते हैं।

एनसीआरबी (नेशनल क्राइम र‍िकॉर्ड ब्यूरो) के अनुसार भारत में बाल अपराधि‍यों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, प‍िछले एक साल में ही 11 फीसदी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। बच्चों के खिलाफ अपराध का आंकड़ा 2015 में जहां 94172 था, वहीं 2016 में यह आंकड़ा 106958 तक पहुंच गया और अब यान‍ि 2020-2021 की शुरुआत में ही हर दिन बच्चों के खिलाफ 350 अपराध दर्ज किए जा रहे हैं।

बाल अपराध‍ियों के बारे में ये आंकड़े आइना द‍िखा रहे हैं क‍ि मां अपने मातृत्व में कहां चूक रही हैं, वे नई पीढ़ी को कौन सा रूप दे रही हैं, पैदा तो वो देश का भविष्‍य बनने के ल‍िए होते हैं परंतु उन्हें रक्तबीज बनाया जा रहा है।

दुखद बात यह भी है क‍ि‍ ऐसी भयंकर नकारात्मक घटनाओं के बावजूद हर संभव प्रयास क‍िया जाता है क‍ि उस मां के प्रत‍ि तरह-तरह से सहानुभूत‍ि‍यां प्रदर्श‍ित की जायें जबक‍ि मां के इस दूसरे रूप ने बाल अपराध‍ियों की एक लंबी चौड़ी फौज खड़ी कर दी है।

व्यक्त‍िगत आजादी और उच्छृंखलता से चलकर अपराध तक पहुंचने वाला मार्ग स‍िर्फ और स‍िर्फ एक बीमार समाज को ही जन्म दे सकता है, इसके अत‍िर‍िक्त और कुछ नहीं। ये मांएं ऐसा ही कर रही हैं।

रमेंद्र जाखू द्वारा रच‍ित इन चार पंक्त‍ियां के साथ बात खत्म –

”मैं वसीयत कर रहा हूँ
कि मेरे मरने के बाद
मेरी आग उस शख़्स को मिले
जो अंधेरे के ख़िलाफ़
इक जलती हुई मशाल है
जिसका साहस कभी कुंद नहीं होता।”

हमें भी यह साहस करना होगा क‍ि पूरी की पूरी पीढ़ी को बरबाद करने वाली मांओं को मह‍िला के प्रति सहानुभूत‍ि की आड़ में ना छुपाएं।

- अलकनंदा स‍िंंह 

रविवार, 4 मार्च 2018

अब स्‍तनपान के नाम पर रचा जा रहा षडयंत्र

''जिस डाल पर बैठे उसी को काटने'' की मूर्खता वाली एक उक्‍ति को हम प्रसिद्ध कवि कालिदास  के लिए हमेशा से संदर्भित करते रहे हैं, मगर आज स्‍तनपान को लेकर जो शोध रिपोर्ट आई है  उसे पढ़कर यह उक्‍ति हम मांओं पर बिल्‍कुल फिट बैठती है। नैसर्गिक अधिकारों व कर्तव्‍यों को  लेकर सदियों पुरानी भारतीय सभ्‍यता का कोई सानी नहीं, इसके बाद भी यदि हम सुसंस्‍कृत  कहलाने के लिए पश्‍चिम की ओर देखें तो हमसे बड़ा मूर्ख और कौन हो सकता है।

हम भारतीय मांऐं ही नहीं, दुनियाभर की मांओं को जिस तरह ये नैसर्गिक अधिकार प्राप्‍त है  कि अपने शिशु को स्‍तनपान कराने से ना तो कोई रोक सकता है और ना ही इसके लिए  अनुमति की आवश्‍यकता होती है, ठीक उसी तरह शिशु को भी मां के दूध से कोई वंचित नहीं  रख सकता।

हमारी सदियों पुरानी परंपरा है कि शिशु की प्राकृतिक देखभाल ही उसे फिजीकली ही नहीं,  इमोशनल ताकत भी देती है। सभ्‍य समाज के लिए शिशुओं की लालन-पालन प्रणाली का बहुत  बड़ा योगदान होता है। हालांकि, अब विदेशी स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ उस पर रिसर्च कर ही रहे होंगे  और निश्‍चित जानिए किसी दिन ये रिपोर्ट भी हमारे सामने आ जाएगी कि बच्‍चे को कैसे पालें  और नई मांऐं इसे हुबहू मानेंगी भी बिना ये सोचे-समझे कि आखिर इस सबके पीछे कौन है जो  हमारी नैसर्गिकता को भी भुना रहा है। 

स्‍तनपान को लेकर पिछले कई दशकों से पश्‍चिम से ये भ्रांति फैला रहा है कि स्‍तनपान से मां  के फिगर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस नैसर्गिक सुख से मांओं को वंचित रखने के पीछे  बाजार का वो षड्यंत्र था जिसे पावडर दूध बेचने वाली विदेशी कंपनियों ने रचा ताकि मांओं की  कथित ''आज़ादी'' के नाम पर अपने प्रोडक्‍ट का लक्ष्‍य हासिल करने में कोई बाधा ना आए। इस  षड्यंत्र में बाकायदा डॉक्‍टर्स को शामिल किया गया। अब एकबार फिर इन्‍हीं डॉक्टर्स के माध्‍यम  से कहलवाया जा रहा है कि स्‍तनपान कराने से कैंसर का खतरा कम होता है। ध्‍यान दीजिए  कि कैंसर खत्‍म करने के स्‍थान पर इसका ''खतरा कम'' शब्‍द प्रयोग में लाया जा रहा है।  बाजार का एंगिल चेंज हुआ है, फिर से मांऐं निशाने पर हैं, इस बार शिशु-आहार बनाने वाली  कंपनियों पर कैंसररोधी दवायें बनाने वाली लॉबी हावी दिख रही है और निशाना बनाई जा रही  हैं नई मांऐं।
मैं इस तथ्‍य का विरोध करती हूं कि कैंसर के डर से स्‍तनपान कराया जाना चाहिए, बल्‍कि  बात ये होनी चाहिए कि स्‍तनपान हमारे नैसर्गिक कर्तव्‍य और शिशु के नैसर्गिक अधिकार के  बीच का मामला है तो इसे निर्धारित करने वाली विदेशी कंपनियां और शोध संस्‍थान आखिर  कैंसर की धौंस किसे दिखा रहे हैं, इस जानलेवा बीमारी के नाम पर बात उठाकर आखिर ये  लॉबी किसे अपनी ज़द में लेना चाहती है। इंतज़ार कीजिए अब ऐसी दवाओं के आने का जो  स्‍तनपान के इमोशनल टच के साथ कैंसर का इलाज करेंगी।

एक सभ्‍य समाज के तौर पर हमने अपनी विरासतों को तो पश्‍चिम का पिछलग्‍गू बना ही दिया  है और अपनी नैसर्गिकता की धज्‍जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आश्‍चर्य तो इस बात  पर है कि ये सब भी होता रहा है तथाकथित तरक्‍की के नाम पर। हमारी उत्‍तरआधुनिक मांओं  की इस कमजोरी का फायदा बाजारवाद की लॉबी ने जमकर उठाया क्‍योंकि दुनिया के बाजार में  भारतीय उपभोक्‍ताओं की संख्‍या 1/6 जो है।

गौरतलब है कि जिस शोध-रिपोर्ट की मैं बात कर रही हूं, उसे यूनीवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के  डा. मलामो कॉन्‍टोरियस ने अपनी टीम के साथ 1998 से 2004 तक गर्भावस्‍था से लेकर नई  मांओं तक पूरा किया। यह रिपोर्ट कहती है कि- स्‍तनपान से गुड कॉलेस्‍ट्रॉल बढ़ता है,  सर्कुलेटिंग फैट कम होता है, गले और सिर पर खून को पहुंचाने वाली कैरोटिड आर्टरीज की  मोटाई भी कम होती है, इस आर्टरी के बड़े व्‍यास को हार्ट स्‍ट्रोक से जोड़कर देखा जाता है,  स्‍तनपान से आक्‍सीटोसिन हॉर्मोन उत्‍सर्जित होता है, जिससे ब्‍लडप्रेशर कम रहता है।

इस रिपोर्ट में शोधकर्ता ये उल्‍लेख करना भूल गए या जानबूझकर नहीं किया कि जब कोई मां  अपने बच्‍चे को उठाकर छाती से भी लगा लेती है तभी कोई भी रोता हुआ बच्‍चा चुप क्‍यों हो  जाता है, स्‍तनपान कराने वाली मां के मन के भाव अपने शिशु के लिए क्‍या होते हैं, यही भाव  आजीवन शिशु के मन की तरंगों की दिशा व दशा को स्‍थापित करते हैं। क्‍या अब हम शोध  रिपोर्टों के आधार पर इन्‍हें तय करेंगे।

मैं मानती हूं कि आधुनिकता के नाम पर अब भी ऐसी मांओं की कमी नहीं जो अपने नवजात  शिशु को फुलटाइम मेड की गोद में बाजारु शिशु आहार के सहारे पलवा रही हैं, वे स्‍तनपान को  आज भी ''पिछड़ेपन'' का नाम देकर बचना चाहती हैं। भारतीय परंपराओं को ना मानने वाली  ऐसी मांऐं ही उक्‍त शोध रिपोर्टों और बाजारवाद का सॉफ्ट टारगेट होती हैं।
ऐसी मांओं के लिए इस रिपोर्ट की पॉजिटिविटी ये रहेगी कि अब वे स्‍तनपान से शिशु को  वंचित रखने से पहले सोचेंगी अवश्‍य, चाहे कैंसर से बचने का ही भय क्‍यों ना हो।

मातृत्‍व का भाव ही तो है जिसने स्‍तनपान से लेकर पालनपोषण तक की भूमिका को 
सर्वाधिक महत्‍व दिलाया। महाभारत में जब यक्ष, धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि 'भूमि  से भारी कौन?' तब युधिष्ठर जवाब देते हैं-
'माता गुरुतरा भूमेरू।' अर्थात माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।

कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि ग्‍लोबली डिजिटलाइज्‍ड युग में जब एक क्‍लिक पर सारी  जानकारियां हमारे हथेली में समाई हों तब तो कम से कम इस तरह की शोध रिपोर्टों के  भ्रमजाल से भारतीय मांऐं बच ही सकती हैं।

फिर भी यदि बात समझ में नहीं आती तो इतना जरूर समझ सकती हैं कि हर शोध अपूर्ण  होती है और एक नई शोध के लिए रास्‍ता बनाती है, जबकि भारतीय मनीषियों द्वारा निकाले  गए निष्‍कर्ष उस मानसिकता की देन हैं जो स्‍वास्‍थ को सबसे पहला सुख मानकर चलती है।
भारतीय मनीषियों ने पहला सुख निरोगी काया को ही बताया है, और यह सभी पर समान रूप  से लागू होता है। स्‍तनपान कराने वाली मां पर भी और उस शिशु पर भी जो स्‍तनपान करता  है। ऐसे में ''कैंसर का खतरा कम'' होने की बात तो तब की जानी चाहिए जब कैंसर होने की  संभावना हो।
यहां तो शुरू से मां के दूध को अमृत तुल्‍य बताया गया है, फिर ये कम खतरे की बात कहकर  खतरे को बनाए रखने का षड्यंत्र ही है, इससे अधिक कुछ नहीं। 

-अलकनंदा सिंह


शनिवार, 13 मई 2017

बेसन की सोंधी रोटी... के बाद की यात्रा

आज मातृदिवस पर कुछ लिखना था तो सोचा वही क्‍यों ना लिखूं जो कई सालों से मन को बींधता आया है। बाजार और सोशल मीडिया जैसे प्‍लेटफॉर्म लीक पर चलते हुए बखूबी सारे ''दिवस'' मनाते हैं मगर वे उन प्रश्‍नों के उत्‍तर तो कतई नहीं दे पाते जो हमारे लिए बेहद अहम हैं...हमारे लिए यानि बच्‍चों के साथ-साथ हम मांओं के लिए भी...

यूं तो मैं इस विषय पर तभी से लिखने की सोच रही थी जब से उत्‍तरप्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने पद संभाला और अपनी पार्टी के संकल्‍प पत्र का एक वायदा पूरा करते हुए एंटी-रोमियो स्‍क्‍वायड का गठन किया।  एंटी-रोमियो स्‍क्‍वायड ने एक ओर जहां स्‍कूल-कॉलेज और तिराहों-चौराहों के आसपास मंडराने वाले शोहदों को पकड़-पकड़ कर उन्‍हें उनके घर वालों के सुपुर्द किया गया तो दूसरी ओर कई केस भी दायर किए। हमेशा की तरह विपक्ष के कुछ नेताओं ने इन शोहदों पर दया दिखाई तो कुछ ने इसे स्‍वतंत्रता में बाधा डालने वाला कदम बताया मगर किसी ने ये नहीं सोचा कि आखिर ये स्‍थिति आई क्‍यों? जो काम घर वालों को करना चाहिए था, उसे शासन को क्‍यों करना पड़ा। हम भले ही इसके लिए कानून व्‍यवस्‍था को दोषी मानते रहें मगर सच यह है कि सरकारों से ज्‍यादा दोष परिवारों का रहा है।
हम चूके हैं, हमारे संस्‍कार और हमारा पारिवारिक ढांचा चूका है, साथ ही इन सबसे ज्‍यादा हमारी मांएं चूकी हैं।

बच्‍चे के भाग्‍य का निर्माता ईश्‍वर है तो सांसारिक विधिविधान सिखाने को ''मां'' हैं, मां ही सिखाती है कि किससे कैसे व्‍यवहार किया जाए। इसीलिए मां को ईश्‍वर के बच्‍चे के नौतिक-अनैतिक कार्य की जिम्‍मेदारी मां की होती है। जब लायक बच्‍चे का श्रेय सब मां को देते हैं तो उसकी नालायकी का जिम्‍मा भी उसे अपने ही सिर लेना होगा।
हमारे ब्रज में कहावत भी है ना कि ''चोर नाय चोर की मैया ऐ मारौ''। मांएं अपनी परवरिश व जिम्‍मेदारी का बोझ सोशल मीडिया या अन्‍य इलेक्‍ट्रॉनिक संसाधनों पर नहीं डाल सकतीं क्‍योंकि बच्‍चे तो साधनहीन परिवारों के भी बिगड़ते हैं। तो चूक कहां है, जीवन की निर्मात्री से चूक तो हुई है और अभी भी होती जा रही है। कानून व्‍यवस्‍था, पारिवारिक विसंगतियों जैसे बहानों से कब तक मांएं अपने आपको कंफर्ट जोन में रखती रहेंगी।

कुछ दिन पहले निर्भया गैंगरेप का फैसला आया, चारों अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई। एक दर्दनाक हादसे की मुकम्‍मल तस्‍वीर, और इसके दोनों पहलू हमारे सामने। सजा दिलाने वाले और पाने वाले अपने-अपने तरीके से फैसले की व्‍याख्‍या कर रहे थे। तस्‍वीर के एक पहलू में निर्भया की मां कह रही थी कि कोर्ट ने इंसाफ किया और मीडिया ने उस इंसाफ की लड़ाई में उसका भरपूर साथ भी दिया। वहीं फांसी की सजा पाए चारों बलात्‍कारियों की मांएं कह रही थीं कि हमारे साथ अन्‍याय हुआ है। दोनों ओर मांएं अपनी अपनी संतानों के लिए दुखी व संतप्‍त होती रहीं मगर अपराध करने वालों ने ये एक बार भी सोचा कि वो जो कर रहे हैं यदि उनकी अपनी मां उस जगह हो तो...? नहीं, उन्‍होंने नहीं सोचा तभी तो ऐसे जघन्‍य अपराध को अंजाम दिया जिसने देश से लेकर विदेश तक हाहाकार मचा दिया।

उनका कृत्‍य देखकर ही कानून को अपना काम करना पड़ा, यदि मांओं ने अपना काम किया होता और इन अभागों की परवरिश सही तरीके से की होती तो ऐसी नौबत आने का सवाल ही कहां था। इसी प्रकार जब किन्‍हीं शोहदों को एंटी-रोमिओ स्‍क्‍वायड पकड़ती है उंगलियां उनके घर वालों और खासकर मां की ओर भी उठती हैं। इसलिए मानना तो पड़ेगा कि चूक कहीं न कहीं जीवन की निर्मात्री से भी होती है।

हर साल 14 मई को मातृ दिवस मनाने वाले हम, अपनी मांओं के प्रति कृतज्ञता प्रगट करते हैं, करनी भी चाहिए मगर इस कृतज्ञ भाव में वे कर्तव्‍य नहीं भुलाए जाने चाहिए जो समाज को ''और अच्‍छा व निष्‍कंटक'' बना सकें। जिनसे हमारे बच्‍चे निर्भय होकर सड़कों व गली-चौराहों पर घूम सकें।

मैं भी मां हूं और अपनी मां के कर्तव्‍यों के कारण, उनकी मेहनत के कारण आज मैं अपने शब्दों को अपने विचारों का माध्‍यम बना पा रही हूं, जब अपना बचपन अपनी शिक्षा का दौर याद करती हूं तो कई बार ऐसा लगता है कि ये कृतज्ञता शब्‍द बहुत नाकाफी है मेरी मां के लिए। मगर हमें सिर्फ अपनी-अपनी मां के प्रति कृतज्ञ होने के साथ ही अपने प्रति भी कोई संकल्‍प लेना होगा ताकि भविष्‍य में किसी निर्भया को इतनी भयंकर मौत ना मरना पड़े और ना किसी के बेटे फांसी पर झूलें। इसके लिए बहानों को दफन करना होगा। आधुनिकता, संस्‍कार, शिक्षा और मातृप्रेम में सामंजस्‍य बैठाना होगा।

चलिए मातृ दिवस पर आप भी पढ़िए निदा फाज़ली की एक बेहद खूबसूरत रचना क्‍योंकि मां का स्‍वरूप आज भले ही बदल रहा हो मगर हमारे जीवन में उनकी मौजूदगी ऐसी ही है जैसी कि निदा साहब ने बताई है-


बेसन की सोंधी रोटी

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुँकनी जैसी माँ

बान की खूर्रीं खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ

चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखें जाने कहाँ गईं
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ


- अलकनंदा सिंह