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शनिवार, 16 मई 2020

प्रवास‍ियोंं पर याच‍िका के उन्माद का अर्धसत्य

क‍िसी भी अध‍िकता की प्रवृत्त‍ि उन्मादी होती है। वह हर हाल में नुकसान पहुंचाती है। फिर चाहे वह अध‍िक मीठा हो, अध‍िक खारा या अध‍िक चुप्पी या फिर अध‍िक वाचाल प्रवृत्त‍ि….। घर में बैठे बुजुर्ग यद‍ि अध‍िक बोलने लगें तो उनकी ”अच्छी बातें” भी हम ”ये तो बस यूं ही बड़बड़ाते रहते हैं” कहकर अनसुनी कर देते हैं। ऐसे ही अनेक लोग आपको मीड‍िया, सोशल मीड‍िया या आस-पड़ोस में म‍िल जाऐंगे, जो ”हर वि‍षय पर वक्त-बेवक्‍त ”ज्ञान बघारने” का काम करते रहते हैं।
इस कोरोना संकट के समय पलायन कर रहे प्रवासियों की बात हो या कोरोना से बचाव के उपाय, उपदेशों की अध‍िकता ने द‍िमाग चकरा द‍िया है क‍ि आख‍िर इन ”कृपा बरसाने वालों” का उपाय क्या है। संभवत: इसी अध‍िकता से आज‍िज़ आ गई अदालतों ने भी अब याचि‍काकर्ताओं को दोटूक जवाब देना शुरू कर द‍िया है।
महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 16 मजदूरों के ट्रेन की पटर‍ियों पर सोने के कारण हुई मृत्यु पर कल अदालत ने एक याच‍िका रद्द करते हुए याच‍िकाकर्ता वकील से कहा क‍ि ऐसे प्रवास‍ियों को रोकना असंभव है जो सरकारों द्वारा लगातार क‍िये जा रहे उपायों के बाद भी न केवल पैदल चल रहे हैं बल्क‍ि रेल की पटर‍ियों पर सो कर स्वयं अपनी मौत को आमंत्रण दे रहे हैं। सरकारों को अपना काम करने दें, उन्हें एक्शन लेने दें, क‍िसी को भी अपनी बारी का इंतज़ार तो करना ही होगा, और यही व्यवस्था का मूल है।
हर ऐरे-गैरे व‍िषय पर याच‍िका दायर करने की अध‍िकता ना तो सरकारों को काम करने दे रही है और ना ही स्वयं नागर‍िकों को उनके कर्तव्य का बोध करा रही है। याच‍िकाएं अब स‍िर्फ अध‍िकारों को मांगने का ज़र‍िया बनकर रह गई हैं, गोया क‍ि अध‍िकार स‍िर्फ नागर‍िकों के होते हैं और कर्तव्य स‍िर्फ सरकारों के।
जहां तक बात है प्रवासी मजदूरों पर याच‍िका की तो न‍िश्च‍ित ही उनके ल‍िए ये समय सब्र और बुद्ध‍ि से काम लेने का है, ना क‍ि आवेश और गुस्से में आकर मीलों तक पैदल सफर करने का। सरकार द्वारा ट्रेन की व्यवस्था क‍िये जाने व बसों में उनके गंतव्य तक पहुंचाए जाने के बावजूद वे अपनी जेब से भारी भरकम पैसा खर्च कर यद‍ि ट्रकों में ठुंसकर सफर करने पर आमादा हैं तो उन्हें रोकना असंभव है। इसी तरह वे जो रेल की पटर‍ियों पर सो गए, ना तो अबोध थे और ना ही मंदबुद्ध‍ि फ‍िर उनके ल‍िए सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जाहिर है कि ना तो हर मृत व्यक्त‍ि ”न‍िर्दोष” होता है और न हर गरीब ”बेचारा”। ये समय सरकारों का साथ देकर व्यवस्थाओं को मानने का है।
प्रवासी मजदूरों के झुंडाें को धूप में पैदल चलते द‍िखाने वाले फोटो, सूटकेस पर लेटे हुए सफर करते बच्चे का फोटो, ब‍िवांई और छालों के साथ अपने मूल देस लौट रहे लोगों की थकान के फोटो ”लाइक्स” और सरकारों की आलोचना का ”आनंद” भले ही दे दें परंतु इस तरह के व‍िचारों की अध‍िकता मजदूरों के प्रत‍ि सहानुभूत‍ि को बहुत देर तक भुनाने नहीं देगी क्योंक‍ि ये अर्धसत्य है प्रवास‍ियों का, कर्मठता और न‍िकृष्टता के बीच मौजूद पूर्णसत्य इससे अभी बहुत दूर है।
बहरहाल पलायन करने वाले प्रवासि‍यों पर वसीम बरेलवी का एक शेर बेहद माकूल बैठता है -   
परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है
उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है
परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है
मैं क़तरा हो के तूफानों से जंग लड़ता हूँ
मुझे बचाना समंदर की ज़िम्मेदारी है
कोई बताये ये उसके ग़ुरूर-ए-बेजा को
वो जंग हमने लड़ी ही नहीं जो हारी है
दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है


बुधवार, 4 जुलाई 2018

जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है

"उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है ।"

वसीम बरेलवी का यह शेर, इंसान को इंसान की तरह नज़र आने और इंसान को इंसानियत से पेश आने का सलीका सिखाता है मगर इतनी खूबसूरती से इंसानियत की बात हो और सामने खबरों में बुराड़ी, सतना, मंदसौर आदि-आदि चल रहे हों तो जहन का कसैला हो जाना लाजिमी है।
Picture Courtsey: Google
अंधविश्‍वास की सारी हदें तोड़कर बुराड़ी में सामूहिक आत्‍महत्‍या करने वाले लोग इंसानियत के नाम पर भी किसी रहम के हकदार नहीं हैं। बेशक मानवाधकिारवादी इनके लिए रहम की बात करते हुए इनके मनोविकार का वास्‍ता देंगे, कुछ ऐसे भी होंगे जो राष्‍ट्रीय राजधानी में अकेलेपन या यहां के सामाजिक कटाव को ऐसी प्रवृत्‍तियां पनपने देने के लिए कारण बतायेंगे। शायद ही कोई होगा जो कम से कम सार्वजनिक रूप से इन ''मरने वालों की अपनी सोच'' को इनकी आत्‍महत्‍या का कारण बतायेगा।

दूसरे उदाहरण भी इंसानियत के ही नाम पर हमें शर्मसार करते हैं। मंदसौर और सतना में बच्‍चियों के साथ हुई बर्बरता की आलोचना के लिए मेरे शब्‍दों ने काम करना बंद कर दिया है। हम निर्भया और संभवत: इससे पहले भी ऐसी बर्बरता को सुनते व देखते आए हैं परंतु अब चंद महीने, चंद साल की बच्‍चियां वहशियत का शिकार हो रही हैं। अपनी उम्र के इस छोटे से अंतराल में वे तो इसका दर्द भी बयां करने की स्‍थिति में नहीं होतीं। अपराधी पकड़े जायें या नहीं, वे नहीं जानतीं, शरीर के किन भागों को किसने किस मानसिकता से चोट पहुंचाई, वे नहीं बता सकतीं। लगा लो पॉक्‍सो और चढ़ा दो फांसी पर, चाहे अपराधी को धर्म और जाति पर बांट दो या उसे मानसिक विकार से ग्रस्‍त बता दो, क्‍या फर्क पड़ेगा। बच्‍चियों के शरीर का जो हाल हो चुका, वह अब हमेशा उनके जहन पर हावी रहेगा।

हालांकि मैं यह नहीं कह रही कि वहशियों को सजा न मिले, बल्‍कि अधिकतम दंड उन्‍हें दिया जाना चाहिये और संतोषजनक बात ये है कि ऐसा हो भी रहा है। समाज में बलात्‍कारियों के प्रति घृणा का स्‍तर बताता है कि हम अब इसे दबाने या सहने की स्‍थिति से आगे निकल आए हैं, ये अच्‍छा है परंतु अब इसके आगे क्‍या।

क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता कि कहीं न कहीं हम भी समाज में फैल रहे इस कोढ़ के लिए जिम्‍मेदार हैं। अपने बच्‍चों को ''भयमुक्‍त माहौल'' न दे पाने के दोषी हैं। ज़रा याद कीजिए कि आपने कब-कब अपने पड़ोसी के बच्‍चे को गलत बात पर टोका है, या उसके घर शिकायत की है, कब किसी आवारा व्‍यक्‍ति को फालतू बैठने के लिए मना किया है, कब अपने या किसी परिचित के बच्‍चे (बेटा हो या बेटी) को मोबाइल से अलावा भी रिश्‍तों को निबाहने की सीख दी है, या कब अपने ही बच्‍चों को बड़ों के पैर छूने की हिदायत दी है जबकि यही वो बातें हैं जो सामाजिक रिश्‍तों को गहरा करके उन्‍हें समझने की सीख देती हैं।

हमने स्‍वयं ही अकेलेपन को फैशन बनाकर कई पीढ़ी पहले से रोपना शुरू कर दिया था लिहाजा अब इसके आफ्टरइफेक्‍ट कहीं बलात्कार तो कहीं आत्‍महत्‍या के रूप में सामने आ रहे हैं। 

उक्‍त सभी घटनाओं में एक बात कॉमन है कि ये सभी समाज के भीतर समाज के ही अकेले होते जाने, हमें क्‍या... कोई कुछ भी करे, बस हमारा काम बने, हमारा कुछ ना बिगड़े, कोई अपने घर में क्‍या कर रहा है, ये उसकी प्राइवेसी का मामला है और ये प्राइवेसी ही हमें, हमारे समाज को, हमारे मूल्‍यों को साबुत ही निगल रही है।

अब समझ में आ रहा है कि जब सामाजिकता दरकती है तो रिश्‍ते-नाते-परिवार व संस्‍कार भी दरकते हैं और इनकी दराज़ों से निकलता है अकेलापन, बहशतें, अवसाद। फिर नतीजा बुराड़ी, मंदसौर व सतना जैसे केस में तब्‍दील हो जाता है। तो आज से ही अपने बच्‍चों के साथ स्‍वयं को भी तैयार करें, देश व समाज को सुरक्षित व सुसंस्‍कृत बनाने के लिए संकल्‍प तो लेना ही होगा वरना आने वाला समय हमारी निकृष्‍टता और खुदग़र्जी़ को कभी माफ नहीं करेगा।

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 29 मार्च 2015

जश्न-ए-बहार मुशायरे में इस बार चीन और पाकिस्तान के शायर भी आयेंगे

नई दिल्‍ली। ‘जश्न-ए-बहार’ मुशायरे में इस बार पाकिस्तान और चीन समेत दुनियाभर के नामचीन उर्दू शायर शमा रौशन करेंगे.
तीन अप्रैल को आयोजित होने जा रहा यह मुशायरा देश का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक जश्न होता है और इस बार 17वें मुशायरे में जावेद अख्तर और वसीम बरेलवी जैसी हस्तियां शिरकत करेंगी.
इनमें बीजिंग से झांग शिचुआन, न्यूयार्क से अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह, टोरंटो से अशफाक हुसैन जैदी और जेद्दाह से उमर सलीम अल एदरूस प्रमुख हैं.
उर्दू शायरी के चाहने वालों को इस सालाना जश्न का बेसब्री से इंतजार रहता है जिसमें पाकिस्तान के शायरों को खासतौर से पसंद किया जाता है. इस बार इस्लामाबाद से किर नाहीद, लाहौर से अमजद इस्लाम अमजद और कराची से आम्बरीन हासिब मुशायरे की रौनक बढ़ाने के लिए आ रहे हैं.
मुशायरे का आयोजन दिल्ली पब्लिक स्कूल मथुरा रोड में किया जाएगा. अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय के वाइस चांसलर जमीनउद्दीन शाह मुशायरे के खास मेहमान होंगे और वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर इसकी अध्यक्षता करेंगे.
भारतीय शायरों में कोलकाता से मुनव्वर राना, मुरादाबाद से मंसूर उस्मानी और मेरठ से पोपुलर मेरठी भी अपनी शायरी पेश करेंगे.
जश्न-ए-बहार ट्रस्ट की संस्थापक और उर्दू कार्यकर्ता कामना प्रसाद कहती हैं कि भारत में मुशायरे को हमेशा से ही धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से देखा जाता रहा है जिसकी पहचान उर्दू और हिंदुस्तानी चरित्र को समेटे हुए है. हम इस संस्थान को जिंदा रखने तथा इसे और बेहतरीन बनाने की कोशिश में हैं.