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गुरुवार, 30 मई 2013

पत्रकारिता दिवस: मूकं करोति वाचालं..

आज 30 मई यानि पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारों के लिए ही प्रार्थना की सर्वाधिक ज़रूरत महसूस की जा रही है, और हो भी क्‍यों ना।
केंद्र सरकार से लेकर राज्‍य सरकारें तक और राजनैतिक दलों से लेकर कॉरपोरेट घरानों तक पत्रकारों को अपने हिसाब से तोड़ने मोड़ने में लगे हैं। सौदेबाजी का बड़ा घातक दौर चल रहा है और लगभग दो दशक पहले ही मिशन से प्रोफेशन में तब्‍दील हुई पत्रकारिता को बाजारवाद बड़ी तेजी से निगलता जा रहा है । नतीजतन दूसरों की खबर रखने वाले खबरनवीसों के स्‍वयं खबर बन जाने का खतरा बढ़ गया है।
पत्रकारिता के लिए चुनौती के रूप में ताजातरीन कुछ मामले ऐसे सामने आये हैं जिन्‍होंने बतौर मीडियापर्सन 'मीडिएटर' बने पत्रकारों को अपनी भूमिका पर यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि.... अब बस! बहुत हो चुका...।
इन मामलों में सबसे ताजा हैं कल की ही दो घटनाएं...