बुधवार, 31 जुलाई 2013

आखिर ये प्रेम है क्‍या बला...

ये एक आम सी जिज्ञासा है जिसकी वजह से लोग अक्‍सर पूछा करते हैं कि भई आखिर ये प्रेम क्‍या बला है।

....अरबों रुपये का कारोबार फिल्‍म इंडस्‍ट्री कर रही है,इससे कुछ कम ही सही वेलेंटाइन पर भी प्रेम का ही करोबार हो रहा है..इसी का भ्रम पाले अपराध की दुनिया भी प्रेम का धंधा कर रही है। यह बात दीगर है कि कहीं ये भ्रम है तो कहीं हकीकत।हकीकत वह भी है जो कुछ खापों के निर्णयों से हमारे बीच गाहे-ब-गाहे चर्चा का विषय बनती रही है और प्रेम को सभी अपनी अपनी नजरों से देखते हुये परिभाषित करने में जुट जाते हैं... मगर बात वहीं ठहरी दिखती है कि भई आखिर ये प्रेम है क्‍या बला...

साइंटफिक लैग्‍वेज़ में कहूं तो यह एक न्‍यूरोलॉजिकल मेंटल स्‍टेज है जिसके तहत दिमाग और दिल का तालमेल अगर सही अनुपात में हो यह कंस्‍ट्रक्‍टिव होता है वरना इसके डिस्‍ट्रैक्‍ट होने से परिणाम घातक होना निश्‍चित है।

सामाजिक नज़रिये से प्रेम एक ऐसी बीमारी के रूप में देखा जाता है जिसकी गिरफ्त में स्‍वयं तो सब आना चाहते हैं लेकिन दूसरे को आते देख नैतिकता का पहाड़ा पढ़ने लगते हैं। दूसरे का प्रेम अचानक ही अनैतिक हो जाता है।
एक और भी नजरिया है व्‍यवहार का नज़रिया...जिसमें प्रेम, मानव व्‍यवहार की एक साइकोलॉजिकल स्‍टेज को परिभाषित करता है या यूं कहें कि प्रेम के माध्‍यम से किये गये मानवीय व्‍यवहार को ज्‍यादा स्‍थायित्‍व मिलता है।
मेरी समझ में तो इतनी सी बात आती है कि तमाम अवस्‍थाओं से गुज़रते हुये भी...अलग-अलग रंग, रूप, देश, भाषा, समाज, सोच, दशा व अवस्‍थाओं में इसकी कितनी भी परिभाषायें क्‍यों न गढ़ ली जायें परंतु.....इस शाश्‍वत सहज ईश्‍वरीय शक्‍ति व वरदान को न तो परिभाषित किया जा सकता है और न ही किसी श्रेणी में रखा जा सकता है। 

बात तो इतनी सी है कि प्रेम जब घटित होता है तो फिक्र कैसी..और फिक्र है तो प्रेम कहां ...ये असमंजस क्‍यों है। ऐसे में हमें भीतर झांक लेना चाहिए , अकसर हम अपने भीतर झांकने से डरते हैं, क्‍यों...? क्‍योंकि आदतन हम दूसरे के प्रेम को देखते हैं कि उसने मुझसे प्रेम किया,उसने कितना प्रेम किया,उसका प्रेम ऐसा,उसका प्रेम वैसा। ऐसे में हम स्‍वयं प्रेम करना भूल जाते हैं। न स्‍वयं से कर पाते हैं ना स्‍वयं के लिए । और जब स्‍वयं से प्रेम नहीं तो किसी से भी प्रेम का सवाल ही उठता।
मेरी समझ में तो प्रेम जब भी होता है चरम ही होता है, उसकी कोई अवस्‍था नहीं होती,उसे डिग्रीज में  नहीं बांटा जा  सकता। या तो वह 100 डिग्री प्रथम होता है या 100 डिग्री आखिरी । प्रथम अवस्‍था ही आखिरी होती है। इसीलिए या तो यह होता है या नहीं।
इसके होने या न होने को तो देखा व महसूस किया जा सकता है,वह भी बेहद निजी स्‍तर पर मगर शब्‍दों में इसकी वृहदता को बांधना मुश्‍किल  है।
संभवत: इसीलिए ये जहां अनपढ़ कबीर की दृष्‍टि में बंधकर साधो से एकात्‍म हो जाने को विवश हो जाता है वहीं ज्ञानी ऊधौ को अज्ञानी गोपिकाओं से मात खानी पड़ती है।
निश्‍चित ही सृष्‍टि के साथ ही उपजी इस फिज़ीकल-मेंटल
अवस्‍था के अस्‍तित्‍व पर पूर्वकाल से चली आ रही बहस आज भी वहीं टिकी है जहां से ये शुरू हुई थी।
- अलकनंदा सिंह


शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

कबीर..तुलसी..मोदी..मुलायम..और घूरे के दिन

समय...जिसे हमारे पुराणों से लेकर कथाओं तक में  ईश्‍वर से भी ज्‍़यादा बलवान माना गया है। समय अच्‍छा  हो तो रंक को राजा और यदि बुरा हुआ तो राजा को  रंक बनते देर नहीं लगती। यूं तो ये मात्र कहावतें हैं  मगर ये जीवन के हर क्षण में अपनी सार्थकता सिद्ध  करती दिखाई देती हैं।
इन्‍हीं कहावतों में से एक ये कहावत यह भी प्रचलित है  कि 12 साल बाद तो 'घूरे' के दिन भी बदल जाते हैं।
अब 12 साल का समय ही क्‍यों ...तो ये समय अंतराल  यूं ही नहीं गढ़ा गया। ज्‍योतिष विज्ञान में ग्रहों की  निर्धारित चाल के अनुसार शुक्र ग्रह अपनी चाल हर 12  वर्ष में बदलता है और शुक्र ग्रह किसी भी व्‍यक्‍ति या  स्‍थान के भाग्‍योदय का कारक माना गया है। हमारी  सोशल पॉज़िटिविटी देखिए कि घूरे यानि कूड़े करकट  जैसे निकृष्‍ट स्‍थान के भाग्‍योदय को भी 12 साल का  समय तय कर दिया गया।
मैं यहां न तो सोशल पॉज़िटीविटी की पराकाष्‍ठा पर तथा  न ही शुक्र ग्रह की चाल पर बात कर रही हूं, और न ही  घूरे की नियति पर बात कर रही हूं ... बात तो उस  उत्‍तर प्रदेश के हालातों और नियति की कर रही हूं जो  कभी सर्वोच्‍च सत्‍ता का केंद्र बिंदु हुआ करता था। आज  उसका शुक्र अपने पराभवकाल में अपने विकास के सबसे  निचले पायदान पर खड़ा है और इसके नीति-नियंता  अपने ही नौकरशाहों से भयभीत दिखाई दे रहे हैं। उन्‍हें  नौकरशाहों की आदत में समा चुकी भ्रष्‍ट व लापरवाह  कार्यशैली अपनी सत्‍ता के खिलाफ कुचक्र रचती दिखाई  दे रही है। इतना ही नहीं, वे अपनी इस बेबसी को  जगज़ाहिर भी कर रहे हैं। बिना ये जाने कि जनता में ये बेबसी क्‍या संदेश पहुंचा रही है। इसे  मुख्‍यमंत्री की स्‍वीकारोक्‍ति नहीं, बल्‍कि पलायनवादी  प्रवृत्‍ति कहा जायेगा।
जहां तक बात है आगामी चुनावों में जीत के सपने  पालने की और नरेंद्र मोदी का विरोध करने की.. तो  मोदी के विकास एजेंडे से प्रदेश का हर नेता चाहे वह  कांग्रेसी हो या समाजवादी, भयभीत है क्‍योंकि जिस  विकास को वो आज तक भुलाये बैठे थे, अब वही मुद्दा  बनने जा रहा है। इस संदर्भ में लगभग अपनी हर सभा  में सत्‍तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नेता जनता को यही  कहकर चेताते हैं कि नरेंद्र मोदी सावधान हो जायें ये  गुजरात नहीं है...
हां! सही कहते हैं ये लोग और इनके मुखिया मुलायम  सिंह कि ये उत्‍तर प्रदेश है, गुजरात नहीं...निश्‍चित ही ये  सही है क्‍यों कि जिस धरती पर राम, कृष्‍ण, कबीर और  तुलसीदास पैदा हुए हों..जहां बुद्धिजीवियों ने शासन की  बागडोर संभाली हो..जहां से पूरे देश की राजनीति  प्रतिध्‍वनित होती रही हो.. वहां जोड़-तोड़ का ककहरा  पढ़ने वाले स्‍वयं को लोहियावादी के मुलम्‍मे में ढांक और  धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर अपराधियों, आतंकवादियों  के प्राश्रय से ''राज'' कर रहे हों तो सोचना पड़ेगा कि  क्‍या ये वही प्रदेश है जिसने देश को एकमुश्‍त इतने  प्रधानमंत्री दिये।
सत्‍य है कि नरेंद्र मोदी को उत्‍तर प्रदेश में आगे बढ़ने  के लिए दस बार सोचना होगा कि उनका सामना किन्‍हीं  घाघ राजनेताओं या अराजकताओं व अव्‍यवस्‍थाओं से  नहीं, बल्‍कि ज़हनी तौर पर कंगाल हो चुके जाहिल  नेताओं से होगा जो निज स्‍वार्थ के लिए प्रदेश की रग  रग में हर किस्‍म का ज़हर भर चुके हैं... इससे पार  पाना सच में लोहे के चने चबाने जैसा होगा।
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

ऊ तो भये स्‍वर्ग के वासी और हम..?

कोई मुसीबत जब हमारी जान पर बन आती है तो हम  उससे पीछा छुड़ाने को वो सारी कवायद करते हैं जो  हमारे वश में होती हैं। जाहिर है कि हमारी सराकर भी  इस प्रवृत्ति से अलग नहीं रह सकती। उसके लिए उसी  की दी हुई सौगात यानि आरटीआई अब हर दिन याद  दिलाती रहती है कि श्रेय लूटने को जो खिलौना उसने  जनता के हाथ दिया था, जनता उससे खेलना अच्छी  तरह सीख गई है। जनता की डुगडुगी पर सरकार नाचने  को बाध्य है इसीलिए वह अब आरटीआई को भोंथरा  बनाने का मन बना चुकी है।
जिस तरह हमारे देश में तीसरी पीढ़ी तक पूर्वजों का  श्राद्ध अथवा तिथि आयोजित करने की सनातनी परंपरा  चली आ रही है उसी तरह केंद्र सरकार अपने राजनैतिक  पूर्वजों को याद करने के बहाने, मीडिया पर करोड़ों  बरसाकर अपनी कमियों को ढांपने का जो प्रयास कर रही  है उस पर उंगलियां उठना लाज़िमी है। बदहाली के इस  दौर में इन पूर्वजों की जन्मतिथि व पुण्यतिथि मनाने पर  ही सरकार अगर करोड़ों रुपये जाया कर देगी तो जनता  सवाल खड़े करेगी ही।
हालांकि खबर थोड़ी पुरानी है मगर काबिलेगौर है कि केंद्र  सरकार ने पिछले पांच सालों में मरे हुओं का उत्सव  कुल 142.3 करोड़ रुपये खर्च करके मनाया और इसे  उजागर करने का हथियार बना उसी का उपलब्ध कराया  गया आरटीआई कानून।
जी हां, देखिए ये तथ्य भी....कि यूपीए-2 सरकार ने पूर्व  प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव  गांधी के विज्ञापनों पर 53.2 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।  यह पैसा इन नेताओं की जयंती और पुण्यतिथि पर  समाचार पत्रों में दिए गए विज्ञापनों पर खर्च किया गया।
सरकारी एडवरटाइजिंग विभाग डीएवीपी से ही मिली  जानकारी के मुताबिक सरकार ने पिछले पांच सालों में  2008-2009, 2012-2013 के दौरान 15 नेताओं की  जयंती और पुण्यतिथि पर समाचार पत्रों को विज्ञापन  दिए। इन विज्ञापनों पर कुल 142.3 करोड़ रुपए खर्च  किए गए। सबसे ज्यादा खर्च राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की  पुण्यतिथि और जयंती पर दिए गये विज्ञापनों पर हुआ।  गांधी को लेकर दिए विज्ञापनों पर कुल 38.3 करोड़ रुपए  खर्च हुए।
गांधी के बाद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, संविधान  निर्माता भीमराव अंबेडकर, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल  नेहरू के विज्ञापनों पर काफी खर्च किया गया। नेहरू-गांधी  के बाद अंबेडकर इकलौते नेता हैं जिनके लिए केन्द्र  सरकार ने विज्ञापनों के लिए 10 करोड़ रुपए आवंटित  किए। इन पांच वरिष्ठ नेताओं को लेकर दिए गए  विज्ञापनों पर कुल 100 करोड़ रुपए खर्च हुए।
सरदार पटेल की पुण्यतिथि और जयंती पर दिए  विज्ञापनों पर 6.8 करोड़, बाबू जगजीवन राम की  पुण्यतिथि और जयंती पर दिए विज्ञापनों पर 6.2 करोड़  रुपए खर्च किए गए। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री  पर 3 करोड़, मौलाना आजाद पर 2 करोड़ और एस.  राधाकृष्णन की जयंती पर 1.2 करोड़ रुपए खर्च किए  गए।
बहरहाल करोड़ों के घोटालों के बीच इस बूंदभर खर्चे को मीडिया द्वारा कोई अहमियत न दिया जाना समझ में आता है मगर जनता का क्या...वह अपने टैक्स से जिस खजाने को भर रही है उसे यूं लुटाया जाना भला कैसे मंज़ूर होगा। ज़ाहिर है आरटीआई का हथियार जब तक हाथ में है तबतक तो कम से कम सरकार की नाक में दम किया जाता रहेगा।

रविवार, 14 जुलाई 2013

दरकते मुखौटों का लाक्षागृही षड्यंत्र

मुखौटे दरक रहे हैं। आकांक्षाएं धूमिल हुई जा रही हैं। भस्‍मासुरों ने अपने ही प्रदेश को लाक्षागृह बनाने का षड्यंत्र जो रच दिया है, विघटनकारी आतताई तो पहले से मौज़ूद थे, अब जेल में बैठे घोटालबाजों को हेर-फेर कर सत्‍ता में लाया जा रहा है....उत्‍तर प्रदेश के राजनैतिक अवसान की पराकाष्‍ठा है ये।
यूं भी कहते हैं कि राजनीति में आस्‍थाएं टूटते और पाला बदलते देर नहीं लगती मगर इस प्रक्रिया में हमाम का जो सीन जनता के सामने आता है वह बेहद पीड़ादायक है।
कल जब एनआरएचएम घोटाले की बड़ी मछली बाबूसिंह कुशवाहा की पत्‍नी व भाई को समाजवादी पार्टी में शामिल किया गया तो घोटाले से जुड़ी हर घटना याद आ गई। याद आ गया कि किस तरह करोड़ों के इस घोटाले को ऑफीसर्स की मदद से पूरे प्रदेश के हर जिले तक फैला दिया गया। अब उसकी फांसें सीबीआई जांच के ज़रिये निकालने की कोशिश की जा रही है और ऐसे में घोटाले के सूत्रधार बाबूसिंह कुशवाहा के परिवार को सीधे-सीधे सत्‍ता का लगभग हिस्‍सा ही बना लेना ये सोचने पर विवश करता है कि प्रदेश का भविष्‍य क्‍या होने वाला है।
मुग़ालते में हैं वे युवा जिन्‍होंने अखिलेश के मुख्‍यमंत्री बनते ही उनसे तमाम आशाएं संजो लीं थीं कि अब उनके प्रदेश को भी खुशहाली का दीदार होगा। प्रशासनिक और राजनैतिक दोनों स्‍तर पर प्रदेश की जनता को आखिर मिला क्‍या?
'भैयाजी' और 'नेताजी' की अपनी मजबूरियां.. असुरक्षा का माहौल और चौतरफा बदइंतज़ामियों का आलम। उस पर अब बाबूसिंह कुशवाहा के परिवार को सपा में शामिल किये जाने के बाद यह सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि समाजवाद के मुखौटे किस तरह जनता से धोखा करने के आदी हैं।
कौन नहीं जानता कि खुद मुलायम सिंह व अखिलेश के खिलाफ आय से अधिक संपत्‍ति के मामले चल रहे हैं और उन्‍हीं मामलों से कांग्रेस ने उनकी प्रतिबद्धता अपनी मुठ्ठी में कर रखी है...बाकी न्‍यूक्‍लियर डील से लेकर ममता बनर्जी से मुंह फेरने तक का ड्रामा सिर्फ और सिर्फ खुद को बचाये रखकर केंद्र से मिल रहे अनुदानों को ठिकाने लगाने तक सीमित है। तभी तो प्रदेश की बेलगाम नौकरशाही का नाम आते ही दोनों अपने-अपने सुर में ''क्‍या करें कोई सुनता ही नहीं'' कहकर पल्‍ला झाड़ लेते हैं । क्‍या किसी प्रदेश के लिए शासकवर्ग की ये बेचारगी सही मानी जानी चाहिए।
बाबूसिंह कुशवाह के परिवार को समाजवादी बनाये जाते वक्‍त के तमाशे की एक बात गौर करने लायक जरूर है। वह यह कि जिस समय यह तमाशा चल रहा था, स्‍वयं मुलायम सिंह पार्टी कार्यालय में मौज़ूद थे मगर सारी औपचारिकताएं पार्टी प्रवक्‍ता व कारागार मंत्री राजेंद्र चौधरी ने पूरी करवाईं।
फिलहाल तो यह देखना बाकी है कि बाबूसिंह कुशवाहा नाम के आफ्टर इफेक्‍ट्स क्‍या होंगे और मतिभ्रम के रोगी मुलायम सिंह को क्‍या रिज़ल्‍ट्स देकर जायेंगे।
 - अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

'हम हैं ना' और 'देख लेना' के बीच....

मुआवजे दर मुआवजे और लैपटॉप बांटने में लगी उत्‍तर प्रदेश सरकार अव्‍यवस्‍थाओं एवं अनियमितताओं के बीच बदहवासी के उस आलम में अपना सफर तय कर रही है जिसमें अक्‍सर लोग ये समझ ही नहीं पाते कि आखिर उनकी नाव जा किस ओर रही है।
उत्‍तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जो जितनी अहमियत
राजनैतिक कारणों से रखता है उतनी ही सामाजिक विषमताओं के लिए भी।
इसके अलावा एक और कड़वा सच ये है कि राजनीतिक उठापटकों ने प्रदेश के आम आदमी में 'स्‍वयं कुछ करने' का जज्‍़बा लगभग खत्‍म ही कर दिया है। ऐसे में किसी शहीद के घर सांत्‍वना देते हुए जब मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि    ''हम हैं कोई बात हो तो बताना....''उसी क्षण डीएम की ओर मुड़कर कहते हैं ''देख लेना''... तो दोनों ही वाक्‍य कथनी और करनी की सच्‍चाई को बखूबी उजागर कर देते हैं।
अखिलेश की कथनी जिन आश्‍वासनों को आमजन के सामने परोसती है, उनके नौकरशाहों की फौज उन्‍हीं आश्‍वासनों का गला साथ के साथ ही घोंटती चलती है, तभी तो एक मुख्‍यमंत्री आदेश देने के स्‍थान पर ये कहता दिखाई देता है कि ''देख लेना''।
प्रदेश में तकरीबन हर मोर्चे पर असफलता और अराजकता कायम है। चाहे सांगठनिक मामला हो या प्रशासनिक। यही कारण है कि अधिकारियों के रवैये ने अब तक तो कम से कम जनता में सरकार के प्रति उदासीनता, क्षोभ और निराशा ही भरी है ।
इस 'हम हैं ना' और 'देख लेना' के बीच से ही प्रदेश के उत्‍थान की राह निकालने में नाकाम रहे हैं अखिलेश यादव। फिलहाल तो जनता को रोजबरोज लैपटॉप वितरण के अलावा किसी जनकल्‍याणकारी कार्य की आशा नहीं पालनी चाहिए। हां, विकास की बात के रूप में ऑस्‍ट्रेलियाई, चीनी और जापानी निवेश की सूचनायें अवश्‍य सुनाई देतीं रहती हैं । ये कहां होगा कब होगा और किसके लिए होगा... जैसे आशावादी जुमले से फिलहाल जनता अपना पेट भर ले और अगले साढ़े तीन साल तक बाट जोहती रहे।
-अलकनंदा सिंह

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