शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

उदयभास्कर जी… आंकड़े ज़मीनी हक़ीकत बयां नहीं करते


 आज देवी अष्टमी है और आज के द‍िन यद‍ि कुछ ल‍िखा जाये और वह मह‍ि‍लाओं से संबंध‍ित ना हो , ऐसा हो नहीं सकता। यूं देखा जाये तो हम पत्रकार लोग अकसर ज्वलंत मुद्दों पर ही ल‍िखते हैं और आंकड़ों की बाजीगरी कम करते हैं, परंतु कुछ स्थाप‍ित लेखक और बड़े संस्थानों के '' बड़े च‍िंतक '' जब आंकड़ों पर आधार‍ित बात करके क‍िसी भी समस्या को कागजों पर ही तैराते हैं तो बड़ा दुख होता है क्योंक‍ि आंकड़े कभी ज़मीनी हक़ीकत नहीं बता पाते। 


ऐसा ही आज के समाचार पत्र में ''सोसायटी फॉर पॉल‍िसी स्टडीज''  के न‍िदेशक 'सी. उदय भास्कर' का एक लेख पढ़ा, जो क‍ि दुष्कर्म और मह‍िलाओं की स्थ‍ित‍ि पर ' समाज की ज‍िम्मेदारी' पर ल‍िखा  गया था, उन्होंने हाथरस के ज‍िस केस से शुरुआत की, वह बेहद हवा हवाई था, क्योंक‍ि इस केस से संबंध‍ित जांच एंजेंस‍ियों की अभी तक की प्रगति, राजनीत‍िक कुप्रचार और ग्रामीणों के हवाले से जो बातें छन कर आ रही हैं, वे सभी  जानकारी पूरे मीड‍िया में उपस्थ‍ित है परंतु उदयभास्कर जी ने इसे भी रटे रटाये अंदाज़ में प‍िछले एक दशक के आंकड़े पेश करते हुए मात्र ''दल‍ित उत्पीड़न और मह‍िलाओं पर अत्याचार''  के संदर्भ में देखा । जबक‍ि आज के संदर्भ में  पूरा का पूरा केस ही एकदम अलग एंग‍िल लेकर सामने आ रहा है...तमाम संदेह और सुबूत इशारा करते हैं क‍ि केस जो प्रचार‍ित क‍िया गया... वैसा है नहीं और इसे मैं पहले भी ल‍िख चुकी हूं। 


दरअसल SCSTAct में फर्जी केस दर्ज कराने और 2 लाख रुपये लेकर केस वापस लेने से पनपी 19 साल पहले की रंज‍िश और मृतका के प्रेम संबंधों के चलते दुश्मनी को गाढ़ा रंग म‍िला। इत्त‍िफाक ऐसा क‍ि लड़की से संबंध रखने वाले का नाम संदीप और लड़की भाई का भी नाम संदीप... व‍िक्ट‍िम लड़की के सबसे पहले जो वीड‍ियो आए वे सारी कहानी बताते हैं परंतु व‍िक्ट‍िम के पर‍िवारीजन शुरू से ही संदेह के घेरे में रहे और इसकी तस्दीक उन्होंने नार्को टेस्ट से मना करके कर भी दी। तमाम अन्य कारणों को तो जाने ही दें।


मैं आज इस केस पर नहीं ल‍िख रही बल्क‍ि आंकड़ों के ज़र‍िये मह‍िला अत्याचारों पर अब तक बनाए जाते रहे नैरेट‍िव पर ल‍िख रही हूं। क‍ि आख‍िर ये नैरेट‍िव क्यों बनाया जा रहा है, क्यों सी. उदयभास्कर सरीखे सभी बड़े पॉल‍िसी मेकर्स आज तक सरकारों, अध‍िकार‍ियों और राजनीत‍ि को दोषी बताते नहीं थक रहे और क्यों ये बुद्ध‍िजीवी सदैव ही मह‍िलाओं के ह‍ित बनने वाली नीत‍ियों को कमतर ठहराने का राग अलापते रहते हैं। वे यह क्यों हम भूल जाते हैं क‍ि हम ही उसके ल‍िए  सर्वाध‍िक ज‍िम्मेदार हैं। ''गांव की बेटी- सबकी बेटी'' के ध्वस्त हो चुके सामाज‍िक ढांचे के ल‍िए वे अपनी आवाज़ क्यों नहीं उठाते। जब SCSTAct में जात‍ि सुचक शब्द कहने पर सजा का प्राव‍िधान है तो मह‍िलाओं के नाम पर दी जाने वाली गाल‍ियों पर क्यों नहीं। 


समाज में अभीतक हमने ही तो जो फसल मह‍िलाओं की बेइज्जती कर- कर के बोई है अब वही तो काट रहे हैं फ‍िर ये हाय-हाय क्यों। 


नेता भी इसी समाज से आते हैं और अध‍िकारी भी... दुष्कर्मी भी कोई आसमान से नहीं टपकते, उन्हें हम ही तैयार करते रहे हैं...अपने घर की फैक्ट्री में और तो और अब भी ऐसा करने से बाज नहीं आ रहे। कभी हमने अपने पर‍िवारों में... अपने घरों में.. र‍िश्तेदार‍ियों...में देखा है क‍ि कोई पुरुष गाली देता है तो घर की मह‍िलायें उसे टोकती हों या अन्य बुजुर्ग अथवा पुरुष उस पर ऐतराज करते हों, जबक‍ि हम सभी जानते हैं भारतीय समाज में हर भाषा में सभी गाल‍ियां लगभग मह‍िलाओं पर यौन‍िक आत्याचार से ओतप्रोत होती हैं... हम फ‍िर भी उन्हें देते हुए सुनते हैं, कोई अपना क‍िसी को दे रहा हो तो खुश भी होते हैं , आत्मसंतुष्ट‍ि होती है ये देखकर फलां को नीचा द‍िखा द‍िया...।


तो ग‍िरेबां तो हमने मैला क‍िया हुआ है अपने समाज का और आशा करते हैं क‍ि पीढ़‍ियां सुधर जायें... ऐसा कैसे संभव है। कम से कम बढ़े लेखकों, पॉल‍िसी  मेकर संस्थानों के न‍िदेशक जैसे पदों पर बैठे लोगों को क‍िसी नैरेट‍िव पर ल‍िखते समय यह अवश्य सोचना चाह‍िये क‍ि वे यह सब अखबारों, वेबपोर्टल्स से मेहनताना पाने के ल‍िए नहीं ल‍िख रहे , वे समाज को आइना द‍िखाने और एक कदम आगे बढ़कर उसके ल‍िए ''कुछ पॉज‍िट‍िव'' करने के ल‍िए ल‍िख रहे हैं, शब्द सदैव जीव‍ित रहता है ... व‍ह क्रांत‍ि भी ला सकता है और तबाही भी। सोचना बुद्ध‍िजीव‍ियों को है क‍ि वे समाज में अपने शब्दों से कौन सी भुमश्िका न‍िबाहना चाहते है। 


आज बस इतना ही। 

- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

हे देवि!... मृजया रक्ष्यते को व‍िस्मृत करने पर हमें क्षमा करें


 

वेदों से लेकर उपन‍िषदों तक, शास्त्रों - पुराणों से लेकर सभी सनातनी ग्रंथों तक क‍ि सी पूजा से पहले स्वच्छता को प्रथम स्थान द‍िया गया है क्योंक‍ि यह शारीर‍िक शुद्धता के माध्यम से मानस‍िक बल व न‍िरोगी रहने की मूलभूत आवश्यकता होती है। कोई भी पूजा मन, वचन और कर्म की शुद्धि व स्‍वच्‍छता के बिना पूरी नहीं होती। 

आज से शारदीय नवरात्र देवी के आगमन का पर्व शुरू हो गया है। देवी उसी घर में वास करती है, जहां  आंतरिक और बाह्य शुद्धि हो। वह कहती भी हैं कि मृजया रक्ष्यते (स्‍वच्‍छता से रूप की  रक्षा होती है), स्‍वच्‍छता धर्म है इसीलिए यही पूजा में सर्वोपरि भी है। शरीर, वस्त्र,  पूजास्‍थल, आसन, वातावरण शुद्ध हो, कहीं गंदगी ना हो। यहां तक कि पूजा का प्रारंभ  ही इस मंत्र से होता है -''ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्‍थां गतोsपिवा।

यह स्वच्छता को धर्म में प्रमुखता देने के कारण ही तो पूरे देवीशास्‍त्र में 8 प्रकार की शुद्धियां बताई गई हैं- द्रव्‍य (धनादि की स्‍वच्‍छता अर्थात्  भ्रष्‍टाचार मुक्‍त हो), काया (शरीरिक स्‍वच्‍छता), क्षेत्र (निवास या कार्यक्षेत्र के आसपास  स्‍वच्‍छता), समय (बुरे विचार का त्‍याग अर्थात् वैचारिक स्‍वच्‍छता), आसन (जहां बैठें  उस स्‍थान की स्‍वच्‍छता), विनय (वाणी में कठोरता ना हो), मन (बुद्धि की स्‍वच्‍छता)  और वचन (अपशब्‍दों का इस्‍तेमाल ना करें)। 

इन सभी स्‍वच्‍छताओं के लिए अलग  अलग मंत्र भी हैं इसलिए आपने देखा होगा कि पूजा से पहले तीन बार आचमन, न्‍यास,  आसन, पृथ्‍वी, दीप, दिशाओं आदि को स्‍वच्‍छ कर देवी का आह्वान किया जाता है।

विडंबना देखिए कि हमने इसी मृजया रक्ष्यते के सूत्र वाक्य को हमने भुला द‍िया है और आज हजारों करोड़ रुपये स‍िर्फ इस प्रचार पर 'जाया' करने पड़ रहे हैं क‍ि हम स्वच्छता के असली मायने ही भुला चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक कार्यकाल पूरा हो गया '' स्वच्छता का आव्हान करते करते '' इसी स्वच्छता अभ‍ियान के तहत उन्होंने खुले में शौच से मुक्त‍ि के ल‍िए पूरा का पूरा मंत्रालय जुटा द‍िया परंतु आज भी ग्रामीण क्षेत्रों की मह‍िलाओं व छोटी बच्च‍ियों के साथ आए द‍िन होने वाली रेप की घटनाओं के पीछे खेत में शौच के ल‍िए जाना भी एक कारण न‍िकल कर सामने आ रहा है। इतनी सहायता के बाद भी शत प्रत‍िशत सफलता क्यों नहीं म‍िली, क्योंक‍ि हमने उसे अपनाया नहीं बल्क‍ि ओढ़ ल‍िया। स्वच्छता दूतों ने प्रचार-प्रसार कर अपना मेहनताना सीधा क‍िया, जनप्रत‍िन‍िध‍ियों और सरकारी बाबुओं ने इसे स‍िर्फ 'नरेंद्र मोदी का काम' मान कर इत‍िश्री कर ली।   

ज‍िस सूत्रवाक्य को हमारे धर्म शास्त्रों में स्वयं देवी के मुख से कहलवाया गया ताक‍ि स्वच्छता संदेश का प्रभाव कुछ तो स्थायी रहे परंतु हम घरों के भीतर की स्वच्छता तक स‍िमट गये और मृजया रक्ष्यते का अहम संदेश त‍िरोह‍ित हो गया। तो क्या ज‍िस देवी का आह्वान स्वयं को बलवान बनाने के ल‍िए करते हैं, उसके संदेश हम जीवन में हीं उतार सकते, न‍िश्च‍ित ही उतार सकते हैं , इसके ल‍िए बहुत अध‍िक प्रयास की आवयकता नहीं है, थोड़ा सा प्रयास कीज‍िए फ‍िर देख‍िए क‍ि देवी का ''आव्हान'' करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, वे स्वयं आपके सन्न‍िकट होंगीं। 

- अलकनंदा स‍िंंह 


मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

ब्रांडेड आभूषण कंपनी “तन‍िष्क” को द‍िखाया आइना… संघे शक्त‍ि कल‍ियुगे


 धर्म एक ऐसा स्तंभ है जो क‍िसी भी देश, उसके नागरि‍कों, उसकी संस्कृत‍ि को न केवल सहेजता है, बल्क‍ि उन्हें न‍ियमों के बंधन में बांधकर उच्छृंखल होने से बचाता है और एक पूरे के पूरे समाज की अनेक थात‍ियों को अगली तमाम पीढ़‍ियों तक प्रवाह‍ित करता है। सनातन धर्म ऐसा सद‍ियों से वही करता आ रहा है। सबसे पुरानी संस्कृत‍ि का संवाहक होने के नाते इसे ही अन्य अनेक धर्मों के आक्रमणकार‍ियों का न‍िशाना भी इसील‍िए बनना पड़ा।

युद्ध चाहे मैदानों में लड़े जाते रहे हों या आज की तरह मानस‍िक व वैचार‍िक रूप से किंतु सनातन धर्म पर आघात अब भी जारी हैं। हालांकि संघे शक्त‍ि कल‍ियुगे ने कल अपना छोटा सा नमूना तब पेश क‍िया जब लव ज‍िहाद को प्रमोट करने वाला एक व‍िज्ञापन टाटा कंपनी की ब्रांडेड आभूषण कंपनी ‘तन‍िष्क’ हटाने पर बाध्‍य हुई।

वैसे सनातन धर्म पर आघात का ही उदाहरण हैं आए द‍िन होने वाली संतों-पुजार‍ियों की हत्याएं, लव ज‍िहाद की घटनाएं और धर्म-पर‍िवर्तन के ल‍िए ब्रेनवॉश की सतत प्रक्र‍िया ज‍िसे मीड‍िया के माध्यम से बखूबी अंजाम द‍िया जा रहा है। अभी तक तथाकथ‍ित तौर पर ‘धर्मन‍िरपेक्षी होने की कीमत’ चुकाते आ रहे हम, अब इस मीठे ज़हर को ‘चुपचाप’ पीने के ल‍िए राजी नहीं… कतई नहीं ।

ज्वेलरी ब्रांड तन‍िष्क द्वारा लव ज‍िहाद को प्रमोट करने वाला एड प्रसार‍ित करने पर हंगामा यूं ही नहीं मचा। तनिष्क ने अपने नये विज्ञापन में एक गर्भवती हिन्दू महिला को मुस्लिम के घर की बहू बताकर ये जताने का प्रयास किया है कि किसी मुस्लिम से निकाह करने वाली हिन्दू महिला को मुस्लिम घर में क‍ितना प्यार म‍िलता है और उसे ”ब‍िट‍िया की खुशी” मनाने का र‍िवाज़ बताकर प्रोत्साह‍ित क‍िया जाता है।

इस विज्ञापन के आते ही सोशल मीडिया में तनिष्क के प्रति लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। इसके बाद सामूहिक रूप से तनिष्क के बहिष्कार की मुहिम ट्विटर पर चलाते हुए #BoycottTanishq अभियान छेड़ द‍िया गया। अंतत: तन‍िष्क को अपना एड हटाना पड़ा। कुछ समय पहले ही सर्फ एक्सेल ब्रांड ने भी इसी मानसिकता पर अपने विज्ञापन को प्रचारित किया था, उसका भारी विरोध हुआ था परंतु तब व‍िरोध की तीव्रता शायद कम रह गई थी।

व्यक्त‍िगत आज़ादी और कानूनी तौर पर क‍िसी मुस्ल‍िम से ह‍िंदू लड़की की शादी को सही ही माना जाएगा और होना भी यही चाह‍िए क्योंक‍ि ये व्यक्त‍िगत फैसला है परंतु बड़ा सवाल ये है क‍ि हमेशा ”ह‍िंदू लड़की ही क्यों”, और धर्मन‍िरपेक्षता की इतनी बड़ी कीमत हमेशा ह‍िंदू ही क्यों चुकाए क‍ि उनकी बेट‍ियों को न‍िशाना बनाया जाता रहे, कभी बरगलाकर तो कभी धमकाकर, और वह अब भी चुप रहे जबक‍ि इसके पीछे की सच्चाई NIA जैसी सर्वोच्च जांच एजेंसी भी बता चुकी हैं, क‍ि इसकी जड़ें कितनी गहरी हैं। ये स‍िर्फ शादी नहीं होती, इसके पीछे धर्मपर‍िवर्तन और परोक्ष रूप से लड़की के पर‍िवार व उससे पैदा हुए बच्चे तक एक लंबी श्रृंखला है ज‍िसे सुन‍ियोज‍ित तरीके से चलाया जा रहा है।

बहरहाल, अब जो थोड़ी चेतना स‍िर से ऊपर जाते पानी को रोकने के ल‍िए जागृत हुई है, वह बनी रहनी चाह‍िए। प्रश्न ये है क‍ि आख‍िर ह‍िंदू को ही क्यों सहनशील बनने की नसीहत देते हुए ये एड प्रसार‍ित क‍िये जा रहे हैं। अरे… ह‍िंदू तो दुन‍ियाभर में पहले से ही सहनशील माने जाते हैं, अब और क‍ितना। अब चेतने का समय है क्योंक‍ि अब उनकी न‍िगाहें हमारी बेट‍ियों पर आ गड़ी हैं।

अभी तक ज‍िस धर्मन‍िरपेक्षी चश्मे को हमारी आंखों पर चढ़ाकर हमें ”भाई भाई और सहनशीलता” का पाठ पढ़ाया गया, अब वही आत्मघाती होता जा रहा है। देश में सत्तापर‍िवर्तन के बाद इस चेतना को बल म‍िला तो उन ”घात‍ियों” को सहन नहीं हो रहा।
न‍िश्च‍ित रूप से व्यापार का कोई मत या मजहब नहीं होता परंतु अब जो कुछ भी दिख रहा है, वह लोगों को एक बार सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या सच में अब व्यापार भी धर्म देखने लगा है, वह भी लव ज‍िहाद को प्रमोट करके। इस आघात की शिकार अब तक हजारों लड़कियाँ हो चुकी हैं और इस से भी ज्यादा अभी इस जाल में फंसी हुई हैं। कहते हैं ना क‍ि संघे शक्त‍ि कल‍ियुगे, तो अब एकता का प्रमाण ट्व‍िटर ट्रेंड में ही नहीं, समाज के व‍िध्वंसक तत्वों तक भी पहुंचना चाह‍िए जो हमारी बेट‍ियों को बरगलाने में लगे हैं।

– अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

हाथरस को ‘हाथरस’ बनाने के बाद…की कहानी


 र‍िश्तों को लेकर हमारे कव‍ियों- साह‍ित्यकारों ने बड़ा काम क‍िया है, पोथ‍ियों पर पोथ‍ियां गढ़ते गए परंतु इन्हें प्रभाव‍ित करने वाली लालची मानस‍िकता को वे नहीं पढ़ पाए और ना ही बदल पाए। आज जब लालच ने सबसे पहला प्रहार र‍िश्तों पर क‍िया और सामूह‍िक दुष्कर्म के बढ़ते मामलों के रूप में इसका नतीज़ा अब हमारे सामने आ रहा है, तो एक एक केस की हकीकत भी समझ आ रही है। ये अलग बात है क‍ि कभी राजनीति तो कभी कानूनी बहाने ‘सच’ को कहने-सुनने-देखने पर बंद‍िशें लगा रहे हैं परंतु कब तक, सच की यही खूबी है क‍ि वह तो सामने आकर ही रहता है।

और सच ये है क‍ि दुष्कर्म की ‘घृणा’ का मोल लगाकर जो मुआवज़ा बांटने की प्रथा चली है, उसने इसके ‘घट‍ित होने’ पर प्रश्नच‍िन्ह लगाने शुरू कर द‍िए हैं। ऐसा नहीं है क‍ि ये घटनायें होती ही नहीं हैं, न‍िश्च‍ित ही होती हैं परंतु भेड़‍िया आया… भेड़‍िया आया… की तर्ज़ पर दुखद घटनायें भी संशय के घेरे में तब आ जाती हैं जब इसके पीछे पीड़‍ित को न्याय द‍िलाने की अपेक्षा मुआवजे का लालच प्रगट होता है। हक़ीकत हम सभी जानते हैं क‍ि समाज में सभी पुरुष ‘हर‍िश्चंद्र’ नहीं बैठे और ना ही सभी मह‍िलायें ‘साव‍ित्री’ हैं।

हाथरस कांड के बाद अब फतेहपुर में भी ऐसा ही मामला सामने आया है जहां मृतका के पर‍िजन जाम लगाकर न्याय की मांग के साथ ही पुल‍िस के व‍िरुद्ध नारे लगा रहे थे, अचानक सपा व कांग्रेस के नेता के पहुंचते ही एफआईआर में नामज़द क‍िए गए एक आरोपी के साथ साथ ”तीन अन्य अज्ञात” का नाम भी जोड़ देते हैं और मामले को ‘ जघन्य व सामूह‍िक दुष्कर्म ‘ बताने लगते हैं। फ‍िर एक और ट्व‍िस्ट आता है क‍ि 25 लाख मुआवजे की घोषणा होते ही वे पुल‍िस का व‍िरोध भी छोड़ देते हैं और मृतका का अंत‍िम संस्कार भी फटाफट कर देते हैं।

बहरहाल ये और इस जैसे कई मामले हैं जहां मुआवज़ा ‘बांटा’ नहीं गया , बल्क‍ि पर‍िजनों पर पैसा पानी की तरह बहाया गया। निर्भया केस के बाद जिस तरह से उसके घरवालों को दिल्ली में फ़्लैट, लाखों रुपये और भाईयों को नौकरी दी गई, उसके बाद से देशभर में न्याय की जगह ‘तुष्टीकरण’ की एक अजीब सी प्रथा शुरू हो गई ज‍िसने लालच को ऐसा पनपाया क‍ि अब वही गुनाहों को जन्म दे रहा है।

अगर बेटियों के रेप के बदले ज़मीन, लाखों रूपये और बेटों को सरकारी नौकरी मिलने लगेगी तो फिर समझ लो कि गरीब और मजबूर समाज को किस लालच के गर्त में ढकेला जा रहा है। ये बात तो अब कतई बेमानी हो गई है कि कोई भी माँ-बाप अपनी बेटियों के बलात्कार का झूठा मुक़द्दमा नहीं कर सकते। अदालतों से बड़ी संख्या में वापस ल‍िए गए बलात्कार के आरोपों वाले केस इस बात की तस्दीक करते हैं । चूंक‍ि बलात्कार के अपराध में प्रत्यक्ष साक्षी का अभाव होता है इसल‍िए इसका बेजां फायदा उठाकर मुआवज़ा प्रथा के ल‍िए इस टूल को सब अपने-अपने ह‍िसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं ।

हसरत मोहानी का एक शेर और बात खत्म क‍ि –

भड़क उठी है कैसी आतिश-ए-गुल
शरारे आशियाँ तक आ गए हैं।

- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

हाथरस केस का वो ”ग्रे” फैक्टर जो आधे अधूरे सच पर गढ़ा गया

समाज में कानून का राज होना चाह‍िए… मगर यहां कानून की धज्ज‍ियां उड़ाई जा रही हैं…दल‍ितों को सताया जा रहा है… दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ गई हैं… बेट‍ियां सुरक्ष‍ित नहीं हैं… फलां नेता के शासन में ‘जंगल राज’ है…. फ‍िलहाल हाथरस मामले में ऐसा ही कुछ सुनने को मिल रहा है मगर कभी सोचा है क‍ि ऐसा क्यों है।

वोट बैंक, जात‍ि और ल‍िंग आधार‍ित भावनाओं के ज्वार में आकर यदि कोई कानून बना द‍िया जाएगा तो उससे क‍िसी पीड़‍ित को न्याय म‍िलने की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है। दहेज हत्याएं हुईं तो इसके ल‍िए कानून, दुष्कर्म हुए तो इसके ल‍िए कानून, दल‍ित सताये गए तो इसके ल‍िए कानून, यहां तक मह‍िलाओं का यौन शोषण रोकने के लिए अलग-अलग कानून बना द‍िये गये, वो भी ब‍िना ये सोचे समझे क‍ि इनका दुरुपयोग करने वाले अध‍िक ही होंगे… कम नहीं।

प्राकृत‍िक न‍ियम है क‍ि शोष‍ित होने की थ्योरी हमेशा काम नहीं करती, सच सामने आ ही जाता है परंतु मीड‍िया आए द‍िन क‍िसी भी एक घटना को ज‍िस तरह आधा-अधूरा सच द‍िखाकर ‘आपाधापी वाली वाहवाही’ बटोरने में जुट जाता है वह ‘ सच ‘ की तह तक पहुंचने में बाधा ही बनता है जबक‍ि होना यह चाह‍िए क‍ि जो काम पुल‍िस नहीं कर सकती वह ‘खोजबीन’ न‍िष्पक्ष होकर मीड‍िया द्वारा की जानी चाह‍िए परंतु ना तो सच बोलने का जोख‍िम उठाना चाहती है और ना ही प्रोपेगंडा की धारा में बहने की सहजता खोना चाहती है।

ठीक यही हुआ है हाथरस की घटना में। पूरा बुलगढ़ी गांव जानता है क‍ि वाल्म‍िकी जाति की मृतका का प्रथम आरोपी संदीप से प्रेमसंबंध था, परंतु 19 साल की खानदानी रंज‍िश और वाल्म‍िकी-ठाकुर का गैप, दोनों के घर वालों को पसंद नहीं था, इसी के चलते भाई द्वारा मृतका को अकसर मारापीटा जाता था। एकबार दोनों घर में ही एकसाथ पकड़े गए, प्रधान के द्वारा गांव में पंचायत हुई, दोनों की शादी का प्रस्ताव पंचायत ने रखा परंतु पर‍िवारों ने नहीं माना, लड़के को लड़की से दूर रहने की ह‍िदायत के साथ गांव से दूर भेज द‍िया गया।

प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीणों के अनुसार 14 स‍ितंबर को घटना से एक द‍िन पहले ही वह गांव वापस आया था। घरवालों की कड़ी पहरेदारी के बीच वो खेत पर मां के साथ घास काटने गई लड़की (मृतका) से म‍िलने पहुंच गया, मात्र 10-15 मीटर दूरी पर घास काट रही मां ने उसे लड़की से बात करते देख ल‍िया और शोर मचाते हुए अपने बेटे यान‍ि मृतका के भाई को आवाज़ दी, भाई के आते ही कथ‍ित दोषी (संदीप) भाग गया और मृतका के भाई ने बहन का गला दबा कर मारते हुए उसे अधमरा कर द‍िया। वो पहले भी लड़की को इसी तरह मारता रहा है परंतु इस बार बहन की हड्डी टूट गई, उसे अस्पताल ले जाना पड़ा, बहन के प्रेमी को जेल भेजने के ल‍िए ये सारा प्रपंच रचा गया।

मीड‍ियाकर्मी अगर थाने में ल‍िखी गई पहली तहरीर को ही खंगाल लेते तो सारा माजरा समझ में आ जाता मगर इसे दबा द‍िया गया। SCSTAct के तहत मारपीट में दर्ज की गई एफआईआर को क्रमश: पहले रेप, फ‍िर गैंगरेप में तब्दील कराया गया, और ये प्रपंच क‍िसी व‍िरोधी पार्टी या क‍िसी दबंग ने नहीं बल्क‍ि भाजपा के ही दल‍ित सांसद ने लड़की के भाई के संग म‍िलकर रचा ताक‍ि ”दल‍ित बेटी का दबंगों द्वारा गैंगरेप ” कहकर मामले को तूल द‍िया जा सके।

घटना की जांच करने वाले एसएचओ डीके वर्मा जो कि खुद दलित वर्ग से हैं, ने पाया कि लड़के के अलावा ज‍िन तीन अन्य को नामज़द कराया जा रहा है, वे वही लोग हैं ज‍िनके द्वारा लड़के के पर‍िवार की पैरवी की जा सकती थी। इनमें से एक तो उस समय क‍िसी आइस फैक्ट्री में काम कर रहा था (ज‍िसकी तस्दीक उस आइस फैक्ट्री के माल‍िक ने भी की) और एक वो पास के ही खेत से भागकर आया व भाई के चंगुल से लड़की को बचाया, पानी प‍िलाया।

फ‍िलहाल मीडिया के दबाव में एसएचओ डीके वर्मा लाइन हाज़िर हैं और मृतका के भाई व प‍िता राजनीत‍ि व मीड‍िया के टूल बने अभी तक आधा दर्जन बार बयान बदल चुके हैं। आगे गांव में उनके ल‍िए पनप रही नफरत क्या गुल ख‍िलाएगी, कहा नहीं जा सकता।

14 स‍ितंबर से 22 स‍ितंबर और कल के राजनैत‍िक ड्रामे के बाद इतना तो न‍िश्च‍ित ही कहा जा सकता है क‍ि यह एक साधारण सी प्रेम कहानी का वीभत्स अंत था जो हॉरर क‍िल‍िंग का ही एक रूप है। इसमें ज‍ितना दोष मृतका के भाई और सांसद का है, उतना ही दोष पुल‍िस का भी है ज‍िसने असंवेदनशीलता से सारे मामले को हैंड‍िल क‍िया और रात्र‍ि में ही मृतका का दाह संस्कार कर द‍िया।

बहरहाल पूरे मामले में हाथरस केस का वो ”ग्रे” फैक्टर जो आधे अधूरे सच पर गढ़ा गया और कानून को ज‍िस तरह अपने अपने ह‍ित में प्रयोग क‍िया गया वह उन र‍िश्तों के ल‍िए घृण‍ा बो गया जो गांवों की थाती हुआ करते थे। न‍िश्च‍ित ही इस पूरे प्रकरण ने संशयों का ऐसा पहाड़ खड़ा कर द‍िया है जो वास्तव‍िक अपराध‍ियों को बचाने का ही काम करेगा।

– अलकनंदा स‍िंह

सोमवार, 28 सितंबर 2020

‘कौवा कान ले गया’ जैसा है क‍िसान आंदोलन का सच

 

अनियंत्रित अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता के दुष्‍परिणाम: 
कुछ नासूर ऐसे होते हैं जो क‍िसी एक व्यक्त‍ि नहीं बल्क‍ि पूरे समाज को अराजक स्थ‍ित‍ि में झोंक देते हैं, ऐसा ही एक नासूर है अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता और लोकतंत्र बचाने के नाम पर ''आंदोलन'' की बात करना, फि‍र चाहे इसके ल‍िए कोई भी अराजक तरीका क्यों ना अपनाया जाये। हाल ही में क‍िया जा रहा क‍िसान आंदोलन इसी अराजकता और भ्रम की पर‍िणत‍ि है। ''क‍िसानों के नाम पर'' क‍िये जाने वाले इस आंदोलन के कर्ताधर्ता दरअसल भयभीत हैं क‍ि उनकी सूदखोर लॉबी के हाथ से न‍िकल कर क‍िसान अपनी उपज का खुद माल‍िक बन जायेगा। 

आंदोलन का जोर हर‍ियाणा, पंजाब में ज्यादा रहा क्योंक‍ि इन दोनों ही प्रदेशों में मंडी कारोबारी हों या कोल्ड स्टोरोज चेन के माल‍िक सभी नेता हैं। हर‍ियाणा में देवीलाल के पोते दुष्यंत चौटाला या पंजाब के अकाली दल की बादल फैम‍िली का करोबारी ह‍ित इससे प्रभाव‍ित हो रहा है। ठीक यही स्थ‍िति महाराष्ट्र में एनसीपी के पवार फैम‍िली की भी है, तभी तो अज‍ित पवार ने कहा क‍ि वे कानून को महाराष्ट्र में लागू नहीं होने देंगे।  पश्च‍िमी उत्तरप्रदेश में भी भाक‍ियू ने प्रदर्शन क‍िये, इसमें भाग लेने वाले ''क‍िसान'' दरअसल मंडी में कमीशन एजेंटों  व आढ़त‍ियों के वे गुर्गे ही न‍िकले परंतु यहां उनकी '' नेताग‍िरी'' की सारी हवा पढ़े ल‍िखे क‍िसानों ने ही न‍िकाल दी।  

संसद में भी आपराध‍िक पृष्ठभूम‍ि वालों ने तो भरपूर अराजकता फैलाने की कोश‍िश की, संसद के बाहर धरना द‍िया, राष्ट्रपत‍ि से जाकर भी म‍िले क‍ि व‍िधेयकों को पास न क‍िया जा सके और कहीं से भी प्राणवायु म‍िल सके परंतु अब यह कानून ''कृषि उत्पाद व्यापार व वाणिज्य विधेयक-2020'' बन गया। इसमें  किसानों के हित में ऐसे प्रावधान किए गए हैं जो कृषि उत्पाद बाजार की खामियों को दूर करेंगे। अब किसानों को अपना उत्पाद बेचने के लिए एपीएमसी यानी कृषि मंडियों तक सीमित रहने के लिए मजबूर नहीं होना होगा। कानून बनने के बाद राज्य की मंडियां या व्यापारी किसी प्रकार की फीस या लेवी नहीं ले पाएंगे। ज‍िस एमएसपी को लेकर संशय पैदा क‍िया जा रहा है , केंद्र सरकार ने अगले ही कदम में रबी की फसलों का एमएसपी बड़ा कर ये शंका भी न‍िर्मूल साब‍ित‍ कर दी। अब...? अब ये क्या करें .. कहने को कुछ नहीं ..बचा तो कुलम‍िलाकर ये कौआ कान ले गया जैसी कहावत को ही चर‍ितार्थ कर रहे हैं जहां ना कौआ है ना ही कान गायब है ..है तो बस स‍िर्फ हंगामा ..वो भी बेवजह। 

वर्ष 1967 में बना कृषि बाजार उत्पाद समिति यानी एपएमसी एक्ट और वर्ष 1991 के बाद आर्थ‍िक सुधारों के बाद भी बिचौलियों के कारण कृषि उत्पाद बाजारों की उपेक्षा, किसानों का शोषण के ल‍िए सरकारी लाइसेंस ने स्थ‍ित‍ि औश्र ब‍िगाड़ी ही। हालांक‍ि 2001 में शंकरलाल गुरु समिति ने कृषि उत्पाद बाजार के संवर्द्धन एवं विकास के लिए 2,600 अरब रुपये के निवेश का सुझाव दिया, लेकिन उस पर चुप्पी साध ली गई। ऐसे में जाह‍िर है क‍ि  इस कृषि उत्पाद व्यापार व वाणिज्य विधेयक-2020 कानून से उस वर्ग को तो खीझ होगी ही जो अब तक कृषि उत्पाद बाजार से अरबपत‍ि बन गए। कृषि मंडियां ज‍िनके ल‍िए कमाई का अहम ज़रिया रहीं, कृषि मंडियों की खामियों व उनके परिसर में संचालित होने वाले उत्पादक संघों से कौन सा क‍िसान आज‍िज़ नहीं होगा।   

इस सारे कथ‍ित आंदोलन से एक बात तो साफ हो गई क‍ि जिन्होंने कायदे से गांव नहीं देखे, खेत से जिनका साबका नहीं पड़ा, फसल की निराई-गुड़ाई नहीं की, उपज की मड़ाई-कटाई नहीं की, घर पर खेतों से अनाज कैसे आता है, जो नहीं जानते, वे लोग किसानों के हमदर्द बनने का दावा कर रहे हैं। दरअसल ऐसे लोगों की कोशिश अपनी राजनीति चमकाना है, इसीलिए वे राज्यसभा में अध्यक्ष की पीठ के सामने मेज पर चढ़ जाते हैं...हंगामा करते हैं और इसके बावजूद खुद को संसदीय आचरण के संवाहक मानते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज की जनता सूचनाओं के बहुस्रोतों के उपयोग की आदी हो गई है। वह भी सच और झूठ समझने लगी है। उसकी समझ ही मौजूदा राजनीति को जवाब देगी। 

- अलकनंदा स‍िंंह 


बुधवार, 16 सितंबर 2020

दीमकें… इससे पहले क‍ि हमारा घर चट कर जायें


 घर का गेट खोला… तो देखा दरवाजे की चौखटों पर दीमक लगी हुई है, घर के कई कोनों तक उसका फैलाव हो गया जबक‍ि अभी कुछ द‍िन पहले ही तो पेस्ट ट्रीमटमेंट कराया था। काफी कुछ तो खरोंच कर भी उतारी मगर सब बेकार। दीमक कुछ समय के ल‍िए गई लेकिन फ‍िर वापस आ गई। इसे दूर करने के ल‍िए घर के कोने-कोने व दरवाजों को लगातार खरोंचना होगा… दरअसल, दीमक की प्रवृत्त‍ि ही ऐसी होती है क‍ि उसे दूर करने को सतत प्रयास करने होते हैं।

ऐसा ही कुछ हाल है हमारे समाज में व्याप्त दीमकों का भी है, जो स‍िर्फ अपनी स्वार्थ पूर्त‍ि के ल‍िए देश के हर उस दरवाजे और हर उस अंग को अपने लपेटे में ले चुकी हैं, जहां-जहां से उन्‍हें प्रगत‍ि की आस लगी हो। दीमक को अंधेरा, सीलन और कमजोर कड़‍ियों का साथ चाह‍िए बस, फ‍िर देख‍ने लायक होता है उसका फैलाव…।

मैं बात कर रही हूं, ऐसी ही कुछ दीमकों की जैसे क‍ि द‍िल्ली दंगों के साज‍िशकर्ता तथा सीएए व एनआरसी का व‍िरोध करने वाले वो ”कथ‍ित बुद्ध‍िजीवी” जो बलवाइयों को न केवल आर्थ‍िक मदद देते रहे बल्क‍ि कोर्ट में उनकी र‍िहाई और अन्य खर्चों को भी स्वयं ही वहन करते रहे हैं…उनकी ये मदद बदस्तूर अब भी जारी है।

कल की ही बात ले लीज‍िए… द‍िल्ली दंगों के आरोपी उमर खाल‍िद का नाम दंगों में ”जबरन फ्रेम” करने व कोई सुबूत ”ना” होने का आरोप लगाते हुए कथ‍ित बुद्ध‍िजीवी उसके ल‍िए सहानुभुत‍ि अभ‍ियान चला रहे थे, वह भी सोशल मीड‍िया के उस युग में जब इसकी ”करतूतों” वाले वीड‍ियो वायरल होकर सरेआम हो चुके हैं क‍ि कैसे उमर खाल‍िद ”खून बहाने” की बात कहता है… कैसे वह डोनाल्ड ट्रंप का नाम लेते हुए कहता है क‍ि यही अच्छा मौका है ज‍िससे हमारी बात इंटरनेशनली सुनी जा सकेगी… व‍ह आईबी के अंक‍ित शर्मा के हत्यारे ताह‍िर हुसैन से मुलाकात करता है, ये वीड‍ियो भी सोशल मीड‍िया पर है… फ‍िर भी उसके पक्ष में बोल रहे कथ‍ित बुद्ध‍िजीवी आख‍िर समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं, क्यों अव‍िश्वास और अलगाववाद की दीमकों को पनपा रहे हैं, वे यह क्यों नहीं समझते क‍ि इससे तो स्वयं उनकी ही व‍िश्वसनीयता पर खतरा है।

कोरोना संक्रमण काल में भी बजाय वॉर‍ियर्स का साथ देने के सीएए व एनआरसी से लेकर द‍िल्ली दंगों तक को अंजाम देने वाली ये दीमकें आख‍िर देश को क‍िधर ले जाना चाहती हैं।

अगला उदाहरण है रेलवे कर्मचारी यून‍ियन अर्थात ‘ऑल इंड‍िया रेलवे मेंन्स फेडरेशन’ नामक दीमक का, जो रेलवे द्वारा कुछ प्राइवेट ट्रेन्स को ट्रैक पर चलाने का व‍िरोध कर रही है जबकि इससे गरीबजन की यात्रा पर कोई आंच नहीं आएगी, ये तो बस एक्स्ट्रा इनकम के ल‍िए ओवरटाइम है ताक‍ि रेलवे समृद्ध हो सके। प्राइवेट ट्रेनों का संचालन जहां रेलवे कर्मचार‍ियों की कार्यसंस्कृत‍ि को प्रत‍िस्पर्द्धा बनाएगा वहीं संसाधनों का दुरुपयोग भी रोकेगा परंतु ऑल इंड‍िया रेलवे मेंन्स फेडरेशन के इरादे भी दीमकों की भांत‍ि रहे हैं जो ”अध‍िकारों” के नाम पर व‍िभागह‍ित को ही चाटते रहे हैं।

प्रत‍िस्पर्द्धा और प्रत‍िबद्धता दोनों ही फेडरेशन के कुकृत्यों के ल‍िए खतरा हैं। अभी तक फेडरेशन के नेता कुछ भ्रष्ट रेलवे अध‍िकार‍ियों के साथ म‍िलकर टेंडर्स के नाम पर बड़े घोटाले, करोड़ों की रेलवे भूम‍ि को खुर्दबुर्द करके, वेंडर्स से लेकर कंस्ट्रक्शन, रेलवे अस्पतालों के सामान खरीद तक में घोटाला करके मामूली से पद पर रहते हुए जो करोड़ों कमा रहे हैं, वो ये नहीं कर पायेंगे, कर्मचारी संगठन पर दबदबा खो देंगे, सो अलग।

दरअसल यून‍ियन द्वारा कर्मचारी के ह‍ित की बात करना तो मुखौटा है, इसके पीछे खाल‍िस तौर पर वो कॉकस है जो प्राइवेटाइजेशन के नाम पर न केवल कर्मचार‍ियों को बरगला रहा है बल्क‍ि रेलवे को फायदे में आने से भी रोक रहा है। संगठन पदाध‍िकारी से लेकर अध‍िकार‍ियों के घर तक कर्मचार‍ियों से ”बेगार” या रेलवे ट्रैक की देखरेख करने वाले गैंगमैन्स से घरों में बर्तन, पोंछा करवाना कैसा कर्मचारी ह‍ित है परंतु यून‍ियनबाजी के चलते व‍िभाग ऐसे लोगों को ढोने पर व‍िवश है।

कुछ अन्य दीमकों में शाम‍िल हैं फर्जी भर्त‍ियों को अंजाम देने वाले ठेकेदार, ई गवर्नेंस को धता बताते भ्रष्टाचारी सरकारी कर्मचारी। वंच‍ितों -आद‍िवास‍ियों के ल‍िए काम करने वाली वो गैर सरकारी संस्थाऐं ज‍िनका ‘व‍िकास’ गरीबों का ”धर्म पर‍िवर्त‍ित” करा कर ही ज़मीन पर उतरता है और इस व‍िकास के ल‍िए वे हथ‍ियारों से लेकर मानव तस्करी तक के नेटवर्क को इस्तेमाल कर रही हैं। इसी श्रेणी में आती हैं ड्रगमाफ‍िया, हथ‍ियार माफ‍िया, बॉलीवुड माफ‍िया की दीमकें (Termites) जो अपने अपने तरीके से समाज को चट कर रही हैं।

अब इन दीमकों को समझ लेना चाह‍िए क‍ि समाज और देश की व्यवस्थाओं में भरी सीलन और कमजोरी जो इन्हें अपने मंसूबे कामयाब कराती आई है, आगे नहीं मिलने वाली क्‍योंकि समय ही नहीं सरकार भी बदल रही है।

– अलकनंदा स‍िंंह 

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मीड‍िया: अपने ही हाथों से मैला कर ल‍िया अपना ग‍िरेबां

 



मीड‍िया के न‍िकम्मेपन और ग‍िरावट ने अब तो सारी हदें पार कर दी हैं। कभी ज‍िस वर्ग को समाज और वंच‍ितों के ल‍िए प्राणवायु माना जाता था, आज मीड‍िया का वही वर्ग और उसके कर्मचारी ( ज‍िन्हें पत्रकार तो हरग‍िज नहीं कहा जा सकता) अपनी सारी क्रेड‍िब‍िल‍िटी खो चुके हैं। अब ये चीखने वाले कथ‍ित पत्रकार क‍िसी मज़लूम की ज़‍िंदगी व न्याय के ल‍िए र‍िपोर्ट‍िंग नहीं करते, वे पुल‍िस व प्रशासन के अध‍िकार‍ियों के काले कारनामों को दबाने के आदी हो चले हैं , समाज में कहां क्या बुरा हो रहा है, इसपर नज़र नहीं डालते।

वे सुशांत स‍िंह राजपूत, र‍िया चक्रवर्ती से लेकर कंगना रानौत पर गला फाड़ फाड़कर तो च‍िल्लाते हैं, परंतु उन्हीं की नाक के नीचे गाज़ियाबाद के विकास नगर, लोनी में 16 वर्ष की नाबाल‍िग बहन को छेड़ रहे शोहदों द्वारा भाई को ही धारदार हथ‍ियार से घायल करने की खबर नहीं होती है, जबक‍ि उल्टा शोहदे ने ही लड़की के भाई पर जयश्रीराम ना बोलने पर जात‍िसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने की र‍िपोर्ट करा दी गई। लड़की के अनुसार इससे पहले भी कई बार आरोपी अभिषेक जाटव ने अश्लील हरकतों के साथ छेड़ा है।

ये पत्रकार इससे भी अनभ‍िज्ञ रहते हैं क‍ि गाज़ियाबाद पुल‍िस द्वारा लड़की के भाई पर ही ‘शोहदे को मारने’ का आरोप लगाकर SC-ST एक्ट में केस दर्ज करने की लापरवाही आख‍िर कैसे की गई। वो तो भला हो सोशल मीड‍िया का ज‍िस पर ये तस्वीर वायरल हो गई और अब गाज‍ियाबाद की पुल‍िस व उनके प‍िठ्ठू पत्रकारों का ये गठजोड़ बेनकाब हो गया।

पुल‍िस की ये र‍िपोर्ट डीसीआरबी में देखने के बाद भी क्राइम बीट संभालने वाले गाज‍ियाबाद के पत्रकारों को ये नहीं सूझता क‍ि आख‍िर पूरी बस्ती जाटव समाज की, छेड़ने वाले जाटव समाज के तो एक अकेला ब्राह्मण लड़का सैकड़ों जाटव समाज के घर के बीच कैसे उनको मार लेगा और कैसे उन्हें जयश्रीराम बोलने को बाध्य करेगा ?

जात‍िगत आधार पर यद‍ि यही मामला उल्टा होता तो टीआरपी के नाम पर यही पत्रकार थाली लोटा लेकर पीछे पड़ जाते। लोनी के व‍िकासनगर का ये मामला अकेला मामला नहीं, SC-ST एक्ट में दर्ज हजारों फर्जी मामले ऐसे हैं जो बदले की भावना से ल‍िखवाए गए। ब्राह्मण सह‍ित सभी सवर्णों के प्रत‍ि दुर्भावना को कैश करने का माध्यम बन गया है ये एक्ट परंतु क‍िसी मीड‍िया हाउस ने इस संदर्भ में कुछ नहीं क‍िया।

बात ब्राह्मण और दल‍ित की नहीं है, और ना ही लड़की से छेड़छाड़ व स‍िर फाड़ देने की है… बात तो उस ज‍िम्मेदार तबके ”मीड‍िया” की अवसरवाद‍िता की है जो अपने ही ग‍िरेबां को अपने ही हाथों से मैला कर रही है। हमें पढ़ाया गया था क‍ि पत्रकार‍िता की पहली सीढ़ी ही प्रश्नों के साथ ही शुरू होती है.. कहां , क्या, कौन, कब, क‍िसने, क‍िसको , क‍सि‍तर‍ह आद‍ि प्रश्न जबतक नहीं उभरेंगे तब तक पत्रकार‍िता अपने उद्देश्य को हास‍िल नहीं कर सकती परंतु अब … अब तो हो ये रहा है क‍ि सुबह सुबह ही मीड‍िया मैनेजमेंट की ओर से मीट‍िंग में मुद्दे तय कर द‍िये जाते हैं और गरीब, मजलूम, अन्याय, बदइंतजामी से सुव‍िधानुसार मुंह फेर ल‍िया जाता है।

व‍िडंबना ये है क‍ि भरोसा खो चुका मीड‍िया अब अपनी इस ग‍िरावट के ल‍िए क‍िसी और को दोष भी नहीं दे सकता क्यों क‍ि ये सब उसके अपने लालच व स्वार्थ ने क‍िया है। बस एक शेर और बात खत्म क‍ि

संभला तो कभी भी जा सकता है, कोश‍िश तो करे कोई…
इस कुफ्र की दीवार को हल्का ही धक्का काफी है… ।

-अलकनंदा स‍िंंह  

रविवार, 6 सितंबर 2020

र‍िश्तों पर भारी पड़ता मुआवज़ा

 

क‍िसी पीड़‍ित को त्वर‍ित राहत देने के ल‍िए जब कभी भी मदद के नाम पर ''मुआवजे'' शब्द का ईजाद क‍िया गया था तब शायद ही क‍िसी ने सोचा होगा क‍ि ये मदद र‍िश्तों पर क‍ितनी भारी पड़ सकती है। प‍िछले कुछ समय से ध्रुवीकरण करने के नाम पर राजनीत‍ि कर रहे दलों ने इसे ''कैक्टस'' बना द‍िया, जहां फूल की तरह द‍िखने वाला पैसा... र‍िश्तों में कांटे बोकर उन्हें जख़्मी कर जाता है और इस तरह तार तार हुए र‍िश्ते समाज में राक्षसी प्रवृत्तिायों को जन्म देते नज़र आते हैं। 


पहला उदाहरण है - फ‍िरोजाबाद में सीएए-एनआरसी के ख‍िलाफ हुए ह‍िंसक व‍िरोध प्रदर्शन में एक व्यक्ति मारा गया ज‍िसकी पत्नी को मुआवजे के तौर पर उप्र राज्य सरकार के व‍िपक्षी दल समाजवादी पार्टी की ओर से 5 लाख का चेक द‍िया गया, ज‍िसे हथ‍ियाने को देवर ने अपनी ही बेटी की हत्या कर इसका आरोप उस व‍िधवा पर लगा द‍िया। हालांक‍ि मामला खुल गया और पुल‍िस ने उस राक्षस को ग‍िरफ्तार भी कर ल‍िया परंतु मुआवजे के लालच में र‍िश्ते...तो तार तार हो गए ना ?


दूसरा उदाहरण - रेप व‍िक्टिम बताकर सरकार से मुआवजा हास‍िल करने वाले पर‍िवार का है ज‍िसने अपनी कई बेट‍ियों को इसका माध्यम बनाया और कई बार कई लोगों यहां तक क‍ि शासन-प्रशासन से भी मुआवजा झटका... हालांक‍ि देर से ही सही इस मामले की भी पोल खुल गई... और इज्ज़त मानी जाने वाली बेटी ''ब्लैकमेल‍िंग कर मुआवजा हथ‍ियाने'' की कुंजी बन गई। बाप भाई... बाप भाई ना रहे और बेटी बेटी ना रही।  


अब तीसरा उदाहरण मुआवजे के साथ साथ रंज‍िशन बदले का भी देख‍िए क‍ि आपसी दुश्मनी में अपनी ही क‍िशोर बेट‍ियों को पहले मरवाया फिर सुबूत ऐसी ऐसी जगह छोड़े क‍ि व‍िरोधी फंस जाये, ऐसा हुआ भी। व‍िपक्षियों ने हालचाल लेने के बहाने भारी मुआवजे की बरसात कर दी, सरकार को घेरा, हल्ला मचा, मीड‍िया ट्रायल चला... ये लंबा चलता भी परंतु ...  परंतु पोल खुली मुआवजे के बंटवारे में। क‍िशोर बेट‍ियों के र‍िश्तेदार आपस में भ‍िड़ गए और सारे के सारे '' आंसू बहाते - दहाड़ मार कर रोते'' र‍िश्तों का सच सामने आ गया।   


चौथा उदाहरण शहीदों के पर‍िवारों को म‍िलने वाले मुआवजे का है। शहीद सैन‍िकों के ऐसे कई पर‍िवारों की पोल सरेआम खुली है, जो शहीद सैन‍िक के नाम पर बाकायदा धरने पर बैठे ताक‍ि जहां से ज्यादा से ज्यादा पैसा म‍िल सके, इन शहीदों के पर‍िजनों द्वारा ऐसा इमोशनल ड्रामा खेला जाता है क‍ि कोई भी सरकारी संस्था बेबस हो जाती है। कीमती ज़मीन पर शहीद की मूर्ति लगवा कर उस ज़मीन को अपने अध‍िकार में ले लेने, शहीद के नाम पर सब्सिडी के साथ ब‍िना स‍िक्यूर‍िटी जमा कराए पेट्रोल पंप  लेने, सैन्य व‍िभाग द्वारा दी गई सहायता के अलावा अनेक संस्थाओं से नकद धनराश‍ि बटोरने के ल‍िए कभी जाम लगाना, क‍िसी बड़े नेता व अध‍िकारी के आ जाने पर ही शहीद का अंत‍िम संस्कर करना आद‍ि दृश्य आमतौर पर देखे जा सकते हैं।  


पुलवामा हमले में मारे गए सीआरपीएफ के एक जवान के पर‍िवार में तो मुआवजा हास‍िल करने का मामला कोर्ट तक जा पहुंचा, ससुर ने बहू को धमकी दी तो बहू ने अपने मायके पक्ष से ससुर पर हमला करवा द‍िया... ऐसा क्यों ? क्योंक‍ि सरकार, व‍िपक्ष और सामाज‍िक संस्थाओं ने लगभग 3 करोड़ का मुआवजा अकेले इस पर‍िवार पर '' बरसाया'' ... नतीजा क्या न‍िकला...? र‍िश्तों की ऐसी तैसी तो हुई ही उस जवान की शहादत भी जाया  गई। 


कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं क‍ि शहीद की पत्नी ने मुआवजा राश‍ि लेकर अपनी दूसरी शादी तो ठाटबाट से कर ली और शहीद के बच्चों को दरबदर कर द‍िया ... और ये सब स्वयं उनकी सगी मां ने क‍िया, तो कहीं इसके बंदरबांट में जेल तक जाने की नौबत आ गई, और तो और इसी राश‍ि पर शहीदों के बच्चों ने क्राइम का रास्ता अख्तियार कर ल‍िया। 


हालांक‍ि सभी शहीदों के पर‍िवार ऐसे नहीं होते परंतु अब ऐसे मामलों की अध‍िकता शहादत का अपमान कर रही है। कुल म‍िलाकर बात इतनी सी है क‍ि अब मुआवजा एक ऐसा हथ‍ियार बन गया है जो पीड़‍ित के ज़ख्मों पर तुरंत मरहम लगाता द‍िखता तो है परंतु एक मीठे ज़हर की भांत‍ि ये र‍िश्तों को तार तार भी क‍िए दे रहा है। लाशों पर मुआवजा हास‍िल करने वालों ने हमारी मृत देह का सम्मान करने वाली परंपराओं, र‍िश्तों और फ‍िर समाज के आधारों को छ‍िन्न भ‍िन्न कर द‍िया है, अब सोचने की बारी हमारी है क‍ि इस मुआवजा- संस्कृत‍ि को कैसे रोका जाए, बात बात पर '' रहम की भीख ''  देकर ज‍िस मक्कारी को हमने यहां तक आने द‍िया, अब उस पर पुन: सोचें ताक‍ि ''क‍िसी भी मृतक'' के नामपर ना तो मुआवजा बंटे और ना ही इस मुआवजे के बंदरबांट पर र‍िश्तों से हम कंगाल हो जायें।  

- अलकनंदा स‍िंह 

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

व‍िवाद करके कहीं के न रहे साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर के मारे ये बुद्ध‍िजीवी

कुछ साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर ऐसे होते हैं जो व्यक्ति, व‍िषय, देश और ''समाज के अह‍ित में ही अपना ह‍ित'' समझते हैं , इस तरह के ड‍िसऑर्डर्स में सुपरमेसी की लालसा इतनी हावी होती है...क‍ि दूसरे को ध्वस्त करना ही मकसद हो जाता है, चाहे इसमें खुद ही क्यों ना फना हो जायें।

आजकल इस ड‍िसऑर्डर से ही गुजर रहा है साह‍ित्य का वो धड़ा जो स्वयं को प्रगत‍िशील कहता न थकता था, साह‍ित्य के शीर्ष पर यही व‍िराजमान था ज‍िसने अपनी वामपंथी सोच के चलते देश में द्रोह-राजनीत‍ि से  ''न‍िकम्मेपन की प्रवृत्त‍ि'' यशोगान क‍िया, बुर्जुआ को गर‍ियाना और सर्वहारा को न‍िकम्मा बनाना इसका अभ‍ियान रहा परंतु अब यही धड़ा अपने साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर के कारण बदहवास स्थ‍ित‍ि में है, बात बात पर व‍िरोध करने की प्रवृत्त‍ि ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा।

द‍िल्ली दंगों पर ल‍िखी क‍िताब Delhi Riots 2020: untold story को प्रकाश‍ित ना होने देने का जो अभ‍ियान इस वाम पंथी धड़े ने चलाया था, वो उसी पर भारी पड़ गया। दरअसल Delhi Riots 2020: untold story की तीनों लेखिकाओं वकील मोनिका अरोड़ा, डीसयू की प्रोफेसर सोनाली चितलकर व प्रेरणा मल्होत्रा द्वारा फील्ड में घूम कर, कई लोगों से इंटरव्यू लेकर और पुलिस जाँच के आधार पर जो लिखा और संपादित किया गया है उसे  सितम्बर में ही रिलीज किया जाना था, वर्चुअल बैठकों में इसके रिलीज को लेकर बैठकें हो रहीं थीं। परंतु अभ‍िव्यक्त‍ि की आजादी पर पूरे देश को स‍िर पर उठा लेने वालों ने ब्लूमबेरी पब्ल‍िकेशन से क‍िताब के प्रकाशन पर रोक लगवा दी, क‍िताब की लेख‍िकाओं ने इस व‍िरोध को एक चैलेंज के तौर पर लेते हुए गरुड़ प्रकाशन से अपनी क‍िताब का प्रकाशन करवा ल‍िया और अब यह क‍िताब अभी तक लाखों के प्र‍िऑर्डर पर बुक हो चुकी है तथा आगे भी ब‍िक्री के सारे र‍िकॉर्ड टूटने वाले हैं। 

इस पूरे प्रकाशन व‍िरोध अभ‍ियान में पत्रकार तवलीन स‍िंह के बेटे पाक‍िस्तानी कट्टरवादी आत‍िश तासीर, मुगल कालीन इत‍िहास को मह‍िमामंड‍ित करने वाली पुस्तकें ल‍िखने वाले स्कॉटिश लेखक विलियम डेलरिम्पल, कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी के नेता, दक्षिण एशिया सॉलिडैरिटी इनिशिएटिव से जुड़े बुद्ध‍िजीवी, अभिनेत्री स्वरा भास्कर, कई पत्रकार शाम‍िल थे। ज‍िसमें खासकर वाम बुद्धिजीवियों ने क‍िताब के पब्ल‍िकेशन को रुकवाने के ल‍िए ब्लूमबेरी प्रकाशन पर स्ट्रेटज‍िक व फाइनेंश‍ियल हर तरह का दबाब बनाया और प्रकाशन रुकवाने में कामयाब भी रहे परंतु इस जद्दोजहद में वे यह भूल गए क‍ि वे स्वयं इस सब में बेनकाब हो गए हैं। स्वयं आतिश तासीर ने कहा कि स्कॉटिश इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल ही वो व्यक्ति हैं, जिसने इस पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगवाई। विलियम डेलरिम्पल ने भी इसी अगस्त 21 को कहा था कि वो दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक का प्रकाशन रोकने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

सवाल उठता है क‍ि पुस्तक का प्रकाशन रुकवाने के इस पूरे मामले में उनके हाथ क्या लगा...इतनी क्या इमरजेंसी क‍ि ये सब के सब इकठ्ठे होकर देश से लेकर व‍िदेशी लेखकों तक की मदद मांगने को व‍िवश हुए  ... क‍िताब में ऐसा क्या था क‍ि ये सब भयभीत हो रहे थे ...मात्र दंगे की र‍िपोर्ट‍िंग पर इनका भयभीत हो जाना '' दाल में काला '' की ओर इशारे नहीं करता क्या...। क‍िताब का प्रकाशन रुकवाकर हो सकता है ये खुश हो रहे हों परंतु अब जबक‍ि यही क‍िताब गरुड़ प्रकाशन से बाजार में आ रही है, तब इनका ये पूरा का पूरा अभ‍ियान चौपट हो गया। अभी तक ज‍िस क‍िताब को एक ल‍िम‍िटेड वर्ग पढ़ता अब उसी क‍िताब की गरुड़ प्रकाशन द्वारा छापने की घोषणा करने के चंद घंटों के भीतर ही 20 हजार प्रत‍ियों की  प्र‍िबुक‍िंग हो गई।

वामपंथ‍ियों की इस स्थ‍ित‍ि पर मुझे ''मोर के नाचने'' का सीन याद आ रहा है, ज‍िसमें पंखों की ओर से भले ही वो खूबसूरत द‍िखे परंतु असल में वो नंगा हो रहा होता है। मुझे आश्चर्य होता है अपने ''बौद्ध‍िक'' कहलाने पर भी क‍ि कैसे कैसे जाह‍िलों को अभी तक हमने ढोया, कैसे कैसे द्रोह‍ियों को हम अभी तक सरआंखों पर बैठाते आए... कैसे कैसे...  परंतु अब और नहीं, भांडा फूट चुका है... मैं जो क‍ि सदैव लेखन में न‍िरपेक्षता न‍िरपेक्षता रटती रही आज महसूस हुआ क‍ि समस्या की ओर से आंखें मूंद लेना न‍िरपेक्षता नहीं कायरता होती है परंतु अब और नहीं ।

- अलकनंदा स‍िंंह

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

ये सोशल मीड‍िया है… बुरी ज़हन‍ियत को नंगा भी कर देता है

हाल ही में घट‍ित हुए तीन उदाहरणों से मैं एक बात पर पहुंची हूं क‍ि दंगाई हों, सफेदपोश नेता हों, कव‍ि हों या शायर हों, इस सोशल मीड‍िया के समय में क‍िसी की कारस्तानी छुपी नहीं रह सकती। कल तक हम ज‍िन्हें स‍िर आंखों पर बैठाते थे और अचानक उनकी कोई ऐसी करतूत हमारे सामने आ जाए जो न केवल समाज व‍िरोधी हों बल्क‍ि देश व‍िरोधी भी हो तो इसके ल‍िए हम सोशल मीड‍िया को ही धन्यवाद देते हैं। फिर मुंह से न‍िकल ही जाता है क‍ि अच्छा हुआ पता चल गया वरना…
इस तर‍ह बेपर्दा होने के तीन उदाहरण हमारे सामने हैं। कल बैंगलुरु में हुई ह‍िंसा, फिर राहत इंदौरी का चले जाना और उससे एक द‍िन पहले मुनव्वर राणा साहब का ज़हर उगलना।
पहला उदाहरण- बैंगलुरू ह‍िंसा मामले की शुरुआत भगवान कृष्ण को रेप‍िस्ट बताकर राधा जी और गोप‍ियों के ख‍िलाफ ”कुछ तत्वों” द्वारा अनर्गल ल‍िखने से हुई परंतु प्रचार‍ित ये क‍िया जा रहा है क‍ि ”मुहम्मद साहब” के ख‍िलाफ अनर्गल ट्विटर पोस्ट पर बवाल हुआ और ”कुछ तत्वों” ने आगजनी कर लाखों की संपत्त‍ि फूंककर पुल‍िस पर हमला करते हुए दर्जनों पुल‍िसकर्मी घायल कर द‍िए… । इसके बाद हमारे तथाकथ‍ित धर्मन‍िरपेक्ष ठेकेदारों ने मंद‍िर के आगे मानव श्रृंखला बनाए खड़े कुछ मुस्ल‍िम युवकों की तारीफ में कसीदे पढ़े ही थे क‍ि सोशल मीड‍िया ने सारा सच उगल द‍िया… क‍ि पूर्व न‍ियोज‍ित था यह क‍ि ह‍िंसा व आगजनी के बाद ऐसा वीड‍ियो बनाकर ”खास तरह” से प्रचार‍ित क‍िया जाए। हिंसा में बड़ी बात निकलकर सामने आई है। पुलिस की मानें तो 5 दंगाइयों ने 300 लोगों का गैंग बनाया था। उनका प्लान सभी पुलिस वालों को जान से मारने का था। हमलावरों ने हिंसा के दौरान पुलिस को निशाना बनाने के लिए गुरिल्ला जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया। 


आलोक श्रीवास्तव द्ववारा राणा को ल‍िखा पत्र-

दूसरा उदाहरण हैं – जाने माने शायर मुनव्वर राणा, ज‍िन्होंने राम मंद‍िर पर सुप्रीमकोर्ट के न‍िर्णय को गलत बताते हुए एकसाथ देश की सुप्रीम कोर्ट व सरकार पर सवाल खड़े कर अपनी ”अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता” का बेजां इस्तेमाल क‍िया। ये वही मुनव्वर राणा हैं जो आजतक के पूर्व एंकर व शायर आलोक श्रीवास्तव की नज़्म चुराकर उन्हीं की मौजूदगी में मुशायरे में अपने नाम से सुना चुके हैं, मैं उस पत्र को भी यहां चस्‍पा कर रही हूं जो आलोक श्रीवास्तव ने मुनव्वर राणा को ल‍िखा था। ये पत्र भी सरेआम हो गया और मुनव्वर राणा की हक़ीकत हमें बता गया।
हालांक‍ि सोशल मीड‍िया दोधारी तलवार भी है तो बूमरैंग भी, दोधारी तलवार इसल‍िए क‍ि इस पर आने वाली सूचनाएं कहर बरपा सकती हैं और जागरूकता भी पैदा कर सकती हैं। बूमरैंग इसल‍िए क‍ि इस पर डाली गई साम‍ग्री लगातार घूमकर कब हमारे सामने क‍िसे नंगा कर दे, कहा नहीं जा सकता। सोशल मीड‍िया क‍ि पूरी प्रोसेस में परदे के पीछे से घात करने वाले बहुत द‍िनों तक छुप नहीं पाते, उनके कुकृत्य सबके सामने आ ही जाते हैं। मुनव्वर राणा इसका ताजा उदाहरण हैं।

अब तीसरा उदाहरण राहत इंदौरी साहब का- हालांक‍ि मरने के बाद हमारे संस्कारों में नहीं है क‍िसी की मजामत करना, परंतु अटल ब‍िहारी वाजपेयी से लेकर अहमदाबाद के दंगों पर उनकी ज़ुबान का ज़हर तो हमने मुशायरों में बहुत सुना परंतु कभी वह गोधरा का सच ना बोल सके…आख‍िर क्यों.. ?? मुशायरों के मंच से युवाओं को अहमदाबाद दंगे याद रखने को कहते हैं और मुंबई दंगे भूल जाते हैं, उन्हें 370 तो याद रहता है…व‍िस्थाप‍ित पंड‍ितों को भूल जाते हैं। स‍िर्फ ह‍िंदू ही क्यों, उन्हें तो तीन तलाक़ का खत्म होना भी अखरता है पर हलाला भूल जाते हैं.. इन सबके सुबूत सोशल मीड‍िया हमें देता रहता है परंतु हम ही अगर एक आंख से देखेंगे तो कैसे इनकी असल‍ियत पहचानेंगे … अब यही मीड‍िया उनकी कलई खोल रहा है।
देख‍िए वीड‍ियो-


सत्य कड़वा होता है, सुना नहीं जाता परंतु सोशल मीड‍िया ही है जो अब इन जैसों को नंगा कर रहा है। बैंगलुरू ह‍िंसा के पीछे छुपे तत्व हों या मुनव्वर राणा व राहत इंदौरी जैसे बड़े शायर, सबकी ज़हन‍ियत के सच से हमें सावधान रहना होगा।
- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

…आख‍िर ये भी तो कानून का मजाक उड़ाना ही है


भतृहर‍ि ने कहा था- क्षत‍ि क्या है= समय पर चूकना… और हम ये क्षत‍ि बहुत पहले से करते आ रहे हैं, खासकर न्याय व्यवस्था में। आवश्यक न्याय‍िक सुधारों को लेकर समय पर चूकना आज हमें ऐसे दलदल में फंसा चुका है ज‍िससे न‍िकलने के आसार कहीं द‍िखाई नहीं दे रहे। आजादी के बाद से न्याय प्रदान करने वाली जो संस्थाएं देश की रीढ़ बनीं, वे ही अपने कर्तव्यों से चूकती गईं। वे सुधार कर सकती थीं परंतु समय पर न‍िर्णय ना ले सकीं नतीजतन देश में न्याय व्यवस्था का आलम ये हो गया है क‍ि आजकल न‍िचली कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सभी ऐसा अंधा कुंआं बन कर रह गई हैं ज‍िनके पेट में ”वादी व प्रत‍िवादी” दोनों पक्षों का बेशुमार पैसा, समय, शक्त‍ि… सब समाता जा रहा है और इतना ” खाकर” भी इनकी दुर्दशा जस की तस है।
सरकारी स्तर पर क्या होना चाह‍िए, क्या नहीं हुआ … आज इस पर बात नहीं, बल्क‍ि बात इस पर है क‍ि कॉमन सेंस भी यद‍ि इस्तेमाल क‍िया जाए तो जो साढ़े तीन करोड़ मुकद्दमों का बोझ ”सुरसा” बनता जा रहा है, उसे न‍िपटाया जा सकता है। बहुत छोटे-छोटे मामलों का न‍िपटारा करके मुकद्दमों का बोझ कम क‍िया जा सकता है। न्‍यायिक जांचों के नाम पर मामले लटकाना न्यायालयों की कार्यशैली का ह‍िस्सा बन गया है, इससे बचा जा सकता है परंतु ऐसा करे कौन, ज‍िन्हें करना है वे न्याय‍िक-भ्रष्टाचार के मोहरे हैं।
अफरशाही की जकड़न इतनी है क‍ि पहले तो पुल‍िस अपराध‍ियों से जूझे, फ‍िर अदालतों के अंतहीन झमेले से। क‍िसी अपराधी के एनकाउंटर के बाद ”उसी एनकाउंटर की ही फ‍िर से जांच” के नाम पर बनाई गई जांच सम‍ित‍ियां आख‍िर क्या हैं। ये तो न्याय व्यवस्था पर अत‍िर‍िक्त बोझ के स‍िवाय कुछ और है ही नहीं। ये अत‍िर‍िक्त बोझ स‍िर्फ मामले को लटकाए रखने, जांच आयोगों के अध्यक्षों पर बेवजह धन जाया करने का माध्यम है, और कुछ नहीं। जांच आयोग के अध्यक्ष अध‍िकांशत: र‍िटायर्ड अध‍िकारी होते हैं, पेंशन पाते हैं फ‍िर भी ये कोई अवैतन‍िक काम नहीं करते, बल्क‍ि हर अध्यक्ष को प्रत‍ि सुनवाई 1.50 लाख और आयोग के अन्य सदस्यों को 1 – 1 लाख रुपये प्रत‍ि सुनवाई भुगतान क‍िया जाता है। इतना आर्थ‍िक बोझ…वो भी स‍िर्फ जांच के नाम पर ?
कानून एक सा, कानून की पढ़ाई एक सी, कानून के ओहदेदारों की समझ (जैसा क‍ि समझा जाता है) एक सी, तो फ‍िर एक ही कानून में क्यों न‍िचली अदालतों के न‍िर्णय हाईकोर्ट नहीं मानते, हाई कोर्ट के न‍िर्णय सुप्रीम कोर्ट में रद्द कर द‍िए जाते हैं… आख‍िर ये भी तो कानून का मजाक उड़ाना ही है।
व‍िकास दुबे एनकाउंटर मामला हो या हैदराबाद रेप‍िस्ट एनकाउंटर, दोनों ही मामलों में जांच आयोग बैठाना कहां तक उच‍ित है। न‍िश्च‍ित रूप से ये सही है क‍ि क‍िसी न‍िर्दोष के साथ अन्याय नहीं होना चाह‍िए परंतु जो सरेआम अपराध करते रहे, उनके ”अंजाम” पर संदेह कर जांच आयोग बैठाना कहां तक उचि‍त है। ये क्या कम था क‍ि अब हैदराबाद रेप‍िस्ट एनकाउंटर मामले की जांच सम‍ित‍ि का कार्यकाल 6 महीने बढ़ा द‍िया गया ”कोरोना के कारण जांचकार्य में देरी” के नाम पर। ये सीधा सीधा आर्थ‍िक दोहन और न्याय‍िक-भ्रष्टाचार का स्पष्ट उदाहरण है। तभी तो सोच कर देख‍िए क‍ि आख‍िर जांच आयोगों की जांच कभी समय पर पूरी क्यों नहीं होती, अदालती अफरसरशाही का कुचक्र है ही ऐसा क‍ि क‍िसी मामले की जांच को लटकाए रखने के ल‍िए जब प्रत‍ि सुनवाई लाख से डेढ़ लाख तक म‍िलते हों तो ये ”कानूनी अफसर” क्योंकर चाहेंगे क‍ि जांच कभी पूरी भी हो।
सुप्रीम कोर्ट चाहे तो इन बेवजह के दांवपेंचों से अदालतों का बोझ कम कर सकता है, मुकद्दमों में कमी तो आएगी ही, अदालतों पर जाया हो रहे धन की बरबादी भी रोकी जा सकेगी परंतु ये बात तो हम कह सकते हैं, वे ”जस्ट‍िस” करने वाले वे न्यायिक अध‍िकारी ऐसा नहीं करेंगे क्योंक‍ि आगे कोई जांच आयोग उनका भी तो इंतज़ार कर रहा होगा।
- अलकनंदा स‍िंह 

बुधवार, 22 जुलाई 2020

श‍िद्दत से सक्र‍िय हैं जड़ों से द्रोह करने वाले


आज दो मुद्दे मेरे सामने हैं … एक तो राम और दूसरी ह‍िंदी । दोनों ही अपनी व्यापकता के पश्चात भी नकारे गए और समय समय पर व‍िरोधी अभ‍ियानों से घ‍िरे रहे। इसे मैं सनातन संस्कृत‍ि और भाषा के प्रत‍ि उन लोगों का ”भय” ही कहूंगी जो बेहद नकारात्मकता के साथ अपनी ही जड़ों से द्रोह करते रहे और जो अपनी जड़ों से द्रोह करता है उसे समाज बहुत द‍िनों तक नहीं ढोता।
यही दशा आजकल उन राजनैत‍िक, सामाज‍िक व बौद्ध‍िक संस्थाओं की हो रही है जो देश में कथ‍ितरूप से लोकतंत्र , आजादी, अभ‍िव्यक्त‍ि की बात कर रही हैं। जो यहीं पनपीं और यहीं के संस्कारों को गर‍ियाती रहीं, उन्हें पराई पत्तर का भात ज्यादा स्वाद‍िष्ट लगता रहा है इसील‍िए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम काल्पन‍िक लगते ही हैं, उन्हें ह‍िंदी भी व‍िमर्श की भाषा तो लगती है परंतु उसे सर्वग्राह्य बनने नहीं देते। वे ह‍िंदी की रोजी पर पल रहे हैं परंतु तलवे ह‍िंदी व‍िरोध‍ियों के चाटते हैं।
राम से द्रोह कर उन्हें काल्पन‍िक बताने वाले न कभी जानेंगे और ना ही जानने का प्रयास भी करेंगे क‍ि आख‍िर राम को जन जन का बनाने वाली वाल्म‍िकी रामायण का आरंभ कैसे हुआ, वे कौन से प्रश्न थे ज‍िनसे वाल्म‍िकी प्रेर‍ित हुए राम कथा ल‍िखने को। वाल्म‍िकी रामायण के बालकांड के प्रथम सर्ग इसका प्रमाण है क‍ि वाल्म‍िकी ने जब नारद मुन‍ि से पूछा क‍ि संसार में ऐसा कौन है जो इस समय इस लोक में गुणवान, शक्ति‍शाली, धर्मज्ञाता, कृतज्ञ, सत्यभाषी, चर‍ित्रवान, सब प्राण‍ियों की भलाई चाहने वाला, क्रोधहीन व ओजस्वी है। तब नारद मुन‍ि ने कहा क‍ि वे इच्छवाकु वंश में पैदा हुए हैं, उनका नाम राम है, ज‍िस प्रकार नद‍ियां सागर के पास जाती हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुष राम के पास जाते हैं।
इस उत्तर के बाद ही राम की कथा का प्रारंभ हुआ और ये कल्पना नहीं बल्क‍ि वाल्म‍िकी ने एक नायक के सर्वोत्कृष्ट गुणों को आमजन के समक्ष इसील‍िए रखा क‍ि वो अपने आचरण में इन्हें सम्मि‍लि‍त कर सके और रामराज्य जैसी व्यवस्था का सुख ले सके। वो रामराज्य… ज‍िसमें व‍िपरीत सोच वाले को भी बराबरी का अध‍िकार म‍िला। तो क्या ये रामद्रोही वाल्म‍िकी रामायण के बालकांड के प्रथम सर्ग को पढ़ेंगे, नहीं… ब‍िल्कुल भी नहीं। पढ़ लेंगे तो फ‍िर राम से द्रोह कैसे कर पाएंगे।
वाल्म‍िकी के राम की पूजा तो इनके वश की नहीं परंतु ये द्रोहकारी लोग तो जानबूझकर भारतीय धर्म और दर्शन की भी उपेक्षा करते हैं। तभी तो उन्हें अपने कथ‍ित ”बौद्ध‍िक व‍िमर्श” में समुद्र मंथन पर दाराश‍िकोह के ल‍िखे मज्मउल बहरैन द‍िखाई नहीं देता, वे अलबरूनी,अब्दुर्रहीम खानखाना, मल‍िक मोहम्मद जायसी, नजीर अकबराबादी की रचनाओं और व‍िचारों को भी बड़ी चालाकी से छुपा जाते हैं। ये वे लोग हैं जो कुरान और बाइब‍ि‍ल सुनकर उसकी तारीफ में झुक ही नहीं जाते बल्क‍ि इन पर कभी बहस करने की ह‍िम्मत भी नहीं करते परंतु हां, वेद-पुराण का कोई जिक्र करे तो फौरन उसे सांप्रदायवादी, पोंगापंथी कहकर कुतर्क करने से भी बाज नहीं आते। उन्हें तो तीन युगों को पार कर आने वाला आज का समृद्ध ”सनातन धर्म” में भी आद‍िकालीन मनु द‍िखते हैं। इसी तरह उन्हें वैद‍िक शोधों से एलर्जी है।
ये द्रोहकारी प्रवृत्त‍ि क‍िसी एक जाति, धर्म, संप्रदाय में नहीं बल्क‍ि ये तो एक खास वर्ग है जो कलुष‍ित मानस‍िकता वाला है ज‍िसे न‍िज भाषा, न‍िज धर्म, न‍िज देश और न‍िज माटी को लेकर हीनताबोध है, यह प्रवृत्त‍ि उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी।
– अलकनंदा स‍िंह