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सोमवार, 25 जुलाई 2016

शिव पुराण में व्यक्त है- अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि

‘अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि।
 

सर्व शिवमयं ब्रह्म, शिवात्परं न किञचन।।

अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-रूप में शिव का निवास है और शिव ही सर्वस्य 

शिव आदि देव है। वे महादेव हैं, सभी देवों में सर्वोच्च और महानतमें शिव को ऋग्वेद में रुद्र कहा गया है। पुराणों में उन्हें महादेव के रूप में स्वीकार किया गया है। श्वेता श्वतरोपनिषद् के अनुसार ‘सृष्टि के आदिकाल में जब सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था। न दिन न रात्रि, न सत् न असत् तब केवल निर्विकार शिव (रुद्र) ही थे।’ शिव पुराण में इसी तथ्य को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है -

‘एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्नि कश्चन’ सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्र देव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसकी रक्षा करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। ‘रु’ का अर्थ है-दुःख तथा ‘द्र’ का अर्थ है-द्रवित करना या हटाना अर्थात् दुःख को हरने (हटाने) वाला। शिव की सत्ता सर्वव्यापी है।

मैं शिव, तू शिव सब कुछ शिवमय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है।

इसीलिए कहा गया है- ‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्

शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है। शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद। शिव का अर्थ है-परम मंगल, परम कल्याण।

सामान्यतः ब्रहमा को सृष्टि का रचयिता, विष्णु को पालक और शिव को संहारक माना जाता है। परन्तु मूलतः शक्ति तो एक ही है, जो तीन अलग-अलग रूपों में अलग-अलग कार्य करती है। वह मूल शक्ति शिव ही हैं।
स्कंद पुराण में कहा गया है-ब्रह्मा, विष्णु, शंकर (त्रिमूर्ति) की उत्पत्ति माहेश्वर अंश से ही होती है। मूल रूप में शिव ही कर्त्ता, भर्ता तथा हर्ता हैं। सृष्टि का आदि कारण शिव है। शिव ही ब्रह्म हैं। ब्रहम की परिभाषा है - ये भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर जिसके कारण जीवित रहते हैं और नाश होते हुए जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, वही ब्रह्म है। यह परिभाषा शिव की परिभाषा है। ध्यान रहे जिसे हम शंकर कहते हैं - वह एक देवयोनि है जैसे ब्रहमा एवं विष्णु हैं। उसी प्रकार। शंकर शिव के ही अंश हैं। पार्वती, गणेश, कार्तिकेय आदि के परिवार वाले देवता का नाम शंकर है। शिव आदि तत्त्व है, वह ब्रह्म है, वह अखण्ड, अभेद्य, अच्छेद्य, निराकार, निर्गुण तत्त्व है। वह अपरिभाषेय है, वह नेति-नेति है।
शिव की स्वतंत्र निजी शक्ति के दो शाश्वत रूप उसकी प्रापंचिक अभिव्यक्ति में प्रतीत होते हैं, जिन्हें विद्या तथा अविद्या कह सकते हैं। इस प्रापंचिक ब्रहमाण्ड व्यवस्था में परमात्मा के पारमार्थिक आनंदमय स्वरूप को प्रकट करने वाली शक्ति विद्या कहलाती है तथा परमात्मा की प्रापंचिक विभिन्ननाओं के आवरण से अवगुंठित शक्ति अविद्या कहलाती है।
परमात्मा की अभिन्न शक्ति के ही दोनों रूप हैं। नाना आकारों में उसकी ही अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति उसकी शक्ति का विलास है, लीला है। यह ब्रह्माण्ड परमात्मा की निजी शक्ति का व्यावहारिक पक्ष है। पारमार्थिक पक्ष में परमात्मा पूर्णतया एक है-एकं द्वितीयो नास्ति।’ उसके चरम सत् और चित् में कोई भेद नहीं, उसके स्वभाव में कोई द्वैत एवं सापेक्षिता नहीं। यहां वह चरम अनुभव की अवस्था में है जिसमें स्वनिर्मित ज्ञाता-ज्ञेय का कोई भेद नहीं है।
परमात्मा का यह स्वरूप प्रकाश स्वरूप है।परमात्मा की शक्ति का विमर्श पक्ष उसे व्यावहारिक स्तर पर आत्म-चेतन बना देता है। अतः विमर्श-शक्ति शिव की आत्म चेतनता पर आत्मोद्घाटन की शक्ति मानी जाती है। यहां परमात्मा ज्ञाता ज्ञेय के रूप में अपने आपको विभाजित कर लेता है।
परमात्मा की यह वस्तुगत आत्म-चेतना है जो विभिन्न स्तरों के भोक्ता या भोग्य पदार्थों के रूप में दृष्टिगोचर होती है। काल, दिक्, कारणत्व एवं सापेक्षिकता चारों परमात्मा के वस्तुगत रूप हैं। परमात्मा की विमर्श शक्ति को माया शक्ति भी कहा जाता है।

जो सृष्टि में है वही पिण्ड में है। ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे।’ समस्त शरीरों का अन्तिम आधार एक परम आध्यात्मिक शक्ति है जो अपने मूल रूप में अद्वैत परमात्मा शिव से अभिन्न है। समस्त शरीर एक स्वतः विकासमान दिव्य शक्ति की आत्माभिव्यक्ति है। वह शक्ति अद्वैत शिव से अभिन्न है। वही आत्म चैतन्य आत्मानंद, अद्वैत परमात्मा अपने आत्म रूप में स्थित होती है तब शिव कहलाती है और जब सक्रिय होकर अपने को ब्रहमाण्ड रूप में परिणत कर लेती है तब शक्ति कहलाती है। यह शक्ति पिण्ड में कुण्डलिनी के रूप में स्थित है। यही शक्ति महाकुण्डलिनी के रूप में ब्रह्माण्ड में स्थित है।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

सोऽहमास्मि की ओर ले जाते हैं हनुमान

हनुमान जयंती के अवसर पर - 
आज ही के दिन अर्थात् चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भगवान श्रीराम के भक्‍त  हनुमान का जन्म हुआ था।  बल , बुद्धि और अनुशासन के संग भक्‍ति व निरअहंकारी शक्‍ति वाले भक्‍त हनुमान का सनातन धर्म और भगवान श्रीराम के अनुयाइयों में  एक विशेष स्‍थान है, हनुमान श्रीराम के बिना और श्रीराम हनुमान के बिना अधूरे हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार चैत्र माह की पूर्णिमा पर भगवान श्रीराम की सेवा के उद्देश्य से भगवान शंकर के ग्यारहवें रुद्र ने अंजना के घर हनुमान के रूप में जन्म लिया था, इसीलिए उन्‍हें भगवान शिव का अवतार  माना गया है परंतु भगवान शिव ने  पवन देव के रूप में अपनी रौद्र शक्ति का अंश यज्ञ कुंड में अर्पित किया था और वही शक्ति अंजनी के गर्भ में प्रविष्ट हुई थी  इसीलिए हनुमान को पवनपुत्र कहा गया।
शक्‍ति और भाव का ऐसा अद्भुत संयोग कि जिसमें बल भी हो और बुद्धि भी, अनुशासन भी हो और चंचलता भरी भक्‍ति भी, जिसमें अपार बल हो परंतु कतई निरअहंकार का भाव भी...वही हनुमान हैं। इन गुणों का इतना अद्भुत साम्‍य हनुमान के अतिरिक्‍त और किसी के लिए नहीं बताया गया।
श्री हनुमान की शक्‍तियों का आध्‍यात्‍मिक पक्ष जानना कोई बहुत मुश्‍किल नहीं हैं इसीलिए जो अपने जीवन के 'अंतश्‍चतुष्‍टय' को जान पाया, बता पाया ...वही हनुमान है । सामान्‍य से सामान्‍य व्‍यक्‍ति भी जान सकता है कि ये 'अंतश्‍चतुष्‍टय' क्‍या है ?अर्थात् मन, चित्‍त व बुद्धि तीन अवयवों के 'साथ' और इन तीनों के 'बीच' उपस्‍थित रहने वाला चौथा अवयव जो अहंकार है, उस अहंकार को जिसने सोऽहमस्मि तक पहुंचाया, जिसने अहं को आत्‍मा में विलीन कर  दिया...वह हनुमान है।
अब देखिए ना, अहंकार ही तो वह विभाजक अवयव है जो रामायण काल में दो बलिष्‍ठ पात्रों को एक दूसरे के विपरीत खड़ा करता है... और वे हैं हनुमान तथा रावण ।
रावण अहंकारी है, कहता है -
‘मेरी इन बड़ी भुजाओं ने कैलाश पहाड़ उठाया है,
दानव मय इंद्र, कुबेर, वरुण, इन बाणों से थर्राया है।’
अर्थात् सफलता का हर पक्ष अहं से सराबोर है। दूसरी ओर हनुमान हैं जो प्रत्येक सफलता के पीछे ईश्वरीय कृपा को श्रेय देते कहते हैं-
‘लांधि सिंधु हाटक पुर जारा, निशिचर गन विधि विपिन उजारा,
सो सब तब कृपालु प्रभुताई, नाथ न कछू मोर प्रभुताई।’
प्रत्‍येक कार्य के लिए निर्धारित है हमारी भूमिका, हम जो कि निमित्तमात्र हैं परंतु  अहंकार में मनसा, वाचा, कर्मणा जो भी सोचते हैं, उसके कारण स्वयं के अस्तित्व में निहित ईश्वरीय सत्ता के महत्व को नहीं समझ पाते। निश्‍चित ही ‘अहं’ मन, बुद्धि और चित्त से ऊपर है, बलशाली भी और प्रभावी भी इसीलिए यह प्रश्‍न हमेशा बना रहा कि क्या अहंकार मिट सकता है? मन, बुद्धि, चित्त जितने महत्वपूर्ण हैं... उतना ही महत्वपूर्ण अहं है । अहं यानी 'मैं' और मैं को आत्म-तत्व में विलीन कर देना अर्थात अहं का एकात्म ही ‘सोऽहमस्मि’ बना देता है । जब तक 'मैं' को शरीर तक सीमित माना गया, तब तक अहं रावण की तरह शक्ति को क्षीण करने वाला तत्व रहा । जब वही अहं आत्मतत्व में समाहित हुआ,‘सोऽहमस्मि’ बन गया.. तो हनुमानजी के लिए शक्ति संवर्द्धक हो गया और अहं ही देवत्व हो गया।
आज हनुमान जयंती पर अहं के संदर्भ और भक्‍ति के मूलतत्‍व को जानने का संकल्‍प लिया जाये ताकि मैं, मेरा मान-अभिमान, मेरा सुखदुख, मेरा अपमान, मेरे अपने से निकल सर्वत्र ईश्‍वर को देख पाने का भाव जाग सके। हनुमान के माध्‍यम से परमात्‍मा ने यह संदेश हमें दिया कि जब भगवान शिव की प्रचंड रौद्र शक्‍ति को मानवीय हित के लिए प्रयुक्‍त करना हो तो उसके लिए ‘सोऽहमस्मि’ तक की यात्रा करना ज़रूरी है ताकि विश्‍व कल्‍याण की बात सोची जा सके।
- अलकनंदा सिंह