मंगलवार, 10 जुलाई 2018

क्रूरता की हदें पार करने पर veal का विरोध अभीतक क्‍यों नहीं हुआ

veal के रूप में क्रूरता को तो हम अपनी थाली में परोसकर चल रहे हैं , मैं किसी के आहार को नियंत्रित करने की बात यहां नहीं कह रही परंतु मगर भक्ष और अभक्ष का भेद तो करना ही होगा अन्‍यथा ये क्रूरता हमारी हमारे दिमाग को कहीं का नहीं छोड़ेगी।

पिछले कई दिनों से जब लगातार नन्‍हीं बच्‍चियों के साथ बलात्‍कार की खबरें पढ़-सुन कर मुझे बहुत बेचैनी हो रही है तो उन मांओं के साथ क्‍या बीतती होगी जिनके बच्‍चों को सिर्फ 'मारने के लिए ही' जन्‍माया जाता है। जी हां, मांसाहारियों में एक नाम बड़ा प्रचलित है 'वील'। जो वील खाता है, वह शेखी बघारता है कि उसका पसंदीदा भोजन वील है।

इसी 'वील' से जुड़ी एक मार्मिक खबर आपको सुनाती हूं... कि भारत के तकरीबन सभी फाइव स्टार होटलों में 'वील' की खास डिमांड होती है और दावत का स्‍टैंडर्ड नापने के लिए इसे मेजबान और मेहमान के बीच बड़ी अहमियत दी जाती है। सभी मांसाहारी का तो पता नहीं परंतु जो बीफ की बात करते हैं या इनमें से जो उच्‍चशक्षित और संपन्‍न परिवार के हैं, वे बखूबी परिचित होंगे ‘वील’ से परंतु उनमें से कम ही होंगे जो यह जानते होंगे कि आखिर वील तैयार कैसे होता है, मैं यह दावे से कह सकती हूं कि वील तैयार करने के प्रक्रिया जानकर उनमें से तमाम मांसाहार ही छोड़ देंगे।

फाइव स्‍टार की मांसाहारी पार्टियों में अपने स्‍टैंडर्ड को दिखाने के लिए परोसा जाने वाला वील आखिर है क्या? दरअसल यह गाय के उस नन्हें बछड़े का मांस होता है, जिसे भूखे रखकर मार दिया गया हो ताकि उसका मांस हल्‍का (सफेद-पीला) रंग लिए हुए गुलाबी भी नज़र आए, इतना ज़र्द कि उजले रंग का सा लगे। जन्म के तकरीबन 14 हफ्ते बाद ऐसे बछड़े को काट दिया जाता है।

‘veal’ मांस के लिए बछड़े तैयार करने की वीभत्‍सता जानकर दिल को थाम लेंगे आप भी। यह मांस-उद्योग के लिए पशुपालन के बाकी सभी रुपों में सबसे ज्यादा वीभत्‍स है। पशु की इस नियति से तो कहीं उसकी मौत अच्छी। ‘वील’ तैयार करने के लिए जन्म के एक- दो दिन बाद ही नन्हें बछड़े को उसकी मां से अलग कर दिया जाता है। इस बछड़े को काठ के एक तंग और 22 इंच गुणे 54 इंच के अंधेरे दड़बे में जंजीर से बांधकर रखा जाता है। दड़बा इतना तंग होता है कि उसमें बछड़े का शरीर बमुश्किल समा पाता है। चल-फिर ना पाने के कारण बछड़े की मांसपेशियां एकदम शिथिल पड़ जाती हैं और मांसपेशियों की यही शिथिलता मांस को मुलायम बनाती है। बछड़ा कभी खड़ा भी नहीं होता, सिवाय उस एक वक्त के जब उसे काटने के लिए ले जाया जाता है और इस घड़ी तक बछड़े की टांगें बेकाम हो चुकी होती हैं।

अंधेरे और मिट्टी की छुअन से दूर, बिना मां के दूध और घास के, इस बछड़े के मुंह में कुछ घंटों के अंतराल पर जबरदस्ती एक बोतल उड़ेली जाती है जिसे भोजन कहा जाता है जबकि भोजन के नाम पर यह लुगदीनुमा दवाई तरल वसा (फैट) होती है। बछड़े की चमड़ी में सूइयां चुभायी जाती हैं और यह सब इसलिए किया जाता है ताकि बछड़ा जिन्दा रहे और मोटा होता जाए। उसमें जान-बूझकर लौह-तत्व (आयरन) या ऐसे ही जरुरी पोषक तत्व नहीं डाले जाते। ऐसे भोजन के कारण पशु में आयरन की कमी हो जाती है। आयरन की कमी के ही कारण बछड़े का मांस जर्द पीला या कह लें तकरीबन उजला नजर आता है जो कि वील के लिए जरूरी माना जाता है।

‘वील’ मांस के लिए बछड़े को तैयार करने वाले किसान उसे जरुरत भर का पानी भी नहीं पिलाते, प्यास से बेहाल बछड़ा भोजन के नाम पर दिए जा रहे बदबूदार तरल वसा को पीने के लिए बाध्य होता है।
इस बछड़े को भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्‍स दी जाती हैं ताकि न्यूमोनिया और डायरिया से वह बचा रहे। यह एंटीबॉयोटिक्स वील खाने वाले के शरीर में भी पहुंचता है लेकिन सिर्फ एंटीबॉयोटिक्स ही नहीं पहुंचता बहुत कुछ और भी पहुंचता है।

वील का उत्पादन करने वाली ज्यादातर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां बछड़े को एक खतरनाक और अवैध दवा क्लेनबुटेरॉल भी देती हैं। यह बछड़े के शरीर को बढ़ाता और उसमें आयरन की ज्यादा कमी पैदा करता है ताकि बछड़े का मांस ज्यादा उजला दिखे, मांस जितना उजला दिखेगा, उसकी कीमत उतनी ज्यादा लगेगी। दूसरे 16 हफ्ते की जगह उसे 12-13 हफ्ते में ही काटने के लायक मान लिया जाता है।

गौरतलब है कि वील के ज़रिए क्लेनबुटेरॉल मांस-उपभोक्ता के शरीर में जाने पर हृदय की धड़कन का बढ़ना, कंपकंपी आना, सांस लेने में कठिनाई होना, बुखार होना और मौत होने तक का खतरा 90% बढ़ जाता है।
हालांकि भारत के होटलों में वील गैरकानूनी, चोपी छिपे मिलता है क्‍योंकि भारत में वील का उत्पादन करना गैरकानूनी है परंतु फाइवस्‍टार होटलों ने इसकी काट निकाल ली है, वे कहते हैं हमने वील का आयात किया है।
मुझे पक्का यकीन है कि होटलों पर छापेमारी की जाए तो पता चलेगा कि इम्पोर्ट लाइसेंस और वील की खरीदी की मात्रा उससे कम निकलेगी जितना कि बेचा गया है। बहुत से होटल वील बेचते हैं और अपने मैन्यू में वील के नीचे ‘इम्पोर्टेड’ (विदेश से मंगाया) लिखते हैं। 'इम्पोर्टेड' लिखने का अर्थ ही यह है कि हमारे देश में भी चोरी-छुपे इसका व्यवसाय चल तो रहा है।

बहरहाल 'इम्पोर्टेड' के तर्क को पेश करने से उनका ''वीभत्‍सता के ज़रिए व्‍यापार करने'' का दोष तो खत्म नहीं हो जाता ना।

यह भी सत्‍य है कि कानूनी तौर पर वील का आयात DGFT (Directorate General of Foreign Trade) के अंतर्गत हमेशा प्रतिबंधित रहा है और जिन होटलों में स्वदेशी या आयातित वील परोसा जाता है उनपर एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई की जा सकती है परंतु अभी तक ऐसी कार्यवाही कहीं नहीं हुई।

निश्‍चित रूप से वील मांस की तैयारी के लिए पाले जा रहे बछड़े की नियति और व्यवस्थित क्रूरता क्‍या हमें ये सोचने पर बाध्‍य नहीं करती कि जैसा खाओगे अन्‍न वैसा बनेगा मन। दरअसल क्रूरता को तो हम अपनी थाली में परोसकर चल रहे हैं फिर यह आशा कैसे करें कि वे ''आहें'' हमारा विनाश नहीं करेंगी, फिर चाहे विनाश बुद्धि का हो या शरीर का।
-अलकनंदा सिंह

शनिवार, 7 जुलाई 2018

संगीत की साक्षात् देवी सिद्धेश्वरीदेवी: सात स्वरों की स्वर्ग-सृष्टि

क्‍या हुआ जब डॉ. सुरेशव्रत राय इंटरव्‍यू लेने के लिए सिद्धेश्वरीदेवी से मिले ---

चलिए आज आपको एक अद्भुत संस्‍मराणात्‍मक लेख से परिचय कराते हैं, फरवरी 1971 में क्‍या हुआ जब डॉ. सुरेशव्रत राय सिद्धेश्वरीदेवी से मिले । जी हां, इलाहाबाद के रहने वाले डा. सुरेशव्रत राय, किताब सारंगी के लेखक, ध्रुवपद की व्‍याख्‍या करने वाले डा. राय जब प्रसिद्ध शास्‍त्रीय गायिका सिद्धेश्वरीदेवी से मिलने उनके घर गए तब........


बंगले का पोर्टिको लांघकर मैं बरामदे में पहुंचा ही था कि सामने के कमरे का परदा हिला, और एक सज्जन ने बाहर आकर मुझसे पूछा- ‘कल आपने ही सिद्धेश्वरीजी से मिलने का समय लिया था न? आइये.’ और बड़ी शिष्टता से बगल के कक्ष में ले गये.
श्वेत परिधान पहने, सफेद चादर पर श्रीमती सिद्धेश्वरीदेवी संगीत की अधिष्ठात्री देवी ‘सर्वशुक्ला सरस्वती’ की भांति विराजमान थीं. मेरे हाथ अनायास जुड़ गये और तभी मेरे कानों में ये स्नेहसिक्त शब्द प्रविष्ट हुए- ‘आवा बचवा आवा, तोहार सनेस मिलल, संगीत-चर्चा के लिए जौन समय निश्चित कइले रहली, ओकर बाट जोहत बैठल हई.’
मैं ठगा-सा रह गया. पहले कभी देखा-सुना नहीं, पर भोजपुरी के इस एक वाक्य में मुझे आत्मीय बना लिया! मैंने भोजपुरी का अपना सारा ज्ञान बटोरकर बड़े परिश्रम से कहा- ‘आपके संगीत रेडियो पर, अउर काफ्रेंस में तो बहुत सुनीला, बाकी एतने नगीच से वार्ता करै के न साहस भयल अउर न अवसर मिलल! संगीत के साथ संगीत-ज्ञान के बारे में अउर ओनकर संगीत के विषय में जाने की इच्छा के कारण आज भेंट वार्ता के ढिठाई कइली.’
उसी स्निग्ध स्वर में उत्तर मिला- ‘अरे बचवा, अपने घरे आवे में कइसन संकोच अउर कइसन ढिठाई? संगीत साक्षात नाद ब्रह्म हो, अउर संगीत-प्रेमी तो बस समझा भगवान से बढ़कर ओनकर भक्त हउअन. अइसन चर्चा बड़े भाग से होला. लेकिन उतनी दूर से आएल हउआ, पहिले कुछ जलपान करा, तब कुछ चर्चा होई.’ और कैसा ममत्व था उनके मुखड़े पर!
मैंने कैफियत दी की अभी-अभी भोजन करके आया हूं, तनिक भी गुंजाइश नहीं है. मगर कहीं-न-कहीं मुझे उनका दिया प्रसाद लेना ही था. अपनी चांदी की डिबिया से पान के दो बीड़े निकालकर मेरी ओर बढ़ाती हुई बोली- ‘पान घुलावे में तो कोई हर्जा हौ नाहीं, बनारसी मगही पान के बीड़ा मुंह में रख के ध्यान से संगीत सुना, चर्चा करा. फिर देखा पान के रस मुंह में घुलत हौ अउर ओकरे संग संगीत के रस रोम-रोम में समात हौ.’
मैंने श्रद्धापूर्वक पान लेकर बैग में रख लिया. उनकी आत्मीयता ने मन में मिस्री घोल दी थी. परंतु मुझे यह भय भी सता रहा था कि अपनी टूटी-फूटी भोजपुरी के सहारे बातचीत की गाड़ी चलाना कठिन है. आखिर मैंने हिचकिचाते हुए यह बात कह दी. इस पर वे बच्चों की तरह खिल-खिलाकर हंस पड़ीं ओर बोलीं- ‘हमार खड़ी बोली के परिच्छा लेना हौ, चला एही में सही.’
बातचीत बचपन की स्मृतियों और संगीत के प्रति अनुराग अंकुरित होने की कथा से आरंभ हुई. वे बताने लगीं- ‘जिसने मां का प्यार जाना ही नहीं, उसका बचपन क्या हो सकता है! जब मैं डेढ़ वर्ष की थी, तो मां का देहांत हो गया और जब ग्यारह वर्ष की हुई, तो पूज्य पिताजी भी परलोक सिधार गये. परंतु मेरी मौसी राजेश्वरी जी ने मेरा न केवल लालन-पालन किया, बल्कि मुझे मां का प्यार भी दिया. आज अगर मैं कुछ हूं, पूज्य मौसीजी की बदौलत हूं.’
जैसे वे मौसीजी के महत्त्व से मुझे पूरी तरह परिचित करा देना चाहती थीं.
‘मेरी मौसीजी को हिंदी, उर्दू और थोड़ा बहुत अंग्रेजी, बंगला का भी ज्ञान था. मुझे शिक्षा-दीक्षा उन्होंने घर पर ही दी और संगीत में मेरी रुचि देखकर संगीत-शिक्षा आरंभ की. उनकी माताजी अपने युग की श्रेष्ठ गायिकाओं में से थीं और काशी में ‘बड़ी मैना’ के नाम से प्रसिद्ध थीं. लोग बतलाते हैं, उनकी आवाज बहुत मधुर होते हुए भी इतनी बुलंद और तेज थी कि वे ‘बुढ़वा-मंगल’ के मेले में गातीं शीतला या चौसट्टी घाट के पास, तो सुनाई देंती रामनगर के पास तक.’
राजेश्वरी मौसी अपनी मां से बढ़कर ही निकलीं. वे और उनकी बहन विद्याधरी अपने समय की श्रेष्ठ गायिकाएं थीं. काशीदरबार की संगीत महफिल इनके बिना सूनी रहती. राजेश्वरी मौसी ‘हुस्ना’ और विद्याधरी ‘महफिले रोशन’ के नाम से प्रसिद्ध थीं. खयाल हो चाहे ठुमरी, ये विशुद्ध बनारसी अंग ही गाती थीं. यही नहीं, मेरे नाना बदरीरामजी राजा बलवंत सिंह और चेतसिंह के समय के श्रेष्ठतम तबला-वादक थे. इस तरह हमारे परिवार की संगीत-परंपरा कई सौ वर्ष पुरानी हो चली.’
और आगे की संगीत-शिक्षा?
‘लगभग आठ-नौ वर्ष की आयु में श्री सियाजी महाराज मिश्र के चरणों में मेरी संगीत-शिक्षा आरंभ हुई. वे अपने समय के चोटी के सारंगी-वादक थे और ध्रुवपद, खयाल तथा ठुमरी के सबसे बड़े जानकारों में से थे. गुरुजी को देने के लिए मेरे पास सिवा श्रद्धा के था ही क्या? मगर गुरुजी निस्संतान थे, उन्होंने मुझे कला दी, पिता का स्नेह और संरक्षण भी दिया. अंतिम सांस तक वे मुझे अपनी बेटी मानते रहे. पंचगछिया स्टेट में गुरुजी ने आफताबे-मौसीकी उस्ताद फैयाज खां के सामने स्टेज पर पहली बार मेरा गायन कराया. अपने उस केदार के खयाल-गायन को मैं आज भी भूल नहीं सकी हूं. और तब से बस चला जा रहा है. गुरुजी के देहांत के पश्चात स्वर्गीय बड़े रामदासजी से संगीत सीखने का सौभाग्य मिला.’
श्रीमती सिद्धेश्वरीदेवी जिस खूबसूरती से खयाल की अदायगी करती हैं, उसी अदा और भावपूर्णता से ठुमरी प्रस्तुत करती हैं. कारण है उनकी तन्मयता. खयाल में स्वर-विस्तार प्रधान है, जबकि ठुमरी में भाव प्रमुख होता है. परंतु सिद्धेश्वरीदेवी की गायन-शैली में दोनों का मिश्रित रूप प्रतिबिंबित होता है, जिससे उनकी गंगा-जमुनी शैली में सजीवता आ जाती है. ठुमरी को खयाल अथवा अन्य गायन-शैलियों की तुलना में सरल और हीन मानना उनकी दृष्टि में निरा अविवेक है. और वे ऐसा नहीं मानतीं कि श्रेष्ठ गायक के लिए ध्रुवपद, खयाल, ठुमरी, टप्पा आदि समस्त गायन-शैलियों में पारंगत होना आवश्यक है.
उनकी तो मान्यता है- ‘एक शैली में भी सिद्धि प्राप्त करके श्रेष्ठ गायक संगीत को दिशा दे सकता है. कहा भी है- एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय. संगीत की डिग्री-डिप्लोमा ले लेना, आकाशवाणी या सम्मेलनों में प्रोग्राम मिलना, संगीत की नौकरी मिलना, बीच की सीढ़ियां हो सकती हैं, लेकिन आखिरी मंजिल तो अनहद नाद की अनुभूति है.’
बातचीत की धारा न जाने कब अतीत की ओर फिर मुड़ गयी थी. वे पुराने दिनों का चित्र खींचने लगीं.
‘तुलसी का एक पद है- वसुधा पै वसुधारस जात बहा है. काशी में बहते उस सुधारस का पान करते-करते हर काशीवासी के गले में अमृत बस गया था. चाहे कजरी हो, चाहे चैती, यहां के जीवन का कण-कण संगीतमय था. एक तो साल-भर मेलों और त्योहारों के कारण गाने-बजाने का बराबर सिलसिला लगा रहता, दूसरे काशी में पग-पग पर बसे मंदिरों में आये दिन संगीत की महफिलें होतीं. कार्तिक मास में जाड़ऊ मंदिर, चैत्र में शितल मंदिर, मसान बाबा, किनाराम बाबा, फागुन में रामनगर (दुर्गा-मंदिर), गोपाष्टमी को पुराने विश्वनाथ, आदि विशेश्वर, बड़ा गणेश, बटुक मंदिर के प्रांगण राग-रागिनियों से गूंजते रहते. सावन में सारनाथ और दुर्गाजी के मंदिरों में महफिलें जमतीं. श्रद्धा और शौक के कारण दूर-दूर से सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ आते और बिना किसी पारिश्रमिक के,मंदिरों में अपनी कला के फूल चढ़ा कर अपने जीवन और अपनी कला को धन्य समझते.’
‘होली समाप्त होते-होते फिर बुढ़वा-मंगल का संगीत-जश्न सात दिन दिन-रात चलता और फिर ‘गुलाब बाड़ी’ उत्सव. रईसों की हवेलियों में महफिलें होती और उन महफिलों में गजरा, झूमर और दंगल होते. गायिकाओं में अपनी कला के प्रदर्शन की होड़ लग जाती और अजीब समां बंध जाता. हर महफिल का अपना निराला रंग. अलावा इनके ‘जुमागी’ होती, जिससे रियाज और भी पक्का होता जाता.’
मेरे मुख के भाव से जैसे ताड़ गयीं कि ‘जुमागी’ शब्द मेरे पल्ले नहीं पड़ा है. वे समझाने लगीं- ‘इसे बस यों समझिये कि गाने-बजाने वालों का शुक्रवारी क्लब, जो अक्सर किसी गाने-बजाने वाले के घर पर होता था. इन गोष्ठियों में गुरु-शिष्यों के समेत, हर श्रेणी के संगीतज्ञ भाग लेते थे. एक ही बोल या तान की अदायगी अलग-अलग ढंग से करने की होड़ तो होती ही थी, साथ में संगत की लडंत भी बड़ी बेमिसाल होती.’
‘जुमागियों में संगत करने के लिए सुर-सहाय, सियाजी महाराज, सुमेरु, पनारू, शंभू खां, नज्जू,खां, कल्लन खां जैसे सारंगी-वादक, सोनाजी जैसे हारमोनियम-वादक और वीरू महाराज, वाचा मिश्र, हरिजी, मौलवी राम, अनोखेलाल, कंठे महाराज जैसे महारथी तबला-वादक पधारते थे. कभी-कभी महफिलें संगीत-प्रेमी रईसों के घर भी होती थीं.’
‘संगीत-कला के पारखियों की उस महफिल का नाम सुनते ही बड़े-बड़े कलाकारों को पसीना आने लगता. मगर इसमें नये गाने बजाने वालों को सीखने-समझने का काफी मौका मिलता और बुजुर्ग संगीतज्ञ सीखने वालों का बड़े प्यार से मार्गदर्शन करते थे.’
फिर सिद्धेश्वरीजी एक ठंडी सांस लेकर बोलीं- ‘अब कहां रहे वे दिन और उस समय की काशी! वैसी महफिलें और उनका माहौल तो बस एक यादगार बनकर रह गया है.’ उनके स्वर में पीड़ा थी.
मैंने विषय बदला- ‘चैती कजरी को आप इस खूबसूरती से पेश करती हैं कि सुनने वाले जैसे सावन की फुहार में झूला झूलने लगते हैं.’ उनका उत्तर था- ‘इसका श्रेय मुझे नहीं, बल्कि काशी को है. काशी की माटी में लोटकर मैंने जीवन का अधिकांश भाग बिताया है, गंगाजी को स्पर्श करती हुई हवा में मैंने सांस ली है. आजकल मुझे ठुमरी की शिक्षा देने के सिलसिले में जरूर दिल्ली में रहना पड़ रहा है, लेकिन काशी मेरे रोम-रोम में बसी है.’
फिर बोलीं- ‘आप पूछ रहे थे, कजरी मैं इतनी भावना के साथ कैसे गाती हूं? कजरी का नाम लेते ही जैसे मैं पहुंच जाती हूं काशी के ‘बाहरी अलंग’ में, जहां किसी बाग में या जंगल में झरने के किनारे भांग-बूटी छन रही है, ‘साफा लगाया’ जा रहा है, और गाना-बजाना हो रहा है. या फिर मुझे लगता है कि रंग-बिरंगी साड़ियां पहने सारनाथ के मेले में कजरी गाती हुई गंगा की लड़कियों के झुंड में मैं भी चली जा रही हूं. जगह-जगह बन रही दाल-बाटी , दुकानों पर बन रही जलेबियों, अनरसे की सोंधी महक में, सावन की फुहार और झूले पर लगती ठंडी बयार में मेरा मन हिलोरें लेने लगता है. फिर मैं क्या गाती हूं, यह मुझे स्वयं पता नहीं रहता. मैं तो सिर्फ इतना जानती हूं कि उन झूलों और कजरी के बीच मैं खो जाती हूं.’
जब सिद्धेश्वरीदेवी तुलसी या कबीर के पद गाती हैं, तो भक्तिरस की गंगा बहने लगती है. मैंने कहा- ‘सुना है, डॉ. राजेंद्र प्रसादजी आपके भजनों के बड़े प्रशंसक थे!’ बोली- ‘वे तो संत थे, उन्होंने हमारे संगीत की प्रशंसा की. नहीं तो हमारे पल्ले क्या है? वैसे भी भाई, राम को रिझाना ही तो संगीत का लक्ष्य है. ‘ओम, तोम, हरि’ के साथ जब मैं अलाप आरंभ करती हूं, तो मुझे सुध-बुध नहीं रहती. कभी ‘मन लागो मेरो यार फकीरी में’ भजन मुंह से निकलने लगता है,तो कभी सूर-तुलसी का दूसरा कोई भजन, और फिर मुझे इसका बिलकुल पता नहीं रह जाता कि कौन गाने वाला दूसरा ही कोई है. या यों कहूं कि मैं साज बन जाती हूं, जिस पर सुर कोई और ही छेड़ रहा होता है. मुझे तो बस लगता है, ऊपर से संगीत-रस की वर्षा हो रही है, मैं भीग रही हूं. और इच्छा होती है, भीगती रहूं, अपने जीवन की अंतिम सांस तक…’
और बोलते-बोलते न जाने कब वे भजन गाने लग गयीं- ‘शिव-शिव के मन शरण हो, तो प्राण तन से निकलें.’ भक्तिभाव में पगे उस नाद-प्रवाह में गायिका और श्रोता का अस्तित्व जैसे विलीन हो गया था. केवल गेय का साम्राज्य था…‘शिव-शिव के मन शरण हो…’


बुधवार, 4 जुलाई 2018

जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है

"उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है ।"

वसीम बरेलवी का यह शेर, इंसान को इंसान की तरह नज़र आने और इंसान को इंसानियत से पेश आने का सलीका सिखाता है मगर इतनी खूबसूरती से इंसानियत की बात हो और सामने खबरों में बुराड़ी, सतना, मंदसौर आदि-आदि चल रहे हों तो जहन का कसैला हो जाना लाजिमी है।
Picture Courtsey: Google
अंधविश्‍वास की सारी हदें तोड़कर बुराड़ी में सामूहिक आत्‍महत्‍या करने वाले लोग इंसानियत के नाम पर भी किसी रहम के हकदार नहीं हैं। बेशक मानवाधकिारवादी इनके लिए रहम की बात करते हुए इनके मनोविकार का वास्‍ता देंगे, कुछ ऐसे भी होंगे जो राष्‍ट्रीय राजधानी में अकेलेपन या यहां के सामाजिक कटाव को ऐसी प्रवृत्‍तियां पनपने देने के लिए कारण बतायेंगे। शायद ही कोई होगा जो कम से कम सार्वजनिक रूप से इन ''मरने वालों की अपनी सोच'' को इनकी आत्‍महत्‍या का कारण बतायेगा।

दूसरे उदाहरण भी इंसानियत के ही नाम पर हमें शर्मसार करते हैं। मंदसौर और सतना में बच्‍चियों के साथ हुई बर्बरता की आलोचना के लिए मेरे शब्‍दों ने काम करना बंद कर दिया है। हम निर्भया और संभवत: इससे पहले भी ऐसी बर्बरता को सुनते व देखते आए हैं परंतु अब चंद महीने, चंद साल की बच्‍चियां वहशियत का शिकार हो रही हैं। अपनी उम्र के इस छोटे से अंतराल में वे तो इसका दर्द भी बयां करने की स्‍थिति में नहीं होतीं। अपराधी पकड़े जायें या नहीं, वे नहीं जानतीं, शरीर के किन भागों को किसने किस मानसिकता से चोट पहुंचाई, वे नहीं बता सकतीं। लगा लो पॉक्‍सो और चढ़ा दो फांसी पर, चाहे अपराधी को धर्म और जाति पर बांट दो या उसे मानसिक विकार से ग्रस्‍त बता दो, क्‍या फर्क पड़ेगा। बच्‍चियों के शरीर का जो हाल हो चुका, वह अब हमेशा उनके जहन पर हावी रहेगा।

हालांकि मैं यह नहीं कह रही कि वहशियों को सजा न मिले, बल्‍कि अधिकतम दंड उन्‍हें दिया जाना चाहिये और संतोषजनक बात ये है कि ऐसा हो भी रहा है। समाज में बलात्‍कारियों के प्रति घृणा का स्‍तर बताता है कि हम अब इसे दबाने या सहने की स्‍थिति से आगे निकल आए हैं, ये अच्‍छा है परंतु अब इसके आगे क्‍या।

क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता कि कहीं न कहीं हम भी समाज में फैल रहे इस कोढ़ के लिए जिम्‍मेदार हैं। अपने बच्‍चों को ''भयमुक्‍त माहौल'' न दे पाने के दोषी हैं। ज़रा याद कीजिए कि आपने कब-कब अपने पड़ोसी के बच्‍चे को गलत बात पर टोका है, या उसके घर शिकायत की है, कब किसी आवारा व्‍यक्‍ति को फालतू बैठने के लिए मना किया है, कब अपने या किसी परिचित के बच्‍चे (बेटा हो या बेटी) को मोबाइल से अलावा भी रिश्‍तों को निबाहने की सीख दी है, या कब अपने ही बच्‍चों को बड़ों के पैर छूने की हिदायत दी है जबकि यही वो बातें हैं जो सामाजिक रिश्‍तों को गहरा करके उन्‍हें समझने की सीख देती हैं।

हमने स्‍वयं ही अकेलेपन को फैशन बनाकर कई पीढ़ी पहले से रोपना शुरू कर दिया था लिहाजा अब इसके आफ्टरइफेक्‍ट कहीं बलात्कार तो कहीं आत्‍महत्‍या के रूप में सामने आ रहे हैं। 

उक्‍त सभी घटनाओं में एक बात कॉमन है कि ये सभी समाज के भीतर समाज के ही अकेले होते जाने, हमें क्‍या... कोई कुछ भी करे, बस हमारा काम बने, हमारा कुछ ना बिगड़े, कोई अपने घर में क्‍या कर रहा है, ये उसकी प्राइवेसी का मामला है और ये प्राइवेसी ही हमें, हमारे समाज को, हमारे मूल्‍यों को साबुत ही निगल रही है।

अब समझ में आ रहा है कि जब सामाजिकता दरकती है तो रिश्‍ते-नाते-परिवार व संस्‍कार भी दरकते हैं और इनकी दराज़ों से निकलता है अकेलापन, बहशतें, अवसाद। फिर नतीजा बुराड़ी, मंदसौर व सतना जैसे केस में तब्‍दील हो जाता है। तो आज से ही अपने बच्‍चों के साथ स्‍वयं को भी तैयार करें, देश व समाज को सुरक्षित व सुसंस्‍कृत बनाने के लिए संकल्‍प तो लेना ही होगा वरना आने वाला समय हमारी निकृष्‍टता और खुदग़र्जी़ को कभी माफ नहीं करेगा।

-अलकनंदा सिंह