शनिवार, 26 जुलाई 2014

खुलेआम बिक भी रही हैं यें 'निर्भया'

अजीब तमाशा बनकर रह गया है निर्भया का नाम और इस नाम का पर्याय बन गया है शब्‍द ''दुष्‍कर्म''। कहीं ये एक शब्‍द औरत के वजूद को ही मिटाने पर तुला है तो कहीं ये पुरानी रंजिशों को चुकता करने के लिए अच्‍छा और अकाट्य बहाना बन गया है। नैतिकता की गिरावट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब ये मसला औरत पर ज्‍यादती तक सीमित नहीं रहा। शहरों की बात तो छोड़ दीजिए, जिन गांवों को हम बहन-बेटियों के लिए सबसे अधिक सुरक्षित और नैतिक व संस्‍कारों का भंडार मानते थे आज उन्‍हीं गांवों में नैतिकता के परखच्‍चे उड़ाये जा रहे हैं। लड़कियां औजार की तरह भी इस्‍तेमाल हो रही हैं और हथियार की तरह भी।
दिल्‍ली में हुए निर्भया कांड ने कई कोणों से समाज की स्‍थापित नैतिकता को उधेड़ दिया है। हाल में हुई ताबड़तोड़ दुष्‍कर्म की घटनाओं में कुछ बातें कॉमन देखने में आईं। जैसे कि जिनकी विकृत मानसिकता थी, उन्‍होंने लड़कियों और औरतों को हवस का शिकार बनाकर उनका कत्‍ल  करना शुरू कर दिया ताकि सुबूतों के अभाव में वे अपने अगले शिकार के लिए स्‍वतंत्र रह सकें। दूसरी ओर दुष्‍कर्म की घटना के बाद जनता, महिला व सामाजिक संगठनों के प्रदर्शन को ठंडा करने के लिए ''मुआवजे'' का जो लालच सरकारों ने दिया, उसने खुद परिजनों को घर की औरतों, लड़कियों  तक को खतरे में डाल दिया, वरना क्‍या ऐसा संभव है कि किसी विवाहिता के साथ रात में बलात्‍कार  हो और उसकी रिपोर्ट दो दिन बाद पति के साथ जाकर दर्ज़ कराई जाये या फिर ऑनर किलिंग में लड़की को मार कर बमुश्‍किल 3 फुट लंबे पौधे (पेड़ नहीं) पर लटकाया दिखाया जाये और बाकायदा उसके प्रेमी व उसके परिजनों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई जाये कि फलां...फलां  ने  दुष्‍कर्म किया और इसके बाद लड़की को माराऔर पेड़ पर लटका दिया। कहानी को बिल्‍कुल एक डिटर्जेंट के उस विज्ञापन की तर्ज़ पर कि ''भिगोया...धोया...और हो गया'' तैयार किया जाता है। एक दुष्‍कर्म का आरोप और दुश्‍मन चारों खाने चित्‍त। बिजनौर का हालिया केस इसकी बानगी है। बदायूं मामले में भी शंकायें सच को दबा रही हैं कि आखिर कौन है उन बच्‍चियों का कातिल । लखनऊ के मोहनलाल गंज में महिला के साथ दरिंदगी किसी भी हाल में निर्भया से कम नहीं मगर सुबूतों को ढूढ़ेगा कौन। आज खबर आई है कि सात साल की बच्‍ची से पड़ोसी युवक ने दुष्‍कर्म किया । दूसरी खबर है कि ईंटभट्टा पर काम करने वाली महिला मजदूर के साथ भी दुष्‍कर्म हुआ, वो रिपोर्ट लिखाने पहुंची तो उसे दुत्‍कार कर भगा दिया गया। यहां तो दुष्‍कर्मी भी साथी मजदूर ही बताया गया, तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने पुलिस को प्रभाव में ले लिया होगा ।
कुल मिलाकर स्‍थितियां अब गले में अटकी हड्डियों की भांति दुखदायी हैं और फिलहाल तो और बदतर ही होती जा रही हैं। इसके लिए सिर्फ लचर कानून को दोषी नहीं माना जा सकता क्‍योंकि कानून के ओहदेदारों में भी तो समाज ही स्‍थापित करता है नैतिकता। और जब नैतिकता को परिजन ही ताक पर रखने लगे हों तो...? दुष्‍कर्म और मुआवजे के बीच झूलती औरतें-लड़कियां  'अपनों' के इस घात को नहीं समझ पा रही हैं। वे यह भी नहीं समझ पा रही हैं  कि आखिर उनके शरीर को अभी और कितने घातों के लिए तैयार रहना है । इज्‍जत के चले जाने और बनाये रखने में उनकी ही जान क्‍यों इतनी सस्‍ती हो गई । सौदेबाजी की भी हद होती है और गिरावट की भी...।
-अलकनंदा सिंह

रविवार, 20 जुलाई 2014

टारगेट इंटरवेंशन की जरूरत ही क्‍यों पड़ी?

कुछ दिनों पहले जब देश के स्‍वास्‍थ्‍यमंत्री डा. हर्षवर्द्धन ने नवआधुनिक समाज और मेट्रो कल्‍चर में आम होती जा रही प्रिमेराइटल यौन संबंध स्‍थापित करने की प्रवृत्‍ति पर लगाम लगाने की  बात  की थी, किशोर वर्ग को यौन शिक्षा देने  की बजाय उन्‍हें तन और मन से दृढ़ बनाने की बात  की थी तथा शादीशुदाओं से अपने ही साथी से संबंध बनाने को ही सुरक्षित बताया था, तब तथाकथित स्‍वतंत्र अधिकारवादियों ने बड़ा हो हल्‍ला मचाया कि समाज को सदियों पीछे  धकेलने की  कोशिश है ये...स्‍वतंत्रता के अधिकारों का हनन है ये... वर्तमान समय की मांग है स्‍वछंदता...आदि आदि परन्‍तु कल ''मणिपुर राज्‍य में एड्स'' के संदर्भ जारी हुई कैग रिपोर्ट सारे नव-आधुनिकतावादियों की उक्‍त उच्‍छृंखल सोच के लिए सबक हो सकती है कि मर्यादायें जब टूटती हैं तो वे समाज के लिए कितने कोणों से जानलेवा बन जाती हैं।
देश के उत्‍तरपूर्वी राज्‍यों में से एक मणिपुर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और बेहद खुले व बिंदास तौरतरीकों की जीवनशैली के लिए जाना जाता है। राज्‍य की अधिकांश आबादी ईसाई है और आम जनजीवन में खुलेपन से जीना यहां का एक अंदाज़ है । अपनी इसी बिंदास जीवनशैली के चलते  अतिआधुनिकता के कई ज़हर पूरे प्रदेश की फिजां में रम गये हैं जिनमें सबसे भयावह है एचआईवी एड्स के मामलों में बेतहाशा वृद्धि। यूं तो ड्रग्स माफिया,वेश्‍यावृत्‍ति, आतंकवाद जैसे अपराधों  ने  यहां अरसे से जड़ें जमा रखी हैं परंतु अब एड्स के मामलों में हुई दोगुनी वृद्धि ने राज्‍य सरकार के तो होश  ही  उड़ा दिये हैं।
कैग ने राज्‍य की विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट  के हवाले से कहा है कि एड्स के प्रभावितों का इलाज करने और इसे बढ़ने से रोकने को चलाई गई ''टारगेट इंटरवेंशन'' परियोजना पूरी तरह विफल रही। और तो और इस परियोजना के क्रियान्‍वयन को मिले 43.39 करोड़ खर्च किये जाने के बावजूद पिछले पांच सालों में एड्स के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई। जहां 2007 में राज्‍य में कुल 25,919 लोग एचआईवी एड्स से संक्रमित थे वहीं सन् 2012 में प्रभावितों की संख्‍या बढ़कर 40,855 हो गई। पांच सालों में हुई एड्स के मरीजों की इस बेतहाशा वृद्धि एक चेतावनी है कि आधुनिकता के नाम पर हमारे सामाजिक ढांचे किस तरह आमजन को प्रभावित  कर रहे हैं और इसके दुष्‍परिणाम आने वाली पीढ़ियों तक को भोगने होंगे ।
''टारगेट इंटरवेंशन'' के तहत अत्‍यधिक जोखिम के कगार पर पहुंचे एड्स संक्रमितों को अलग इलाज करवाने की सुविधायें देने के साथ साथ नये संक्रमितों को एहतियातन अलग से ट्रीट किये जाने हेतु स्‍वास्‍थ्‍य महकमे द्वारा प्रोग्राम चलाये गये। इसमें राज्‍य सरकार की ओर से इलाज  के साथ साथ नुक्‍कड़ सभाओं जैसे अवेयरनेस प्रोग्राम भी शामिल थे। आशा की गई कि इस इंटरवेंशन के कारण एचआईवी एड्स से पूरी तरह मुक्‍ति नहीं भी मिलेगी, तो कम से कम लोगों को जागरूक करने में तो मदद मिलेगी ही। दीर्घकालीन सुधार की ये योजना कैग की मौजूदा रिपोर्ट के बाद  खुद ही अनुपयुक्‍त हो गई है। ज़ाहिर है इस योजना पर धन किस तरह बहाया गया, क्‍यों एड्स प्रभावितों की संख्‍या इस तरह बढ़ती गई, इसकी भी जांच होनी चाहिए।
यह सिर्फ पूर्वोत्‍तर के सिर्फ एक राज्‍य की बानगी है जिसकी आहट से सरकारी स्‍तर पर ही नहीं बल्‍कि सामाजिक और सांस्‍कृतिक स्‍तर पर सोचने की जरूरत है, क्‍योंकि मणिपुर में एड्स का  इस तरह फैलना और मणिपुर समेत पूर्वोत्‍तर के कई राज्‍यों से राष्‍ट्रीय राजधानी में नागरिकों  का आना ,एड्स के प्रसार को और भयावह बना सकता है। इसके लिए अतिशीघ्र ठोस योजना व उपायों की आवश्‍यकता है ताकि स्‍वछंद यौनसंबंधों से फैल रहे इस ज़हर से पीढ़ियों को बचाया जा सके।
-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

गुरू पूर्णिमा : चेतना को परमात्‍मा तक पहुंचाने का पर्व


गुरु के महात्मय को समझने के लिए ही प्रतिवर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व  मनाया जाता है। गुरू पूर्णिमा कब से शुरू हुई यह कहना मुश्किल है, लेकिन गुरू पूजन की यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है क्‍योंकि उपनिषदों में भी ऐसा माना गया है कि आत्मस्वरुप का ज्ञान पाने के अपने कर्त्तव्य की याद दिलाने वाला, मन को दैवी गुणों से विभूषित करनेवाला, गुरु के प्रेम और उससे प्राप्‍त ज्ञान की गंगा में बार बार डुबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देनेवाला जो पर्व है – वही है ‘गुरु पूर्णिमा’ ।
इसी पूर्णिमा के दिन ही भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, १८ पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। इसीलिए ये लोक मान्‍यता बनी है कि इस दिन जो शिष्य ब्रह्मवेत्ता गुरु के चरणों में संयम-श्रद्धा-भक्ति से उनका पूजन करता है उसे वर्षभर के पर्व मनाने का फल मिलता है।
ईश्‍वर के लिए गुरू का मार्गदर्शन अत्‍यंत आवश्‍यक माना गया है। गीता में भी श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन  से कहा -
मय्ये व मन आघत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि भय्येव, अत ऊर्ध्व न संशयः ॥8/12
अर्थात् “हे अर्जुन ! तू मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ संशय नहीं है।”
किसी को गुरु से कितना मिला, किसी को अधिक किसी को कम क्यों मिला, इसके मूल में यही कारण है कि जिसने गुरु के बताये आदर्शों में मन व बुद्धि को लगा दिया, संशय मन से निकाल दिया, श्रेष्ठता के प्रति समर्पण कर दिया, उसका सारा जीवन ही बदल गया।
गुरू और शिष्‍य के सुप्रामेंटल रिलेशन्‍स के बारे में दार्शनिक श्री अरविन्द कहते थे “डू नथिंग ट्राइ टू थिंक नथिंग विह्च इज अनवर्थी टू डिवाइन” अर्थात् जो देवत्वधारी सत्ता के योग्य न हो, ऐसा कोई भी कार्य न करो, यहां तक कि ऐसा करने की सोचो भी मत ।
श्री रामकृष्ण परमहंस ने तो और एक कदम आगे बढ़कर यही कहा कि कामिनी काँचन से दूर परमात्म सत्ता में मन-बुद्धि को लगाने पर स्वयं ईश्वर गुरु के रूप में आकर मार्गदर्शन करते हैं। देखा जाये आदर्श शिष्‍य के लिए समर्पण एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति का रूपांतरण कर देती है और जब श्रेष्ठ गुरु के प्रति यही समर्पण होता है तो व्यक्ति तत्सम हो जाता है। उपनिषदों में कहा गया है कि व्‍यक्‍ति को तप करने से सिद्धि तो मिल सकती है, किन्तु भगवान नहीं मिल सकता जबकि समर्पण से गुरु व भगवान दोनों एक साथ मिल जाते हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे-”सामान्य गुरु कान फूँकते हैं, अवतारी महापुरुष-सदगुरु प्राण फूँकते हैं।” ऐसे सदगुरु का स्पर्श व कृपा दृष्टि ही पर्याप्त है । परमहंस जी  एक ऐसी ही सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए। अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पास बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का उन्हें अवसर मिला।
गुरू-शिष्‍य के बीच संबंध और गुरू की महत्‍ता को रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी कुछ यूं कहा है-
गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं , सपनेहुँ सुख सुलभ न तेहिं ।
उदाहरण बताते हैं कि इस एक आध्‍यात्‍मिक संबंध की वास्तविकता,  कि समर्पण भाव से गुरु के निर्देशों का परिपालन करने वालों को जी भर कर गुरु के अनुदान भी मिले हैं।
श्रद्धा की परिपक्वता, समर्पण की पूर्णता, शिष्य में अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देती है। उसके सामने देहधारी गुरु की अंत:चेतना की जितनी भी रहस्यमयी परतें होती हैं सब की सब एक एक करके खुलने लगती हैं। शिष्‍य के सामने इनका ठीक-ठीक खुलना शास्त्रीय भाषा में गुरु के परमतत्‍व का प्राकट्य ही तो होता है। गुरु का यह रूप जान लेने पर मौन व्याख्या शुरू हो जाती है। बिल्‍कुल ऐसे जैसे कि हृदय में निःशब्द शक्ति का जन्‍म हो रहा हो । जन्म लेने से पूर्व ही प्रश्‍नों का उत्‍तर मिलने लग जाता है ।
स्वामी विवेकानन्द की दो शिष्याएँ थीं एक नोबुल (निवेदिता), दूसरी क्रिस्टीन (कृष्ण प्रिया)। स्वामी जी से निवेदिता तो तरह तरह के सवाल पूछतीं परन्तु कृष्ण प्रिया चुप रहतीं। स्वामी जी ने उनसे पूछा-”तेरे मन में जिज्ञासाएँ नहीं उठतीं?” उसने कहा-”उठती हैं पर आपके जाज्वल्य समान रूप के समक्ष वे विगलित हो जाती हैं, मेरी जिज्ञासाओं का मुझे अंतःकरण में समाधान मिल जाता है।” लगभग यही स्थिति हम सबकी हो, यदि हम अपनी गुरुसत्ता के शाश्वत रूप व गुरुसत्ता के संस्कृति सत्य को ध्यान में रखें कि “जब तक एक भी शिष्य पूर्णता प्राप्ति से वंचित है, गुरु की चेतना का विसर्जन परमात्मा में नहीं हो सकता।” सूक्ष्म शरीरधारी वह सत्ता अपने शिष्यों, आदर्शोन्मुख संस्कृति साधकों की मुक्ति हेतु सतत् प्रयत्नशील है व रहेगी जब तक कि अंतिम व्यक्ति भी इस पृथ्‍वी पर मुक्त नहीं हो जाता ।
गुरू और शिष्‍य के बीच संबंधों की पवित्रता को लेकर आज की स्थिति बड़ी विषम हो चुकी है। विगत वर्षों में कई गुरुओं के कारनामों ने इस संबंध को तार तार करके रख दिया है।ऐसा लगता है कि चारों ओर नकली ही नकली गुरु भरे हैं। ये बिल्‍कुल ऐसे ही हैं जैसे कि पानी में रहने वाला सांप, जिसके  मुंह का आकार छोटा मगर चेष्‍टायें बड़ी होती हैं । इन्‍हीं 'चेष्‍टाओं' के कारण वह मेंढक को निगलने की कोशिश में मुँह में तो उसे जकड़ लेता है पर दोनों के लिए मुश्‍किल हो जाती है । पनेले सांप के गले से मेंढक बाहर निकलने को ताकत लगाता है , और वह मेंढक को गले में उतारने के लिए । आज गुरु व शिष्य दोनों की स्थिति ऐसी है। फिर भी सत्‍य और संकल्‍प के साथ सदगुरू की खोज और उसका सानिध्‍य पाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता और इस गुरू पूर्णिमा पर  हमारा ध्‍येय यही होना चाहिए ।
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

बताना जरूरी था... कि अदालत से ऊपर कोई नहीं

ये 21वीं सदी है। तमाम स्‍थापित परंपराएं-धारणाएं टूट रही हैं और बदलाव की ये हवा अपने पारंपरिक ढांचे में समयानुसार बदलाव भी करती जा रही है। हमारे देश में धर्म, समाज, संस्‍कृति और अधिकारों को लेकर नई सोच बन भी रही हैं और इन नई सुधारवादी सोचों के साथ बदलाव का हौसला भी दिख रहा है। आधुनिक काल में जहालत और ज़हानत में फ़र्क करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उससे जुड़ी भ्रांति फैलाने वाले रिवाजों को नये तरीके से खंगालने की। कल सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत की हद और फतवों के तौर-तरीकों को लेकर अपने निर्णय में इसी बदलाव की अगुवाई की है। 
अभी तक सिर्फ खाप पंचायतों द्वारा स्‍थानीय स्‍तर दिये गये औरंगजेबी निर्णयों को लेकर बहस होती रही है जो हर दूसरे निर्णय में देश के कानून को अंगूठा दिखाती थीं, मगर अब शरियत की  तकरीरों को अपने अपने हिसाब और बेजां तरीकों से पेश करके मुस्‍लिम समाज में जो एक ऊहापोही स्‍थिति बना दी गई थी उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कल साफ कर दिया है कि शरियत अदालतों को ऐसे व्यक्ति के खिलाफ फतवा या आदेश जारी करने से बाज आना चाहिए जो उसके समक्ष आया ही न हो। कोर्ट ने साफ कहा कि शरिया अदालतों को कानून की कोई मंजूरी प्राप्त नहीं है और ना ही उनका कोई कानूनी दर्जा है इसीलिए कानूनी अधिकारों, स्थिति और नैतिक कर्तव्यों को प्रभावित करने वाले फतवे पूरी तरह से अवैध हैं।
जस्टिस सी. के. प्रसाद और पी. सी. घोष की पीठ ने कहा कि कुछ मामलों में तो हद ही हो गई। दारुल कजा और दारुल निजाम जैसी शरिया अदालतों ने ऐसे आदेश दिए जिनके तहत मानवाधिकारों का सीधा सीधा उल्लंघन करते हुए बेगुनाह व्यक्तियों को ही सजा दी गई । कोर्ट ने मुज़फ्फ़रनगर की इमराना के मामले का उल्लेख किया जिसमें उसके बलात्कारी ससुर को ही उससे शादी करने का अजीबो-गरीब निर्णय सुनाया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह फतवा एक पत्रकार के आग्रह पर दिया गया जो मामले में पूरी तरह से अजनबी था लेकिन फिर भी फतवा जारी कर दिया गया। इस तरीके से एक पीड़ित को ही सजा दे दी गई। कानून के शासन से शासित देश में ऐसे कार्य बर्दाश्त नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने हिदायतन कहा कि दारुल कजा को इस बारे में सतर्क रहना चाहिए कि विवाद से अनजान या बाहरी व्यक्ति के कहने पर फतवा न दे। पीठ ने कहा कि फतवों को अदालत में चुनौती देने की जरूरत नहीं है, उन्हें नजरअंदाज कर देना चाहिए। यदि कोई उन्हें लागू करने की कोशिश करता है तो यह पूरी तरह से गैरकानूनी होगा। जस्टिस सी. के. प्रसाद और पी. सी. घोष की पीठ ने कहा कि इस्लाम सहित कोई भी धर्म बेगुनाहों को सजा की इजाजत नहीं देता। धर्म को पीड़ित के प्रति दयाविहीन नहीं होने दिया जा सकता, न ही किसी मत को अमानवीय शक्ति बनने की आज्ञा दी जा सकती है।
गौरतलब है कि कोर्ट द्वारा उक्‍त ऐतिहासिक निर्णय अधिवक्ता विश्व लोचन मदान द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनाया गया है। याचिका में उन शरियत अदालतों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था जो कि कथित तौर पर देश में न्यायिक प्रणाली के समानांतर चलती हैं। याचिका में इन अदालतों को बंद कराने की मांग भी की गई थी लेकिन कोर्ट ने इन अदालतों को 'बंद करने'  का आग्रह खारिज कर दिया ।
शरियत, कानून और फतवों व मौलानाओं के माध्‍यम से नित नये भय पूरे मुस्‍लिम समाज को  दिखाये जाते रहे हैं जबकि स्‍वयं इस्‍लामी विद्वान भी यह मानते हैं कि आज शरिया अदालतें भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त नहीं हैं और उनके निर्णयों में पक्षपात आसानी से देखा जा सकता है। कुछ मौलानाओं का कोर्ट के निर्णय पर यह कहना कि शरिया अदालतें मजलूमों और गरीबों  की मदद करती हैं, खुद को सही साबित करने की कोशिशभर करना है। हकीकत तो ये है कि शरियत के नाम पर जहालत को बढ़ावा दिया जाता रहा है ताकि कोई भी शख्‍स इन अदालतों और शरियाई कानूनों को लेकर सवाल जवाब करने की हिम्‍मत ना कर सके।
शरियत के निर्णयों और फतवों के खिलाफ भी अपनी बात कहने का अगला पायदान जब कोर्ट ही होता है तो फिर क्‍यों इन समानानन्‍तर चलने वाली अदालतों को इतनी अहमियत दी जाती है कि वे मनमाने निर्णय सुनाकर लोगों में विश्‍वास की बजाय दहशत पैदा करने की वाइज़ बनती हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिन्‍द के मौलाना महमूद मदनी अदालत के निर्णय पर खुशी तो जाहिर करते हैं मगर शरियत के निर्णय को देश की अदालत के समानान्‍तर मानने की बजाय उसे अदालतों के लिए एक मददगार ज़रिया के तौर पर देखते हैं । एक ऐसा ज़रिया जो समाज के छोटे-मोटे सामाजिक व पारिवारिक विवादों को अपने स्‍तर से निपटा देते हैं। हालांकि इसमें कोई बुराई नहीं है मगर जिस तरह खापें अपना निर्णय अंतिम मानती हैं और उनके निर्णय के खिलाफ जाने वाले को समाज की भारी प्रताड़ना या कभी-कभी तो जान देकर या लेकर कीमत चुकाई जाती है । शरिया के निर्णयों में भी ऐसी ही हिमाकतें हो रही हैं, इमराना मामला भी तो ऐसा ही था जिसमें शरियाई हुक्‍म के मुताबिक बेचारी इमराना अपने पति को पति नहीं मान सकती थी और बलात्‍कार करने वाले को ही पति मानने के लिए उसे बाध्‍य किया गया ।
फतवों को जारी करने की बावत लगभग सफाई के अंदाज़ में आल इंडिया पर्सनल ला बोर्ड का कहना है कि फतवा बाध्यकारी नहीं होता और यह मुफ्ती का विचार/सलाह या मध्यस्थीकरण मात्र होता है, जो तभी दिया जाता है जब प्रभावी पक्ष उसके पास आता है। उसके पास उसे लागू कराने का कोई अधिकार या प्राधिकार नहीं होता। यदि किसी फतवे को संबंधित व्यक्ति की मर्जी के खिलाफ लागू करने का प्रयास किया जाता है तो वह उसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
अब एक सवाल पर्सनल लॉ बोर्ड से भी है कि फतवों से संबंधित यदि उनकी बात सही है फिर तो शरियाई अदालतों की जरूरत ही नहीं रह जाती। फिर शरियत के नाम पर गाहेबगाहे फतवों को जारी करने की जहमत उठाने का मतलब क्‍या है। क्‍या इसीलिए कि देश को मुगलकालीन व्‍यवस्‍थाओं से वाकिफ़ कराया जाता रहे, जहां जान के बदले जान तो आंख के बदले आंख लेने की सजा तजवीज की जाती थी। आखिर ये सारा प्रपंच क्‍यों?
बहरहाल, शीर्ष न्यायालय ने सोमवार को दिए फैसले में कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी अदालतों का कोई भी कानूनी दर्जा हासिल नहीं है। इनसे आया फतवा कोई फैसला नहीं है, न ही यह राज्य की कानूनी प्रणाली का हिस्सा है और न इसे कानून की स्वीकृति प्राप्त है। मुगल और ब्रिटिश काल में इनकी मान्यता होगी, लेकिन आजादी के बाद भारतीय संविधान में इनकी कोई जगह नहीं है। कम से कम इस निर्णय के बाद आशा की जानी चाहिए कि औरतों व मजलूमों की बावत सोया रहने वाला मुस्‍लिम समाज अब अपने मौलिक अधिकारों के लिए सजग होगा।
जाहिर है आज तक जो लोग समाज को अपनी उंगलियों पर नचाते आये हैं, उनके लिए भी सर्वोच्‍च अदालत ने चिंतन करने का एक अच्‍छा मौका दिया है ।
-अलकनंदा सिंह

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