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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

हाथरस को ‘हाथरस’ बनाने के बाद…की कहानी


 र‍िश्तों को लेकर हमारे कव‍ियों- साह‍ित्यकारों ने बड़ा काम क‍िया है, पोथ‍ियों पर पोथ‍ियां गढ़ते गए परंतु इन्हें प्रभाव‍ित करने वाली लालची मानस‍िकता को वे नहीं पढ़ पाए और ना ही बदल पाए। आज जब लालच ने सबसे पहला प्रहार र‍िश्तों पर क‍िया और सामूह‍िक दुष्कर्म के बढ़ते मामलों के रूप में इसका नतीज़ा अब हमारे सामने आ रहा है, तो एक एक केस की हकीकत भी समझ आ रही है। ये अलग बात है क‍ि कभी राजनीति तो कभी कानूनी बहाने ‘सच’ को कहने-सुनने-देखने पर बंद‍िशें लगा रहे हैं परंतु कब तक, सच की यही खूबी है क‍ि वह तो सामने आकर ही रहता है।

और सच ये है क‍ि दुष्कर्म की ‘घृणा’ का मोल लगाकर जो मुआवज़ा बांटने की प्रथा चली है, उसने इसके ‘घट‍ित होने’ पर प्रश्नच‍िन्ह लगाने शुरू कर द‍िए हैं। ऐसा नहीं है क‍ि ये घटनायें होती ही नहीं हैं, न‍िश्च‍ित ही होती हैं परंतु भेड़‍िया आया… भेड़‍िया आया… की तर्ज़ पर दुखद घटनायें भी संशय के घेरे में तब आ जाती हैं जब इसके पीछे पीड़‍ित को न्याय द‍िलाने की अपेक्षा मुआवजे का लालच प्रगट होता है। हक़ीकत हम सभी जानते हैं क‍ि समाज में सभी पुरुष ‘हर‍िश्चंद्र’ नहीं बैठे और ना ही सभी मह‍िलायें ‘साव‍ित्री’ हैं।

हाथरस कांड के बाद अब फतेहपुर में भी ऐसा ही मामला सामने आया है जहां मृतका के पर‍िजन जाम लगाकर न्याय की मांग के साथ ही पुल‍िस के व‍िरुद्ध नारे लगा रहे थे, अचानक सपा व कांग्रेस के नेता के पहुंचते ही एफआईआर में नामज़द क‍िए गए एक आरोपी के साथ साथ ”तीन अन्य अज्ञात” का नाम भी जोड़ देते हैं और मामले को ‘ जघन्य व सामूह‍िक दुष्कर्म ‘ बताने लगते हैं। फ‍िर एक और ट्व‍िस्ट आता है क‍ि 25 लाख मुआवजे की घोषणा होते ही वे पुल‍िस का व‍िरोध भी छोड़ देते हैं और मृतका का अंत‍िम संस्कार भी फटाफट कर देते हैं।

बहरहाल ये और इस जैसे कई मामले हैं जहां मुआवज़ा ‘बांटा’ नहीं गया , बल्क‍ि पर‍िजनों पर पैसा पानी की तरह बहाया गया। निर्भया केस के बाद जिस तरह से उसके घरवालों को दिल्ली में फ़्लैट, लाखों रुपये और भाईयों को नौकरी दी गई, उसके बाद से देशभर में न्याय की जगह ‘तुष्टीकरण’ की एक अजीब सी प्रथा शुरू हो गई ज‍िसने लालच को ऐसा पनपाया क‍ि अब वही गुनाहों को जन्म दे रहा है।

अगर बेटियों के रेप के बदले ज़मीन, लाखों रूपये और बेटों को सरकारी नौकरी मिलने लगेगी तो फिर समझ लो कि गरीब और मजबूर समाज को किस लालच के गर्त में ढकेला जा रहा है। ये बात तो अब कतई बेमानी हो गई है कि कोई भी माँ-बाप अपनी बेटियों के बलात्कार का झूठा मुक़द्दमा नहीं कर सकते। अदालतों से बड़ी संख्या में वापस ल‍िए गए बलात्कार के आरोपों वाले केस इस बात की तस्दीक करते हैं । चूंक‍ि बलात्कार के अपराध में प्रत्यक्ष साक्षी का अभाव होता है इसल‍िए इसका बेजां फायदा उठाकर मुआवज़ा प्रथा के ल‍िए इस टूल को सब अपने-अपने ह‍िसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं ।

हसरत मोहानी का एक शेर और बात खत्म क‍ि –

भड़क उठी है कैसी आतिश-ए-गुल
शरारे आशियाँ तक आ गए हैं।

- अलकनंदा स‍िंंह 

रविवार, 6 सितंबर 2020

र‍िश्तों पर भारी पड़ता मुआवज़ा

 

क‍िसी पीड़‍ित को त्वर‍ित राहत देने के ल‍िए जब कभी भी मदद के नाम पर ''मुआवजे'' शब्द का ईजाद क‍िया गया था तब शायद ही क‍िसी ने सोचा होगा क‍ि ये मदद र‍िश्तों पर क‍ितनी भारी पड़ सकती है। प‍िछले कुछ समय से ध्रुवीकरण करने के नाम पर राजनीत‍ि कर रहे दलों ने इसे ''कैक्टस'' बना द‍िया, जहां फूल की तरह द‍िखने वाला पैसा... र‍िश्तों में कांटे बोकर उन्हें जख़्मी कर जाता है और इस तरह तार तार हुए र‍िश्ते समाज में राक्षसी प्रवृत्तिायों को जन्म देते नज़र आते हैं। 


पहला उदाहरण है - फ‍िरोजाबाद में सीएए-एनआरसी के ख‍िलाफ हुए ह‍िंसक व‍िरोध प्रदर्शन में एक व्यक्ति मारा गया ज‍िसकी पत्नी को मुआवजे के तौर पर उप्र राज्य सरकार के व‍िपक्षी दल समाजवादी पार्टी की ओर से 5 लाख का चेक द‍िया गया, ज‍िसे हथ‍ियाने को देवर ने अपनी ही बेटी की हत्या कर इसका आरोप उस व‍िधवा पर लगा द‍िया। हालांक‍ि मामला खुल गया और पुल‍िस ने उस राक्षस को ग‍िरफ्तार भी कर ल‍िया परंतु मुआवजे के लालच में र‍िश्ते...तो तार तार हो गए ना ?


दूसरा उदाहरण - रेप व‍िक्टिम बताकर सरकार से मुआवजा हास‍िल करने वाले पर‍िवार का है ज‍िसने अपनी कई बेट‍ियों को इसका माध्यम बनाया और कई बार कई लोगों यहां तक क‍ि शासन-प्रशासन से भी मुआवजा झटका... हालांक‍ि देर से ही सही इस मामले की भी पोल खुल गई... और इज्ज़त मानी जाने वाली बेटी ''ब्लैकमेल‍िंग कर मुआवजा हथ‍ियाने'' की कुंजी बन गई। बाप भाई... बाप भाई ना रहे और बेटी बेटी ना रही।  


अब तीसरा उदाहरण मुआवजे के साथ साथ रंज‍िशन बदले का भी देख‍िए क‍ि आपसी दुश्मनी में अपनी ही क‍िशोर बेट‍ियों को पहले मरवाया फिर सुबूत ऐसी ऐसी जगह छोड़े क‍ि व‍िरोधी फंस जाये, ऐसा हुआ भी। व‍िपक्षियों ने हालचाल लेने के बहाने भारी मुआवजे की बरसात कर दी, सरकार को घेरा, हल्ला मचा, मीड‍िया ट्रायल चला... ये लंबा चलता भी परंतु ...  परंतु पोल खुली मुआवजे के बंटवारे में। क‍िशोर बेट‍ियों के र‍िश्तेदार आपस में भ‍िड़ गए और सारे के सारे '' आंसू बहाते - दहाड़ मार कर रोते'' र‍िश्तों का सच सामने आ गया।   


चौथा उदाहरण शहीदों के पर‍िवारों को म‍िलने वाले मुआवजे का है। शहीद सैन‍िकों के ऐसे कई पर‍िवारों की पोल सरेआम खुली है, जो शहीद सैन‍िक के नाम पर बाकायदा धरने पर बैठे ताक‍ि जहां से ज्यादा से ज्यादा पैसा म‍िल सके, इन शहीदों के पर‍िजनों द्वारा ऐसा इमोशनल ड्रामा खेला जाता है क‍ि कोई भी सरकारी संस्था बेबस हो जाती है। कीमती ज़मीन पर शहीद की मूर्ति लगवा कर उस ज़मीन को अपने अध‍िकार में ले लेने, शहीद के नाम पर सब्सिडी के साथ ब‍िना स‍िक्यूर‍िटी जमा कराए पेट्रोल पंप  लेने, सैन्य व‍िभाग द्वारा दी गई सहायता के अलावा अनेक संस्थाओं से नकद धनराश‍ि बटोरने के ल‍िए कभी जाम लगाना, क‍िसी बड़े नेता व अध‍िकारी के आ जाने पर ही शहीद का अंत‍िम संस्कर करना आद‍ि दृश्य आमतौर पर देखे जा सकते हैं।  


पुलवामा हमले में मारे गए सीआरपीएफ के एक जवान के पर‍िवार में तो मुआवजा हास‍िल करने का मामला कोर्ट तक जा पहुंचा, ससुर ने बहू को धमकी दी तो बहू ने अपने मायके पक्ष से ससुर पर हमला करवा द‍िया... ऐसा क्यों ? क्योंक‍ि सरकार, व‍िपक्ष और सामाज‍िक संस्थाओं ने लगभग 3 करोड़ का मुआवजा अकेले इस पर‍िवार पर '' बरसाया'' ... नतीजा क्या न‍िकला...? र‍िश्तों की ऐसी तैसी तो हुई ही उस जवान की शहादत भी जाया  गई। 


कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं क‍ि शहीद की पत्नी ने मुआवजा राश‍ि लेकर अपनी दूसरी शादी तो ठाटबाट से कर ली और शहीद के बच्चों को दरबदर कर द‍िया ... और ये सब स्वयं उनकी सगी मां ने क‍िया, तो कहीं इसके बंदरबांट में जेल तक जाने की नौबत आ गई, और तो और इसी राश‍ि पर शहीदों के बच्चों ने क्राइम का रास्ता अख्तियार कर ल‍िया। 


हालांक‍ि सभी शहीदों के पर‍िवार ऐसे नहीं होते परंतु अब ऐसे मामलों की अध‍िकता शहादत का अपमान कर रही है। कुल म‍िलाकर बात इतनी सी है क‍ि अब मुआवजा एक ऐसा हथ‍ियार बन गया है जो पीड़‍ित के ज़ख्मों पर तुरंत मरहम लगाता द‍िखता तो है परंतु एक मीठे ज़हर की भांत‍ि ये र‍िश्तों को तार तार भी क‍िए दे रहा है। लाशों पर मुआवजा हास‍िल करने वालों ने हमारी मृत देह का सम्मान करने वाली परंपराओं, र‍िश्तों और फ‍िर समाज के आधारों को छ‍िन्न भ‍िन्न कर द‍िया है, अब सोचने की बारी हमारी है क‍ि इस मुआवजा- संस्कृत‍ि को कैसे रोका जाए, बात बात पर '' रहम की भीख ''  देकर ज‍िस मक्कारी को हमने यहां तक आने द‍िया, अब उस पर पुन: सोचें ताक‍ि ''क‍िसी भी मृतक'' के नामपर ना तो मुआवजा बंटे और ना ही इस मुआवजे के बंदरबांट पर र‍िश्तों से हम कंगाल हो जायें।  

- अलकनंदा स‍िंह