दुष्कर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दुष्कर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

उदयभास्कर जी… आंकड़े ज़मीनी हक़ीकत बयां नहीं करते


 आज देवी अष्टमी है और आज के द‍िन यद‍ि कुछ ल‍िखा जाये और वह मह‍ि‍लाओं से संबंध‍ित ना हो , ऐसा हो नहीं सकता। यूं देखा जाये तो हम पत्रकार लोग अकसर ज्वलंत मुद्दों पर ही ल‍िखते हैं और आंकड़ों की बाजीगरी कम करते हैं, परंतु कुछ स्थाप‍ित लेखक और बड़े संस्थानों के '' बड़े च‍िंतक '' जब आंकड़ों पर आधार‍ित बात करके क‍िसी भी समस्या को कागजों पर ही तैराते हैं तो बड़ा दुख होता है क्योंक‍ि आंकड़े कभी ज़मीनी हक़ीकत नहीं बता पाते। 


ऐसा ही आज के समाचार पत्र में ''सोसायटी फॉर पॉल‍िसी स्टडीज''  के न‍िदेशक 'सी. उदय भास्कर' का एक लेख पढ़ा, जो क‍ि दुष्कर्म और मह‍िलाओं की स्थ‍ित‍ि पर ' समाज की ज‍िम्मेदारी' पर ल‍िखा  गया था, उन्होंने हाथरस के ज‍िस केस से शुरुआत की, वह बेहद हवा हवाई था, क्योंक‍ि इस केस से संबंध‍ित जांच एंजेंस‍ियों की अभी तक की प्रगति, राजनीत‍िक कुप्रचार और ग्रामीणों के हवाले से जो बातें छन कर आ रही हैं, वे सभी  जानकारी पूरे मीड‍िया में उपस्थ‍ित है परंतु उदयभास्कर जी ने इसे भी रटे रटाये अंदाज़ में प‍िछले एक दशक के आंकड़े पेश करते हुए मात्र ''दल‍ित उत्पीड़न और मह‍िलाओं पर अत्याचार''  के संदर्भ में देखा । जबक‍ि आज के संदर्भ में  पूरा का पूरा केस ही एकदम अलग एंग‍िल लेकर सामने आ रहा है...तमाम संदेह और सुबूत इशारा करते हैं क‍ि केस जो प्रचार‍ित क‍िया गया... वैसा है नहीं और इसे मैं पहले भी ल‍िख चुकी हूं। 


दरअसल SCSTAct में फर्जी केस दर्ज कराने और 2 लाख रुपये लेकर केस वापस लेने से पनपी 19 साल पहले की रंज‍िश और मृतका के प्रेम संबंधों के चलते दुश्मनी को गाढ़ा रंग म‍िला। इत्त‍िफाक ऐसा क‍ि लड़की से संबंध रखने वाले का नाम संदीप और लड़की भाई का भी नाम संदीप... व‍िक्ट‍िम लड़की के सबसे पहले जो वीड‍ियो आए वे सारी कहानी बताते हैं परंतु व‍िक्ट‍िम के पर‍िवारीजन शुरू से ही संदेह के घेरे में रहे और इसकी तस्दीक उन्होंने नार्को टेस्ट से मना करके कर भी दी। तमाम अन्य कारणों को तो जाने ही दें।


मैं आज इस केस पर नहीं ल‍िख रही बल्क‍ि आंकड़ों के ज़र‍िये मह‍िला अत्याचारों पर अब तक बनाए जाते रहे नैरेट‍िव पर ल‍िख रही हूं। क‍ि आख‍िर ये नैरेट‍िव क्यों बनाया जा रहा है, क्यों सी. उदयभास्कर सरीखे सभी बड़े पॉल‍िसी मेकर्स आज तक सरकारों, अध‍िकार‍ियों और राजनीत‍ि को दोषी बताते नहीं थक रहे और क्यों ये बुद्ध‍िजीवी सदैव ही मह‍िलाओं के ह‍ित बनने वाली नीत‍ियों को कमतर ठहराने का राग अलापते रहते हैं। वे यह क्यों हम भूल जाते हैं क‍ि हम ही उसके ल‍िए  सर्वाध‍िक ज‍िम्मेदार हैं। ''गांव की बेटी- सबकी बेटी'' के ध्वस्त हो चुके सामाज‍िक ढांचे के ल‍िए वे अपनी आवाज़ क्यों नहीं उठाते। जब SCSTAct में जात‍ि सुचक शब्द कहने पर सजा का प्राव‍िधान है तो मह‍िलाओं के नाम पर दी जाने वाली गाल‍ियों पर क्यों नहीं। 


समाज में अभीतक हमने ही तो जो फसल मह‍िलाओं की बेइज्जती कर- कर के बोई है अब वही तो काट रहे हैं फ‍िर ये हाय-हाय क्यों। 


नेता भी इसी समाज से आते हैं और अध‍िकारी भी... दुष्कर्मी भी कोई आसमान से नहीं टपकते, उन्हें हम ही तैयार करते रहे हैं...अपने घर की फैक्ट्री में और तो और अब भी ऐसा करने से बाज नहीं आ रहे। कभी हमने अपने पर‍िवारों में... अपने घरों में.. र‍िश्तेदार‍ियों...में देखा है क‍ि कोई पुरुष गाली देता है तो घर की मह‍िलायें उसे टोकती हों या अन्य बुजुर्ग अथवा पुरुष उस पर ऐतराज करते हों, जबक‍ि हम सभी जानते हैं भारतीय समाज में हर भाषा में सभी गाल‍ियां लगभग मह‍िलाओं पर यौन‍िक आत्याचार से ओतप्रोत होती हैं... हम फ‍िर भी उन्हें देते हुए सुनते हैं, कोई अपना क‍िसी को दे रहा हो तो खुश भी होते हैं , आत्मसंतुष्ट‍ि होती है ये देखकर फलां को नीचा द‍िखा द‍िया...।


तो ग‍िरेबां तो हमने मैला क‍िया हुआ है अपने समाज का और आशा करते हैं क‍ि पीढ़‍ियां सुधर जायें... ऐसा कैसे संभव है। कम से कम बढ़े लेखकों, पॉल‍िसी  मेकर संस्थानों के न‍िदेशक जैसे पदों पर बैठे लोगों को क‍िसी नैरेट‍िव पर ल‍िखते समय यह अवश्य सोचना चाह‍िये क‍ि वे यह सब अखबारों, वेबपोर्टल्स से मेहनताना पाने के ल‍िए नहीं ल‍िख रहे , वे समाज को आइना द‍िखाने और एक कदम आगे बढ़कर उसके ल‍िए ''कुछ पॉज‍िट‍िव'' करने के ल‍िए ल‍िख रहे हैं, शब्द सदैव जीव‍ित रहता है ... व‍ह क्रांत‍ि भी ला सकता है और तबाही भी। सोचना बुद्ध‍िजीव‍ियों को है क‍ि वे समाज में अपने शब्दों से कौन सी भुमश्िका न‍िबाहना चाहते है। 


आज बस इतना ही। 

- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

हाथरस को ‘हाथरस’ बनाने के बाद…की कहानी


 र‍िश्तों को लेकर हमारे कव‍ियों- साह‍ित्यकारों ने बड़ा काम क‍िया है, पोथ‍ियों पर पोथ‍ियां गढ़ते गए परंतु इन्हें प्रभाव‍ित करने वाली लालची मानस‍िकता को वे नहीं पढ़ पाए और ना ही बदल पाए। आज जब लालच ने सबसे पहला प्रहार र‍िश्तों पर क‍िया और सामूह‍िक दुष्कर्म के बढ़ते मामलों के रूप में इसका नतीज़ा अब हमारे सामने आ रहा है, तो एक एक केस की हकीकत भी समझ आ रही है। ये अलग बात है क‍ि कभी राजनीति तो कभी कानूनी बहाने ‘सच’ को कहने-सुनने-देखने पर बंद‍िशें लगा रहे हैं परंतु कब तक, सच की यही खूबी है क‍ि वह तो सामने आकर ही रहता है।

और सच ये है क‍ि दुष्कर्म की ‘घृणा’ का मोल लगाकर जो मुआवज़ा बांटने की प्रथा चली है, उसने इसके ‘घट‍ित होने’ पर प्रश्नच‍िन्ह लगाने शुरू कर द‍िए हैं। ऐसा नहीं है क‍ि ये घटनायें होती ही नहीं हैं, न‍िश्च‍ित ही होती हैं परंतु भेड़‍िया आया… भेड़‍िया आया… की तर्ज़ पर दुखद घटनायें भी संशय के घेरे में तब आ जाती हैं जब इसके पीछे पीड़‍ित को न्याय द‍िलाने की अपेक्षा मुआवजे का लालच प्रगट होता है। हक़ीकत हम सभी जानते हैं क‍ि समाज में सभी पुरुष ‘हर‍िश्चंद्र’ नहीं बैठे और ना ही सभी मह‍िलायें ‘साव‍ित्री’ हैं।

हाथरस कांड के बाद अब फतेहपुर में भी ऐसा ही मामला सामने आया है जहां मृतका के पर‍िजन जाम लगाकर न्याय की मांग के साथ ही पुल‍िस के व‍िरुद्ध नारे लगा रहे थे, अचानक सपा व कांग्रेस के नेता के पहुंचते ही एफआईआर में नामज़द क‍िए गए एक आरोपी के साथ साथ ”तीन अन्य अज्ञात” का नाम भी जोड़ देते हैं और मामले को ‘ जघन्य व सामूह‍िक दुष्कर्म ‘ बताने लगते हैं। फ‍िर एक और ट्व‍िस्ट आता है क‍ि 25 लाख मुआवजे की घोषणा होते ही वे पुल‍िस का व‍िरोध भी छोड़ देते हैं और मृतका का अंत‍िम संस्कार भी फटाफट कर देते हैं।

बहरहाल ये और इस जैसे कई मामले हैं जहां मुआवज़ा ‘बांटा’ नहीं गया , बल्क‍ि पर‍िजनों पर पैसा पानी की तरह बहाया गया। निर्भया केस के बाद जिस तरह से उसके घरवालों को दिल्ली में फ़्लैट, लाखों रुपये और भाईयों को नौकरी दी गई, उसके बाद से देशभर में न्याय की जगह ‘तुष्टीकरण’ की एक अजीब सी प्रथा शुरू हो गई ज‍िसने लालच को ऐसा पनपाया क‍ि अब वही गुनाहों को जन्म दे रहा है।

अगर बेटियों के रेप के बदले ज़मीन, लाखों रूपये और बेटों को सरकारी नौकरी मिलने लगेगी तो फिर समझ लो कि गरीब और मजबूर समाज को किस लालच के गर्त में ढकेला जा रहा है। ये बात तो अब कतई बेमानी हो गई है कि कोई भी माँ-बाप अपनी बेटियों के बलात्कार का झूठा मुक़द्दमा नहीं कर सकते। अदालतों से बड़ी संख्या में वापस ल‍िए गए बलात्कार के आरोपों वाले केस इस बात की तस्दीक करते हैं । चूंक‍ि बलात्कार के अपराध में प्रत्यक्ष साक्षी का अभाव होता है इसल‍िए इसका बेजां फायदा उठाकर मुआवज़ा प्रथा के ल‍िए इस टूल को सब अपने-अपने ह‍िसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं ।

हसरत मोहानी का एक शेर और बात खत्म क‍ि –

भड़क उठी है कैसी आतिश-ए-गुल
शरारे आशियाँ तक आ गए हैं।

- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

हाथरस केस का वो ”ग्रे” फैक्टर जो आधे अधूरे सच पर गढ़ा गया

समाज में कानून का राज होना चाह‍िए… मगर यहां कानून की धज्ज‍ियां उड़ाई जा रही हैं…दल‍ितों को सताया जा रहा है… दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ गई हैं… बेट‍ियां सुरक्ष‍ित नहीं हैं… फलां नेता के शासन में ‘जंगल राज’ है…. फ‍िलहाल हाथरस मामले में ऐसा ही कुछ सुनने को मिल रहा है मगर कभी सोचा है क‍ि ऐसा क्यों है।

वोट बैंक, जात‍ि और ल‍िंग आधार‍ित भावनाओं के ज्वार में आकर यदि कोई कानून बना द‍िया जाएगा तो उससे क‍िसी पीड़‍ित को न्याय म‍िलने की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है। दहेज हत्याएं हुईं तो इसके ल‍िए कानून, दुष्कर्म हुए तो इसके ल‍िए कानून, दल‍ित सताये गए तो इसके ल‍िए कानून, यहां तक मह‍िलाओं का यौन शोषण रोकने के लिए अलग-अलग कानून बना द‍िये गये, वो भी ब‍िना ये सोचे समझे क‍ि इनका दुरुपयोग करने वाले अध‍िक ही होंगे… कम नहीं।

प्राकृत‍िक न‍ियम है क‍ि शोष‍ित होने की थ्योरी हमेशा काम नहीं करती, सच सामने आ ही जाता है परंतु मीड‍िया आए द‍िन क‍िसी भी एक घटना को ज‍िस तरह आधा-अधूरा सच द‍िखाकर ‘आपाधापी वाली वाहवाही’ बटोरने में जुट जाता है वह ‘ सच ‘ की तह तक पहुंचने में बाधा ही बनता है जबक‍ि होना यह चाह‍िए क‍ि जो काम पुल‍िस नहीं कर सकती वह ‘खोजबीन’ न‍िष्पक्ष होकर मीड‍िया द्वारा की जानी चाह‍िए परंतु ना तो सच बोलने का जोख‍िम उठाना चाहती है और ना ही प्रोपेगंडा की धारा में बहने की सहजता खोना चाहती है।

ठीक यही हुआ है हाथरस की घटना में। पूरा बुलगढ़ी गांव जानता है क‍ि वाल्म‍िकी जाति की मृतका का प्रथम आरोपी संदीप से प्रेमसंबंध था, परंतु 19 साल की खानदानी रंज‍िश और वाल्म‍िकी-ठाकुर का गैप, दोनों के घर वालों को पसंद नहीं था, इसी के चलते भाई द्वारा मृतका को अकसर मारापीटा जाता था। एकबार दोनों घर में ही एकसाथ पकड़े गए, प्रधान के द्वारा गांव में पंचायत हुई, दोनों की शादी का प्रस्ताव पंचायत ने रखा परंतु पर‍िवारों ने नहीं माना, लड़के को लड़की से दूर रहने की ह‍िदायत के साथ गांव से दूर भेज द‍िया गया।

प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीणों के अनुसार 14 स‍ितंबर को घटना से एक द‍िन पहले ही वह गांव वापस आया था। घरवालों की कड़ी पहरेदारी के बीच वो खेत पर मां के साथ घास काटने गई लड़की (मृतका) से म‍िलने पहुंच गया, मात्र 10-15 मीटर दूरी पर घास काट रही मां ने उसे लड़की से बात करते देख ल‍िया और शोर मचाते हुए अपने बेटे यान‍ि मृतका के भाई को आवाज़ दी, भाई के आते ही कथ‍ित दोषी (संदीप) भाग गया और मृतका के भाई ने बहन का गला दबा कर मारते हुए उसे अधमरा कर द‍िया। वो पहले भी लड़की को इसी तरह मारता रहा है परंतु इस बार बहन की हड्डी टूट गई, उसे अस्पताल ले जाना पड़ा, बहन के प्रेमी को जेल भेजने के ल‍िए ये सारा प्रपंच रचा गया।

मीड‍ियाकर्मी अगर थाने में ल‍िखी गई पहली तहरीर को ही खंगाल लेते तो सारा माजरा समझ में आ जाता मगर इसे दबा द‍िया गया। SCSTAct के तहत मारपीट में दर्ज की गई एफआईआर को क्रमश: पहले रेप, फ‍िर गैंगरेप में तब्दील कराया गया, और ये प्रपंच क‍िसी व‍िरोधी पार्टी या क‍िसी दबंग ने नहीं बल्क‍ि भाजपा के ही दल‍ित सांसद ने लड़की के भाई के संग म‍िलकर रचा ताक‍ि ”दल‍ित बेटी का दबंगों द्वारा गैंगरेप ” कहकर मामले को तूल द‍िया जा सके।

घटना की जांच करने वाले एसएचओ डीके वर्मा जो कि खुद दलित वर्ग से हैं, ने पाया कि लड़के के अलावा ज‍िन तीन अन्य को नामज़द कराया जा रहा है, वे वही लोग हैं ज‍िनके द्वारा लड़के के पर‍िवार की पैरवी की जा सकती थी। इनमें से एक तो उस समय क‍िसी आइस फैक्ट्री में काम कर रहा था (ज‍िसकी तस्दीक उस आइस फैक्ट्री के माल‍िक ने भी की) और एक वो पास के ही खेत से भागकर आया व भाई के चंगुल से लड़की को बचाया, पानी प‍िलाया।

फ‍िलहाल मीडिया के दबाव में एसएचओ डीके वर्मा लाइन हाज़िर हैं और मृतका के भाई व प‍िता राजनीत‍ि व मीड‍िया के टूल बने अभी तक आधा दर्जन बार बयान बदल चुके हैं। आगे गांव में उनके ल‍िए पनप रही नफरत क्या गुल ख‍िलाएगी, कहा नहीं जा सकता।

14 स‍ितंबर से 22 स‍ितंबर और कल के राजनैत‍िक ड्रामे के बाद इतना तो न‍िश्च‍ित ही कहा जा सकता है क‍ि यह एक साधारण सी प्रेम कहानी का वीभत्स अंत था जो हॉरर क‍िल‍िंग का ही एक रूप है। इसमें ज‍ितना दोष मृतका के भाई और सांसद का है, उतना ही दोष पुल‍िस का भी है ज‍िसने असंवेदनशीलता से सारे मामले को हैंड‍िल क‍िया और रात्र‍ि में ही मृतका का दाह संस्कार कर द‍िया।

बहरहाल पूरे मामले में हाथरस केस का वो ”ग्रे” फैक्टर जो आधे अधूरे सच पर गढ़ा गया और कानून को ज‍िस तरह अपने अपने ह‍ित में प्रयोग क‍िया गया वह उन र‍िश्तों के ल‍िए घृण‍ा बो गया जो गांवों की थाती हुआ करते थे। न‍िश्च‍ित ही इस पूरे प्रकरण ने संशयों का ऐसा पहाड़ खड़ा कर द‍िया है जो वास्तव‍िक अपराध‍ियों को बचाने का ही काम करेगा।

– अलकनंदा स‍िंह