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मंगलवार, 26 सितंबर 2023

NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल जीरो करने पर क्यों मचा है बवाल, ये है पूरा मामला


 व‍िपक्ष से लेकर स्वयं मेडीकल लाइन के जानकारों के बीच बहस का मुद्दा बन गया है NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल को स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 'जीरो' कर देना.

मगर इसके पीछे की वजह जो मुझे समझ में आई है वह यह है क‍ि देशभर के सरकारी और प्राइवेट मेडीकल कॉलेजों में पीजी स्तर की लगभग 13 हजार से ज्यादा खाली पड़ी सीटों को भरा जा सके.  क्योंक‍ि स‍िर्फ एक सीट पर सरकार की ओर से 3 करोड़ रुपये खर्च क‍िये जाते हैं और 13 हजार सीटों का मतलब है एक पूरी की म‍िन‍िस्ट्री खड़ी कर देना.  तो इस भारी नुकसान को बचाने के ल‍िए परसेंटाइल को जीरो कर द‍िया गया.  

NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल जीरो करने का मतलब है, जिस भी बच्चे ने NEET-PG एग्जाम दिया, इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने 0 नंबर पाए या निगेटिव मार्क्स आए, वे काउंसलिंग के लिए एलिजिबल माने जाएंगे. इस फैसले का रिजल्ट ये रहा कि 0 नंबर वाले 14 स्टूडेंट्स, निगेटिव स्कोर वाले 13 और 1 स्टूडेंट -40 स्कोर वाला भी NEET PG के लिए क्वालीफाई माना जाएगा.

NEET-PG नेशनल लेवल का एंट्रेंस टेस्ट है. इस टेस्ट के जरिए देश भर में PG मेडिकल सीटों पर दाखिला दिया जाता है. एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए मेडिकल काउंसिल कमेटी ने कहा, इस साल अब तक बची खाली PG सीटों के लिए एलिजिबिलिटी जीरो परसेंटाइल कर दी जाएगी. 

ऐसी छूट क्यों देनी पड़ी 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक काउंसलिंग के दो राउंड हो जाने के बाद तक भी मेडिकल कॉलेजों में PG की करीब 13 हजार सीटें खाली रह गईं. यह पहली बार है जब एलिजिबिलिटी कट-ऑफ को पूरी तरह से हटा दिया गया है ताक‍ि सीटें भरी जा सकें. एक सीट पर तीन करोड़ खर्च करने वाली सराकर के ल‍िए यह काफी नुकसानदेह था क‍ि 13,245 खाली रह गई सीटों को हर हाल में भरा जाए.

कौन दे सकता है NEET PG एग्जाम

NEET PG एग्जाम वे कैंडिडेट्स देते हैं तो MBBS कर चुके हैं. ये कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट होता है. इसमें मल्टीपल चॉइस के सवाल आते हैं, जिसमें मेडिकल सब्जेक्ट्स के टॉपिक कवर किए जाते हैं. इस परीक्षा के जरिए रैंक, परसेंटाइल, कैंडिडेट की एलिजिबलिटी और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स और इंस्टीट्यूट में प्रिफ्रेंस तय किया जाता है. इसी के जरिए ये कय किया जाता है कि कैंडिडेट मेडिकल स्टडीज के लिए सभी एजुकेशनल दायरों को पूरा करता हो.

क्या है परसेंटाइल- 

परसेंटाइल एक स्टेटिस्टिकल Measure है जिसके जरिए आप ये तुलना कर सकते हैं कि कॉम्पटिशन में आपने कितनों से बेहतर किया. उदाहरण से समझिए. एक अंग्रेजी का टेस्ट हुआ. इस टेस्ट में आपका परसेंटाइल ये बताएगा कि कितने लोगों ने आपसे कम और ज्यादा स्कोर किया है.

पेपर में हिस्सा लेने वालों टेस्ट स्कोर इकट्ठा किए और उन्हें एक ऑर्डर में lowest to highest रखा, मान लेते हैं पेपर में कुल 100 स्कोर पाए. यदि आपको 80 नंबर मिले, तो इसका मतलब है कि परीक्षा देने वाले 80 लोगों ने आपसे कम नंबर पाए. ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने 100 में से 80 लोगों से बेहतर प्रदर्शन किया. यदि आप 90वें परसेंटाइल में हैं, तो आपने 100 में से 90 लोगों से बेहतर प्रदर्शन किया. यदि आप 50वें परसेंटाइल में हैं, तो आपने आधे लोगों (100 में से 50) के बराबर ही अच्छा प्रदर्शन किया है.

दूसरे राउंड की काउंसल‍िंंग के बाद भी  13,245 खाली रह गईं
NEET-PG काउंसलिंग सेशन जुलाई में हुआ, MCC ने इसके लिए कट-ऑफ परसेंटाइल 50 सेट की. कुल 800 नंबरों में से 582 पाने वाले को 100th परसेंटाइल दिया गया. इस मुताबिक सीटें भरी जानें लगीं और दूसरे राउंड के बाद 13,245 खाली रह गईं. इन मेडिकल कॉलेजों में सबसे बड़ी तादाद में खाली सीटों की संख्या All-India quota के तहत रही, जो कि 3000 थी. ये सीटें DNB डॉक्टर्स के लिए थी.

मेडिकल में मास्टर्स डिग्री करने के लिए तीन कोर्स हैं. MD (Doctor of Medicine), MS (Master of Surgery), DNB (Diplomate of National Board) हैं.  DNB भी पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल क्वालीफिकेशन है जो NBE की ओर से भारत में ऑफर की जाती है. ये डिग्री MD, MS के बराबर मानी जाती है. इसके लिए जरिए  मेडिकल और सर्जिकल में अलग अलग स्पेशलाइजेन मिलता है.

एक एमबीबीएस सीट के ल‍िए सरकार 3 करोड़ रुपये करती है खर्च 

शासकीय मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस सीट पर दाखिला लेने वाले एक छात्र को डॉक्टर बनाने में सरकार तीन करोड़ रुपये खर्च करती है. इसमें डॉक्टर/प्रोफेसर का वेतन, कॉलेज का इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर प्रयोगशाला, हॉस्टल और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) में मान्यता के आवेदन का खर्च शामिल है. 

इस परेशानी के मद्देनजर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन समेत सभी मेडिकल एसोसिशएंस ने हेल्थ मिनिस्ट्री से परसेंटाइल कट-ऑफ को 20 तक कम करने की अपील की थी. 

इसके जवाब ने MCC ने मांगे गए नंबर तक परसेंटाइल घटाने की बजाय उसे जीरो (0) तक घटा दिया. 0 परसेंटाइल का मतलब है, जिस भी बच्चे ने NEET-PG एग्जाम दिया, इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने 0 नंबर पाए या निगेटिव मार्क्स आए, वे काउंसलिंग के लिए एलिजिबल माने जाएंगे. इस फैसले का रिजल्ट ये रहा कि 0 नंबर वाले 14 स्टूडेंट्स, निगेटिव स्कोर वाले 13 और 1 स्टूडेंट -40 स्कोर वाला भी NEET PG के लिए क्वालीफाई माना जाएगा.

इसका मतलब सीधा है कि अगर आपने नीट पीजी में अप्लाई किया है, अपीयर हुए हैं या अगर आप उस परीक्षा में केवल बैठे भी हैं तो भी आप उस सीट के दावेदार हैं. अगर कॉलेज में सीट है तो आप उस सीट के लिए आवेदन कर सकते हैं. अभी तक दो राउंड की काउंसलिंग हो चुकी है और तीसरे राउंड की काउंसलिंग शुरू होगी, जिसमें स्टूडेंट्स अपनी चॉइस भरेंगे और वो इन छह से सात हजार मेडिकल सीटों के लिए अप्लाई कर सकेंगे.

IMA ने बयान जारी किया

केंद्र सरकार की ओर से यह पत्र राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBE) को भी भेजा गया था. ये NEET PG द्वारा आयोजित किया जाता रहा है. इसके साथ ही मंत्रालय के चिकित्सा परामर्श प्रभाग और सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों (स्वास्थ्य) को भेजा गया था. इस आदेश के जवाब में आईएमए ने एक बयान जारी कर स्वास्थ्य मंत्री का आभार किया गया है. उन्होंने  कहा कि उसने सरकार से ऐसा करने का अनुरोध किया था. बीते वर्ष काउंसलिंग के आखिरी दौर के लिए क्वालीफाइंग परसेंटाइल  को घटाकर 30 करा गया था. उस वक्त लगभग 4 हजार सीटें खाली हो गई थीं. सरकार के इस कदम के जरिए स्ट्रीम में पीजी सीटें भरने का लक्ष्य रखा है.

- अलकनंदा स‍िंंह 

https://www.legendnews.in/single-post?s=why-is-there-an-uproar-over-reducing-the-qualifying-percentile-of-neet-pg-to-zero-understand-the-complete-mathematics--12352

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

हारून भाई को किसने मारा...

वो फैमिली हेयर ड्रेसर थे, दुबई रिटर्न...जी हां...''दुबई रिटर्न'', ये तमगा 90 के दशक में बड़ी बात  हुआ करती थी, वो बताते थे कि वो स्‍वयं तब वहां शेखों के पर्सनल सैलून्‍स में हजामत किया करते  थे।
खुशदिल, मिलनसार और ओवरऑल एक अच्‍छी पर्सनालिटी के मालिक थे हारून भाई। मथुरा में  उनकी दुकान हमेशा शिफ्ट होती रहती, कभी चौराहे के पास किसी नन्‍हीं सी गली में तो कभी  नामालूम वीरानी सी रोड पर। दुकान कहीं भी पहुंच जाए, मगर हारून भाई के ''हुनर'' के मुरीद  उनको तलाश ही लेते थे। उनकी कस्‍टमर लिस्‍ट में एक ओर जहां शहर के अमीरजादे, नवधनाढ्य,  गणमान्‍य नागरिक, फैशनपरस्‍त थे वहीं दूसरी ओर आमजन भी उसी शिद्दत से उन्‍हें आजमाते थे।  एक अजब सा सम्‍मोहन था उनके उंगलियों में जो नन्‍हें बच्‍चों को भी चुपचाप हेयर ड्रेसिंग कराने  को बाध्‍य कर देता।

लगभग एक साल पहले की बात है कि अचानक एक दिन उनके बेटे का फोन आया कि ''मेरे अब्‍बा  और आपके हारून भाई नहीं रहे...''। उनका जाना हमारे लिए किसी अज़ीज की रुखसती जैसा था।  बेटे से तफसील जानी तो पता लगा कि वो डायबिटिक थे, उनका शहर के जाने माने  एंडोक्रायनोलॉजिस्‍ट से इलाज चल रहा था, डॉक्‍टर ने उन्‍हें इतनी हैवी मैडीसिन्‍स दी कि उनका  पैन्‍क्रियाज ही बस्‍ट हो गया, उन्‍हें जो इंजेक्‍शन्‍स इंट्रामस्‍कुलर दिए जाने थे, वो इंट्रावेनस दिए गए,  जिससे उनका दिमाग डेड हो गया, जब शरीर में जहर फैलता देखा तब जाकर डॉक्‍टर ने उन्‍हें  दिल्‍ली के अपोलो अस्‍पताल के लिए रैफर किया, वहां का हाल भी कमोबेश ऐसा ही था, बस बच्‍चों  को सुकून था कि सर्वोच्‍च सुविधा का हॉस्‍पीटल है तो अच्‍छे रिजल्‍ट आऐंगे, परंतु कुछ दिन  वेंटीलेटर पर रखने के बाद उनका मृत शरीर ही हाथ आया।

इस तफसील का लब्‍बोलुआब ये कि अच्‍छे खासे हारून भाई को डायबिटीज ने नहीं, बल्‍कि गलत  और एक की जगह दस दवाओं के हाईडोज ने मारा और इसका जिम्‍मेदार कौन...? ज़ाहिर है वही  जिम्‍मेदार माना जाएगा जिसने दवाइयां दीं...जिसने जानबूझकर उन्‍हें कई दिनों तक अपने यहां  सिर्फ हैवी बिल बनाने के लालच में एडमिट रखा और बिगड़ती तबियत को 'अंडरकंट्रोल' बताता रहा।

ज़रा बताइये कि मरीजों की जान से खेलने वाले झोलाछाप डॉक्‍टर्स को जब हम गलत ठहराते हैं तो  ये स्‍पेशलिस्‍ट क्‍या कहे जाने चाहिए। बेशर्मी की हद देखिए कि डॉक्‍टर्स की संस्‍था ''इंडियन मेडीकल  एसोसिएशन'' यानि आईएमए इस जानलेवा अपराध को चुप्‍पी साधे देखती रहती है। डॉक्टर्स की  लापरवाही के ऐसे किसी भी मामले पर आईएमए का बोलना तो दूर, बल्‍कि उन्‍हें इस लूट-खसोट की  मौन स्‍वीकृति देती है।

कौन नहीं जानता कि हर नर्सिंग होम के भीतर मेडीकल स्‍टोर रखना नाजायज है, फिर भी रखा  जाता है, या ये कौन नहीं जानता कि पैथोलॉजीकल लैब बाकायदा कमीशन-सेंटर के तौर पर डॉक्‍टर्स  की ''साइड-इनकम'' का ज़रिया होती हैं, कैसे एक ही टेस्‍ट के लिए हर पैथलैब का रिजल्‍ट अलग  अलग होता है।

आईएमए के साथ साथ मेडीकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) भी इस बावत आंखें फेरे रहती  है कि जिन मेडीकल प्रैक्‍टिशनर्स को उसने प्रैक्‍टिस के लिए मान्‍यता दी है, वे उसका पालन कर भी  रहे हैं या नहीं। यूं तो स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय भी आंखें मूंदे था, यदि गत दिनों प्रसिद्ध हॉस्‍पीटल फोर्टिस   में डेंगू से बच्‍ची के मर जाने तथा उसके पिता को 18 लाख रुपए का बिल थमा देने जैसा गंभीर  मामला सामने न आता। अस्‍पताल की असंवेदनशीलता तथा लूट को सभी ने सुना होगा कि कैसे  अस्‍पताल के संचालकों द्वारा कई दिन पहले मर चुकी बच्‍ची का शव सिर्फ मोटा बिल बनाने के  लिए उपयोग किया जाता रहा और अंतत: बच्‍ची का निर्जीव शरीर उन्‍हें थमा दिया गया।

ये कोई किस्‍सा नहीं बल्‍कि ऐसी हकीकत है जिसे हर वो परिवार भोगता है जिसका कोई अपना  धरती पर भगवान कहलाने वाले चिकित्‍सकों की शरण में पहुंचने को मजबूर होता है।
फोर्टिस अस्‍पताल की ब्‍लैकमेलिंग के मामले ने वो सारे ज़ख्‍म ताज़ा कर दिए जो हमने हारून भाई  की मौत के बाद जाने थे।

संभवत: इसीलिए आमजन की तो अब यह धारणा हो गई है कि मल्‍टीस्‍पेशलिटी हॉस्‍पीटल, हैल्‍थ  पैकेजेज, भारी-भरकम डिग्रियों से सुसज्‍जित डॉक्‍टर्स के ये सिर्फ आधुनिक कसाईखाने हैं। हालांकि  अपवाद अभी भी शेष हैं, मगर कितने।

अब तो बस ये देखना है कि केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय की ओर से जो राज्‍यों को ''क्‍लीनकल  स्‍टैब्‍लिशमेंट एक्‍ट'' लागू करने को कहा गया है, उसे कितने समय और कितने राज्‍यों द्वारा लागू  किया जाता है क्‍योंकि इस ''क्‍लीनकल स्‍टैब्‍लिशमेंट एक्‍ट'' के तहत अस्‍पतालों को विभिन्‍न सेवाओं  व चिकित्‍सकीय प्रक्रियाओं के लिए तय फीस का ब्‍यौरा देना होगा। यदि ऐसा होता है तो अब भी  समय है कि मेडीकल जगत जनता का भरोसा कायम रख सकता है। हकीकतन तो आज कोई  डॉक्‍टर ऐसा नज़र नहीं आ रहा जो उस शपथ की सार्थकता सिद्ध कर पाने के  लायक भी हो  जिसमें पूरी मानवता की सेवा को सर्वोपरि मानने की बात कही गई थी।

बहरहाल, अफसोस तो इस बात का है कि व्‍यावसायिकता की अंधी दौड़ में पता नहीं कब धरती के  भगवानों ने शैतान का रूप धारण कर लिया और कैसे उनकी पैसे को लेकर हवस इस कदर बढ़ गई  कि उनके लिए इंसानी जान की कोई कीमत ही नहीं रही। अगर कुछ रहा तो केवल इतना कि किस  तरह मरीज के परिजनों की भावनाओं का खून की अंतिम बूंद तक दोहन किया जा सके। 

-अलकनंदा सिंह