बुधवार, 14 सितंबर 2016

हिन्दी दिवस पर विशेष: दिल्ली सरकार का भाषादूत सम्मान पर विवाद, Om Thanvi का भी इस्तीफा


दिल्ली सरकार का भाषादूत सम्मान पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा , हिंदी अकादमी के संचालन समिति सदस्य वरिष्ठ पत्रकार Om Thanvi ने भी इस्तीफा दे दिया है ।
दिल्ली की केजरीवाल सरकार अपनी हिंदी अकादमी की ओर से दिए जा रहे भाषादूत सम्मान को लेकर और घिर गई है। पहले लेखकों को इस सम्मान के लिए आमंत्रित करने और बाद में खेद जताकर इनकार कर देने से अकादमी की  संचालन समिति में रोष है। समिति के सदस्य वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने तो पद से इस्तीफा दे दिया है, वहीं भाषादूत के लिए चुने गए दो लेखकों, ललित कुमार और राहुल देव ने ये सम्मान लेने से ही इनकार कर दिया है।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अध्यक्षता वाली हिंदी अकादमी की कर्ताधर्ता जानी-मानी साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा हैं। अकादमी ने पहले पत्र के जरिये लेखक अरुण देव, अशोक कुमार पांडेय, संतोष चतुर्वेदी, अभिषेक श्रीवास्तव, और पत्रकार शिवेंद्र सिंह को भाषादूत सम्मान देने के लिए आमंत्रित किया, लेकिन दो दिन पहले ही त्रुटिवश नाम शामिल होने का पत्र भेजकर खेद जता दिया, इसके बाद सोशल मीडिया पर केजरीवाल सरकार की जमकर आलोचना हो रही है।
इधर, इस पूरे विवाद में अकादमी की संचालन समिति के सदस्य ओम थानवी ने इस्तीफा दे दिया है। थानवी ने बताया कि यह हिंदी अकादमी की स्वायत्तता पर कुठाराघात है। प्रतिष्ठित कथाकार मैत्रेयी पुष्पा को अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया तब हम सबको खुशी हुई थी, भले पदेन अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं। फिर मैत्रेयी जी के कहने पर मैंने संचालन समिति की सदस्यता स्वीकार कर ली। कैसी विडंबना है कि संचालन समिति का सदस्य हूं और सोशल मीडिया से पता चलता है कि हिंदी दिवस पर अकादमी ‘डिज़िटल दुनिया’ के लेखकों-पत्रकारों को ‘भाषादूत’ सम्मान से सम्मानित कर रही है। यह फैसला कब हो गया? अगर ऐसे ही होता है तो अकादमी की संचालन समिति क्यों बनती है? आखिर किसी निर्णायक समिति आदि की संस्तुति पर संचालन समिति की सम्मति दरकार होती है कि नहीं? निर्णायक समिति कब बनी?
थानवी ने कहा कि मुझे पुरस्कृत होने वाले कुछ नाम देखकर सदमा भी लगा। खासकर हर सरकार के दरबारी अशोक चक्रधर का, जो खुद इस अकादमी के उपाध्यक्ष रहे हैं। कृष्ण बलदेव वैद को पुरस्कार घोषित कर वापस लेने का काम भी उन्हीं के वक्त हुआ। तब साहित्यकारों ने इसका सामूहिक विरोध किया था। बाकी कुछ नाम मसलन राहुल देव (जनसत्ता वाले नहीं)- मैंने सुने तक नहीं। लेकिन खुशी की बात है कि राहुल देव ने इस तरह लेखकों का अपमान करने वाले कदम का विरोध करते हुए यह सम्मान लेने से इनकार कर दिया है।
थानवी ने कहा कि चौंकाने वाली बात यह भी है कि मैंने इस विवाद पर सुबह मैत्रेयी जी को फ़ोन भी किया था तो उन्होंने बताया कि ये नाम उनके सुझाए हुए नहींहैं। उनके सुझाए नाम तो संस्कृति मंत्री ने ख़ारिज कर दिए। जबकि उपाध्यक्ष की संस्तुति के बाद अकादमी कार्यालय ने उन पांच लेखकों (अरुण देव, अशोक कुमार पांडेय आदि) से संपर्क कर पत्र भी भेज दिए थे। बाद में उन्हें निरस्त कर दिया गया। मुझे नहीं लगता कि किसी हिंदी सेवी का इससे बड़ा अपमान अकादमी कर सकती है।
थानवी ने कहा कि इस प्रकरण में सबसे ज़्यादा जहां अकादमी की स्वायत्तता आहत हुई है, वहीं हम संचालन समिति के सदस्यों का भी अपमान हुआ है, जिनकी अब तक तो कोई बैठक ही नहीं हुई और पुरस्कार तय-निरस्त भी हो गए। उन्‍होंने कहा कि ऐसे परिवेश में मैं अकादमी को सहयोग नहीं कर सकता और इस्तीफा देने की सूचना भी मैंने अकादमी को प्रेषित कर दी है।
इधर, इंटरनेट पर कविता कोष जैसे सर्वाधिक लोकप्रिय पोर्टल के मॉडरेटर ललित कुमार ने अकादमी के इस व्यवहार को हिंदी सेवियों का अपमान बताया है। ललित कुमार ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है कि मैंने हमेशा कहा है कि कविता कोश हम और आप सबकी साझी परियोजना है। साहित्यकार भी इस स्वयंसेवी समाज का हिस्सा हैं। ऐसे में अरुण देव, अशोक कुमार पांडेय और संतोष चतुर्वेदी के साथ हुए प्रकरण के बाद मुझे नहीं लगता कि मैं हिंदी अकादमी का भाषादूत सम्मान स्वीकार कर सकता हूं। इसलिए मैं हिंदी अकादमी, दिल्ली का भाषादूत सम्मान विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर रहा हूं।
दूसरी ओर राहुल देव ने भी भाषादूत सम्मान लेने से इनकार कर दिया। राहुल ने तो यहां तक कह दिया कि उन्हें पता ही नहीं कि उन्हें सम्मान क्यों दिया जा रहा है? उन्हें तो कन्‍फर्म करना पड़ा कि सम्मानित किए जाने वाले व्यक्ति वे ही हैं।
राहुल ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है- मुझे अकादमी से परसों स्वीकृति के लिए एक फोन आया था कि आपको सम्मानित कर रहे हैं, मुझे यह जानकार थोड़ा आश्चर्य भी हुआ था कि मैंने ऐसा कौन सा काम कर दिया जो अकादमी मुझे सम्मानदे रही है। इस सम्मान की वैसे तो कोई आवश्यकता नहीं थी, फिर भी अगर देना था तो निश्चित रूप से यह तीनों साहित्यकार अरुण देव, अशोक कुमार पांडेय और संतोष चतुर्वेदी मुझसे ज्यादा योग्य और उचित थे फिर रातोरात इस तरह निर्णय में बदलाव बेहद अपमानजनक होता, किसी के भी लिए। यह सब देखकर मैंने इस सम्मान को लेने से पहले ही इनकार कर दिया। अकादमी की कार्यप्रणाली की निंदा और पूरी भर्त्सना के साथ, उनका पुरस्कार उन्हें ही मुबारक हो।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का संस्कृत में अनुवाद

संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का संस्कृत में अनुवाद किया गया है। यह चार्टर संयुक्त राष्ट्र की बुनियादी संधि है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरूद्दी ने कल कहा, ‘‘चार्टर अब संस्कृत में उपलब्ध है। इस उत्कृष्ट प्रयास के लिए डॉ जितेंद्र कुमार त्रिपाठी आपका शुक्रिया।’’ उन्होंने ट्विटर पर चार्टर के संस्कृत कवर की एक तस्वीर भी डाली।
डॉ जितेंद्र कुमार त्रिपाठी लखनऊ स्थित अखिल भारतीय संस्कृत परिषद के सचिव हैं। संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय संगठन सम्मेलन के खत्म होने के साथ अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में 26 जून, 1945 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किया गया था और यह 24 अक्तूबर, 1945 से प्रभाव में आया।
चार्टर संयुक्त राष्ट्र की सभी छह आधिकारिक भाषाओं में उपलब्ध है।

चार्टर संयुक्त राष्ट्र क्या है

संयुक्त राष्ट्र अधिकारपत्र (United Nations Charter) वह पत्र है जिसपर 50 देशों के हस्ताक्षर द्वारा संयुक्त राष्ट्र स्थापित हुआ। अक्सर इस पत्र को संविधान माना जाता है, पर वास्तव में यह एक संधि है। इस पर अवश्यक 50 हस्ताक्षर 26 जून 1945 को हुए, पर संयुक्त राष्ट्र वास्तव में 24 अक्टूबर 1945 को स्थापित हुआ जब पांच मुख्य संस्थापक देशों (चीन गणराज्य, फ़्रांस, संयुक्त राज्य, संयुक्त राजशाही और सोवियत संघ) ने इस पत्र को स्वीकृत किया।



अधिकारपत्र का संगठन

इस अधिकारपत्र का संगठन कुछ-कुछ संयुक्त राज्य के संविधान जैसा है। पत्र का प्रारंभ एक प्रस्तावना से होता है। बाकी का पत्र अध्यायों में विभाजित है।

अध्याय 1 : संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों का अर्पण। इनमें से दो अहम अद्दुश्य है अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा।

अध्याय 2 : संयुक्त राष्ट्र के सदस्य बनने की कसौटियों का अर्पण।

अध्याय 3 से 15 : संयुक्त राष्ट्र के अलग-अलग अंगों और संस्थाओं तथा उनके अधिकारों का विवरण।

अध्याय 16 एवं 17 : संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के पहले के अंतर्राष्ट्रीय कनूनों का संयुक्त राष्ट्र के साथ जोड़ने की प्रक्रिया।

अध्याय 18 से 19 : इस अधिकारपत्र के संशोधन और दृढ़ीकरण की प्रक्रियाएं।


इनमें से कुछ बेहद अहम अध्याय हैं जैसे कि


अध्याय 6 : सुरक्षा परिषद का अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों को जांचने और सुलझाने का अधिकार।

अध्याय 7 : संघर्षों को सुलझाने के लिए सुरक्षा परिषद की आर्थिक, राजनयिक और सामरिक योग्यताएं।

अध्याय 9 एवं 10 : आर्थिक और सामाजिक सहयोग में संयुक्त राष्ट्र का अधिकार और इस अधिकार का प्रबंध करने वाली आर्थिक एवं सामाजिक परिषद का विवरण।

अध्याय 12 एवं 13 : उपनिवेशों को स्वतंत्र करने का प्रबंध।

अध्याय 14 : अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार।

अध्याय 15 : सचिवालय के अधिकार।

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